नक्सली बर्बरता से पीड़ित बस्तर के आदिवासियों का जंतर-मंतर पर प्रदर्शन

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नक्सलियों द्वारा बस्तर के आदिवासियों के विरुद्ध की जा रही नृशंस और बर्बर हिंसा के खिलाफ वहां के पीड़ित आदिवासियों के एक समूह की ओर से अभी 11 बजे से एक प्रदर्शन जंतर-मंतर (नई दिल्ली) पर आयोजित है। इस प्रदर्शन में खामोश रही बस्तर (छत्तीसगढ़) की पीड़ा और वहां फैले कम्युनिस्ट आतंक पीड़ितों को स्वर देने की कोशिश होगी।

कभी भी बस्तर की आवाज दिल्ली के कानों को प्रभावित नहीं करती है। इस आयोजन में बस्तर के वैसे पीड़ित जन जिनकी आवाज कभी नहीं सुनी गयी, वे दिल्ली को अपनी आवाज सुनाने आ रहे हैं। साथ ही निर्दोष और भोले-भाले आदिवासियों की हत्या को महिमामंडित करने वाले, उनकी संस्कृति से खिलवाड़ करने वाले अर्बन नक्सलियों के कृत्यों का खुलासा करने की विनम्र कोशिश है।

आपसे आग्रह है कि पहली बार दिल्ली में हो रहे इस प्रदर्शन में अपनी सहभागिता देकर भारत के भीतर ही भारतीयता का संहार करने के विरुद्ध हो रही कोशिश में साथ आए।

Agra Students Unite for Water Conservation at Jal Panchayat

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A Pani Panchayat, organized by Civil Society of Agra and St. Xavier’s International School, brought together school children to discuss water conservation and management in the city.

Renowned water conservationist Rajendra Singh, also known as Jalpurush, praised the students’ efforts, saying their views would be conveyed to the government and public representatives.

The students emphasized the need to identify and revive Agra’s water sources, clean the Yamuna River, and implement effective water storage plans. They suggested redeveloping water structures, reviving old ponds, and implementing the Shastripuram reservoir scheme.

Participants criticized the Uttar Pradesh government’s groundwater exploitation policy, stating it has worsened the city’s water crisis.

The Panchayat resolved to make Agra water-rich by cleaning and preserving its water sources, and urged the government to address the issue of Rajasthan stopping UP’s share of water from the Utangan and Khari rivers.

Students from seven schools participated in the event, including Holy Public School, Delhi Public School International, and Bharatiya Vidya Mandir School.

The event highlighted the importance of community involvement in water conservation efforts. “We are proud to see our students taking initiative and showing concern for Agra’s water crisis,” said Father Raj Albert, Principal of St. Xavier’s International School.

Rajendra Singh emphasized the need for sustainable water management practices, citing successful examples from neighboring districts Bharatpur and Dholpur. “Agra can learn from these models and implement similar solutions to address its water woes,” he said.

The Panchayat’s resolutions and recommendations will be submitted to the Agra District Administration and the Uttar Pradesh government, with the hope of sparking meaningful change in the city’s water conservation efforts.

Organizers hailed the event as a success, noting that it marked a crucial step towards raising awareness and promoting community engagement on water conservation issues in Agra.

यू. के. में बसा छोटा सा मिथिला

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मिथिला क्षेत्र से हजारो मील दूर यूनाइटेड किंगडम (यू .के ) की धरती पर एक सांस्कृतिक लघु मिथिला का उद्भव हो चूका है ।यू. के. में प्रवासी भारतीयों की संख्या का एक नगण्य हिस्सा मैथिल समाज से आता है। यह समाज सांस्कृतिक अस्तित्व के संकट के दौर से गुजर रहा था। आज से दसेक वर्ष पूर्व यहाँ की स्वास्थ्य सेवा में कार्यरत कुछ चिकित्सक मैथिलों ने एक बैठक की और जन्म हुआ मिथिला कल्चरल सोसाइटी (यू. के. ) का। यू. के. में मैथिल संस्कृति को पुनर्जीवित कर अगली पीढ़ी को उससे जोड़ कर रखना यही इस संस्था का लक्ष्य बना।

यू. के में भारतीय सांस्कृतिक जीवन पर केंद्रित , बी. एच. एफ. रेडिओ पर भारत की प्रमुख भाषाओँ पर आधारित कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। उन्होंने मैथिल संस्कृति को उजागर करने वाली मैथिली मधुर गीतमाला नामक कार्यक्रम के प्रसारण का प्रस्ताव दिया।

मिथिला कल्चरल सोसाइटी यू. के. की एक अत्यंत मेधावी , उद्यमी और समर्पित सदस्या श्रीमती चंदा झा ने इसका उत्तरदायित्व लिया। इस क्षेत्र का कार्यभार संभालना चंदा जी के लिए सरल नहीं था। इनके पिता भारतीय नौसेना में थे। चंदा जी का जन्म विशाखापट्टनम में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा कोचीन में औरआगे की पढाई मुंबई में हुई । इन्होने अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर किया। इनका विवाह श्री देवाचल झा जी से हुआ जो घर में मैथिली में ही बातें करना पसंद करते हैं। मगर तब भी चंदा जी मैथिली में बातचीत करना प्रारम्भ नहीं कर सकीं। जीवन में पहली बार मैथिल संस्कृति और भाषा से इनका परिचय अपने देश में नहीं होकर विदेश की धरती पर तब हुआ जब यह मिथिला कल्चरल सोसाइटी (यू. के.) की सदस्य बनीं। चंदा जी के शब्दों में , इनके हृदय में एक टीस सी उठती थी कि मैथिल होकर भी वह मैथिली नहीं बोलती थीं। मगर यू. के. आकर उन्होंने सप्रयास मैथिली सीखी।

इस उम्र में यह कार्य दुष्कर था। त्रुटिपूर्ण उच्चारण के लिए मन विचलित हो जाया करता था , मगर मैथिल समाज के साथियों का सहयोग इनका सम्बल बना। अब वह मधुर गीतमाला के थीम पर गुणवत्तापूर्ण गीतों का चुनाव करके गीतमाला बनातीं हैं। सभी गीतों को एक लड़ी में जोड़कर और शोध करके आलेख बनाती हैं , आलेख पर अभ्यास करके समय पर प्रसारण करती हैं और यह सारे कार्य बड़े ही मनोयोग से करती हैं। वह पति देवाचल जी, पुत्र प्रीत और मिथिला कल्चरल सोसाइटी (यू. के.) के मित्रों के प्रति इस कार्य में सहायता हेतु कृतज्ञ हैं।

पिछले एक वर्ष में चन्दा जी ने मुख्य पर्व -त्यौहार जैसे कि होली,दिवाली, दशहरा , के अतिरिक्त सामा -चकेवा, बरसाइत , जानकी नवमी, राम नवमी ,विवाह पंचमी, शिवरात्रि, जुड़ -शीतल , तिला संक्रांति ,वसंत पंचमी , जन्माष्टमी , रक्षा बंधन , चैतावर, मिथिला धाम , सावन, बरखा, वसंत , गाम – घर, इजोरिया, सिनेहिया, कागा, कोइली, पान , मखान , पाग, चूड़ा -दही, चौरचन, जगदम्बा , माँ भगवती, झुमका, साँझ – पराती, विरह, गणेश वंदना इत्यादि कितने ही सांस्कृतिक विषयों पर थीम गीतमाला प्रस्तुत कर चुकी हैं । इनकी गीतमाला के श्रोतागण यू. के., भारत , नेपाल, अमेरिका, पूर्वी एशिया, और यूरोप तक से हैं जहाँ से इन्हे प्रशंसा और शुभकामना के सन्देश मिलते हैं ।

इन्होने पं. कौशल झा द्वारा स्थापित दूर्वाक्षत मिशन मिथिलाक्षर अभियान (दिल्ली) के तहत मिथिलाक्षर लिपि सीखी और अब इसी संस्थान की कार्यकारिणी समिति में है।

चंदा जी से बातचीत में यह जान प्रसन्नता हुई कि वह यह कार्य माँ मैथिली और मैथिल संस्कृति की सेवा समझ कर कर रही हैं। अपने देश की मिट्टी पानी से दूर , विदेश की धरती पर मिथिला और मैथिली की सेवा में तत्पर मिथिला की इस बेटी की हम सराहना करते हैं और शुभकामनाएं देते हैं कि वह इसी तरह अपनी संस्कृति का दीपक जलाये रखें। यह दीपक एक दिन विदेश में मैथिल संस्कृति का प्रकाश पुंज बनेगा यही हमारी कामना, आशा और विश्वास है।

हिंदुत्व के पुनरुत्थान के बीच, पितृ पक्ष में प्रशिक्षित कर्मकांडी पंडितों की कमी

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पितृ पक्ष पखवाड़ा शुरू होते ही, हिंदू समुदाय को एक गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा है: प्रशिक्षित पंडितों की भारी कमी।

पुराने पंडित बूढ़े होते जा रहे हैं, जबकि युवा ब्राह्मण पुरोहिती करने से कतरा रहे हैं और इसके बजाय आधुनिक करियर अपना रहे हैं।

यह कमी भारत और विदेशों में नए सिरे से रुचि के कारण वैदिक अनुष्ठानों की मांग में उछाल के साथ मेल खाती है।

हिंदू पंडितों की भूमिका महत्वपूर्ण है, जिसके लिए संस्कृत शास्त्रों और परंपराओं में विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है। हालांकि, वित्तीय और प्रतिष्ठा संबंधी विचार युवा ब्राह्मणों को इस मार्ग से रोकते हैं। मांग बढ़ने पर परिणामी शून्यता महसूस की जाती है। चुनौतियों के बावजूद, वैदिक अनुष्ठानों में रुचि का पुनरुत्थान वैश्विक स्तर पर प्रशिक्षित पंडितों के लिए अवसर पैदा करता है।

कुछ शहरों में, प्रशिक्षित पंडित नदियों या झीलों के किनारे समूहों में तर्पण अनुष्ठान करते हैं। वीडियो भी प्रसारित किए जाते हैं। कुछ साल पहले, आगरा विश्वविद्यालय ने कर्मकांड में एक पाठ्यक्रम शुरू किया था, लेकिन अच्छे शिक्षकों की कमी के कारण इसे बंद कर दिया गया था। अब, कई गुरुकुल पुजारियों को प्रशिक्षित करते हैं, लेकिन पारिवारिक पंडितों की पुरानी प्रणाली में गिरावट देखी गई है।

कमी में योगदान देने वाले कुछ प्रमुख कारकों में आधुनिक करियर की ओर बढ़ती आकांक्षाएँ, वित्तीय पुरस्कारों और प्रतिष्ठा की कमी और कठोर प्रशिक्षण की आवश्यकता शामिल है। इसके परिणामस्वरूप वैदिक ज्ञान को संरक्षित करने के महत्व की बढ़ती मान्यता, विदेशों में कुशल पंडितों की बढ़ती माँग और अगली पीढ़ी को प्रेरित करने के प्रयासों की आवश्यकता है।

प्रशिक्षित हिंदू पंडितों की कमी एक गंभीर चुनौती है।

पंडित शिव स्वामी ने कहा, “पितृ पक्ष, पूर्वजों को सम्मानित करने के लिए एक पखवाड़े तक चलने वाला हिंदू अनुष्ठान, वास्तव में एक अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहा है। प्रशिक्षित “कर्मकांडी पंडितों” की भारी कमी ने देश को प्रभावित किया है।”

हाथरस से सेवानिवृत्त नौकरशाह प्रकाश चंद्र कहते हैं कि वैदिक अनुष्ठानों और हिंदुत्व में नई रुचि के कारण अनुभवी पंडितों की मांग बढ़ गई है।

नतीजतन, पूर्वी यूपी के जिलों, बिहार और अन्य कम विकसित क्षेत्रों से पंडित बाजार में आ रहे हैं। आगरा के श्री मथुराधीश मंदिर के पुजारी गोस्वामी नंदन श्रोत्रिय कहते हैं, “परिवार पुरोहित की संस्था लगभग खत्म हो चुकी है।” कमी के कारण दूसरे क्षेत्रों से पंडितों को बुलाना पड़ा, अनुष्ठानों और पेश किए जाने वाले भोजन की गुणवत्ता में कमी आई, श्राद्ध समारोहों का व्यवसायीकरण बढ़ा और बड़े शहरों में पंडितों ने बहुत ज़्यादा शुल्क वसूलना शुरू कर दिया।

स्थानीय ब्राह्मण सभा के एक पदाधिकारी ने इस संकट के लिए युवा पंडितों के लिए उचित मार्गदर्शन और प्रशिक्षण की कमी, पंडितों के लिए सीमित आर्थिक अवसरों और बदलते सामाजिक मूल्यों और प्राथमिकताओं को जिम्मेदार ठहराया।

चूंकि कमी बनी हुई है, इसलिए कई परिवार पंडितों के बजाय भिखारियों, अनाथों या गायों को भोजन कराने जैसे श्राद्ध करने के वैकल्पिक तरीकों को चुन रहे हैं। यह संकट भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और पारंपरिक प्रथाओं की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए स्थायी समाधानों की आवश्यकता को उजागर करता है।

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