चेन्नई के शोलिंगनलूर में स्थित श्री महा प्रत्यंगिरा देवी मंदिर केवल एक शक्तिपीठ नहीं, बल्कि दक्षिण भारतीय तंत्र, आगमिक परंपरा और अथर्वण विद्या का सजीव संगम है। मंदिर में प्रवेश करते ही साधक की यात्रा सामान्य भक्ति से सीधे गूढ़ तांत्रिक अनुभव की ओर मुड़ जाती है, और यह यात्रा शुरू होती है माँ वाराही के सान्निध्य से।
द्वार से भीतर आते ही सबसे पहले वाराही देवी का मंदिर दर्शन देता है। भूमितत्त्व, रक्षण और भौतिक सिद्धि से जुड़ी यह देवी यहाँ हल्दी की गांठों से पूजित होती हैं। हल्दी को प्राचीन शास्त्रों में पृथ्वी की गरिमा, रोग-नाश, आयु और तांत्रिक शुद्धि का प्रतीक माना गया है; वाराही को हल्दी अर्पित करना साधक के लिए ऐसा है मानो वह आगे की उग्र साधना से पहले अपने चारों ओर एक सुरक्षा वृत्त रच रहा हो। वाराही का यह प्रथम दर्शन और हल्दी समर्पण पूरे देवालय के अनुभव का ‘ग्राउंडिंग’ भाग है साधक पहले धरती से जुड़ता है, फिर अग्नि और आकाश की उग्रता में प्रवेश करता है।
वाराही के पश्चात जब साधक मुख्य गर्भगृह की ओर बढ़ता है तो उसकी ऊर्जा सीधे महा प्रत्यंगिरा देवी के मंडल में प्रवेश करती है। यहाँ देवी ‘नरसिंही’ रूप में प्रतिष्ठित हैं सिंहमुखी, उग्र, किंतु रक्षणकारी। वे वही शक्ति हैं जिन्हें वेदों में अथर्वण भद्रकाली के रूप में याद किया गया है, अर्थात् अथर्ववेद की मायावी, मंत्र तांत्रिक और रक्षात्मक शक्तियों की अधिष्ठात्री देवी। प्रत्यंगिरा को प्रति अंगिरा भी कहा गया ,जो प्रतिकूल या आक्रमक तांत्रिक ऊर्जा को पलटकर उसके प्रभाव को साधक से दूर कर देती है; इसीलिए उन्हें विशेष रूप से काला जादू, अभिचार और दुष्ट शक्तियों के निवारण से जोड़ा जाता है।

दक्षिण भारत की आगमिक परंपरा में ऐसे देवालय केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि विधिवत आगम निर्दिष्ट प्रयोगशालाएँ होती हैं। प्रत्यंगिरा देवी के होम, न्यास, यंत्र पूजन और महामंत्र जप के विस्तृत विधान दक्षिण भारतीय शक्त-आगमों और तांत्रिक परंपराओं में मिलते हैं, जिनमें देवी को विशेष रूप से रक्षण तत्त्व की मूर्तिमान शक्ति माना गया है। शोलिंगनलूर का यह पीठ उसी आगमिक धारा का आधुनिक रूप है यहाँ की होम शाला, अग्निकुंड, दिशा-विन्यास और अनुष्ठानिक क्रम यह संकेत देते हैं कि मंदिर की पूरी संरचना साधक की ऊर्जा परिवर्तन (ट्रांसम्यूटेशन) के लिए रची गई है, न कि केवल दर्शन के लिए।
मुख्य गर्भगृह के ठीक बाहर, दायीं ओर स्थित उच्छिष्ठ गणपति का स्थान इस देवालय के तांत्रिक चरित्र को और स्पष्ट करता है। उच्छिष्ठ गणपति गणेश के दुर्लभ तांत्रिक रूपों में गिने जाते हैं, जिन्हें शास्त्रों में उच्छिष्ट -अर्थात यज्ञोपरांत बचा हुआ, नियम-दृष्टि से ‘अपवित्र’ समझे जाने वाले अंश के अधिपति के रूप में वर्णित किया गया है। यह वही रूप है जिसमें गणपति वामाचार तंत्र में काम-शक्ति, इन्द्रिय नियंत्रण, वशीकरण और मंत्र-सिद्धि के अधिष्ठाता देव माने जाते हैं। उनके नाम और स्वरूप में ही यह शिक्षा छुपी है कि जिसे आम धारणा अपवित्र या त्याज्य मानती है, वही ऊर्जा सही मार्गदर्शन में साधक को बन्धन से मुक्त कर सकती है।
तांत्रिक दृष्टि से देखें तो वाराही-प्रत्यंगिरा-उच्छिष्ठ गणपति का यह क्रम अत्यंत अर्थपूर्ण है। द्वार पर वाराही जो स्थूल जगत की सुरक्षा, भोजन, स्वास्थ्य और भूमिगत भय को संतुलित करती हैं। गर्भगृह में महा प्रत्यंगिरा जो सूक्ष्म स्तर पर अभिचार, दृष्टदोष और अदृश्य हमलों को नष्ट करती हैं। और बाहर दाहिनी ओर उच्छिष्ठ गणपति जो साधक की इन्द्रियों, वासनाओं और ‘टैबू’ समझी जाने वाली ऊर्जा को साधना के पथ पर मोड़ने का बीज-मंत्र हैं। शास्त्रीय परंपराएँ उच्छिष्ठ गणपति को इन्द्रिय-विजय और वासना-परिवर्तन के देव के रूप में भी वर्णित करती हैं, जो वज्र की तरह उस कच्ची शक्ति को साधक के भीतर ही ऊपर की ओर मोड़ देते हैं।
अथर्ववेद, जहाँ भद्रकाली-प्रत्यंगिरा को जादुई और रक्षात्मक सूक्तों की अधिष्ठात्री माना गया, और दक्षिण भारतीय आगम, जहाँ देवी की प्रतिष्ठा, होम, यंत्र और मण्डल का विस्तृत विधान मिलता है – दोनों धाराएँ इस देवालय में एक साथ प्रकट होती हैं। यही कारण है कि शोलिंगनलूर प्रत्यंगिरा पीठ को केवल एक “लोकप्रिय मंदिर” कहकर नहीं समझा जा सकता; यह वास्तव में अथर्वण-विद्या, आगमिक शैव-शाक्त तंत्र और वामाचार गणपति–उपासना , इन तीनों की संयुक्त धारा का जीवित केन्द्र है।

जब कोई साधक इस मंदिर में प्रवेश करता है, वाराही के चरणों में हल्दी रखता है, मुख्य गर्भगृह में महा प्रत्यंगिरा की उग्र-करुणा को निहारता है, और बाहर दाहिनी ओर उच्छिष्ठ गणपति के स्थान पर दृष्टि टिकाता है, तो अनजाने ही वह एक संपूर्ण तांत्रिक सूत्र में प्रवेश कर चुका होता है -स्थूल से सूक्ष्म, भय से निर्भयता, और ‘अपवित्र’ मानी गई शक्ति से अंततः परम-शुद्धि तक की यात्रा। शोलिंगनलूर का यह मंदिर इसी कारण मेरे लिए केवल देवदर्शन का स्थल नहीं, बल्कि एक जीवित तांत्रिक विश्वविद्यालय है, जहाँ देवी स्वयं साधक को सिखाती हैं कि सुरक्षा, उग्रता और इच्छा ये तीनों यदि सही तरह साधे जाएँ तो मुक्ति का मार्ग बन जाते हैं।
(लेखिका तंत्र साधक और तंत्र विषय की शोधार्थी हैं)



