फसाद बिहार में और फायदा उत्तर प्रदेश 2022 चुनाव में

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बिहार स्कैन

देखिए ना संयोग या कहें प्रयोग? जब बिहार में चुनाव था, उप्र में हिंसा हुई। अब उप्र में चुनाव है तो बिहार से हिंसा की खबर आ गई। कांग्रेसी इको सिस्टम का एक खबरिया चैनल प्राइम टाइम में छात्रों को लगातार उकसाने का काम लंबे समय से कर ही रहा है। इस चैनल ने सीएए प्रदर्शन के दौरान कथित आंदोलनकर्मियों को हांगकांग में चल रहे प्रदर्शन पर कवरेज करके समझाया कि पुलिस की कार्रवाई पर जवाबी कार्रवाई के तरीके क्या हो सकते हैं? आज भी बात ‘इको सिस्टम’ की हो तो ‘वाम—कांग्रेसी इको सिस्टम’ का कोई जवाब नहीं

अभिधा-लक्षणा—व्यंजना जैसे शब्दों से जिनका पाला पहले नहीं पड़ा है, उन्हें हिन्दी साहित्य के किसी विद्यार्थी से मदद लेनी चाहिए। वामपंथी एक्टिविस्ट के पूरे एक्टिविज्म में आपको व्यंजना नजर आएगी। मतलब चुनाव बिहार में होगा तो मुद्दा नोएडा का अखलाक बनाया जाएगा। कथित तौर पर जिसके घर से गाय का मांस बरामद हुआ।
बात 2015 की है, बिहार में चुनाव का साल था। इस मामले में स्थानीय लोगों के विरोध और हाथापाई में दादरी के अखलाक की जान चली गई थी। इस पूरे मुद्दे को इस तरह ‘वामपंथोन्मुख कांग्रेसी इको सिस्टम मीडिया’ ने चलाया जैसे भारतीय जनता पार्टी ने बिहार का चुनाव हारने के लिए उत्तर प्रदेश में अखलाक पर पहले हमला करवाया हो। जिसमें उसकी जान चली गई और इस बात का नुकसान खुद बिहार चुनाव में पार्टी ने उठा लिया। इस तरह की चूक तो कल राजनीति में आई ‘आम आदमी पार्टी’ भी नहीं करेगी।

देखिए ना संयोग या कहें प्रयोग? जब बिहार में चुनाव था, उप्र में हिंसा हुई। अब उप्र में चुनाव है तो बिहार से हिंसा की खबर आ गई। कांग्रेसी इको सिस्टम का एक खबरिया चैनल प्राइम टाइम में छात्रों को लगातार उकसाने का काम लंबे समय से कर ही रहा है। इस चैनल ने सीएए प्रदर्शन के दौरान कथित आंदोलनकर्मियों को हांगकांग में चल रहे प्रदर्शन पर कवरेज करके समझाया कि पुलिस की कार्रवाई पर जवाबी कार्रवाई के तरीके क्या हो सकते हैं? आज भी बात ‘इको सिस्टम’ की हो तो ‘वाम—कांग्रेसी इको सिस्टम’ का कोई जवाब नहीं।

इस वक्त बिहार में जदयू—भाजपा की सरकार है लेकिन बिहार वाले खूब जानते हैं कि सरकार जदयू ही चला रही है। जिले से लेकर प्रखंड, पंचायत स्तर तक जदयू के नेताओं में जबर्दस्त ‘उछाल’ है। किसी भी प्रखंड, अंचल, अनुमंडल में आपको दो—चार जदयू नेता मिल ही जाएंगे। आप बिहार के किसी भी जिले के भाजपा जिलाध्यक्ष से बात करके इसकी पुष्टी कर सकते हैं। शर्त सिर्फ इतनी है कि बातचीत आफ द रिकॉर्ड हो।

छात्रों के आक्रोश भेंट चढ़ी ट्रेन

बिहार के विश्वविद्यालयों में जब आइसा के कार्यकर्ताओं की थोक में नियुक्तियां हुई। उसी वक्त मुझे संदेह था कि यह सब बिहार में भाजपा विरोधी इको सिस्टम तैयार करने के लिए किया जा रहा है। उन नियुक्तियों में जेएनयू, आइसा की वह पूर्व छात्रा भी शामिल है, जिसने देवी मां सरस्वती पर एक अश्लील तुकबंदी की थी। जिसे सदी की महान कविता बनाकर सोशल मीडिया पर वाम इकोसिस्टम ने खू्ब प्रचारित किया और उनकी तुकबंदियों पर पुरस्कार भी दिलवाया।

किसी को भी नौकरी मिलना स्वागत योग्य कदम है। सरकारों को बिल्कुल विचारधारा की जगह योग्यता देखकर नियुक्ति देनी चाहिए लेकिन जिस तरह एक खास विचारधारा के लोगों की नियुक्ति बिहार के कॉलेजों में हुई। इसलिए इस तरफ ध्यान गया। अब लाल सलाम के गढ़ रहे गया में छात्रों द्वारा हिंसा हुई तो ऐसा लगा कि संदेह की पुष्टी हो रही है। एक बार जांच कर रही टीम को पूरे मामले को इस तरह भी देखना चाहिए। एनएसयूआई का नाम जरूर सामने आ रहा है इस मामले में लेकिन उनका मार्गदर्शन कौन कर रहा था? वे छात्र हिंसा में कटपुतली थे तो उनकी डोर किन लोगों ने पकड़ रखी थी। यह सामने आना बेहद जरूरी है।

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कब तक इस्तेमाल होती रहेगी इस बेगुनाह की तस्वीर

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आशीष कुमार ‘अंशु’

केरल के तिरुची में सीपीएम के मंच से एक किताब के लोकार्पण के दौरान अशोक कुमार भगवान भाई परमार का परिचय दंगाई के रूप में दिया गया था। उनकी ‘दंगाई’ के तौर पर फ्रेम किए जाने लायक तस्वीर पत्र-पत्रिकाओं में भी छपती रही है। शायद इसे एक समुदाय का जिसका मीडिया पर आधिपत्य है पूर्वाग्रह समझा जा सकता है लेकिन इस जाल में अब अंग्रेजी अखबार टेलीग्राफ भी आ गया। कॉमरेड शंकर राय ने लेखक रामचन्द्र गुहा को ध्यान कराया कि आपके लेख के साथ गलत तस्वीर इस्तेमाल हुई है। इस पर रामचन्द्र गुहा का जवाब था-”धन्यवाद। तस्वीर का चयन मेरे द्वारा नहीं बल्कि टेलीग्राफ द्वारा किया गया है। आपके मेल की सूचना उन तक पहुंचा दूंगा।”

वास्तव में अशोक का कसूर सिर्फ इतना था कि वह एक बड़े फोटो पत्रकार सब्सटीन डिसूजा को पोज देने को तैयार हो गया था और उसे इसका खामियाजा बार-बार लगातार भुगतना पड़ा। अभी हाल में कुतबुद्दीन पर आई किताब के लोकार्पण के बाद अखबारों में छपी प्रेस रिलीज से तैयार खबरों में भी। इन ख़बरों में उन्हें अशोक मोची बताया गया। किस मानसिकता के चलते तमाम अखबार और पत्रिकाएं अशोक भाई को अशोक मोची लिखती रहीं यह बताने की जरूरत नहीं है।

केरल के त्रिची में हुए किताब लोकार्पण की खबर कुछ इस तरह से लिखी गई मानो यहां से अशोक और कुतुबुद्दीन की मित्रता की कहानी लिखी जा रही हो। जबकि दोनों एक दूसरे से परिचित थे और एक दूसरे से दुश्मनी की दोनों के पास ही कोई वजह नहीं थी।

गोधरा कांड के बाद मीडिया में हाथ जोड़े और आंखों में आंसू लिए जिंदगी की भीख मांगते हुए व्यक्ति की जो तस्वीर जारी की गई थी वह कुतुबद्दीन की थी। यह भ्रम फैलाने की कोशिश भी की गई कि अशोक ने गुजरात 2002 में कोई बड़ा अपराध किया था जिसके लिए उन्हें पछतावा है। सबसे पहले अखबारवालों से यह पूछा जाना चाहिए कि क्या अशोक ने यह स्वीकार किया है कि वह गुजरात 2002 का अपराधी है और वह आगजनी और हत्या में शामिल था। यदि वह इन बातों को स्वीकार नहीं कर रहा है तो फि र वह माँफी किसलिए मांग रहा है। क्या वह गुजरात के साम्प्रदायिक हिन्दुओं का प्रतिनिधित्व करता है, क्या वह गुजरात सरकार में किसी महत्वपूर्ण पद पर है।

जहां तक बात पहली बार मिलने की है तो उनकी पहली मुलाकात तिरुची में नहीं हुई थी। पहली बार दोनों की मुलाकात राकेश शर्मा की फिल्म ‘फाइनल  सॉल्यूशन’ के सेट पर हुई थी। उसके बाद एक-दो बार कुतुबुद्दीन अशोक की दुकान पर आए भी हैं। लेकिन किताब के लोकार्पण पर कुछ इस तरह से उन्हें पेश किया गया मानो वे पहली बार मिल रहे हों। अखबारों ने धड़ल्ले से अशोक को बजरंग दल का सदस्य बताया। जबकि सच्चाई यह है कि अशोक बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर का अनुयायी है और उनके स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्शों पर उसका गहरा यकीन है। पिछले दिनों जब मैं अहमदाबाद गया तो मेरी मुलाकात अशोक से हुई। अशोक पिछले 20 सालों से शाहपुर रोड पर जूते सिलने और पॉलिश करने का काम कर रहे हैं। वे चाल में रहते हैं, मोबाइल नहीं रखते। भाई से रिश्ता बिगड़ा तो पुश्तैनी मकान छोड़कर सड़क पर आ गए। चाहते तो भाई से जायदाद के लिए लड़ सकते थे लेकिन उन्हें यह ठीक नहीं लगा।

दंगों के साल 2002 में अशोक सड़क पर अपनी दुकान से कुछ दूर एक चादर बिछाकर सोते थे और होटल में खाना खाते थे। जीवन में एक बार प्रेम हुआ था। प्रेम सफल नहीं रहा तो उसके बाद शादी का विचार त्याग दिया। शादी नहीं करने की एक वजह आर्थिक स्थिति भी है। यदि किसी लड़की को घर में लाएंगे तो उसके सपने भी साथ-साथ घर में दाखिल होंगे। यदि सपने पूरे करने की हैसियत नहीं हो तो शादी करके किसी की जिंदगी क्यों नरक बनाना। शाहपुर रोड के आसपास स्थित मुस्लिम मोहल्लों के लोग अशोक को जानते थे। वे आज भी अशोक के ग्राहक हैं। लेकिन मीडिया के लिए अशोक मानो बजरंग दल के एक बड़े नेता थे। तस्वीर की वजह से वे लोग भी अशोक से नफरत करने लगे, जो उन्हें जानते तक नहीं थे। दंगों के दो-तीन महीने बाद ही उन पर अज्ञात हमलावरों ने जानलेवा हमला किया। उन पर गोली चली। अशोक ने हमलावरों के खिलाफ कोई मुकदमा नहीं किया। बकौल अशोक, हमलावर मुझे गुजरात दंगों में मुसलमानों का कातिल समझ रहे हैं। मैं जानता हूं कि जब उन्हें सच्चाई पता चलेगी तब उन्हें अपने किए पर पछतावा होगा।

परमार कहते हैं, ‘मुझे न तो बजरंग दल से मतलब है और ना भाजपा से और ना ही कभी था। मेरा एक भी दोस्त या रिश्तेदार बजरंग दल या भाजपा में नहीं है। दंगों के दौरान जब मुझे लगा कि मेरे मुसलमान पड़ोसी खतरे में हैं तो मैंने उनकी मदद की। मैंने पांच परिवारों को उनके रिश्तेदारों के घर पहुंचाने में मदद की जहां वे ज्यादा सुरक्षित थे।’

अशोक से मैंने जानना चाहा कि उनकी आक्रामक तस्वीर आई कैसे। गोधरा कांड के अगले दिन गुजरात में आक्रोश चरम पर था। अहमदाबाद में भी उसका असर दिख रहा था। लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि तोड़-फोड़ इतने भयानक साम्प्रदायिक दंगों में बदल जाएगी। जिस दिन अशोक की तस्वीर ली गई थी उसके एक दिन पहले गोधरा कांड हुआ था। अगले दिन विश्व हिन्दू परिषद् ने बंद का आह्वान किया था। अशोक ने अखबार में पढ़ा था सो उसने अपनी दुकान बंद कर दी थी। वे अपने पड़ोस में नजीर भाई के गैराज में बैठे थे। दस-साढ़े दस बजे हो-हल्ला शुरू हो गया। दुकानें तोड़ी जाने लगीं। अशोक चूंकि नजीर भाई की दुकान में बैठे थे सो वे घेर लिए गए।

उन्होंने बड़ी मिन्नतें की और मुश्किल से समझा पाए कि वे एक हिन्दू हैं। अशोक को पूरे दिन सड़क पर रहना था। अपनी बढ़ी हुई दाढ़ी की वजह से वे मुसलमान लग रहे थे। उस वक्त गर्दन बचाने के लिए उन्हें सिर पर भगवा कपड़ा बांधना बेहतर विकल्प लगा। ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे तक अहमदाबाद की सड़कों पर भीड़ उग्र हो गई। तब उन्होंने चाल की तरफ भागना बेहतर समझा।

भीड़ से निकलते हुए एएफपी के प्रसिद्ध फोटो पत्रकार सब्सटीन डिसूजा की नजर अशोक पर गई। सब्सटीन बाद में ‘मुंबई मिरर’ में काम करने लगे और उन्होंने अजमल कसाब की चर्चित फोटो भी ली थी। डिसूजा ने अशोक से पूछा-‘गोधरा में जो हुआ उस पर उनकी क्या प्रतिक्रिया है।’ अशोक ने उन्हें जवाब दिया-‘गोधरा में जो हुआ वह गलत है लेकिन अब जो पब्लिक कर रही है वह भी सही नहीं है।’ अशोक ने यह भी कहा कि गोधरा में जो मुसलमानों ने किया वह इस्लाम की सीख नहीं है और अहमदाबाद में जो हिन्दू कर रहे हैं वह हिन्दू धर्म नहीं सिखलाता।

डिसूजा शायद गोधरा के प्रति हिन्दुओं के गुस्से को प्रदर्शित करना चाहते थे। परमार बताते हैं, ‘वे दूर से मेरी तस्वीर लेना चाहते थे। मैंने उनसे कहा की वे नजदीक से मेरी फोटो लें। मैं अपना गुस्सा अपने चेहरे पर प्रदर्शित करूंगा।’ और इस तरह उनकी वह फोटो ले ली गई, जिसमें वे माथे पर भगवा कपड़ा बांधे हुए हैं और उनके हाथों में एक डंडा है जिसे उन्होंने सड़क से उठाया था। भगवा साफा आत्मरक्षा के लिए था। परंतु दुनिया के लिए वे बदला लेने को आतुर खून के प्यासे व्यक्ति के प्रतीक बन गए।

अशोक कहते हैं, ‘मैं इंसान हूं। किसी की जान जाते हुए देखकर मेरा दिल भी रोता है। आज मुझे पूरी दुनिया में एक खलनायक बना दिया गया है। मेरे सिर वह गुनाह लिख दिया गया जो मैंने किया ही नहीं।’ वे कहते हैं, ‘मुझ पर यकीन करने की जरूरत नहीं है। आप आसपास के मुस्लिम मोहल्ले में जाकर बात कीजिए। आपको इस बात की जानकारी हो जाएगी।’ अशोक ने कहा कि यदि उन्हें पता होता कि दंगे इतने फैल जाएंगे तो वे अपनी तस्वीर नहीं देते। 22 फरवरी की सुबह तक हालात इतने नहीं बिगड़े थे और ना तस्वीर देते समय उन्हें अंदाजा था कि इतना खून-खराबा होगा।

बहरहाल, अशोक तो पिछले 20 सालों से उस गुनाह की सजा भुगत रहे हैं, जिसके लिए उन्हें किसी न्यायालय ने दोषी नहीं ठहराया। अब समय आ गया है कि गुजरात 2002 के दंगों के हिन्दुत्ववादी चेहरे का सच दुनिया जाने। टेलीग्राफ भी अपनी इस गलती के लिए क्षमा मांगे।

नीति आयोग के उपाध्यक्ष डॉ राजीव कुमार ने ‘नेशनल अबिलिटी अवार्ड् ‘ द्वारा आयोजित पुरस्कार -समारोह मे संस्थाओ को पुरस्कृत किया|

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 डॉ राजीव कुमार, उपाध्यक्ष, नीति आयोग ने  शनिवार 18 दिसंबर को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में आयोजित  “इंप्लॉय वेलबेइंग अवार्ड एंड कंक्लैव 2021” में विजेताओं को पुरस्कृत किया|

अपोलो टायर्स लिमिटेड,
आयन एक्सचेंज इंडिया लिमिटेड 
बीएसईएस ,राजधानी पावर लिमिटेड 
एंड्रिट्ज़ हाइड्रो प्रा.लिमिटेड 
लाइटअप (स्टार्टअप कंपनी)  विजेता थे।

 कॉन्क्लेव को संबोधित करते हुए, डॉ राजीव ने कहा कि मानव संसाधन में सुधार की बहुत गुंजाइश है।  उन्होंने कहा कि भारत को एक महाशक्ति बनाने के लिए एजेंसियों, नागरिक समाज और कॉरपोरेट्स को मिलकर काम करना चाहिए।

 उन्होंने आगे कहा कि मानव संसाधन विकास एक महत्वपूर्ण विषय है और कर्मचारियों की भलाई का समग्र विकास महत्वपूर्ण है – वित्त (धन) से स्वास्थ्य अधिक महत्वपूर्ण है और कोरोना ने इसे साबित कर दिया है। कर्मचारियों की भलाई और सुरक्षा के बारे में जागरूकता फैलाई जानी चाहिए। उनका यह भी कहना था कि “नेशनल अबिलिटी अवार्ड्स” व उनके संस्थापक गौरव स्वामी ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय चुना है जिसे पूरे देश में संबोधित करने की आवश्यकता है।
 राष्ट्रीय योग्यता पुरस्कार के संस्थापक श्री गौरव स्वामी ने बताया कि संगठनों और व्यक्तियों के उत्कृष्ट प्रदर्शन को मान्यता देने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्तर पर और नियमित अंतराल पर”नेशनल अबिलिटी अवार्ड्स” आयोजित किए जा रहे हैं।  उन्होंने कहा कि कोरोना ने कॉरपोरेट सेक्टर को बहुत बुरी तरह प्रभावित किया है और कर्मचारियों व अधिकारियों की भलाई अत्यंत महत्वपूर्ण है।  इसलिए यह संगोष्ठी और पुरस्कार उस संगठन को पहचानने और प्रेरित करने के लिए आयोजित किया गया जिसने अपने कर्मचारियों व अधिकारियों की भलाई के लिए पहल की।

विनोद दुआ को ‘महापुरुष’ बताने वाले क्या पाखंडी हैं

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मीडिया स्कैन डेस्क

”हमारे यहां एक बहुत बड़ा पाखंड होता है, दिखावा होता है कि जो दिवंगत हो जाए। जो इस दुनिया में ना रहे। जिसका देहांत हो जाए। उसको अचानक से महापुरुष बना दिया जाता है और जिस तरह की श्रद्धांजलियां दी जाती है, यह समझा जाता है कि दीस इज पोलिटिकली करेक्ट टु प्रेज अ पर्सन आफ्टर हिज गॉन।”

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दिवंगत होने पर इन शब्दों में पूर्व पत्रकार विनोद दुआ ने अपनी श्रद्धांजली दी थी।

पूर्व पत्रकार विनोद दुआ का 67 साल की उम्र में निधन हो गया, कल लोधी श्मशान घाट में होगा अंतिम संस्कार। विनोद दुआ की बेटी मल्लिका दुआ ने इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिए ये जानकारी दी।

विनोद लंबे समय से मुख्यधारा की पत्रकारिता से बाहर थे। एनडीटीवी ने उन्हें देश भर में खाने—पीने के काम में लगाया हुआ था। बाद में जब वे प्रोपगेन्डा वेबसाइट वायर से जुड़े तो वहां पत्रकारिता नहीं मोनोलॉग ही उनकी पहचान बनी। 2014 के बाद विनोद अकेले नहीं थे, एक पूरी खेप थी ऐसे पूर्व पत्रकारों की जिन्होंने पत्रकारिता छोड़कर मोनालॉग को अपना जीवन यापन का माध्यम बना लिया। उनके एकालाप का जमीनी सच्चाई से कुछ लेना—देना नहीं होता था। इन दिनों एनडीटीवी का प्राइम टाइम भी उसी रास्ते पर है।

विनोद ने जो बातें ‘अटलजी’ के लिए कही थी, वह सारी बातें उनके दिवंगत होने के बाद एक बार फिर दुहराई जा रही थी। विनोद की आत्मा कराह रही होगी एनडीटीवी, न्यूज लॉन्ड्री, वायर जैसे संस्थान से जुड़े कर्मचारियों के संदेशों से। उन्हें महापुरुष साबित करने का वही सारा पाखंड और दिखावा सोशल मीडिया पर दुहराया जा रहा है। जिसके वे आजीवन विरोधी रहे। इस तरह की श्रद्धांजलियों से उनकी आत्मा को कष्ट ही पहुंच रहा होगा।

ऐसा नहीं है कि सभी सोशल मीडिया पर ‘पोलिटिकल करेक्ट’ ही दिखना चाह रहे हों। जैसे विनोद पोलिटिकल करेक्ट होने को गलत मानते थे, वैसे ही कुछ सोशल मीडिया संदेशों को ‘मीडिया स्कैन’ की टीम ने तलाशा।

Vishal Maheshwari’s Facebook Post

यह सोशल मीडिया संदेश शायद विनोद दुआ के लिए सच्ची श्रद्धांजली हो। क्योंकि वे मरने के बाद किसी को लार्जर दैन लाइफ दिखाए जाने को पाखंड ही मानते थे।

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