भारत में धार्मिक पर्यटन छू रहा नित नई ऊचाईयां

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अयोध्या। हाल ही के समय में भारत के नागरिकों में “स्व” का भाव विकसित होने के चलते देश में धार्मिक पर्यटन बहुत तेज गति से बढ़ा है। अयोध्या धाम में प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर में श्रीराम लला के विग्रहों की प्राण प्रतिष्ठा के पश्चात प्रत्येक दिन औसतन 2 लाख से अधिक श्रद्धालु अयोध्या पहुंच रहे हैं। यह तो केवल अयोध्या की कहानी है इसके साथ ही तिरुपति बालाजी, काशी विश्वनाथ मंदिर, उज्जैन में महाकाल लोक, जम्मू स्थित वैष्णो देवी मंदिर, उत्तराखंड में केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री एवं यमनोत्री जैसे कई मंदिरों में श्रद्धालुओं की अपार भीड़ उमड़ रही है। भारत में धार्मिक पर्यटन में आई जबरदस्त तेजी के बदौलत रोजगार के लाखों नए अवसर निर्मित हो रहे हैं, जो देश के आर्थिक विकास को गति देने में सहायक हो रहे हैं।

जेफरीज नामक एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय ब्रोकरेज कम्पनी ने बताया है कि अयोध्या में निर्मित प्रभु श्रीराम के मंदिर से भारत की आर्थिक सम्पन्नता बढ़ने जा रही है। दिनांक 22 जनवरी 2024 को अयोध्या में सम्पन्न हुए प्रभु श्रीराम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह के बाद स्थानीय कारोबारी अपना उज्जवल भविष्य देख रहे हैं। अयोध्या धार्मिक पर्यटन का हब बनाने जा रहा है तथा अब अयोध्या दुनिया का सबसे बड़ा तीर्थ क्षेत्र बन जाएगा। धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से अयोध्या दुनिया का सबसे बड़ा केंद्र बनने जा रहा है। जेफरीज के अनुसार अयोध्या में प्रति वर्ष 5 करोड़ से अधिक पर्यटक आ सकते हैं। अभी अयोध्या में केवल 17 बड़े होटल हैं इनमें कुल मिलाकर 590 कमरे उपलब्ध हैं। लेकिन, अब 73 नए होटलों का निर्माण किया जा रहा है।  इनमें से 40 होटलों का निर्माण कार्य प्रारम्भ भी हो चुका है। अभी तक नए एयरपोर्ट, रेल्वे स्टेशन, टाउनशिप और रोड कनेक्टिविटी में सुधार जैसे कामों पर 85,000 करोड़ रुपए का निवेश किया गया है। इस निवेश का स्थानीय अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर दिखाई देने जा रहा है। शीघ्र ही अयोध्या वैश्विक स्तर पर धार्मिक और आध्यात्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में उभरेगा। इससे होटल, एयरलाईन, हॉस्पिटलिटी, ट्रैवल, सिमेंट जैसे क्षेत्रों को बहुत बड़ा फायदा होने जा रहा है। भारत के विभिन्न शहरों से 1000 के आसपास नई रेल अयोध्या के लिए चलाए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं। पूरे देश से दिनांक 23 जनवरी 2024 के बाद से प्रतिदिन भारी संख्या में धार्मिक पर्यटक अयोध्या पहुंच रहे हैं। यह हर्ष का विषय है कि पहिले दिन ही 5 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने प्रभु श्रीराम के दर्शन किये हैं। 

विश्व के कई अन्य देश भी धार्मिक पर्यटन के माध्यम से अपनी अर्थव्यवस्थाएं सफलतापूर्वक मजबूत कर रहे हैं। सऊदी अरब धार्मिक पर्यटन से प्रति वर्ष 22,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर अर्जित करता है। सऊदी अरब इस आय को आगे आने वाले समय में 35,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक ले जाना चाहता है। मक्का में प्रतिवर्ष 2 करोड़ लोग पहुंचते हैं, जबकि मक्का में गैर मुस्लिम के पहुंचने पर पाबंदी है। इसी प्रकार, वेटिकन सिटी में प्रतिवर्ष 90 लाख लोग पहुंचते हैं। इस धार्मिक पर्यटन से अकेले वेटेकन सिटी को प्रतिवर्ष लगभग 32 करोड़ अमेरिकी डॉलर की आय होती है, और अकेले मक्का शहर को 12,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर की आमदनी होती है। अयोध्या में तो किसी भी धर्म, मत, पंथ मानने वाले नागरिकों पर किसी भी प्रकार की पाबंदी नहीं होगी। अतः अयोध्या पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या 5 से 10 करोड़ तक प्रतिवर्ष जा सकती है। फिर अकेले अयोध्या नगर को होने वाली आय का अनुमान तो सहज रूप से लगाया जा सकता है। अभी अयोध्या आने वाले श्रद्धालु अयोध्या में रूकते नहीं थे प्रात: अयोध्या पहुंचकर प्रभु श्रीराम के दर्शन कर शाम तक वापिस चले जाते थे परंतु अब अयोध्या को इतना आकर्षक रूप से विकसित किया गया है कि श्रद्धालु 3 से 4 दिन रुकने का प्रयास करेंगे। एक अनुमान के अनुसार, प्रत्येक पर्यटक लगभग 6 लोगों को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से रोजगार उपलब्ध कराता है। इस संख्या के हिसाब से तो लाखों नए रोजगार के अवसर अयोध्या में उत्पन्न होने जा रहे हैं। अयोध्या के आसपास विकास का एक नया दौर शुरू होने जा रहा है। यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगा कि अब अयोध्या के रूप में वेटिकन एवं मक्का का जवाब भारत में खड़ा होने जा रहा है।

धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भारत सरकार ने भी धरातल पर बहुत कार्य सम्पन्न किया है। साथ ही, अब इसके अंतर्गत एक रामायण सर्किट रूट को भी विकसित किया जा रहा है। इस रूट पर विशेष रेलगाड़ियां भी चलाए जाने की योजना बनाई गई है। यह विशेष रेलगाड़ी 18 दिनों में 8000 किलो मीटर की यात्रा सम्पन्न करेगी, इस विशेष रेलगाड़ी के इस रेलमार्ग पर 18 स्टॉप होंगे। यह विशेष रेलमार्ग प्रभु श्रीराम से जुड़े ऐतिहासिक नगरों अयोध्या, चित्रकूट एवं छतीसगढ़ को जोड़ेगा। अयोध्या में नवनिर्मित प्रभु श्रीराम मंदिर वैश्विक पटल पर इस रूट को भी  रखेगा। 

केंद्र सरकार द्वारा भारत में पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लगातार किए जा रहे प्रयासों का परिणाम भी अब दिखाई देने लगा है। “मेक माई ट्रिप इंडिया ट्रैवल ट्रेंड्स रिपोर्ट” के अनुसार, भारत के नागरिक अब पहले के मुकाबले अधिक यात्रा कर रहे हैं। भारत के नागरिकों द्वारा विशेष रूप से अयोध्या, उज्जैन एवं बदरीनाथ जैसे आध्यात्मिक स्थलों के बारे में अधिक जानकारी हासिल की जा रही है। उक्त जानकारी  “मेक माई ट्रिप” के प्लेटफार्म के 10 करोड़ से अधिक सक्रिय उपयोगकर्ताओं से प्राप्त जानकारी के आधार पर सामने आई है। वर्ष 2019 के बाद से भारत में एक वर्ष में तीन से अधिक यात्राएं करने वाले लोगों की संख्या में 25 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है। उक्त रिपोर्ट के अनुसार, आध्यात्मिक पर्यटन सम्बंधी जानकारी हासिल करने की गतिविधियों में वर्ष 2021 की तुलना में वर्ष 2023 में 97 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है। विशेष रूप से अयोध्या के सम्बंध में जानकारी हासिल करने सम्बंधी गतिविधियों में वर्ष 2022 की तुलना में वर्ष 2023 में 585 प्रतिशत की भारी वृद्धि दर्ज हुई है। इसी प्रकार, उज्जैन एवं बदरीनाथ जैसे धार्मिक स्थलों के सम्बंध में भी जानकारी हासिल करने वाले नागरिकों की संख्या में क्रमशः 359 प्रतिशत और 343 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है। भारत में अब पारिवारिक यात्रा की बुकिंग भी बहुत तेज गति से बढ़ रही है। इसमें वर्ष 2022 के तुलना में वर्ष 2023 में 64 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है। जबकि इसी अवधि में एकल यात्रा की बुकिंग में केवल 23 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। 

उक्त जानकारी को भारत के नागरिक विमानन मंत्रालय द्वारा जारी एक जानकारी से भी बल मिलता है कि भारत में घरेलू हवाई यातायात अब एक नए मुकाम पर पहुंच गया है। दिनांक 21 अप्रेल 2024 (रविवार) को रिकार्ड 471,751 यात्रियों ने 6,128 उड़ानों के माध्यम से, भारत में हवाई सफर किया है। इसके पूर्व हवाई यातायात करने वाले नागरिकों की औसत संख्या, कोरोना महामारी के पूर्व के खंडकाल में, 398,579 यात्रियों की थी। इसमें 14 प्रतिशत  वृद्धि दर्ज की गई है।

देश में धार्मिक पर्यटन में हो रही भारी वृद्धि के चलते भारत के सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर में भी तेजी दिखाई देने लगी है। वित्तीय वर्ष 2023-24 की तृतीय तिमाही के दौरान सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर ने भारत सहित विश्व के समस्त आर्थिक विश्लेशकों को चौंका दिया है। इस दौरान, भारत में सकल घरेलू उत्पाद में 8.4 प्रतिशत की वृद्धि हासिल हुई है जबकि प्रथम तिमाही के दौरान वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत एवं द्वितीय तिमाही के दौरान 7.6 प्रतिशत की रही थी। पिछले वर्ष इसी अवधि के दौरान वृद्धि दर 4.4 प्रतिशत रही थी। जबकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं विश्व बैंक ने वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 6.3 प्रतिशत की वृद्धि दर का अनुमान लगाया था। इसी प्रकार, क्रेडिट रेटिंग एजेंसी इकरा ने 6.5 प्रतिशत, एशिया विकास बैंक एवं बार्कलेस एवं प्राइस वॉटर कूपर्स ने 6.7 प्रतिशत, डेलाईट इंडिया ने 7 प्रतिशत की वृद्धि दर का अनुमान लगाया था। परंतु, समस्त विदेशी संस्थानों के अनुमानों के झुठलाते हुए भारत की आर्थिक विकास दर लगभग 8 प्रतिशत की रही है। यह सब देश में लगातार बढ़ते धार्मिक पर्यटन एवं विभिन त्यौहारों तथा शादी जैसे समारोहों पर भारतीय नागरिकों द्वारा दिल खोलकर पैसा खर्च करने के चलते सम्भव हो पा रहा है। इससे त्यौहारों एवं शादी के मौसम में व्यापार के विभिन्न क्षेत्रों में अतुलनीय वृद्धि दृष्टिगोचर होती है। जैसे दीपावली त्यौहार के समय भारत में नागरिकों के बीच विभिन्न नए उत्पादों की खरीद के लिए जैसे आपस में होड़ सी लग जाती है। भारत में लाखों करोड़ रुपए का व्यापार दीपावली त्यौहार के समय में होता है। इसी प्रकार की स्थिति शादियों के मौसम में भी पाई जाती है। संभवत: विदेशी वित्तीय संस्थान भारत में हो रहे इस तरह के उक्त वर्णित परिवर्तनों को समझ नहीं पा रहे हैं एवं केवल पारंपरिक विधि से ही सकल घरेलू उत्पाद को आंकने का प्रयास कर रहे हैं। इसलिए भारत की विकास दर के संबंच में विभिन्न विदेशी संस्थानों के अनुमान गलत साबित हो रहे हैं।     

कांग्रेस के घोषणापत्र पर आक्रामक भाजपा

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दिल्ली। लोकसभा चुनावों के प्रथम चरण का मतदान संपन्न हो चुका है । दूसरे चरण का प्रचार चरम पर है। प्रथम चरण के चुनावों में भाजपा नेतृत्व राम लहर और मोदी के करिश्माई नेतृत्व के बल पर अबकी बार चार सौ पार के नारे के साथ आगे बढ़ रहा था और चुनावी रैलियों में, “सबका साथ, सबका विकास, सबके विश्वास के साथ एक बार फिर मोदी सरकार” की बात की जा रही थी। भाजपा नेतृत्व अभी तक विपक्ष को परिवारवाद व उनके शासनकाल में किए गये अथाह भ्रष्टाचार और घोटालों की बात करके घेर  रहा था लेकिन उसके मुस्लिम तुष्टिकरण पर सीधा प्रहार नहीं कर रहा था किन्तु कांग्रेस के चुनावी घोषणापत्र, राहुल गांधी व विपक्ष के नेताओं के कुछ आपत्तिजनक बयानों के बाद नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में पूरी भारतीय जनता पार्टी अब कांग्रेस तथा विरोधी दलों के घोर मुस्लिम तुष्टिकरण या कहें कि हिन्दू घृणा के खिलाफ बहुत आक्रामक हो गयी है। मोर्चा स्वयं नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस के समय में प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह के भाषण और कांग्रेस के घोषणापत्र में किए गए वादों पर चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री ने स्वयं खोला।
भारतीय जनता पार्टी के इतिहास में पहली बार विरोधी दल कांग्रेस के घोषणपत्र को ही आधार बनाकर उस पर इतना तीखा हमला बोला गया है। स्वाभाविक रूप से कांग्रेस और उसके साथी तिलमिला गए हैं और वह मुख्य धारा तथा सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री मोदी पर अर्मायदित शब्दावली का प्रयोग कर रहे हैं । कांग्रेस का एक प्रतिनिधि मंडल  प्रधानमंत्री मोदी की शिकायत लेकर चुनाव आयोग भी पहुंचा है उधर भाजपा का प्रतिनिधि मंडल भी राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव आयोग पहुंच गया है।
प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी सहित भाजपा के सभी बड़े नेता कांग्रेस के मुस्लिम प्रेम पर एक के बाद एक तीखा प्रहार कर रहे हैं जिससे कांग्रेस तिलमिला गई है । प्रधानमंत्री मोदी एक के बाद एक कांग्रेस की सरकारों में हुए हिन्दू विरोधी घटनाओं, निर्णयों, विवादों को उठा रहे हैं । प्रधानमंत्री ने सबसे पहले राजस्थान की एक जनसभा में कहा कि, “कांग्रेस की नजर आम लोगों की मेहनत की कमाई पर है, प्रापर्टी पर है महिलाओं के मंगलसूत्र पर है। कांग्रेस ने इरादा जाहिर कर दिया है कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो लोगो के घरों, प्रापर्टी और गहनों का सर्वे कराएगी फिर लोगों की कमाई कांग्रेस के पंजे में होगी । कांग्रेस की नजर देश की महिलाओं के गहनों  पर है, माताओं- बहनों के मंगल सूत्र पर है वो उसे छीन लेना चाहती है। कांग्रेस के चुनाव घोषणापत्र में उसके इरादे साफ जाहिर हो रहे हैं।  अगर कांग्रेस की सरकार आई तो लोगो के बैंक एकाउंट में झांकेगी, लॉकर खंगालेगी, जमीन -जायदाद का पता लगायेगी और फिर सब कुछ छीनकर उसे घुसपैठियों और ज्यादा बच्चे वालों में बांट देगी। प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा कि कांग्रेस यह संपत्ति उन लोगों  को बांटेगी जिन्हें मनमोहन सरकार ने कहा था कि देश की संपत्ति पर पहला अधिकार मुसलमानों का है। इस बयान ने चुनाव के मैदान में तूफ़ान आ गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस को धार्मिक आधार पर मुस्लिम आरक्षण को लेकर भी घेरा है। उन्होंने  बताया कि किस प्रकार से कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश में 2004 से 2010 के बीच मुसलमानों को दलितों, पिछड़ों, अति पिछड़ों  का हिस्सा काटकर उसमें से ही  विशेष  आरक्षण देने का भरसक प्रयास किया किंतु न्यायपालिका के हस्तक्षेप से  कांग्रेस का यह विकृत पायलट प्रोजेक्ट लागू नहीं हो सका जबकि अब यही कांग्रेस भारत का संविधान बदलकर दलित, पिछड़ों, अतिपिछड़ों के अधिकारों  में कटौती करके मुस्लिम आरक्षण देने की बात कर रही है।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी अपने ही बयानों से फंस जाते हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फुल टॉस गेंद फेंककर चुनाव के मैदान में चौके-छक्के लगाने का अवसर दे बैठते हैं। राहुल गांधी ने कांग्रेस का घोषणापत्र जारी हो जाने के बाद एक जनसभा में कहा कि, “सत्ता में आने पर वह देश का एक्सरे कर देंगे। दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। पिछडे़,  दलित, आदिवासी, गरीब, सामान्य वर्ग के लोगों को पता चल जाएगा कि इस देश में उनकी भागीदारी कितनी है। इसके बाद हम वित्त और  संस्थागत सर्वे करेंगे और  यह पता लगायेंगे कि हिंदुस्थान का धन किसके हाथों में है और इस एतिहासिक कदम के बाद हम क्रांतिकारी काम शुरू करेंगे।“ इस बयान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रन बनाने का सुनहरा अवसर दे दिया और वे हिंदुत्व को लेकर आक्रमक हो गए।
इस बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जो अभी तक केवल अयोध्या, मथुरा, काशी और विरोधी दलों के माफिया प्रेम व कानून व्यवस्था की बात कर रहे थे वो  भी बोल पड़े, “कांग्रेस देश में शरिया कानून लागू करना चाहती है लेकिन यह देश संविधान से ही चलेगा शरिया से नहीं। योगी का कहना है कि बीजेपी को मिलने वाल  एक- एक वोट कर्फ्यू से मुक्ति और बेटियों की सुरक्षा से गारंटी देता है। वही असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा का बयान आता है कि कांग्रेस के घोषणापत्र पर पाकिस्तान की छाप है।
कांग्रेस के घोषणा पात्र और उसके स्टार प्रचारक के बयानों से तो यह तो स्पष्ट ही था कि अब कांग्रेस पूरी तरह से टुकड़े- टुकडे गैंग और शहरी नक्सलियों के हाथ में चली गयी है लेकिन कन्हैया कुमार को टिकट देकर उसने इस बात को साबित भी कर दिया। एक समय था कि राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी व दादी इंदिरा गांधी ने जातिगत जनगणना को देश के लिए घातक माना था आज राहुल गांधी उन्हीं के विरुद्ध जाकर जातिगत जनगणना की बात कह रहे हैं। राहुल गांधी की असली मंशा जगजाहिर हो चुकी है।
एक बात ध्यान देने योग्य यह भी है कि विपक्ष का गठबंधन तो बन गया है और उनकी तीन रैलियां भी हो चुकी हैं किंतु उसके पास प्रधानमंत्री कौन बनेगा इस बात को लेकर असमंजस है।विपक्षी दलों के घोषणा पत्रों में वैसे तो  विरोधाभास है किंतु मुस्लिम तुष्टिकरण के मामले पर सब एक हैं। आज भाजपा को हिंदुत्व पर आक्रामक होने का अवसर किसी ने दिया है तो वह केवल और केवल कांग्रेस व इंडी गठबंधन के नेता ही हैं। ।कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में मुसलमानों से कई वायदे किये हैं जिसमें उसने कहा है कि सत्ता में आने पर फैसले बहुसंख्यकवाद पर नहीं अल्पसंख्यकवाद पर आधारित होंगे।कांग्रेस के घोषणापत्र में कहा गया है कि हम अल्पसंख्क छात्रों और युवाओं को शिक्षा , रोजगार, व्यवसाय, सेवाओं, खेल, कला और अन्य क्षेत्रों मे बढ़ते अवसरों का पूरा परा लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित और सहायता करेंगे। कांग्रेस नेता चिदंबरम सत्ता में आने के बाद सीएए और एनआरसी को न लागू करने की बात कह रहे हैं। मल्लिकार्जुन खड़गे का मानना धारा 370 से देश के दूसरे भागों का क्या लेना देना? कांग्रेस ने जातिगत जनगणना कराने के बाद 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा को भी बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित कर लिया है। भूलना नहीं चाहिए यही कांग्रेस की सरकार सांप्रदायिक हिंसा बिल लेकर आई थी जो अगर लागू हो जाता तो हिन्दुओं का जीवन दुरूह हो जाता, भाजपा के अथक प्रयासों से वह बिल लागू नहीं हो सका।
एक समय था जब कांग्रेस के इंदिरा गांधी सरीखे नेता वामपंथियों को महत्व नहीं देते और कांग्रेस की अपनी  विचारधारा थी। उस समय  की कांग्रेस वामपंथी नेताओं का अपने हितों के लिए उपयोग भर करती थी, उन्हें अपने पास फटकने तक नहीं देती थी जबकि आज हालात ऐसे हो गये कि शहरी नक्सलियों ने कांग्रेस के भीतर ही अपनी जड़ों को मजबूत कर लिया है। राहुल गांधी पूरी तरह से शहरी नक्सलियों के शिकंजे में आ चुके हैं। नक्सलियों व मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के चलते ही कांग्रेस ने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह का बहिष्कार कर डाला।
कांग्रेस “संविधान बचाओ” के नाम पर  भाजपा को घेरने का प्रयास कर रही थी किन्तु उसके घोषणापत्र ने उसकी कलई खोल दी और भाजपा को हिंदुत्व की राजनीति करने का अवसर दे दिया । वैसे भी आम नागरिक और भाजपा कार्यकर्ता दोनों ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आक्रामक छवि को अधिक पसंद करते है ।
परिणाम तो चार जून को आएगा किन्तु अभी कांग्रेस बैकफुट पर है ।

भारत में मोदी सरकार है, किसी के सामने झुकेगा नहीं

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‘डरा हुआ भारत’ और ‘सहमा हुआ भारत’ की पहचान से बाहर निकल कर हमारे देश की पूरी दुनिया के सामने आज एक नई छवि है। मोदी का भारत।  जिसका अर्थ होता है, एक ऐसा भारत जो जवाब देना जानता है। विदेशी बयानों को सुनकर पहले की तरह हल्की प्रतिक्रिया भर से काम नहीं चलता। वह जवाब देता है। दूसरे देशों को बताता है कि हमारे आंतरिक मामलों में बयानबाजी करके कृपया हस्तक्षेप ना करें। हाल फिलहाल देखें तो भारत की विदेश नीति में काफी बदलाव आया है। पहले कभी विदेश से कोई टिप्पणी होती थी, तो उस पर सिर्फ प्रतिक्रिया आती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है। मोदी के भारत में देश की घरेलू नीति और विदेश नीति में आए परिवर्तन की वजह से अब उन देशों को फटकार लगाई जाती है, जो भारत को लेकर अनर्गल टिप्पणी करते हैं। उन्हें साफ शब्दों में आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप ना करने की नसीहत दी जाती है।

एनडीटीवी को कांग्रेस का संरक्षण प्राप्त था। यह एक जग जाहिर बात है। इसलिए इस संस्थान में काम करने वाले पत्रकारों में चैनल प्रणय रॉय के हाथ से जाने के बावजूद कांग्रेस के प्रति वफादारी जारी है। राडिया टेप में इस चैनल से जुड़े पत्रकार की पहुंच सरकार के अंदर तक दिखाई दी। इसलिए जब एनडीटीवी पर मोदी सरकार ने कार्रवाई की तो पूरे मामले पर अंतरराष्ट्रीय लॉबी के दबाव का इस्तेमाल किया गया। जब आर्थिक अपराध से जुड़े एक मामले में सीबीआई ने एनडीटीवी के मालिक प्रणय रॉय के ठिकानों पर छापे मारे थे, तब भी कांग्रेस समेत वाम इको सिस्टम की पार्टियों ने इसे भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला बताया था। उसी दौरान लोकतंत्र को कमज़ोर करने वाली बात निकली थी। जिसे 2024 के चुनाव में कांग्रेस और इंडि गठबंधन के दूसरे दल इस्तेमाल कर रहे हैं।

किसान आंदोलन के समय जिस तरह वहां नक्सलियों और खाालिस्तानियों का गठबंधन होने के संकेत मिल रहे थे। उस आंदोलन का लंबा चलना देश के लिए खतरा हो सकता था। उस आंदोलन में अंतरराष्ट्रीय गुटों की लॉबिंग साफ दिखाई दे रही थी। ऐसा लग रहा था कि किसान आंदोलन की आड़ में सरकार को कमजोर करने और झुकाने की कोशिश की जा रही है। बाद में इस बात का खुलासा स्वीडिश युवती ग्रेटा थनबर्ग द्वारा गलती से पोस्ट किये गये एक टूलकिट से हो गया। जिसमें आंदोलन को आगे बढ़ाने के संबंध में मार्गदर्शन किया गया था। पेगासस स्पाइवेयर के मामले को भी बेवजह अधिक तूल देने की कोशिश की गई। जिसमें कई वैश्विक संगठनों ने विपक्ष की पार्टियों को समर्थन किया और भारत की सरकार पर दबाव बनाने का काम किया। मोदी सरकार ने एक एक टूल किट को सही जवाब दिया। सरकार ने विदेशी हस्तक्षेप को कहीं भी अधिक महत्व नहीं दिया। इस बात में किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि 2014 से लेकर 2024 तक के 10 सालों में विपक्ष कमजोर हुआ है।

यह सच है कि बीते दस वर्षों में भारत में विपक्ष लगातार कमज़ोर पड़ा है, लेकिन उसकी इस कमज़ोरी के पीछे पार्टी में लगे भ्रष्टाचार, सांप्रदायिक तुष्टीकरण, राजनीतिक अपराधीकरण, परिवारवाद, जातिवाद जैसे दीमक की मुख्य भूमिका है। आज उनके नेताओ, विपक्ष की नीतियों और उनकी नीयत के ऊपर मतदाता भरोसा करने को तैयार नहीं है।

हर भारतीय को उस दिन गर्व हुआ जब भारत ने अमेरिका को फटकार लगाई। 20 साल पहले यह बात कोई भारतीय सोच भी नहीं सकता था। जब नागरिकता संशोधन कानून, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी तथा कांग्रेस के बैंक खातों में फ्रीज लगाने के मामले में अमेरिका ने टिप्पणी की थी। ऐसे मामलों में कठोर प्रतिक्रिया की भारत में परंपरा नहीं रही। मोदी सरकार में यह परिवर्तन देश ने महसूस किया। इस मामले में भारत के दिल्ली में स्थित अमेरिकी मिशन के कार्यवाहक उप-प्रमुख को बुलाकर फटकार लगाई गई, और अमेरिका को साफ संदेश दिया गया कि भारत के आंतरिक मामलों में उनकी तरफ से हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए। पहली बार के डांट फटकार का असर जब कम हुआ, चुनावी और न्यायिक प्रक्रिया में फिर टिप्पणी की गई तो भारत ने दूसरी बार अमेरिका को फटकार लगाई और कहा कि भारत के ऊपर किसी बाहरी देश का टीका-टिप्पणी करना पूरी तरह से गलत है।

पहले भी मणिपुर में हुई हिंसक झड़पों के बीच अमेरिकी राजदूत ने कहा था कि अमेरिका इस राज्य में हो रही हिंसा को लेकर चिंतित है। भारत ने अमेरिका के बयानों को गंभीरता से लिया और अपनी आपत्ति जताई। जिसका परिणाम था कि अमेरिका को मणिपुर की स्थिति भारत का आंतरिक मामला है और इसमें उन्हें दखलंदाजी नहीं करनी चाहिए। इस बात को स्वीकार करना पड़ा।

फरवरी महीने में संयुक्त राष्ट्र् की मानवाधिकार परिषद की बैठक में पाकिस्तान ने कश्मीर को लेकर आरोप लगाए थे। इन आरोपों पर तुर्की ने पाकिस्तान का साथ दिया था। पुराना भारत होता तो इस बात का संभव है कि सज्ञान भी नहीं लिया जाता लेकिन वहां भारत की प्रतिनिधि अनुपमा सिंह ने तुर्की के टिप्पणी पर अपना प्रतिरोध जाहिर किया। इसी साल जनवरी की बात है, जब चीन के इशारों पर मालदीव ने प्रधानमंत्री मोदी और भारत के खिलाफ टिप्पणी की। भारत ने ना सिर्फ फटकार लगाई बल्कि कार्रवाई भी की। भारत के कड़े रुख का परिणाम था कि  मालदीव की अर्थव्यवस्था में लगभग 30 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। अब भारत से मालदीव के राष्ट्रपति मदद की गुहार लगा रहे हैं। पाकिस्तान अपना प्रोपगेंडा लेकर दुनिया भर में पहले की तरह अब भी घुम रहा है लेकिन अब उसे कहीं महत्व नहीं मिल रहा। पहले भारत में आतंक मचाकर दहशतगर्द पाकिस्तान में जाकर छुप जाते थे। अब एक एक कर उनकी पहचान हो रही है और कोई भारत समर्थक उन्हें घर में घुसकर मार रहा है। यह बात कुछ लोग दबी छुपी जुबान में कह रहे हैं कि यह सब भारत की खुफिया एजेन्सियों का पराक्रम है। देश में जब एक राष्ट्रवादी शासन है, ऐसे में देश से प्रेम करने वालों के हौसले बुलंद हैं। वह सेना में काम करने वाले हों, या फिर सुरक्षा एजेन्सियों में। अब उन्हें महसूस हो रहा है कि वे किसी सरकार के लिए नहीं देश के लिए काम कर रहे हैं।

मार्च महीने की बात है, जर्मनी की ओर से दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी पर बयान जारी किया गया। भारत ने बिना देरी किए इस पर अपना एतराज जताया। नई दिल्ली में जर्मन राजनयिक को बुलाया गया। समाचार पत्रों में दोनों देशों के बीच तनाव की खबर प्रकाशित हुई। जर्मनी को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने तनाव को कम करने की नियत से भारत के साथ बेहतर रिश्ते रखने की इच्छा जाहिर की।

जर्मनी की ओर से कहा गया कि भारत के साथ वह एक भरोसे के माहौल में काम करना और रिश्तों को आगे ले जाना चाहता है। जर्मनी के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि हम भारत के साथ विश्वास के माहौल में मिलकर काम करना चाहते हैं। इसे भारत की कूटनीतिक सफलता के तौर पर पेश किया जा सकता है लेकिन साथ ही साथ यह प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत की बढ़ती ताकत का उदाहरण भी है।

दो दशक पहले तक सिद्धांतों में उलझे रहने वाला भारत आज वैश्चिक मंच पर एक महत्वपूर्ण किरदार बनकर उभरा है। कोरोना महामारी के दौरान भारत ने वैक्सीन मैत्री पहल के जरिए पूरी दुनिया को अपनी उपस्थिति का एहसास दिलाया। भारत आंतरिक मोर्चे की चुनौतियों से निपटने के साथ साथ अब वैश्विक समस्याएं सुलझाने में भी दिलचस्पी ले रहा है। नेतृत्वहीनता के इस दौर में पूरी दुनिया मोदी में एक उम्मीद देख रही है। इसका ताजा उदाहरण भारत की G20 अध्यक्षता है।

मोदी के नेतृत्व में भारत पिछली सरकारों की भूलों को भी सुधार रहा है। चाहे वह शी जिनपिंग के बेल्ट एंड रोड इनीशटिव का विरोध हो। जिसका विरोध वर्ष 2013 में ही भारत की यूपीए सरकार को करना चाहिए था, जब चीन इस योजना पर काम प्रारंभ कर चुका था। लेकिन इसमें थोड़ी देरी हुई। वर्ष 2014 में मोदी की नई सरकार बनने के साथ ही भारत ने चीन के सामने अपना विरोध दर्ज कराया। मोदी के नेतृत्व में नए भारत ने चीन की सैन्य आक्रामकता को भी उसी की शैली में जवाब दिया और कई मोर्चो पर चीन को पीछे हटने को मजबूर किया। इसके अलावा किसी औपचारिक गठबंधन में गए बगैर ही अमेरिका से करीबी स्थापित करने का कौशल भी नई सरकार ने दिखाया और यूरोपीय देशों की मदद से भारत ने अपनी घरेलू क्षमता बढ़ाने का भी काम किया। वर्ष 2014 से 2024 तक के दस सालों को केन्द्र में रखकर किसी शोध छात्र को भारत की विदेश नीति का अध्ययन करना चाहिए। इस अध्ययन से अनगिनत रोचक प्रसंगों को प्रकाश में आने का अवसर मिलेगा जो हर एक भारतीय को सशक्त भारत बनाने में योगदान के लिए प्रेरित करेगा।

वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय संघी नहीं हैं

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पिछले दिनों एक कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने यह कह कर कई लोगों को चौंकाया कि मैं संघी नहीं हूं। अशोक वाजपेयी से लेकर पुरुषोत्तम अग्रवाल जैसे वामोन्मुख रुझान वाले लेखक, प्राध्यापक, पत्रकारों के लिए तो वे अब तक संघी ही है। संघी परिचय के साथ कॉमरेड जन के लिए किसी पर हमला करना आसान हो जाता है। वे तो उन मुसलमानों को भी इन दिनों संघी कह देते हैं, जो उनका कहा नहीं मानते। उनके बताए रास्ते पर चलने को तैयार नहीं होते। ऐसे में राम बहादुर राय का यह कहना कि मैं संघी नहीं हूं। खुद को संघी विचारक कहकर समाचार पत्रों और चैनलों में प्रचारक बने कई बुद्धीजीवियों के लिए मुश्किल खड़ी करने वाला था।

श्री राय ने कहा कि संघी होना मेरे लिए थोड़े ऊंचे दर्जे की बात है। मैं विद्यार्थी परिषद से जुड़ा रहा। अब जहां प्रधानमंत्री मोदी के पक्ष में सोशल मीडिया पर दो शब्द लिखकर कोई व्यक्ति संघी होने का तमगा हासिल कर सकता है, वहीं राय साहब ने अपने इतने लंबे सामाजिक जीवन के बाद जब कहा कि वे संघी नहीं है, यह सवाल जरूर सभा में मौजूद लोगों के अंदर उठा होगा कि फिर संघी कौन है? किसे संघी कहा और माना जाए?

आईजीएनसीए के तत्वावधान में वाणी प्रकाशन की उस सभा में प्रश्नोत्तर के लिए समय नहीं रखा गया था, इसलिए यह प्रश्न सभा में अनुत्तरित रहा। अनुत्तरित तो यह प्रश्न भी रहा कि वाणी ने जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी किताबों के प्रकाशन के लिए अपने दरवाजे खोल दिए हैं तो इसका अर्थ है कि उसने थोड़ी वैचारिक नजदीकी महसूस की होगी। गाधी परिवार के शासन के दौरान प्रकाशन क्षेत्र में एक अघोषित आपातकाल था। जहां आरएसएस और उससे वैचारिक नजदीकी रखने वाले लेखकों से बड़े प्रकाशकों का रिश्ता ‘अस्पृश्यता’ का ही था। 2014 के बाद यह छूआछूत मिटा है।

ऐसे में वाणी की तरफ से राष्ट्रवादी किताबों के प्रकाशन के सिलसिले को बढ़ाने की कोशिश के भावार्थ को सरलतापूर्वक समझा जा सकता है। संघ से जुड़ाव की पहल के बीच अब भी मकबूल फिदा हुसैन द्वारा तैयार तस्वीर वाला लोगो वाणी प्रकाशन इस्तेमाल कर रहा है। यह संघ की उदारता है कि माहेश्वरीजी को इस संबंध में किसी ने कभी कोई शिकायत नहीं की।

संघ परिवार और गांधी परिवार की कार्यशैली में यह अंतर साफ दिखाई पड़ता है। बहरहाल यह पोस्ट लिखे जाने तक प्रश्न अनुत्तरित है कि ‘संघी कौन है?’, ‘संघी किसे कह सकते हैं?’

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