भारत रत्न लाल बहादुर शास्त्री जी : अयाचित से लोक नेता तक

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पृथक

शास्त्री जी को हम सब ने बचपन में अपनी पुस्तकों में एक ऐसे युवा के तौर पर पढ़ा था जो तैर करके गंगा जी पार करके अपने स्कूल पढ़ने जाता था। स्कूल पहुंचने की यह जद्दोजहद लगभग हर जगह है थोड़ी कम या ज्यादा मुझे याद है हमारे कृष्णा नगर, यमुनापार में बरसात के दिनों में पानी भर जाया करता था स्कूल बसे बंद हो जाती थी साइकिल स्कूटर इत्यादि भी ठीक से नहीं चल पाते थे मगर स्कूल पहुंचना था तो पहुंचा जाता था। अपने छोटे दुखों से हमने शास्त्री जी की विकट परिस्थितियों का अंदाजा अच्छे से लगाया।

शास्त्री जी, प्रधानमंत्री बनने के कोई नेचुरल विकल्प नहीं थे वह कांग्रेस में या कहे पूरे देश में ही सबसे कमजोर समझे जाने व्यक्ति आगे बढ़ाए जाने की नीति के अयाचित लाभार्थी थे। कमजोर समझे जाने वाले व्यक्ति को इसलिए आगे बढ़ाया जाता है ताकि वह पहले से ही ऊपर बैठे किसी मजबूत व्यक्ति को चुनौती न दे सके। शास्त्री जी का चयन इसी नीति के तहत हुआ बाद में हमने देखा कि पहले अस्वस्थ शंकर दयाल शर्मा को और उनके मना करने पर बाद में अस्वस्थ पीवी नरसिम्हा राव को भी इसी मकसद से चुना गया। फिर आज कल पप्पू यादव के साथ जो कुछ भी हो रहा है वह तेजस्वी यादव के सामने भविष्य में मजबूत यादव नेतृत्व के संकट को खत्म करने के लिए हो रहा हैं, अमिताभ बच्चन, माधवराव सिंधिया आदि भी वैसे ही विकटिमहुड उदाहरण हैं।

खैर इस अयाचित प्रधानमंत्री से शुरुवात में तो कांग्रेस के सिंडिकेट ( सात नेता जिनके ग्रुप लीडर के. कामराज थे ) ने अपने दबाव में काम करवा लिया पर 1965 के युद्ध में शारीरिक और सामाजिक राजनीतिक लोकेशन के आधार पर कमजोर समझे जाने वाले प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने दिखा दिया की उनमें कितना दम हैं। ऐसा दमखम एक व्यक्ति में तब भी आ पाता है जब वह सारे समाज को, अपने राजनैतिक विरोधियों को एक साथ लेकर के चलता है। युद्ध के समय प्रधानमंत्री रहते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने पार्टी लाइन से ऊपर उठकर आरएसएस के सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिव गोलवलकर को सर्वदलीय बैठक में आमंत्रित किया। डॉ. हरीश चंद्र बर्थवाल ने अपनी पुस्तक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघः एक परिचय में कहा है कि इस आमंत्रण का उद्देश्य दिल्ली पुलिस को अधिक रणनीतिक गतिविधियों का कार्यभार सौंपना और उन्हें उनके नियमित कर्तव्यों से मुक्त करना था, जिन्हें बाद में आरएसएस कार्यकर्ताओं द्वारा संभाला गया। बर्थवाल ने यहां तक दावा किया कि शास्त्री के अनुरोध पर, आरएसएस कार्यकर्ताओं ने युद्ध के मोर्चे पर तैनात सैनिकों को भोजन और अन्य आवश्यक आपूर्ति भी प्रदान की।

अपनी आत्मकथा में भारतीय जनता पार्टी के शिखर पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी लाल बहादुर शास्त्री का वर्णन करते हुए कहते हैं, “नेहरू के विपरीत, शास्त्री जी ने जनसंघ और आरएसएस के प्रति कोई वैचारिक शत्रुता नहीं रखी। वह अक्सर राष्ट्रीय मुद्दों पर परामर्श के लिए श्री गुरुजी को आमंत्रित करते थे।” आर्गनाइज़र’ में अपने संपादकीय लेख में आडवाणी जी ने कहा ‘नेहरू से उलट, शास्त्री ने जनसंघ और आरएसएस को लेकर किसी तरह का वैमनस्य नहीं रखा. वह श्री गुरुजी को राष्ट्रीय मुद्दों पर विचार-विमर्श के लिए बुलाया करते थे.’

इसी प्रकार शास्त्री जी का किस्सा संघ के चतुर्थ सरसंघचालक श्री रज्जू भैय्या के संस्मरण से भी मिलता है। दोनों लोग रज्जू भैय्या और प्रधानमंत्री शास्त्री उत्तर प्रदेश प्रयागराज से थे, स्थानिक होने की वजह से दोनों के घनिष्ठ सम्बन्ध थे। जब शास्त्री जी क्षेत्रीय यानी उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय थे, तब एक बार सरसंघचालक श्री गुरूजी की उपस्थिति में कुछ गणमान्य लोगों के लिए चायपान का कार्यक्रम आयोजित हुआ था। श्री रज्जू भैय्या ने शास्त्री जी को इस का निमंत्रण दिया, तब शास्त्री जी ने कहा कि मैं आना चाहता हूँ, पर नहीं आऊंगा कारण मेरे वहां आने से कांग्रेस में मेरे बारे में तरह-तरह की बातें शुरू हो जाएंगी।

इस पर श्री रज्जू भैय्या ने पूछा कि – “शास्त्री जी! आप जैसे व्यक्ति के बारे में भी लोग ऐसी बातें करेंगे?” तब उन्होंने कहा – “अरे! आप नहीं जानते राजनीति क्या होती है।” इस पर श्री रज्जू भैय्या ने कहा कि हमारे यहां संघ में ऐसा नहीं है। यदि कोई स्वयंसेवक मुझे आपके साथ देखता है तो वह सोचेगा कि – “रज्जू भैय्या शास्त्री जी को संघ समझा रहे होंगे।” शत्रुता नहीं रखने की वजह से ही शास्त्री जी अजात शत्रु भी कहलाये जाते थे

शास्त्री जी राजनीति में रहते हुए भी प्रधानमंत्री रहते हुए भी सादा बने रहे, उनकी लोन द्वारा ली गई कार यदा कदा सोशल मीडिया पर चर्चा में आ जाती है। यह कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके ठीक सामने पाकिस्तान के अयूब खान थे जिनकी लाइफस्टाइल और रंगोलिया के किस्से इतिहास में बखूबी दर्ज हैं। 65 युद्ध में शास्त्री जी कठोर निर्णय कर चुके थे इसलिए शायद वह किसी षड्यंत्र का शिकार हुए।

2017 में प्रयागराज में शास्त्री जी एवं उनकी पत्नी ललिता जी की मूर्ति की अनावरण करते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने उन्हें लोक नेता कहकर सम्बोधित किया तो 2019 में एक कदम आगे बढ़कर प्रधानमंत्री मोदी ने वाराणसी के एयरपोर्ट पर लालबहादुर शास्त्री जी की आदम कद मूर्ति लगवा कर उन्हें श्रद्धांजलि दी, इस प्रकार लार्जर देन लाइफ गांधियन प्रधानमंत्रियों की इमेज बिल्डिंग से इतर भारत के इस महान सपूत को विपक्ष ने अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की, आज उनकी जयंती पर उनको नमन श्रद्धांजलि ।

बेकार, बेकाम नहीं हैं हमारे वृद्धजन

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प्रो. मनोज कुमार

भोपाल । सक्सेना जी पीएचई विभाग में चीफ इंजीनियर के पद से रिटायर हुए हैं. किसी समय उनकी तूती बोला करती थी लेकिन उम्र के आखिरी पड़ाव में ना केवल वे अकेले हैं बल्कि वृद्धाश्रम का एक कोना उनका बसेरा बन गया है. कभी करोड़ों का मामला सुलटाने वाले अग्रवाल दंपति की कहानी भी यही है. गणित और अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे द्विवेदी दंपति भी उम्र के आखिरी पड़ाव पर वृद्धाश्रम में रह रहे हैं. ये वे लोग हैं जिनकी काबिलियत और अनुभवों से समाज रोशन होता था. उनके अपने बच्चे आज किसी मुकम्मल मुकाम पर हैं तो उनका ही सहारा था. जिन्हें आप माता-पिता कहते हैं, आज वृद्धाश्रम में बिसूर रहे हैं. निराश और हताश भी हैं. ये दो चार लोग नहीं बल्कि वृद्धजनों की पूरी टोली है. आपस में बतिया लेते हैं और वृद्धाश्रम के दरवाजे पर टकटकी लगाये देखते हैं कि कहीं बहू-बेटा तो लेने नहीं आए? पोता-पोती की सूरत याद कर हौले से मुस्करा देते हैं लेकिन गोद में उठाकर लाड़ ना कर पाने की हसरत उनके चेहरे पर मायूसी बनकर उभर आती है. यह कहानी घर-घर की होती जा रही है. थोड़ा पैसा, थोड़ा रसूख कमाने के साथ ही वृद्धजन बोझ बनने लगते हैं. और जल्द ही तलाश कर लेते हैं उनके लिए वृद्धाश्रम का कोई कोना. पहले पहल आना-जाना भी होता है लेकिन धीरे-धीरे वह भी भुला दिया जाता है. संस्कारों में रची-बसी भारतीय संस्कृति का यह दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय है. इन पर लिखते हुए मैं भी एक गलती कर रहा हूँ क्यों एक दिन वृद्धजन दिवस पर लिख रहा हूँ. क्यों साल में बार-बार इस बात का स्मरण नहीं कराता हूँ. सच है लेकिन यह दिन इसलिए चुना कि आज अंतरराष्ट्रीय दिवस वृद्धजन के बहाने लोग पढ़ तो लेेंगे. खास बात यह है कि हमारे वृद्धजन लिए नहीं बल्कि बाजार का दिन है. उम्र भर लतियाते वृद्धजनों का ऐसा सम्मान किया जाएगा कि लगेगा कि कुछ हुआ ही नहीं. इसी दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय की चर्चा कर रहा हूँ.

क्या ही हैरानी की बात है कि जिनसे हम रौशन हैं, जिनसे हमारा घर रौशन है, उनके लिए हमने एक दिन तय कर दिया है और नाम दे दिया है वृद्धजन दिवस. और इसका फलक बढ़ाकर अंतरराष्ट्रीय कर दिया है. यूरोप की मानसिकता में वृद्धजन के लिए यह सौफीसदी मुफीद हो सकता है लेकिन भारतीय सनातनी संस्कृति में वृद्धजन बेकार और बेकाम नहीं हैं लेकिन दुर्र्भाग्य से हमने भी यूरोपियन संस्कृति का अंधानुकरण कर उन्हें बेकार और बेकाम मान लिया है. उम्र के आखिरी पड़ाव में ठहरे वृद्धजनों के पास अनुभव है, कौशल है और है दुनियादारी की वह समझ लेकिन वे निहायत अकेले होकर वृद्धाश्रम में अपना समय गुजार रहे हैं. कितनी विडम्बना है कि एक तरफ हम सनातनी होने और संस्कार की दुहाई देते नहीं थकते और दूसरी ओर वृद्धजन की उपेक्षा और तिरस्कृत करने में पीछे नहीं हटते. आखिर क्या मजबूरी हो गई कि जिनकी छाँह में पलकर हम बढ़े हुए, वही हमारे लिए बोझ बन गए? क्यों हम उनके अनुभवों का लाभ लेकर जीवन को संवार नहीं पा रहे हैं? क्या कारण है कि उन्हें साथ रखते हुए कथित प्रायवेसी में बाधा आ रही है? सवाल अनेक हैं लेकिन सवालों के बीच अपने दुख और अहसास के बीच घुटते-घबराते वृद्धजनों की सुध कौन लेगा? क्या वृद्धाश्रम ही अंतिम विकल्प है.

वृद्धजनों को घर से बाहर निकाल देना, उनके साथ शारीरिक हिंसा करना और उन्हें अपमानित करने की खबरें अब रोजमर्रा की हो गई हैं. संवेदहीन होते समाज में वृद्धजन दिवस बाजार के लिए एक दिन है. वृद्धजनों को उत्पाद बना दिया जाएगा. दरअसल बाजार से बाहर आकर इन वृद्धजनों के टैलेंट का उपयोग करना होगा. परिवार के नालायक बच्चों ने वृद्धजनों को वृद्धाश्रम में भेज दिया है तो समाज का, सरकार का दायित्व है कि उन्हें मुख्यधारा में लाकर उनकी ना केवल प्रतिभा का सम्मान करे बल्कि उन्हें सम्मानपूर्वक जीने का हौसला दे. देशभर के शासकीय स्कूलों की हालत एक जैसी है. शिक्षकों की कमी है तो इस कमी को इन वृद्धजनों से पूरा क्यों नहीं किया जा सकता है? इन्हें स्कूलों में अध्यापन का अवसर दिया जाए और बदलेे में सम्मानजनक मानदेय. ऐसा करने से उनके भीतर का खोया आत्मविश्वास लौटेगा. वे स्वयं को सुरक्षित और उपयोगी समझेंगे तो डॉक्टर और दवा से उनकी दूरी बन जाएगी. एक बेटे, पोते-पोती की कमी को दूर कर सकेंगे. स्कूली शिक्षा में गुणवत्ता आएगी. आखिरकार अनुभव अनमोल होता है.

कुछ वृद्धजन गणित, विज्ञान, हिन्दी, अंग्रेजी और अन्य विषयों के जानकार होंं लेकिन कुछ वृद्धजन ऐसे होंगे जो विषयों के सिद्धहस्त ना होंं लेकिन दूसरी विधा के जानकार हों, उन्हें कौशल विकास के कार्यों में नई पीढ़ी को दक्ष करने के कार्य में उपयोग किया जाना चाहिए. वृद्धाश्रम के भीतर ही कौशल उन्नयन की कक्षा आयोजित कर उत्सुक युवाओं को प्रशिक्षण दिया जाए ताकि वे सीख सकें. अध्यापन का कार्य हो या कौशल उन्नयन का. ज्यादा कुछ नहीं तो वृद्धाश्रम के भीतर ही हम विविध विषयों की साप्ताहिक कोचिंग कक्षा के संचालन की शुरूआत कर सकते हैं. जिसमें विषय की शिक्षा तो होगी ही, विविध कलाओं की कक्षाएं भी होंगी. जो जिस विधा में पारंगत है, वे उसमें सक्रिय हो जाएंगे. इन गतिविधियों में वृद्धजनों का जुड़ाव होगा तो वे वापस स्वस्थ्य और प्रसन्न हो जाएंगे. जिंदगी के प्रति उनका अनुराग बढ़ जाएगा. हौसला बढ़ेगा तो वे दवा से दूर हो जाएंगे.

बस, थोड़ा सा हमें उनके प्रति मेहनत करना है. थोड़ा सा साहस देना है. परिवार से टूटे लोग शरीर से ज्यादा मन से टूट जाते हैं और मन से टूटे को जोडऩा आसान नहीं होता लेकिन मुश्किल कुछ भी नहीं है. दो को खड़ा कीजिए, दस अन्य स्वयं सामने आ जाएंगे. इसमें जेंडर का कोई भेद नहीं हैं. वृद्धजनों का अर्थ माता और पिता दोनों ही हैं और दोनों ही अपने बच्चों से सताये हुए हैं. इस बार वृद्धजन दिवस पर हमें, हम सबको संकल्प लेना होगा कि अबकी बार वे वृद्धाश्रम में नहीं, कौशल की पाठशाला में रह रहे होंगे. वृद्धाश्रम को कौशल की पाठशाला में परिवर्तन ही भारतीय संस्कृति की ओर वापसी का पहला कदम होगा. नालायक बच्चों के लिए यह एक पाठ होगा कि उन्होंने कौन सा अनमोल हीरा गंवा दिया है. बाजार को अपना काम करने दीजिए, हम सब अपना काम करेंगे. एक बार कोशिश तो करके देखिए. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

समाज सहयोग से संघ शताब्दी यात्रा सुगम बनी

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दिल्ली ।

दत्तात्रेय होसबाले

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य को अभी सौ वर्ष पूर्ण हो रहेहै। इस सौ वर्ष की यात्रा में कई लोग सहयोगी और सहभागीरहे हैं। यह यात्रा परिश्रम पूर्ण और कुछ संकटों से अवश्यघिरी रही, परंतु सामान्य जनों का समर्थन उसका सुखद पक्षरहा। आज जब शताब्दी वर्ष में सोचते हैं तो ऐसे कई प्रसंगऔर लोगों का स्मरण आता है, जिन्होंने इस यात्रा कीसफलता के लिए स्वयं सब कुछ समर्पित कर दिया।

प्रारंभिक काल के वे युवा कार्यकर्ता एक योद्धा की तरह देशप्रेम से ओत-प्रोत होकर संघ कार्य हेतु देशभर में निकल पड़े।अप्पाजी जोशी जैसे गृहस्थ कार्यकर्ता हों या प्रचारक स्वरूपमें दादाराव परमार्थ, बालासाहब व भाऊराव देवरस बंधु, यादवराव जोशी, एकनाथ रानडे आदि लोग डॉक्टर हेडगेवारजी के सान्निध्य में आकर संघ कार्य को राष्ट्र सेवा काजीवनव्रत मानकर जीवन पर्यन्त चलते रहे।

संघ का कार्य लगातार समाज के समर्थन से ही आगे बढ़तागया। संघ कार्य सामान्य जन की भावनाओं के अनुरूप होनेके कारण शनैः शनैः इस कार्य की स्वीकार्यता समाज मेंबढ़ती चली गई। स्वामी विवेकानंद से एक बार उनके विदेशप्रवास में यह पूछा गया कि आपके देश में तो अधिकतम लोगअनपढ़ हैं, अंग्रेज़ी तो जानते ही नहीं हैं, तो आपकी बड़ी-बड़ीबातें भारत के लोगों तक कैसे पहुँचेगी? उन्होंने कहा कि जैसेचीटियों को शक्कर का पता लगाने के लिए अंग्रेज़ी सीखनेकी ज़रूरत नहीं है, वैसे ही मेरे भारत के लोग अपनेआध्यात्मिक ज्ञान के चलते किसी भी कोने में चल रहेसात्विक कार्य को तुरंत समझ जाते हैं व वहीं वो चुपचापपहुँच जाते हैं। इसलिए वे मेरी बात समझ जायेंगे। यह बातसत्य सिद्ध हुई। वैसे ही संघ के इस सात्विक कार्य को धीरेक्यों न हो, सामान्य जन से स्वीकार्यता व समर्थन लगातारमिल रहा है।

संघ कार्य के प्रारंभ से ही संपर्कित व नये-नये सामान्यपरिवारों द्वारा संघ कार्यकर्ताओं को आशीर्वाद व आश्रय प्राप्तहोता रहा। स्वयंसेवकों के परिवार ही संघ कार्य संचालन केकेंद्र रहे। सभी माता-भगिनियों के सहयोग से ही संघ कार्य कोपूर्णता प्राप्त हुई। दत्तोपंत ठेंगड़ी या यशवंतराव केलकर, बालासाहेब देशपांडे तथा एकनाथ रानडे, दीनदयाल उपाध्यायया दादासाहेब आपटे जैसे लोगों ने संघ प्रेरणा से समाजजीवन के विविध क्षेत्रों में संगठनों को खड़ा करने में अहमभूमिका निभाई। ये सभी संगठन वर्तमान समय में व्यापकविस्तार के साथ-साथ उन क्षेत्रों में सकारात्मक बदलाव लानेमें सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। समाज की बहनों के मध्य इसीराष्ट्र कार्य हेतु राष्ट्र सेविका समिति के माध्यम से मौसी जी केलकर से लेकर प्रमिलाताई मेढ़े जैसी मातृसमान हस्तियोंकी भूमिका इस यात्रा में अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।

संघ द्वारा समय-समय पर राष्ट्रीय हित के कई विषयों कोउठाया गया। उन सभी को समाज के विभिन्न लोगों कासमर्थन प्राप्त हुआ, जिनमें कई बार सार्वजनिक रूप सेविरोधी दिखने वाले लोग भी शामिल रहे। संघ का यह भीप्रयास रहा कि व्यापक हिंदू हित के मुद्दों पर सभी का सहयोगप्राप्त किया जाए। राष्ट्र की एकात्मता, सुरक्षा, सामाजिकसौहार्द तथा लोकतंत्र एवं धर्म-संस्कृति की रक्षा के कार्य मेंअसंख्य स्वयंसेवकों ने अवर्णनीय कष्ट का सामना किया औरसैकड़ों का बलिदान भी हुआ। इन सबमें समाज के संबल काहाथ हमेशा रहा है।

1981 में तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम में भ्रमित करते हुए कुछहिंदुओं का मतांतरण करवाया गया। इस महत्वपूर्ण विषय परहिंदू जागरण के क्रम में आयोजित लगभग पाँच लाख कीउपस्थिति वाले सम्मेलन की अध्यक्षता करने हेतु तत्कालीनकांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ. कर्णसिंह उपस्थित रहे। 1964 मेंविश्व हिन्दू परिषद की स्थापना में प्रसिद्ध संन्यासी स्वामीचिन्मयानंद, मास्टर तारा सिंह व जैन मुनी सुशील कुमार जी, बौद्ध भिक्षु कुशोक बकुला व नामधारी सिख सद्गुरु जगजीतसिंह इनकी प्रमुख सहभागिता रही। हिन्दू शास्त्रों मेंअस्पृश्यता का कोई स्थान नहीं है यह पुनर्स्थापित करने केउद्देश्य से श्री गुरूजी गोलवलकर की पहल पर उडुपी मेंआयोजित विश्व हिंदू सम्मेलन में पूज्य धर्माचार्यों सहित सभीसंतों-महंतों का आशीर्वाद व उपस्थिति रही। जैसे प्रयागसम्मेलन में न हिंदुः पतितो भवेत् ( कोई हिन्दू पतित नहीं होसकता) का प्रस्ताव स्वीकार हुआ था वैसे ही इस सम्मेलन काउद्घोष था – हिंदवः सोदराः सर्वे अर्थात सभी हिन्दू भारत माताके पुत्र हैं। इन सभी में तथा गौहत्या बंदी का विषय हो या रामजन्मभूमि अभियान, संतों का आशीर्वाद संघ स्वयंसेवकों कोहमेशा प्राप्त होता रहा है।

स्वाधीनता के तुरंत पश्चात राजनीतिक कारणों से संघ कार्यपर तत्कालीन सरकार द्वारा जब प्रतिबंध लगाया गया, तबसमाज के सामान्य जनों के साथ अत्यंत प्रतिष्ठित व्यक्तियोंने विपरीत परिस्थितियों में भी संघ के पक्ष में खड़े होकर इसकार्य को संबल प्रदान किया। यही बात आपातकाल केसंकट समय में भी अनुभव में आई। यही कारण है कि इतनीबाधाओं के पश्चात भी संघ कार्य अक्षुण्ण रूप से निरंतर आगेबढ़ रहा है। इन सभी परिस्थितियों में संघ कार्य एवंस्वयंसेवकों को सँभालने का दायित्व हमारी माता-भगिनीयों नेबड़ी कुशलता से निभाया। यह सभी बातें संघ कार्य हेतु सर्वदाप्रेरणास्रोत बन गयी हैं।

भविष्य में राष्ट्र की सेवा में समाज के सभी लोगों के सहयोगएवं सहभागिता के लिए संघ स्वयंसेवक शताब्दी वर्ष मेंघर-घर संपर्क के द्वारा विशेष प्रयास करेंगे। देशभर में बड़ेशहरों से लेकर सुदूर गाँवों के सभी जगहों तक तथा समाज केसभी वर्गों तक पहुँचने का प्रमुख लक्ष्य रहेगा। समूचे सज्जनशक्ति के समन्वित प्रयासों द्वारा राष्ट्र के सर्वांगीण विकासकी आगामी यात्रा सुगम एवं सफल होगी।

(लेखक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह हैं)

संघ के 100 साल: दो अक्टूबर, 2025 को रेशमबाग मैदान, नागपुर के भाषण में क्या होगा खास

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दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का विजयादशमी उत्सव हर वर्ष एक महत्वपूर्ण अवसर होता है, जहां संघ प्रमुख (सरसंघचालक) डॉ. मोहन भागवत का भाषण राष्ट्र के सामने दिशा-निर्देश प्रदान करता है। 2 अक्टूबर, 2025 को होने वाला यह भाषण विशेष रूप से महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि यह संघ की स्थापना के शताब्दी वर्ष का प्रारंभ चिह्नित करेगा। आरएसएस की स्थापना 1925 में डॉ. केशवराव बलराम हेडगेवार द्वारा विजयादशमी के दिन हुई थी, और 2025 में यह संगठन अपने 100 वर्ष पूरे कर रहा है। इस भाषण में क्या खास होगा, इसका अनुमान संघ की परंपराओं, हाल की घटनाओं, पूर्व भाषणों और शताब्दी योजनाओं के आधार पर लगाया जा सकता है।

सबसे पहले, इस भाषण की विशेषता होगी शताब्दी उत्सव का उद्घाटन। आरएसएस ने घोषणा की है कि 2 अक्टूबर, 2025 को नागपुर के रेशमबाग में सुबह 7:40 बजे विजयादशमी उत्सव आयोजित होगा, जिसमें पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद मुख्य अतिथि होंगे। डॉ. भागवत का उद्बोधन इस उत्सव का केंद्रबिंदु होगा, जो संघ के 100 वर्षों की यात्रा को रेखांकित करेगा। यह भाषण न केवल इतिहास की समीक्षा करेगा, बल्कि भविष्य की दृष्टि भी प्रस्तुत करेगा, जो संघ के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा।

भाषण में संघ की ऐतिहासिक यात्रा पर गहन चिंतन होने की संभावना है। डॉ. भागवत संभवतः 1925 से शुरू हुई संघ की कहानी को याद करेंगे – कैसे एक छोटे से शाखा से यह संगठन लाखों स्वयंसेवकों का विशाल नेटवर्क बन गया। वे स्वतंत्रता संग्राम में संघ की भूमिका, आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा, और विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं में सेवा कार्यों का उल्लेख करेंगे। उदाहरण के लिए, 2024 के विजयादशमी भाषण में उन्होंने हिंदू समाज की एकता और सांस्कृतिक मूल्यों पर जोर दिया था, जो 2025 में शताब्दी संदर्भ में और गहराई से दोहराया जा सकता है। विशेष रूप से, संघ के योगदान को राष्ट्र-निर्माण के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास में उसके अनुषांगिक संगठनों की भूमिका।

दूसरी प्रमुख विशेषता होगी हिंदू एकता और सामाजिक सद्भाव पर बल। डॉ. भागवत अक्सर जातिगत विभाजन को दूर करने की बात करते हैं। 2024 में उन्होंने जातियों के बीच पुल बनाने और कमजोरी को अस्वीकार करने पर जोर दिया था। 2025 में, शताब्दी वर्ष में, यह संदेश और मजबूत होगा, खासकर वर्तमान राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य में। वे संभवतः बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचारों, वैश्विक युद्धों और ‘डीप स्टेट’, ‘वोकिज्म’ तथा ‘कल्चरल मार्क्सिज्म’ जैसे खतरों का जिक्र करेंगे, जैसा कि पिछले वर्ष किया था। भारत की विविधता को ताकत बताते हुए, वे ‘धर्म’ को जीवन-प्रेरणा के रूप में परिभाषित करेंगे, न कि मात्र मजहब के रूप में।

शताब्दी वर्ष की योजनाएं इस भाषण को और खास बनाएंगी। संघ ने एक लाख से अधिक ‘हिंदू सम्मेलनों’ और ‘बिरादरी गोष्ठियों’ की योजना बनाई है, जो समाज को एकजुट करने पर केंद्रित होंगी। डॉ. भागवत इन कार्यक्रमों का रोडमैप प्रस्तुत कर सकते हैं, जिसमें युवाओं की भागीदारी, स्वदेशी अपनाने और राष्ट्रीय सुरक्षा पर जोर होगा। वे ओटीटी प्लेटफॉर्म्स जैसे माध्यमों पर सांस्कृतिक प्रभाव की चर्चा कर सकते हैं। वैश्विक संदर्भ में, इजराइल-हमास संघर्ष या कश्मीर की स्थिति का उल्लेख हो सकता है।

इसके अलावा, भाषण में संघ की अपोलिटिकल छवि को मजबूत करते हुए, राष्ट्रहित को सर्वोपरि बताया जाएगा। 2025 में लोकसभा चुनावों के बाद के परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए, वे स्थिर सरकारों के महत्व पर बात कर सकते हैं, लेकिन प्रत्यक्ष राजनीतिक टिप्पणियों से बचेंगे। विशेष घोषणाएं जैसे नए सेवा प्रकल्प या अंतरराष्ट्रीय विस्तार की योजनाएं शामिल हो सकती हैं, क्योंकि संघ अब 40 से अधिक देशों में सक्रिय है।

कुल मिलाकर, यह भाषण संघ के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ होगा, जो अतीत की उपलब्धियों को सम्मानित करते हुए भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करेगा। डॉ. भागवत का संदेश एकता, शक्ति और सांस्कृतिक गौरव पर केंद्रित होगा, जो लाखों स्वयंसेवकों को प्रेरित करेगा। शताब्दी वर्ष में यह भाषण न केवल आरएसएस के सदस्यों के लिए, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए प्रेरणादायी साबित होगा, क्योंकि यह भारत की सनातन परंपराओं को आधुनिक संदर्भ में जोड़ेगा।

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