बदल रहा है स्वास्थ का परिदृश्य और हो रहा सुधार

आशीष कुमार ‘अंशु’

इस बात को प्रधानमंत्री के राजनीतिक विरोधी भी मानते हैं कि उन्होंने देश के अंतिम जन तक सरकारी सुविधा पहुंचाई है। अब यह सुविधाएं सिर्फ कागजों पर नहीं पहुंच रही। जमीन पर उतर रहीं हैं।

जन धन खाता का उद्देश्य यही था कि पैसों को बिचौलियों के माध्यम से ना पहुंचाया जाए। जिसका परिणाम हुआ कि जनऔषधि केंद्र के माध्यम से आम आदमी दवा पर अपना 13 हजार करोड़ बचाने में सफल रहा और  आयुष्मान योजना से 70 हजार करोड़ की बचत की। गरीबों के बीच ये दोनों योजनाएं वरदान साबित हुई हैं। 

सरकार मरीजों को आसानी से जेनरिक दवाएं उपलब्ध कराने के लिए देश भर में जनऔषधि केंद्र खोल रही है। जिसके लिए देशभर में मार्च 2024 तक 10,000 प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्रों खोलने की योजना है। जन औषधि दवाइयां बाजार में मिलने वाली ब्रांडेड दवाईयों की तुलना में 50 से लेकर 90 फीसदी तक सस्ती हैं। इससे महंगी दवाइयों से लोगों को छुटकारा मिलता है नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में 18 फीसदी लोग अपने अस्पताल का खर्च नहीं उठा पाते। इसलिए उन्हें या तो कर्ज लेना पड़ता है या फिर अपनी अचल संपत्ति बेचनी पड़ती है। ऐसे में देश भर में यदि जनऔषधि केन्द्रों का प्रसार होता है तो यह स्वास्थ सेवा में किसी क्रांति से कम नहीं  है।

आयुष्मान भारत योजना भी देश के सबसे पीछड़े वर्ग की भलाई के लिए है। यह मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक है। इस योजना के अन्तर्गत लाभार्थियों को पांच लाख तक का स्वास्थ्य बीमा प्रदान किया जाता है। इस स्वास्थ बीमा से गरीब परिवारों को बीमारी से लड़ने का ‘प्रतिरोधक हौसला’ मिला है। जब देश कोविड 19 की भयंकर चपेट में था। क्या गरीब और क्या अमीर, सभी कोविड 19 से पीड़ित थे। उसी दौरान सरकार ने इस योजना के अंतर्गत कोविड-19 का इलाज भी शामिल किया।

आयुष्मान भारत योजना के दायरे में आज भारत की लगभग आधी आबादी हैं। यह संख्या 50 करोड़ से भी अधिक लोगों की बैठती है। इस योजना के शुरू होने से लेकर अब तक तीन करोड़ से अधिक लोग इसका लाभ उठा चुके हैं। इस योजना के अन्तर्गत मरीजों को अस्पताल में मुफ्त इलाज मिला है। अगर ये योजना नहीं होती, गरीब परिवार से आने वाले लोगों को 70  हजार करोड़ रुपए खर्च करने पड़ते। इन तीन करोड़ से अधिक लोगों के ईलाज पर आने वाला सारा खर्च भारत सरकार ने उठाया।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 07 मार्च को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जन औषधि केंद्र के मालिकों और योजना के लाभार्थियों से ‘जन औषधि-जन उपयोगी’ विषय पर बातचीत की। जेनेरिक दवाओं के उपयोग और जन औषधि परियोजना के लाभों के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए पूरे देश में जन औषधि सप्ताह मनाया गया। यूक्रेन से लौटे छात्रों से जब प्रधानमंत्री मिले तो देश में मेडिकल कॉलेज की कमी को लेकर कहा कि सरकार देश में मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाने पर काम कर रही है ताकि छात्र देश में ही मेडिकल शिक्षा पा सकें। अगले दस सालों में केन्द्र सरकार ने हर एक जिले में एक अस्पताल खोलने का लक्ष्य रखा। निश्चित तौर इससे देश में चिकित्सा शिक्षा में सीटों की वृद्धी होगी। 

सरकार यदि चाहे तो यह भी हो सकता है कि जहां स्वास्थ व्यवस्था की बड़ी जिम्मेवारी बिना डिग्री वाले डॉक्टरों के कंधों पर है। वहां सरकार प्रशिक्षण देकर गांव और जनजातीय क्षेत्रों में ‘बिना डिग्री वाले डॉक्टरों’ को तैनात करती है तो इससे उन क्षेत्रों में स्वास्थ सुविधा पहुंच सकती है, जहां महंगी पढ़ाई करने वाले डॉक्टर जाने को तैयार नहीं होते। वैसे प्रधानमंत्री मोदी ने भी इस बात का भरोसा दिया है कि देश में मेडिकल शिक्षा में सीट बढ़ेगी और शिक्षा सस्ती भी होगी। कुछ दिन पहले ही सरकार ने एक और बड़ा फैसला लिया है जिसका बड़ा लाभ गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चों को मिलेगा। सरकार ने तय किया है कि प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में आधी सीटों पर सरकारी मेडिकल कॉलेज के बराबर ही फीस लगेगी।

वैसे इन निर्णयों के फलीभूत होने में समय लगेगा। समय रहते यदि हम गांव और आदिवासी क्षेत्रों की स्वास्थ व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ करना चाहते हैं तो वहां पहले से काम कर रहे झोला छाप डाॅक्टरों के प्रशिक्षण की व्यवस्था पर सरकार को ध्यान देना चाहिए। वे देश की प्राथमिक स्वास्थ व्यवस्था को सुदृढ़ करने में मजबूत स्तम्भ साबित हो सकते हैं।

चिकित्सा शिक्षा में होने वाले खर्च को जहां नियंत्रित करने के लिए सरकार प्रयासरत है, वहीं साथ—साथ वह चिकित्सा खर्च को कम करके स्वास्थ सुविधा को आम आदमी के लिए सुगम बनाने की दिशा में भी काम कर रही है। इसके लिए जन-औषधि केंद्र के विस्तार पर विचार किया जा रहा है। दवा का पर्चा हाथ में आने के बाद लोगों के मन में पहली आशंका यही होती थी कि, पता नहीं कितना पैसा दवा खरीदने में खर्च होगा? जन-औषधि केंद्र  ने वो चिंता कम की है। आज देश में साढ़े आठ हजार से ज्यादा जन-औषधि केंद्र खुले हैं। ये केंद्र अब केवल सरकारी स्टोर नहीं, बल्कि समाधान केंद्र बन रहे हैं। सरकार ने कैंसर, टीबी, डायबिटीज, हृदयरोग जैसी बीमारियों के इलाज के लिए जरूरी 800 से ज्यादा दवाइयों की कीमत को भी नियंत्रित किया है। सरकार ने ये भी सुनिश्चित किया है कि स्टंट लगाने और घुटना प्रत्यारोपण की कीमत भी नियंत्रित रहे। आज देश में 8500 से ज्यादा जन औषधि केंद्र खुले हैं। जब मोदी सरकार 2014 में सत्ता में आई थी, देश में सिर्फ एक अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान हुआ करता था। आज देश में 22 ऐसे संस्थान हैं।

गांव की महिलाओं के लिए माहवारी के समय सेनेटरी नेपकीन की जरूरत को स्वच्छता और साफ सफाई के लिहाज से भी समझा जा सकता है। जहां परिवार में पहनने को कपड़ा पूरा ना पड़ता हो, ऐसे परिवारों में सेनेटरी नेपकीन के ना होने पर मिट्टी और राख का इस्तेमाल आज भी गांवों में आम बात है। ऐसे परिवारों के लिए  01 रुपए में केन्द्रों पर मिलने वाला सेनेटरी नेपकीन किसी वरदान से कम नहीं है। इन केन्द्रों के माध्यम से 21 करोड़ से ज्यादा सेनेटरी नेपकीन की बिक्री, दिखाती है कि कितनी बड़ी संख्या में महिलाओं का जीवन आसान हो रहा है।

इस वित्तीय वर्ष में जन औषधि केंद्रों के माध्यम से 800 करोड़ रुपए से ज्यादा की दवाएं बिकी हैं। इसी साल की बात करें तो जन औषधि केंद्रों की वहज से गरीब परिवारों और मध्यम वर्ग के परिवारों में करीब 5,000 करोड़ रुपए की बचत हुई है। केन्द्र सरकार के जन औषधि केंद्रों के माध्यम से 13,000 करोड़ रुपए की बचत यहां आने वाले लोगों की हुई है।

नीति आयोग ने ‘भारत में वित्तपोषण के विभिन्न स्रोतों के माध्यम से स्वास्थ्य देखभाल की पुनर्कल्पना’ शीर्षक से रिपोर्ट प्रकाशित की है। ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका मिलकर ब्रिक्स देश होते हैं। इन सभी देशों का तुलनात्मक अध्ययन जब आयोग ने किया तो पाया कि भारत का स्वास्थ्य देखभाल पर शेष देशों की तुलना में सबसे कम खर्च है

आम आदमी के लिये समान रूप से स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच सुनिश्चित करने के लिये अस्पताल में बिस्तरों की संख्या में कम-से-कम 30 प्रतिशत वृद्धि किये जाने की जरूरत है। यह बात नीति आयोग की रिपोर्ट में आई है कि  सभी तक अस्पताल की स्वास्थ सुविधाएं पहुंचे इसके लिए बिस्तरों की संख्या मे कम से कम 30 फीसदी की वृद्धि किए जाने की जरूरत है।

बहरहाल सरकार आने वाले समय में इन जरूरतों को पूरा करे और स्वास्थ के पूरे परिदृश्य में सुधार लाने की पहल करे। यही समय की मांग है।

सम्पन्न हुआ संस्कार भारती का सदानीरा उत्सव -2022

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जलज अनुपम

इसके बाद भोजपुरी कथा पाठ का आयोजन ‘यायावरी वाया भोजपुरी’ की ओर से सुधीर कुमार मिश्र ने किया। जिसमें उन्होनें सर्वेश तिवारी श्रीमुख की कहानी ‘अंतिम प्रार्थना’ का पाठ किया। जिसका भोजपुरी अनुवाद अनुराग रंजन ने किया था। इस भावुक प्रस्तुति ने सबका मन मोह लिया और सारे लोग अपनी आंखें पोंछते दिखे

इसके बाद भोजपुरी कथा पाठ का आयोजन ‘यायावरी वाया भोजपुरी’ की ओर से सुधीर कुमार मिश्र ने किया। जिसमें उन्होनें सर्वेश तिवारी श्रीमुख की कहानी ‘अंतिम प्रार्थना’ का पाठ किया। जिसका भोजपुरी अनुवाद अनुराग रंजन ने किया था। इस भावुक प्रस्तुति ने सबका मन मोह लिया और सारे लोग अपनी आंखें पोंछते दिखे।

संस्कार भारती, बिहार द्वारा आयोजित सदानीरा उत्सव-2022, 26 मार्च को गोपालगंज के करवतही गाँव में सम्पन्न हो गया। ऐसा लग रहा था कि राष्ट्रीय हित का चिंतन और मनन करने वाले लोगों का यह समूह वेद वाक्य ‘उप सर्प मातरं भूमिम्।’ अर्थात जैसे भी हो मातृभूमि की सेवा कर का भाव रखकर कार्य करता है।

गोपालगंज, बिहार के जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर करवतही गाँव जहाँ दस वर्ष पहले तक गूँजती थी गोलियों की गड़गड़ाहट वहाँ पर सदानीरा उत्सव का सम्पन्न होना और उसमें लेखन के समक्ष चुनौतीयाँ और हिन्दू इकोसिस्टम के बहाने बदलती तस्वीर जैसे विषयों पर विमर्श का होना इसको विशिष्ट बनाता है। प्रो. अरुण भगत जैसे बुद्धिजीवी लोगों के साथ महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली, उत्तरप्रदेश और बिहार के अनेक जिलों से युवा राष्ट्रवादी लेखकों के साथ साथ बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय और प्रयागराज विश्वविद्यालय से शोधार्थी युवा बच्चों की आयी भीड़ यह बताने के लिए काफी थी कि हिन्दुस्तान गाँवों तक पहुँचने लगा है।

सदानीरा उत्सव -2022 के स्मारिका का लोकार्पण

इस मौके पर साहित्य अकादमी समेत देश के अनेक बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य प्रो अरुण कुमार भगत, गोपालगंज के विधान पार्षद श्री आदित्य नारायण पाण्डेय, पूर्व विधायक मिथिलेश तिवारी, पूर्व प्रमुख श्री रवि प्रकाश मणि त्रिपाठी, संस्कार भारती के संगठन मंत्री श्री वेद प्रकाश, प्रान्त मंत्री दिवाकर राय,अनिल कुमार मिश्रा, जिला पार्षद ओमप्रकाश सिंह और संस्कार भारती गोपालगंज ईकाई के अध्यक्ष सर्वेश तिवारी श्रीमुख उद्घाटन सत्र में शामिल हुए। प्रो. अरुण कुमार ने बोलते हुए कहा कि साहित्य संवेदना के धरातल पर पुष्पित, पल्लवित और फलित होता है, हमें अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए सबसे पहले मानवीय संवेदना की रक्षा करनी होगी।” ऐसे आयोजन समाज को सशक्त और समृद्ध करने की दिशा में कदम‌ होते हैं। सर्वेश तिवारी श्रीमुख ने कहा कि हम सभी इसके लिए प्रयासरत हैं कि सिर्फ एक समूह और विचारधारा का कब्जा साहित्य और कला जगत में न हो! गाँव से गाँव लिखना ही सुखद है।कार्यक्रम का सन्चालन चंपारण के प्रसिद्ध युवा साहित्यकार जलज कुमार अनुपम ने किया।

उद्घाटन सत्र के बाद मंच से हिन्दी के उभरते युवा लेखक कृपा शंकर मिश्र की बेस्टसेलर हॉरर उपन्यास ‘मधुबाला’ के दूसरे संस्करण, सूर्यांश द्विवेदी ‘मिहिर’ के आने वाले उपन्यास “कैम्पस वाला प्यार” का आवरण पृष्ठ और उसके साथ सदानीरा उत्सव -2022 के स्मारिका का भी लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर पतरकी और बाला सेक्टर जैसे बेस्टसेलर उपन्यास के युवा लेखक आशीष त्रिपाठी को सदानीरा सम्मा‌न -2022 से सम्मानित किया गया!

साहित्य को शहरों के वातानुकूलित कमरों से निकाल कर खेतों की मेड़ तक ले जाने के उद्देश्य से प्रारम्भ हुए इस आयोजन में देश के अलग अलाग कोने से राष्ट्रवादी लेखक और कवि सम्मिलित हुए। कार्य्रकम के वैचारिक सत्र के दौरान ‘नए रचनाकारों के समक्ष चुनौतियाँ’ युवा साहित्यकार विकास कुमार, आशीष त्रिपाठी, अमृता प्रकाश ने अपने अपने विचार रखे इस सत्र में संचालक की भूमिका में सिद्धार्थ अरोड़ा ‘सहर’ रहे।

इसके बाद भोजपुरी कथा पाठ का आयोजन ‘यायावरी वाया भोजपुरी’ की ओर से सुधीर कुमार मिश्र ने किया। जिसमें उन्होनें सर्वेश तिवारी श्रीमुख की कहानी ‘अंतिम प्रार्थना’ का पाठ किया। जिसका भोजपुरी अनुवाद अनुराग रंजन ने किया था। इस भावुक प्रस्तुति ने सबका मन मोह लिया और सारे लोग अपनी आंखें पोंछते दिखे।

कार्यक्रम के अगले पड़ाव पर ‘हिन्दू इकोसिस्टम के बहाने हिन्दुस्तान की बदलती तस्वीर’ विषय पर परिचर्चा का आयोजन हुआ जिसमें वक्ता के तौर पर जलज कुमार अनुपम और आनंद कुमार शामिल थे।

कार्यक्रम के अंतिम सत्र में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ जिसमें देर रात तक काव्यधारा बहती रही। मंच से कविताओं, गीतों का गायन होता रहा और मुग्ध श्रोता झूमते और वाह वाह करते रहे। कवि सम्मेलन का प्रारम्भ बस्ती, उत्तरप्रदेश की प्रसिद्ध कवयित्री शिवा त्रिपाठी सरस ने माता सरस्वती की वंदना “हे माँ विराजो कंठ में सूचि ज्ञान को विस्तार दो” से किया । उसके बाद प्रशान्त सौरभ ने संस्कृत में काव्यपाठ कर के मंच को ऊंचाई दी। प्रशांत ने संस्कृत और भोजपुरी मिला कर जो “नागेन्द्र हाराय त्रिलोचनाय…” का पाठ किया उसने लोगों को वाह वाह करने पर विवश कर दिया! उसके बाद अवध की धरती से आये वरिष्ठ कवि ज्ञान प्रकाश आकुल ने भगवान राम और भरत के भातृत्व पर छन्द पढ़कर कवि सम्मेलन को अगले स्तर पर पहुँचाया। गोरखपुर की धरती से आये संदीप सिंह श्रीनेत ने अपनी कविता “छोटा सा शहर हूँ मगर छोटा किरदार नही” पढ़कर खूब वाहवाही बटोरी। जिले के वरिष्ठ कवि संजय मिश्र संजय ने अपना प्रसिद्ध गजल ‘मैं समझता था कि वो किस्सा पुराना हो गया” पढ़ कर समा बांधा, तो बनारस से आये सुशांत शर्मा ने अपने खण्डकाव्य जटायु से “भक्त से नाता छूटे भगवान के, छूटे न भाई से भाई के नाता” सुना कर श्रोताओं को भाव विह्वल कर दिया। इनके अतिरिक्त छपरा के कवि निर्भय नीर, दिल्ली से आये नित्यानन्द नीरव, बलिया से आये अशोक तिवारी और आलोक पाण्डेय और जिले के कवि सत्यप्रकाश शुक्ल ने अपनी कविताओं से लोगों को झुमाया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता गोपालगंज जिले के वरिष्ठ कवि सुभाष संगीत ने की और इस सत्र का मंच संचालन संजय मिश्रा संजय ने किया।

सम्मानित हुए हरियाणा के वीरेंद्र देव शर्मा

मीडिया स्कैन संवाददाता

करनाल हरियाणा में द मिराज डा मंगलसैन आडिटोरियम में देव मानव सेवा ट्रस्ट के ट्रस्टी वीरेंद्र देव शर्मा (देव) को समाजसेवा के लिए द ग्रेट खली के द्वारा नैशनल डायमंड अवार्ड से सम्मानित किया गया।

वीरेंद्र देव शर्मा समाजसेवा के लिए हुए द ग्रेट खली के हाथों सम्मानित

समाजसेवा, पर्यावरण, गरीब लड़कियों के सामूहिक विवाह,झुगी बस्तीयों में भोजन व वस्त्र वितरण, महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कटिंग, टेलरिंग, फैशन डिजाइनिंग व ब्यूटी पार्लर की ट्रेनिंग व रोजगार उपलब्ध करवाने व लॉक डाउन के समय 2460 परिवारो को सूखा राशन वितरण, महिलाओं व लड़कियों के लिए मुफ्त आत्मरक्षा कैम्प आयोजन आदि कार्यों को देखते हुए, उन्हें नैशनल डायमंड अवार्ड से सम्मानित किया गया।

कुल 51 लोगों को सम्मान दिया गया। इस अवार्ड सेरेमनी के आयोजक सतीश राणा ने वीरेंद्र देव शर्मा को अवार्ड के लिए नामांकित किया।

हिजाब प्रकरण : अलग दिखने की जिद क्यों 

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डॉ. सौरभ मालवीय

मंगलवार को कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध लगाने को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं को खारिज कर दिए जाने के पश्चात यह मामला अब सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया है

भारत एक लोकतांत्रिक देश है. यहां सभी धर्मों और संप्रदायों के लोग आपस में मिलजुल कर रहते हैं. सभी को अपने-अपने धर्म के अनुसार धार्मिक कार्य करने एवं जीवन यापन करने का अधिकार प्राप्त है. परन्तु कुछ अलगाववादी शक्तियों के कारण देश में किसी न किसी बात को लेकर प्राय: विवाद होते रहते हैं. इन विवादों के कारण जहां शान्ति का वातावरण अशांत हो जाता है, वहीं लोगों में मनमुटाव भी बढ़ जाता है. ताजा उदाहरण है हिजाब प्रकरण. कर्नाटक के उडुपी से प्रारंभ हुआ हिजाब प्रकरण थमने का नाम ही नहीं ले रहा है.

डॉ. सौरभ मालवीय

मंगलवार को कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध लगाने को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं को खारिज कर दिए जाने के पश्चात यह मामला अब सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया है. कर्नाटक उच्च न्यायालय का कहना है कि छात्रों को स्कूलों में हिजाब नहीं, यूनिफॉर्म पहननी होगी. न्यायालय का कहना है कि हिजाब पहनना इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है. हिजाब मामले में राज्य के एडवोकेट जनरल प्रभुलिंग नवादगी ने कर्नाटक उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ के सामने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि हिजाब इस्लाम का अनिवार्य अंग नहीं है और इसके उपयोग पर रोक लगाना संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन नहीं है। उन्होंने कहा कि हिजाब धर्म के पालन के अधिकार के अंतर्गत दिखावे का भाग है. पूर्ण पीठ में न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ऋतुराज अवस्थी, न्यायाधीश जेएम काजी एवं न्यायाधीश कृष्णा एम दीक्षित सम्मिलित हैं. एडवोकेट जनरल ने कहा कि सरकार का आदेश संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) का उल्लंघन भी नहीं करता. यह अनुच्छेद भारतीय नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है. उन्होंने यह भी कहा कि यूनिफॉर्म के बारे में सरकार का आदेश पूरी तरह शिक्षा के अधिकार कानून के अनुरूप है और इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है. उन्होंने कहा कि उडुपी के सरकारी प्री यूनिवर्सिटी कॉलेज में यूनिफॉर्म का नियम वर्ष 2018 से लागू है, परन्तु समस्या तब प्रारंभ हुई जब विगत दिसंबर में कुछ छात्राओं ने प्राचार्य से हिजाब पहनकर कक्षा में जाने की अनुमति मांगी. इस पर उनके अभिभावकों को कॉलेज में बुलाया गया और यूनिफॉर्म लागू होने की बात कही गई, परन्तु छात्राएं नहीं मानीं और उन्होंने विरोध आरंभ कर दिया. जब मामला सरकार के संज्ञान में आया, तो उसने मामले को तूल न देने की अपील करते हुए एक उच्च स्तरीय समिति बनाने की बात कही. किन्तु छात्राओं पर इसका कोई प्रभाव नहीं हुआ. जब मामला बढ़ गया, तो सरकार ने 5 फरवरी को आदेश देकर ऐसे किसी भी वस्त्र को पहनने से मना कर दिया, जिससे शांति, सौहार्द्र एवं कानून व्यवस्था प्रभावित हो रही हो.

विशेष बात यह भी है कि उच्च न्यायालय ने पर्दा प्रथा पर भीमराव आंबेडकर की टिप्पणी का भी का उल्लेख करते हुए कहा- “पर्दा, हिजाब जैसी चीजें किसी भी समुदाय में हों तो उस पर बहस हो सकती है। इससे महिलाओं की आजादी प्रभावित होती है। यह संविधान की उस भावना के विरुद्ध है, जो सभी को समान अवसर प्रदान करने, सार्वजनिक जीवन में हिस्सा लेने और पॉजिटिव सेक्युलरिज्म की बात करती है।“

भारत में व्याप्त अनेक कुप्रथाओं ने महिलाओं को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित रखा है. पर्दा प्रथा भी उनमें से एक है. इस प्रथा के कारण महिलाओं को अनेक समस्याओं से जूझना पड़ा. उन्हें घर की चारदीवारी तक सीमित कर दिया गया. पुनर्जागरण के युग में समाज सुधारकों ने इन कुप्रथाओं के विरोध में जनजागरण आन्दोलन चलाया. इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिले. समय के साथ-साथ समाज में परिवर्तन आया. हिन्दू व अन्य समुदायों के साथ-साथ मुसलमान भी अपनी बच्चियों को स्कूल भेजने लगे, परन्तु उनका अनुपात अन्य समुदायों की तुलना में बहुत ही कम है, जो चिंता का विषय है. देश में सबको समान रूप से अधिकार दिए गए हैं. शिक्षण संस्थानों में भी सबके साथ समानता का व्यवहार किया जाता है. प्रश्न यह है कि कुछ लोग स्वयं को दूसरों से पृथक क्यों रखना चाहते हैं?   

वास्तव में हिजाब प्रकरण मुस्लिम समाज की लड़कियों को शिक्षा से दूर रखने का एक षड्यंत्र है. चूंकि शिक्षा ही मनुष्य को अज्ञानता के अंधकार से निकाल कर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाती है, इसलिए रूढ़िवादी मानसिकता के लोग महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखने के लिए ऐसे षड्यंत्र रचते रहते हैं, ताकि वे अपने अधिकारों के लिए आवाज न उठा सकें. मुस्लिम समाज में महिलाओं की जो स्थिति है, वह किसी से छिपी नहीं है. जब मुस्लिम बहन-बेटियों के हक में भाजपा सरकार ‘तीन तलाक’ पर रोक लगाने का कानून लाई थी, तो शिक्षित और जागरूक मुस्लिम महिलाओं ने इसका खुले दिल से स्वागत किया था. उस समय भी रूढ़िवादी लोगों ने जमकर इसका विरोध किया था, परन्तु उनकी एक न चली. इस कानून ने मुस्लिम महिलाओं के जीवन को बेहतर बनाने का कार्य किया. अब कोई भी व्यक्ति ‘तीन तलाक’ कहकर अपनी पत्नी को घर से नहीं निकाल सकता. ऐसा करने पर उसे दंड दिए जाने का प्रावधान है.

उल्लेखनीय है कि यूरोप के अनेक देशों ने हिजाब अर्थात बुर्का पहनने पर आंशिक या पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाया हुआ है, जिसमें ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, बुल्गारिया, डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड एवं स्विट्जरलैंड आदि सम्मिलित हैं। इटली और श्रीलंका में भी बुर्का पहनने पर प्रतिबंध है. इन सभी देशों में आदेश का उल्लंघन करने पर भारी आर्थिक दंड दिए जाने का प्रावधान है.

कुछ लोग हिजाब के मामले में कुरआन की दुहाई देते हुए कहते हैं कि इसमें कई स्थान पर हिजाब का उल्लेख किया गया है, परन्तु वे इस बात पर चुप्पी साध लेते हैं कि ड्रेस कोड के संदर्भ में ऐसा कुछ नहीं कहा गया. इस्लाम के पांच मूलभूत सिद्धांतों में भी हिजाब सम्मिलित नहीं है. वास्तव में धर्म का संबंध आस्था एवं विश्वास से होता है, जबकि वस्त्रों का संबंध क्षेत्र विशेष एवं आवश्यकताओं से होता है. उदाहरण के लिए किसी भी ठंडे स्थान पर रहने वाले लोग जो भारी भरकम गर्म वस्त्र पहनते हैं, वे किसी गर्म क्षेत्र में रहने वाले लोग नहीं पहन सकते. ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि भारत में कहीं भी हिजाब अथवा बुर्का पहनने पर कोई प्रतिबंध नहीं है, परन्तु जिन संस्थानों में ड्रेस कोड लागू है, वहां हिजाब पहनने की जिद क्यों की जा रही है ?

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