जान से मारने की धमकी मिली पत्रकार दीपक चौरसिया को

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जाने माने वरिष्ठ पत्रकार दीपक चौरसिया को लोकप्रिय डिबेट शो ‘देश की बहस’ में जान से मारने की धमकी दी गई। ये धमकी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी PTI के प्रवक्ता चौधरी इफ्तिखार गुज्जर ने दी। चौधरी इफ्तिखार गुज्जर ने कहा, ‘अगर हमारे नबी के बारे में बकवास की तो मैं तुम्हारी गर्दन काटने के लिए इंडिया भी पहुंच जाऊंगा…’

दरअसल ‘देश की बहस’ में चर्चा हो रही थी कि कैसे पाकिस्तान के अंदर मासूम बच्चों का ब्रेनवॉश किया जा रहा है और उन्हें पढ़ाई के नाम पर जिहाद की ट्रेनिंग दी जा रही है। यही नहीं उन्हें गला काट देने तक की शिक्षा दी जा रही है। इस मुद्दे पर शो में शामिल सभी पैनलिस्ट के साथ चर्चा की जा रही थी और इसी दौरान जब PTI के प्रवक्ता चौधरी इफ्तिखार गुज्जर से इस पर सवाल किया गया, तो वो तिलमिला गए और जान से मारने की धमकी देने लगे। जिस तरह से पाकिस्तान के स्कूलों में बच्चों को जान से मारने की शिक्षा दी जा रही है, ठीक उसी तरह से भारत के नेशनल न्यूज चैनल पर चौधरी इफ्तिखार गुज्जर ने वरिष्ठ पत्रकार और शो के एंकर दीपक चौरसिया को भारत में आकर गला काटने की धमकी देने लगे।

शो में शामिल बाकी एक्सपर्ट भी चौधरी इफ्तिखार गुज्जर की इस जिहादी सोच को सुनकर हैरान रह गए। पाकिस्तान मूल के कनाडा के लेखक तारेक फतेह ने कहा कि इसके अलावा ये लोग कर भी क्या सकते हैं? वहीं इस्लामिक स्कॉलर मुफ्ती वजाहत कासमी ने भी चौधरी इफ्तिखार गुज्जर से कहा कि आप देश के इतने बड़े पत्रकार को इस तरह की धमकी कैसे दे सकते हैं? शो में शामिल दर्शकों ने भी इमरान खान की पार्टी के प्रवक्ता की इस धमकी की निंदा की।

आतंक की फैक्ट्री है पाकिस्तान और भारत समेत दुनियाभर में आतंकी वारदातों में पाकिस्तान का नाम आता रहा है और जिस तरह से पाकिस्तान सरकार में शामिल पार्टी के प्रवक्ता चौधरी इफ्तिखार गुज्जर ने LIVE शो के दौरान भारत के जाने माने पत्रकार को जान से मारने की धमकी दी, उससे पता चलता है कि किस तरह से पाकिस्तान के अंदर भारत के खिलाफ नफरत भरी हुई है और पाकिस्तान सरकार के नुमाइंदे भी आतंकियों की तरह बात करते हैं। वैसे ये पहली बार नहीं हुआ है कि किसी पाकिस्तानी ने इस तरह जहर उगला हो।

पत्रकार अरविंद कुमार सिंह राज्यसभा में विपक्ष नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के मीडिया सलाहकार नियुक्त

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अतुल मोहन गहरवार

वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह को राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे का मीडिया सलाहकार नियुक्त किया गया है। यह नियुक्ति राज्यसभा सचिवालय ने की है। मूलरूप से बस्ती जनपद के निवासी अरविंद कुमार सिंह की शिक्षा एवं दीक्षा प्रयागराज में हुई।  सिंह हिंदी के जाने-माने लेखक और पत्रकार हैं। दो महीने पहले तक राज्यसभा टीवी में वरिष्ठ सहायक संपादक के तौर संसदीय मामलों के प्रमुख और कृषि तथा परिवहन क्षेत्र के प्रभारी के तौर पर कार्यरत रहे। अरविन्द कुमार सिंह ने दशकों से खेती-बाड़ी, कृषि अनुसंधान और संचार तथा परिवहन तंत्र पर विशेष कार्य किया है। अरविंद की कई किताबें चर्चित हैं। ‘भारतीय डाक सदियों का सफरनामा’, ‘डाक टिकट में भारत दर्शन’, ‘भारत में जल परिवहन’ जैसे ऐतिहासिक पुस्तकें लिखने वाले अरविंद ने पत्रकारिता में सफलता के प्रतिमान स्थापित किए।

भारत के विकास में महिलाओं का अहम योगदान : स्मृति ईरानी

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आईआईएमसी के ‘शुक्रवार संवाद’ कार्यक्रम में बोलीं केंद्रीय मंत्री

”जब हम घर से बाहर निकल कर सफल हुई महिलाओं के लिए खुश होते हैं, तो हमें उन महिलाओं की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, जो अपनी मर्जी से घर पर रहना पसंद करती हैं। भारत के विकास में उन महिलाओं का भी अहम योगदान है।” यह विचार केंद्रीय महिला एवं बाल विकास व कपड़ा मंत्री स्मृति ज़ुबिन ईरानी ने शुक्रवार को भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) द्वारा आयोजित कार्यक्रम ‘शुक्रवार संवाद’ में व्यक्त किए। इस अवसर पर आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी विशेष तौर पर उपस्थित थे।

‘लोकतंत्र में स्त्री शक्ति’ विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि जब भी हम लोकतंत्र में स्त्री शक्ति की बात करते हैं, तो सिर्फ संसद में सेवा दे रही महिलाओं की बात होती है। लेकिन हम समाज के विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रही उन महिलाओं को भूल जाते हैं, जिनकी वजह से भारत ने एक मुकाम हासिल किया है।

स्मृति ईरानी ने कहा कि मेरी परवरिश गुरुग्राम में हुई है। उस वक्त अगर मैं कहती कि एक तबेले में पैदा हुई लड़की गुरुग्राम से दिल्ली तक का 20 किलोमीटर का फासला 40 साल में तय कर लेगी, तो शायद लोग मुझ पर हंसते। लेकिन मुझे पूरा भरोसा था कि मेरी सोच, जज़्बे और आकांक्षा को एक शहर की सीमा नहीं रोक सकती। उन्होंने कहा कि मैंने कभी रास्ते में आने वाली मुश्किलों को एक बाधा के रूप में नहीं देखा, मैंने इसे समाधान खोजने के लिए मिलने वाले एक रचनात्मक अवसर के रूप में देखा। 

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि समानता का मतलब है कि हर महिला को ये अधिकार मिले कि वो अपना जीवन कैसे जीना चाहती है। वो होममेकर बनना चाहती है या ऑफिस में काम करना चाहती है। उन्होंने कहा कि भारतीय राजनीति में एक महिला सरपंच का भी उतना ही महत्व है, जितना एक महिला मुख्यमंत्री का है।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर अपने विचार व्यक्त करते हुए स्मृति ईरानी ने कहा कि सिर्फ एक ही दिन महिलाओं के सम्मान का कोई औचित्य नहीं है। एक महिला का संघर्ष सिर्फ एक दिन तक ही सीमित नहीं होता। उसे हर दिन नई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए महिलाएं हर दिन सम्मान पाने की अधिकारी हैं।  

इस अवसर पर आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा कि स्त्री, शक्ति का ही रूप है। पुरुष का संपूर्ण जीवन नारी पर आधारित है। कोई भी पुरुष अगर सफल है, तो उस सफलता का आधार नारी ही है। प्रो. द्विवेदी ने कहा कि नई शिक्षा नीति में सरकार का पूरा ध्यान इस बात पर केंद्रित है कि लड़कियां पीछे ना रहें और उन्हें शिक्षा के समान अवसर प्राप्त हों। 

कार्यक्रम का संचालन प्रो. संगीता प्रणवेंद्र ने किया एवं धन्यवाद ज्ञापन संस्थान की अपर महानिदेशक (प्रशिक्षण) ममता वर्मा ने किया। कार्यक्रम में डीन (अकादमिक) प्रो. गोविंद सिंह, डीन (छात्र कल्याण) प्रो. प्रमोद कुमार, समस्त प्राध्यापक, अधिकारी एवं विद्यार्थियों ने भाग लिया।

परजीवियों की प्रयोगशाला से निकले हैं आंदोलनजीवी

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समीर कौशिक

(लेखक शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास में पश्चिमी उत्तरप्रदेश(मेरठ-बृज प्रान्त) के संयोजक हैं)

बात 2011 से आरम्भ होती है जब देश में जन लोकपाल हेतु आंदोलन के नए रूप को देखा जिसमें देश भर की कई नामचीन हस्तियां कई राजनैतिक दलों ने अपना भाग्य आजमाया जो इस आंदोलन में परजीवियों की तरह आये जिस प्रकार परजीवी एक स्वस्थ शरीर देखते हैं उस पर चिपकते हैं और रक्त पीकर स्वंय को ह्रष्टपुष्ट करके अगले शरीर को जीर्ण शीर्ण करने की तलाश करते हैं। वैसा ही तब हुआ उस आंदोलन में देश ने परजीवियों को एक नई बिरादरी देखी जिन्होंने आंदोलन को पकड़ा और उसे अपनी राजनैतिक जमीन तैयार करने की प्रयोगशाला बना लिया जिस प्रयोगशाला में से मंत्री, मुख्यमंत्री से लेकर राज्यसभा सांसदों , एवं पूर्णरूपेण आन्दोलनजीवयों का अविष्कार हो गया परंतु आंदोलन जैसा पुण्य भाव कंही समाप्त हो गया । समय बीतता गया देश में सत्ता परिवर्तन हुआ देश अखण्डता और समग्रता की तरफ अग्रसर होने लगा तथापि कुछ लोगों की जीविका का साधन आंदोलन बन गए तो उन्हें रोज भोजन एवं काम के रूप आन्दोलनों की प्रतीक्षा रहने लगी । वो अपनी क्षणिक प्रसिद्धि में ये भूल जा रहे हैं कि देश में रहकर देशवासियों के हित में आंदोलन किया जाए या विदेशी ताकतों की टूलकिट का एक टूल बनकर उपयोग हुआ जाए । एक समय था देश में जब आंदोनलकारी हुआ करते थे वो हमेशा परिधि के भीतर जाकर संघर्ष करते थे । देश और आंदोलन की अस्मिता को बरकरार रखा जाता था । एक द्रष्टान्त यंहा स्मरण आता है कि गाँधी जब असहयोग आंदोलन चला रहे थे । पुलिस एवं आंदोलन में भाग ले रहे जनमानस के बीच टकराव हुआ एवं 4 फरवरी 1922 को आक्रोशित भीड़ द्वारा थाना जला दिया गया । गोरखपुर के समीप चौरा चौरी कांड के नाम से जाना जाता है जिसमें 3 नगरिकों समेत 22 पुलिसकर्मियों की जान गई । तथापि आंदोलन देश की स्वातंत्रय समर का हिस्सा था चूंकि गांधी के जीवन मूल्यों एवं आंदोलन की अस्मिता में अहिंसा समाहित थी ।  इस घटना में हुई हिंसा से गांधी ने देश भर में ये आंदोलन तत्काल प्रभाव से समाप्त किया । क्योंकि गांधी के चिंतन में आंदोलन एक क्षणिक लाभ लेने वाली फुलझड़ी नही है । गांधी के चिंतन में आंदोलन एक चिंगारी है जो सहज सहज ज्वालामुखी बने वो भी अपने भाव व प्रकृति को विकृत किये बगैर । आज आंदोलनकारी नही रहे आंदोलनजीवीयों की प्रजाति परजीवी के रूप में उतपन्न हो गए हैं । यंहा हमे “जीवी” और “कारी” दोनों का शाब्दिक अर्थ भी समझना होगा जीवी अर्थात किसी पर जीवन यापन करने वाला अपनी जीविका चलाने वाला जैसे श्रमजीवी श्रम से जीवन यापन करता है बुद्धिजीवी बुद्धि ज्ञान आदि के बल पर जीविकोपार्जन करता है । वैसे ही आज के ये आंदोलनजीवी हैं जो आंदोलनों से अपना जीवन यापन कर रहे हैं । “कारी” अर्थात करने वाला उसमें किसी भी प्रकार का लोभ न देखने वाला वो होता है जिसका भाव मात्र ..

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ गीता जी (2-47)

की जैसी पवित्रता से उद्धत है ।

समीर कौशिक

जो अनेकता में एकता को संचारित करते हुए राष्ट्र समाज को एक सुत्र में बांधे । दिन भर आपस में वैचारिक मतभेद करते हुए द्वंद करे परंतु रात्रि को सामने के पक्ष के पास जाकर उनकी कुशल क्षेम भी करें ।आज हमारे सामने एकता में अनेकता करने वाले चेहरे हैं । जो सुनियोजित प्रायोजित आंदोलन करते हैं गांधी और बाबासाहेब के झण्डे लगाते हैं परंतु गांधी के असहयोग आंदोनल से सिखते नही । अपितु देश की अस्मिता सुरक्षा अखण्डता से खिलवाड़ करते हैं गणतंत्र दिवस पर देश मे गण और तंत्र दोनों का अपमान करते हैं । गांधी इन आन्दोलनजीवों के सिर्फ पोस्टर ब्वाय हैं बाकी सब तो टूलकिट जैसी पोस्टल सेवाओं पर निर्धारित है । ये सब अनेक स्थानों पर दिखने वाले वही व्यवसायी आन्दोलनजीव हैं जिनका व्यवसाय आंदोलन है इनमें मेगा पाटकर जैसा कोई स्वयं को पर्यावरण कार्यकर्ता कहता है परंतु पर्यावरण इनके लिये अंशकालिक कार्य है । मुख्यत: ये देश में आंदोलन भक्षण से अपनी क्षुदा शांत करती हैं । ऐसे ही एक राजनैतिक विश्लेषक हैं योगेंद्र यादव जो अन्ना आंदोलन के बाद अपना विश्लेषण भी नही कर पाए और समाजिक राजनैतिक रूप से हाशिये पर जाने के बाद इन्होंने भी आंदोलन पर्यटन आरम्भ किया हुआ है । चाहे कहने को अधिवक्ता प्रशांत भूषण हों या अन्य कोई भी ऐसे चेहरे जो सिर्फ आंदोलन घुमन्तु हैं । जिन्हें कोई भी आंदोलन देश में दिखे ये अपना तंबू वंहा गाड़ लेते हैं और आदोंलन को दिशा हीन तर्क हीन तथ्य हीन करके सिर्फ टूलकिट के आधार पर उसे चलाते हैं । जिसका परिणाम हमेशा हिंसा है चाहे CAA के विरोध में , 370 हो या किसान के नाम पर ये सब जगह पाए जाते हैं । किसान के नाम पर जीवन यापन करने वाले एक साहब हैं जिनकी खुद की  सम्पत्ति इन्हीं आंदोलनों के चलते चलते आज कई सौ गुना है । किसानी जिनका अंशकालिक कार्य है पूर्णरूप से तो वो भी आंदोलन की तलाश में ही रहते हैं । घ्यान में आता है कि आंदोलनों से पूर्व उनके पास कोई 8-10 बीघा जमीन थी वर्तमान में करोडों की संपत्ति कई सौ बीघा जमीन पैट्रोल पंप, होटल लग्ज़री गाड़ियां आलीशान बंगले हैं । देश को अराजकता के मुँह में धकेल कर राजधानी में अराजकता करवा कर अपने डंडे के झंडे में गांधी की आत्मा को लपेटकर अब पुनः एक बार लाखों ट्रेक्टर दिल्ली में लाने की धमकियां सरकार को दे रहे हैं सामान्य मानस को भयभीत कर रहे हैं । आज आंदोनल के नाम पर देश में सिर्फ भय अराजकता हिंसा का वातावरण निर्माण करके देश की चुनी हुई सरकारों को दबाव में लेकर अपनी राजनीति खड़ी करने के अवसर तलाशे जा रहे हैं । अन्यथा संवाद में हर विवाद का समाधान है परंतु ये लोग संवाद नही उत्पात चाहते हैं । आज इन आन्दोलनजीवियों का बस एक ही काम है कि किस प्रकार से स्वयं पर जमी धूल हटे । हमें कैमरा मिले अखबार में छपें अपनी बातों में जनसामान्य को भावुकता के आधार पर बहकाकर उनके आवेश को अपने राजनैतिक हितपूर्तियों के लिए उपयोग कर स्वयं के लिए राजनैतिक जमीन खड़ी करना । जिनकी जमीन खड़ी हो चुकी है वो इसे और विस्तारित करने में लगे हैं । इन्हें देश से देश की अखण्डता सुरक्षा से कोई लेना देना नही क्योंकि इनकी टूलकिट ही विदेशी है । ऐसे आन्दोलनजीवियों से हमे सावधान रहना होगा ये कालनेमि हैं जो देश को आत्मनिर्भरता रूपी संजीवनी देने वाले सामान्य करदाता सामान्य व्यवसायी नौकरीपेशा हनुमान को विचलित दिगभर्मित एवं दुर्बल करने में लगे हैं ।

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