जंगल की सौंधी खुशबू में नहाई है कांतारा:चैप्टर वन

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ऋषभ कुमार

भारतीय संस्कृति की पहचान सनातन संस्कृति के रूप में होती है। सनातन’ यानी कि “हमेशा रहने वाला” या “शाश्वत”, जिसका न कोई आदि है और न कोई अंत। नाम से इतर भी अगर बात करें तो इस पृथ्वी पर मौजूद सभी संस्कृतियों में सबसे पुरातन भारतीय संस्कृति को कहा जा सकता है। हमारी अपनी एक समृद्ध परंपरा रही है, जो सहस्त्राब्दियों में हुए तमाम परिवर्तनों को साधते हुए, अभी भी अपनी पुरातनता में जीवित है। इसको समृद्ध करने और बनाए रखने में सबसे बड़ा योगदान यहां की लोकपरंपराओं और लोकआस्था का रहा है। हमारे यहां हर एक गांव के अपने लोकदेवता होते हैं, जिनको ग्रामदेवता और क्षेत्रपाल के रूप में जाना जाता है और पूजा जाता है। ये या तो ईश्वर के कोई गण होते हैं या कोई ऐसी महान आत्मा जिसने अपने अच्छे कार्यों द्वारा देव का दर्जा प्राप्त किया होता है। इनके बारे में तमाम दंतकथाएं भी प्रचलित होती हैं। ये वहां के रहवासियों को हर समस्या से जूझने की शक्ति और विश्वास प्रदान करते हैं। तमाम संकटों के बाद भी आस्था के द्वारा उनमें जिजीविषा को बनाए रखने में मदद करते हैं। ऐसे ही लोक देवताओं और उनसे जुड़ी दंतकथाओं को पर्दे पर चरितार्थ करते हुए ऋषभ शेट्टी एक बार फिर लेकर आए हैं ‘कंतारा’ का प्रिक्वल ‘कांतारा-अ लिजेंड:चैप्टर वन’।

फिल्म का आधार है,भूतकोला। जिसका अर्थ है दैवीय नृत्य। जो तुलुनाडु अर्थात कर्नाटक और उत्तरी केरल के तटीय इलाकों में प्रचलित है और जो समर्पित किया जाता है, वहां के लोकदेवता पंजुरी और गुलिका को। जिनको शिव के गण के रूप में पूजा जाता है। इनके पृथ्वी पर आने की अलग-अलग दंतकथाएं प्रचलित है। वो कथाएं फिर कभी। जहां पंजुरी शांत स्वभाव के हैं वहीं गुलिका अपने रौद्र स्वभाव और अनंत भूख के लिए जाने जाते हैं, भूख ऐसी कि जिसे शांत करने के लिए साक्षात नारायण को अपनी उंगली परोसनी पड़ी और जब फिल्म में यह अपने विविध रूपों में ऋषभ शेट्टी पर आते हैं तो यह दृश्य देखते ही बनता है।

अब यह पृथ्वी पर हैं और इनका कार्य है; क्षेत्रपाल के रूप में, क्षेत्र रक्षण का। इनके रक्षण का क्षेत्र है ‘ईश्वर का मधुवन’ जहां साक्षात् भगवान शिव और माता पार्वती तपस्या में लीन रहते हैं। इस क्षेत्र को कांतारा के नाम से भी जाना जाता है। इसी क्षेत्र में एक आदिवासी समुदाय रहता है। जिन्होंने प्रकृति से अद्भुत सामंजस्य स्थापित किया हुआ। यह जंगल का सम्पूर्ण क्षेत्र अद्भुत और बेशकीमती औषधियों से भरा है जो और कहीं प्राप्त नहीं होती हैं। अब संपदा है, तो स्वार्थ भी है और लालच भी, इस प्रकृति के वरदान को हड़पने का। तो एक राजा है स्वार्थ की प्रतिमूर्ति, अत्यंत क्रुर जिसकी नज़र पड़ती है ईश्वर के मधुवन पर।

जो वहां के आदिवासियों को हटा कर उस समूचे वन क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित करना चाहता है पर वह देव के क्रोध का शिकार बनता है और साथ ही देव के भयंकर रूप को देखकर उसका पुत्र भय से आतंकित होकर इस जंगल से भागता है और नन्हा राजकुमार मिलता है, एक दूसरी जनजाति से जो है, कदबा। जिनका स्वार्थ है, देव की अद्भुत शक्तियां और जो काला जादू करके देव की शक्तियों को अपने वश में करना चाहती है। सब अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में रहते हैं और तब कहानी फैलती है, कांतारा में ब्रह्मराक्षस होने की। भय की वज़ह से वो एक दूसरे के क्षेत्र में नहीं जाते हैं। पर जब अधिकार क्षेत्र की मर्यादाएं टूटतीं है तो फिल्म में असली संघर्ष शुरू होता है और संघर्ष ऐसा की कई जगह आपको गूज़वम्प आते हैं।

फिल्म की कहानी में जो लोक परंपरा और आस्था को दर्शाता गया है, वह बहुत ही दर्शनीय बन पड़ा है। ऋषभ शेट्टी ने जो कहानी को गढ़ा और संवारा है वह तारीफ योग्य है। बल्कि यहां मैं यह जोडूंना चाहूंगा कि लोककथा या किंवदंतियों से जुड़ा यह कहानियों का एक ऐसा क्षेत्र है जो हीरे की वह खदान है जिसमें अभी खनन की शुरुआत की गई है और अगर इसका अच्छा उपयोग किया जाए तो इससे एक से बढ़कर एक कहानी रूपी हीरे निकल सकते हैं।‌ कहानी का एक यूनीक पार्ट है आदिवासियों को टिपिकल फिल्मों से अलग दिखाते हुए। बुद्धिमान रुप में प्रस्तुत करना। जो अशिक्षित तो है पर कॉमन सेंस का प्रयोग करते हुए स्वयं से विकसित संस्कृति की तमाम खूबियों को बहुत ही कम समय में अपनी तार्किक बुद्धि द्वारा सीख कर अपने यहां उनका प्रयोग करने लगता है।

बात अगर एक्टिंग की करें तो ऋषभ शेट्टी चौकाते हैं, वो अपनी एक्टिंग के लिए पूरी तरह से कमिटेड दिखाई देते हैं, उन्होंने वरमै के चरित्र को जीवंत किया है। क्लाइमेक्स में उन्हें देखना अद्भुत है, जब चामुंडी उनके अंदर आतीं हैं तो उनका एकदम से स्त्रैण हो जाना बाकई दर्शनीय है। दूसरी किरदार है राजकुमारी कनकावती जिसे निभाया है, रुक्मिणी वसंत। जो कोमलांगी प्रेमिका और दुष्ट राजकुमारी दोनों ही रूप में बखूबी जंची हैं। राजा राजशेखर बने हैं जयराम जो अपने चरित्र के साथ न्याय करते हैं और उसके शेड्स को बखूबी साधते नज़र आते हैं। राजा कुलशेखर बने हैं गुलशन देवैया जो अय्याश राजा का टिपिकल कैरैक्टर ही निभाते दिखते हैं। शायद ऋषभ शेट्टी को इनके कैरेक्टर को लिखने में और मेहनत करने की आवश्यकता थी। बांगरा के पहले राजा विजेंद्र बने हरिप्रशांथ ने भी छोटा और इंपैक्टफुल किरदार निभाया है। मायाकारा का भी किरदार भी बहुत इंपैक्टफुल रहा है।

फिल्म में चार चांद लगाते हैं उसके सीन्स और बैकग्राउंड म्यूजिक जो दृश्य में प्रयुक्त इमोशन की इंटैंसिटी को बढ़ाने का कार्य करता। यह फिल्म हमें एक अलग तरह का ही एक्शन दिखाता है जो मजेदार है, विजुअल इफेक्ट्स भी लाजबाव बन पड़े हैं। डबिंग की बात करें तो गीतों और कॉमिक पर अभी काम करने की आवश्यकता है। डबिंग में कॉमेडी का पूरी तरह से खत्म हुई लगती है। हां, कुछ-कुछ डायलॉग बढ़िया बन पड़े हैं।

कुलमिलाकर कहा जाए तो फिल्म बहुत ही अच्छी बन पड़ी है। जो आपको कुछ अलग ही एक्सपीरियंस देती है। जंगल को आप तक लाती है और आपको बारिश में भींगी सौंधी मिट्टी की खुशबू देती है। तो इसे देखना एक ट्रीट जैसा है तो जाइए खुदको और अपने परिवार को यह ट्रीट दीजिए और दोस्तों को भी।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में शोध छात्र हैं)

पूरे देश में एकत्व और सामाजिक जागरण का अलख जगाया

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भोपाल । महर्षि वाल्मीकि भारत के उन विरली विभूतियों में से एक हैं जिनकी उपस्थिति पूरे देश में है और सभी सामाजिक स्वरूप में मान्यता है । हर समाज उन्हें अपना पूर्वज मानकर गर्व करता है । भारत की समाज व्यवस्था जन्म के आधार पर कभी नहीं रही । गुण और कर्म के आधार पर रही है । महर्षि व्यास की माता मछुआरा समाज से हैं तो महर्षि जाबालि की माता गणिका। लेकिन अपने गुण कर्म ऋषि बने । इसी प्रकार बाल्मीकि जी भी अपने गुण कर्म से महर्षि बने । इसलिये समाज में उनकी गणना महर्षि परंपरा में होती है
उनकी मान्यता भारत के सभी समाज जनों में हैं । सब उन्हें अपना मानते हैं । भारत के भील वनवासी समाज उन्हेंअपना पूर्वज मानता है, पंजाब में एक समाज स्वयं को क्षत्रिय मानता है और वाल्मीकि जी को अपना पूर्वज, मालवा और राजस्थान में सेवावर्ग से संबंधित एक समाज स्वयं को बाल्मीकि का वंशज मानता है । गुजरात में उन्हें निषाद समाज से संबंधित माना जाता है । भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में बाल्मीकि जी अलग अलग समाज से जोड़ कर देखा जाता है । स्वयं को वाल्मीकी जी का वंशज मानने वालों में उपनाम भी ऐसे हैं जो सभी वर्गों की ओर इंगित करते हैं । वाल्मीकि समाज में “चौहान” उपनाम भी होता है और “झा” उपनाम भी । बिहार प्राँत के भोजपुरी क्षेत्र में “झा” ब्राह्मणों में उपनाम होता है तो “चौहान” पूरे देश में क्षत्रियों का उपनाम माना जाता है । वाल्मीकि समाज में “वर्मा” भी होते हैं और चौधरी एवं पटेल भी । इस प्रकार वे लगभग सभी वर्गों और उपवर्गो में मान्य हैं । महर्षि वाल्मीकि किस समाज या समूह से संबंधित हैं, इस पर मतभेद हो सकते हैं पर यह तथ्य सर्व स्वीकार्य है कि वे संसार के आदि कवि हैं, उन्होंने पुरुषार्थ, परिश्रम और तप से अपने व्यक्तित्व का निर्माण किया । वे सर्व समाज में मार्गदर्शक और पूज्य हैं । वे भारत में सामाजिक एकत्व और समरसता के प्रतीक हैं । उन्होंने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से संपूर्ण समाज और भूभाग को एक सूत्र में पिरोया । वे सबके लिये आदर्श थे तभी तो दशरथ नंदन राम ने उन्हें धरती पर लेटकर साष्टांग प्रणाम किया था और उन्हीं से वन में रहने के लिय सुगम स्थान पूछा । माता सीता उन्ही के आश्रम में रहीं और बाल्मीकि जी ने ही लवकुश को शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा दी । भारतीय वाड्मय में जिस प्रकार उनकी सामाजिक व्यापकता है । भारत के हर प्राँत और क्षेत्र में बाल्मीकि जी के आश्रम होने का उल्लेख मिलता है । इससे एक बात स्पष्ट होती है कि या तो स्वयं वाल्मीकि जी ने संपूर्ण भारत की यात्रा करके समाज और राष्ट्र को एक स्वरूप में बांधने का प्रयास किया होगा अथवा उनकी शिष्य परंपरा पूरे देश में फैली और अपने गुरु महर्षि बाल्मीकि जी के नाम पर आश्रम स्थापित करके संपूर्ण भारत राष्ट्र को एक ही ज्ञानसूत्र में पारोया । इसीलिये उनका संदर्भ सभी समाजों में और देश के सभी स्थानों में मिलते हैं ।

बाल्मीकि जी का जन्म और जन्म कथायें

उनका जन्म अश्विन माह की पूर्णिमा को माना जाता है । शरद पूर्णिमा के रूप में यह पूर्णिमा विशिष्ट है । इस वर्ष यह पूर्णिमा 6 अक्टूबर को पड़ रही है । इसलिये इस वर्ष 17 अक्टूबर को बाल्मीकि जयंति मनाई जा रही है । भारत के विभिन्न स्थानों बाल्मीकि के मंदिर या तपस्या स्थल मिलते हैं। इन सभी स्थानों में उनके जन्म स्थान होने की मान्यता है । नेपाल, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, विहार, मध्यप्रदेश महाराष्ट्र, गुजरात और छत्तीसगढ़ ही नहीं सुदूर केरल में भी वाल्मीकि जी के मंदिर हैं । नेपाल के चितवन जिले में वाल्मीकि मंदिर है तो उत्तर प्रदेश में तमसा, सोना और सप्त गंडक के संगम स्थल को उनकी जन्म स्थली और आश्रम होने की मान्यता है । एक दावा प्रयाग से लगभाग चालीस किलोमीटर दूर झाँसी माणिकपुर रोड पर उनके जन्म स्थान होने का दावा किया जाता है तो एक दावा चित्रकूट का है । एक दावा सीतामढी के बिठूर में तो एक दावा हरियाणा फतेहाबाद में और कोई मध्यप्रदेश के मंडला जिले में नर्मदा संगम पर बने वाल्मीकि आश्रम को उनकी तपोस्थली मानता है । इन सभी स्थानों पर शरद पूर्णिमा को पूजन भंडारे होते हैं । कहीं कहीं तो चल समारोह भी निकलते हैं ।
जैसी विविधता उनके जन्मस्थान की है वैसी ही विविध पुराणों और ग्रंथो विविधता से भरा उनका संदर्भ मिलता है । उनकी जन्म कथाएँ भी विविध हैं । कुछ पुराण कथाओं में उन्हें प्रचेता का ग्यारहवाँ पुत्र और महर्षि भृगु का भाई बताया है तो कहीँ महर्षि अंगिरा का वंशज, कहीँ उन्हे वनवासी बताया गया है और पिता का नाम सुमाली लिखा है । लेकिन सभी कथाओं में यह एक बात समान है कि बाल्मीकि जी का नाम रत्नाकर था, और उनका पालन पोषण वनवासी भील समाज में हुआ । वे आजीविका के लिये चाँडाल कर्म करते थे । उन दिनों चोरी डकैती, शमशान घाट में काम करके अथवा हिंसात्मक कार्यों से आजीविका कमाने वालों को चाँडाल कहा जाता था । पुराण कथाओं के अनुसार एक दिन नारदजी कहीं जा रहे थे । मार्ग में रत्नाकर ने रोका और लूटने का प्रयास किया पर नारद जी ने कहा कि उनके पास तो वीणा है ।इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं । रत्नाकर ने वीणा ले ली । वीणा देकर नारद जी ने पूछा कि यह सब किसलिये करते हो । रत्नाकर ने कहाकि “परिवार पालन केलिये” । नारद जी ने कहा कि यह दस्युकर्म तो पाप है और पूछा कि “क्या परिवार जन इस पाप में भी भागीदार होंगे” ? सुनकर चौंक पड़े रत्नाकर और घर जाकर यही प्रश्न परिवार से पूछा तो सबने पाप की सहभागिता से अपना पल्ला झाड़ लिया । इसी घटना से रत्नाकर का हृदय परिवर्तन हो गया । उन्होंने चाँडाल कर्म छोड़कर भक्ति आरंभ की । कठोर तप के बाद ब्रह्म ज्ञान प्राप्त हुआ। और उनके मुँह से व्याकरण युक्त संस्कृत के पहला श्लोक प्रस्फुटित हो गया । आगे चलकर उन्हें ऋषित्व प्राप्त हुआ और वे महर्षि कहलाये ।

“वाल्मीकि” नाम का रहस्य

वाल्मीकि नाम साधारण नहीं है ।।सामान्य तौर पर कहा जाता है कि कठोर तप और साधना में इतने निमग्न हो गये थे शरीर पर दीमक लग गयी थी दीमक का एक नाम बाल्मी भी कहा जाता है इसलिए उनका नाम वाल्मीकि पड़ा । लेकिन यह तो लोक चर्चा है । जिस संस्कृत में स्वर और व्यंजन की ध्वनि भी गहरे अनुसंधान के बाद निश्चित किये गये, प्रत्येक नाम सार्थक रखे जाते थे तब वाल्मीकि नाम निरर्थक नहीं हो सकता है । वस्तुतः “वाल्मीकि” शब्द संस्कृत की दो धातुओं से मिलकर बना है । संस्कृत में एक धातु है “वल्” जिसका अर्थ होता है केन्द्रीयभूत शक्ति । दूसरी धातु है “मक्” जिसका अर्थ आकर्षण होता है । इन दोनों धातुओं की संधि से शब्द बना “वाल्मीकि” जिसका अर्थ होता आंतरिक शक्ति का आकर्षण । नाम के अर्थ के संदर्भ में भी वाल्मीकि जी के व्यक्तित्व को देखें । उनका अमृत्व उनके जन्म या परिवार की पृष्ठभूमि के कारण नहीं अपितु उनकी ज्ञानशक्ति के कारण है । यह ज्ञान उन्हे अपनी आंतरिक प्रज्ञा शक्ति से उत्पन्न हुआ और इसी से संसार के प्रत्येक व्यक्ति के लिये आकर्षण का केंद्र बने ।

वाल्मीकि जी का कृतित्व

महर्षि वाल्मीकि संस्कृत में काव्यविधा के जन्मदाता माने जाते हैं । यह मान्यता है कि संस्कृत की पहली काव्य रचना उन्हीं के स्वर में प्रस्फुटित हुई । भारत के लगभग सभी काव्य रचनाकारों ने अपना साहित्य सृजन करने से पहले उनकी वंदना की है । इनमें पूज्य आदिशंकराचार्य भी हैं और रामानुजार्य भी । राजाभोज भी हैं और संत तुलसीदास भी । वैदिक काल से आधुनिक काल तक भारत में ऐसा कोई काव्य रचनाकार नहीं जिनने उनका स्मरण न किया हो । उन्होंने ऋषित्व ही नहीं देवत्व भी प्राप्त किया । वे वैदिक ऋषि हैं। उनके द्वारा रचित वाल्मिकी रामायण भारत ही नहीं अपितु संसार भर का पहला महाकाव्य है । इस महाकाव्य में पच्चीस हजार श्लोक हैं और हर हजारवें श्लोक का आरंभ गायत्री मंत्र के प्रथम अक्षर होता है । उनकी रामायण रचना की दो विशेषताएं हैं । एक तो इसमें सूर्य और चन्द्र की स्थिति का सटीक उल्लेख है । इससे अनुमान है कि उन्हें अंतरिक्ष या सौर मंडल का भी ज्ञान था । दूसरा रामजी के वनवास काल के वर्णन में स्थानों के नाम, उनकी भौगोलिक स्थिति और मौसम का जिस प्रकार का वर्णन है, यह केवल कल्पना से संभव नहीं हैं । स्थानों के नाम और स्थिति का उल्लेख यथार्थ परक है इससे लगता है कि उन्होंने रामायण लिखने से पूर्व राम जी के वन गमन पथ की यात्रा की, अध्ययन किया और उसी आधार पर वर्णन किया । उनके वर्णन में सामाजिक एकत्व और समरसता को जिस प्रमुखता से विवरण दिया गया है । विशेषकर वनवासी एवं ग्रामवासी समाज के विभिन्न समूहो एवं उप समूहों में एकरूपता का अद्भुत विवरण है । इससे यह बात स्पष्ट है कि प्राचीन भारत के विभिन्न भूभागों में निवास रत व्यक्तियों के बीच वे एकत्व और समरसता का भाव रहा है और इसी का सटीक विवरण बाल्मीकि जी ने दिया । वे सही मायने में राष्ट्र जागरण और सामाजिक एकत्व के अभियान में सक्रिय रहे । उन्होंने रामायण के अतिरिक्त और भी काव्य रचनाएं तैयार की। भारतीय रचना शीलता जगत में गुरु वंदना के अतिरिक्त भगवान गणेशजी और माता सरस्वती के बाद बाल्मीकि जी की ही वंदना की जाती है । इसे भारतीय वाड्मय के किसी भी ग्रंथ रचना से समझा जा सकता है ।

मामाजी माणिकचन्द्र वाजपेयी: पत्रकारिता की आत्मा और राष्ट्रधर्म के अग्रदूत

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नैवेद्य पुरोहित

भोपाल । मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी की 106वीं जन्म जयंती के अवसर पर विश्व संवाद केन्द्र भोपाल में “मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी स्मृति व्याख्यान” का आयोजन हुआ। यह आयोजन ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता के उस युगपुरुष को नमन करने का अवसर बना, जिन्होंने पत्रकारिता को राष्ट्रधर्म के रूप में जिया। कार्यक्रम की शुरुआत महर्षि वाल्मीकि के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करके हुई। प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी विश्व संवाद केन्द्र की स्मारिका का विमोचन किया गया, जिसका विषय था: “कन्वर्जन का खेल: निशाने पर जनजातीय”।

पत्रकारिता की आत्मा राष्ट्रहित में निहित – गिरीश जोशी

मुख्य वक्ता माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सहायक कुलसचिव गिरीश जोशी ने कहा कि मामाजी की पत्रकारिता का एक ही लक्ष्य था राष्ट्रहित। उन्होंने कहा, “पत्रकारिता का माध्यम बदल सकता है, क्लेवर बदल सकता है, पर उसकी आत्मा नहीं बदलती।” उन्होंने गीता के श्लोक “नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि…” का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस प्रकार आत्मा अमर है, उसी प्रकार पत्रकारिता की आत्मा कभी नहीं बदली। भारत में पत्रकारिता की आत्मा को गढ़ने वाले कुछ महर्षियों में मामाजी का नाम सर्वोपरि है। आज हम उनका स्मरण क्यों कर रहे है आखिर क्या था इस व्यक्ति में हम पाएंगे वो जो मूल्य थे उनमें पत्रकारिता के मूल्य थे और पत्रकारिता के अलावा मानवीय मूल्य थे। उन्होंने कुछ अंश जो मामाजी ने लिखे थे वो सुनाए। एक अंश पढ़ा उन्होंने जो आपातकाल के पहले लिखा था। “एक होती है बुद्धि एक है विवेक और फिर है प्रज्ञा जो ध्येय के साथ एकाकार हो जाते है। मामाजी की प्रज्ञा क्या होगी उन्होंने पूर्वाभास जता दिया था कि आपातकाल लग सकता है, अपनी ध्येय से इतना एकाकार हो जाना की प्रज्ञा जागृत हो जाए। प्रज्ञा जागृत हो जाने के बाद आपको भविष्य में जो घटनाएं होने वाली है वो दिख जाती है। उस कालखंड में उनकी कलम की धार देखिए। वह डगमगाई नहीं। उन्हें पढ़ने के बाद पाठक वैचारिक रूप से समृद्ध होता था। आज भी बहुत प्रेरक है।”

मेरी आत्मा पर मामाजी के छींटे पड़े – गिरीश उपाध्याय

स्वदेश के सलाहकार संपादक गिरीश उपाध्याय ने अपने बेहद मार्मिक संस्मरण साझा किए। उन्होंने कहा, “हीरे से पूछिएगा कि जौहरी का क्या महत्व है तो वह क्या बोलेगा। मैं आज जो भी कुछ हूं जहां भी हूं जिस भी स्थिति में हूं उसका संपूर्ण श्रेय मामाजी को है।” जब उन्हें नौकरी की तलाश थी वे राजेन्द्र शर्मा के पास गए उस समय स्वदेश भोपाल से शुरू होने वाला था। राजेन्द्र जी ने इंदौर में मामाजी के पास भेज दिया काम सीखने के लिए। इंदौर में रामबाग स्थित स्वदेश कार्यालय जब वे गए तब स्वदेश का दफ्तर एक आंगन जैसा था, “मामाजी का व्यक्तित्व एक सख्त लौहार जैसा था। मामाजी की मूछें उनके होठों को ढंक लेती थी, उनकी आवाज़ जो थी वो मूंछों के बाल में से छन के आती थी।”
अपनी प्रथम रिपोर्टिंग से जुड़े संस्मरण सुनाते हुए गिरीश जी कहते है, “मामाजी ने रिपोर्टिंग के लिए मुझे इंदौर के सबसे बड़े सांस्कृतिक आयोजन का कवरेज के लिए भेजा वो था अनंत चतुर्दशी की झांकी का कवरेज। उन्होंने मुझे न कोई पोलिटिकल काम सौंपा, न कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस में भेजा उन्होंने मुझे पहला काम सौंपा नगर को जानने का। उनका कहना था नगर की संस्कृति को जानो, उसके परिवेश को जानो, उसके जनमानस को जानो, उसके उल्लास को जानो। ये जो स्टेप बाय स्टेप पत्रकार को गढ़ने का काम है। वो उन्होंने किया।”
आखिर में उन्होंने कहा, “मैं धन्य हुआ कि मेरी आत्मा पर मामाजी के छींटे पड़े। मामाजी ने अपने कर्म से अपने धर्म से अपने आचरण से अपने चरित्र से उन्होंने मुझे स्वयंसेवक बनाया। हमको संस्कार देने के लिए किसी को बाध्य करने की आडंबर करने की कोई जरूरत नहीं होती हम वो उदाहरण प्रस्तुत करते है। संपादक की सहजता और सरलता उनसे सीखी जा सकती है। मैं मामाजी से वो 50 रूपए की उधारी लेकर भोपाल आया।”

मामाजी जैसे संपादकों की हम सिर्फ आज कल्पना कर सकते है – लाजपत आहूजा

कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्व संवाद केन्द्र के अध्यक्ष लाजपत आहूजा ने की। उन्होंने कहा, “मामाजी भिंड में एक निजी महाविद्यालय चलाते थे। एक सज्जन को उनके पास भेजा गया। मामाजी ने उनसे कहा तैरना जानते हो, वो अचकचा गए उन्होंने मना किया कि तैरना तो नहीं जानते। फिर बाद में उन्होंने बताया कि महाविद्यालय तक पहुंचने के लिए बीच में नदी पड़ती। पढ़ाओगे तो तब जब वहां पहुंचोगे।बाद में वो दोनों ही लोग स्वदेश के प्रधान संपादक बने एक तो मामाजी थे और दूसरे कृष्ण कुमार अष्ठाना जी।” मामाजी एक जमीनी आदमी थे। जमीनी आदमी पहले जमीनी हकीकत जानना चाहता है। एक शिक्षक से वो पत्रकार बने। मामाजी की गोदी में बैठकर उनकी मूंछों से खेलने वाले भी आज संपादक बन गए है। उन्होंने जो शब्द लिखे वो शब्द जिए है कोई ऐसा संपादक? एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि, “मध्यप्रदेश में एक समय श्रममंत्री हुआ करते थे गंगाराम तिवारी जो एक सेक्स स्कैंडल में फंस गए थे। उनके सारे फोटोग्राफ्स स्वदेश के पास आ गए थे। लेकिन मामाजी ने कहा हमारा पत्र पारिवारिक पत्र है हम संस्कार क्या देंगे। उन्होंने वो सभी चित्र छापने से इनकार कर दिया। मामाजी ने पत्रकारिता के नैतिक मापदंड हमेशा साथ रखें। किसी भी अखबार के लिए उस समय चित्रों का बड़ा महत्व था। ऐसे निष्प्रय संपादकों की सिर्फ आज हम कल्पना कर सकते है।”

कार्यक्रम का संचालन सुश्री अदिति ने किया और आभार विश्व संवाद केन्द्र भोपाल के सचिव लोकेंद्र सिंह ने माना। आज के दौर में जब पत्रकारिता अपनी दिशा खोज रही है, तब मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी के मूल्य ही उसे सही मार्ग दिखा सकते हैं। उनकी पत्रकारिता केवल शब्द नहीं एक साधना थी और उनका जीवन राष्ट्रहित के लिए समर्पित था।

बिहार का चुनाव: सियासी दंगल या लोकतंत्र की अग्नि परीक्षा?

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नवंबर 6 और 11, 2025 को होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव, और 14 नवंबर को आने वाले नतीजे, इस बार सिर्फ़ एक राजनीतिक मुक़ाबला नहीं बल्कि लोकतंत्र की एक बड़ी परीक्षा माने जा रहे हैं। 243 सीटों पर वोटिंग होगी और 7.42 करोड़ से ज़्यादा मतदाता, जिनमें 14 लाख नए वोटर्स शामिल हैं, तय करेंगे कि बिहार की गद्दी पर कौन बैठेगा — नीतीश कुमार के नेतृत्व वाला एनडीए या तेजस्वी यादव का इंडिया गठबंधन।

फिलहाल हवा एनडीए के पक्ष में बहती दिखाई दे रही है। जेडीयू और भाजपा का गठबंधन, पिछले लोकसभा चुनावों की तरह, इस बार भी संगठित और आत्मविश्वास से भरा है। NewsX और ABP सर्वे के मुताबिक़ एनडीए को 150-160 सीटों तक मिलने की संभावना है, जबकि बहुमत के लिए 122 सीटें काफ़ी हैं। भाजपा को इस बार “सिंगल लार्जेस्ट पार्टी” बनने का भरोसा है, क्योंकि उसने 2024 में बिहार की 40 में से 30 लोकसभा सीटें जीती थीं।

नीतीश कुमार अब भी बिहार के “सुशासन बाबू” कहलाते हैं। 20 साल से ज़्यादा सत्ता में रहने के बावजूद उनकी छवि एक व्यावहारिक और स्थिर नेता की बनी हुई है। उन्होंने कानून-व्यवस्था में सुधार, सड़कों का जाल और महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दों पर काम किया है। भाजपा के केंद्रीय नेताओं — ख़ासकर अमित शाह — ने मोदी सरकार की योजनाओं को “गेम चेंजर” बताया है, जैसे महिलाओं को ₹10,000 वार्षिक सहायता और युवाओं के लिए कौशल विकास कार्यक्रम।

दूसरी तरफ़ इंडिया गठबंधन (RJD + कांग्रेस + वाम दल) की लड़ाई कठिन नज़र आ रही है। तेजस्वी यादव बेरोज़गारी, शिक्षा और “हर बिहारी को बदलाव” जैसे नारों के साथ मैदान में हैं। युवाओं में उनका असर दिखता है — ख़ासकर शहरी मतदाताओं और प्रथम बार वोट देने वालों में। मगर गठबंधन की सबसे बड़ी मुश्किल है एकता की कमी। तेज प्रताप यादव के अलग दल “जनशक्ति जनता दल” ने कुछ हद तक यादव वोटों में सेंध लगाने का खतरा पैदा किया है।

इसी बीच, प्रशांत किशोर की पार्टी “जन सुराज” भी इस चुनाव में तीसरे मोर्चे के रूप में उतर रही है। उसका वोट प्रतिशत भले ही कम (1-2%) दिख रहा हो, लेकिन यह विपक्षी वोटों में कटाव ला सकता है। किशोर का फोकस भ्रष्टाचार के खिलाफ़ और विकास-केंद्रित राजनीति पर है, जिससे वे नौजवान वर्ग को आकर्षित कर रहे हैं।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं कि विपक्ष ने इस बार इलेक्शन कमीशन को कटघरे में खड़ा करने की नाकामयाब कोशिश की।
“इस चुनाव की सबसे बड़ी बहस चुनाव आयोग (ECI) की “विशेष मतदाता सूची संशोधन” (Special Intensive Revision) प्रक्रिया को लेकर है। चुनाव आयोग का कहना है कि यह “डेटा साफ़ करने” का प्रयास था, जिसमें डुप्लीकेट नाम हटाए गए। मगर आधार लिंकिंग से जुड़ी अनियमितताओं ने विवाद बढ़ा दिया है। हालाँकि आयोग ने पारदर्शिता के लिए 100% वेबकास्टिंग, नई डिज़ाइन की EVMs और विशेष पर्यवेक्षक की नियुक्ति जैसी व्यवस्थाएँ की हैं, फिर भी मतदाताओं के बीच अविश्वास बना हुआ है।”

बिहार के समाज ज्ञानी टीपी श्रीवास्तव के मुताबित इस चुनाव में सबसे दिलचस्प और निर्णायक भूमिका युवा मतदाताओं की है — जिनकी संख्या करीब 1.4 करोड़ है। ये जाति समीकरणों से हटकर नौकरी, शिक्षा और अवसर की बात कर रहे हैं। युवा अब विकास की ज़मीन पर वोट दे रहे हैं, न कि केवल नारेबाज़ी पर। चिराग पासवान, और कई वोट कटवा गैंग्स की क्या भूमिका रहेगी, अभी क्लियर नहीं है।

विश्लेषक बता रहे हैं, बिहार में डिजिटल प्रचार का नया दौर शुरू हुआ है — इंस्टाग्राम रील्स से लेकर व्हाट्सऐप कैंपेन तक। युवा नेता सोशल मीडिया पर ज़्यादा सक्रिय हैं, और गाँव-गाँव “पन्ना प्रमुख” और “युवा संवाद” कार्यक्रमों से बूथ स्तर पर जुड़ाव बनाया जा रहा है।

अगर एनडीए दोबारा सत्ता में आता है, तो यह न केवल नीतीश कुमार के लिए “स्वान सांग” (आख़िरी कार्यकाल) होगा बल्कि भाजपा के लिए बिहार की पकड़ और मज़बूत करने का मौका भी। वहीं इंडिया गठबंधन की हार से विपक्षी राजनीति में नया फेरबदल हो सकता है, और तेजस्वी यादव की लीडरशिप पर सवाल उठेंगे।

बिहार का यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का खेल नहीं है, बल्कि यह देखना है कि लोकतंत्र कितना परिपक्व हो चुका है। यहाँ हर वोट मायने रखता है — हर नाम का हटना या जुड़ना, हर बूथ की गिनती, और हर उम्मीदवार का वादा। यह चुनाव तय करेगा कि बिहार “स्थिरता” चाहता है या “बदलाव”।

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