पत्रकारों से मारपीट के मामले में कांग्रेस नेता पर शिकंजा कसा

पटना पुलिस की विशेष टीम ने कांग्रेस पार्टी के उस नेता को  गिरफ्तार कर लिया है, जिस पर नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान मीडियाकर्मियों के साथ मारपीट करने का आरोप लगा था। बताया जा रहा है कि ये नेता पिछले कुछ दिनों से फरार थे और पुलिस इनकी तलाश में थी।

ज्ञात हो कि 21 दिसंबर को नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ आरजेडी की ओर से बिहार बंद का आह्वान किया गया था। पटना में हुए इस प्रदर्शन में कांग्रेस नेता आशुतोष शर्मा भी अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ मौजूद थे। डाक बंगला चौराहे पर उनकी झड़प प्रदर्शन को कवर कर रहे मीडियाकर्मियों से हो गई। उन्होंने पत्रकारों को कवर करने से रोकने की कोशिश की, जिसका विरोध करने पर कांग्रेस नेता न केवल मारपीट करने पर उतारू हो गए, बल्कि वहां मौजूद असामाजिक तत्वों को भी मारपीट के लिए उकसाने लगे।

इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने कई पत्रकारों के साथ मारपीट की, जिसमें ‘रिपब्लिक टीवी’ के सीनियर एडिटर प्रकाश कुमार, कैमरामैन सूरज, ‘दैनिक जागरण’ के फोटोग्राफर दिनेश कुमार और फोटोग्राफर मोहन शर्मा घायल हो गए थे। इस घटना के दौरान पत्रकारों के कैमरे, मोबाइल समेत अन्य उपकरणों को भी तोड़ डाला गया था।

मारपीट की यह घटना कैमरे में भी कैद हो गई, जिसके बाद इसकी निंदा न केवल सरकार ने, बल्कि कई विपक्षी दलों ने भी की।  पुलिस के आला अफसरों के निर्देश पर कोतवाली थाने में आशुतोष शर्मा और अज्ञात लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया, जिसके बाद से ही वे फरार थे।

बुधवार को पटना पुलिस की विशेष टीम ने कोतवाली थाने के सहयोग से इसी मामले में आशुतोष शर्मा को गिरफ्तार कर लिया। फिलहाल आशुतोष शर्मा को पटना पुलिस ने रंगदारी सेल में रखा है। जल्द ही उन्हें कोर्ट ले जाया जाएगा। गौरतलब है कि आशुतोष पटना जिला ग्रामीण कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष हैं।

ट्विटर से ‘तौबा’ करने का मन बना लिया है BBC ने

जल्द से जल्द ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने के लिए जहाँ एक तरफ तमाम मीडिया संस्थान सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर जोर दे रहे हैं  वहीं ‘बीबीसी’ (BBC) इससे तौबा करने का मन बना चुका है। ‘बीबीसी’ अपने पत्रकारों के लिए ट्विटर के इस्तेमाल को प्रतिबंधित करने पर विचार कर रहा है। यदि ऐसा होता है तो संवाददाताओं को खबरें ब्रेक करने या त्वरित विश्लेषण प्रदान करने के लिए इस ऑनलाइन प्लेटफार्म का इस्तेमाल न करने के लिए कहा जाएगा।

 इसका कारण ‘बीबीसी’ की पॉलिटिकल एडिटर लौरा कुएंसबर्ग का वह ट्वीट है, जिसकी वजह से मीडिया संस्थान को आलोचना का सामना करना पड़ा था। चुनाव अभियान के दौरान लौरा का एक ट्वीट चर्चा में रहा, हालांकि उन्होंने बाद में अपनी गलती स्वीकार कर ली, लेकिन तब तक बवाल काफी ज्यादा बढ़ चुका था। इसी के चलते बीबीसी यह पाबंदी लगाने पर विचार कर रहा है। 

लौरा कुएंसबर्ग ने ट्वीट किया था कि स्वास्थ्य सचिव मैट हेनकुक के समर्थक के साथ लेबर पार्टी के कार्यकर्ता ने मारपीट की, जबकि ऐसा कुछ नहीं हुआ था। लिहाजा, लौरा को फर्जी खबर फैलाने के लिए निशाना बनाया जाने लगा, साथ ही ‘बीबीसी’ की भी आलोचना हुई। लौरा की तरह ही ‘बीबीसी’ के उत्तरी अमेरिका के संपादक जॉन सोपेल के ट्वीट पर भी संस्थान को शर्मिंदगी उठानी पड़ी।

हाल ही में जॉन सोपेल ने एक ट्वीट किया था, जिसमें बराक ओबामा की अपने परिवार के साथ और डोनाल्ड ट्रम्प की बॉक्सर के गेटअप वाली फोटो थी, जिस पर लिखा था ‘थैंक्स गिविंग पोस्ट ऑफ बराक ओबामा और रियल डोनाल्ड ट्रम्प’। इस ट्वीट को लेकर जॉन के साथ-साथ ‘बीबीसी’ को भी निशाना बनाया गया।

‘द गार्जियन’ के अनुसार, बीबीसी की न्यूज एवं करंट अफेयर्स की निदेशक फ्रेंक अंसवर्थ पत्रकारों के ट्विटर के इस्तेमाल पर रोक लगाने का मन बना चुकी हैं। हालांकि, फ्रेंक के करीबियों का कहना है कि उनका इरादा सोशल मीडिया पर बैन का नहीं है, लेकिन वह ‘बीबीसी’ के सोशल मीडिया संबंधी दिशा-निर्देशों के कड़ाई से पालन के लिए कुछ कदम उठा सकती हैं।

 पिछले हफ्ते ‘चैनल4’ ने अपने ऐसे पत्रकारों के करेंट अफेयर्स से जुड़े मामलों पर ट्वीट करने पर प्रतिबंध लगाया था, जिनका राजनीतिक खबरों की कवरेज से सीधा जुड़ाव नहीं है।

चंद रिपोर्टरों की उत्साह से मीडिया कर बैठी बड़ी गलती

तमाम संगठन जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी के बाहर हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद  यूनिवर्सिटी में पुलिस के घुसने और छात्रों के साथ किए गए बर्ताव को लेकर अपनी-अपनी याचिकाएं लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। सुप्रीम कोर्ट ने एएमयू, जामिया और सिटीजनशिप एक्ट के विरोध में हुई हिंसा से जुड़ी कई याचिकाओं को एक साथ सुनना शुरू किया। सॉलिसिटर जनरल के बयान को लेकर मीडिया के लगभग सभी पत्रकारों ने गलत रिपोर्टिंग कर डाली। ब्रेकिंग चलना शुरू हो गई और देश के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से भिड़ गए जामिया के चीफ प्रॉक्टर वसीम अहमद।

दरअसल, देश के लगभग सभी बड़े न्यूज चैनल्स और वेबसाइट्स ने ब्रेकिंग खबर चलाई कि सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी कर रहे तुषार मेहता ने दावा किया है कि जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी में पुलिस तभी घुसी, जब वहां के चीफ प्रॉक्टर ने बाकायदा लिखित में पुलिस से इसकी रिक्वेस्ट की। उन्होंने लिखा कि कैसे उपद्रवी तत्व छात्रों के बीच मिलकर यूनिवर्सिटी का लॉ एंड ऑर्डर खराब कर रहे हैं। यह खबर वाकई में चौंकाने वाली थी, क्योंकि एक दिन पहले जामिया के प्रॉक्टर वसीम अहमद यह दावा कर चुके थे कि दिल्ली पुलिस बिना उनकी अनुमति के यूनिवर्सिटी कैंपस में घुसी। जामिया की वाइस चांसलर सलमा अख्तर ने भी यही दावा किया था।

 खबर ब्रेक होते ही मीडिया के सभी बड़े रिपोर्टर जामिया के चीफ प्रॉक्टर को फोन लगाने में जुट गए और कुछ तो उनके दफ्तर भी पहुंच गए। अब तक चीफ प्रॉक्टर को यह खबर लग चुकी थी। उन्होंने एक लिखित बयान जारी किया कि सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट में झूठ बोला है, मैंने इस तरह की कोई परमिशन या रिक्वेस्ट न ही दी और न मांगी बल्कि मैंने तो दिल्ली पुलिस की निंदा की थी। यही बात उन्होंने न्यूज़ एजेंसी ‘एएनआई’ को दिए विडियो इंटरव्यू में भी कही।

सरकार से सारी मीडिया इस बारे में बयान देने को कहने लगी। होम मिनिस्ट्री के अफसरों को फोन लगाया जाने लगा कि क्या सॉलिसिटर जनरल को कोर्ट में होम मिनिस्ट्री ने गलत जानकारी दी थी। लगभग 2 घंटे बाद यूपी पुलिस की तरफ से बयान आया कि सॉलिसिटर जनरल ने प्रॉक्टर की रिक्वेस्ट की जो बात कही थी, वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी यानी एएमयू के बारे में थी, न कि जामिया के बारे में और बाकायदा एएमयू के चीफ प्रॉक्टर का रिक्वेस्ट लेटर मीडिया के लिए जारी किया गया।

यानी कि मीडिया के चंद ‘उत्साही’ रिपोर्टर्स की वजह से सारा मामला गड़बड़ हो गया। ऐसा लगा कि सॉलिसिटर जनरल सुप्रीम कोर्ट में खड़े होकर सरासर झूठ बोल रहे हैं। लेकिन सारी की सारी मीडिया एक साथ क्यों गलत हो गई, उसकी वजह भी है। ज्यादातर रिपोर्टर्स कोर्ट के अंदर जाते ही नहीं है, वह बाहर लाइव पर खड़े रहते हैं और उनके साथी रिपोर्टर जो गिनती के होते हैं, वो वॉट्सऐस ग्रुप्स में खबर को डाल देते हैं और फिर पूरी मीडिया में वही मैसेज सर्कुलेट होता है। जाहिर है जिसने ग्रुप में डाला, यह गलती उसकी थी, उसे शायद कंफ्यूजन हुआ कि सॉलिसिटर जनरल ने एएमयू के बजाए जामिया पर ऐसा बोला है और उसी के चलते ये गलतफहमी पैदा हुई।

इस्लाम फोबिया और विश्व सिनेमा

अजित राय

बेल्जियम के ज्यां पियरे और लुक दारदेन की फिल्म ” यंग अहमद ”  दुनिया भर में कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों द्वारा जेहाद के नाम पर बच्चों के दिमाग में हिंसा का जहर घोलने की साज़िशों के खिलाफ एक सिनेमाई प्रतिरोध है।

हाल ही में संपन्न हुए भारत के 50 वें अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में ऐसी कई फिल्में  दिखाई गई जो इस्लाम फोबिया से ग्रस्त हमारी दुनिया में अंतर धार्मिक रीति-रिवाजों की टकराहट को सामने लाती है। समारोह की ओपनिंग फिल्म ” डिस्पाइट द फाग ” यूरोप में जारी मुस्लिम शरणार्थियों की समस्या की पृष्ठभूमि में एक अनाथ बच्चे की कहानी है ।सर्बिया के चर्चित फिल्मकार गोरान पास्कलजेविक ने यूरोपीय देशों में मुस्लिम शरणार्थियों की स्वीकृति और अस्वीकृति का मुद्दा उठाया है। इससे पहले वे उत्तराखंड में विक्टर बैनर्जी को लेकर ” देवभूमि ” फिल्म बना चुके हैं जिसे अमेजन पर करीब एक करोड़ लोग देख चुके हैं।

“डिस्पाइट द फाग ” युद्ध के खिलाफ एक राजनैतिक टिप्पणी है। यूरोप में जारी मुस्लिम शरणार्थियों के विरोध के घनघोर माहौल में गोरान पास्कलजेविक सवाल करते हैं कि कोई भी अपना देश और संस्कृति शौक से नही, मजबूरी में ही छोड़ता है। आठ साल का मोहम्मद स्वीडन से इटली आने के दौरान अपने पिता से बिछड़ गया है। रोम की सुनसान सड़क के बस अड्डे पर ठंड से बचने की असफल कोशिश करता है। रात गहरा रही है और सुबह से पहले कोई बस नहीं आएगी। रेस्त्रां मैनेजर पाउलो उसे अपने घर ले आता है। थोड़ी हिचकिचाहट के बाद उसकी पत्नी वेलेरिया उसे घर में रखने को राजी हो जाती है।

मोहम्मद अपनी मुस्लिम पहचान के प्रति सचेत है। वह कमरे में छुपकर नियम से नमाज पढ़ता है जबकि वेलेरिया उसमें अपने मर चुके बेटे मार्को की छवि देखने लगती है। क्रिसमस आने वाला है और सारा रोम उसकी तैयारी में लगा है। ईसाई संस्कृति से अनजान मोहम्मद को अकेलापन महसूस होता है और वह बार बार स्वीडन जाने की जिद करता है। फिल्म में धार्मिक रीति-रिवाज को लेकर कई बहसें है। अधिकतर इसाई परिवार मोहम्मद को रखने के खिलाफ है। क्रिसमस की सुबह पाउलो के कहने पर मोहम्मद को लेने पुलिस आती है पर तब तक वेलेरिया उसे लेकर स्वीडन की ओर निकल चुकी होती हैं। गहरी धुंध से भरी वीरान सड़क पर हम कार में वेलेरिया और मोहम्मद को दूर जाते हुए देखते हैं।

मास्टर फ्रेम खंड में  बेल्जियम के ज्यां पियरे और लुक दारदेन की फिल्म ” यंग अहमद ”  दुनिया भर में कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों द्वारा जेहाद के नाम पर बच्चों के दिमाग में हिंसा का जहर घोलने की साज़िशों के खिलाफ एक सिनेमाई प्रतिरोध है।  13 साल का अहमद एक मौलवी के चक्कर में जेहादी बनना चाहता है। वह जेहाद के अभ्यास के लिए अपनी ईसाई टीचर की हत्या का असफल प्रयास करता है। उसे सुधारने के लिए एक फार्म हाउस में रखा जाता है। फार्म हाउस के मालिक की बेटी लूइस  एक दिन उसे प्यार से चूम लेती है। अहमद को लगता है कि वह इस चुंबन से अपवित्र हो गया और उसका जेहाद खतरे में पड़ गया। वह लूइस को कहता है कि उसके चुंबन से वह अपवित्र हो गया है इसलिए वह इस्लाम कबूल कर लें जिससे सब ठीक हो जाय। अहमद की मां, टीचर, जज, वकील, मनोवैज्ञानिक, सहपाठी, दोस्त – किसी को सपने में भी यकीन नहीं हो सकता कि अहमद जैसा मासूम बच्चा सच्चा मुसलमान बनने के लिए दूसरे की हत्या करने का निर्णय ले सकता है। फिल्म के यूरोप में मुस्लिम बच्चों के मनोविज्ञान को सादगी से सामने लाती है।

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