साहित्य, संस्कृति एवं कला के संवर्धन हेतु आईजीएनसीए और लेखक गांव के बीच एमओयू

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नई दिल्ली : इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) एवं लेखक गांव, देहरादून के बीच साहित्य, संस्कृति एवं कला के क्षेत्र में सहयोग और संयुक्त गतिविधियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए। आईजीएनसीए की ओर से सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी तथा लेखक गांव की ओर से निदेशक श्रीमती विदुषी निशंक ने समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए। आईजीएनसीए के डीन (प्रशासन) और कला निधि प्रभाग के अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) रमेश चंद्र गौड़ भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम आईजीएनसीए के उमंग सम्मेलन कक्ष में संपन्न हुआ।

इस अवसर पर दोनों संस्थानों के प्रतिनिधियों ने भारतीय साहित्यिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण, संवर्धन और प्रसार के लिए मिलकर कार्य करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की और भविष्य में संयुक्त संगोष्ठियों, कार्यशालाओं, सांस्कृतिक आयोजनों और शोधपरक गतिविधियों के संचालन की संभावनाओं पर चर्चा की। डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा, लेखक गांव के साथ मिलकर आईजीएनसीए वहां क्या कर सकता है, यह प्रश्न हमारे सामने था। हमारा सम्बंध सीधे-सीधे लेखकों से नहीं है। हम कुछ कार्यक्रम करते हैं, जिसमें लेखकों को आमंत्रित करते हैं, पर वैसे सीधे-सीधे हमारा सम्बंध लेखकों से नहीं होता। खासकर, जो समकालीन साहित्यकार, लेखक हैं, उनसे तो बिल्कुल ही नहीं हो पाता। एक-आध कार्यक्रम अगर होते हैं, क्योंकि हम अलग तरह के प्रकल्पों पर काम करते हैं, जो भारतीय संस्कृति की स्थायी निधि, स्थायी कोष, स्थायी संदर्भ की बात करते हैं। तो हम क्या लेखक गांव के साथ कर सकते हैं? तो, हमें यह समझ में आया कि ऐसी बहुत सारी चीजें हैं, जहां हमें ऐसे विशेषज्ञों की आवश्यकता पड़ती है, जो एक साथ बैठकर एक नैसर्गिक एवं निष्पक्ष वातावरण में मंथन करें। अगर आप यहां बैठकर मंथन करते हैं, तो थोड़ी देर बाद आपके अंदर यह बात हावी होने लगती है कि हम कला केंद्र में बैठे हैं।यह आपके अवचेतन में आ जाता है, तो आपके अंदर जो एक निष्पक्ष विचार प्रक्रिया होनी चाहिए, वह शायद कई बार नहीं होती। इसलिए हमको लगा कि अगर हम एक ऐसी जगह जाएंगे, जहां हमारे विद्वान शांत एवं निष्पक्ष वातावरण में बैठकर मंथन कर सकें, ऐसी जगह हमारे लिए अत्यंत आवश्यक है।

उन्होंने आगे कहा, दूसरा एक विचार यह आया कि हम लोग बहुत सारे युवा पेशेवरों के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम करते हैं, चाहे फिर वह कंजर्वेशन हो, रिसर्च मेथोडोलॉजी हो, कल्चरल इंफॉर्मेटिक्स हो, क्रिटिकल एडिशन तैयार करना हो। तो ऐसे में वर्कशॉप के लिए भी अगर हम कोई ऐसी आवासीय जगह ढूंढ़े, जहां पर प्रतिभागी अपनी पढ़ाई की अवधि के बाद भी आपस में बातचीत करके उसको आगे बढ़ा सकें, ऐसा वातावरण भी आपको लेखक गांव में मिलता है। यह रचनात्मकता के लिए उर्वर भूमि तैयार करने वाला एक स्थान है, पवित्र स्थान है। इसकी ऊर्जा और प्रेरणा से लोगों की रचनात्मकता मुखरित हो सकती है।

विदुषी निशंक ने लेखक गांव के बारे में बताते हुए कहा कि लेखक गांव की यात्रा इस प्रश्न से शुरू हुई थी कि लेखक के बारे में कोई सोचेगा क्या? क्या कोई ऐसा स्थान होगा, जहां साहित्य केवल लिखा नहीं जाएगा, बल्कि जिया भी जाएगा? जहां प्रकृति, संस्कृति, संवेदना, संवाद और सृजन एक साथ उपस्थित होंगे? जहां हिमालय केवल दृश्य नहीं, बल्कि दृष्टि बनेगा। इसी विचार से, हिमालय और मां गंगा के आशीर्वाद के साथ तथा डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक जी की अविराम साधना और दूरदृष्टि ने लेखक गांव की परिकल्पना को यथार्थ के धरातल पर उतारा है। यह इस देश का पहला लेखक गांव है, जो हिमालय की वादियों में बसा है। लेखक गांव केवल लेखकों के लिए सीमित नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत केंद्र है। यह साझेदारी दोनों संस्थानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि आईजीएनसीए के सानिध्य में यह हमारे लिए बहुत बड़ा अवसर है। यह दो संस्थानों का मिलन नहीं है, बल्कि दो विचारों का मिलन है।

प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने कहा, जब हम किसी भी संस्था के साथ एमओयू साइन करते हैं, तो सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह होता है कि दोनों संस्थाएं मिलकर भारतीय साहित्य और संस्कृति को कैसे आगे बढ़ा सकते हैं। लेखक गांव के साथ यह समझौता ज्ञापन कई मायनों में बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह अनूठी पहल है। भारत में ऐसी जगहों के उदाहरण आपको बहुत कम देखने को मिलेंगे, जहां जाकर आप रुक सकते हैं, अपनी किताब लिख सकते हैं, अपनी रिसर्च कर सकते हैं।

समझौता ज्ञापन कार्यक्रम में आईजीएनसीए के अधिकारियों एवं कर्मचारियों, लेखक गांव के प्रतिनिधियों, डॉ. बेचैन कंडियाल, अलका सिन्हा, सर्वेश उनियाल सहित साहित्य, संस्कृति एवं कला जगत से जुड़े अनेक विद्वान, लेखक, कलाकार, शोधार्थी तथा अतिथि उपस्थित रहे। दोनों संस्थानों के बीच यह समझौता ज्ञापन दो सांस्कृतिक धाराओं का एक मिलन है। निश्चित रूप से यह समझौता ज्ञापन भारतीय सभ्यता, संस्कृति और कला के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध होगा।

माटी उवाच : मिट्टी की स्मृतियों से उठती आवाज़

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डॉ. कुमुद रामानंद बंसल

दिल्ली । कुछ पुस्तकें कहानियाँ सुनाती हैं, कुछ विचार प्रस्तुत करती हैं, और कुछ ऐसी होती हैं जो पाठक को उस संसार में ले जाती हैं जहाँ शब्दों से अधिक मौन बोलता है। माटी उवाच ऐसी ही एक पुस्तक है।

यह कहानी-संग्रह भारतीय आदिवासी जीवन के बाहरी चित्रों का नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक चेतना का साहित्यिक दस्तावेज़ है। यहाँ जंगल केवल वृक्षों का समूह नहीं, बल्कि एक जीवित उपस्थिति है; नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं, बल्कि स्मृतियों और संबंधों की वाहक हैं; और मिट्टी केवल भूमि नहीं, बल्कि इतिहास, पहचान और अस्तित्व का आधार है।

इस संग्रह की बारह कहानियाँ भारत के विविध जनजातीय संसारों की यात्रा कराती हैं। रात की शेवाली प्रकृति और उपचार के संबंध को उद्घाटित करती है; दिमनगंगा की संध्या विकास और विस्थापन के प्रश्न उठाती है; छोटी चतुरी मानवीय करुणा और सहज विश्वास का उत्सव है। मिट्टी के ताल और पहचान के धागे स्मृति, समुदाय और सांस्कृतिक पहचान की पड़ताल करती हैं। नाच का दर्पण तथा धुआँ और ढोल आदिवासी उत्सवधर्मिता और सामूहिक जीवन की ऊर्जा को स्वर देते हैं। अमर पत्ता, सोयरी बाई की दीवार और रेत की चिट्ठी विरासत, स्त्री-अनुभव और समय की नश्वरता को स्पर्श करती हैं। जंगल की साँस और मोर की चाल प्रकृति, स्वाभिमान और आत्म-खोज की गहरी संवेदनाओं को सामने लाती हैं। इन सबके बीच उपसंहार पुस्तक की मूल चिंता को एक सूत्र में पिरो देता है—मनुष्य और धरती के रिश्ते की चिंता।

इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ आदिवासी पात्र किसी अध्ययन-वस्तु या रोमांचक लोक-कथा के पात्र नहीं बनते। वे अपनी पूरी गरिमा, संवेदना और आत्मसम्मान के साथ उपस्थित होते हैं। लेखक उनके लिए बोलने का दावा नहीं करता; वह उनके साथ बैठकर सुनने का प्रयास करता है। यही कारण है कि इन कहानियों में सहानुभूति नहीं, सहभागिता है; वर्णन नहीं, अनुभव है।

आज जब जंगलों को संसाधन, नदियों को जल-भंडार और मिट्टी को केवल भूमि मानने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, तब माटी उवाच हमें स्मरण कराती है कि प्रकृति के साथ मनुष्य का संबंध उपयोग का नहीं, संवाद का भी है। यह पुस्तक बार-बार हमें उस प्रश्न के सामने खड़ा करती है जिसे आधुनिक समाज लगभग भूल चुका है—क्या विकास और संवेदना साथ-साथ चल सकते हैं?

इन कहानियों का महत्व केवल साहित्यिक नहीं, सांस्कृतिक और नैतिक भी है। वे हमें याद दिलाती हैं कि भारत की आत्मा केवल महानगरों में नहीं बसती; वह उन जंगलों, पहाड़ियों और नदी-तटों में भी जीवित है जहाँ आज भी मनुष्य प्रकृति से संवाद करना जानता है।

माटी उवाच अंततः मिट्टी की आवाज़ सुनने का निमंत्रण है—उस मिट्टी की, जो बोलती कम है, पर याद बहुत कुछ दिलाती है। यह पुस्तक पाठक को केवल कथाएँ नहीं देती; वह उसे ठहरना, सुनना और पुनः स्मरण करना सिखाती है।

जब मिट्टी बोलती है, तो वह शोर नहीं करती—वह स्मरण कराती है।
जब जंगल बोलता है, तो वह उपदेश नहीं देता—वह संबंध रचता है।
और जब मनुष्य सुनना सीख जाता है, तब उसे पता चलता है कि धरती केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि जीवन की सबसे पुरानी गुरु है।

श्रीराम मंदिर में 200 करोड़ की लूट

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आचार्य श्रीहरि

दिल्ली । वरिष्ठ पत्रकार मनोज वर्मा के आँखो में आंसू थे, वे लगातार सिसक रहे थे, आँखों के आंसू रुकने के नाम नहीं ले रहे थे, वे मुझसे पूछते हैं कि आचार्य जी आपने यह क्या करा दिया,? क्या यही दिन देखना था? मै निशब्द हो गया, मेरी कठोरता भी बर्फ की तरह पिघल गई, मुझे अशोक सिंहल के फटे सिर से टपकते खून याद हो गए, मुझे उमा भारती के वे वाक्य भी याद हो गए जिसमें उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी को कहा था कि शर्म आपको आती होगी, मुझे तो बाबरी मस्जिद के ढांचे गिरने, ध्वस्त होने से गर्व की अनुभूति हो रही है।

पत्रकार संवेदनशील होता है, कोई संवेदनाहीन व्यक्ति सही पत्रकार हो ही नहीं सकता है, वह सिर्फ लुटेरा हो सकता है, पैरोकार हो सकता है। चूंकि मनोज वर्मा रामनदिर आंदोलन से न केवल साथ थे, बल्कि भगवान राम के प्रति उनका समर्पण रहा है, इसलिए उनका व्यथित होना अस्वाभाविक नहीं बल्कि स्वाभाविक है। मनोज वर्मा ही क्यों, बल्कि करोड़ों उन रामभक्तो की भावनाएं , बलिदान आहत हुई है,ब जिन्होंने राममंदिर आंदोलन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष भूमिका निभाई थी, पुलिस की गोलिया खायी थी, मुस्लिम जिहादियों की हिंसा झेली थी, कांग्रेस राज का उत्पीड़न झेला था, मुलायम सिंह यादव राज की गोलियों के सामने अपने सीने तान कर खड़े थे। मै खुद राममंदिर आंदोलन का हिस्सा था, पुलिस की लाठिया खाई थी, बाबरी मस्जिद के ढांचे का विनाश देखा था, ईट पूजन आंदोलन में महीनों गांव गांव घुमा था। क्योंकि मै राममनोहर लोहिया का वैचारिक शिष्य था, राममनोहर लोहिया के आराध्य भी भगवान श्रीराम थे, राममनोहर लोहिया श्रीराम मेला लगाते थे और कहते थे कि भारत को जानना है तो भगवान राम को जानो, उनके आदर्श और महानता से जुड़ो। श्रीराम तीर्थ मंदिर ट्रस्ट में दान की राशि की लुट कितनी की है? दो सौ करोड़ पार तक लूट की बात आ रही है।

राममंदिर आंदोलन को पूर्ण तक पहुंचाने वाले विनय कटियार की भावनाओं का उल्लेख करना भी अति आवश्यक है। विनय कटियार की रामवाणी युवाओं का खून खोला देती थी, युवाओं को श्रीराम मंदिर के लिए मरने मिटने के लिए प्रेरित कर देती थी। श्रीराम मंदिर में दान और चढ़ावे में लूट, चोरी, डकैती पर दुखी होते हुए कहा कि जिस भगवान श्रीराम मंदिर के लिए कल्याण सिंह ने अपनी सत्ता त्याग दी थी और कहा था कि भगवान श्री राम के लिए एक तो क्या मै सौ सौ सत्ता का भी त्याग कर सकता हूं, कल्याण सिंह जी की आत्मा आज कितनी पीड़ा में होगी? सिर्फ कल्याण सिंह ही नहीं बल्कि उन कोठरी बंधुओं की आत्मा भी व्यथित होगी और अपने बलिदान पर पश्चाताप कर रही होगी। कोलकाता के कोठारी बंधु अपने माता पिता के दो ही बेटे थे, दोनों ने मुलायम सिंह यादव सरकार की गोलियों को डटकर सामना किया था, जिनकी शरीर छलनी हो गई थी, फिर भी अंतिम सांस तक हार नहीं मानी थी। उन सैकड़ों लोगों की आत्मा भी अशांत होगी जिन्होंने राममंदिर आंदोलन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष बलिदान किया था। विशेषकर उन हजारों साधु संतों की आत्माएं भी गुस्से में होगी जिन्होंने पुलिस के सामने दीवार बन गए थे और गोलियों से छलनी होने के बाद भी पुलिस से लड़े थे। अयोध्या की धरती साधु संतों और रामभक्तो के खून से लाल हो गई थी, मुलायम सिंह की सरकार ने हजारों साधु संतों के शवों को सरयू नदी में भी बहा दिया था। चूंकि साधु संत का जीवन परिवार मुक्त और पहचान विहीन होता है, इसलिए उनकी खोज खबर रखना, किसी के लिए संभव नहीं है।

भगवान श्रीराम मंदिर के दान और चढ़ावे के लुटेरे, चोर, डकैतों के कुछ नाम सामने आए हैं, इनकी पहचान उनकी अचानक बढ़ी हुई संपत्ति और रुतबे के आधार पर हुई है । दो नाम बहुत ही प्रचारित हो रहे हैं। एक नाम है, लवकुश मिश्रा का। लवकुश मिश्रा कभी कार मिस्त्री था, उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, किसी तरह उसका भाग्य चमक गया, भगवान श्रीराम मंदिर ट्रस्ट का कर्मचारी बन गया, कमर्चारी बनते ही उसका रुतबा भी चमक गया, उसकी संपति अचानक सातवें आसमान पर चढ़ गई, करोड़ो का मालिक बन गया, उसके पास कई प्लॉट, कई रिश्तेदारों के नाम संपतिया है, लवकुश मिश्रा के घर से गोबर के ढेर में छिपाये गए लाखों रुपए मिले हैं। एक अन्य है अनिल मिश्रा। अनिल मिश्रा भी करोड़ों का मालिक बन गया। टीनू यादव का प्रकरण और उदाहरण तो लोमहर्षक है और डकैत जैसा है, सबूत मिटाने जैसा है, टीनू यादव चंपत राय का निजी ड्राइवर था, फिर ट्रस्ट का कर्मचारी बन गया। इसकी संपति करोड़ो में है, इनकी तूती बोलती थी, क्योंकि ये चंपत राय का बेहद विश्वास पात्र था। टीनू यादव ने ही रामनदिर चढ़ावे और दान से संबंधित वीडियो डिलीट कराए हैं, कुल आठ महीने के वीडियो गायब मिले हैं, गायब वीडियो की रिकवरी भी संभव नहीं है, जहां तक टीनू यादव की अवैध संपत्ति की बात है तो फिर उसकी संपति करोड़ो में है, जिसके प्रमाण सार्वजनिक हो गए। बैंक अधिकारी भी मालो माल हो गए।

बोया पेड़ बबूल का तो आम कहा से होय? दान और चढ़ावे में लूट के पीछे नृपेन मिश्रा का हाथ बताया जा रहा है, नृपेन मिश्रा भगवान श्रीराम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष है, नृपेन मिश्रा ने कर्मचारियों की नियुक्ति और प्रबंधन में भूमिका निभाई है, नृपेन मिश्रा कौन है? नृपेन मिश्रा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत के अति दुलारे और विश्वास पात्र हैं, मोहन भागवत के कहने पर मोदी ने इन्हें मंदिर निर्माण का सरगना बनाया था। इसलिए ट्रस्ट के प्रबंधन पर इनकी तूती बोलती है, इनकी सहमति के बिना मंदिर का कोई भी निर्णय और सुधार के कार्यक्रम तय नहीं हो सकते हैं। नृपेन मिश्रा क्या श्रीराम के भक्त थे, क्या ये हिंदुत्व के प्रति सहानुभूति रखते थे, समर्पण रखते थे? इसके उत्तर भी जानना अति आवश्यक है। कारसेवकों और साधु संतों पर गोलियां चलवाने के आरोपी और गुनाहगार नृपेन मिश्रा है। 1990 जब कारसेवकों और साधु संतों के खून की होली खेली गई थी, तब उसका आदेश देने वाले यही नृपेन मिश्रा थे। उस समय ये मुलायम सिंह यादव के प्रमुख सचिव थे, कल्याण सिंह ने इन्हें प्रमुख सचिव के पद से हटा दिया था। सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह सरकार में इनकी पहुंच और रुतबा बढ़ता चला गया, दिन दुगनी और रात चौगुनी इनकी प्रगति होती चली गई। पहले उर्वरक मंत्रालय में सचिव बने फिर दूरसंचार मंत्रालय के सचिव भी बने, ट्राई के हेड भी बना दिए, कांग्रेस के लिए इनकी एक मात्र योग्यता कारसेवकों पर गोलियां चलवाने की थी, संसद में एक बार अखिलेश यादव ने कहा था कि जिसने गोलियां चलवाई , जिसने आपके कारसेवकों की हत्याएं कराई, उसी को आपने भगवान राम के मंदिर निर्माण समिति का अध्यक्ष बनवा दिया। अरुण जेटली ने गुजरात भवन में मोदी और नृपेन मिश्रा की मुलाकात कराई थी। बाद की कहानी सभी को मालूम है। मोदी की कृपा नृपेन मिश्रा पर बरसती चली गई, सैया भय कोतवाल तो डर किस बात का।

संघ का प्रचारक मंद बुद्धि का नहीं होता है, संघ का प्रचारक तो अति विद्वान होता है, संघ का प्रचारक तो अति समझदार होता है,संघ का प्रचारक बईमान भी नहीं होता है, संघ का प्रचारक लोभ लालच से मुक्त होता है, संपति और परिवारिक मोह से भी दूर होता है। ये सभी भ्रम भी टूट गए, बेनकाब हो गए है। यह भी सर्विदित हो गया कि संघ का प्रचारक भी बईमान हो सकता है, झूठ बोल सकता है, सबूत मिटाने की करतूत को अंजाम दे सकता है, अपने नजदीकी की चोरी डकैती पर पर्दा डाल सकता है, पुलिस और कानून के हाथ लगने से बचा सकता है। इसका साक्षात उदाहरण चंपत राय है। चंपत राय श्रीराम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव है, उनकी नियुक्ति संघ के प्रचारक के तौर पर हुई है। चढ़ावे और दान की राशि की लुट, चोरी, डकैती की घटना सामने आने पर चंपत राय ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर खुलेआम झूठ बोला और कहा कि दान और चढ़ावे की राशि में कोई लूट नहीं हुई है, कोई गबन नहीं हुआ है, कोई हेराफेरी नहीं हुई है, कोई वीडियो डिलीट नहीं हुई है, हमारे कर्मचारी सत्य निष्ठा के प्रतीक हैं , भगवान श्रीराम के विरोधियों ने झूठा आरोप लगाया है, हम उन सभी पर कानूनी कार्रवाई करेंगे जो अफवाह उड़ाई है। पर जैसे उनके चालक टीनू यादव का लूट में शामिल होने का प्रकरण सामने आया, लव कुश मिश्रा, अनिल मिश्रा की संपति का खुलासा हुआ, वैसे ही चंपत राय गायब हो गए, उनकी बोलती बंद हो गई, उनकी ईमानदारी से पर्दा और नकाब उठ गया। कहने का अर्थ है कि चंपत राय ने झूठ बोल कर संघ की छवि खराब कर दिया। अगर चंपत राय ने सच को स्वीकार कर लिया होता तो फिर संघ की छवि भी खराब होने से बच जाती, रामभक्तो मे चंपत राय खुद सत्य निष्ठा के प्रतीक बन जाते और नायक भी बन जाते।

साधु संत और पुजारी का स्वभाव प्रबंधन सरीखा हो ही नहीं सकता है, साधु संत अपने ध्यान और तपस्या में लीन रहते हैं, इसलिए वे दान और चढ़ावे में गबन को रोकने में सफल नहीं हो सकते हैं। इसलिए श्रीराम तीर्थ मंदिर ट्रस्ट में साधु संतों के अलावा समाज के संघर्षशील और निष्ठावान लोगों को शामिल किया जाना चाहिए,ट्रस्ट से एक जाति का नियंत्रण और वर्चस्व सामाजिक विद्रोह के लिए प्रेरित करता है। सामाजिक समीकरण बनना चाहिए। भगवान श्रीराम सिर्फ एक जाति के नहीं बल्कि सभी के आराध्य है। योगी आदित्यनाथ ईमानदार हैं , उन्होंने जांच के लिए एसआईटी का गठन कर दिया है फिर भी बीजेपी उत्तर प्रदेश विधानसभा के भावी चुनाव को देखते हुए कोई जोखिम नहीं लेगी, चढ़ावे और दान चोरी में जो पकड़े जाएंगे , उनकी जातियां विद्रोह पर उतर आएंगी और बीजेपी योगी को हराने की कसम खाने लगेगी। सिर्फ एनआईए ही इस लूट के गुनहगारों की गर्दन नाप सकती है। एनआईए जांच से ही श्रीराम तीर्थ मंदिर ट्रस्ट, बीजेपी, संघ की छवि बचेगी।

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समाज में सकारात्मक और रचनात्मक बदलाव लाने में ज़ेन ज़ी का महत्वपूर्ण योगदान – सुनील आंबेकर जी

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पुणे। संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में नवी पेठ स्थित पुणे श्रमिक पत्रकार संघ की ओर से आयोजित विशेष वार्तालाप कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर जी ने कहा कि “देश की नई पीढ़ी यानी ‘ज़ेन ज़ी’ (Gen Z) को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) बेहद आशान्वित है। आज के युवा अपनी परंपराओं और भारत के गौरवशाली इतिहास से जुड़े हुए हैं। समाज में सकारात्मक और रचनात्मक बदलाव लाने में यह पीढ़ी बहुत बड़ा योगदान दे रही है”।
इस अवसर पर मंच पर पत्रकार संघ के अध्यक्ष ब्रिजमोहन पाटिल और महासचिव मंगेश फल्ले भी उपस्थित रहे। सुनील आंबेकर जी ने संघ के पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन), ‘ज़ेन ज़ी’, जनसंख्या असंतुलन और मुस्लिम समाज को लेकर संघ के दृष्टिकोण को साझा किया। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के आंदोलन से जुड़े प्रश्न पर कहा कि “भारत में सभी स्तरों पर लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव होते हैं। हमारी अदालतें, प्रशासन और मीडिया पूरी स्वतंत्रता के साथ अपना काम कर रहे हैं। ऐसे मजबूत लोकतंत्र में यदि कोई अपनी आवाज उठा रहा है, तो व्यवस्था में उसकी बात को सुनने और उचित संज्ञान लेने की क्षमता होनी चाहिए। इसलिए इस तरह के आंदोलनों से अचंभित या हैरान होने की कोई आवश्यकता नहीं है।”

आरएसएस के सभी वित्तीय व्यवहार केवल बैंकों के जरिए
संघ के पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) को लेकर कतिपय राजनेताओं द्वारा फैलाए जा रहे भ्रम को सिरे से खारिज करते हुए उन्होंने कहा, “संघ के विधि-सम्मत अस्तित्व को लेकर कोई कानूनी विवाद है ही नहीं; केवल तुच्छ राजनीतिक लाभ के लिए कुछ तत्वों द्वारा दिग्भ्रमित करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूर्णतः विधि-सम्मत और मान्यता प्राप्त सामाजिक संगठन है। यही कारण है कि स्वतंत्रता के पश्चात समय-समय पर सभी सरकारों ने विभिन्न राष्ट्रीय आपदाओं और रचनात्मक कार्यों में संघ का सक्रिय सहयोग लिया है। संघ के पथ संचलन को प्रशासन द्वारा नियमानुसार अनुमति प्राप्त होती है, इतना ही नहीं, हमारी स्थानीय शाखाओं के नाम पर बैंकों में अधिकृत खाते संचालित हैं। संघ का समस्त आर्थिक व्यवहार पूर्णतः पारदर्शी है और केवल बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से ही होता है। संघ अपनी दैनिक शाखा पद्धति के माध्यम से प्रतिदिन समाज के प्रति प्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी (जवाबदेह) रहता है।”

मुस्लिम समाज और संघ के अंतर्संबंधों पर कहा, “यह ऐतिहासिक सत्य है कि संघ की स्थापना से बहुत पहले से ही देश में अलगाववादी मानसिकता के कारण हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष विद्यमान रहा है। दुर्भाग्यवश, स्वतंत्रता पूर्व मुस्लिम समाज में यह विषैली धारणा विकसित की गई कि ‘पूजा पद्धति बदलने से राष्ट्र, पूर्वज और इतिहास बदल जाता है’, और इसी विभाजनकारी मानसिकता के कारण देश ने विभाजन का दंश झेला। हर्ष का विषय है कि अब स्वयं मुस्लिम समाज के भीतर से भी सामाजिक सुधारों के लिए सकारात्मक पहल प्रारंभ हुई है। भारतीय मुस्लिमों को अपनी प्रेरणाओं के लिए पाकिस्तान की ओर नहीं, बल्कि इंडोनेशिया के सांस्कृतिक आदर्श की ओर देखना चाहिए, जिसने इस्लाम अपनाने के बाद भी अपनी मूल हिन्दू सांस्कृतिक जड़ों को अक्षुण्ण रखा है।”
उन्होंने कहा, “वर्तमान में यूरोप और चीन जैसे देशों ने अपनी आत्मघाती जनसंख्या नीतियों के कारण अब ‘यू-टर्न’ ले लिया है। इसे देखते हुए भारत के संदर्भ में जनसांख्यिकीय संतुलन बनाए रखना राष्ट्र की सुरक्षा के लिए कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।”
वर्ष 1947 के दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन का स्मरण कराते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि देश का बँटवारा भी ‘डेमोग्राफिक असंतुलन’ के कारण ही हुआ था। यदि भविष्य में पुनः किसी भूभाग में ऐसा असंतुलन पैदा हुआ, तो अखंड भारत की पहचान, सुरक्षा और सनातन संस्कृति को अक्षुण्ण रखना अत्यंत कठिन हो जाएगा। अतः भारतीय संस्कृति और राष्ट्रनिष्ठा को मानने वाले नागरिकों की बहुलता देश के प्रत्येक क्षेत्र और कोने में होनी अनिवार्य है।
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