श्रीकृष्ण: प्रकृति के शाश्वत रक्षक और यमुना

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मथुरा । आज नदियाँ गंदी हो रही हैं, जंगल कट रहे हैं और जानवरों की कई नस्लें खत्म हो रही हैं। ऐसे में कृष्ण की शिक्षा हमें बताती है— प्रकृति की देखभाल करना हमारी ज़िम्मेदारी है। जो पेड़, नदी और जानवरों की रक्षा करता है, वही असली भक्त है।

श्री कृष्ण सिर्फ़ भगवान नहीं, बल्कि प्रकृति के सच्चे साथी थे। अगर हम उन्हें मानते हैं, तो हमें भी पेड़-पौधों, नदियों और जीव-जंतुओं की रक्षा करनी चाहिए। कृष्ण की पूजा तभी सच्ची है, जब हम प्रकृति की सेवा करें।

वृंदावन कृष्ण के लिए सिर्फ़ खेलने की जगह नहीं थी—वह उनकी ज़िंदगी का हिस्सा था। नदियाँ, पेड़, पहाड़, जानवर और पक्षी… सबके साथ उनका एक ख़ास नाता था। पेड़ों के दोस्त: कदंब के पेड़ों की छाँव में बैठकर वह बाँसुरी बजाते थे। उनकी मधुर धुन सुनकर पत्ते भी झूम उठते थे! गायों के पालक: गोपाल कृष्ण गायों को सिर्फ़ पालते ही नहीं थे, बल्कि उनसे बेपनाह मुहब्बत करते थे। जब कालिया नाग ने यमुना को ज़हरीला बना दिया, तो कृष्ण ने उसकी रक्षा की। वह यमुना को सिर्फ़ नदी नहीं, बल्कि अपनी सखी मानते थे।

आज जब संसार पर्यावरणीय संकटों से जूझ रहा है, श्री कृष्ण का जीवन हमें स्मरण कराता है कि मानव का भाग्य प्रकृति के स्वास्थ्य से ही जुड़ा है। अक्सर जब हम श्रीकृष्ण का स्मरण करते हैं, तो हमारी दृष्टि उनके रासलीला, गोपियों के साथ उनके दिव्य प्रेम, महाभारत में उनके पराक्रम, या भगवद्गीता के शाश्वत उपदेशों पर ठहरती है। किंतु श्रीकृष्ण के जीवन का एक अत्यंत गहरा और कम चर्चित आयाम है—प्रकृति के साथ उनका अतूट और भावनात्मक बंधन। कृष्ण के लिए वृंदावन केवल खेल का स्थल नहीं था, बल्कि एक जीवंत तपोभूमि थी—नदियों, वनों, पर्वतों, पशुओं और पक्षियों से गुंथी हुई एक पवित्र चादर, जिसे उन्होंने प्रेम और संरक्षण से संवार दिया।

यमुना के तटों से लेकर कदंब के उपवनों तक, कृष्ण की उपस्थिति उस भूमि से अभिन्न है जिसे उन्होंने पवित्र किया। बाल्यकाल में वे वृक्षों, नदियों और पशुओं के साथी बने। उनकी बांसुरी की तान केवल मनुष्यों को ही नहीं, बल्कि पशुओं, पक्षियों और वृक्षों को भी मोहित कर देती थी। हिरण, मोर, गायें, यहाँ तक कि पत्तों की सरसराहट भी उनके स्वर में बंध जाती थी, मानो सब पहचानते हों कि वही जीवन का मूल स्पंदन हैं। स्वयं कृष्ण गीता में कहते हैं—“मैं जल का स्वाद हूँ, सूर्य और चंद्रमा का प्रकाश हूँ, आकाश में ध्वनि हूँ और समस्त प्राणियों में जीवन हूँ।” (10.20)

श्रीकृष्ण की पर्यावरण रक्षक की छवि का सबसे अद्भुत प्रतीक है गोवर्धन पर्वत का धारण। जब इन्द्र ने प्रलयंकारी वर्षा कर वृंदावन को डुबोने का प्रयास किया, तब बालक कृष्ण ने अपनी छोटी अंगुली पर विशाल गोवर्धन पर्वत उठा लिया और समस्त ग्रामवासियों, गायों तथा वन्यजीवों को आश्रय दिया। यह केवल दिव्य पराक्रम नहीं था, बल्कि एक पर्यावरणीय संदेश भी था। कृष्ण ने अपने लोगों को समझाया कि पर्वत, जो चरागाह, जल और संसाधन देता है, उसी की पूजा होनी चाहिए। वे कहते हैं—“पर्वतों में मैं मेरु हूँ, नदियों में गंगा हूँ, वृक्षों में पीपल हूँ।” (गीता 10.24)

यमुना नदी के प्रति कृष्ण का प्रेम भी उतना ही शाश्वत है। यमुना उनके लिए केवल एक नदी नहीं, बल्कि एक प्रिय सखी थी। जब कालिया नाग ने उसके जल को विषाक्त कर दिया, तब कृष्ण ने यमुना की रक्षा हेतु जल में कूदकर उसे नाग से मुक्त कराया। उनकी वाणी में: “मैं पृथ्वी की सुगंध हूँ और सभी जीवों का जीवन हूँ।” (गीता 7.8)

कदंब वृक्षों की छाया में कृष्ण की बांसुरी को उसकी मधुरतम ध्वनि मिली। कदंब उनके प्रिय वृक्ष थे, जिनकी छाया और सुगंध ने उनकी लीलाओं को पवित्र किया। भागवत कहती है—“नदियाँ, पर्वत, वृक्ष और पशु सब दूसरों के हित के लिए जीते हैं। वैसे ही मनुष्य को भी जगत के कल्याण हेतु जीना चाहिए।” (10.22.35)

कृष्ण का प्रेम सबसे कोमल रूप से गौओं में झलकता है। गोपाल के रूप में वे उन्हें केवल पालते ही नहीं, बल्कि परिवार की तरह मानते थे। गायें उनके जीवन का केंद्र थीं, जो वृंदावन की पारिस्थितिकी संतुलन की धुरी थीं। कृष्ण ने दिखाया कि सादगी और कृतज्ञता से भरा जीवन ही सच्चा स्थायी जीवन है। वे कहते हैं—“यदि कोई मुझे प्रेम और भक्ति से एक पत्ता, एक पुष्प, एक फल या जल भी अर्पित करे, तो मैं उसे स्वीकार करता हूँ।” (गीता 9.26)

कृष्ण ने गीता में संतुलित आहार, कर्तव्य और त्याग को जीवन का आधार बताया। “सभी प्राणी अन्न पर जीवित रहते हैं, अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है, वर्षा यज्ञ से आती है और यज्ञ कर्तव्य से उत्पन्न होता है।” (गीता 3.14) इस प्रकार अध्यात्म और पर्यावरण उनके लिए अलग-अलग नहीं, बल्कि अभिन्न थे।

आज जब नदियाँ प्रदूषण से दम तोड़ रही हैं, वन कट रहे हैं, और असंख्य प्रजातियाँ लुप्त हो रही हैं, कृष्ण का वृंदावन हमें पुकारता है। वे हमें स्मरण कराते हैं कि प्रकृति की रक्षा करना ही अपने अस्तित्व की रक्षा है।

श्रीकृष्ण केवल राधा के प्रियतम या अर्जुन के सारथि ही नहीं थे—वे यमुना के संरक्षक, गोवर्धन के रक्षक, वृक्षों के मित्र और वनों के स्वर हैं। आज कृष्ण की आराधना का सच्चा अर्थ है—प्रकृति की आराधना।

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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