प्रशांत उमराव समेत जारी हुई लखनऊ से एक दर्जन मीडिया पैनलिस्टों की सूची, त्यागी बने प्रवक्ता

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ढाई दर्जन सोशल मीडिया इन्फ्लुएंर्स से मिले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। श्री योगी का वक्तव्य सुनने के बाद यह स्पष्ट था कि प्रदेश भाजपा अब 2022 के चुनाव के मैदान में उतर गई है

आशीष कुमार

”भारतीय जनता पार्टी उत्तरप्रदेश के मीडिया पैनलिस्ट बनने पर आदरणीय श्री प्रशांत उमराव भैया जी को हार्दिक शुभकामनाएं व बधाई। काशी विश्वनाथ आपको ऊर्जावान रखे ताकि हम सब मिलकर विरोधियों की बखिया उधेड़ दें।”

आरती मिश्रा नाम के सोशल मीडिया यूजर ने पेशे से अधिवक्ता और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर प्रशांत उमराव को टैग करके अपनी शुभकामना प्रेषित ​की।

प्रशांत समेत बारह लोगों को मीडिया पैनलिस्ट बनाया गया है, गुरुवार को भाजपा के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह के हस्ताक्षर से यह जानकारी सार्वजनिक की गई।

गुरुवार को ही मेरठ के अवनीश ​त्यागी पार्टी के प्रवक्ता नियुक्त किए गए। उनके साथ एक दर्जन मीडिया पैनलिस्टों की सूचि जारी की गई। जारी सूचि के अनुसार — ओमप्रकाश सिंह, संजीव मिश्रा, राजेश चौधरी, राघवेन्द्र सिंह, डॉ. कौशल मिश्रा, अमृता, प्रशांत कुमार उमराव, शरतेन्दु त्रिवेदी शरद, दीपक बघेल, दीपक सोनकर, कृष्ण मोहन पांडेय और एसएन सिंह को मीडिया पैनलिस्ट घोषित किया गया है।

सोशल मीडिया संवाद 2021

यह फैसला अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर अहम हो सकता है। ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश अब पूरी तरह चुनावी रंग में रंग चुका है और सरकार सोशल मीडिया के महत्व को समझ रही है। गुरुवार को भाजपा रुझान वाले सोशल मीडिया इन्फ्लुएंर्स से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जूम पर सोशल मीडिया संवाद किया। संवाद में कपिल मिश्रा, तेजिन्दर पाल सिंह बग्गा, प्रशांत उमराव, प्रीति गांधी, शेफाली वैद्य, प्रदीप भंडारी के साथ लगभग 30 सोशल मीडिया इन्फ्लुएंर्स शामिल हुए।

अपने वक्तव्य में श्री योगी ने इस बात का उल्लेख भी किया कि सोशल मीडिया पर हमारी बात को प्रमुखता से रखने वाली जो टीम है, उसमें लगभग ढाई दर्जन प्रमुख नाम संवाद में शामिल हुए। आज श्री योगी का वक्तव्य सुनने के बाद यह स्पष्ट था कि प्रदेश भाजपा 2022 के चुनाव की तैयारी में जुट गई है।

नेपथ्य के नायकों का प्रतिनिधि दस्तावेज है ‘कोरोनानामा’

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पुस्तक के अध्ययन के पश्चात् यह साफ होता है कि कोरोना संकट के कोपाकुल-काल के दौर में हमारे समाज के वरिष्ठ नागरिकों की भूमिका और उसके विभिन्न पहलुओं पर केन्द्रित बेहद गंभीर चिंतन हुआ है। इसके लिए संपादक के मार्गदर्शन और कौशल के साथ-साथ इस संग्रह में शामिल आठों रिपोर्टरों क्रमश: अमृता मौर्य, डॉ. उपेन्द्र पाण्डेय, दीक्षा मिश्रा, डॉ. अरुण प्रकाश, अर्चना अरोड़ा, अमन तिवारी, अल्पना बिमल और विनय कुमार की गंभीरता, चुनौतियों और संवेदनशीलता को स्पष्ट महसूस किया जा सकता है

डॉ. पवन विजय

पुस्तक ‘कोरोनानामा: बुजुर्गों की अनकही दास्तान’ अपनी शैली की दृष्टि में रिपोर्ताज है। इसमें वैश्विक महामारी कोविड-19 के दौरान हुए देशव्यापी लाॅकडाउन के कारण उपजी विसंगतियों की आठ विशिष्ट रिपोर्ट्स शामिल हैं, जोकि देश के अलग-अलग हिस्सों से संकलित की गयी हैं।कोरोनानामा कई मायनों में विशेष पुस्तक कही जा सकती है, जिसका हिन्दी साहित्य की यात्रा में भी विशेष अवदान माना जाना चाहिए। इस क्रम में इससे संबंधित सबसे पहली बात तो यह है कि कोरोनानामा जैसा कि अपने शीर्षक से ही स्पष्ट है कि यह कोरोनाकाल का एक सशक्त दस्तावेज सिद्ध है। यह बहुत अच्छा प्रयास माना जाता है कि आप वैश्विक महामारी का सजीव दस्तावेज अपने पास रखें। भारत और खासकर हिन्दी भाषियों के लिए यह एक अच्छी बात है कि उनके पास कोरोनानामा जैसा ग्रंथ उपलब्ध हो गया है, जो हमारी आने वाली पीढ़ियों को इस वैश्विक महामारी का जीवंत सनद प्रस्तुत करेगा। यूँ तो प्राय: वैश्विक महामारी के करुण दस्तावेज संकलित करने की संभावना अधिक होनी चाहिए या रहती है, लेकिन कोरोनानामा के संकलनकर्ता अमित राजपूत की इस दृष्टि की जमकर प्रशंसा की जानी चाहिए कि उन्होंने वैश्विक महामारी के सकारात्मक दस्तावेज हमारे सामने लाकर प्रस्तुत कर दिये।पुस्तक की दूसरी विशेषता यह है कि इस आठ रिपोर्ट्स के संकलन से गठित रिपोर्ताज-संग्रह कोरोनानामा में सभी बुजुर्गों की कहानियाँ हैं। आज के दौर में बुजुर्गों पर केन्द्रित कोई काम कम ही दिखता है और पुस्तक लेखन में खासकर हिन्दी में और भी कम। इसलिए हिन्दी भाषा में बुजुर्गों पर केन्द्रित पुस्तक तैयार करने के लिए भी इसके संपादक अमित राजपूत न केवल प्रशंसा के पात्र हैं, बल्कि उन्हें इसके लिए बधाई भी दी जानी चाहिए।

पुस्तक लोकार्पण

पुस्तक के अध्ययन के पश्चात् यह साफ होता है कि कोरोना संकट के कोपाकुल-काल के दौर में हमारे समाज के वरिष्ठ नागरिकों की भूमिका और उसके विभिन्न पहलुओं पर केन्द्रित बेहद गंभीर चिंतन हुआ है। इसके लिए संपादक के मार्गदर्शन और कौशल के साथ-साथ इस संग्रह में शामिल आठों रिपोर्टरों क्रमश: अमृता मौर्य, डॉ. उपेन्द्र पाण्डेय, दीक्षा मिश्रा, डॉ. अरुण प्रकाश, अर्चना अरोड़ा, अमन तिवारी, अल्पना बिमल और विनय कुमार की गंभीरता, चुनौतियों और संवेदनशीलता को स्पष्ट महसूस किया जा सकता है। पुस्तक की एकलयता परस्पर सभी रिपोर्टरों और संपादक के आपकी समन्वय की ओर भी ध्यान इंगित कराता है। इस किताब की लयबद्धता और प्रवास इस बात का समर्थन भी करती हैं।संपादक की एक और दृष्टि की ओर मैं आपकी दृष्टि ले चलने का प्रयास करूँगा; और वो है, इन रिपोर्ट्स के पात्रों की खोज और उन्हें संकलन में शामिल किये जाने के निश्चय की निडरता। जी हाँ, किसी भी समाज के किसी भी दौर में नेपथ्य के नायकों का रेखांकन उजले ढंग से कभी नहीं किया गया। किन्तु कोरोनानामा तो नेपथ्य के नायकों का ही मजबूत दस्तावेज है। ऐसे में, इस पुस्तक के उद्देश्य को हम सर्व समाज एवं वर्ग के लिए उपयोगी, अंतिम जन के लिए भी रुचिकर और लोक-कल्याकारी पुस्तक कह हैं। और सरल तरीके से इसे हम यह भी कह सकते हैं कि पुस्तक कोरोनानामा हमारे बुजुर्गों के प्रति हमारी दृष्टि को बदलने वाली और उनके प्रति चिन्तन को हमें प्रेरित करने वाली पुस्तक है। हालाँकि यह इतना आसान भी नहीं है। इसका हल पुस्तक में ही पृष्ठ- 27 में उल्लिखित है कि “परिवार, समाज और सरकार तीनों की जिम्मेदारी बनती है कि वह वरिष्ठ-जनों की सुविधाओं का ख्याल रखें।”बहरहाल, कोरोना के लाॅकडाउन में पुस्तक के संकलनकर्ता और संपादक के प्रयास से समाज के विभिन्न क्षेत्रों और सुदूर गाँवों की रिपोर्टों से पाठकों को रूबरू कराना और वैश्विक बहस में वरिष्ठ-जनों की भूमिका को प्रमुखता से रेखांकित करना बहुत ही महती और बहादुरी का काम किया गया है।एक दिलचस्प बात यह भी है इस पुस्तक की कि हिन्दी साहित्य के आधुनिक इतिहास में मुख्यधारा में दशकों से रिपोर्ताज नहीं लिखे गये हैं। अमित राजपूत की पुस्तक कोरोनानामा ने इस सूखे को भी समाप्त कर दिया है और हिन्दी साहित्य के विकास में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ दी है। इसी के साथ यह पुस्तक समयानुकूल है और वरिष्ठ-जनों के जीवन पर उपलब्ध हिन्दी-साहित्य में भी अपना एक प्रमुख योगदान देती है। इसकी भाषा ललित और परिमार्जित है। जमीनी स्तर की रिपोर्ट की वैशिष्ट्यता और उसका बोध भी कोरोनानामा को ऊँचा मकाम देता है। एक ओर इसमें शामिल आठ रिपोर्ट हमें सिंगल सिटिंग में बैठकर पढ़ लेने का रोमांच देते हैं, तो इसमें शामिल रिपोर्टों की बेहद सीमित संख्या हमें और जानने व पढ़ने की जिज्ञासा के वास्ते हमें निराश भी कर देती है। बावजूद इसके कोरोनानामा को एक जरूरी पुस्तक के तौर पर रेखांकित किया जाता है।


पुस्तक का नाम: कोरोनानामा: बुजुर्गों की अनकही दास्तान
संपादक: अमित राजपूत
प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली।
मूल्य: 175 रुपये मात्र/-

पाटलिपुत्र इंटरसिटी ट्रेन के परिचालन के लिए चंपारण के गौरव मिश्र ने रेल मंत्री से किया आग्रह

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अब, जबकि कोविड के बाद की स्थिति में आवश्यक ट्रेनों का परिचालन पूरे देश में आरम्भ होने लगा है, ऐसे में उक्त ट्रेन के परिचालन की आवश्यकता अहम है।

गीतांजलि शर्मा

देश में प्रतिष्ठित लोक नीति विश्लेषक और स्थानीय रामगढवा मौजे ग्राम निवासी गौरव कुमार मिश्र ने केंद्रीय रेल मंत्री को पत्र लिख कर रक्सौल पाटलिपुत्र इंटरसिटी एक्सप्रेस के परिचालन को आरंभ करने की मांग की है।

पत्र में उन्होंने लिखा है कि चंपारण अपनी ऐतिहासिक विरासत के साथ न केवल भारत के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि वैश्विक स्तर पर इसकी अमिट छाप है। ऐसे में चंपारण के विकास की बात राष्ट्रीय मुद्दा है। साथ ही चंपारण वासी होने के कारण उनके लिए यह व्यक्तिगत महत्व भी रखता है।

उन्होंने राज्य की राजधानी को चंपारण से जोड़ने वाली इंटरसिटी ट्रेन के परिचालन के मुद्दे को गंभीर समस्या बताते हुए इसे तत्काल शुरू करने की मांग की है। पत्र में उन्होंने लिखा है कि माननीय प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में भारत का प्रत्येक क्षेत्र विकास के नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है.। देश का प्रत्येक भाग विकास की मुख्यधारा में शामिल हो रहा है। किन्तु विडंबना है या अधिकारियों की उदासीनता कि बिहार के उत्तर में अवस्थित पूर्वी और पश्चिमी चंपारण के लोग आज अपने प्रदेश के मुख्यालय तक पहुँचने के लिए एक अदद सार्वजनिक परिवहन के अभाव से जूझ रहे है।

इस पर गहरा दुख जताते हुए उन्होंने कहा है कि यह अत्यंत दुखद स्थिति है कि चंपारण वासी अपने अंतर्राष्ट्रीय महत्व को याद कर गौरवान्वित तो होते हैं, किन्तु इस प्रकार की मूलभूत सुविधा से वंचित हैं।

उन्होंने कहा है कि विगत कई वर्षों से रक्सौल- सुगौली- पाटलिपुत्र इंटरसिटी एक्सप्रेस ट्रेन (05201 और 05202 ) का परिचालन हो रहा था, जिससे दोनों चंपारण के लोग और नेपाल सीमा से लगे होने के कारण नेपाल के नागरिक भी इसका लाभ ले रहे थे। किन्तु करीब 2 वर्ष पूर्व कोविड के कारण इसका परिचालन बंद कर दिया गया। इससे परिवहन की असुविधा से लोगों को अपार कष्ट हो रहा है और इसके साथ राजस्व की हानि भी हो रही है।

अब, जबकि कोविड के बाद की स्थिति में आवश्यक ट्रेनों का परिचालन पूरे देश में आरम्भ होने लगा है, ऐसे में उक्त ट्रेन के परिचालन की आवश्यकता अहम है।

पत्र में उन्होंने सभी चंपारण वासियों की तरफ से उक्त ट्रेन के परिचालन को पूर्व स्थिति की भाँति आरम्भ कराने हेतु निवेदन किया है। जिससे न केवल प्रतिदिन सैकड़ो यात्रियों को लाभ होगा बल्कि इससे रेल राजस्व की वृद्धि भी होगी। इसके साथ ही राज्य की राजधानी से अंतर्राष्ट्रीय सीमा क्षेत्र का संपर्क भी स्थापित हो सकेगा।

पूर्व वीसी प्रो जुयाल बने बीटीएसएस के पहले राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष

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-प्रो. जुयाल बोले, तिब्बत मुक्ति-यज्ञ को परिणाम तक पहुंचाने की है यह जिम्मेदारी

हिमाचल प्रदेश के कार्यकर्ताओं में अपार हर्ष

भारत-तिब्बत समन्वय संघ की कोर कमेटी की बैठक में प्रथम राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्यातिनाम वैज्ञानिक प्रो प्रयाग दत्त जुयाल को सर्वसम्मति से चुना गया। प्रो जुयाल प्रसिद्ध पशु विज्ञानी हैं और गत वर्ष जबलपुर (मध्य प्रदेश) के नानाजी देशमुख वेटरनरी साइंस यूनिवर्सिटी के कुलपति के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं।

 प्रो जुयाल के नाम का प्रस्ताव केंद्रीय संयोजक श्री हेमेन्द्र तोमर ने रखा, जिसे सभी सदस्यों ने पूर्ण सहमति से पारित कर दिया। उत्तराखंड के मूल निवासी प्रो जुयाल वर्तमान में देहरादून में निवास कर रहे हैं और अब तक बीटीएसएस की केंद्रीय परामर्शदात्री समिति (सीएसी) के माननीय सदस्य के रूप में नियुक्त थे। इनके बारे में केंद्रीय संयोजक श्री तोमर ने बताया कि प्रो जुयाल की तिब्बती मामलों में सक्रियता और सूझ बूझ के साथ काम करने की उनकी आक्रामक कार्यशैली के कारण संघ के कार्यकर्ताओं में बहुत उत्साह दिखने लगा था। इस नाते उनके इस ऊर्जा से संघ को एक अच्छे, कुशल और परिणाममूलक नेतृत्व मिलने के विश्वास पर उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष दायित्व पर चुना गया। श्री तोमर ने कहा कि इसी वर्ष मकर संक्रांति के दिन संघ की स्थापना और मार्च में सरकारी स्तर पर पंजीकरण के बाद यह नियुक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उधर, इसके बाद संघ के कार्यकारी अध्यक्ष प्रो जुयाल ने अपने अधिकारिक बयान में कहा कि इस निर्णय को शिरोधार्य करते हुए अब तिब्बत-स्वातंत्र्य और कैलाश मुक्ति साधना में इस प्रकार लगना है कि विश्व समुदाय को इन उद्देश्यों में प्रभावी रुप से बीटीएसएस का ही कार्य दिखेगा। उन्होंने कहा कि तिब्बत की आज़ादी अब हम भारत वासियों के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। चीन को अब समझना होगा कि हम आध्यात्मिक  शक्ति के केंद्र भारत में जिस दिन पूर्ण जन जागरण हो जाएगा, उस दिन चीन न केवल तिब्बत छोड़ भाग खड़ा होगा बल्कि खुद भी कई भागों में विखंडित हो जाएगा। उन्होंने कहा कि तिब्बती समाज को शत्रु-संघर्ष में अपना मुखर  योगदान देने की आवश्यकता है क्योंकि  चीन पूरी तरह से कपटी और धूर्त देश है। कार्यकारी अध्यक्ष ने कहा कि यज्ञ तो अब शुरू हुआ है तो पूर्णाहुति दे कर हम ही अब क्रांति की निर्णायक स्थिति तय करेंगे। बाबा भोलेनाथ  और भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को आत्मसात कर शत्रु शमन कर विश्वशांति स्थापित करने का संकल्प संघ का है और इसमें हम सफल होंगे।

प्रो प्रयाग दत्त जुयाल

इस अवसर पर, बीटीएसएस और प्रो जुयाल को मिल रही लगातार बधाइयों के बीच राष्ट्रीय महामंत्री द्वय विजय मान व अरविंद केशरी ने कहा कि प्रो जुयाल जिस प्रकार तिब्बती समुदाय के लिए हितचिंतक के रूप में निरन्तर कार्य कर रहे थे, वह वास्तव में अनुकरणीय है। उनकी काम करने की सहयोगात्मक शैली ने ही सब को अभिभूत कर दिया था। देश-विदेश से और साधु-संतों से मिल रही बधाई के बीच हिमाचल प्रदेश के प्रांत अध्यक्ष बी आर कौंडल (हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक सेवा (सेवानिवृत), अध्यक्ष-हि.प्र. भूमि अधिग्रहण मंच) तथा प्रान्त उपाध्यक्ष प्रोफेसर मनोज सक्सेना (शिक्षा शास्त्र के आचार्य, हिमाचल केंद्रीय विवि, धर्मशाला) ने कहा कि यह संघ के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है तथा प्रोफेसर जुयाल जी कि दूरगामी सोच एवं मार्गदर्शन से संघ को बल मिलेगा। राष्ट्रीय नेतृत्व में प्रत्यक्ष बागडोर प्रो जुयाल को देने से बहुत अच्छा परिणाम मिलेगा। यह विश्वास है कि संघ की गति जो पहले से ही द्रुत थी, अब महाद्रुत हो जाएगी। हिमाचल प्रदेश के प्रान्त संयोजक (शोध व विकास प्रभाग) डॉ सचिन श्रीवास्तव (गणित विभाग के सहायक आचार्य, हिमाचल केंद्रीय विवि, धर्मशाला), राष्ट्रीय अध्यक्ष (महिला विभाग) श्रीमती नामग्याल सेकी (प्रखर विधि-विशेषज्ञ, पूर्व तिब्बतियन सुप्रीम जस्टिस कमीशन सलाहकार व अधिवक्ता), राष्ट्रीय संयोजक (अन्तराष्ट्रीय सम्बन्ध प्रभाग) डॉ अमरीक सिंह ठाकुर, प्रान्त उपाध्यक्ष श्री तेनजिन सुन्ग्रोप तथा राष्ट्रीय सह-संयोजक (प्रचार व आई टी प्रभाग) श्री अखिलेश पाठक इत्यादि संघ के सक्रिय कार्यकर्ताओं ने कहा कि प्रो जुयाल के पाण्डित्य से संघ बहुत आगे बढ़ेगा और विश्व स्तर पर तिब्बत मुक्ति की पहचान बनेगा।

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