राम; सच में तुम मोक्ष के दायक हो! संदर्भ- चंपत राय

3fq7bd8o_ram-temple_625x300_25_November_25.jpeg.webp

डॉ. मयंक चतुर्वेदी

अयोध्या । भारतीय सनातन परंपरा के संदर्भ में ‘भक्ति साहित्य’ का जितना आप अध्ययन करेंगे आपको कई कहानियां भक्त और भगवान के परस्पर संबंधों को लेकर मिलेंगी। उनमें अनेक कहानियां तो ऐसी हैं जो यह कहती हैं कि भगवान के पास जब भक्त आता है तो उसे अपार कष्‍टों का सामना करना पड़ता है। परीक्षा की घड़ी, लगता है कि समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रही…! एक समस्या समाप्त होती है तो कहीं दूसरी समस्या खड़ी हो जाती है, कष्ट अनवरत जीवन में चलते रहते हैं, वह समाप्त नहीं होते।

शायद, इसलिए अंतत: भक्त तुलसीदास को भी कहना पड़ गया था कि

धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ।
काहू की बेटी सों, बेटा न ब्याहब, काहू की जाति बिगार न सोऊ।
तुलसी सरनाम गुलामु है राम को, जाको, रुचै सो कहै कछु ओऊ।
माँगि कै खैबो, मसीत को सोईबो, लैबो को, एकु न दैबे को दोऊ॥

अर्थात् चाहे कोई मुझे धूर्त कहे अथवा परमहंस कहे, राजपूत कहे या जुलाहा कहे, मुझे किसी की बेटी से तो बेटे का ब्याह करना नहीं है, न मैं किसी से संपर्क रखकर उसकी जाति ही बिगाड़ूँगा। तुलसीदास तो श्रीराम का प्रसिद्ध ग़ुलाम है, जिसको जो रुचे सो कहो। मुझको तो माँग के खाना और मसजिद (देवालय) में सोना है, न किसी से एक लेना है, न दो देना है। (पुस्तक : कवितावली (पृष्ठ 120) रचनाकार : तुलसी प्रकाशन : गीताप्रेस संस्करण : 2017)

यानी आप यहां देखिए कि भक्‍त आखिर बोल क्‍या रहा है! अब इस तरह की बातें भक्त जब बोल रहा है तो आप समझ लीजिए कि वह जो है, पूरी तरह अपनी देह से मुक्त हो चुका है। अपनी दैनिक आवश्‍यकताओं की पूर्ति से परे हो चुका है और अपने को उसने ईश्वर की आराधना में पूरी तरह तल्लीन कर लिया है। इस परिस्‍थ‍िति में अब कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसे कष्‍ट कितने मिलने है, वह देह से कष्‍ट में होगा या मानसिक कष्‍ट (जैसा कि इन दिनों चंपतराय जी के ऊपर आए कष्‍ट को देखा जा सकता है) उसे मिलेगा।

वैसे श्रीराम का संपूर्ण जीवन भी कष्‍टों का अनुपम उदाहरण हैं; जन्‍म के बाद कुछ बड़े हुए तो ऋषि विश्‍वामित्र आ गए, आश्रम की शिक्षा और वन में साधना, पूरी तरह से भौतिक सुख-सुविधाओं से दूर एक तपस्‍वी जीवन। वहां भी असुरों (जिनके सुर समाज जीवन से मेल नहीं खाते) से लगातार संघर्ष करते हुए जीवन आगे बढ़ता है। विवाह योग्‍य हुए, अभी विवाह हुआ ही था कि “वन गमन” की दुंदुभी बज उठी। संयोग देखिए; इस बार अकेले नहीं जाना था, भाई के साथ भार्या (पत्‍नि) को भी साथ लेकर जाना था। फिर एक नई परीक्षा जीवन में आरंभ हो चुकी थी, वह भी पूरे 14 वर्षों के लिए!

अनन्‍त कठोर तपश्‍चर्या, तमाम देहिक, मानसिक कष्‍टों को झेलने का यह समय श्रीराम जी के जीवन में हम देखते हैं, इस बार तो संघर्ष असुरों के साथ-साथ राक्षसों (स्‍वभावगत दुष्‍ट), निशाचरों, (निशायाम् चरति इति) यानी जब संसार में सभी जीव आराम करते हैं, तब ये जागते हैं और ऐसे कृत्‍य करते हैं जो सभ्‍य समाज में मान्‍य नहीं, और दानवों (क्रूर अथवा अनैतिक व्यक्तियों) से भी रहा। अपनी भार्या का बिछोह झेला, एक लम्‍बा युद्ध और उसके बाद अयोध्‍या के लिए प्रस्‍थान।

पर, रामजी को यहां भी कहां शांति थी! अभी कुछ समय ही बीता था कि एक नई परीक्षा उनका इंतजार कर रही थी, इस बार उन्‍हें अपनी पत्‍नि को सदैव के लिए खो देना था! फिर राजा का पहला और अंतिम कर्तव्‍य ही है, प्रजा का सुख। इसलिए तुलसीबाबा करते भी हैं-

दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती।
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥

अर्थात् श्री राम के राज्य में किसी को भी दैहिक (शारीरिक और मानसिक), दैविक (दैवीय या प्राकृतिक) और भौतिक (संसार से मिलने वाले)- इन तीनों प्रकार के ताप (कष्ट) नहीं सताते। सभी मनुष्य आपस में प्रेम करते हैं और वेदों में बताई गई मर्यादा और नीति के अनुसार अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं। (गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य ‘श्रीरामचरितमानस’ के उत्तरकांड)।

यानी कि रामराज्‍य में “स्‍वधर्म” का पालन पूरे मनोयोग से हर कोई करता हुआ हमें दिखाई देता है। फिर दिखाई भी क्‍यों न दे, आखिर राज्‍य भी तो श्रीराम जी का है, जिसका आदर्श वाक्‍य ही है-

जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृप अवसि नरक अधिकारी॥”

“जिस राजा (शासक) के राज्य में प्यारी प्रजा दुखी रहती है, वह राजा निश्चय ही (अवश्य) नरक का भागी होता है।”। हालांकि यह प्रसंग अयोध्याकाण्ड में तब आता है जब भरत अपने ननिहाल से वापस अयोध्या पहुँचते हैं और उन्हें अपने पिता राजा दशरथ की मृत्यु तथा श्री राम के वनवास का पता चलता है। माता कैकेयी से बातचीत के दौरान और अयोध्या की प्रजा की दुर्दशा को देखकर भरत स्वयं के लिए या राज्य की नीतियों के संदर्भ में यह बात कहते हैं।

इस पंक्ति के माध्यम से तुलसीदास जी ने यह बताया है श्रीराम के समय में ‘राजधर्म’ को सबसे ऊपर रखा गया है। एक राजा का सबसे पहला कर्तव्य अपनी प्रजा की रक्षा करना और उन्हें सुखी रखना है। यदि शासक अपनी जिम्मेदारी में विफल रहता है और जनता कष्ट में है, तो उसे पाप का भागी माना जाता है और मृत्यु के पश्चात उसे नरक प्राप्त होता है।

स्‍वभाविक है कि श्रीराम ने जीवन भर इन पंक्‍तियों का अनुसरण किया। अपनी भार्या (पत्‍नि) सीता (जानकी) जी को ऋषि बाल्‍मि‍की के आश्रम में पहुंचाने के साथ अयोध्‍या नरेश, कण-कण के स्‍वामी श्रीराम की यात्रा एक पुरुष रूप में दुख और कष्‍टों से भरी हुई ही दिखी। सीता का विछोह फिर एक बार हुआ, बच्‍चे भी आश्रम में ही जन्‍में। इसके बाद जब पुन: मिलना भी हुआ तो बच्‍चे ही सिर्फ मिले, जानकी जी सदैव के लिए पृथ्‍वी में समा चुकी थीं।

तब कुल मिलाकर श्रीराम का जीवन चरित्र देह के स्‍तर पर सतत संघर्ष का, यश, कीर्ति, लाभ, हानि, अपयश से परिपूर्ण नजर आता है। फिर भला उनके भक्‍त इन गुणों से कैसे मुक्‍त हो सकते हैं ? वैसे भी हरि (विष्‍णु) के लिए कहा भी गया है कि उनके भक्‍त एक समय के बाद सांसारिक पदार्थों से मुक्‍त हो जाते हैं, भगवान स्‍वयं ऐसी लीला रचते हैं कि जो थोड़ी बहुत आसक्‍ति शेष भी रहती है, वह उन कारणों से समाप्‍त हो जाती है, जोकि जीवन व्‍यवहार में घटित होते हैं।

सच, राम नाम, राम संकीर्तण, राम ध्‍यान, राम चरण, राम भाव, राम आस्‍था, राम स्‍नेह, राम समर्पण, राम जाप एवं इस तरह से अन्‍य जो भी कुछ राम मय है, वह कल्‍याणकारी एवं मोक्षकारी है। फिर अयोध्‍या के कण-कण में राम बसे हैं! राममंदिर के लिए अनेक आहुतियां सतत दी जाती रही हैं, जो भी श्रीराम के नजदीक पहुंचा है, उसका मोक्ष होना तय है। वैसे भी मोक्ष शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत की ‘मुच्’ धातु (जिसका अर्थ ‘छुटकारा पाना’ या ‘मुक्त होना’ है) से हुई है। मोक्ष का शाब्दिक अर्थ है; जन्म-मरण के सांसारिक चक्र और सभी दुखों से सदा के लिए मुक्ति।

आध्यात्मिक संदर्भ में इसे मोह + क्षय के रूप में समझा जाता है, जिसका अर्थ है; सांसारिक मोह (आसक्ति) का नष्ट हो जाना और आत्मा का शुद्ध स्वरूप में स्थापित होना। मोक्ष = मोह + क्षय (दीर्घ और व्यंजन के मेल की सैद्धांतिक अवधारणा) में मोह (संसार के प्रति लगाव, अज्ञान और भ्रम) का पूर्ण क्षय (नाश) हो जाना ही मोक्ष है।

सांख्य, न्याय और वेदांत के अनुसार मोक्ष, वस्‍तुत: आत्मज्ञान की प्राप्ति: “आत्मानम् विद्धि” है। आत्मज्ञान द्वारा मायिक (माया के) बंधनों से रहित होकर अपने शुद्ध ब्रह्मस्वरूप का बोध प्राप्त करना मोक्ष है। न्याय दर्शन में इसे लेकर इसीलिए यहां तक कहा गया कि “दुःखस्य आत्यन्तिको विमोक्षः मोक्षः।” अर्थात्, सांसारिक दुखों (दैहिक, दैविक और भौतिक) का हमेशा के लिए समूल नाश हो जाना ही मोक्ष है।

इस तरह से मोक्ष की परिभाषा से मोक्ष सर्वकल्‍याणकारी है। फिर भाग्‍यवान और श्रेष्‍ठ लोगों को ही यह मोक्ष मिल पाता है। फिर भले ही “बड़े भाग मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा॥ साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा॥” जैसी स्‍थ‍िति हो।

वास्‍तव में यह चौपाई हमें याद दिलाती है कि मनुष्य जीवन सिर्फ खाने, सोने और सांसारिक भोग-विलास में बिताने के लिए नहीं है। यह हमें ईश्वर की भक्ति, अच्छे कर्म और आत्म-कल्याण (मोक्ष) प्राप्त करने का सर्वोत्तम अवसर प्रदान करता है। अब श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव रहे चंपत राय जी की स्‍थ‍िति भी कुछ ऐसी ही है।

वे ईश्‍वर आराधना के अपने वर्षों के पुण्‍य-प्रताप से पूर्ण मोक्ष के अधिकारी हैं। जहां तक यश-अपयश की बात है तो भगवान श्रीराम, मां जानकी भी उससे अछूते नहीं रहे, तो भला उनका भक्‍त कैसे रह सकता है इससे अछूता! अब भला जो दिन-रात अयोध्‍या में रहते हुए भगवान राम के साथ को अनुभव नहीं कर पा रहे, उनके लिए क्‍या ही कहें!

वास्‍तव में उनसे अधिक दुर्भाग्‍यपूर्ण मनुष्‍य इस संसाद में कोई अन्‍य नहीं होगा। वे भगवान के धाम में रहते हुए भी माया का गुणगान कर रहे हैं, माया का ध्‍यान कर रहे हैं, मौका मिलते ही माया को पार कर रहे हैं! किंतु कुछ ऐसे भी हैं, जो माया के बीच रहते हुए उन्‍हें माया से नहीं अपने भगवान राम से प्रेम है। वे वहां भगवान श्रीराम के लिए हैं।

तभी तो भगवान ऐसे ही अपने अनन्‍य भक्‍त को उनके अथक समर्पण और मंदिर के हर कोने-विवरण की गहरी जानकारी के कारण उन्‍हें जनमानस से ‘रामलला का पटवारी’ नाम दिलवाते हैं। उनके तप का ही यह फल है कि वे राम मंदिर आंदोलन के रणनीतिकार और सर्वोच्च न्यायालय में केस के प्रमुख समन्वयक बनाए जाते हैं। नहीं तो कितने लोग हैं, जिनको भगवान अपने करियर को दांव पर लगाने की हिम्‍मत देते हैं। ‘भौतिकी’ का प्राध्‍यापक देखते ही देखते सब कुछ छोड़कर संघ प्रचारक बन जाता है।

चंपत राय के रामलला के पटवारी बन जाने की कहानी कुछ ऐसी ही है, जोकि साधारण तो बिल्‍कुल भी नहीं है, जितनी आज कोई कल्‍पना कर रहा हो! वे अपने जीवन में आपातकाल का सिर्फ दौर ही नहीं देखते, उसे भोगते भी हैं, 18 महीने जेल में बिताते हैं। अपनी सरकारी नौकरी छोड़ते हैं। रामजन्‍म भूमि से जुड़ी गहराइयों में वे इतना उतर जाते हैं कि एक समय के बाद उनकी इसमें गहरी पैठ देखकर लोग उन्हें ‘अयोध्या का एनसाइक्लोपीडिया’ (विश्वकोश) कहने लगते हैं।

एक पटवारी (भूमि का लेखा-जोखा रखने वाला) की भांति, उनके पास राम जन्मभूमि से जुड़ा हर कानूनी दस्तावेज, नक्शा और साक्ष्य मौजूद रहते हैं। बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद में वकीलों को अकाट्य ऐतिहासिक और दस्तावेजी तथ्य चंपत राय ने ही उपलब्ध कराए, आज यह भी एक एतिहासिक सच है! उनके पास मौजूद सबूतों ने कानूनी टीम को न्‍यायालयीन बहस में बहुत मजबूती दी।

1990 और 1992 के निर्णायक कारसेवक आंदोलनों के दौरान, उन्होंने देश भर से लाखों रामभक्तों को अयोध्या पहुंचने और जुटाने में महत्वपूर्ण रणनीतिक भूमिका निभाई। 1991 में क्षेत्र संगठन मंत्री और बाद में विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय महासचिव बनने तक, उन्होंने आंदोलन को एक जन-आंदोलन का रूप देने में अथक परिश्रम किया। इस तरह से देखें तो राम मंदिर आंदोलन और उसके बाद के समय में चंपत राय जी का योगदान पांच दशकों से भी अधिक लंबा और विस्तृत है।

जब 2020 में उच्‍चतम न्‍यायालय का निर्णय आता है, तब वह श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में गठन के साथ महासचिव नियुक्त होते हैं। मंदिर निर्माण के प्रशासनिक, वित्तीय और तकनीकी कार्यों का नेतृत्व वे करते हुए हम सभी को दिखते हैं। राम मंदिर के लिए विशाल स्तर पर हुए क्राउड-फंडिंग (जन-सहयोग) अभियान का नेतृत्व उन्होंने ही किया। प्राण प्रतिष्ठा तक की यात्रा में, उन्होंने देश और दुनिया को मंदिर निर्माण की नियमित और सटीक जानकारी देने में मुख्य प्रवक्ता की भूमिका निभाई।

अब वक्‍त उनका इस दैनन्‍दिन कार्यों से मोक्ष पाने का है! तभी तो रामजी ने उनके साथ ये लीला रची है! हाल ही में अयोध्या के राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए चढ़ावे और दान (नकद और स्वर्ण-आभूषणों) में कथित अनियमितताओं का विवाद सामने आ खड़ा हुआ है। इन गंभीर आरोपों के बीच और वित्तीय कोष की देखरेख की जवाबदेही लेते हुए, चंपत राय ने नैतिक जिम्मेदारी के आधार पर श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव पद से अपना इस्तीफा दे दिया है।

वे इसके साथ ही अब पूरी तरह माया के विविध बंधनों से मुक्‍त हो जाने की घोषणा करते दिखते हैं। अपने जीवन के कई दशक श्री राम को समर्प‍ित कर चुके चंपत राय का इतिहास भव्य मंदिर के निर्माण का साक्षी रहा है। वैसे प्रभु श्रीराम ने ही तुलसी बाबा के मुख के संभवत: भक्‍त के सामने आनेवाले इसी संकट के लिए ही कहलवाया है-

सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेहुँ मुनिनाथ।
हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश, अपयश विधि हाँथ॥

अर्थात, महर्षि वशिष्ठ भरत जी को समझाते हुए कहते हैं कि हानि-लाभ, जीवन-मृत्यु और यश-अपयश (बदनामी) सब विधाता (ईश्वर) के हाथ में हैं।(गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड)। अब जो कुछ भी सामने है, वह सब रघुवीर की माया है!

लग यही रहा है कि चंपत राय जी को प्रभु ने अपने इस संसार का सही पाठ पढ़ाया है। मोह-माया से पूर्ण मुक्‍ति के लिए श्रीहरि (विष्‍णु) राम ने कभी नारद को दिए अपने हर‍ि रूप (वानर/बंदर) की तरह ही माया का पाठ पढ़ाया है!

ऐसे में एक भक्‍त के लिए भगवान का यही संदेश है, भक्‍ति जितनी प्रवल होगी, भगवान अनेक यश-अपयश का भागी बनाकर अंतत: अपने भक्‍त की मति को कर्मों की गति से आखिरकार उसके हित में अपनी ओर मोड़ ही लेते हैं। अयोध्‍या, रामलला, राममंदिर प्रकरण और चंपतराय जी के बीच कुछ ऐसा ही प्रसंग घटता हुआ आज नजर आ रहा है! अब चंपत राय राममय है रामजी भी अपने भक्‍त में प्रेम में प्रेममय है, अब भगवान और भक्‍त के बीच कोई माया का बंधन नहीं, सिर्फ यदि कुछ है तो वह मोन समर्पण है, पूर्ण समर्पण है एक भक्‍त का अपने आराध्‍य प्रभु श्रीराम के श्रीचरणों में…….जहां परम शांति है, परम सुख हैं और अंतत: मोक्ष है, इस भवसागर से……

संविधान हत्या दिवस’ नई पीढ़ी को लोकतंत्र का मूल्य समझाएगा

unnamed-11.jpg
नई दिल्ली: भारत सरकार द्वारा ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाई जा रही आपातकाल की 51वीं वर्षगांठ के अवसर पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता एवं आईजीएनसीए के अध्यक्ष श्री राम बहादुर राय ने आपातकाल के दौरान जेल में बिताए अपने अनुभवों, लोकतंत्र की रक्षा के लिए चले जनआंदोलन तथा उस दौर के अनेक अप्रकाशित प्रसंगों को विस्तार से साझा किया।
श्री राय ने कहा कि गुजरात का नव निर्माण आंदोलन, बिहार छात्र आंदोलन तथा उसके बाद लगाया गया आपातकाल — ये तीन घटनाएँ ऐसी थीं, जिन्होंने विभिन्न विपक्षी दलों को एक साझा मंच पर आने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय ने तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों को निर्णायक मोड़ दिया। उनके अनुसार, इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने वरिष्ठ कांग्रेस नेता सिद्धार्थ शंकर रे सहित अन्य नेताओं की सलाह से संवैधानिक प्रक्रियाओं को दरकिनार करते हुए आपातकाल की घोषणा करवाई।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका का उल्लेख करते हुए श्री राय ने कहा कि तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहेब देवरस ने नानाजी देशमुख, दत्तोपंत ठेंगड़ी तथा अन्य कार्यकर्ताओं को भूमिगत रहकर लोकतांत्रिक प्रतिरोध को संगठित रखने तथा विपक्षी दलों के बीच समन्वय बनाए रखने का दायित्व सौंपा। अपने संबोधन में श्री राय ने एक रोचक प्रसंग साझा करते हुए कहा कि श्रीमती इंदिरा गांधी इस बात से अत्यंत नाराज़ हुई थीं कि देशभर में संघ के हजारों स्वयंसेवकों के बावजूद प्रारंभिक दौर में केवल लगभग 100 स्वयंसेवकों की ही गिरफ्तारी हो सकी, जबकि बड़ी संख्या में स्वयंसेवक भूमिगत रहकर लोकतांत्रिक आंदोलन को संगठित करने में सक्रिय रहे।
श्री राय ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में इस दिन का स्मरण नई पीढ़ी को लोकतंत्र, संविधान और नागरिक स्वतंत्रताओं के महत्व से परिचित कराने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेगा।
उन्होंने यह भी कहा कि विश्व के अनेक देशों ने अपने संविधान में संशोधन किए हैं, किन्तु संविधान की प्रस्तावना में वैचारिक परिवर्तन आपातकाल के दौरान जिस प्रकार भारत में किया गया, वैसा उदाहरण विश्व में विरल है। उन्होंने इसे तत्कालीन सत्ता की वैचारिक प्राथमिकताओं से जोड़कर देखा।
इस अवसर पर प्रख्यात चिंतक श्री के. एन. गोविंदाचार्य ने भी अपने विचार व्यक्त किए और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा के महत्व पर बल दिया।
कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ पत्रकार श्री अजय सेतिया द्वारा लिखित पुस्तक ‘इमरजेंसी की अनसुनी कहानियाँ’ का लोकार्पण भी किया गया।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विद्वानों, पत्रकारों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों, बुद्धिजीवियों तथा नागरिकों ने सहभागिता की और लोकतंत्र तथा संविधान की रक्षा के संकल्प को दोहराया।

इमरजेंसी से कोई सबक नहीं लिया गया: प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज

indra-gandhi.jpg.webp
दिल्ली । इंदिरा गांधी ने असंवैधानिक रूप से भी सत्ता में बने रहने के लिए ही इमरजेंसी लगाई थी। यह बात करोड़ों लोगों को पता है। अतः यह सबक नहीं कहा जा सकता। इंदिरा गांधी ने अपने स्वार्थ के लिए इमरजेंसी लगाई और संविधान उनके लिए खिलवाड़ की वस्तु थी, यह जानकारी बार-बार देना कोई सबक सीखना या सबक बताना या सबक लेना नहीं कहा जा सकता।

सबक है इमरजेंसी का दुरुपयोग कर राज्य की लोकतांत्रिक संरचना बदलकर उसे socialism नामक बर्बर पैशाचिक मतवाद से नियंत्रित राज्य बना देना और लोक जीवन विशेषतः हिन्दू जीवन को मतवाद नियंत्रित धर्म शून्य बनाने का योजना बद्ध कार्य। वह अभी तक जारी है। इस सबक को सीख कर यह आवश्यक था कि भारत के लोकतंत्र को संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य पुनः बनाया जाए जैसा संविधान में प्रतिज्ञा की गई थी। परंतु ऐसा कुछ नहीं किया गया इसका अर्थ है कि वस्तुत : कोई सबक नहीं लिया गया।

कोई सबक नहीं लिया गया क्योंकि यह पैशाचिक मॉडल हर नए शासक को भाता है। अनन्त अधिकार जो देता है।
देश बहुत बड़ा है इसमें भांति 2 के प्रतिभाशाली और मेधावी ,त्यागी और तपस्वी, चिंतनशील और मननशील लोग हैं।
अतः किसी भी महत्वपूर्ण विषय पर विविध मत होना सहज स्वाभाविक है। उनमें परस्पर आमने-सामने संवाद होने पर शायद कुछ सामान्य बातें स्पष्ट हो सके।
कल इमरजेंसी के सबक पर कई जगह गोष्ठियां हुई ।
दिल्ली में भी एक बड़ी गोष्ठी हुई।
उसमें क्या सबक बताए गए यह अभी तक रिपोर्टिंग में पढ़ने को नहीं मिला है।
जहां तक मेरा अध्ययन और अनुभव है और मैं स्वयं संपूर्ण क्रांति आंदोलन में अधिकृत रूप से सक्रिय था ।मेरे पास दायित्व भी था। छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का मैं प्रांतीय कार्यकारिणी सदस्य था। वर्तमान में उच्च न्यायालय में कार्यरत एक माननीय न्यायाधीश उस समय हमारे प्रांतीय संयोजक थे।
जयप्रकाश नारायण जी से हमारा निजी आत्मीय संबंध था और उन्होंने जनता पार्टी के समय में स्वयं हमारा लेख अपने द्वारा संपादित पत्रिका समग्रता में छापा था जो कि मधु लिमए आदि के पार्टी तोड़क प्रयास के विरुद्ध बहुत कड़ा लेख था। उन्होंने स्वयं वह लेख छापने कुमार प्रशांत जी से कहा यह कुमार प्रशांत जी ने मुझे बताया था।
अतः अपने अधिकृत अनुभवों और विस्तृत अध्ययन के आधार पर मेरा सुचिंतित मत है कि इमरजेंसी से उन लोगों ने कोई सबक नहीं लिया जिन्होंने इमरजेंसी में पीड़ा सही, कष्ट सह कर अविचलित रहे।जो जेल गए तथा सताए गए।
उनकी पीड़ा तपस्या का ही एक रूप थी इसलिए वह पीड़ा सम्मान के योग्य है परंतु उससे कोई सबक उन्होंने नहीं लिया ।

क्योंकि एकमात्र सबक जो लेने योग्य था वह था भारत के राज्य को पहले की तरह संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य पुनः बना देना।
इंदिरा गांधी ने इसे सोशलिस्ट बनाकर लोकतंत्र की हत्या की थी। साथ ही शरारतन सेक्यूलर शब्द जोड़ा जो ईसाइयत से जुड़ा शब्द है जबकि भारत ईसाई नेशन स्टेट नहीं है।

उन शब्दों को न हटाने का अर्थ है कि पीड़ित लोगों ने शासक बनने पर उत्पीड़क लोगों को अपना आदर्श माना और यह पाप पूर्ण संशोधन जारी रखा क्योंकि इसके कारण ही वे हिंदू धर्म का दमन जारी रख सकते हैं। हिंदू मंदिरों पर अपना कब्जा बनाए रख सकते हैं।

हिंदू धर्म के व्यवस्थित दमन करने के लिए और उसके द्वारा हिंदू समाज को धीरे-धीरे एक नास्तिक भीड़ में रूपांतरित करने के लिए ही सोशलिस्ट शब्द जोड़ा गया था और सेकुलर भी इसी के लिए जोड़ा गया था।

अतः उन दोनों शब्दों को जारी रखने का अर्थ है इंदिरा गांधी इन पीड़ित लोगों को बहुत ही अनुकरण योग्य शासक लगी और बाद में अपनी सत्ता पाने के बाद उन्हें उनका ही अनुकरण आदर्श लगा है ।
इसलिए इमरजेंसी पर चर्चा में केवल उनके अन्याय और अपने शोषण का वर्णन तो कोई सबक सीखने जैसी बात नहीं।
अगर कोई सबक सीख जाएगा तो उस पाप पूर्ण संशोधन को सर्वप्रथम बदला जाएगा जिसने भारत के लोकतंत्र को हिंदू धर्म का विरोधी बना दिया और हिंदू समाज को धीरे-धीरे नास्तिक भीड़ बनाने की दिशा में जिसमें प्रावधान समाहित किए गए ।
वे प्रावधान यथावत जारी हैं और मोदी जी भी उन प्रावधानों का सम्यक उपयोग कर रहे हैं ।
अतः स्पष्ट है कि इमरजेंसी से कोई सबक किसी ने नहीं लिया है।
इमरजेंसी में बहुत से लोगों ने बहुत कष्ट सहा यह उनकी तपस्या थी। यह सत्य है ।
सबक तो किसी ने नहीं लिया।

27 जून 1838 सुप्रसिद्ध साहित्यकार और पत्रकार बंकिम चंद्र चटोपाध्याय का जन्म

images-12.jpeg

भोपाल : देश की स्वतंत्रता केलिये हुये असंख्य बलिदानों की श्रृंखला के पीछे असंख्य प्रेरणादायक महाविभूति भी रहे हैं। जिनके आव्हान से समाज जाग्रत हुआ और संघर्ष के लिये सामने आया । ऐसे ही महान विभूति हैं बंकिम चंद्र चटोपाध्याय । जिनका आव्हान मानों स्वाधीनता संघर्ष का एक महामंत्र बन गया । उनके द्वारा सृजित वंदेमातरम का उद्घोष सशस्त्र क्रान्तिकारियो ने भी किया और अहिसंक आँदोलनकारियों ने भी किया ।

राष्ट्र और सांस्कृतिक वोध जागरण केलिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित करने वाले सुप्रसिद्ध पत्रकार, साहित्यकार और गीतकार बंकिम चंद्र चटोपाध्याय का जन्म 27 जून 1838 को बंगाल के उत्तरी चौबीस परगना जिला अंतर्गत कंठालपाड़ा नैहाटी में हुआ था ।(कहीं कहीं यह तिथि 26 जून भी लिखी है) उनके पिता यादवचन्द्र चटोपाध्याय के परिवार की संपन्न और सुसंस्कृत थी । माता दुर्गा देवी भी परंपराओं के प्रति पूर्णतयः समर्पित थीं। राष्ट्र स्वाभिमान और सांस्कृतिक वोध उनके संस्कारों में था । उनकी शिक्षा हुगली कॉलेज और प्रेसीडेंसी कॉलेज में हुई। देश में जब 1857 की क्रान्ति आरंभ हुई तब वे महाविद्यालयीन छात्र थे । बी ए कर रहे थे । अंग्रेजों ने क्रान्ति के दमन के लिये जो सामूहिक नरसंहार किये उनके समाचार प्रतिदिन आ रहे थे । उन्होंने क्रान्ति के कारणों को भी समझा और असफलता को भी । इस पूरी अवधि में वे मानसिक रूप से उद्वेलित तो हुये पर अपनी पढ़ाई से विचलित न हुये । 1857 में ही प्रेसीडेंसी कालेज से बी. ए. की उपाधि लेने वाले वे पहले भारतीय विद्यार्थी थे। इस कारण तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने उनका स्वागत किया और शिक्षा पूरी होने के साथ उनकी नियुक्ति डिप्टी मजिस्ट्रेट पद पर हो गई। कुछ समय वे बंगाल सरकार में सचिव पद पर भी रहे। लेकिन उन्होंने नोकरी छोड़ दी । 1869 में वकालत पास की । और इसके साथ ही उन्होंने वैचारिक रूप से समाज जागरण का अभियान आरंभ किया । वे अतीत में हुये संघर्ष से जितने प्रभावित थे उतने ही कुछ लोगों द्वारा परिस्थतियों के समक्ष झुक कर अपना स्वत्व और स्वाभिमान खो देने की मानसिकता से भी आहत थे । इसलिये उन्होंने स्वत्व जागरण और संगठन पर जोर देने के संकल्प के साथ अपनी रचना यात्रा आरंभ की ।

उनकी पहली प्रकाशित रचना राजमोहन्स वाइफ थी। यह अंग्रेजी में थी। इसमें परिस्थतियों की विवशता को बहुत सावधानी से प्रस्तुत किया । बंगला में उनकी पहली रचना 1865 में ‘दुर्गेशनंदिनी’ प्रकाशित हुई । यह एक आध्यात्मिक रचना है पर इसके माध्यम से समाज की आंतरिक शक्ति से ठीक उसी प्रकार परिचित कराया गया जैसा मुगल काल में बाबा तुलसी दास ने रामचरित मानस के द्वारा जन जागरण करने का प्रयास किया था । इसी श्रृंखला में 1866 में उपन्यास कपालकुंडला प्रकाशित हुआ और 1872 में मासिक पत्रिका बंगदर्शन का भी प्रकाशन किया। इस पत्रिका के माध्यम से वे एक कुशल पत्रकार के रूप में सामने आये । इस पत्रिका में बंगाल के अतीत, और गौरव की चर्चा के माध्यम से समाज को जाग्रत करने की सामग्री होती थी । अपनी इस पत्रिका में उन्होंने अपने विषवृक्ष उपन्यास को भी धारावाहिक रूप से प्रकाशित किया। जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है कि इस उपन्यास में समाज के उस स्वभाव और अदूरदर्शिता का प्रतीकात्मक वर्णन था जो भारत राष्ट्र के पतन का कारण बना । इसी प्रकार अपनी कृष्णकांतेर रचना में उन्होंने ने अंग्रेजी शासकों पर तीखे व्यंग्य किये । बंगाल के कांतल गाँव में 7 नवम्बर 1876 को गीत “वंदे मातरम” की रचना की। जो 1882 में कालजयी उपन्यास ‘आनंद मठ’ पूर्ण हुआ । वंदेमातरम इस उपन्यास का प्रमुख अंश है । मूलरूप से ‘वंदे मातरम’ के प्रारंभिक दो पद संस्कृत में थे, जबकि शेष गीत बांग्ला भाषा में था। गीत वंदे मातरम् का अंग्रेजी अनुवाद सबसे पहले अरविंद घोष ने किया।

यूँ तो उनकी प्रत्येक रचना भारतीय समाज को जाग्रत करने वाली हैं पर फिर भी “आनंदमठ” उपन्यास और इसके अंतर्गत गीत वंदेमातरम संघर्ष और बलिदान का महामंत्र बना । इस उपन्यास की भूमिका बंगाल में हुये सन्यासी विद्रोह से पड़ गई थी । बंगाल में संतों और सन्यासियों ने 1873 में समाज जागरण का कार्य किया था ताकि अंग्रेजी कुचक्र से राष्ट्र संस्कृति और परंपराओ की रक्षा हो सके । संतो के इस अभियान को संयासी विद्रोह का नाम दिया गया जिसे अंग्रेजों ने बहुत क्रूरता से दमन किया था । आनंदमठ में संन्यासियों द्वारा की गई क्रान्ति के प्रयास का वर्णन था । जब इस उपन्यास के रूप में यह विवरण सामने आया तो मानो पूरे समाज राष्ट्रवोध जाग्रत हो गया । और समाज अंग्रेजों के विरुद्ध एक जुट सामने आने लगा । तब बंगाल के सामाजिक और सार्वजनिक आयोजन में वंदेमातरम का घोष मानों एक परंपरा ही बन गई थी ।

बंकिम बाबू का अंतिम उपन्यास 1886 में सीताराम आया। इसमें सल्तनकाल के वातावरण और उसके प्रतिरोध को दर्शाया गया था । उनके अन्य उपन्यासों में मृणालिनी, इंदिरा, राधारानी, कृष्णकांतेर, देवी चौधरानी और मोचीराम जीवनचरित शामिल है। उन्होंने धर्म, सामाजिक और समसामायिक विषयों पर आधारित कई निबंध और कविताएँ भी लिखीं ।

यह उनके रचना संसार से समाज में उत्पन्न जाग्रति का ही परिणाम था कि उस काल-खंड में हुये प्रत्येक आन्दोलन के प्रतिभागी उनसे प्रेरित रहे । उनके चिंतन और जीवन में भारत राष्ट्र की संस्कृति और परंपरा का आव्हान था । वे स्वतंत्रता के आदर्शों के प्रति गहराई से प्रेरित थे।

पराधीनता के काल में राष्ट्रभाव जाग्रत करने की दिशा में बंकिमबाबू का योगदान सबसे बड़ा है। उन्होंने एक आदर्श सत्ता की स्थापना के लिये आवश्यक तत्वों को समाज के सामने लाने के लिये निबंध ‘कृष्णचरित्र’ प्रकाशित किया। जब उनका गीत ‘वन्देमातरम्’ पहली बार 1876 में ‘बंगदर्शन’ समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ, तो उससे मानों पूरे देश में वैचारिक आवेग उत्पन्न हुआ । उन्होने सनातन परंपराओ और राष्ट्र के लिये अनिवार्य आदर्शों के बीच एक अद्भुत पूरकता और सामंजस्य स्थापित किया।

वही हिन्दुओं के बीच फैली विभ्रम की स्थिति के बारे में मानों एक प्रकार से शोक व्यक्त किया था । उन्होने इस बात पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया और झकझोरने का प्रयास किया । उनके इन शब्दों में कि “हिन्दु समाज “कुमारसंभव को छोड़कर स्वाइनबर्न पढ़ता है”, गीता को छोड़ कर मिल को पढ़ता है । उड़ीसा की पत्थर कला को छोड़ देते हैं और साहिबों की चीनी गुड़िया को देखते हैं।” कितनी व्यथा और स्वत्व का आव्हान है इसे इन्ही शब्दों में छुपे संदेश से सहज समझा जा सकता है ।
उन्होेंने अपनी रचना ‘धर्मशास्त्र’ में देशभक्ति को सभी धर्मों से ऊपर रखा। ‘लोक रहस्य’ में उदारवादियों के भीख मांगने पर व्यंग्य किया और देश को अपने पैरों पर खड़ा होने पर जोर दिया । निबंध ‘अमर दुर्गोत्सव’ में उन्होंने विधवा विवाह, महिलाओं की स्वतंत्रता के बारे में बात की और अंधी अंग्रेजी नकल का जोरदार विरोध किया। उन्होंने अपनी मातृभूमि को अपनी मां के रूप में प्रस्तुत किया ।

इस प्रकार उनका पूरा जीवन भारत राष्ट्र और उसकी संस्कृति के प्रति समाज को जाग्रत करने के लिये समर्पित रहा । लेख लिखे, कविताएँ लिखीं, उपन्यास लिखे और संगोष्ठियों में भाग लिया । स्वत्व, स्वाभिमान और राष्ट्र संस्कृति जागरण के इस महानायक ने 8 अप्रैल 1894 को संसार से विदा हो गये । पर संसार से यह विदाई केवल शरीर की थी । वे और उनका व्यक्तित्व आज भी प्रत्येक भारतीय के मन में विराजे हैं।

scroll to top