भारत ने इंग्लैंड को 100 रनों से हराया

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आईसीसी क्रिकेट विश्व कप में कल भारत ने इंग्लैंड को 100 रनों से हरा दिया। 230 रनों के लक्ष्य के जवाब में इंग्लैंड की टीम 35वें ओवर में 129 रन पर ही सिमट गई। भारत की ओर से मोहम्मद शमी ने चार और जसप्रीत बुमराह ने तीन विकेट लिए। पहले बल्लेबाजी करते हुए भारत ने निर्धारित 50 ओवर में 9 विकेट पर 229 रन बनाए थे। खराब शुरुआत के बावजूद कप्तान रोहित शर्मा ने सर्वाधिक 87 रनों की पारी खेली। सूर्यकुमार यादव ने 49 रन बनाए। इंग्लैंड की तरफ से डेविड विली ने तीन विकेट लिए।

230 रनों के लक्ष्य का पीछा करने उतरी इंग्लैंड की टीम के शीर्ष क्रम को जसप्रीत बुमराह और शमी ने सस्ते में समेट दिय। जॉनी बेयरेस्टो और डेविड मलान 14 और 16 रन बनाकर आउट हो गए। यहां तक कि मोहम्मद शमी ने भी पावरप्ले के भीतर बेन स्टोक्स और जॉनी बेयरस्टो को वापस भेज दिया, जिससे इंग्लैंड का स्कोर 39/4 हो गया.।

भारत ने इंग्लैंड को 98 रनों पर 7वां झटका दिया, जब रवींद्र जडेजा ने क्रिस वोक्स को 10 रनों पर स्टम्प आउट कराया। वर्ल्ड कम में भारत की की ये लगातार 6वीं जीत है और वह अंक तालिका में टॉप कर पहुंच गया है.।

 

केरल में बम धमाका, विजयन ने बुलाई सर्वदलीय बैठक

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केरल के मुख्‍यमंत्री पिनराई विजयन ने एर्नाकुलम सिलसिलेवार बम धमाकों को लेकर आज तिरुवनंतपुरम में सर्वदलीय बैठक बुलाई है। राष्‍ट्रीय अन्‍वेषण अभिकरण और राष्‍ट्रीय सुरक्षा गार्ड के विशेषज्ञों के एक दल ने कल विस्‍फोट स्‍थल का दौरा किया। राज्‍य के पुलिस महानिदेशक शेख दरवेश साहब ने धमाकों से जुड़े घटनाक्रम के मद्देनजर कानून और व्‍यवस्‍था के अपर पुलिस महानिदेशक एम.आर. अजित कुमार की नेतृत्‍व में 21 सदस्‍यों वाली जांच समिति का गठन किया है।

पुलिस महानिदेशक ने चेतावनी देते हुए कहा कि सोशल मीडिया के माध्‍यम से साम्‍प्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने और घृणा फैलाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। इस बीच कल रात एक बच्‍ची के दम तोड़ने के बाद मरने वालों की संख्‍या बढ़कर तीन हो गई है। इन धमाकों में चालीस से अधिक लोग घायल हुए हैं।

गृह मंत्री अमित शाह ने घटना को लेकर सीएम पिनाराई विजयन से फोन पर बात की और राज्य के हालात का जायजा लिया। साथ ही, उन्होंने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) और राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) की टीमों को केरल भेजने और जांच शुरू करने का निर्देश दिया है। वहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) ने विस्फोट में इस्तेमाल की गई सामग्रियों को इकट्ठा करने और जांच करने के लिए अपनी एक बम निरोधक इकाई को दिल्ली से केरल के लिए रवाना कर दिया है।

संस्कारवान शिक्षा से कम होते हैं बाल अपराध

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प्राचीन भारतीय शिक्षा राष्ट्रनिर्माण की अवधारणा पर आधारित थी। उसमे धर्म, संस्कृति एवं नैतिकता का समावेश था। उसमे स्वहित से ज़्यादा राष्ट्रहित को महत्व दिया जाता था। 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम में जब भारतीयों द्वारा अंग्रेजों को कड़ी चुनौती मिली तब लार्ड मैकाले ने ब्रिटिश संसद को बताया कि जब तक भारत की परंपरागत शिक्षा जारी रहेगी तब तक हम भारत पर बड़े समय तक कब्जा नहीं रख पाएंगे। इसके बाद अंग्रेजों ने शिक्षा व्यवस्था बदल दी। शिक्षा का वह स्वरूप सामने आया जो आज भी बरकरार है। शिक्षा का स्वरूप, राष्ट्रनिर्माण में शिक्षा का महत्व एवं शिक्षा को जीविकोपार्जंनकारी बनाने के लिए शिक्षा के महत्व को व्यापक अर्थों में समझना आवश्यक है

वर्तमान की समस्याओं का जब हम गहराई से विश्लेषण करते हैं तब हम पाते हैं कि शिक्षा व्यवस्था पर विमर्श की आवश्यकता है। शिक्षा का वास्तविक उद्वेश्य व्यक्तित्व विकास होना चाहिए। व्यक्तित्व विकास जीविका के साधन स्वयं उपलब्ध करा देता है। शिक्षा का अर्थ अक्षर ज्ञान या किताबी ज्ञान नही होता, बल्कि व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास होता है। वर्तमान, शिक्षा व्यवस्था न तो व्यक्तित्व विकास में सहायक हो पा रही है और न ही जीविकोपार्जनकारी है। यह पेंडुलम दोनो के बीच लगातार कहीं डोलता रहता है। हमारी शिक्षा व्यवस्था की प्रायोगिक विडम्बना देखिये कि उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति भी अपने संवैधानिक अधिकारों एवं कर्त्तव्यों के बारें में नही जानता। वह तिरंगे को अपने स्वाभिमान से जोड़ के नही देख पाता। राह चलते हुये राष्ट्रगान की धुन सुनाई दे तो वह उसको ठहराव के लिए मजबूर नही कर पाती। महान व्यक्तित्व एवं युगपुरूषों की गाथाए क्षणिक रोमांच तो पैदा कर देती है, किन्तु वैसा जीवन जीने के लिए प्रेरित नही कर पाती। सामाजिक दायित्वों को शिक्षित व्यक्ति सरकारी गतिविधियों से जोड़ के देखता है। भारत को स्वच्छ रखने के लिए बाकायदा एक स्वच्छ भारत अभियान चलाना पड़ा। ऐसे में राष्ट्रवाद की भावना फिर कहॉ से परिलक्षित होगी ? यह अपूर्ण शिक्षा न ही व्यक्तित्व विकास में सहायक हो पा रही है और न ही राष्ट्रवाद की भावना पैदा करने में ? जब हम अपने आस पास का माहौल और समस्याएँ देखते हैं तब अपनी दिनचर्या में हम पाते हैं कि पद की जवाबदेही के स्थान पर पद का दुरूपयोग भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहा है।

राजनीति में अनीति, शिक्षा का बाजारीकरण, लचर प्रशासन, न्याय प्रक्रिया में देरी, पुलिस का अपराधीकरण जैसे ज्वलंत मुद्दे एक ‘गंभीर चिंता एवं गहन चिंतन’ का विषय हैं। एक उच्च शिक्षित व्यक्ति जब भ्रष्टाचार के सामने हथियार डाल देता है तो यह हमारी शिक्षा की असफलता को ही इंगित करता है। किसी भी देश के निर्माण में बालशिक्षा एक अहम तत्व है। बालमन मे चारों का तीव्र प्रवाह रहता है। संस्कारों के द्वारा इस प्रवाह को सार्थक एवं उपयुक्त दिशा मिलती है। जाने माने शोधकर्ताओं की बड़ी-बड़ी थ्योरियों को समझने के स्थान पर अभिभावकों को एक मूलभूत बात समझने की ज़्यादा आवश्यकता है कि बच्चों की भावनाओं को रोकना संभव नहीं है। जैसे कोई बच्चा अगर शरारत कर रहा है तो उस पर सख्ती के द्वारा सिर्फ क्षणिक काबू पाया जा सकता है। ज़्यादा बेहतर है उसे हम कोई रचनात्मक काम दे दें। एक ऐसा काम जिसके द्वारा उसका ध्यान भी किसी काम में लग जाये और उसका अंजाम ऐसा हो जहां उसकी शरारत का रचनात्मक इस्तेमाल हो सके। ऐसा करवाना एक बड़ी कला है। बालमन का मार्गदर्शन करके सिर्फ उन्हें ही सही अर्थों में मनुष्य नहीं बनाया जाता है वरन खुद को भी एक आत्मिक शांति मिलती है। बालमन के निश्चल सवाल बड़ों को भी आत्मचिंतन का माध्यम उपलब्ध करा देते हैं। जैसे ही हम बच्चों की नई सोच से तालमेल बैठाने की कोशिश करते हैं, हमारे अंदर भी वैचारिक स्फूर्ति आ जाती है। बालमन की कल्पनाओं का प्रवाह इतना असीमित होता है कि अनंत आकाश की सीमाएं भी छोटी पड़ जाती हैं।

अपराध के मनोविज्ञान मे बालमन एक महत्वपूर्ण विषय है। बेसिक शिक्षा की असफलता कहीं न कहीं अपराध की मनोवृत्ति को बढ़ाने मे मददगार बन जाती है। अपराध मुक्त सभ्य समाज के लिए दो बिन्दु महत्वपूर्ण हैं। “प्रिवेंशन एंड क्योर”। बच्चों मे अच्छे संस्कार समाज मे अपराध का पूर्व-निवारण(प्रिवेंशन) कर सकते हैं और न्याय होना और होते दिखना समस्या के उपचार(क्योर) के लिए आवश्यक है। वेदो के अनुसार ईश्वर ने बीज रूप में सभी गुण मनुष्य को दिए हैं किन्तु गुण दिखाई तभी पड़ते हैं जब इन गुणों को अभ्यास के द्वारा पूर्ण रूप से विकसित किया जाता है। हमारे अंदर विद्यमान ये गुण अनुकूल परिस्थितियां पाते ही अंकुरित होने लगते हैं और धीरे-धीरे पूर्णता की तरफ बढ़ते हुए एक दिन बढ़ कर मानवता के लिए छायादार वृक्ष बन जाते हैं। अब चूंकि वेद, धार्मिक वातावरण एवं सांस्कृतिक विरासत की बातें स्कूल में नहीं पढ़ाई जाती हैं इसलिए घर का माहौल बच्चे पर बहुत प्रभाव डालता है। बालमन एक बीज़ है एवं इससे बना हर छायादार वृक्ष राष्ट्र को समर्पित एक भारतीय नागरिक। बबूल के बीज़ से मे आम का उदभव नहीं होता। वृक्ष बनने पर आप परिवर्तन भी नहीं कर सकते। जो भी सुधार संभव है वह बीज़ के स्तर पर ही संभव है। अक्सर हम लोग बीज़ को छोटा समझने की भूल कर बैठते हैं। बच्चों की शिक्षा का विज्ञान इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। बच्चों का मनोविज्ञान समझते हुए उन्हे कोमिक्स और कार्टून का सानिध्य दें। 50 रुपये के चिप्स और चॉकलेट बच्चों को दिलवाने के स्थान पर इतने रुपये की कोमिक्स दिलवाने पर विचार करें। बच्चे बड़ो के आचरण से प्रभावित होते हैं। किताबों मे लिखी बातों को तो बच्चे याद कर लेते हैं किन्तु अपने माता पिता और निकट आत्मीयों के आचरण को वो स्वयं मे ढालने की कोशिश करते हैं। इसलिए बड़े पहले स्वयं मानवीय गुणों को अपनाने के लिए प्रयास करें। हमारा व्यवहार बच्चों की किताबों मे लिखी नैतिक शिक्षा से बेहतर परिणाम देगा ?

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं सामाजिक चिंतक हैं। )

लोक नाट्य ‘भगत’ के भगत:

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कला और संस्कृति की नई इबारत लिखने में मशगूल है हिमानी चतुर्वेदी

– अनिल शुक्ला

हाल ही में ‘रंगलीला’ की लोक नाट्य ‘भगत’ की वरिष्ठ कलाकार हिमानी चतुर्वेदी को आगरा की सांस्कृतिक संस्था ‘संस्कार भारती कला केंद्र’ ने अपने ‘रंगोदय’ समारोह में महिला लोक कलाकार के ‘स्वरुप चंद सम्मान’ से अभिनंदित किया। हिमानी ‘भगत’ के 4 सौ साल के इतिहस की पहली महिला कलाकार हैं। उनसे पहले की 4 सदी तक हमेशा पुरुष ही ‘भगत’ में महिला भूमिकाओं को अभिनीत करते आये हैं। हिमानी को यह सम्मान दिया जाना आगरा के सांस्कृतिक जगत में उनके लोक अभिनय कौशल को मिलने वाली एक बड़ी सामाजिक-सांस्कृतिक स्वीकृति है यद्यपि इस प्राप्ति के लिए उन्हें और समूची ‘रंगलीला’ को कड़ी अग्निपरीक्षा से गुज़रना पड़ा है।
50 साल से लुप्तप्राय हो चली ‘भगत’ के पुनरुद्धार का जब मैंने ढांचा परिकल्पित किया तो उसमें शुरू से ही महिला भूमिकाओं में अभिनेत्रियों को ही उतारे जाने की बात थी। काफी समय बाद सन 2010 में मैंने भगत के अपने गुरु फूलसिंह यादव ख़लीफ़ा से जब इस बात की चर्चा की तो उनकी पहली प्रतिक्रिया थी- “तुम मुझे इन सालों के जूते पड़वाओगे।” ख़लीफ़ा का ‘इन सालों’ से आशय दूसरे अखाड़ों के उनके समकालीन ख़लीफ़ाओं से था। उनमें से ज़्यादातर कितने दकियानूस हैं, ख़लीफ़ा इसे भली भांति जानते थे।
“ख़लीफ़ा आप क्या इन से डरते हो?” मैंने ख़लीफ़ा की चाभी भरी। एकदम से दमक कर उन्होंने कहा-“मैं किसी मादर …….. से नहीं डरता।”
मैं यही चाहता था। इससे पहले भी हम लोग इस विषय में कई बार बातचीत कर चुके थे। ख़लीफ़ा मेरी इस बात से पूर्णतः सहमत थे कि जब महिला अंतरिक्ष में जा सकती है, हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट की जज बन सकती है और जब वह फिल्म की हीरोइन बन सकती है तो भगत की कलाकार क्यों नहीं बन सकती?


2 दिन बाद ख़लीफ़ा ने मुझसे पूछा-” पर लोंडिया मिलेगी कहाँ से?” मैंने हिमानी का नाम सुझाया। हिमानी मेरी पत्रकारिता और रंगमंच की स्टूडेंट थी। उसका गला बहुत सुरीला था। मुझे विश्वास था कि इसे भगत अभिनेत्री में विकसित किया जा सकता है। वह ‘रंगलीला’ से जुड़ी थी और इस नाते कई बार ख़लीफ़ा फूलसिंह यादव से मिल चुकी थी। खलीफा उसे पसंद करते थे।

“बो तो ठीक है।” उन्होंने पहली स्वीकृत दी।

हिमानी के सामने जब मैंने यह प्रस्ताव रखा तो हड़बड़ा कर उसने कहा-“सर मैं भगत कैसे करुँगी? मैं तो इसकी एबीसीडी भी नहीं जानती।”
“तुम जर्नलिज़्म या मॉडर्न थियेटर की एबीसीडी मम्मी के पेट से सीख कर आयी थीं?” मैंने हड़काते हुए पूछा

“नहीं।”

“यहीं सीखा न ?”

“यस सर।”

“तो भगत भी यहीं सीखोगी।”

हिमानी का प्रशिक्षण शुरू हुआ। ख़लीफ़ा उसे भगत की गायकी सिखाते रहे और मैं भगत में अभिनय करना। इस बीच भगत अखाड़ों के पुरातन ख़लीफ़ाओं और उनकी संस्था ‘काव्यकला परिषद’ ने मेरे और ख़लीफ़ा के मंच पर महिला को उतारे जाने के फ़ैसले के विरुद्ध सघन अभियान चलाया। अपनी मूर्खता और अज्ञानता में वे यहाँ तक बढ़े कि उन्होंने बाक़ायदा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और उसमें कहा कि मैं और ख़लीफ़ा बड़े बदनीयत हैं और लड़कियों को मंच पर उतारने की आड़ में जिस्म फरोशी का धंधा करना चाहते हैं। हम दोनों उनके इन आरोपों से कहाँ निरुत्साहित होने वाले थे।
आख़िरकार 2 वर्ष की कड़ी मेहनत के बाद हिमानी को पहली बार भगत ‘कल का इंडिया’ में कल्लू की मां की भूमिका करने को मिली। यह सन 2012 का ‘ताज महोत्सव’ था। ‘ताज महोत्सव’ में भगत की यह पहली एंट्री थी। हमारी भगत के अलावा

उस दिन एक अन्य संस्था का पंजाबी लोक गीतों का प्रोग्राम भी होना था जिसके चलते सूरसदन दर्शकों से खचाखच भरा था। उस दिन की भगत के दो जादू थे जो दर्शकों के सर चढ़कर बोले। एक तो कल्लू की भूमिका में बंसी की शानदार गायकी और दूसरा हिमानी की गायकी और उनका अद्भुत अभिनय।
‘ताज महोत्सव’ के दर्शकों ने हिमानी को एक कामयाब लोक कलाकार के रूप में जैसे हाथों-हाथ लपक लिया। पुरातनपंथी अखाड़ा बड़ा हतोत्साहित हुआ। बाद के सालों में हालांकि उनहोने जब अपनी भगत शुरू की तो झक मार कर लड़कियों को शामिल करने को वे मजबूर थे। हिमानी भगत का लगातार अभ्यास करती रही। अपनी योग्यता और क्षमताओं के बल पर वह ख़लीफ़ा के कलेजे का टुकड़ा बन गयी और मेरी दुलारी बिटिया। इसके बाद उसने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा। ‘मेरे बाबुल का बीजना’ भगत में जब वह मंच पर अपनी बेटी को तलाश करते सिसकते हुए आती है तो अनेक दर्शकों के आंसू टपक पड़ते हैं। हिमानी बहुत धैर्य और धीरज वाली कलाकार है। उसके भीतर कला साधक की अटूट भावना भरी है। वह उन उभरते हुए कलाकारों के लिए भी नसीहत है जो अपनी हड़बड़ी में तत्काल सब कुछ हासिल कर लेना चाहते हैं। बीच में अपनी पढ़ाई और दूसरे निजी वजहों से उसकी भगत कुछ सालों के लिए छूटी रही लेकिन वह वापस लौटी और दुगनी ऊर्जा से फिर जुट गयी। नि:संदेह वह भगत का नेतृत्व सँभालने के लिए तैयार हो जाने वाली ‘रंगलीला’ की दूसरी पीढ़ी की क़तार में सबसे आगे है। वह एमबीए की अपनी पढ़ाई कर चुकी है। पहले उसका इरादा कोर्पोरेट नौकरी का था लेकिन अब उसने अपना व्यवसाय शुरू कर दिया है।

अपने घर के बुज़ुर्गों से उसे सामाजिक संस्कार मिले हैं जिनका वह पालन कर रही है। वह कैलाश मंदिर के किनारे बहने वाली यमुना नदी के तट के आसपास के गाँवों के बच्चों को लेकर एक चेतना अभियान चला रही है ताकि लोग यमुना में प्लास्टिक और कचरा न डालें। अपने भाई जितेंद्र के साथ मिलकर वह दुर्घटनाग्रस्त गायों की चिकित्सा के लिए एक गौ चिकित्सालय भी संचालित करती है।

आने वाले समय में वह ‘रंगलीला’ की नयी भगत में नयी भूमिकाओं में दखेगी। लोक अभिनेत्री का सम्मान प्राप्त होने की ढेरों बधाई। जुग-जुग जियो मेरे लाल! थैंक्यू संस्कार भारती कला केंद्र।

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