18 अप्रैल 1898 – भारत माता के महान सपूत दामोदर हरि चाफेकर का बलिदान दिवस

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पवनपुत्र बादल

दामोदर हरि चाफेकर, बालकृष्ण हरि चाफेकर और वादुदेव हरि चाफेकर तीनों सहोदर भाई थे। 22 जून ,1897 को आतताई ब्रिटिश कमिश्नर वाल्टर चार्ल्स रैण्ड का पुणे में गोलियों की बौछार कर काम तमाम कर दिया था। रैण्ड महारानी विक्टोरिया के सिंघासनारूढ होने के हीरक जयंती समारोह का जश्न मनाकर आ रहा था।

लोकमान्य तिलक जी की प्रेरणा से उन्होंने युवकों का एक संगठन व्यायाम मंडल तैयार किया। ब्रितानिया हुकूमत के प्रति उनके मन में बाल्यकाल से ही तिरस्कार का भाव था। दामोदर चाफेकर ने बंबई में रानी विक्टोरिया के पुतले पर तारकोल पोत कर, गले में जूतों की माला पहना कर अपना रोष प्रकट किया था।

सन्‌ 1897 में पुणे नगर प्लेग जैसी भयंकर बीमारी से पीड़ित था। इस स्थिति में भी अंग्रेज अधिकारी जनता को अपमानित तथा उत्पीड़ित करते रहते थे। वाल्टर चार्ल्स रैण्ड तथा आयर्स्ट-ये दोनों अंग्रेज अधिकारी लोगों को जबरन पुणे से निकाल रहे थे। जूते पहनकर हिंदुओं के पूजाघरों में घुस जाते थे। इस तरह ये अधिकारी प्लेग पीड़ितों की सहायता की जगह लोगों को प्रताड़ित करना ही अपना अधिकार समझते थे। पुणे के ही श्री हरिभाऊ चाफेकर तथा श्रीमती लक्ष्मीबाई के तीन पुत्र थे-दामोदर हरि चाफेकर, बालकृष्ण हरि चाफेकर और वासुदेव हरि चाफेकर। ये तीनों भाई लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के सम्पर्क में थे। तीनों भाई तिलक जी को गुरुवत्‌ सम्मान देते थे। किसी अत्याचार-अन्याय के सन्दर्भ में एक दिन तिलक जी ने चाफेकर बन्धुओं से कहा, “शिवाजी ने अपने समय में अत्याचार का विरोध किया था, किन्तु इस समय अंग्रेजों के अत्याचार के विरोध में तुम लोग क्या कर रहे हो?’ इसके बाद इन तीनों भाइयों ने क्रान्ति का मार्ग अपना लिया। संकल्प लिया कि इन दोनों अंग्रेज अधिकारियों को छोड़ेंगे नहीं।

संयोगवश वह अवसर भी आया, जब 22 जून 1897 को पुणे के “गवर्नमेन्ट हाउस’ में महारानी विक्टोरिया की षष्ठिपूर्ति के अवसर पर राज्यारोहण की हीरक जयन्ती मनायी जाने वाली थी। इसमें वाल्टर चार्ल्स रैण्ड और आयर्स्ट भी शामिल हुए। दामोदर हरि चाफेकर और उनके भाई बालकृष्ण हरि चाफेकर भी एक दोस्त विनायक रानडे के साथ वहां पहुंच गए और इन दोनों अंग्रेज अधिकारियों के निकलने की प्रतीक्षा करने लगे। रात 12 बजकर 10 मिनट पर रैण्ड और आयर्स्ट निकले और अपनी-अपनी बग्घी पर सवार होकर चल पड़े। योजना के अनुसार दामोदर हरि चाफेकर रैण्ड की बग्घी के पीछे चढ़ गया और उसे गोली मार दी, उधर बालकृष्ण हरि चाफेकर ने भी आर्यस्ट पर गोली चला दी। आयर्स्ट तो तुरन्त मर गया, किन्तु रैण्ड तीन दिन बाद अस्पताल में चल बसा। पुणे की उत्पीड़ित जनता चाफेकर-बन्धुओं की जय-जयकार कर उठी।

गुप्तचर अधीक्षक ब्रुइन ने घोषणा की कि इन फरार लोगों को गिरफ्तार कराने वाले को 20 हजार रुपए का पुरस्कार दिया जाएगा। चाफेकर बन्धुओं के क्लब में ही दो द्रविड़ बन्धु थे- गणेश शंकर द्रविड़ और रामचंन्द्र द्रविड़। इन दोनों ने पुरस्कार के लोभ में आकर अधीक्षक ब्रुइन को चाफेकर बन्धुओं का सुराग दे दिया। इसके बाद दामोदर हरि चाफेकर पकड़ लिए गए, पर बालकृष्ण हरि चाफेकर पुलिस के हाथ न लगे। सत्र न्यायाधीश ने दामोदर हरि चाफेकर को फांसी की सजा दी और उन्होंने मन्द मुस्कान के साथ यह सजा सुनी। कारागृह में तिलक जी ने उनसे भेंट की और उन्हें “गीता’ प्रदान की। 18 अप्रैल 1898 को प्रात: वही “गीता’ पढ़ते हुए दामोदर हरि चाफेकर फांसीघर पहुंचे और फांसी के तख्ते पर लटक कर अमरत्व प्राप्त किया। उस क्षण भी वह “गीता’ उनके हाथों में थी। इनका जन्म 25 जून 1869 को पुणे जिले के चिंचवड़ नामक स्थान पर हुआ था।

उधर बालकृष्ण चाफेकर ने जब यह सुना कि उसको गिरफ्तार न कर पाने से पुलिस उसके सगे-सम्बंधियों को सता रही है तो वह स्वयं पुलिस थाने में उपस्थित हो गए। अनन्तर तीसरे भाई वासुदेव चाफेकर ने अपने साथी महादेव गोविन्द विनायक रानडे को साथ लेकर उन गद्दार द्रविड़-बन्धुओं को जा घेरा और उन्हें गोली मार दी। वह 09 फरवरी 1899 की रात थी। तदनन्तर वासुदेव चाफेकर को 08 मई को और बालकृष्ण चाफेकर को 12 मई 1899 को यरवदा कारागृह में फांसी दे दी गई। बालकृष्ण चाफेकर सन्‌ 1873 में और वासुदेव चाफेकर सन्‌ 1880 में जन्मे थे। इनके साथी क्रांतिवीर गोविन्द विनायक रानडे को 10 मई 1899 को यरवदा कारागृह में ही फांसी दी गई।

पीएम मोदी के हाथों में पहुंची ‘सबके राम’ अनूठी कॉफी टेबल बुक

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आदित्य भारद्वाज
जैसे ही सुंदरकांड की चौपाई रामकाज कीन्हे बिनु… गूंजी, भावुक हुए प्रधानमंत्री मोदी
—पीएम मोदी ने आह्वान किया कि राष्ट्र की सभी प्रमुख विभूतियों और अलग-अलग देश में सभी भारतवंशियों तक सदियों के संघर्ष और सत्य की जीत की यह गाथा पहुंचे
—इस पुस्तक को आप पढ़ भी सकते हैं और हिंदी व अंग्रेजी में सुन भी सकते हैं
पाञ्चजन्य संपादक हितेश शंकर और भारत प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अरुण गोयल ने देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को  “सबके राम कॉफी टेबल बुक भेंट की। खास बात यह है कि इस पुस्तक को आप पढ़ भी सकते हैं और हिंदी व अंग्रेजी में सुन भी सकते हैं।
भारत के कण कण में राम हैं। आध्यत्म, इतिहास, मिथक या विज्ञान क्या है राम जन्म भूमि और जन्म तिथि का सच, अयोध्या के इतिहास को उसके वर्तमान से जोड़ता अध्याय, ऐसी तमाम बातों को कहती एक अनुठी पुस्तक है “सबके राम। अयोध्या में राम मंदिर के लिए 500 वर्षों का संघर्ष अब सार्थक हो गया है। दुनिया भर के करोड़ों रामभक्तों का अपने आराध्य की जन्मभूमि पर मंदिर का सपना साकार हो चुका है। इस पुस्तक में राम मंदिर की नींव में दबे समर्पण, त्याग, बलिदान और सामाजिक चेतना के उद्घोष की अनकही कहानियां हैं।
संघर्षों की कहानियों, प्रभु राम से जुड़ी आ​स्थाओं, पौराणिक कथाओं से जुड़े इतिहास और तथ्यों को इस पुस्तक में ज्ञान की प्रामणिकता के साथ एक नए स्वरूप में लाया गया है। इस किताब में  आपको आडियो के रूप में प्रभु राम से जुड़ी वह सारी जानकारी मिलेगी जो उनके विराट रूप को सिर्फ भारत में नहीं बल्कि पूरे विश्व के लिए आदर्श का प्रतीक बनाता है।
इस पुस्तक में आप भारत की ऐसी महान विभूतियों के राम नाम पर विचार पढ़ सकते हैं और सुन सकते हैं जो देश ही नहीं बल्कि दुनियाभर में जाने जाते हैं। इस पुस्तक के माध्यम से आपको पता चलेगा कि क्यों प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अयोध्या को राष्ट्रीय अभिमान कहते थे। राम राज्य, राम रीति और रा​म नीति को पीएम मोदी, राम जन्मभूमि ट्रस्ट के महासचिव चंपतराय, सरसंघचालक मोहन भागवत, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, जूना आखाड़ा के आचार्य महामंडलेवर स्वामी अवधेशानंद गिरि कैसे देखते हैं यह इस पुस्तक के माध्यम से आप जान पाएंगे। ये सभी राम मंदिर संघर्ष के साक्षी रहे हैं। इस पुस्तक में भगवान राम और उनकी अयोध्या के बारे में वैज्ञानिकता से देखने का प्रयास किया गया है। यह किताब साक्ष्यों के आधार पर आपके अनेकों अनसुलझे प्रश्नों का उत्तर देगी।

कांग्रेस के लिए रवीश कुमार का प्रेम inbuilt है, उन्हें छुपाना नहीं पड़ता

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”प्रधानमंत्री में प्रेस कांफ्रेन्स करने की शक्ति कब आएगी, यह हम उनसे पूछे या उनके अराध्य से। हर समय, हर अखबार, हर चैनल पर उनको देखने वाली जनता को क्या यह सुख कभी नहीं मिलेगा?” यह सवाल वरिष्ठ यू ट्यूबर रवीश कुमार अपने प्राइम टाइम में यू ट्यूब पर अपलोड किए गए वीडियो में पूछते हैं। रवीश अपने यू ट्यूब चैनल पर अक्सर बीजेपी, मोदी, आरएसएस के खिलाफ ही बोलते हुए पाए जाते हैं। उनका विश्लेषण एक पक्षीय होता है। जिसमें दूसरे पक्ष को वह कोई स्थान नहीं देते। अक्सर अपने चैनल पर वे दूसरे पत्रकारों को ज्ञान दे रहे होते हैं कि उन्हें पत्रकारिता के किन मूल्यों का पालन करना चाहिए। यह सारा उपदेश दूसरों के लिए है। उन उपदेशों का दशवां हिस्सा भी उनके यू ट्यूब चैनल पर अपलोड किए गए वीडियो पर लागू नहीं होता।

रवीश कुमार ऑफिसियल यू ट्यूब चैनल पर अपलोड किए गए कुछ वीडियो के थंबनेल साफ साफ प्रधानमंत्री मोदी को केन्द्र में रखकर तैयार किए गए। उन वीडियो को देखकर समझना आसान था कि रवीश कुमार के अधिकांश व्यूअर बीजेपी से नफरत करने वाले हैं। रवीश भी अपने चैनल पर निष्पक्ष होने की कोशिश नहीं करते। वे कभी कांग्रेसी बन जाते हैं और कभी आप वाला कभी तृणमूल के समर्थक। वे जिस भी भूमिका में रहें लेकिन उनका बीजेपी के विपक्ष में रहना कॉमन है, जो उनके सभी वीडियो में दिखाई पड़ता है। बीजेपी सत्ता में रहे या विपक्ष में, रवीश कुमार को हर उसकी आलोचकों के दल में रहना है। उसके बावजूद वे दशक पर से पत्रकारिता पर प्रवचन दे रहे हैं और उसे निष्पक्ष भाव से सुना जा रहा है जबकि रवीश कुमार का पक्ष तय है। दो दिन पहले का एक थंबनेल है— मोदी का इंटरव्यू हो और सवाल न हो। तीन दिन पहले मोदी मेनिफेस्टो, नौकरी चाहिए तो सपने ले लो। इसी तरह मोदी के भाषण में क्या है, मोदी सरकार की जेल फैक्ट्री, नौकरियां कहां हैं मोदीजी, मोदीराज का टेलीकॉम घोटाला जैसे अनगिनत थंबनेल पीएम मोदी दर्जनों सवालों के साथ उनके चैनल पर अपलोड किए गए हैं। दूसरी तरफ वे अपने लोगों के लिए जो थंबनेल डालते हैं, उसे पढ़ा जाना चाहिए। कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी के लिए थंबनेल दिया गया है— सिंघवी ने की धुंआधार बहस। यह बहस न्यायालय में सिंघवी ने अरविन्द केजरीवाल के लिए की। दस साल पहले अरविन्द केजरीवाल सिंघवी और उनकी पार्टी के लिए सार्वजनिक मंचों पर क्य बोलते थे, यह किसी से छुपी हुई बात नहीं है। अब रवीश, सिंघवी और केजरीवाल सब एक टीम हो गए हैं। केजरीवाल के लिए रवीश ने एक वीडियो बनाकर उसका शीर्षक दिया— मुझे गिरफ्तार क्यों किया? इसी तरह कांग्रेस की चुनावी रैली को रवीश ने अपने चैनल से महारैली का महाभाषण कहकर प्रचारित किया। संजय सिंह पर वीडियो बनाते हुए शीर्षक दिया— ईडी की बोलती बंद। कांग्रेस के मैनिफेस्टो पर वीडिये बनाते हुए उसे शीर्षक दिया, सिस्टम की मनमानी पर लगेगी ब्रेक। अपने यू ट्यूब चैनल पर यह सब करते हुए रवीश कुमार जब पत्रकारिता पर भाषण देते हैं तो यकिन मानिए वे बड़े बौने दिखाई देते हैं। जिसने पत्रकारिता से नहीं बल्कि उस राजनीतिक विचार से वफादारी निभाई, जिससे उनके परिवार का संबंध रहा। बड़े भाई का संबंध रहा। यह बात उनके करीबी ही बता रहे थे कि रवीश कुमार की कांग्रेस से चैनल को लेकर बात हो रही थी लेकिन उनकी निष्पक्ष छवि बनी रहे इसलिए चैनल का मामला स्थगित कर दिया गया। अब रवीश के पास छुपाने के लिए कुछ नहीं है। जिस तरह के वीडियो वे बनाकर अपलोड कर रहे हैं, उनके पास इससे अधिक एक्सपोज होने के लिए अब बचा ही क्या है?

अपने हालिया वीडियो में रवीश कुमार ने प्रधानमंत्री के प्रेस कांफ्रेन्स के लिए कुछ पत्रकारों के नाम भी सुझाए। जिन्हें प्रधानमंत्री को अपने पीसी में बुलाना चाहिए। रवीश कहते हैं आने दो सिद्धार्थ वरदराजन, नितिन सेठी, बसंत कुमार, अमन सेठी, मोहम्मद जुबैर, बेतवा शर्मा, आलीशान जाफरी, धन्या राजेन्द्रन, अतुल चौरसिया, सागर, हरतोष सिंह बल, मेघनाथ को और पूछने दो जो वे पूछना चाहते हैं।

जितने भी नाम रवीश कुमार ने लिए, सभी को सिर्फ पीएम मोदी से ही सवाल पूछने हैं। या इन्होंने अपने पत्रकारिता कॅरियर में सोनिया गांधी से कभी कोई सवाल पूछा है। ये तो राहुल गांधी के प्रेस कांफ्रेन्स में सवाल पूछने वालों में नहीं थे। राहुल गांधी भी जिन्हें अपने प्रेस काफ्रेन्स में इतना महत्व नहीं दे रहे, रवीश कुमार उन्हें मोदी के सामने सवाल पूछने के लिए क्यों खड़ा करना चाहते हैं? इन्होंने सोनिया गांधी और राहुल गांधी से किस तरह के सवाल पूछे हैं, एक बार रवीश कुमार को इनके नाम प्रस्तावित करते हुए, उन सवालों को उद्धृत करना चाहिए क्योंकि अब उनमें सोनिया और राहुल के लिए कुछ कहने का साहस बचा नहीं है। कम से कम अपने मित्रों के सवाल ही शेयर कर दें। या वे सब भी उनकी ही तरह कांग्रेस पार्टी के आलाकमान के सामने ‘विनम्र बालक’ हैं।

रवीश को मौका मिला था राहुल से साक्षात्कार लेने का। वह साक्षात्कार मीडिया के छात्रों को देखना चाहिए। एक वरिष्ठ यू ट्यूबर जब मुख्य धारा के पत्रकारों को गोदी मीडिया कहता है तो वह खुद अपने चैनल पर किस स्तर की पत्रकारिता कर रहा है। इसे देखना और समझना बहुत जरूरी है। उसके यहां सबकुछ एक पक्षीय है या दूसरे पक्ष को भी अपनी बात रखने का बराबर का अवसर मिल रहा है। इसे भी नोट करना चाहिए।

यह सच है कि वे जिस एनडीटीवी से निकल कर यू ट्यूब वीडियो के क्षेत्र में आए हैं, उसे पत्रकारिता में कांग्रेस का ही चैनल कहा जाता था। उस चैनल को सोनिया गांधी की वजह से मदद मिली। उनके उपकार नीचे दबे चैनल ने अपने पूरे इतिहास में सोनिया गांधी की आलोचना करती एक स्टोरी नहीं चलाई है। जब सोनिया गांधी ने एक बार राजनीति से बाहर रहने का निर्णय लिया, उसे कवर करने के लिए प्रणय राय बारिश के बीच निकल कर सड़क पर आए। उन्होंने सोनिया को त्याग की मूर्ति कहा। सोनिया उस समय सत्ता में थी लेकिन गोदी मीडिया शब्द ट्रेंड में नहीं था।

रवीश ने एक महीने पहले ‘दम नहीं है तुममे’ (https://www.youtube.com/watch?v=Qavc5RPqJwY&t=151s&pp=ygUZcmFodWwgZ2FuZGhpIHJhdmlzaCBrdW1hcg%3D%3D) शीर्षक से एक वीडियो बनाया और उस वीडियो में राहुल गांधी का जिस स्तर का प्रस्तति वाचन किया। वे जिन्हें गोदी मीडिया कहते हैं, वे भी पूरा वीडियो देख कर शर्मिन्दा हो जाएंगे लेकिन रवीश को इस बात से फर्क नहीं पड़ता। इसी प्रकार 12 जनवरी 2023 को रवीश कुमार ने भारत जोड़ो: राहुल गांधी और डरपोक कवरेज क्लास शीर्षक से एक वीडियो किया। यह वीडियो हो सकता है, रवीश कुमार ने श्रद्धा भाव से बनाया हो लेकिन वह कांग्रेस की पीआर एक्सरसाइज का हिस्सा दिखाई पड़ती है।

आशीष नंदी ने सवर्णो में लेन देन की प्रवृत्ति पर जयपुर साहित्य उत्सव में टिप्पणी की थी। मतलब आज रवीश कुमार कांग्रेस के लिए करेंगे और समय आने पर कांग्रेस रवीश कुमार के लिए करेगी। इस लेन देन में कोई भ्रष्टाचार नहीं दिखाई पड़ता है। कोई खोजी पत्रकार इसमें लेन—देन साबित नहीं कर पाएगा। जैसे रवीश की इस सेवा के बदले उनके सगे भाई को बिहार में कांग्रेस पार्टी के अंदर विधानसभा चुनाव हारने के बावजूद फिर से टिकट मिल जाए तो इस ‘नैतिक—भ्रष्टाचार’ को कोई कैसे साबित करेगा?

11 मई 2019 को रवीश ने राहुल गांधी का साक्षात्कार किया। जिसे अब तक 50 लाख लोग उनके यू ट्यूब पर देख चुके हैं। साक्षात्कार में रवीश, राहुल से कहते हैं, राहुल बहुत धूप है। राहुल हां में सिर हिलाते हैं। मतलब हां धूप है। रवीश सवाल करते हैं — दो विचारधाराओं के बीच की लड़ाई है। राहुल गांधी किस विचारधारा से लड़ना चाहते हैं? रवीश ही बताएं कि यह किस श्रेणी का सवाल था? अब रवीश एक दूसरा कठीन सवाल लेकर आते हैं कि आपके परिवार पर मोदीजी लगातार पांच सालों से हमला कर रहे हैं। आपने अपने साक्षात्कारों में इसे महत्व नहीं दिया। इसके बाद रवीश, राहुल गांधी को समझाने का प्रयास करते हैं, जब नेहरू पर हमला हो रहा था, तो वह सिर्फ नेहरू पर हमला नहीं था। रवीश कहते हैं कि उन्हें लगता है कि कांग्रेस ने नेहरू को ठीक से डिफेन्ड नहीं किया? इस तरह रवीश सवाल पूछते हुए राहुल के सामने, उनसे बड़े कांग्रेसी होने की कोशिश कर रहे थे। यह सच भी है कि नेहरू का कांग्रेसियों से भी अच्छे तरह से रवीश पांडेय और अशोक पांडेय ने बचाव किया है। इसके पीछे की एक वजह इन तीनों की जाति भी हो सकती है। ये तीनों ब्राम्हण हैं। रवीश का राहुल के साथ किया गया वह साक्षात्कार देखा जाना चाहिए।

बहरहाल पाठकों के लिए यह जानना भी दिलचस्प होगा कि एक तरफ रवीश कुमार एक लंबी सूची बनाकर कह रहे हैं कि इन्हें मोदीजी से सवाल—जवाब करने का अवसर मिलना चाहिए, दूसरी तरफ यही रवीश कांग्रेस के उस फैसले के समर्थन में दिखाई पड़ते हैं, जब कांग्रेस मुख्यधारा के एक दर्जन से अधिक एंकरों का ऑफिसिअल बायकाट करती है। यह आलेख रवीश तक पहुंचे तो वह चाहे जवाब ना लिखें, कम से कम थोड़ा विचार अवश्य करें कि क्या से क्या हो गए?

भारत का विदेशी मुद्रा भंडार एक लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को छू सकता है

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भोपाल। वर्ष 1991 में भारत के पास केवल 100 करोड़ अमेरिकी डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार बच गया था जो केवल 15 दिनों के आयात के लिए ही पर्याप्त था। वहीं, आज भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 65,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है एवं यह पूरे एक वर्ष भर के आयात के लिए पर्याप्त है। आज भारत विदेशी मुद्रा भंडार के मामले में चीन, जापान, स्विजरलैंड के बाद विश्व का चौथा सबसे बड़ा देश बन गया है। कोरोना महामारी के बाद भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 7,100 करोड़ अमेरिकी डॉलर से कम हुआ था, परंतु वर्ष 2022 के बाद से यह अब लगातार उतनी ही तेज गति से आगे भी बढ़ रहा है। और, अब तो यह उम्मीद की जा रही है कि आगे आने वाले समय में यह एक लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को भी पार कर जाएगा। भारत में वित्तीय एवं बैंकिंग क्षेत्र में लागू किए गए सुधार कार्यक्रमों के बाद से पिछले 33 वर्षों में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगातार बढ़ता रहा है। यह वर्ष 2004 में 14,500 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गया था, वर्ष 2014 में 32,200 करोड़ अमेरिकी डॉलर एवं वर्ष 2024 में 65,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है। भारत के पड़ौसी देशों का विदेशी मुद्रा भंडार बहुत कम है, जैसे बंगलादेश के पास 2,500 करोड़ अमेरिकी डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है, नेपाल के पास 1,800 करोड़ अमेरिकी डॉलर, पाकिस्तान के पास 800 करोड़ अमेरिकी डॉलर एवं श्रीलंका के पास 450 करोड़ अमेरिकी डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है। अतः भारत समय समय पर अपने पड़ौसी देशों (पाकिस्तान को छोड़कर) की इस संदर्भ में लाइन आफ क्रेडिट उपलब्ध कराकर मदद करता रहता है।

हाल ही के समय में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार के बढ़ने के कारणों में मुख्य रूप से शामिल हैं, भारत में लगातार बढ़ता प्रत्यक्ष विदेशी निवेश। केंद्र सरकार द्वारा चालू किए गए आर्थिक सुधार कार्यक्रमों के चलते भारत में अब व्यापार करना बहुत आसान हुआ है अतः विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत में अपनी विनिर्माण इकाईयां स्थापित कर रही हैं, जिसके लिए वे भारत में भारी मात्रा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ला रही हैं। दूसरे, भारतीय मूल के नागरिक जो विदेश में जाकर बस गए हैं अथवा वे वहां पर रोजगार प्राप्त करने के उद्देश्य से गए हैं, वे इन देशों में अपनी बचत की राशि को भारत भेज रहे हैं। यह राशि पूरे विश्व में किसी भी देश में भेजने वाली राशि में सबसे अधिक है। वर्ष 2023-24 में विदेशों में बसे भारतीय मूल के नागरिकों ने 12,500 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि भारत में भेजी थी। दूसरे स्थान पर मेक्सिको रहा था जहां पर 6,700 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि भेजी गई थी और तीसरे स्थान पर चीन रहा था, जहां 5,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि भेजी गई थी। कितना बड़ा अंतर है प्रथम एवं द्वितीय स्थान के देशों में। तीसरा, कारण है कि अब भारत से वस्तुओं एवं सेवाओं के निर्यात तेजी से बढ़ रहे हैं जबकि विभिन्न वस्तुओं एवं सेवाओं के आयात कम हो रहे हैं। और, अब तो भारत रक्षा के क्षेत्र में भी हवाई जहाज एवं अन्य रक्षा सामग्री का निर्यात करने लगा है। वित्तीय वर्ष 2023-24 में रक्षा के क्षेत्र में 21,083 करोड़ रुपए का निर्यात भारत द्वारा किया गया था, जो वित्तीय वर्ष 2022-23 में निर्यात की गई राशि 15,920 करोड़ रुपए से 32.5 प्रतिशत अधिक था।

विश्व में अब विभिन्न देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने के उद्देश्य से अपने के पास स्वर्ण के भंडार भी बढ़ाते जा रहे हैं। आज पूरे विश्व में अमेरिका के पास सबसे अधिक 8133 मेट्रिक टन स्वर्ण के भंडार है, इस संदर्भ में जर्मनी, 3352 मेट्रिक टन स्वर्ण भंडार के साथ, दूसरे स्थान पर एवं इटली 2451 मेट्रिक टन स्वर्ण भंडार के साथ तीसरे स्थान पर है। फ्रान्स (2437 मेट्रिक टन), रूस (2329 मेट्रिक टन), चीन (2245 मेट्रिक टन), स्विजरलैंड (1040 मेट्रिक टन) एवं जापान (846 मेट्रिक टन) के बाद भारत, 812 मेट्रिक टन स्वर्ण भंडार के साथ विश्व में 9वें स्थान पर है। भारत ने हाल ही के समय में अपने स्वर्ण भंडार में वृद्धि करना प्रारम्भ किया है एवं यूनाइटेड अरब अमीरात से 200 मेट्रिक टन स्वर्ण भारतीय रुपए में खरीदा था।

दरअसल किसी भी देश में विदेशी मुद्रा भंडार के अधिक होने के चलते उस देश में विदेशी व्यापार करने का आत्मविश्वास जागता है क्योंकि अन्य देशों से किये गए व्यापार के एवज में विदेशी मुद्रा में भुगतान करने में कोई कठिनाई नहीं होती है। साथ ही, विदेशी निवेशकों में भी विश्वास जागता है कि जिस देश में वे निवेश कर रहे हैं उस देश की अर्थव्यवस्था बहुत मजबूत है और उनका उस देश में विदेशी मुद्रा में निवेश किया गया पैसा सुरक्षित है एवं उन्हें उनका निवेश वापिस मिलने में कोई परेशानी नहीं आएगी। विदेशी मुद्रा भंडार उच्च स्तर पर होने से कोई भी विदेशी संस्थान ऋण उपलब्ध कराने में नहीं हिचकता है, क्योंकि उसे भरोसा रहता है कि ऋण का पुनर्भुगतान होने में आसानी रहेगी। विदेशी मुद्रा भंडार के उच्च स्तर पर रहने से उस देश की मुद्रा की कीमत को अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरने से बचाया जा सकता है। जैसे भारत में भारतीय रिजर्व बैंक ने कोरोना महामारी के दौरान एवं इसके बाद अमेरिकी डॉलर की तुलना में भारतीय रुपए की कीमत को अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरने से रोकने में सफलता पाई है। जब कभी अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी डॉलर की तुलना में भारतीय रुपए की कीमत पर दबाव दिखाई दिया है, भारतीय रिजर्व बैंक ने अमेरिकी डॉलर को बाजार में बेचकर रुपए की कीमत को स्थिर बनाये रखा है। इस प्रकार, पिछले लगभग दो वर्षों के दौरान भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अमेरिकी डॉलर की तुलना में भारतीय रुपए की कीमत को स्थिर बनाए रखा जा सका है।

अब तो भारत लगातार यह भी प्रयास कर रहा है कि जिन देशों से विभिन्न वस्तुओं का आयात भारत द्वारा किया जा रहा हैं उन्हें इसके एवज में अमेरिकी डॉलर के स्थान पर भारतीय रुपए में भुगतान किया जाए। 32 से अधिक देशों ने इस संदर्भ में अपनी स्वीकृति भारत सरकार को दे दी है एवं कई देशों ने तो भारतीय रिजर्व बैंक के साथ अपना नोस्ट्रो खाता भी खुलवा लिया है ताकि उन्हें भारत को निर्यात किए गए सामान की राशि भारतीय रुपए में भुगतान लेने में आसानी हो सके। यदि भारत और अन्य देशों के बीच इस प्रकार की व्यवस्था सफल होती है तो इन देशों में बीच अमेरिकी डॉलर की मांग कम होगी और अमेरिकी डॉलर की तुलना में अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय रुपए की कीमत स्थिर रखने में और भी आसानी होगी, जो कि भारत के विदेशी व्यापार को गति देने में सहायक होगी।

जिस तेज गति से भारत की अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है, भारत से विभिन्न वस्तुओं एवं सेवाओं के निर्यात बढ़ रहे हैं एवं आयात कम हो रहे हैं, भारत में विदेशी निवेश बढ़ रहे हैं, भारतीय मूल के नागरिकों द्वारा भारत में विदेशी मुद्रा में भारी मात्रा में राशि भेजी जा रही है, इससे अब यह विश्वास दृढ़ होता जा रहा है कि आगे आने वाले समय में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार एक लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को भी पार कर जाएगा।

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