दिल्ली । अमित शाह की कथित “मास्टरस्ट्रोक” राजनीति ने बिहार में झंडा गाड़ दिया, अब सवाल यह है कि क्या वही हिंदुत्व की आंधी तमिलनाडु के द्रविड़ दुर्ग की मोटी दीवारों में दरार डाल पाएगी? या यह किला, हर बार की तरह, बाहरी हमलों को ठंडे आत्मविश्वास से झेल लेगा?
2026 का तमिलनाडु चुनाव किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं, बस फर्क इतना है कि यहाँ हीरो तय नहीं, विलेन भी साफ़ नहीं। भाजपा पूरी ताकत से मैदान में है, लेकिन जमीन अभी भी डीएमके की है। एम.के. स्टालिन सत्ता में हैं, पर आराम में नहीं। गठबंधन मजबूत दिखता है, पर भीतर ही भीतर दरारों की आवाज़ भी सुनाई दे रही है।
चेन्नई के सत्ता गलियारों में फुसफुसाहटें तेज़ हैं, लोग पूछ रहे हैं, क्या अमित शाह की चुनावी मशीनरी पहली बार दक्षिण में हांफेगी? क्या बिखरा हुआ विपक्ष मजबूरी में एकजुट होगा? और क्या कोई नया चेहरा, शायद कोई चमकता सितारा, राजनीति के इस थके हुए मंच पर अचानक स्पॉटलाइट चुरा लेगा?
तमिलनाडु 2026 में लड़ाई सीधी नहीं है। यह विचारधाराओं की कुश्ती है, पहचान की राजनीति है, और अहंकारों का टकराव है। यहाँ जीत उसी की होगी जो खुद को कम आँके, क्योंकि इस चुनाव में आत्मविश्वास से ज़्यादा ख़तरनाक है, आत्ममुग्धता।और यही वजह है कि यह चुनाव जितना रोमांचक है, उतना ही अनिश्चित भी।
मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की डीएमके गठबंधन कागज़ पर सबसे मज़बूत ताकत है। धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन (एसपीए) में कांग्रेस, विग्नान केन्द्र चीफ कोऑर्डिनेशन (वीसीके) और लेफ्ट पार्टियाँ मिलाकर 158 सीटें हैं। सिर्फ़ नंबर्स देखें तो स्टालिन का दोबारा लौटना आसान लगता है। लेकिन सियासत इतनी सीधी कहाँ?
पाँच साल की सत्ता के बाद डीएमके पर साफ़ एंटी-इनकंबेंसी का दबाव है। शासन की शिकायतें, भ्रष्टाचार के इल्ज़ाम, वादों की सुस्त रफ्तार, और नीट (NEET) हटाने में नाकामी से बेचैनी फैल रही है।
मुख्य चैलेंजर है एआईएडीएमके, जो अब फिर से बीजेपी के साथ नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) में। 2024 लोकसभा के छोटे झगड़े के बाद पुराने साथी फिर एकजुट हो गए, ताकि एंटी-डीएमके वोट लामबंद हो सकें। बीजेपी के साथ पीएमके और डीएमडीके भी हैं।
अगर ये गठबंधन मज़बूती से चला तो भारी वोट शेयर हासिल कर सकता है। लेकिन एकजुटता ही इसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी है। जयललिता युग के बाद एआईएडीएमके अपनी पुरानी ताकत वापस पाने में जूझ रहा है। बीजेपी बढ़ रही है, लेकिन तमिलनाडु की द्रविड़ और समाजिक न्याय की जड़ें रुकावटें हैं। पीएमके के घरेलू झगड़े गठबंधन को और कमज़ोर करते हैं। हिसाब अच्छा है; तालमेल नहीं।
इस माहौल में अनप्रेडिक्टेबल तत्व हैं नए सियासी उखाड़ू। एक्टर विजय का तमिलागा वेट्री कझगम (टीवीके) ने जेन ज़ेड को जोश भर दिया है, जो मतदाताओं का पाँचवाँ हिस्सा हैं। उनकी अपील है साफ़ इमेज, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ बयानबाज़ी, और फिल्मों से बनी भावनात्मक कनेक्शन।
लेकिन विजय का सफर पहले ही उलझन भरा रहा। 2025 में कुरूर रैली में भगदड़ से कई मौतें हुईं, जो जांच़ के घेरे में है। समर्थक उन्हें एमजीआर जैसा हीरो मानते हैं, लेकिन आलोचक कहते हैं कि करिश्मा नीति की गहराई और संगठन की ताकत की जगह नहीं ले सकता।
सीमेन की नाम तमिल (एनटीके) भी एक फैक्टर है, जो तमिल राष्ट्रवाद और गुस्सैल मतदाताओं को लुभाती है। टीवीके और एनटीके मिलकर 15-20% वोट काट सकते हैं, ज्यादातर एंटी-डीएमके से, जिससे कई सीटों पर नतीजे प्रभावित होंगे।
तमिल सियासत में सिनेमा का असर पुराना है। एमजीआर से जयललिता तक, सिल्वर स्क्रीन के सितारे सत्ता तक पहुँचे। विजय भी वही रास्ता अपना रहे हैं , फैन क्लब को पार्टी यूनिट बनाकर, फिल्मों में राजनीतिक संदेश डालकर। लेकिन कमल हासन की नाकाम कोशिश याद दिलाती है कि शोहरत को विचारधारा और एडमिन विज़न चाहिए।
इधर बीजेपी सांस्कृतिक-धार्मिक मुद्दों से अपनी जादुई पहचान फैला रही है। डीएमके को एंटी-हिंदू , मंदिर प्रथाओं और सनातन धर्म के खिलाफ बताया जा रहा है। लेकिन तमिलनाडु ने धार्मिक ध्रुवीकरण को हमेशा ठुकराया है। समाजिक न्याय, क्षेत्रीय गर्व और तर्कवादी सियासत हिंदुत्व से भारी पड़ते रहे हैं।
जाति का खेल फैसला करेगा। दलित, थेवर, गाउंडर, वन्नियार और देवेंद्रकुला वेल्लालर इलाकों में अलग-अलग असर डालेंगे। गठबंधन इन्हीं समीकरणों पर बने हैं, जो टाइट मुकाबले में जीत दिला सकते हैं।
शासन के मसलों पर बेरोज़गारी, महंगाई और कल्याण योजनाएँ हावी हैं। डीएमके ने पोंगल पर नकद मदद, मुफ्त लैपटॉप और औरतों की स्कीमों में इज़ाफा जैसे ताज़ा कदम उठाए हैं। नाम समाजिक सहायता का, मकसद वोटर वफादारी का।
एक और विवादास्पद मसला है वोटर लिस्ट का बड़ा संशोधन, जिसमें करीब एक करोड़ नाम कटे। डीएमके को डर अल्पसंख्यकों और प्रवासियों के बहिष्कार का, विपक्ष कहता है नकली वोटर साफ़ हो रहे। टाइट रेस में ये फर्क डाल सकता है।
तो तमिलनाडु कहाँ खड़ा है?
डीएमके के पास संगठन की ताकत और गठबंधन की अनुशासन है। लेकिन विपक्ष की बिखरी-फिर भी जोशीली चुनौती, एक्टर विजय की वाइल्ड कार्ड एंट्री और मतदाता थकान इसे अनप्रेडिक्टेबल बनाते हैं। लटका हुआ सदन (त्रिशंकु) या इकतरफा सरप्राइज़ शिफ्ट मुमकिन है।
आखिरकार, पटकथा तमिलनाडु के मतदाताओं के हाथ है, खासकर युवा पहली बार वोट डालने वालों के। क्या वे द्रविड़ ढांचे पर टिकेंगे, या नई आवाज़ें आज़माएँगे? जवाब तय करेगा कि 2026 स्थिरता लाएगा या सियासी हलचल की शुरुआत।



