BIN(BPO IN Nepal) Debuts Global BPO Platform Led by Ex-NRN President Mr Bhaban Bhatta

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KATHMANDU, NEPAL : BIN (BPO in Nepal) proudly announces its global debut as Nepal’s first fully integrated Business Process Outsourcing company designed to compete on the international stage. The launch marks a significant milestone for Nepal’s service industry, positioning the country as an emerging hub for high-value outsourcing solutions.

Guided by the strategic vision of its Co-Founder and Chairman, Mr. Bhaban Bhatta, former President of the Non-Resident Nepali Association (NRNA) and a prominent international entrepreneur, BIN aims to elevate Nepal’s presence in the global BPO landscape. Mr. Bhatta’s extensive global network, business acumen, and commitment to national development have been pivotal in shaping the company’s mission and long-term strategy.

With a clear goal of redefining business support services through innovation, efficiency and integrated delivery, BIN is committed to offering world-class solutions tailored to the evolving needs of both domestic and international businesses. The company has built a strong foundation by assembling a team of seasoned professionals with deep expertise across multiple operational domains.

BIN’s comprehensive portfolio of services includes:

● Digital Marketing & Branding
● Video Production & Creative Content
● Web Development & IT Solutions
● Customer Support Services
● Legal & Compliance Services
● Accounting & Bookkeeping Services
● Investment Advisory & Business Consulting
● HR Outsourcing & Talent Management

“Our objective is to position Nepal as a competitive global outsourcing hub,” said Mr. Bhaban Bhatta, highlighting the company’s ambition to blend diverse expertise with advanced technology. “By integrating specialised skills and modern solutions, we aim to empower businesses worldwide with enhanced efficiency, scalability, and trust.”

In addition to expanding its global service footprint, BIN is committed to generating meaningful employment opportunities for Nepal’s youth, fostering skill development, and encouraging international partnerships that promote sustainable economic growth.

With a strong emphasis on quality, innovation, and customer satisfaction, BIN sets a new benchmark in Nepal’s journey toward becoming a global service provider.

सेक्टर 62 स्थित प्रेरणा भवन में हुआ प्रेरणा विमर्श 2025 के कार्यालयका उद्घाटन

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 नोएडा । प्रेरणा शोध संस्थान न्यास द्वारा प्रति वर्ष प्रेरणा विमर्श का आयोजन कियाजाता है। इस वर्ष प्रेरणा विमर्श 2025 का आयोजन 12, 13 एवं 14दिसंबर 2025 को ए-31, कल्याण सिंह सभागार, राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयीशिक्षा संस्थान (NIOS), सेक्टर-62, नोएडा में किया जाएगा। तीनदिवसीय इस राष्ट्रीय कार्यक्रम में 12 प्रमुख आयामों पर गहन चिंतन-मननएवं संवाद आयोजित होंगे। प्रेरणा विमर्श – 2025 का शुभारंभ 12 दिसंबर2025 (शुक्रवार) को ‘नारी शक्ति राष्ट्र वंदन यज्ञ’ एवं उद्घाटन समारोह सेहोगा।

इसी सन्दर्भ में प्रेरणा विमर्श 2025 कार्यक्रम के लिए कार्यालय काविधिवत उद्घाटन आज सेक्टर 62 स्थित प्रेरणा भवन में सम्पन्न हुआ। इसवर्ष विमर्श का विषय “नवोत्थान के नए क्षितिज” निर्धारित किया गया है, जो राष्ट्र, समाज और व्यक्तिगत विकास के नए आयामों पर केंद्रित रहेगा।

इस अवसर पर कार्यक्रम के संयोजक श्याम किशोर जी ने कार्यालय काउद्घाटन करते हुए कहा कि यह केंद्र कार्यक्रम से जुड़े सभी कार्यों कासमन्वयक स्थल रहेगा। उन्होंने बताया कि प्रतिभागियों और अतिथियों सेसंपर्क हेतु भरे जा रहे ऑनलाइन पंजीकरण फॉर्म का अनुमोदन/अग्रसारण, आमंत्रित अतिथियों की सूची एवं अन्य आवश्यक व्यवस्थाएँ यहीं सेसंचालित होंगी। कार्यालय प्रमुख श्री हरिओम जी को नियुक्त किया गयाहै, जो अपनी टीम एवं कार्यकर्ताओं के सहयोग से कार्यालय से संचालितहोने वाली गतिविधियों का संचालन करेंगे। इस अवसर पर रामकुमार शर्माजी, बी.के. गुप्ता जी, रवि श्रीवास्तव जी, मृदुला जी, रामकुमार जी, कांतिजी और अन्य कार्यकर्ता उपस्थित रहे।       

कामाख्या देवी,शक्ति, सृष्टि और तांत्रिक रहस्यों का जीवित केंद्र

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शिवानी दुर्गा

गुवाहाटी: असम के नीलांचल पर्वत पर स्थित कामाख्या मंदिर सिर्फ एक देवी का धाम नहीं, बल्कि संपूर्ण तांत्रिक परंपरा का धड़कता हुआ हृदय माना जाता है। यहाँ पूजा किसी साधारण वैदिक क्रम से नहीं, बल्कि स्त्री स्वरूप शक्ति के रजस्वला, गर्भ, योनितत्त्व और सृष्टि-संहृति के रहस्यों को केंद्र में रखकर की जाती है। यही कारण है कि कामाख्या को “कौलाचार का सर्वोच्च पीठ”, “गुप्त कामरूप” और “आदिशक्ति का वास्तविक गर्भ” कहा गया है।
कामाख्या में देवी की प्रतिमा नहीं है। यहाँ देवी योनि रूप में प्रतिष्ठित हैं , पृथ्वी की गर्भनाल के रूप में बहता हुआ जल, जिसे ‘नीलांचल जल’ कहा जाता है, स्वयं शक्ति की जीवित उपस्थिति का प्रमाण माना जाता है। गर्भगृह में उतरते ही साधक को अंधेरे, गीले चबूतरे पर स्थापित उस प्राकृतिक चट्टानी योनि के दर्शन होते हैं, जो निरंतर शीतल जलधारा से अभिषिक्त होती रहती है। इसे “योनि कुंड” कहा जाता है और यही वह स्थान है जहाँ देवी का साक्षात् रूप अनुभव किया जाता है।

कामाख्या में बलि, कौलाचार, पाञ्चरात्र, शाक्तागम, योगिनी साधना, कुमारी पूजन और तांत्रिक यज्ञ की परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है। यहाँ बलि सिर्फ बाहरी अनुष्ठान नहीं, बल्कि अहंकार, वासना और अविद्या की आंतरिक बलि का संकेत है। पशु बलि का ऐतिहासिक स्वरूप आज प्रतीकात्मक रूप से किया जाता है, जिसमें साधक अपने भीतर के ‘पशु भाव’ का विसर्जन करता है।

कामाख्या पीठ में छोटी बच्चियों की पूजा का विशेष महत्व है। कन्या पूजन यहाँ सृष्टि के संभावित रूप ‘नवजात शक्ति’ की आराधना मानी जाती है। माना जाता है कि कन्या स्वरूप में शक्ति का शुद्धतम रूप प्रकट होता है, इसलिए तांत्रिक और गृहस्थ दोनों इस पूजा को अत्यंत श्रद्धा से करते हैं। यह पूजा किसी व्रत या त्योहार का हिस्सा नहीं, बल्कि स्वयं देवी की प्रधान साधना मानी जाती है।

कामाख्या में यज्ञ का स्वरूप वैदिक अग्नि से अलग तांत्रिक अग्नि का है। यह अग्नि देवताओं को नहीं, बल्कि शक्तियों और योगिनी मंडलों को समर्पित होती है। यहाँ के यज्ञ मंडलों में 64 योगिनी, दाकिनी-शाकिनी, भैरवी, भैरव, मातृका और कौलाचार की विभिन्न परंपराएँ प्रतिष्ठित हैं। यज्ञ के दौरान साधक अपनी ऊर्जा को देवियों के मंडल से जोड़ता है और अपनी साधना में उन्नति के लिए शक्तियों को आह्वान करता है।

कामाख्या के गर्भगृह में प्रवेश किसी साधारण मंदिर के गर्भगृह जैसा नहीं है। यहाँ उतरते हुए हर सीढ़ी साधक को अपनी देह-चेतना से अलग करती जाती है। भीतर प्रवेश करते ही अंधकार, शीतल जल, प्राकृतिक गुफा जैसी संरचना और देवी की निश्चल उपस्थिति मन पर ऐसा प्रभाव डालती है कि साधक को भीतर ही भीतर कंपन और ऊर्जा का आघात अनुभव होता है। यह वही स्थान है जहाँ देवी सति का यौनांग (योनि) गिरी थी। इसी कारण यह स्थान स्त्री शक्ति, प्रजनन, सृष्टि और काम इन सभी तत्त्वों का आदिम केंद्र माना जाता है। इसी ‘काम’ से ‘कामाख्या’ नाम की उत्पत्ति मानी जाती है।

कामाख्या का पर्व अंबुबाची मेला पूरे विश्व में प्रसिद्ध है, जब देवी तीन दिनों तक रजस्वला मानी जाती हैं। इस दौरान गर्भगृह बंद रहता है और देवी का ‘रजस्वला जल’ साधकों को ऊर्जा, सिद्धि, रक्षा और अध्यात्मिक उन्नति का वरदान देता है। यह मेला इस बात का प्रमाण है कि सनातन परंपरा में स्त्री के रजस्वला होने को कभी अपवित्र नहीं माना गया, बल्कि उसे सृष्टि का परम पवित्र रूप स्वीकार किया गया।

कामाख्या में तांत्रिक साधना का मार्ग कई स्तरों में विभाजित है और यहाँ साधक अपने-अपने पथ के अनुसार दीक्षा लेकर साधनाएँ करते हैं। इस पीठ से जुड़ी तांत्रिक परंपराएँ कश्मीर शैव मत, कौलाचार, वाममार्ग, दक्षिणमार्ग और कापालिक मार्ग सभी को समाहित करती हैं। कहा जाता है कि जो साधक कामाख्या के गर्भगृह में सच्चे भाव से देवी को समर्पित होता है, उसकी इच्छा, यज्ञ, मंत्र और संकल्प अवश्य सिद्ध होते हैं।
कामाख्या सिर्फ एक मंदिर नहीं है , यह वह स्थान है जहाँ देवी स्वयं पृथ्वी की गर्भनाल के रूप में जीवित हैं। जहाँ ऊर्जा मूर्ति में नहीं, बल्कि जल में, चट्टान में, अंधेरे में और स्त्री स्वरूप में धड़कती है। जो साधक इस पीठ पर आता है, वह देवी के मूल स्वरूप सृष्टि, कामना, शक्ति और मुक्ति का अनुभव लेकर लौटता है।
इसलिए कामाख्या को ‘शक्ति का स्रोत’ नहीं, बल्कि शक्ति की शिरा कहा गया है , जहाँ से तांत्रिक मार्ग की हर सिद्धि, हर शक्ति और हर आशीर्वाद प्रवाहित होता है।

(लेखिका तंत्र साधक और तंत्र विषय की शोधार्थी हैं)

शोलिंगनलूर श्री महा प्रत्यंगिरा पीठ, दक्षिण भारतीय तांत्रिक परंपरा का जीवित प्रयोगशाला

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शिवानी दुर्गा

चेन्नई के शोलिंगनलूर में स्थित श्री महा प्रत्यंगिरा देवी मंदिर केवल एक शक्तिपीठ नहीं, बल्कि दक्षिण भारतीय तंत्र, आगमिक परंपरा और अथर्वण विद्या का सजीव संगम है। मंदिर में प्रवेश करते ही साधक की यात्रा सामान्य भक्ति से सीधे गूढ़ तांत्रिक अनुभव की ओर मुड़ जाती है, और यह यात्रा शुरू होती है माँ वाराही के सान्निध्य से।
द्वार से भीतर आते ही सबसे पहले वाराही देवी का मंदिर दर्शन देता है। भूमितत्त्व, रक्षण और भौतिक सिद्धि से जुड़ी यह देवी यहाँ हल्दी की गांठों से पूजित होती हैं। हल्दी को प्राचीन शास्त्रों में पृथ्वी की गरिमा, रोग-नाश, आयु और तांत्रिक शुद्धि का प्रतीक माना गया है; वाराही को हल्दी अर्पित करना साधक के लिए ऐसा है मानो वह आगे की उग्र साधना से पहले अपने चारों ओर एक सुरक्षा वृत्त रच रहा हो। वाराही का यह प्रथम दर्शन और हल्दी समर्पण पूरे देवालय के अनुभव का ‘ग्राउंडिंग’ भाग है साधक पहले धरती से जुड़ता है, फिर अग्नि और आकाश की उग्रता में प्रवेश करता है।

वाराही के पश्चात जब साधक मुख्य गर्भगृह की ओर बढ़ता है तो उसकी ऊर्जा सीधे महा प्रत्यंगिरा देवी के मंडल में प्रवेश करती है। यहाँ देवी ‘नरसिंही’ रूप में प्रतिष्ठित हैं सिंहमुखी, उग्र, किंतु रक्षणकारी। वे वही शक्ति हैं जिन्हें वेदों में अथर्वण भद्रकाली के रूप में याद किया गया है, अर्थात् अथर्ववेद की मायावी, मंत्र तांत्रिक और रक्षात्मक शक्तियों की अधिष्ठात्री देवी।  प्रत्यंगिरा को प्रति अंगिरा भी कहा गया ,जो प्रतिकूल या आक्रमक तांत्रिक ऊर्जा को पलटकर उसके प्रभाव को साधक से दूर कर देती है; इसीलिए उन्हें विशेष रूप से काला जादू, अभिचार और दुष्ट शक्तियों के निवारण से जोड़ा जाता है।

 

दक्षिण भारत की आगमिक परंपरा में ऐसे देवालय केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि विधिवत आगम निर्दिष्ट प्रयोगशालाएँ होती हैं। प्रत्यंगिरा देवी के होम, न्यास, यंत्र पूजन और महामंत्र जप के विस्तृत विधान दक्षिण भारतीय शक्त-आगमों और तांत्रिक परंपराओं में मिलते हैं, जिनमें देवी को विशेष रूप से रक्षण तत्त्व की मूर्तिमान शक्ति माना गया है।  शोलिंगनलूर का यह पीठ उसी आगमिक धारा का आधुनिक रूप है यहाँ की होम शाला, अग्निकुंड, दिशा-विन्यास और अनुष्ठानिक क्रम यह संकेत देते हैं कि मंदिर की पूरी संरचना साधक की ऊर्जा परिवर्तन (ट्रांसम्यूटेशन) के लिए रची गई है, न कि केवल दर्शन के लिए।

मुख्य गर्भगृह के ठीक बाहर, दायीं ओर स्थित उच्छिष्ठ गणपति का स्थान इस देवालय के तांत्रिक चरित्र को और स्पष्ट करता है। उच्छिष्ठ गणपति गणेश के दुर्लभ तांत्रिक रूपों में गिने जाते हैं, जिन्हें शास्त्रों में उच्छिष्ट -अर्थात यज्ञोपरांत बचा हुआ, नियम-दृष्टि से ‘अपवित्र’ समझे जाने वाले अंश के अधिपति के रूप में वर्णित किया गया है। यह वही रूप है जिसमें गणपति वामाचार तंत्र में काम-शक्ति, इन्द्रिय नियंत्रण, वशीकरण और मंत्र-सिद्धि के अधिष्ठाता देव माने जाते हैं।  उनके नाम और स्वरूप में ही यह शिक्षा छुपी है कि जिसे आम धारणा अपवित्र या त्याज्य मानती है, वही ऊर्जा सही मार्गदर्शन में साधक को बन्धन से मुक्त कर सकती है।

तांत्रिक दृष्टि से देखें तो वाराही-प्रत्यंगिरा-उच्छिष्ठ गणपति का यह क्रम अत्यंत अर्थपूर्ण है। द्वार पर वाराही जो स्थूल जगत की सुरक्षा, भोजन, स्वास्थ्य और भूमिगत भय को संतुलित करती हैं। गर्भगृह में महा प्रत्यंगिरा जो सूक्ष्म स्तर पर अभिचार, दृष्टदोष और अदृश्य हमलों को नष्ट करती हैं। और बाहर दाहिनी ओर उच्छिष्ठ गणपति जो साधक की इन्द्रियों, वासनाओं और ‘टैबू’ समझी जाने वाली ऊर्जा को साधना के पथ पर मोड़ने का बीज-मंत्र हैं। शास्त्रीय परंपराएँ उच्छिष्ठ गणपति को इन्द्रिय-विजय और वासना-परिवर्तन के देव के रूप में भी वर्णित करती हैं, जो वज्र की तरह उस कच्ची शक्ति को साधक के भीतर ही ऊपर की ओर मोड़ देते हैं।

अथर्ववेद, जहाँ भद्रकाली-प्रत्यंगिरा को जादुई और रक्षात्मक सूक्तों की अधिष्ठात्री माना गया, और दक्षिण भारतीय आगम, जहाँ देवी की प्रतिष्ठा, होम, यंत्र और मण्डल का विस्तृत विधान मिलता है – दोनों धाराएँ इस देवालय में एक साथ प्रकट होती हैं।  यही कारण है कि शोलिंगनलूर प्रत्यंगिरा पीठ को केवल एक “लोकप्रिय मंदिर” कहकर नहीं समझा जा सकता; यह वास्तव में अथर्वण-विद्या, आगमिक शैव-शाक्त तंत्र और वामाचार गणपति–उपासना , इन तीनों की संयुक्त धारा का जीवित केन्द्र है।

जब कोई साधक इस मंदिर में प्रवेश करता है, वाराही के चरणों में हल्दी रखता है, मुख्य गर्भगृह में महा प्रत्यंगिरा की उग्र-करुणा को निहारता है, और बाहर दाहिनी ओर उच्छिष्ठ गणपति के स्थान पर दृष्टि टिकाता है, तो अनजाने ही वह एक संपूर्ण तांत्रिक सूत्र में प्रवेश कर चुका होता है -स्थूल से सूक्ष्म, भय से निर्भयता, और ‘अपवित्र’ मानी गई शक्ति से अंततः परम-शुद्धि तक की यात्रा। शोलिंगनलूर का यह मंदिर इसी कारण मेरे लिए केवल देवदर्शन का स्थल नहीं, बल्कि एक जीवित तांत्रिक विश्वविद्यालय है, जहाँ देवी स्वयं साधक को सिखाती हैं कि सुरक्षा, उग्रता और इच्छा ये तीनों यदि सही तरह साधे जाएँ तो मुक्ति का मार्ग बन जाते हैं।

(लेखिका तंत्र साधक और तंत्र विषय की शोधार्थी हैं)

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