18 सितम्बर 1948 : निजाम का समर्पण और हैदराबाद भारत का अंग बना

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पूरे संसार में केवल भारत ऐसा देश हैं जहां स्वतंत्रता के बाद भी स्वतंत्रता का स्वरूप लेने के लिये भी लाखों बलिदान हुये और करोड़ो लोग बेघर हुये । जिन स्थानों पर स्वतंत्रता के बाद भी भारी हिंसा और संघर्ष हुआ उनमें एक हैदराबाद रियासत भी रही है । जहाँ सेना के हस्तक्षेप के बाद ही हिंसा रुक सकी और और वह भूभाग भारतीय गणतंत्र का अंग बन सका । सेना ने 13 सितम्बर को हैदराबाद में प्रवेश किया, 17 सितम्बर की शाम को हैदराबाद के निजाम ने समर्पण किया और 18 सितम्बर को विलीनीकरण दस्तावेज पर हैदराबाद के शासक निजाम के हस्ताक्षर हुये ।

स्वतंत्रता के पूर्व भारत में तीन प्रकार का प्रशासनिक स्वरूप था । एक जो सीधा अंग्रेजों के आधिपत्य में था, दूसरा वह अंग्रेजों का ध्वज और दासता तो थी किंतु निचले स्तर पर किसी राजा या नबाब का शासन था । और तीसरा डच या फ्रांसीसी सत्ता के हाथ । जून 1947 में वायसराय माउंटवेटन द्वारा बनाये गये फार्मूले से 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता तो मिली पर यह स्वतंत्रता केवल ब्रिटिश आधिपत्य वाले क्षेत्रों तक ही सीमित थी । अंग्रेज जा तो रहे थे लेकिन वे एक ऐसे भारत की नींव बनाकर जा रहे थे जो सतत गृह कलह और रक्तपात में ही उलझा रहे । उन्होंने एक चाल चली । अंग्रेजों ने भारतीय रियासतों को भी स्वतंत्रता दी थी और उनसे कहा था कि वे चाहें तो स्वतंत्र रहें अथवा भारत या पाकिस्तान किसी में मिल लें । इसका लाभ कुछ रियासतों ने उठाया उसमें हैदराबाद भी थी । सभी रियासतों को जून 1947 में ही इस फार्मूले की सूचना मिल गयी थी । सूचना मिलते ही जून 1947 में हैदराबाद के शासक निजाम ने स्वयं को स्वतंत्र रहने का पत्र भेज दिया था और स्वतंत्र रहने की तैयारी आरंभ कर दी थी । निजाम को इस काम में अंग्रेजों का मौन और मोहम्मद अली जिन्ना का खुला समर्थन मिल गया था । लेकिन हैदराबाद रियासत की जनता निजाम शासन से मुक्ति चाहती थी । वह भारतीय गणतंत्र का हिस्सा बनना चाहती थी । इसका कारण हैदराबाद के शासकों का समाज पर दमन और अत्याचार करना था । हैदराबाद रियासत में बहुमत तो हिन्दु परंपरा को मानने वालों का था लेकिन वहां कानून इस्लामिक शरीयत के अनुसार चलता था । यह कानून हैदराबाद में 1720 से ही लागू हो गया था । यह निजाम शाही के आरंभ होने का वर्ष था । और जब 1798 में निजाम अंग्रेजों के आधीन हो गया तब भी आतंरिक शासन व्यवस्था में कोई अंतर न आया । हैदराबाद में धार्मिक सत्ता के अधिकारों का दुरुपयोग, बहुसंख्यक समाज का शोषण और उत्पीड़न का क्रम बना रहा । इसलिये हैदराबाद का बहुसंख्यक निजाम से मुक्ति चाहता था ।

हैदराबाद के नबाब को “निजाम-उल-मुल्क” की उपाधि मुगल बादशाह ने दी थी जिससे हैदराबाद का हर नबाब निजाम कहलाया । रियासत का आधिकारिक धर्म ही इस्लामिक प्रावधानों के अनुसार नहीं था अपितु अधिकांश शासकीय पदों पर भर्ती भी मुस्लिम समाज के लोगों की जाती थी । शीर्ष पदों पर तो एक भी गैर मुस्लिम नहीं था । रियासत को अंग्रेजों ने अपने आधीन तो कर लिया था पर रियासत के अदरूनी व्यवस्था में कोई हस्तक्षेप नहीं किया था । इसका कारण यह था कि अंग्रेजों को शासन व्यवस्था में कोई रूचि न थी । उनके केवल दो उद्देश्य थे । एक तो हैदराबाद रियासत से सालाना पैसा मिले और दूसरा आवश्यकता पड़ने पर निजाम उनकी सहायता के लिये अपने खर्चे पर सेना भेजे । निजाम इस काम को सहर्ष कर रहा था । अंग्रेजों को निजाम की जरूरत मराठों के विरुद्ध अभियान शुरु करने के लिये पड़ती थी । इसलिए उन्होने निजाम को कुछ विशेष अधिकार भी दे रखे थे । निजाम के मन में मराठा शासन के प्रति कितनी कटुता थी इस बात का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब मराठों ने भोपाल में अभियान चलाया तो भोपाल नबाब की मदद करने के लिये निजाम की फौज भोपाल आई थी । यह अलग बात है कि भोपाल के युद्ध में इस संयुक्त फौज को भी पराजय का मुंह देखना पड़ा । निजाम इससे पूर्व भी मराठों से पराजित हो चुका था इसलिये उसने अंग्रेजों से संधि कर ली थी । निजाम का सोच कितना साम्प्रदायिक था इसका एक उदाहरण यह भी है कि हैदराबाद रियासत में मुस्लिम आबादी केवल 11% प्रतिशत थी लेकिन रियासत की तीस प्रतिशत भूमि पर मुसलमानों का अधिकार था । इसके साथ वहां हिन्दुओं को हथियार रखने का अधिकार न था जबकि मुस्लिम समाज के पास हथियारों का जखीरा रहता था ।

हैदराबाद की इस विशिष्ट विचार और कार्य शैली कटुता और आक्रामकता 1921 के बाद और बढ़ी । यद्धपि रियासत के अधिकांश मुसलमान धर्मान्तरित थे उन्हे इसका आभास भी था लेकिन खिलाफत आँदोलन के बाद मुसलमानों में संगठन और आक्रामकता दोनों बढ़ी । अनेक स्थानों पर साम्प्रदायिक दंगे भी हुये । इसमें तेजी 1927 के बाद और बढ़ी इस वर्ष रियासत में एक संस्था “मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन” का गठन हुआ । इसका नेतृत्व सैय्यद कासिम रिजवी के हाथ में था । इस संस्था ने सशस्त्र समूह बनाया इसे “रजाकारों का संगठन” कहा गया । इस संगठन ने 1946 के डायरेक्ट ऐक्शन में बड़ी सक्रियता दिखाई और मुस्लिम समाज में अपनी पैठ और बढ़ा ली थी । इसके साथ जैसे जैसे स्वतंत्रता के क्षण समीप आ रहे थे यह संगठन और गहरी पकड़ बनाने लगा । 1946 के बाद निजाम इसी संगठन पर निर्भर हो गये थे । जून 1947 से हैदराबाद निजाम ने स्वयं को स्वतंत्र रहने की तैयारी आरंभ कर दी थी । 15 अगस्त 1947 को निजाम ने स्वयं को स्वतंत्र होने की और कासिम रिजवी ने इसे इस्लामिक देश होने की घोषणा कर दी । इस घोषणा के साथ हैदराबाद रियासत में हिंसा की शुरुआत हो गयी । रजाकारों और रियासत की सेना मिलाकर यह संख्या लगभग दो लाख थी जो हथियारों से युक्त थी अनेक स्थानों पर दमन लूटपाट, हत्या, बलात्कार और धर्मान्तरण का सिलसिला चल पड़ा । सैकड़ो हजारों परिवार सुरक्षित स्थानों की ओर भागे । आरंभ में भारत सरकार कश्मीर पर पाकिस्तान का हमला विभाजन के साथ बढ़ती हिंसा और शरणार्थियों की समस्या से जूझ रही थी इस कारण हैदराबाद की ओर ध्यान कम गया । तभी 1948 के आरंभ में यह सूचना मिली कि हैदराबाद में पाकिस्तान से सशस्त्र सैनिक आ रहे हैं उन्हें बसाया जा रहा है और रियासत हथियारों की खरीद के लिये आस्ट्रेलिया और चेकोस्लोवाकिया से 30 लाख पाउंड के हथियार खरीदने के आर्डर दिया है । तब तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने निजाम से बातचीत की किंतु निजाम के रवैये में कोई अंतर न आया उल्टे रिजवी की रजाकारों की गतिविधियां और बढ़ी ।

सरदार पटेल ने अंततः 9 सितम्बर 1948 को चेतावनी पत्र जारी किया । लेकिन निजाम न माना । 11 सितम्बर को हैदराबाद में सैन्य अभियान का निर्णय हुआ । इस अभियान को “आपरेशन पोलो” नाम दिया गया । 12 सितम्बर को सेना को कूच करने का आदेश दिया । 13 सितम्बर को सेना ने हैदराबाद आपरेशन आरंभ किया, 17 सितम्बर की शाम को निजाम ने समर्पण का प्रस्ताव दिया और 18 सितम्बर को विलीनीकरण दस्तावेज पर हस्ताक्षर हुये । सेना को इस अभियान में कुल 108 घंटे लगे । इस 108 घंटे के अभियान में सेना के कुल 329 जवानों के प्राणों का बलिदान हुआ । दूसरी तरफ निजाम सेना के 807और 1647 अन्य लोगों की मौत हुई । जून 1947 से सितम्बर 1948 के बीच इस लगभग सवा साल की अवधि में 22 से 30 हजार तक लोग मारे गये और एक लाख से अधिक लोग बेघर हुये । इस हिंसा पर विराम भारत सरकार की सक्रियता के साथ लगी । भारत सरकार ने कासिम रिजवी को गिरफ्तार कर लिया और उसकी संस्था मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमीन यनि MIM पर पाबंदी लगा दी । आगे कासिम रिजवी पाकिस्तान चला गया । वह इस संस्था की कमान अपने समय के मशहूर वकील अब्दुल वहाद औबेसी को सौंप गया था । वे इस समय के आक्रामक नेता औबेसुद्दीन औवेसी के पितामह थे ।

हैदराबाद रियासत कि क्षेत्रफल लगभाग 82 हजार वर्ग मील था । जो इंग्लैंड जैसे देश से भी अधिक है । तब इस रियासत की आबादी लगभग 1.6 करोड़ थी इसमें 85%हिन्दु, 11% मुसलमान और 4% अन्य थे । रियासत की वार्षिक आय लगभग 26 करोड़ वार्षिक थी । यह देश की दूसरी बड़ी रियासत मानी जाती थी । हैदराबाद के भारतीय गणतंत्र में विलीन होने के बाद भारत सरकार इन सारी घटनाओं की जाँच के लिये “सुन्दर लाल समिति” भी बनाई लेकिन राजनैतिक कारणों से यह रिपोर्ट सामने न आ सकी । इसे सार्वजनिक करने से रोक दिया गया था । इसके कुछ अश 2014 में ही सामने आ सके । हैदराबाद के विलीनीकरण के बाद भी किसी के पास इस प्रश्न का उत्तर न था उन निहत्थे सामान्य लोगों ने किसका क्या बिगाड़ना था जिन्हें हैदराबाद के आक्रामक जुनीनी लोगों ने लूटा, सब कुछ छीना, महिलाओं से बलात्कार किया और कुछ को मौत के घाट उतार दिया ।

ब्रज की देवालय परम्परा के संरक्षण हेतु ब्रज वृन्दावन देवालय समिति ने की महत्वपूर्ण पहल

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ब्रज के पौराणिक तीर्थ स्थलों, वनों, कुंड, मंदिरों आदि के संरक्षण हेतु और ब्रज भूमि का मूल स्वरूप बचाने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण पहल आज शुरू हुई।

वृन्दावन के श्री रंगनाथ मंदिर में ब्रज वृन्दावन देवालय समिति की पहली औपचारिक बैठक में विकास के दिशा भटकाव पर चिंता व्यक्त करते हुए, पधारे विशिष्ट जनों ने सामूहिक प्रयासों और सतत जन जागरण द्वारा श्री कृष्ण की लीला भूमि को सही दिशा देने का संकल्प लिया।
इस बैठक में ब्रज की देवालय परम्परा, संस्कृति, पौराणिक, मूल स्वरुप, और पर्यावरण पर विचार-विमर्श किया गया।

संयुक्त सचिव जगन नाथ पोद्दार ने बताया कि समिति का उद्देश्य ब्रज की देवालय परम्परा और मूल स्वरूप के संरक्षण और संवर्धन के लिए कार्य करना है। इसके अलावा, समिति ब्रज के वन, यमुना, कुण्ड, ब्रज रज, प्राचीन देवालय, साहित्य, और गौ वंश संरक्षण के लिए भी कार्य करेगी।

ब्रज क्षेत्र में स्थित विभिन्न मंदिर और तीर्थ स्थल हिंदू धर्म के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं।

इन मंदिरों के अलावा, ब्रज क्षेत्र में कई प्राचीन कुण्ड और सरोवर भी हैं जिनको संरक्षण की दरकार है।
इन तीर्थ स्थलों के संरक्षण और संवर्धन से न केवल हिंदू धर्म की परम्पराओं का संरक्षण होगा, बल्कि पर्यावरण और संस्कृति का भी संरक्षण होगा।

समिति ने यमुना शुद्धिकरण, ब्रज संरक्षण हेतु कार्य योजना तैयार करना, और प्राचीन मंदिरों की सूची तैयार करना जैसे महत्वपूर्ण निर्णय लिए। अगले छह महीने की कार्य सूची तैयार की गई।

इस अवसर पर कई गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया, जिनमें हरिश्चन्द्र गोस्वामी, भरत गोस्वामी, शम्भू दयाल पंडा, बलराम कृष्ण गोस्वामी, भारत जोशी, और कृष्णन स्वामी शामिल थे। आचार्य श्रीवत्स गोस्वामी जी ने अध्यक्षता की और जगन्नाथ पोद्दार ने संचालन किया।

Lecture held on Taiwan and India’s Cultural Convergence

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ALIGARH: Ms. Chang Shin Yun, a Taiwanese Scholar and visiting faculty at Amity University, Noida delivered a talk on “Taiwan and India’s Cultural Convergence: Exploring Opportunities in Multicultural Context” at the Chinese Division of the Department of Foreign Languages (DFL), Aligarh Muslim University.

She talked about the literature, society, lifestyle and scholarship opportunities in Taiwan and urged the students to look for new techniques to improve their Chinese.

Earlier, welcoming the guest speaker, Mr Md Yasin, the convener of the event, discussed various issues related to Taiwan and Taiwanese people and highlighted the importance of Taiwan as India’s strategic partner.

Prof. Mohammad Azher, Chairperson, DFL and Dean, Faculty of International Studies, said that the lecture has provided the students with an opportunity to get introduced to Taiwan in a better manner.

भारत के मार्च 2026 तक विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के संकेत

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भारत के सकल घरेलू उत्पाद का आकार 3.93 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर है। जबकि, जापान के सकल घरेलू उत्पाद का आकार 4.21 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का है एवं जर्मनी के सकल घरेलू उत्पाद का आकार 4.59 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का है। भारत की आर्थिक विकास दर लगभग 8 प्रतिशत प्रतिवर्ष बनी हुई है और जापान एवं जर्मनी की आर्थिक विकास दर लगभग स्थिर है अथवा इसके ऋणात्मक रहने की भी प्रबल सम्भावना है। इस दृष्टि से मार्च 2025 तक भारत जापान की अर्थव्यवस्था को पीछे छोड़कर विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा एवं मार्च 2026 तक भारत जर्मनी की अर्थव्यवस्था को पीछे छोड़ते हुए विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। हाल ही के समय में जर्मनी एवं जापान की अर्थव्यवस्थाओं में विभिन्न प्रकार की समस्याएं दृष्टिगोचर हैं, जिनके कारण इन दोनों देशों की आर्थिक विकास दर आगे आने वाले वर्षों में विपरीत रूप से प्रभावित रह सकती है।

द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात लगातार 4 दशकों तक जर्मनी पूरे यूरोपीयन यूनियन में तेज गति से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था बना रहा। इस दौरान विनिर्माण इकाईयों के बल पर जर्मनी ने अपने आप को विश्व में विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित कर लिया था एवं विभिन्न उत्पादों, विशेष रूप से कार, मशीनरी एवं केमिकल उत्पादों का निर्यात पूरे विश्व को भारी मात्रा में किया जाने लगा था। पिछले 20 वर्षों के दौरान जर्मनी पूरे यूरोपीयन यूनियन के विकास का इंजिन बना हुआ था। चूंकि चीन की अर्थव्यवस्था बहुत तेजी से विकास कर रही थी अतः पिछले 20 वर्षों के दौरान चीन, जर्मनी से लगातार मशीनरी, कार एवं केमिकल पदार्थों का भारी मात्रा में आयात करता रहा है। परंतु, अब परिस्थितियां बदल रही हैं क्योंकि चीन की अर्थव्यवस्था भी हिचकोले खाने लगी है और चीन ने विभिन्न उत्पादों का जर्मनी से आयात कम कर दिया है। अतः अब जर्मनी अर्थव्यवस्था पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है। आज बदली हुई परिस्थितियों में चीन, जर्मनी में निर्मित विभिन्न उत्पादों का आयात करने के स्थान पर वह जर्मनी का प्रतिस्पर्धी बन गया है और इन्हीं उत्पादों का निर्यात करने लगा है। दूसरे, पिछले लगभग 2 वर्षों से रूस ने भी ऊर्जा की आपूर्ति यूरोप के देशों को रोक दी है, रूस द्वारा निर्यात की जाने वाली इस ऊर्जा का जर्मनी ही सबसे अधिक लाभ उठाता रहा है। तीसरे, जर्मनी में प्रौढ़ नागरिकों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और एक अनुमान के अनुसार जर्मनी में आगे आने वाले एक वर्ष से कार्यकारी जनसंख्या में प्रतिवर्ष एक प्रतिशत की कमी आने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। इससे उपभोक्ता खर्च पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। चौथे, जर्मनी में नागरिकों की उत्पादकता भी कम हो रही है। जर्मनी में प्रत्येक नागरिक वर्ष भर में केवल 1300 घंटे का कार्य करता है जबकि OECD देशों में यह औसत 1700 घंटे का है। पांचवे, यूरोपीयन यूनियन में वर्ष 2035 में पेट्रोल एवं डीजल पर चलने वाले चार पहिया वाहनों के उत्पादन पर रोक लगाई जा सकती है जबकि इन कारों का निर्माण ही जर्मनी में अधिक मात्रा में होता है तथा जर्मनी की कार निर्माता कम्पनियों ने बिजली पर चलने वाले वाहनों के निर्माण पर अभी बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया है। साथ ही, जर्मनी ने नवाचार पर भी कम ध्यान दिया है एवं स्टार्ट अप विकसित करने में बहुत पीछे रहा है आज इन क्षेत्रों में अमेरिका एवं चीन बहुत आगे निकल गए हैं एवं जर्मनी आज अपने आप को असहाय सा महसूस कर रहा है। अतः जर्मनी अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव आगे आने वाले लम्बे समय तक चलने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है।

वैश्वीकरण की प्रक्रिया का प्रभाव भी जर्मनी अर्थव्यवस्था पर पड़ा है एवं अब पूरे विश्व में गैरवैश्वीकरण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो चुकी है। आज प्रत्येक विकसित एवं विकासशील देश अपने पैरों पर खड़ा होकर स्वावलंबी बनना चाहता है। अतः जर्मनी जैसे देशों से मशीनरी एवं कारों का निर्यात कम हो रहा है साथ ही इन उत्पादों की तकनीकि भी लगातार बदल रही है जिसे जर्मनी की विनिर्माण इकाईयां उपलब्ध कराने में असफल सिद्ध हुई हैं। पिछले 5 वर्षों के दौरान जर्मनी अर्थव्यवस्था में विकास दर हासिल नहीं की जा सकी है।

जर्मनी में सितम्बर 2023 माह में वोक्सवेगन (Volkswagen) कम्पनी ने अपनी दो विनिर्माण इकाईयों को बंद करने का निर्णय लिया है। यह कम्पनी जर्मनी में 3 लाख से अधिक रोजगार के प्रत्यक्ष अवसर उपलब्ध कराती है तथा अन्य लाखों नागरिकों को अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के अवसर उपलब्ध कराती हैं। इस कम्पनी ने जर्मनी में अपनी विनिर्माण इकाईयों में उत्पादन कार्य को काफी हद्द तक कम कर दिया है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से इस कम्पनी के उत्पादों की बिक्री लगातार कम हो रही है। पिछले 5 वर्षों के दौरान इस कम्पनी की बाजार कीमत आधे से भी कम रह गई है। इस कम्पनी की उत्पादन इकाईयों में चार पहिया वाहनों का निर्माण किया जाता रहा है परंतु अब इन उत्पादन इकाईयों में बिजली पर चलने वाली कारों के निर्माण में बहुत परेशानी आ रही है। बिजली पर चलने वाली कारों का जर्मनी में उत्पादन बढ़ाने के स्थान पर चीन से इन कारों का बहुत भारी मात्रा में आयात किया जा रहा है। अपनी आर्थिक परेशानियों को ध्यान में रखते हुए जर्मनी ने यूक्रेन को टैंकों की आपूर्ति भी रोक दी है। दरअसल कोरोना महामारी के बाद से ही, वर्ष 2020 के बाद से, जर्मनी की अर्थव्यवस्था अभी तक सही तरीके से पूरे तौर पर उबर ही नहीं सकी है।

एक अनुमान के अनुसार जर्मनी अर्थव्यवस्था का आकार वर्ष 2024 में भी कम होने जा रहा है, यह वर्ष 2023 में भी कम हुआ था और इसके वर्ष 2025 में भी सुधरने की सम्भावना कम ही दिखाई दे रही है। जर्मनी के सकल घरेलू उत्पाद में वर्ष 2024 के दौरान 0.1 प्रतिशत की कमी की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। बेरोजगारी की दर भी 6.1 प्रतिशत के स्तर तक ऊपर जा सकती है। जर्मनी अर्थव्यवस्था केवल चक्रीय ही नहीं बल्कि संरचनात्मक क्षेत्र में भी समस्याओं का सामना कर रही है। इसमें सुधार की कोई सम्भावना आने वाले समय में नहीं दिख रही है। हालांकि यूरोपीयन यूनियन में जर्मनी की अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है परंतु फिर भी भारत, उक्त कारणों के चलते, जर्मनी की अर्थव्यवस्था को मार्च 2026 तक पीछे छोड़ देगा, ऐसी सम्भावना व्यक्त की जा रही है।

इसी प्रकार, पिछले लगभग 30 वर्षों के दौरान जापान की अर्थव्यवस्था में मुद्रा स्फीति, ब्याज दरें एवं येन की कीमत स्थिर रही है। परंतु, हाल ही के समय में येन का अंतरराष्ट्रीय बाजार में अवमूल्यन हो रहा है एवं यह 160 येन प्रति अमेरिकी डॉलर के स्तर पर आ गया है, जो वर्ष 2009 के बाद से कभी नहीं रहा है। जापान की अर्थव्यवस्था कई उत्पादों के आयात पर निर्भर करती है। जापान अपनी ऊर्जा की आवश्यकताओं का 90 प्रतिशत एवं खाद्य सामग्री का 60 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। जापान द्वारा आयात की जाने वाली वस्तुओं की अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने से जापान में भी आयातित मुद्रा स्फीति की दर बढ़ रही है जो पिछले एक दशक के दौरान लगातार स्थिर रही है।

वर्ष 1955 से वर्ष 1990 के बीच जापान की अर्थव्यवस्था औसत 6.8 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से आगे बढ़ती रही। वर्ष 1990 तक जापान का स्टॉक मार्केट लगातार बढ़ता रहा एवं अचानक वर्ष 1990 में यह बुलबुला फट पढ़ा और जापान में आवासीय मकानों की कीमत 50 प्रतिशत तक गिर गई एवं व्यावसायिक मकानों की कीमत 85 प्रतिशत तक गिर गई। जापान के पूंजी बाजार में निक्के स्टॉक सूचकांक भी 75 प्रतिशत तक गिर गया।

जापान की अर्थव्यवस्था में तेजी के दौरान आस्तियों की बढ़ी हुई कीमत पर ऋण लिए गए थे परंतु जैसे ही इन आस्तियों की कीमत बाजार में कम हुई, नागरिकों को ऋणराशि की किश्तें चुकाने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ा और इससे भी जापान में आर्थिक समस्याएं बढ़ी थी। दिवालिया होने वाले नागरिकों की संख्या बढ़ी और देश में अपस्फीति की समस्या प्रारम्भ हो गई थी। जापान की सरकार ने आर्थिक तंत्र में नई मुद्रा की मात्रा बढ़ाई और ब्याज दरों को लगभग शून्य कर दिया। इन समस्त उपायों से भी जापान में आर्थिक समस्याओं का हल नहीं निकल सका। वर्ष 2022 में जापान में भी विश्व के अन्य देशों की तरह मुद्रा स्फीति बढ़ने लगी थी परंतु जापान ने ब्याज दरों को नहीं बढ़ाया। अब कुल मिलाकर जापान अपनी आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा है एवं वहां पर आगे आने वाले समय में आर्थिक विकास के पटरी पर आने की सम्भावना कम ही नजर आती है अतः भारत जापान की अर्थव्यवस्था को मार्च 2025 तक पीछे छोड़कर विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यस्था बन सकता है।

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