जो बोएंगे वही पाएंगे ….

PHOTO-2024-04-05-10-04-02.jpg

रामगोपाल

दिल्ली। आजकल एक नया शिगूफा शुरू हुआ है कि बच्चा अपना रास्ता स्वयं चुने। यह शिगूफा एक समस्या बनता जा रहा है। बात केवल नास्तिकता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शारीरिक पहचान को भी क्षति पहुंचा रही है। बच्चे में जो संस्कार बचपन से भरे जाते हैं, वही आगे बढ़कर बृहत रूप लेते हैं। बचपन में जो बीज बोए जाएंगे वही आगे चलकर पेड़ का रूप लेंगे। अब यह आपके ऊपर है कि आप क्या बीज बोते हैं। यह भी है कि बीज आप स्वयं बोते हैं, या फिर खाली खेत छोड़ देते हैं और कोई और कुछ बोकर चला जाएगा।

प्रकृति का नियम यह है कि वह कहीं शून्य नहीं छोड़ती। यदि आपने अभीष्ट संस्कार नहीं दिए तो उस खाली जगह में आयातित संस्कार भर जाएंगे। यदि आप चाहते हैं कि आपकी संतान सही दिशा में चले तो सही दिशा आपको चुननी पड़ेगी और उस दिशा में संतान को ले जाना होगा। आपकी संतान दो तरीकों से सीखेगी। या तो उसे आप सिखा सकते हैं, या फिर वह स्वयं देखकर सीखेगा। बालमन कच्चा होता है, जरूरी नहीं कि वह आपको देखकर ही सीखे। उसकी नजर जहां तक जाएगी, वह वहां तक सीखेगा।

यदि आप अपने बच्चे को प्रारंभ से धार्मिक कथाएं सुनाते हैं, पूजा पाठ, आध्यात्म की ओर प्रेरित करते हैं तो बड़े होने पर कितना भी भटक जाए, वापस अपने रास्ते पर आ जाएगा।यदि आप बचपन से अपने बच्चे को मारपीट सिखाते हैं तो उसकी प्रवृत्ति यही रहेगी। दबना सिखाते हैं तो ताउम्र दबेगा, दाबना सिखाते हैं ताउम्र दाबेगा। यदि कुछ नहीं सिखाते हैं और यह सोचते हैं कि बड़ा होने पर अपना निर्णय स्वयं लेगा तो सादर क्षमा मांगते हुए कहता हूं कि आप गलत हैं। उसके मस्तिष्क को जो भोजन चाहिए वह लेगा ही। फिर चाहे वह आप उसे दें या कोई और। यदि बचपन में सही राह नहीं दिखाई तो राह से भटकाने का काम आप कर चुके हैं।

इसी क्रम में एक समस्या मैंने प्रत्यक्ष देखी है। अक्सर देखिएगा कि जिस व्यक्ति की केवल बेटियां होती हैं, वह एकाधिक बेटी को बेटा बनाकर पालेंगे। बचपन में तो ये बात बड़ी प्यारी लगती है। लेकिन धीरे धीरे वह शिशु यह समझ बैठता है कि वह वास्तव में लड़का है। शरीर का निर्माण भले माता के गर्भ में होता है, लेकिन विकास तो जन्म के बाद होता है। इसमें मस्तिष्क की अहम भूमिका होती है। मस्तिष्क उन रसायनों का निर्माण सुनिश्चित करता है जो विभिन्न अंगों का विकास सुनिश्चित करते हैं। संभवतः इन्हें ही हार्मोंस कहा जाता है।

विचार करके देखिए कि आपके घर में तोता पलता है जिसे अन्न चाहिए, लेकिन आप समझ रहे हैं कि आपने खरगोश पाल रखा है। ऐसे में क्या होगा? आप घास की मात्रा बढ़ा देंगे और अन्न एकदम नगण्य कर देंगे। आपका तोता कमजोर हो जाएगा। घास खाकर जिंदा तो रहेगा, लेकिन किसी काम का नहीं रहेगा। खरगोश तो बनने से रहा। यह असंभव ही है। यही शरीर करता है। जो हार्मोंस चाहिए वह बनेंगे नहीं, और जो नहीं चाहिए वह बनने लगेंगे। इसके विपरीत प्रभाव पड़ेंगे। शरीर के विभिन्न अंगों का जो विकास होना चाहिए वह नहीं होगा। शरीर तो छोड़िए, मानसिक अवस्था भी ऐसी हो जाएगी कि वह बच्ची स्वयं को आगे चलकर स्त्री नहीं मान पाएगी। स्त्री शरीर में फंसा हुआ एक पुरुष मिलेगा।

इसका उल्टा भी हो सकता है। पुरुष शरीर में फंसी हुई स्त्री भी हो सकती है। लेकिन ऐसे मामले कम आते हैं। कई मामले देखे हैं मैंने जहां विवाह की अवस्था होने पर अभिभावक चाहते हैं कि उनका ‘बेटा’ बेटी बन जाए। लेकिन यह हो नहीं पाता। ऐसे में या तो वह लड़की शादी ही नहीं करती, या फिर कर भी ले तो दांपत्य जीवन समस्याओं से भर उठता है। पति को स्त्री चाहिए होती है, लेकिन शरीर से आधी और मन से पूरा पुरुष उसे प्राप्त हो जाता है।

खैर! मेरा मानना यह है कि लड़की को आप तमाम शक्तियां दें। उसे स्वाबलंबी बनाएं, आत्मनिर्भर बनाएं, स्वतंत्र बनाएं, लेकिन पुरुष न बनाएं। ऐसा कुछ भी नहीं जो एक लड़की होते हुए नहीं पाया जा सकता है।

एक स्कूल ऐसा, जहां अभिभावकों को मिला होम वर्क

images-1.jpeg

चेन्नई के एक स्कूल ने अपने बच्चों को छुट्टियों का जो एसाइनमेंट दिया वो पूरी दुनिया में वायरल हो रहा है.

वजह बस इतनी कि उसे बेहद सोच समझकर बनाया गया है. इसे पढ़कर अहसास होता है कि हम वास्तव में कहां आ पहुंचे हैं और अपने बच्चों को क्या दे रहे हैं. अन्नाई वायलेट मैट्रीकुलेशन एंड हायर सेकेंडरी स्कूल ने बच्चों के लिए नहीं बल्कि पेरेंट्स के लिए होमवर्क दिया है, जिसे हर एक पेरेंट को पढ़ना चाहिए.

उन्होंने लिखा-
पिछले 10 महीने आपके बच्चों की देखभाल करने में हमें अच्छा लगा.आपने गौर किया होगा कि उन्हें स्कूल आना बहुत अच्छा लगता है. अगले दो महीने उनके प्राकृतिक संरक्षक यानी आप उनके साथ छुट्टियां बिताएंगे. हम आपको कुछ टिप्स दे रहे हैं जिससे ये समय उनके लिए उपयोगी और खुशनुमा साबित हो.

– अपने बच्चों के साथ कम से कम दो बार खाना जरूर खाएं. उन्हें किसानों के महत्व और उनके कठिन परिश्रम के बारे में बताएं. और उन्हें बताएं कि अपना खाना बेकार न करें.

– खाने के बाद उन्हें अपनी प्लेटें खुद धोने दें. इस तरह के कामों से बच्चे मेहनत की कीमत समझेंगे.

– उन्हें अपने साथ खाना बनाने में मदद करने दें. उन्हें उनके लिए सब्जी या फिर सलाद बनाने दें.

– तीन पड़ोसियों के घर जाएं. उनके बारे में और जानें और घनिष्ठता बढ़ाएं.

– दादा-दादी/ नाना-नानी के घर जाएं और उन्हें बच्चों के साथ घुलने मिलने दें. उनका प्यार और भावनात्मक सहारा आपके बच्चों के लिए बहुत जरूरी है. उनके साथ तस्वीरें लें.

– उन्हें अपने काम करने की जगह पर लेकर जाएं जिससे वो समझ सकें कि आप परिवार के लिए कितनी मेहनत करते हैं.

– किसी भी स्थानीय त्योहार या स्थानीय बाजार को मिस न करें.

– अपने बच्चों को किचन गार्डन बनाने के लिए बीज बोने के लिए प्रेरित करें. पेड़ पौधों के बारे में जानकारी होना भी आपके बच्चे के विकास के लिए जरूरी है.

– अपने बचपन और अपने परिवार के इतिहास के बारे में बच्चों को बताएं.

– अपने बच्चों का बाहर जाकर खेलने दें, चोट लगने दें, गंदा होने दें. कभी कभार गिरना और दर्द सहना उनके लिए अच्छा है. सोफे के कुशन जैसी आराम की जिंदगी आपके बच्चों को आलसी बना देगी.

– उन्हें कोई पालतू जानवर जैसे कुत्ता, बिल्ली, चिड़िया या मछली पालने दें.

– उन्हें कुछ लोक गीत सुनाएं.

– अपने बच्चों के लिए रंग बिरंगी तस्वीरों वाली कुछ कहानी की किताबें लेकर आएं.

– अपने बच्चों को टीवी, मोबाइल फोन, कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स से दूर रखें. इन सबके लिए तो उनका पूरा जीवन पड़ा है.

– उन्हें चॉकलेट्स, जैली, क्रीम केक, चिप्स, गैस वाले पेय पदार्थ और पफ्स जैसे बेकरी प्रोडक्ट्स और समोसे जैसे तले हुए खाद्य पदार्थ देने से बचें.

– अपने बच्चों की आंखों में देखें और ईश्वर को धन्यवाद दें कि उन्होंने इतना अच्छा तोहफा आपको दिया. अब से आने वाले कुछ सालों में वो नई ऊंचाइयों पर होंगे.

माता-पिता होने के नाते ये जरूरी है कि आप अपना समय बच्चों को दें.

अगर आप माता-पिता हैं तो इसे पढ़कर आपकी आंखें नम जरूर हुई होंगी. और आखें अगर नम हैं तो वजह साफ है कि आपके बच्चे वास्तव में इन सब चीजों से दूर हैं. इस एसाइनमेंट में लिखा एक-एक शब्द ये बता रहा है कि जब हम छोटे थे तो ये सब बातें हमारी जीवनशैली का हिस्सा थीं, जिसके साथ हम बड़े हुए हैं, लेकिन आज हमारे ही बच्चे इन सब चीजों से दूर हैं, जिसकी वजह हम खुद हैं

3 अप्रैल 1988 : सुप्रसिद्ध पुरातत्वविद् वाकणकर जी की पुण्यतिथि

images.jpeg

भोपाल के समीप भीमबैठका और वैदिककालीन मानव सभ्यता के प्रमाण इन्हीं ने खोजे थे

–रमेश शर्मा

डाक्टर हरिभाऊ वाकणकर की गणना संसार के प्रमुख पुरातत्वविदों में होती है । उन्होंने भारत के विभिन्न वनक्षेत्र के पुरातन जीवन और भोपाल के आसपास लाखों वर्ष पुराने मानव सभ्यता के प्रमाण खोजे । भीम बैठका उन्ही की खोज है । उनके शोध के बाद विश्व भर के पुरातत्वविद् भारत आये और डाक्टर वाकणकर से मार्गदर्शन लिया ।

उनका पूरा नाम श्रीविष्णु श्रीधर वाकणकर था । लेकिन वे हरिभाऊ वाकणकर के नाम से प्रसिद्ध थे । उनका जन्म 4 मई 1919 को मध्यप्रदेश के नीमच नगर में हुआ । पिता श्रीधरजी वाकणकर वैदिक विद्वान थे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे । बड़े भाई लक्ष्मण वाकणकर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से केमिकल इंजीनियर थे। उन्हे सिरेमिक कला में विशेषज्ञता प्राप्त थी । लिपियों के विकास विशेषकर देवनागरी के डिजिटलीकरण में विशेषज्ञ के रूप में उनकी ख्याति थी । हरिभाऊ जी की प्रारंभिक शिक्षा नीमच में ही हुई और उच्च शिक्षा केलिये बनारस गये । पारिवारिक पृष्ठभूमि ने उनके भीतर भारतीय संस्कृति के प्रति अटूट स्वाभिमान जाग्रत किया और राष्ट्रीय स्वयं सेवकसंघ से जुड़ने केलिये प्रेरित किया । वे बालवय में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गये थे । हरिभाऊ जी बहुत अध्ययन एवं कल्पनाशील थे, स्मरण शक्ति और स्वत्व वोध विलक्षण था । छात्र जीवन में अपनी कक्षा के साथियों और अन्य मित्रों से परस्पर चर्चा में तर्क सहित वे उन धारणाओं का खंडन करते थे जो विदेशी लेखकों ने भारतीय वाड्मय की गरिमा कम करने के लिये स्थापित की थीं। शिक्षा पूरी कर उन्होंने इसी दिशा में कदम बढ़ाये। उन्होंने भारतीय पुरातन साहित्य का विस्तृत अध्ययन किया और पुराणों कथाओं से संबंधित विवरणों के सजीव प्रमाण खोजे । और अनेक उन तथ्यों को प्रमाणित किया जिन्हे मिथक कहकर नकारा जाता रहा था । इसमें वेद वर्णित सरस्वती नदी का अस्तित्व भी है ।

वाकणकर जी ने सरस्वती नदी खोज केलिये विश्व इतिहास के इस तथ्य को आधार बनाया कि संस्कृतियों के विकास और इतिहास के प्रमाणीकरण में नदियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है । वाकणकर जी ने वैदिक साहित्य में वर्णित सरस्वती नदी की खोज आरंभ की । उन्होंने उपग्रह छवि से प्रमाणित किया कि सरस्वती नदी का प्रवाह हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात से होकर गुजरता है । आगे चलकर इस मार्ग केलिये एक परियोजना का गठन हुआ जिसके सलाहकार मंडल कै संयोजक वाकणकर जी बनाये गये । उन्होंने सिंधु घाटी सभ्यता को भी सरस्वती नदी से जुड़े होने के प्रमाण दिये । पुरातात्विक खोज के लिये उन्होने उन्होंने पूरे देश की यात्रा की । गंगा और नर्मदा के किनारे, विन्धय एवं सतपुड़ा पर्वत क्षणियों के मैदानों में लाखों वर्ष पुराने मानव सभ्यता के चिन्ह खोजे । पर उन्हें मालवा से बहुत लगाव था । इसलिये उन्होने नीमच, रतलाम, उज्जैन, इंदौर, कायथा, शाजापुर के साथ भोपाल, रायसेन, विदिशा आदि क्षेत्र पर विशेष ध्यान दिया और वनक्षेत्र में पदयात्राएँ कीं। उनके जीवनवृत के अध्ययन से लगता है प्रकृति से उन्हें कोई अतिरिक्त ऊर्जा प्राप्त थी । वे पुरातात्विक और खंडित प्रतिमाओं को इतने ध्यान से देखते थे कि लगता था उनसे बातें कर रहे हो। कयी बार तो बैठे बैठे उठकर किसी विशिष्ठ स्थान की ओर चल देते थे अथवा चलती ट्रेन में अपनी यात्रा अधूरी छोड़कर जंगल में उतर जाते थे और उन्हें वहाँ कुछ न कुछ पुरातात्विक खजाना मिल ही जाता था ।

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से लगभग चालीस किलोमीटर दूर

भीमबेटका के प्राचीन शिलाचित्रों की खोज वाकणकरजी ने की थी । भीमबैठका और भोजपुर के आसपास के कुछ चित्र तो लगभग पौने दो लाख वर्ष पुराने प्रमाणित हुये । इन सभी चित्रों का कार्बन-डेटिंग पद्धति से परीक्षण किया गया । इसका सत्यापन अंतराष्ट्रीय शोध कर्ताओं ने किया । इसी शोध के चलते उन्हें 1975 में पद्मश्री अलंकरण मिला ।

वाकणकर जी उज्जैन के सिंधिया ओरियंटल इंस्टीट्यूट से जुड़े थे और घंटाकार के समीप भारतीय कला मंदिर उनकी साधना स्थली था । वे न केवल पुरातत्वविद् थे अपितु अच्छे चित्रकार भी थे । उन्हे जितनी विशिष्टता पुरातात्विक अनुसंधान में प्राप्त थी वे उतने ही श्रेष्ठ संगठक थे । उनका पूरा जीवन ऋषि परंपपरानुरूप था । उन्होंने अपने शिष्यों की एक विशाल मंडली तैयार की । उनमें श्याम सुंदर सक्सेना, गोमती संकुशल, सचिदा नागदेव , मुजफ्फर कुरेशी, रहीम गुट्टीवाला आदि प्रमुख रहे । अपने शिष्यों की टोली के साथ उन्होंने चंबल और नर्मदा के बीहड़ों की खोज की और इंग्लैड तक यात्रा की । उनका शिष्य मंडल मानों परिवार था, उनके व्यक्तित्व का अंग था । वे सुनते अधिक थे बोलते कम थे । और जो बोलते मानों ब्रह्म वाक्य होता । उन्होंने जीवन में कभी विश्राम नहीं किया । उन्होंने निरंतर यात्राएँ कीं। भारत के सभी महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थानों के साथ विश्व के अनैक स्थानों की । वे कभी भी एक झोला कंधे पर टाँग कर निकल पड़ते थे । जिस प्रकार उनके जीवन का आरंभ भारतीय परंपरा, संस्कृति और श्रेष्ठा को प्रतिष्ठित करने के अभियान के साथ हुआ था । जीवन का समापन भी कर्मपथ पर ही हुआ । उन्होंने 4 मई 1988 को सिंगापुर में जीवन की अंतिम श्वाँस ली ।

यह उनके व्यक्तित्व और कार्य क्षमता और ऊर्जा की विलक्षण विशेषता थी कि पुरातात्विक अन्वेषण में अपने अतुलीय और अथक कार्य के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रकल्पों में भी उनकी सक्रियता निरन्तर रही । वे 1981 में स्थापित संस्कार भारती के संस्थापक महामंत्री रहे । वनक्षेत्र में अपने शोध कार्य के साथ उन्होने संघ की योजनानुसार सामाजिक और शैक्षणिक उत्थान कार्य भी किये ।

पुरातात्विक अनुसंधान और सामाजिक कार्यों के साथ वाकणकरजी ने सिक्कों और शिलालेखों का संग्रह भी किया । उन्होंने ईसापूर्व 5 वीं शताब्दी से लेकर अब तक के लगभग 5500 सिक्कों और संस्कृत, प्राकृत, ब्राह्मी आदि भाषाओं के लगभग 250 शिलालेखों का संग्रह किया । उनके योगदान की स्मृति को सजीव रखने केलिये संस्कार भारती ने 4 मई 2019 से 3 मई 2020 के बीच उनकी जन्म शताब्दी वर्ष का आयोजन किया था ।
उनका शरीर भले आज संसार में नहीं है पर उनके अनुसंधान सजीव है । वे पुरातात्विक अनुसंधान के मील के पत्थर थे । उनके द्वारा स्थापित मानदंड आज भी अनुसंधानकर्ताओं का मार्गदर्शन कर रहे हैं।

महिला मतदाता निर्णायक भूमिका : मोदी और महिला सशक्तिकरण

nari-shakti-puraskar-modi-4.jpg

2024 लोकसभा चुनाव सिर पर है। इस बार भी चुनाव में महिला मतदाता निर्णायक भूमिका में रहेंगी। इसलिए भारतीय जनता पार्टी विकास के मुद्दे के साथ- साथ महिला सशक्तिकरण को लेकर चुनाव प्रचार कर रही है।

भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण आशा है कि उसे महिलाओं का भरपूर सहयोग प्राप्त होगा। इसके अनेक कारण हैं। वास्तव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने दस वर्ष के शासन काल में महिला सशक्तिकरण के लिए अनेक उल्लेखनीय कार्य किए हैं। उन्होंने न केवल महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कार्य किए, अपितु उनके मान- सम्मान को भी विशेष महत्त्व दिया। वे दावे से कहते हैं कि महिलाओं की सुरक्षा, सुविधा और सशक्तिकरण – ये मोदी की गारंटी है। उनका कहना है कि मोदी ने बहन- बेटियों को लोकसभा और विधानसभा में आरक्षण की गारंटी दी थी। वह पूर्ण हो चुकी है। मोदी ने मुस्लिम बहनों को तीन तलाक की कुरीति से मुक्ति दिलाने की गारंटी भी दी थी। ये गारंटी भी मोदी ने पूर्ण की है।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के महिला सशक्तिकरण के कार्यों में नारी शक्ति वंदन अधिनियम का नाम प्रमुख है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार महिला सशक्तिकरण के लिए सदैव से ही प्रतिबद्ध रही है। मोदी सरकार ने समय- समय पर दोहराया है कि उनकी सरकार महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए हरसंभव प्रयास करेगी। नारी शक्ति वंदन अधिनियम इसी प्रयास का ही परिणाम है। सितम्बर 2023 पारित यह विधेयक लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करता है। इसके पारित होने से महिलाओं की एक लम्बित मांग पूर्ण हुई है। इस विधेयक को लेकर विपक्षी दलों ने केवल टाल- मटोल का व्यवहार ही किया था। उन्होंने इस विधेयक को लेकर केवल महिलाओं के वोट हथियाने का ही प्रपंच रचा। उन्होंने इस संबंध में कभी गंभीरता से कार्य नहीं किया। किन्तु प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने इस विधेयक के संबंध में पूर्ण निष्ठा एवं गंभीरता से कार्य किया तथा इसे पारित करवाया। इसी प्रकार बिना किसी भेदभाव के मुस्लिम महिलाओं के हित में भी निर्णय लेते हुए उन्हें तीन तलाक की कुरीति से मुक्ति दिलवाई। इस पर भी उन्हें निशाना बनाया गया, परन्तु उन्होंने किसी की नहीं सुनी और मुस्लिम बहनों के हित में निर्णय लिया। इन सब निर्णयों के कारण ही महिलाओं में मोदी सरकार विशेषकर श्री नरेन्द्र मोदी के प्रति विश्वास बढ़ा है। इसीलिए उन्हें महिलाओं का भरपूर जनसमर्थन प्राप्त होता रहा है।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का मानना है कि भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए नारी शक्ति को अधिक से अधिक अवसर देना अत्यंत आवश्यक है। भाजपा सरकार के प्रयास से आज देश के प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं के लिए नए रास्ते बन रहे हैं। मोदी सरकार महिलाओं के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा एवं रोजगार आदि से संबंधित अनेक योजनाएं संचालित कर रही है। महिलाओं को खुले में शौच से मुक्ति दिलाने के लिए युद्धस्तर पर शौचालयों का निर्माण करवाया जा रहा है। इससे एक ओर महिलाओं को मान मिल रहा है, दूसरी ओर उन्हें अपराधों से भी मुक्ति मिल रही है। महिलाएं शौच के लिए अंधेरे में ही निर्जन स्थानों पर जाती हैं। ऐसी परिस्थिति में वे अपराधी तत्वों का शिकार बन जाती हैं। इसके अतिरिक्त समय पर नित्य कर्म से न निपटने के कारण वे अनेक रोगों की भी चपेट में आ जाती हैं। किन्तु शौचालयों के निर्माण से उन्हें इस समस्या से छुटकारा मिल रहा है। आवास एवं शहरी कार्य मंत्री श्री हरदीप सिंह पुरी के अनुसार देश में विगत नौ वर्षों में 12 करोड़ शौचालय बनाए गए हैं, जिससे देश को खुले में शौच के अभिशाप से मुक्ति मिली है।
वास्तव में मोदी सरकार महिलाओं के हित के अनेक कार्य कर रही है। वह उनकी प्रत्येक छोटी से छोटी बात का भी ध्यान रख रही है। महिलाओं का स्वप्न होता है कि उनका भी अपना निजी मकान हो। इस बात को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार निर्धन लोगों को पक्के आवास उपलब्ध करवा रही है। इनके पंजीकरण में महिलाओं का नाम सम्मिलित किया जा रहा है। इसके कारण अब महिलाएं भी अपने घर की स्वामिनी बन रही हैं। उनका स्वयं के घर का स्वप्न पूर्ण हो रहा है। इतना ही नहीं मोदी सरकार महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी तीव्र गति से कार्य कर रही है। महिलाओं को रोजगार के लिए प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षित महिलाओं को स्वरोजगार अर्जित करने के लिए ऋण उपलब्ध करवाया जा रहा है। इससे वे कुटीर उद्योग चालू कर रही हैं। जो महिलाएं सिलाई का कार्य जानती हैं तथा उनके पास सिलाई मशीन क्रय करने के लिए धन नहीं हैं उन्हें निशुल्क सिलाई मशीनें वितरित की जा रही हैं। ये महिलाएं अब घर पर ही सिलाई का कार्य करके धन अर्जित कर रही हैं। आत्मनिर्भरता के कारण उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा है। अब वे अपनी इच्छा से अपना धन व्यय कर रही हैं। उनके जीवन यापन की शैली में परिवर्तन आया है। यह सब प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की महिला हितैषी योजनाओं का ही परिणाम है।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि भारत की नारी शक्ति, विकसित भारत की एक सशक्त स्तंभ है। भारत की नारी शक्ति की आर्थिक शक्ति बढ़े, इसके लिए बीते दस वर्षों में बीजेपी सरकार ने निरंतर कार्य किया है। जनधन योजना के अंतर्गत करोड़ों बहनों के बैंक खाते खोले हैं। इन दस वर्षों में देश में स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं की संख्या दस करोड़ को पार कर गई है। देश में दस वर्षों में बहनों के इन समूहों को स्वरोजगार के लिए आठ लाख करोड़ रुपए की सहायता बैंकों से दिलवाई गई है।

श्री नरेन्द्र मोदी ने मन की बात में कहा था कि आज देश में कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है, जिसमें देश की नारी- शक्ति पीछे रह गई हो। एक और क्षेत्र, जहां महिलाओं ने अपनी नेतृत्व क्षमता का बेहतरीन प्रदर्शन किया है, वह है- प्राकृतिक खेती, जल संरक्षण और स्वच्छता। केमिकल से हमारी धरती माँ को जो कष्ट हो रहा है, जो पीड़ा हो रही है, जो दर्द हो रहा है – हमारी धरती माँ को बचाने में देश की मातृशक्ति बड़ी भूमिका निभा रही है। देश के कोने- कोने में महिलाएं अब प्राकृतिक खेती को विस्तार दे रही हैं। आज अगर देश में ‘जल जीवन मिशन’ के अंतर्गत इतना काम हो रहा है तो इसके पीछे पानी समितियों की बहुत बड़ी भूमिका है। इस पानी समिति का नेतृत्व महिलाओं के ही पास है। इसके अलावा भी बहनें-बेटियां, जल संरक्षण के लिए चौतरफा प्रयास कर रही हैं।

मोदी सरकार द्वारा महिलाओं की सुरक्षा, सुविधा एवं सशक्तिकरण के लिए किए गये कार्यों की सफलता ही है कि आज महिलाएं आत्मविश्वास के साथ निर्भीक होकर घर से बाहर जाकर कार्य कर रही हैं। कहा जाता है कि महिला मतदाता साइलेंट वोटर होती हैं। महिला मतदाता जिस दल को अपना समर्थन देती हैं, उसे ही बहुमत प्राप्त होता है तथा सरकार उसी दल की बनती है। विशेष बात है कि भारतीय जनता पार्टी एवं प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध विरोधियों द्वारा दुष्प्रचार करने के पश्चात भी मुस्लिम महिलाएं इन्हें अपना भरपूर समर्थन दे रही हैं। इस बार यह देखना अत्यंत रोचक होगा कि महिलाएं उन्हें कितना समर्थन देती हैं।

उनका कहना है कि उन्हें उन निर्णयों पर गर्व है जिन्होंने महिला सशक्तिकरण को और मजबूत किया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का कहना है कि उनका तृतीय कार्यकाल भी विकास एवं महिला सशक्तिकरण को समर्पित रहेगा।

(लेखक – लखनऊ विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर है)

scroll to top