लोकतंत्र की नब्ज थमती जा रही है: भारतीय विश्वविद्यालयों में छात्रसंघों की वापसी वक्त की पुकार

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कभी लखनऊ, इलाहाबाद, बनारस, आगरा, दिल्ली, हैदराबाद, गोरखपुर, पटना के विश्वविद्यालयों की गलियों से गूंजती थी नारेबाजी, बहस, वैचारिक टकराव और एक नए भारत की परिकल्पना। वो दौर था जब हर छात्र नेता अपने वक्तव्य में एक आंदोलन की चिंगारी छिपाए रखता था। पर आज, उन गलियों में सन्नाटा पसरा है, छात्रसंघ भवन वीरान हैं और लोकतंत्र की सबसे अहम प्रयोगशाला – विश्वविद्यालय – राजनीतिक निष्क्रियता के बर्फीले साए में जकड़ी हुई है।

जिन्हें सियासत का हुनर आता था, वो अब नौकरी की दौड़ में उलझे हैं; और जो सत्ता का स्वाद जानते हैं, उन्हें छात्रों की चुप्पी रास आ गई है, सत्तर के दशक के छात्र नेता कहते हैं। याद कीजिए कुछ नाम, देवव्रत मजूमदार, चंचल, मोहन प्रकाश, सत्य देव त्रिपाठी, मोहन सिंह, मोहन प्रकाश, अरुण जेटली, रामजी लाल सुमन, राज कुमार जैन, शरद यादव, सीता राम येचुरी, एक लंबी लिस्ट युवा नेताओं की। और अब सूखा!!!

साठ और सत्तर के दशक में लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं ने छात्र राजनीति को जनक्रांति का औजार बनाया था। इमरजेंसी के दौरान कैंपसों से उठी ललकार ने सत्ता की चूलें हिला दी थीं। मगर नब्बे के दशक के बाद जैसे-जैसे निजीकरण का बोलबाला बढ़ा, विश्वविद्यालयों में विचार की जगह करियर काउंसलिंग ने ले ली। छात्रसंघों पर बैन, प्रशासनिक शिथिलता और ‘शांति व्यवस्था’ के नाम पर असहमति की हर आवाज़ को दबा दिया गया।

“जहाँ बहस नहीं होती, वहाँ बदलाव नहीं होता। और जहाँ बदलाव नहीं होता, वहाँ लोकतंत्र दम तोड़ देता है,” कहते हैं समाजवादी चिंतक प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी।”
छात्रसंघ, सिर्फ एक मंच नहीं थे – वे एक संस्कृति थे, जहाँ युवा नेतृत्व निखरता, नीति पर सवाल उठते और वैकल्पिक भविष्य के रास्ते खुलते थे। ये सभी नेता छात्र राजनीति के गर्भ से निकले। मगर अब वो गर्भ ही बंजर हो चुका है।

बिहार से लेकर महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश से लेकर गुजरात तक — कई राज्यों ने छात्रसंघ चुनावों पर रोक लगाकर एक सजीव लोकतांत्रिक परंपरा को कालकोठरी में डाल दिया है। “हंगामा होता है, पढ़ाई बाधित होती है,” ये तर्क अब कफन बन चुके हैं उस छात्र चेतना के लिए जो कभी सत्ता से सीधे सवाल पूछती थी।

NSUI की 2023 की रिपोर्ट बताती है कि छात्रसंघ की अनुपस्थिति में विश्वविद्यालय प्रशासन बिना जवाबदेही के फैसले करता है — हॉस्टल की दुर्दशा, फीस बढ़ोत्तरी, भेदभाव — सब पर छात्रों की कोई बात सुनी ही नहीं जाती। “शासन चला रहे हैं, संवाद नहीं” — यही आज के कैंपस का हाल है।
और इस गुमनामी का सबसे बड़ा खामियाजा भुगत रहे हैं हाशिए के तबके — दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और ग्रामीण पृष्ठभूमि से आए छात्र। 2024 के एक अध्ययन में पाया गया कि ऐसे छात्र जब तक यूनियनों के माध्यम से संगठित नहीं होते, तब तक उन्हें ‘राजनीतिक रूप से शक्तिहीन’ महसूस होता है। उनके मुद्दे — जातीय भेदभाव, लैंगिक उत्पीड़न, संस्थागत पक्षपात — अनसुने रह जाते हैं।जिस पीढ़ी को बोलने की आदत नहीं रही, वह कल सत्ता में चुपचाप अन्याय करेगी, कहती हैं सोशल एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर।
इस निष्क्रियता का असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी साफ़ दिखता है। एक तरफ वंशवादी पार्टियों का बोलबाला है, दूसरी तरफ कॉरपोरेट हितों की तर्जनी लोकतंत्र की दिशा तय कर रही है। नई आवाजें, नए विचार, नए नेतृत्व – सबकी जगह अब चाटुकारिता, उत्तराधिकार और चमचागिरी ने ले ली है।
क्या यह वही भारत है जहाँ गांधी ने छात्रों को ‘राष्ट्रनिर्माण की रीढ़’ कहा था? क्या यही वो विश्वविद्यालय हैं जहाँ एक समय, हर छात्र अपने भीतर एक आंदोलन को पालता था?

अब वक्त आ गया है – इस चुप्पी को तोड़ने का। छात्रसंघ चुनावों की बहाली कोई ‘राजनीतिक मांग’ नहीं, यह लोकतंत्र की पुनर्स्थापना की शर्त है। विश्वविद्यालय डिग्री वितरण केंद्र नहीं, विचार निर्माण स्थल होने चाहिए। उन्हें एक बार फिर बहस, आलोचना और वैचारिक टकराव का मैदान बनाना होगा।
राज्य सरकारों को चाहिए कि वो छात्रसंघों पर लगे प्रतिबंध हटाएं। विश्वविद्यालय प्रशासन को यह समझना होगा कि नियंत्रण से शांति नहीं, बल्कि निष्क्रियता जन्म लेती है। और राजनीतिक दलों को यह ज़िम्मेदारी लेनी होगी कि वो युवाओं को विचार के आधार पर आगे बढ़ाएं, न कि खानदान या संपर्क के आधार पर।

नेल्सन मंडेला ने कहा था, “Education is the most powerful weapon which you can use to change the world.” पर अगर शिक्षा का मंदिर ही राजनीति से काट दिया जाए, तो बदलाव कहाँ से आएगा? इसलिए, छात्र संघों को वापस लाइए। लोकतंत्र को फिर से सांस लेने दीजिए।

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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