यहां अच्छी ज़िंदगी अभी भी आम आदमी की पहुंच में है

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देहरादून : सुबह दूध वाला घंटी बजाता है।
अख़बार दरवाज़े पर पहुंच जाता है।
मोबाइल पर एक क्लिक करते ही सब्ज़ी, दवा, किराना या भोजन घर आ जाता है। डॉक्टर का अपॉइंटमेंट उसी दिन मिल सकता है। घर की सफाई और छोटी-मोटी मरम्मत के लिए भी सेवाएं ऐप पर उपलब्ध हैं।
भारत में करोड़ों लोगों के लिए यह कोई विलासिता नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है।
सेवा क्षेत्र के विस्फोटक विस्तार ने जीवन को अभूतपूर्व रूप से सुविधाजनक बना दिया है। शायद यही कारण है कि आज भारत दुनिया के सबसे आकर्षक देशों में से एक बनकर उभर रहा है।
दशकों तक भारतीयों की निगाहें पश्चिम की ओर लगी रहीं। अमेरिका अवसरों की धरती माना गया। यूरोप समृद्धि का प्रतीक था। विदेशी नौकरी और पासपोर्ट सफलता के पर्याय बन गए।
यह सपना आज भी जीवित है। लेकिन विदेशों में बसे अनेक भारतीय अब एक नई सच्चाई को पहचान रहे हैं। अच्छी ज़िंदगी केवल ऊंची तनख्वाह से नहीं बनती। उसकी असली पहचान रोज़मर्रा की सहज सुविधाओं में छिपी होती है।
मोबाइल इंटरनेट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भारत ने डिजिटल क्रांति को आम आदमी तक पहुंचा दिया है। दुनिया के सबसे सस्ते डेटा प्लान यहीं उपलब्ध हैं। कुछ सौ रुपये में महीने भर वीडियो कॉल, मनोरंजन, ऑनलाइन शिक्षा और कारोबार चल सकता है।
फिर आती है यूपीआई की कहानी।
चाय वाला हो या सब्ज़ी विक्रेता, रिक्शा चालक हो या बड़ा शोरूम, हर कोई एक ही डिजिटल भुगतान व्यवस्था से जुड़ा है। न छुट्टे पैसे का झंझट, न बैंक की कतारें। मोबाइल स्कैन कीजिए और भुगतान पूरा।
सड़क किनारे नारियल बेचने वाले से लेकर बड़े मॉल तक, डिजिटल भुगतान की यह सहजता विदेशी पर्यटकों को भी चकित कर देती है।
स्वास्थ्य सेवाओं का क्षेत्र भी कम रोचक नहीं है।
दुनिया के कई देशों में डॉक्टर के पास जाना जेब पर भारी पड़ सकता है। भारत में चुनौतियों के बावजूद चिकित्सा सेवाएं अब भी अपेक्षाकृत सुलभ और किफायती हैं। आधुनिक अस्पतालों में दुनिया भर से मरीज इलाज कराने आते हैं, जबकि मोहल्लों के क्लीनिक आज भी लाखों लोगों की पहली जरूरत बने हुए हैं।
लेकिन शायद भारत की सबसे बड़ी सुविधा समय है।
यहां मध्यम वर्ग का परिवार भी घरेलू सहायक, रसोइया या देखभाल करने वाले कर्मचारियों की मदद ले सकता है। इससे लोगों के पास परिवार, बच्चों और अपने शौकों के लिए अधिक समय बचता है।
पश्चिमी देशों में ऐसी सेवाएं अक्सर केवल संपन्न वर्ग तक सीमित रहती हैं।
परिवहन व्यवस्था भी तेजी से बदल रही है। मेट्रो नेटवर्क फैल रहे हैं। नए एक्सप्रेसवे बन रहे हैं। आधुनिक हवाई अड्डे और बेहतर रेल सेवाएं देश को पहले से कहीं अधिक मजबूती से जोड़ रही हैं।
यह वही भारत है जिसे कभी लालफीताशाही और धीमी व्यवस्था का पर्याय माना जाता था।
लेकिन भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि न इंटरनेट है, न यूपीआई और न ही एक्सप्रेसवे।
उसकी सबसे बड़ी ताकत है उसकी जीवंत जीवनशैली।
कहां मिलेगा ऐसा देश जहां दिवाली, ईद, क्रिसमस, गुरुपर्व और होली एक ही कैलेंडर में पूरे उत्साह से मनाए जाते हों? कहां मिलेगा ऐसा भूभाग जहां हिमालय की बर्फ, राजस्थान का रेगिस्तान, गोवा के समुद्र तट, उत्तर-पूर्व के वर्षावन और मुंबई-दिल्ली जैसे महानगर एक ही राष्ट्र की पहचान हों?
भारत केवल एक देश नहीं है।
यह अनेक संसारों का संगम है।
यहां त्योहार सड़कों पर उतर आते हैं। शादियां पूरे मोहल्ले का उत्सव बन जाती हैं। पड़ोसी परिवार जैसे लगते हैं। दादा-दादी और नाना-नानी अब भी बच्चों की दुनिया का अहम हिस्सा हैं। दोस्तियां दशकों तक निभाई जाती हैं।
दुनिया के कई विकसित देशों में यही सामाजिक ताना-बाना धीरे-धीरे कमजोर पड़ता जा रहा है।
बेशक भारत के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। यातायात की अव्यवस्था है। प्रदूषण चिंता का विषय है। सार्वजनिक सुविधाओं में असमानता है। कई शहरों को अभी लंबा सफर तय करना है।
लेकिन इन सबके बावजूद भारत एक अनमोल चीज़ देता है: कम लागत में अपेक्षाकृत बेहतर जीवन।
यही वजह है कि अनेक प्रवासी भारतीय लौट रहे हैं। विदेशी पेशेवर भारत को अवसर और सुविधा के नए केंद्र के रूप में देख रहे हैं। उद्यमी, डिजिटल नोमैड, सेवानिवृत्त लोग और युवा परिवार भारत को नए नजरिए से परखने लगे हैं।
आधुनिक भारत की कहानी केवल आर्थिक विकास की कहानी नहीं है।
यह उस देश की कहानी है जहां जीवन अब भी रिश्तों से चलता है। जहां छोटी-छोटी खुशियां बड़ी दौलत मानी जाती हैं। जहां परिवार, समुदाय और अपनापन आज भी सबसे बड़ी पूंजी हैं।
अच्छी ज़िंदगी जीने के लिए हमेशा अमीर होना जरूरी नहीं होता।
और शायद यही भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

अब समय आ गया है कि आगरा को यूनेस्को विश्व धरोहर नगर का दर्जा मिले

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आगरा : किसी शहर को अपनी महानता साबित करने के लिए और क्या चाहिए?
तीन विश्व धरोहर स्मारक? हजारों वर्षों का इतिहास? ऐसी सांस्कृतिक विरासत जिसने साम्राज्यों, धर्मों, कला, स्थापत्य, संगीत, खानपान और सभ्यता को आकार दिया हो?
अगर यही कसौटी है, तो आगरा यह परीक्षा बहुत पहले पास कर चुका है।
फिर भी विडंबना देखिए। ताजमहल के शहर को आज भी विश्व धरोहर नगर के रूप में पहचान नहीं मिल सकी है। दूसरी ओर अतिक्रमण बढ़ रहे हैं, ऐतिहासिक क्षेत्रों का स्वरूप बिगड़ रहा है और नागरिकों में अपनी धरोहर के प्रति गर्व की भावना लगातार कमजोर पड़ रही है।
आगरा आज एक चौराहे पर खड़ा है।
एक रास्ता अव्यवस्थित शहरीकरण, प्रदूषण और विरासत के क्षरण की ओर जाता है। दूसरा रास्ता संरक्षण, सांस्कृतिक गौरव, टिकाऊ पर्यटन और वैश्विक पहचान की ओर।
चुनाव कठिन नहीं होना चाहिए।
दशकों से सरकारें स्मारकों की सुरक्षा पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च करती रही हैं। लेकिन उन स्मारकों को जन्म देने वाले पूरे शहर की अनदेखी होती रही है। ताजमहल अकेले नहीं बच सकता। विरासत केवल संगमरमर की एक इमारत नहीं होती। विरासत पूरे सांस्कृतिक परिदृश्य का नाम है।
ताजगंज की गलियों में चलिए। सिकंदरा, एतमादुद्दौला, दिल्ली गेट या फतेहपुर सीकरी का चक्कर लगाइए। हर जगह एक दर्दनाक विरोधाभास दिखाई देता है। एक ओर भव्य इतिहास खड़ा है, दूसरी ओर अतिक्रमण, कूड़े के ढेर, अव्यवस्थित निर्माण और बदहाल नागरिक व्यवस्था।
ऐतिहासिक क्षेत्रों के आसपास अतिक्रमण लगातार बढ़ रहे हैं। नोटिस जारी होते हैं, सर्वेक्षण होते हैं, समितियाँ बनती हैं, लेकिन जमीन पर बदलाव बहुत कम दिखाई देता है।
नतीजा सबके सामने है।
जो शहर दुनिया की सबसे बड़ी ऐतिहासिक धरोहरों में गिना जाना चाहिए, वह अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
पर्यावरणीय संकट ने स्थिति और गंभीर बना दी है।
यमुना, जिसने आगरा की सभ्यता को जन्म दिया और ताजमहल की सुंदरता को निखारा, आज दम तोड़ती दिखाई देती है। कभी जीवनदायिनी रही यह नदी अब कई जगह सूखी और बीमार नजर आती है। सूखे नदी तल से उड़ती धूल और रेत हवा को प्रदूषित कर रही है। वाहनों की बढ़ती संख्या स्थिति को और खराब बना रही है।
क्या कोई विरासत नगर अपनी जीवनरेखा नदी के बिना जीवित रह सकता है?
यह सवाल केवल पर्यावरण का नहीं, आगरा के भविष्य का है।
विडंबना यह भी है कि स्मार्ट सिटी बनने की दौड़ में कहीं न कहीं आगरा की ऐतिहासिक पहचान दांव पर लग गई है। नई सड़कें, फ्लाईओवर और व्यावसायिक परियोजनाएँ अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन विकास ऐसा होना चाहिए जो इतिहास को कुचल कर आगे न बढ़े।
यहीं पर विश्व धरोहर नगर की अवधारणा अधिक सार्थक दिखाई देती है।
यह मांग नई नहीं है।
पर्यावरणविदों, इतिहासकारों और संरक्षण कार्यकर्ताओं ने वर्षों पहले केंद्र सरकार से आगरा को यूनेस्को विश्व धरोहर नगर का दर्जा दिलाने की मांग की थी। सर्वोच्च न्यायालय ने भी ताज ट्रेपेजियम क्षेत्र के लिए एक दृष्टि दस्तावेज तैयार करने का निर्देश दिया था। स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर ने आगरा की विरासत संरक्षण के लिए विस्तृत सुझाव भी तैयार किए।
लेकिन फाइलें आगे नहीं बढ़ीं।
सबसे बड़ी बात यह है कि आगरा का दावा केवल ताजमहल, आगरा किला और फतेहपुर सीकरी तक सीमित नहीं है।
यह शहर भारत की साझा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का जीवंत प्रतीक है।
यमुना किनारे बसे बटेश्वर के प्राचीन शिव मंदिर इस क्षेत्र को भारत की सबसे पुरानी धार्मिक परंपराओं से जोड़ते हैं। ब्रज संस्कृति और भक्ति आंदोलन ने यहां की मिट्टी को आध्यात्मिक ऊर्जा दी।
फतेहपुर सीकरी में सम्राट अकबर ने दीन-ए-इलाही के माध्यम से विभिन्न धर्मों के बीच संवाद का प्रयोग किया। आगरा के ऐतिहासिक चर्च ईसाई विरासत की कहानी कहते हैं। सिकंदरा के निकट गुरु का ताल धार्मिक स्वतंत्रता के लिए सिख बलिदान की याद दिलाता है। राधास्वामी मत का जन्म भी इसी शहर में हुआ, जिसके अनुयायी आज पूरी दुनिया में हैं।
दुनिया में बहुत कम शहर ऐसे हैं जहाँ इतनी विविध आध्यात्मिक परंपराएँ एक साथ सांस लेती हों।
आगरा केवल मुगलों का शहर नहीं है।
यह भारत की हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक यात्रा का जीवंत दस्तावेज है।
मध्यकाल में आगरा को लंदन और पेरिस से भी बड़ा और अधिक विश्वनगरीय शहर बताया गया था। दुनिया भर से व्यापारी, विद्वान, कलाकार और यात्री यहां आते थे। यह शहर विविधताओं को आत्मसात करता था, लेकिन अपनी आत्मा नहीं खोता था।
वह आत्मा आज भी जीवित है।
पुरानी मंडियों में, पारंपरिक शिल्प में, स्थानीय व्यंजनों में, त्योहारों में, पुरानी हवेलियों में, मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों, गुरुद्वारों और नदी किनारे बसे ऐतिहासिक मोहल्लों में।
लेकिन केवल जीवित रहना पर्याप्त नहीं है।
विरासत को बचाना, संजोना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना भी जरूरी है।
विश्व धरोहर नगर का दर्जा आगरा को अंतरराष्ट्रीय पहचान देगा। इससे संरक्षण परियोजनाओं को गति मिलेगी, बेहतर शहरी नियोजन संभव होगा और सबसे महत्वपूर्ण, स्थानीय लोगों में अपनी विरासत के प्रति गर्व की भावना पैदा होगी।
आज आगरा की सबसे बड़ी समस्या स्मारकों की कमी नहीं है।
समस्या है विरासत चेतना की कमी।
लोग सदियों पुराने भवनों के पास से गुजर जाते हैं, लेकिन उनकी ऐतिहासिक महत्ता से अनजान रहते हैं। स्कूलों, कॉलेजों और समाज में धरोहर शिक्षा को मजबूत करने की जरूरत है।
हेरिटेज वॉक, सांस्कृतिक उत्सव, संरक्षण अभियान और जनजागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ा जा सकता है।
आगरा केवल वह शहर नहीं होना चाहिए जहाँ पर्यटक कुछ घंटे बिताकर आगे बढ़ जाएँ।
आगरा को एक जीवंत विरासत नगर के रूप में पहचाना जाना चाहिए, जिसकी कहानी आज भी दुनिया को प्रेरित करती है।
नीति निर्माताओं के सामने सवाल सीधा है।
यदि तीन विश्व धरोहर स्मारकों, अद्वितीय सांस्कृतिक विरासत, बहुधार्मिक आध्यात्मिक परंपरा और वैश्विक ऐतिहासिक महत्व वाला आगरा विश्व धरोहर नगर बनने योग्य नहीं है, तो फिर कौन सा भारतीय शहर है?
अब रिपोर्टों और आश्वासनों का समय बीत चुका है।
अब कार्रवाई का समय है।
यमुना को पुनर्जीवित कीजिए। अतिक्रमण हटाइए। पुराने मोहल्लों और बाजारों को संरक्षित कीजिए। विरासत चेतना जगाइए। शहर के गौरव को पुनर्स्थापित कीजिए।
और मिलकर वह मांग उठाइए जिसका आगरा लंबे समय से हकदार है।
सिर्फ स्मार्ट सिटी नहीं।
दुनिया के महानतम विरासत नगरों में सम्मानजनक स्थान।

गर्मियों की छुट्टी का मजा, रोमांच हुआ गायब

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लखनऊ: वे भी क्या दिन थे।
गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही बच्चों की दुनिया बदल जाती थी। कोई नानी के घर भागता था, कोई दादा-दादी के गांव। कोई पहाड़ों में ट्रेकिंग करता, कोई आम के बागों में चढ़ जाता। दोपहरें कॉमिक्स पढ़ते गुजरती थीं। शामें गिल्ली-डंडा, पतंगबाजी और बेवजह की शरारतों में बीतती थीं।
घड़ी का कोई महत्व नहीं था। कोई लक्ष्य नहीं था। कोई प्रदर्शन नहीं था। छुट्टियां आत्मा की मरम्मत का मौसम थीं।
फिर भारत बदल गया।
अब गर्मी की छुट्टियां भी बच्चों की नहीं रहीं।
सुबह स्विमिंग क्लास। फिर क्रिकेट अकादमी। फिर गिटार सीखना। फिर डांस क्लास। फिर कोडिंग कोर्स। फिर स्पोकन इंग्लिश। शाम को ऑनलाइन वर्कशॉप।
बच्चा स्कूल से छुट्टी पाता है, लेकिन बचपन से नहीं।
आज भारत में जन्म लेते ही प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है। डेढ़-दो साल के बच्चों को प्ले स्कूल भेजा जा रहा है, जब वे ठीक से बोलना भी नहीं सीख पाए होते। मध्यमवर्गीय परिवार सालाना पचास हजार से एक लाख रुपये तक फीस भर रहे हैं। माता-पिता को डर है कि कहीं उनका बच्चा दौड़ में पीछे न रह जाए।
और यह डर काल्पनिक नहीं है।
भारत में अवसर सीमित हैं और दावेदार करोड़ों। अच्छी नौकरियां कम हैं। सरकारी नौकरियां और भी कम। प्रतिष्ठित कॉलेजों में सीटें मुट्ठी भर हैं। यही वजह है कि कोचिंग संस्कृति एक समानांतर शिक्षा व्यवस्था बन चुकी है। बच्चा स्कूल में पढ़ता है, फिर कोचिंग में पढ़ता है, फिर टेस्ट सीरीज में बैठता है। उसकी पूरी किशोरावस्था प्रतियोगिता की प्रयोगशाला बन जाती है।
लेकिन अब यह होड़ केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है।
खेल भी कमाई का नया टिकट बन गए हैं।
माता-पिता क्रिकेटरों की करोड़ों की नीलामी देखते हैं। ओलंपिक पदक विजेताओं को मिलने वाले नकद पुरस्कार देखते हैं। सरकारी नौकरियां और विज्ञापन अनुबंध देखते हैं। फिर वे अपने बच्चों को खेल अकादमियों में भेज देते हैं। खेल अब स्वास्थ्य, आनंद और मित्रता का माध्यम कम, करियर की रणनीति अधिक बनता जा रहा है।
सच यह है कि कुछ बच्चे सितारे बनेंगे, लेकिन लाखों नहीं। हर सफल खिलाड़ी के पीछे हजारों ऐसे बच्चे होंगे जो वर्षों का समय, मेहनत और उम्मीदें लगाकर भी मंजिल तक नहीं पहुंच पाएंगे।
इसी बीच मनोरंजन उद्योग ने भी बचपन को बाजार में उतार दिया है।
गायन प्रतियोगिताएं, नृत्य प्रतियोगिताएं, टैलेंट शो और क्विज कार्यक्रम बच्चों को सफलता के शॉर्टकट के रूप में बेच रहे हैं। माता-पिता ऑडिशन दर ऑडिशन भटक रहे हैं। बच्चे कैमरों, जजों और वोटिंग के दबाव में बड़े हो रहे हैं।
कुछ को शोहरत मिलती है। कुछ को पुरस्कार मिलते हैं। लेकिन अधिकांश बच्चे कुछ वर्षों बाद गुमनामी में लौट आते हैं। पीछे छूट जाती है थकान, निराशा और खोया हुआ बचपन।
सबसे दुखद बात यह है कि बच्चों के पास अब खाली समय नहीं बचा।
खाली समय, जिसे आधुनिक समाज लगभग अपराध मानने लगा है।
किताबें पढ़ना समय की बर्बादी समझा जाता है। पेड़ों पर चढ़ना अनुपयोगी गतिविधि बन गया है। दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियां किसी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं हैं। गांव की गलियां, खेतों की पगडंडियां, रिश्तेदारों के घरों की चहल-पहल और बेफिक्र आवारागर्दी अब धीरे-धीरे स्मृतियों का हिस्सा बनती जा रही हैं। जिन बच्चों को कुछ नहीं करना वो मोबाइल वाचिंग करते हैं, या रील बनाते हैं।
हर शौक को करियर में बदला जा रहा है। गाना सीखो ताकि स्टार बनो। नाचो ताकि टीवी पर आ सको। खेलो ताकि करोड़पति बन सको। कोडिंग सीखो ताकि नौकरी मिल सके। अंग्रेजी सीखो ताकि इंटरव्यू निकल जाए।
मानो जीवन का हर क्षण किसी भविष्य की कमाई में निवेश किया जाना चाहिए।
पैसे की चमक इतनी तेज हो गई है कि बचपन उसकी रोशनी में धुंधला पड़ गया है।
समस्या खेल, संगीत, पढ़ाई या प्रतियोगिताओं में नहीं है। समस्या उस मानसिकता में है जो हर बच्चे को एक परियोजना, एक निवेश और एक संभावित आय स्रोत की तरह देखने लगी है।
माता-पिता दोषी नहीं हैं। वे डरे हुए हैं। महंगाई बढ़ रही है। रोजगार अनिश्चित हैं। भविष्य धुंधला है। वे अपने बच्चों के लिए सुरक्षा चाहते हैं।
लेकिन इस प्रक्रिया में एक बड़ा सवाल अनुत्तरित रह जाता है।
यदि बच्चा बचपन में ही थक गया, तो वह जीवन कब जिएगा?
यदि छुट्टियां भी प्रशिक्षण शिविर बन गईं, तो यादें कहां बनेंगी?
यदि हर प्रतिभा का मूल्य रुपये में तय होगा, तो खुशी का मूल्य कौन तय करेगा?
शायद हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी यही है।
हम बच्चों को भविष्य के लिए तैयार करते-करते उनका वर्तमान छीन रहे हैं।
और एक दिन जब वे सफल होकर पीछे मुड़कर देखेंगे, तो शायद पूछेंगे:
वे गर्मियां कहां चली गईं, जिनमें जिंदगी कमाई नहीं, खुशियां हुआ करती थी?

बेतिया कोर्ट में प्रशांत किशोर को समन: 125 करोड़ की मानहानि याचिका में 15 जुलाई को पेश होंगे पीके

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बेतिया। पश्चिम चंपारण के भाजपा सांसद डॉ. संजय जायसवाल ने जन सूरज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर पर 125 करोड़ रुपये की मानहानि का मुकदमा दायर किया है। बेतिया सिविल कोर्ट के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (CJM) श्री आनंद कुमार त्रिपाठी ने मामले की सुनवाई करते हुए प्रशांत किशोर को 15 जुलाई को अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अपने आरोपों को सिद्ध करने का नोटिस जारी किया है।
प्रशांत किशोर ने अपनी सार्वजनिक सभाओं और प्रेस कॉन्फ्रेंस में डॉ. संजय जायसवाल को “टूटपुंजिया नेता” कहा था। जबकि हकीकत यह है कि डॉ. जायसवाल चार बार लोकसभा सांसद चुने जा चुके हैं। वे लोकसभा में भाजपा के मुख्य सचेतक, छह प्रदेशों के प्रभारी और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं। वहीं प्रशांत किशोर ने खुद राघवपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की घोषणा कर हार के डर से मैदान छोड़ दिया। सवाल उठता है कि चार बार का निर्वाचित सांसद “टूटपुंजिया” हो सकता है या चुनाव से भागने वाला नेता?
दूसरा गंभीर आरोप बेतिया छावनी ओवरब्रिज के अलाइनमेंट बदलवाने का था। प्रशांत किशोर ने दावा किया कि सांसद ने अपने निजी पेट्रोल पंप के फायदे के लिए अलाइनमेंट बदला। लेकिन भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) की लिखित जांच रिपोर्ट साफ कहती है कि अलाइनमेंट में कोई बदलाव नहीं हुआ।
तीसरा आरोप नगर निगम के ईंधन बिलों में अनियमितताओं और पेट्रोल चोरी का था।  पीके  ने सांसद को “पेट्रोल चोर” जैसे अपमानजनक शब्दों से नवाजा। सांसद डॉ. जायसवाल ने स्पष्ट किया कि उक्त पेट्रोल पंप उनका है ही नहीं। बिना किसी ठोस प्रमाण के इस तरह के वल्गर आरोप लगाना मर्यादा के बाहर है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रशांत किशोर अदालत में अपने आरोपों के समर्थन में कोई ठोस दस्तावेज या साक्ष्य पेश नहीं कर पाए तो भारतीय दंड संहिता की धारा 499-500 के तहत मानहानि साबित होने पर उन पर भारी जुर्माना, सजा या दोनों हो सकते हैं।
यह मामला केवल व्यक्तिगत मानहानि का नहीं, बल्कि लोकतंत्र में बिना तथ्यों के जिम्मेदार नेताओं पर गंभीर आरोप लगाकर जनता को भ्रमित करने की प्रवृत्ति का भी प्रतीक है। अब सबकी नजरें 15 जुलाई पर टिकी हैं, जब प्रशांत किशोर को अपने दावों की सच्चाई अदालत में साबित करनी होगी।
इनपुट: सुशील कुमार जायसवाल
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