रामनगरी अयोध्या में होगा स्वास्थ्य संसद 2024 का आयोजन

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एमएस डेस्क
नई दिल्ली:  स्वस्थ भारत (न्यास) के स्थापना दिवस के अवसर पर देश भर में कई आयोजन किए गए। दिल्ली स्थित न्यास के कार्यालय में स्थानीय बच्चों ने गीत, कविता एवं कहानी पाठ प्रस्तुत किया।
स्थापना दिवस पर मीडिया से बात करते हुए संस्था के चेयरमैन आशुतोष कुमार सिंह ने बताया कि चुनाव के कारण संस्था के वार्षिक आयोजन स्वास्थ्य संसद को जुलाई में करने का निर्णय लिया गया है। यह आयोजन इस बार रामनगरी अयोध्या में होने जा रहा है।
गौरतलब है कि स्वस्थ भारत (पंजी. न्यास) स्वास्थ्य एडवोकेसी के क्षेत्र में एक अग्रणी संस्था है। लोगो को सस्ती दवाई एवं गुरवत्तायुक्त स्वास्थ्य सेवा मिले इसके लिए संस्था दो बार स्वस्थ भारत यात्रा कर चुकी है।

निष्पक्ष किस्म के मक्कारों से सावधान…

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दर्जनों वीडियो सोशल मीडिया पर घूम रहे हैं जिसमें मुस्लिम मतदाता कह रहा है, इस बार मोदी सरकार। पहले दो चार रील्स को इग्नोर किया। फिर एक घोर मोदी विरोधी चैनल को किशनगंज के मुस्लिम मोहल्ले से रिपोर्ट करते हुए देखा। वह अपने यू ट्यूब पर एक मौलाना को दिखा रहा था, जो बता रहे थे कि वे मोदी भक्त हैं, वे मोदी को ही वोट देंगे।

एक दो वीडियो तक बात ठीक थी लेकिन इतने सारे वीडियो अचानक चुनाव से पहले सोशल मीडिया पर जब घुमाया गया तो बात आसानी से समझ आ गई कि सारे वीडियो स्वाभाविक नहीं हैं। इसके पीछे कोई खुराफाती षडयंत्रकारी दिमाग काम कर रहा है। असम के अंदर वर्ष 2016 के विधान सभा चुनाव के बाद हेमंत बिस्वा शर्मा ने पार्टी के अंदर से मुस्लिम मोर्चा खत्म कर दिया था। जिसे अल्पसंख्यकों के नाम पर चलाया जा रहा था क्योंकि मोर्चा के भाजपा कार्यकर्ताओं ने भी वहां बीजेपी को वोट नहीं दिया था।

मुसलमानों के बीच बीजेपी के वोटर हैं।  इस बात से इंकार नहीं कर रहा लेकिन बहुसंख्यक मुसलमानों के लिए मेरी एक बात लिख लीजिए। उनके लिए इस्लाम मजहब नहीं बल्कि एक संगठन है। उनके निर्णय आसमानी किताब को पढ़कर नहीं लिए जा रहे। उनकी तरफ से निर्णय कोई और ले रहा है। वही निर्णय पटना से चलकर कटिहार, किशनगंज और भागलपुर, सहरसा होते हुए गोपालगंज—सिवान तक जा रहा है। बाकि राज्यों की भी ऐसी ही स्थिति होगी।

आज भी बहुसंख्यक हिन्दू भोला है। वह आदिवासी, दलित, पिछड़ा, जैन, सिक्ख, बौद्ध में बंटा हुआ है। इसे और भी टुकड़ों में बांटने की लगातार कोशिश हो रही है। यहां राहुल गांधी और पूरी कांग्रेस हिन्दूओं को टुकड़ों बांटने की बात करके भी जातिवादी नहीं होती, दूसरी तरफ बांग्लादेशी रोहिंग्या मुसलमानों के लिए बोलकर मोदी साम्प्रदायिक हो जाते हैं। यह कांग्रेस का नैरेटिव है। जो सत्ता से उसके दस साल बाहर रहने के बावजूद आज भी चल रहा है।

कांग्रेस ने 5 दशकों के अपने शासन में ‘निष्पक्ष बुद्धीजीवियों’ के नाम पर पत्रकार और प्रोफेसरों का एक बड़ा वर्ग खड़ा कर दिया, जो कांग्रेस के 10 में से कभी एक और कभी आधी नीतियों से अपनी असहमति जोर—शोर से दर्ज कराता था। इस तरह उन सब निष्पक्षों की निष्पक्षता सलामत रहती थी लेकिन आरएसएस और बीजेपी का नाम आते ही उसकी नफरत छुपी नहीं रहती थी। वह निष्पक्ष गिरोह इन संगठनों का नाम तक सुनने को तैयार नहीं था।

बीजेपी अपने दस साल के शासन में इस स्तर के धूर्त तैयार नहीं कर पाई। कांग्रेस की षडयंत्र की ललित कला में मास्टरी है। बीजेपी के विरोध में कभी—कभी बजरंग दल सड़क पर उतर भी आए तो कोई उन्हें गंभीरता से लेने को तैयार नहीं होता क्योंकि इस विरोध में ‘कांग्रेसी धूर्तता की ललित कला’ जो शामिल नहीं है। जो भी है, वह अभिधा में है। कांग्रेस ऐसा नहीं करती।

कांग्रेस ने मुसलमानों से मोदी को गाली दिलवा कर देख लिया। उसे लाभ नहीं मिला। इस बार उसके समर्थकों ने नया प्रयोग किया है। मुलसमानों से सोशल मीडिया पर मोदी की जमकर तारिफ करवा दी। मोदी इस चालाकी को खूब समझते हैं। 2002 से उन्होंने बड़े—बड़े षडयंत्र देखे हैं। जब गुजरात में बीजेपी और कांग्रेस के बीच चुनाव होता था। वहां कांग्रेस की ‘कार्यकर्ता’ तीस्ता जावेद सीतलवार— शबनम हाशमी ने मिलकर गुजरात में कांग्रेस के समर्थन में यात्रा नहीं निकाली थी। वे कह रहे थे कि साम्प्रदायिक शक्तियों को वोट ना दें। इससे समझ सकते हैं कि कांग्रेस राजनीति में किस स्तर की धूर्तता पर उतर सकती है? गौरतलब है कि दोनों कांग्रेसी ‘बहनों’ की पहचान निष्पक्ष सामाजिक कार्यकर्ता की थी। जबकि वे नाम सिर्फ कांग्रेस के लिए खुलकर काम कर रहे थे बल्कि कांग्रेस से लाभान्वित भी हो रहे थे।

इसी तरह बीजेपी से नफरत करने वाले संजीव भट्ट से लेकर मुकुल सिन्हा तक निष्पक्ष ही माने जाते थे। जैसे कांग्रेसी नेता राजीव शुक्ला के चैनल में अपना कॅरियर बनाने वाले अजीत अंजुम और कांग्रेसी चैनल एनडीटीवी के प्राइम टाइम एंकर व कांग्रेसी अग्रज के छोटे भाई रवीश कुमार भी निष्पक्ष यू ट्यूबर हैं।

मुकेश सहनी के साथ खेल कर गए तेजस्वी यादव?

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अमित श्रीवास्तव।
किसी को साथ रख उसको बेवकूफ बनाने की कला तेजस्वी यादव से सीखना चाहिए।
तेजस्वी यादव ने अपने कोटे की तीन सीटें झंझारपुर,  मोतिहारी व गोपालगंज मुकेश सहनी की वीआईपी को दे उन्हें साध तो लिया किंतु इस गठबंधन में केवल और केवल तेजस्वी यादव को ही फायदा होने वाला है।
मुकेश सहनी निषाद समाज से आते हैं केवट, निषाद, मल्लाह आदि उपजातियों की जनसंख्या के साथ इनकी कुल संख्या  बिहार में  60 लाख के आसपास है। किसी भी एक लोकसभा में इनका प्रभाव न होने के बावजूद बिहार की राजनीति में इनका  असरदार प्रभाव रहा है।
लोकसभा चुनाव2024 के लिए राजद व मुकेश सहनी की पार्टी में गठबंधन हुआ है।  मुकेश सहनी के प्रभाव वाली सीट खगड़िया है जहाँ लोकसभा चुनाव, 2019 में सहनी दूसरे स्थान पर रहे थे और ढाई लाख के करीब मत भी इन्हें प्राप्त हुआ था।  महागठबंधन के बीच हुए सीटों के बंटवारे के बाद यह सीट सीपीआईएम के पास चली गई है।  यानी मुकेश सहनी अपने ही घर मे आउट कर दिए गए हैं।
दूसरी ओर, झंझारपुर लोकसभा सीट पर मुकेश सहनी के कैंडिडेट चुनाव लड़ रहे हैं, जबकि इस सीट पर राजद के प्रभावशाली नेता गुलाब यादव ने निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में वो राजद की ओर इ उम्मीदवार थे दूसरे नंबर पर रहे थे।  निर्दलीय चुनाव लड़ने के बाद भी गुलाब यादव स्वयं को राजद के ही बता रहे हैं। राजद की ओर से भी उन पर किसी भी प्रकार की कोई अनुशासनात्मक कार्यवाही नहीं की गई है और न ही उन्हें मनाने की कोशिश ही की गई है।  ऐसे में प्रश्न  यह है कि क्या गुलाब यादव तेजस्वी की ही चाल चल रहे हैं और उनका लक्ष्य  वीआईपी के प्रसार को रोकना है?
दूसरी सीटों में गोपालगंज व मोतिहाती है। गोपालगंज  में  दो मुकेश सहनी के साथ समस्याएं हैं। एक कि राबड़ी देवी के परिवार का आंतरिक कलह  (राबड़ी देवी का मायका) व दूसरा गोपालगंज के यादव रसूख वाले हैं, वो  पिछड़ी जाति के किसी भी अन्य जाति को अपना नेतृत्व नहीं दे सकते। ऐसे में यहाँ भी मुजेश सहनी को फायदा नहीं मिलने वाला।
मोतिहाती सीट पर भाजपा के कद्दावर नेता राधा मोहन सिंह का प्रभाव है एवं राजद  पिछली बार भी वहाँ से आकाश सिंह चुनाव लड़े थे जो कांग्रेस अध्यक्ष अखिलेश सिंह के पुत्र है।  इस सीट पर विपक्ष के लिए सकारात्मक रुख जनता में नजर नहीं आता।
ऐसे में ये प्रश्न है कि खगड़िया  से मुकेश सहनी को हटा कर वैसी सीटें जहां वीआईपी का अस्तित्व ही नहीं है, उन सीटों को मुकेश सहनी को देकर कोई खेल तो नहीं कर गए तेजस्वी यादव सहनी के साथ  जैसा खेल उन्होंने पूर्णिया खुद के पास रख कर पप्पू यादव के साथ कर गए?

बाज आएं ऐसे पत्रकार

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विष्णु शर्मा
दिल्ली। अक्सर देखा होगा आपने जैसे मुस्लिमों से जुड़ी कोई बात राष्ट्रीय विमर्श में आती है, फौरन बुद्धिजीवियों, नेताओं और पत्रकारों का एक वर्ग दुखी होने लगता है कि जैसे गंगा जमुना संस्कृति में कोई नाला मिलाने आ गया हो.. “अरे दंगे हो जायेंगे, माहौल खराब हो जायेगा. बरसों पुराना भाईचारा खत्म हो जाएगा”.
नई पीढ़ी को हैरत होगी ये जानकर 2014 से पहले मीडिया हाउसेज में ‘मुस्लिम’ शब्द बोलना भी गुनाह सा होता था. लिखना, बोलना भी हो तो वर्ग विशेष या अल्पसंख्यक समुदाय लिखो. दंगा भी होता था कहीं तो ये निर्देश होते थे कि खबर लेते रहो, चलाओ मत. चाहे वहां कत्ल ए आम चलता रहे, तर्क देते थे कि खबर चलाने से दंगा भड़क जायेगा…  लव जेहाद में कोई मुस्लिम शामिल है तो उसका नाम नहीं लिखना. एक बार तो अलीगढ़ के अमर उजाला में मैंने एक हेडिंग देखी, ‘एक व्यक्ति को संदिग्ध जानवर ने काट खाया’, खबर पूरी पढ़कर समझ आया कि वो तो सूअर था.
आखिर ये सब क्यों करते थे ये लोग? मुस्लिम कोई एलियन थोड़े ना हैं, लेकिन इन लोगों ने बना दिया. एक खास वोट बैंक की तरह उनका इस्तेमाल किया, अयोध्या विवाद का हल नहीं निकलने दिया और अब दंगे का डर दिखाते हैं. बीजेपी सरकारों की छोड़िए कांग्रेस के समय में या आजादी से पहले ऐसा कोई साल बताएं  जब दंगे नहीं हुए, बल्कि मेरी बुक ‘इंदिरा फाइल्स’ में ऐसे दंगे भी आप जानेंगे जिनमें हिंदू समुदाय था ही नहीं, या तो सरकार थी या फिर मुस्लिम.
रही बात तथाकथित गंगा जमुनी संस्कृति की तो ये  केवल दो व्यक्तियों के निजी रिश्तों में है या जहां हिंदू बहुतायत में है, वरना राहुल गांधी की भी हिम्मत नहीं कि वायनाड में भगवा तो दूर अपनी पार्टी का तिरंगा भी फहरा लें. कितनी भी किताबों में अकबर महान, जहांगीर की न्याय की जंजीर पढ़ा लो, लोगों से अकबर का चित्तौड़ का कत्ल ए आम और फतहनामा व जहांगीर का किसानों को अगवा करने वाला पिंजरा पता चल ही जाना है. सो प्रोपेगेंडा से रिश्ते नहीं सुधारने वाले, व्यक्तिगत स्तर पर तमाम हिंदू मुस्लिम आपस में दोस्त हैं. मेरे घर भी हर ईद पर कहीं न कहीं से सिवइयां आती ही हैं.
सो इन पूर्व वरिष्ठ पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को अब बाज आना चाहिए, उनकी तरकीबों से केवल कांग्रेस का फायदा हुआ, अब प्रतिक्रिया में बीजेपी का हो रहा है. गरीब मुस्लिम और गरीब हो गए. उनके नाम से हौआ बनाना छोड़ दो, खुलकर चर्चा होने दो.. चर्चा होगी तो हल निकलेगा
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