चढ़ावा चोरी प्रकरण- होने लगा दूध का दूध और पानी का पानी

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दिल्ली । अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावा चोरी के अक्षम्य अपराध पर एसआईटी की रिपोर्ट आ जाने के बाद कार्यवाई आरंभ हो चुकी है। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने करोड़ों रामभक्तों से कहा था कि आपने राम मंदिर के लिए 500 वर्षों तक प्रतीक्षा की है सत्यता जानने के लिए 15 दिन और प्रतीक्षा कर लें। मुख्यमंत्री जैसा कहते हैं वैसा करते हैं, रिपोर्ट आई, एफआईआर हुई और विवाद में शामिल सभी आठ आरोपी हिरासत में ले लिये गये। सभी आठ आरोपितों को कोर्ट में पेश करने के बाद न्यायिक हिरासमत मे भेज दिया गया है। ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय व सदस्य अनिल मिश्रा के इस्तीफे की भी चर्चा है।
अयोध्या का यह प्रकरण हिंदू समाज के लिए अत्यंत दुखद है। इस प्रकरण में जिस प्रकार विगत 35 वर्षो से अयोध्या आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वाले चंपत राय जी पर आरोप हैं वह पीड़ादायक है। चम्पत जी की निष्ठा और इमानदारी पर रंचमात्र संदेह न करने वाले भी कह रहे हैं कि अगर चंपत राय को इसकी जानकारी हो गई थी तो उन्होंने ट्रस्ट की ओर से यह बात पुलिस तक क्यो नहीं पंहुचाई? मामले पर रिपोर्ट क्यो नहीं दर्ज करवाई? संभवतः यही उनकी सबसे बड़ी गलती है। यदि उन्होंने स्वयं आगे आकर रिपोर्ट दर्ज करवा दी होती तो संभवतः बात इतनी आगे न बढ़ती। यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा मांगे जाने पर ट्रस्ट ने प्रधानमंत्री कार्यालय को भी जानकारी देने से मना कर दिया।
अयोध्या की इस अनहोनी से विहिप की उस छवि को गहरा आघात पहुंचा है जिसे बनाने में संगठन ने वर्षो लगाए दिये थे। चंपत राय राम मंदिर आंदोलन से लेकर राम मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण होने तक जितने भी कार्यक्रम हुए उन सभी में अग्रणी भूमिका में रहे। चंपत राय अयोध्या में आने वाले हर अतिथि का स्वागत करने के लिए आगे रहते थे। चम्पत राय अपने सरल स्वभाव के लिए जाने जाते हैं। चंपत राय का सामाजिक जीवन एक शिक्षक के रूप में प्रारंभ हुआ था। इंदिरा गांधी द्वारा थोपे गए आपातकाल का विरोध करने के कारण वह जेल गए थे और 8 महीने बाद बाहर आने पर संघ के प्रचारक बन गए। बाद में उनकी भूमिका विहिप में तय कर दी गई । 1984 की धर्मसंसद से उनकी भूमिका राम मंदिर आंदोलन से जुड़ गयी तभी से वह लगातार अग्रणी भूमिका में रहे। ऐसे व्यक्ति से इतनी बड़ी चूक हो जाने से रामभक्तों का व्यथित होना स्वाभाविक है।
इस पूरे घटनाक्रम में प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी किसी भी आरोपी को बचने नहीं देंगे यह तय है। यह करोड़ों करोड़ हिन्दुओं से जुड़ा विषय है यही कारण है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस पूरे प्रकरण को लेकर अत्यंत गंभीर हैं और दूध का दूध और पानी का पानी करने के लिए संकल्पवान हैं। फ़िलहाल चोरी की घटनाएँ केवल दान पेटी में डाले गए नगद धन से ही समबन्धित लग रही हैं क्योंकि चांदी की ईंटें आदि सुरक्षित पाई गई हैं ।
निकल पडे़ कालनेमि – अयोध्या प्रकरण सामने आने के बाद राजनीति होना स्वाभाविक ही है। अब जिन लोगों ने भगवान राम को काल्पनिक माना था, रामभक्तों पर गोलियां चलवाई थीं और श्री रामजन्मभूमि पर शौचालय बनवाना चाहते थे वो विकृत राजनीति को चमकाने अयोध्या आ रहे हैं। आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजीरवल जो स्वयं शराब घोटाले के आरोपी हैं और कभी कहा करते थे कि मेरी नानी को तकलीफ होगी जो जो वहां राम मंदिर बना अब राजनीति चमकने अयोध्या पहुंच गए हैं। तत्कालीन सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने 1990 में गोलियां चलवाकर सरयू को रामभक्तों के खून से लाल कर दिया था ऐसे रामद्रोही की पार्टी को प्रभु श्रीराम के मंदिर की चिंता हो रही है। राम मंदिर आन्दोलन से लेकर प्राण प्रतिष्ठा तक में बाधा डालने वाले कालनेमि कपड़े बदलकर अयोध्या पहुँच रहे हैं। रामभक्त सब कुछ देख रहे हैं और सत्यको जान रहे हैं । सत्ता के लिए अयोध्या पहुँचने वाले कालनेमि इस मुगालते में न रहें कि अयोध्या प्रकरण उन्हें यूपी में सत्ता दिला सकता है। दूध का दूध और पानी का पानी होने पर इन कालनेमियों का अयोध्या दौरा उल्टा इन्हीं पर भारी हो सकता है।

संस्कारयुक्त बच्चों से ही बनेगा बलशाली राष्ट्र

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लखनऊ। राष्ट्रधर्म मासिक पत्रिका के राजेन्द्रनगर स्थित कार्यालय में- बाल पोषण से राष्ट्र पोषण-विषय पर गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी में शहर के गणमान्य लोगों ने अपने-अपने विचार रखे। गोष्ठी की अध्यक्षता राष्ट्रधर्म के प्रभारी निदेशक सर्वेश चन्द्र द्विवेदी ने की।
सभी वक्ताओं का मानना था कि मजबूत भविष्य के लिए वर्तमान का मजबूत होना जरूरी है। अर्थात् यदि आज बच्चों के शारीरिक, मानसिक, सांस्कृतिक पक्षों को बलशाली बनाया जायेगा तो वे शक्तिशाली राष्ट्र की सुदृढ़ नींव रख सकेंगे। डाॅ. फैय्याज ने कहा कि बच्चों के लिए माँ का दूध सबसे आवश्यक है। इस पर सबको ध्यान देना चाहिए। बढ़ते एकल परिवारों के कारण इस पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है।
अमित कुमार मल्ल ने कहा कि पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति के कुप्रचार के कारण समाज समूचा प्रभावित हो रहा है, बच्चे इससे अछूते नहीं हैं। अब बच्चे घर का खाना खाने से बचते हैं। वही वस्तु यदि बाजार की हो तो उसे बड़ी रुचि से खाते हैं। यह स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है।
पायल लक्ष्मी सोनी ने कहा कि देर से हो रहे विवाह का दुष्प्रभाव परिवार-समाज पर पड़ रहा है। इससे सतर्क रहने की आवश्यकता है।
बाबूलाल शर्मा ने कहा कि अब हम इतना आगे आ चुके हैं कि पीछे लौटना सम्भव नहीं है लेकिन सांस्कृतिक ह्रास न हो, इस पर ध्यान देना जरूरी है।
राष्ट्रधर्म के निदेशक डाॅ. ओमप्रकाश ने कहा कि समुन्नत राष्ट्र के लिए व्यक्ति, समाज अनिवार्य है। इसके लिए सबसे जरूरी है कि बचपन से ही भोजन, खेलकूद को संस्कारयुक्त रखा जाये। इसमें परिवार की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। गोष्ठी में संजीव सिंह, राजीव द्विवेदी ने भी अपने विचार प्रकट किये।

ऑपरेशन सिंदूर व राफेल पर एक टेंडर से विपक्ष हुआ बेनकाब 

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कानपुर : भारतीय वायुसेना की एक खबर से ऐसी सभी ताकतें बेनकाब हो गई हैं जो ऑपरेशन सिंदूर के समय पाकिस्तानी झूठ के आधार पर भारत विरोधी बयानबाजी कर रही थीं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान राफेल विमानों को मार गिराने का पाकिस्तान का झूठ जिसको राहुल गाँधी के नेतृत्व में विपक्ष ने लपक लिया था मनोहर कहानी साबित हुआ है। भारतीय वायुसेना के एक आधिकारिक दस्तावेज ने पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा की पोल खोल दी है। वायुसेना द्वारा जारी किए गए नए टेंडर से यह साफ हो गया है कि फ्रांस से खरीदे गए सभी 36 विमान पूरी तरह से सुरक्षित हैं और देश की सेवा में तैनात हैं।
भारतीय वायुसेना ने फ्रांस से खरीदे गए सभी 36 राफेल विमानों के रखरखाव के लिए टेंडर जारी किया है। अभी तक पाकिस्तानी मीडिया यह अफवाह फैलाने में मगन था कि पाकिस्तान ने चीन की मदद से एक किल चेन तैयार की थी जिसमें राफेल लड़ाकू विमान के पायलटों को अपने बचाव में कोई कदम उठाने का अवसर नहीं मिला और चीन से मिले जे -10सी लड़ाकू विमान में लगी पीएल- 15 मिसाइलों ने राफेल को मार गिराया। अब भारतीय वायुसेना के टेंडर दस्तावेज ने इस झूठ की हवा निकाल दी है।
पाकिस्तान द्वारा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान राफेल मार गिराए जाने के झूठ को लेकर भारत के विपक्ष ने जमकर राजनीति करी थी। कांग्रेस नेता राहुल गांधी व उनके नेतृत्व वाला विपक्ष भारत सरकार से सवाल पूछ रहा था कि कितने राफेल गिरे? उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय से लेकर सपा नेता अखिलेश यादव तक सभी भारतीय सेना का मनोबल तोड़ने में लगे थे । क्या यह सभी नेता अब देश की जनता के सामने आकर माफी मांगेंगे? कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने कहा था कि जिस राफेल की नीबू – मिर्च के साथ पूजा की गई थी क्या वे उड़ भी पाए थे?
जून 15, 2026 को भारतीय वायुसेना ने अपने पूरे राफेल बेड़े के लिए पांच महीने का ब्रिज सपोर्ट पैकेज (रखरखाव और तकनीकी सहायता ) मांगा है । इस दस्तावेज में स्पष्ट लिखा है कि यह रख रखाव सभी 36 राफेल विमानों के लिए है।ऑपरेशन सिंदूर में राफेल विमानों ने पाकिस्तान में आतंकवादी ठिकानों मे एकदम सटीक हमले किए थे।राफेल में लगी घातक मिटियोर व स्कैल्प मिसाइलों और आधुनिक स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट के सामने पाकिस्तानी वायुसेना टिक नहीं पाई थी।
ब्रिज सपोर्ट टेंडर के दस्तावेज में दर्ज 36 का आंकड़ा यह संकेत देता है कि भारतीय वायुसेना के सभी 36 राफेल विमान पूरी तरह सुरक्षित हैं और परिचालन स्थिति में है। इसी आधार पर यह दावा किया गया कि राफेल को लेकर उठे सभी सवालों और अफवाहों पर यह दस्तावेज स्पष्टता देता है। इस दस्तावेज के सामने आ जाने के बाद पाकिस्तानी सेना प्रमुख मुनीर व कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के सपनों में एक बार फिर राफेल ही आएंगे। ऑपरेशन सिंदूर व राफेल को लेकर राहुल गांधी तथा इंडी गठबंधन के नेताओं की झूठ वाली बयानबाजी की पोल खुल चुकी है। राहुल गांधी एंड कंपनी ने ऑपरेशन सिंदूर की सफलता पर कभी कोई बयान नहीं दिया और न ही पाकिस्तान की निंदा की क्योंकि इससे उनका मुस्लिम वोट बैंक नाराज हो जाता।
राहुल गांधी ऑपरेशन सिंदूर पर अपने देश विरोधी बयानों से पाकिस्तानी मीडिया और संसद के नायक बन गये। क्या इस रिपोर्ट व टेंडर के के बाद राहुल गाँधी देश की जनता से माफी मांगेंगे? राफेल राजनीति में यह राहुल गांधी की लगातार दूसरी पराजय है क्योंकि भारत -फ्रांस समझौते के बाद जब से राफेल को लेकर ही राहुल गाँधी ने चौकीदार चोर है कैंपेन चलाया था और 2019 का लोकसभा चुनाव इसी नारे के साथ लड़ा था जिसमें कांग्रेस की भारी पराजय हुई थी।
भारतीय वायुसेना का यह टेंडर ऐसे समय में जारी हुआ है जब भारत अपनी वायु सेना की ताकत को और मजबूत करने के लिए फ्रांस की दसौ एविएशन से 114 अतिरिक्त राफेल फाइटर जेट खरीदने की प्रक्रिया पर तेजी से काम कर रहा है। संभावना है कि इन विमानों का निर्माण मेक इन इंडिया के तहत भारत में ही किया जाएगा। यह विमान पहले से शामिल राफेल की तुलना से अधिक घातक व उन्नत रक्षा प्रणालियों से लैस होंगे।

हुब्बुल वतनी, भारतीय मुसलमान और इंद्रेश कुमार 

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दिल्ली । भारत की सभ्यता का मूल स्वभाव समावेशी रहा है। यहां विविधताओं को मिटाने का नहीं, उन्हें एक व्यापक सांस्कृतिक चेतना में समाहित करने का प्रयास किया गया। यही कारण है कि हजारों वर्षों से विभिन्न आस्थाएं, भाषाएं, जातीय समूह और सांस्कृतिक परंपराएं इस भूमि पर साथ-साथ विकसित होती रही हैं। भारतीय मुसलमान भी इसी ऐतिहासिक प्रवाह का अभिन्न अंग हैं। वे केवल एक धार्मिक समुदाय नहीं, बल्कि भारत की सामूहिक स्मृति, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय विकास यात्रा के महत्वपूर्ण सहभागी हैं। इसलिए भारतीय मुसलमानों का प्रश्न केवल किसी समुदाय विशेष का प्रश्न नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक एकता, राष्ट्रीय आत्मविश्वास और भविष्य की दिशा से जुड़ा हुआ विषय है।

स्वतंत्रता और विभाजन के बाद भारतीय मुसलमानों के सामने एक जटिल परिस्थिति उत्पन्न हुई। एक ओर उन्हें नए भारत के निर्माण में अपनी भूमिका निर्धारित करनी थी, दूसरी ओर विभाजन की त्रासदी से उपजे संदेहों और राजनीतिक व्याख्याओं का सामना भी करना था। दुर्भाग्यवश आने वाले दशकों में मुस्लिम समाज को विकास, शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन की दृष्टि से देखने के बजाय अक्सर राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा गया। चुनावी राजनीति ने समुदाय को अधिकारों के नाम पर संबोधित तो किया, किंतु शिक्षा, आर्थिक सशक्तीकरण, बौद्धिक नेतृत्व और सामाजिक सुधार जैसे मूलभूत प्रश्न अपेक्षित प्राथमिकता प्राप्त नहीं कर सके। परिणामस्वरूप समुदाय का एक बड़ा वर्ग विकास की मुख्यधारा से अपेक्षित गति से नहीं जुड़ पाया।

आज भी भारतीय मुसलमानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि समाज उनके बारे में क्या सोचता है, बल्कि यह है कि वे स्वयं अपने भविष्य की कैसी कल्पना करते हैं। क्या उनकी ऊर्जा अतीत की पीड़ाओंऔर शिकायतों में व्यतीत होगी या भविष्य की संभावनाओं को गढ़ने में? क्या वे अपनी पहचान को केवल राजनीतिक विमर्श का विषय बनाए रखेंगे या उसे ज्ञान, कौशल, उद्यमिता और राष्ट्र निर्माण की शक्ति में परिवर्तित करेंगे? किसी भी समाज की प्रगति अंततः उसके आत्मविश्वास, आत्मचिंतन और आत्मसुधार की क्षमता पर निर्भर करती है।

इसी संदर्भ में पिछले दो दशकों के दौरान संवाद की एक ऐसी धारा विकसित हुई जिसने परस्पर दूरी को कम करने का प्रयास किया। इस प्रक्रिया में इंद्रेशकुमार का योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने मुसलमानों को किसी वैचारिक प्रतिद्वंद्वी या राजनीतिक विषय के रूप में नहीं, बल्कि भारत की साझी राष्ट्रीय चेतना के अंग के रूप में देखने और उनसे सीधे संवाद स्थापित करने का प्रयास किया। उनका मानना रहा कि अविश्वास का समाधान आरोपों में नहीं, संवाद में है; दूरी का समाधान बहिष्कार में नहीं, सहभागिता में है; और राष्ट्रीय एकता का आधार एक-दूसरे को समझने की इच्छा में निहित है।

इसी सोच के साथ उन्होंने देशभर में मुस्लिम बुद्धिजीवियों, उलेमाओं, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, महिलाओं और युवाओं के साथ निरंतर संवाद की परंपरा को विकसित किया। यह संवाद केवल राजनीतिक विषयों तक सीमित नहीं था, बल्कि शिक्षा, महिला सशक्तीकरण, सामाजिक सुधार, पर्यावरण संरक्षण, राष्ट्रहित, सांस्कृतिक विरासत, आतंकवाद के विरुद्ध जनमत निर्माण और राष्ट्रीय दायित्व जैसे विषयों तक विस्तारित था। इन प्रयासों का उद्देश्य किसी को बदलना नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समझने की प्रक्रिया को मजबूत करना था।

इंद्रेश कुमार द्वारा प्रस्तुत सबसे महत्वपूर्ण अवधारणाओंमें से एक “हुब्बुल वतनी” अर्थात मातृभूमि के प्रति प्रेम की अवधारणा है। इस्लामी परंपरा में भी अपने वतन, अपनी भूमि और अपने समाज के प्रति प्रेम को एक महत्वपूर्ण नैतिक मूल्य माना गया है। उन्होंने इसी विचार को भारतीय संदर्भ में पुनः स्थापित करने का प्रयास किया। उनका तर्क था कि भारतीय मुसलमानों की राष्ट्रीय निष्ठा और उनकी धार्मिक पहचान परस्पर विरोधी नहीं हैं। भारत के प्रति प्रेम, उसकी एकता और अखंडता के प्रति समर्पण तथा उसके विकास में सक्रिय भागीदारी किसी भी भारतीय मुसलमान की पहचान का स्वाभाविक हिस्सा हो सकती है। “हुब्बुल वतनी” को उन्होंने केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारतीय मुसलमानों और व्यापक भारतीय समाज के बीच विश्वास का सेतु बनाने वाली अवधारणा के रूप में प्रस्तुत किया।

वास्तव में यह अवधारणा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह संवाद को वैचारिक बहसों से निकालकर साझा उत्तरदायित्व की भूमि पर खड़ा करती है। जब कोई व्यक्ति स्वयं को सबसे पहले अपने देश, अपने समाज और अपने भविष्य से जोड़कर देखता है, तब उसके लिए मतभेद संघर्ष का कारण नहीं बनते, बल्कि संवाद का अवसर बनते हैं। यही वह बिंदु है जहां इंद्रेशकुमार के प्रयास मुसलमानों के साथ उनके संवाद को एक व्यापक राष्ट्रीय विमर्श में परिवर्तित करते दिखाई देते हैं।

यदि भूतकाल और वर्तमान की तुलना की जाए तो स्पष्ट होता है कि कभी जो संबंध मुख्यतः आशंकाओं और दूरी से परिभाषित होते थे, उनमें अब संवाद और संपर्क के नए आयाम विकसित हुए हैं। पहले दोनों पक्षों के बीच प्रत्यक्ष संवाद के अवसर सीमित थे और धारणाएं अक्सर राजनीतिक या वैचारिक मध्यस्थों के माध्यम से निर्मित होती थीं। आज परिस्थितियां पूरी तरह आदर्श नहीं हैं, लेकिन पहले की तुलना में कहीं अधिक खुली हैं। अनेक मुस्लिम बुद्धिजीवी, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता राष्ट्रीय मुद्दों पर अधिक सक्रियता से अपनी बात रख रहे हैं। मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा, अधिकार और सामाजिक भागीदारी जैसे विषयों पर भी व्यापक चर्चा संभव हुई है।

भविष्य की दृष्टि से यह प्रक्रिया और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत की प्रगति केवल आर्थिक विकास से सुनिश्चित नहीं होगी; उसके लिए सामाजिक विश्वास, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और राष्ट्रीय एकात्मता भी उतनी ही आवश्यक है। भारतीय मुसलमानों के पास युवा शक्ति, बौद्धिक क्षमता, सांस्कृतिक समृद्धि और सामाजिक ऊर्जा का विशाल भंडार है। यदि यह शक्ति शिक्षा, नवाचार, उद्यमिता, सामाजिक नेतृत्व और राष्ट्र निर्माण की दिशा में संगठित होती है, तो भारत के विकास की कहानी और अधिक सशक्त होगी।

आज आवश्यकता किसी समुदाय को राष्ट्रभक्ति का प्रमाण देने की नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण में उसकी क्षमता और योगदान को पहचानने की है। साथ ही यह भी आवश्यक है कि संवाद की प्रक्रिया निरंतर चलती रहे, क्योंकि संवाद ही वह माध्यम है जो पूर्वाग्रहों को समझ में, दूरी को विश्वास में और संदेह को साझेदारी में बदलता है। इंद्रेश कुमार के प्रयासों का महत्व इसी तथ्य में निहित है कि उन्होंने मुसलमानों के साथ संबंधों को राजनीतिक विवादों के दायरे से निकालकर राष्ट्रीय सहभागिता और सामाजिक समरसता के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने का प्रयास किया।

भारत की शक्ति उसकी विविधता में नहीं, बल्कि उस विविधता को साझा राष्ट्रीय चेतना में रूपांतरित करने की क्षमता में निहित है। “हुब्बुल वतनी” की भावना, संवाद की संस्कृति और साझी जिम्मेदारी का बोध ये तीनों मिलकर उस भारत का निर्माण कर सकते हैं जहां मुसलमान केवल एक समुदाय के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र की प्रगति और भविष्य के सहनिर्माता के रूप में अपनी पूर्ण भूमिका निभाएं। यही वह दिशा है जिसमें अतीत की दूरियां भविष्य की संभावनाओं में बदल सकती हैं और यही वह मार्ग है जो भारत की एकता को अधिक गहरा, अधिक स्थायी और अधिक सशक्त बना सकता है।

(लेखक प्राध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय और साहित्यकार है)

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