रंगमंच आंदोलन विषय केंद्रित प्रथम परिसंवाद आयोजित

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प्रकाश झा

नई दिल्ली। ‘मैथिली रंगमंच आंदोलन’ की बहुत दीर्घ तो नहीं, लेकिन स्वतंत्र भारत में एक सतत परंपरा रही है। जैसा कि अन्य कई भाषाओं में रंगकर्म की शुरुआत पहले अनुवाद से हुई, उसी तरह मैथिली में रंगमंच आंदोलन को गति देने के लिए अनुवाद के साथ -साथ मौलिक नाटकों का भी लेखन हुआ। हालांकि मैथिली में धूर्तसमागम, मणिमंजरी, गोरक्षविजय जैसे मौलिक नाटक पहले से मौजूद रहे हैं। यह बात प्रमुख नाटककार, कवि और भाषाविद् प्रो. उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ ने साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली और मैथिली लोक रंग (मैलोरंग) के संयुक्त तत्वावधान में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के अंतर्मुख सभागार में आयोजित ‘मैथिली रंगमंच आंदोलन’ पर परिसंवाद में कहा ।

मैलोरंग के निर्देशक डॉ. प्रकाश झा ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि युवा रंगकर्मियों को व्यापक रूप से साहित्य पढ़ने की जरूरत है। बिना पढ़े रंगमंच और अभिनय के साथ न्याय नहीं किया जा सकता। उन्होंने दिल्ली एनसीआर में मैलोरंग और उससे उपजी अन्य रंग संस्थाओं की रंग गतिविधियों पर भी प्रकाश डाला।

परिसंवाद में मैथिली के अन्य विद्वान वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे। बीज वक्तव्य देते हुए प्रदीप बिहारी ने कहा कि अनेक रंग आंदोलनों से गुजरते हुए आज मैथिली रंगमंच का परिदृश्य बहुत समृद्ध हुआ है और मिथिला के विभिन्न शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक में हो रहे नाटकों और रंगकर्म की चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि मिथिला समाज को रंगकर्मियों को प्रोत्साहित करने के लिए कदम उठाना चाहिए और नाटकों में अभिनय प्रदर्शन करने वालों को बढ़ावा देने के लिए पुरस्कार और सम्मान की व्यवस्था करनी चाहिए।
नमोनारायण मिश्र ने कोलकाता में रंगमंच से जुड़ी संस्थाओं और रंगकर्मियों के रंगमंच आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए किए गए योगदान की चर्चा की। किसलय कृष्ण ने मिथिला और नेपाल में मैथिली रंगमंच की गतिविधियों पर शोधपूर्ण आलेख का पाठ किया। मैथिली रंगमंच की वरिष्ठ अभिनेत्री प्रेमलता मिश्र प्रेम ने पटना के रंग आंदोलनों, रंगमंच से जुड़ी संस्थाओं और उन संस्थाओं की गतिविधियों के बारे में विस्तृत और सारगर्भित चर्चा की। उन्होंने कहा कि शुरू में रंगकर्म के लिए महिला अभिनेत्रियों का अभाव दिखता था, लेकिन धीरे-धीरे समाज में जागृति के कारण अब मैथिली रंगमंच में बड़ी संख्या में महिला अभिनेत्री और निर्देशिका सक्रिय हैं।
दूसरे सत्र में युवा लेखक अरुणाभ सौरभ ने मैथिली रंगमंच आंदोलन और उस पर वैश्विक रंगमंच के प्रभाव से संबंधित शोधपूर्ण आलेख का पाठ किया और विभिन्न नाट्य शैलियों की चर्चा की। संजीव सिन्हा ने दिल्ली रंगकर्म के संबंध में प्रेक्षकीय दृष्टि से विचार करते हुए मैथिली में मंचित नाटकों के आम लोगों पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों का उल्लेख किया।
दूसरे सत्र की अध्यक्षता प्रो. देवशंकर नवीन ने की और उन्होंने आशा व्यक्त की कि ‘मैथिली रंगमंच आंदोलन’ ने मिथिला के समाज और संस्कृति को प्रभावित किया है और आगे भी सकारात्मक योगदान करता रहेगा।
उन्होंने कहा कि साहित्य कभी भी मनोरंजन का साधन नहीं रहा, बल्कि उसका मूल उद्देश्य समाज सुधार रहा है।
कार्यक्रम की शुरुआत में साहित्य अकादेमी के उप सचिव एन सुरेश बाबु ने सभी आमंत्रित विद्वान प्रतिभागियों एवं श्रोताओं का अपनी तरफ से अकादेमी के सचिव डॉ. वरुण गुलाटी की ओर से स्वागत किया। पूरे परिसंवाद में सभागार खचाखच भरा हुआ था और इसमें मैथिली के अनेक लेखक, कवि, आलोचक उपस्थित थे। उद्घाटन सत्र का संचालन नाटककार रौशन झा तथा दूसरे सत्र का संचालन नाट्यालोचक संतोषी कुमार ने किया । अंत में धन्यवाद ज्ञापन नीतीश कुमार झा द्वारा किया गया ।

बांग्लादेश में मंदिर निर्माण पर रोक और चयनात्मक वैश्विक विमर्श

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अखिलेश चौधरी

सिलचर (असम) : दक्षिण एशिया में राजनीतिक परिवर्तन और बढ़ती कट्टरता के बीच बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिन्दू समाज की स्थिति एक बार फिर गम्भीर चिन्ता का विषय बन गई है। हाल ही में बांग्लादेश के गाइबांधा जिले के पलाशबाड़ी क्षेत्र में निर्माणाधीन श्री श्री राधा गोविन्द एवं काली मन्दिर परिसर में भगवान राम की विशाल प्रतिमा और एक सांस्कृतिक परिसर के निर्माण कार्य को रोक दिया गया। इस घटनाक्रम ने धार्मिक स्वतंत्रता, प्रशासन की भूमिका और वैश्विक मानवाधिकार विमर्श की निष्पक्षता पर अनेक प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

️ *क्या है पूरा विवाद?*

गाइबांधा के पलाशबाड़ी उपजिला में स्थित श्री श्री राधा गोविन्द एवं काली मन्दिर परिसर में एक विशाल धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्र का निर्माण किया जा रहा था। इस परियोजना का उद्देश्य सनातन संस्कृति की झलक प्रस्तुत करना था। परिसर में भगवान राम, भगवान कृष्ण, भगवान शिव सहित लगभग 144 देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की स्थापना की योजना थी।

सामाजिक माध्यमों पर निर्माणाधीन विशाल राम प्रतिमा के चित्र सामने आने के बाद कुछ कट्टरपन्थी संगठनों ने इसका विरोध प्रारम्भ कर दिया और कानून-व्यवस्था बिगड़ने की चेतावनियाँ दीं। उपलब्ध समाचार रिपोर्टों के अनुसार, विरोध कर रहे तत्वों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने के बजाय स्थानीय प्रशासन ने मन्दिर परिसर में चल रहे मूर्तिनिर्माण कार्य को ही रोकने का निर्देश दे दिया। प्रशासन के इस आदेश के बाद मन्दिर समिति को निर्माण कार्य स्थगित करना पड़ा। मन्दिर के सलाहकार श्यामल कुमार महन्त ने पुष्टि की कि प्रशासनिक निर्देशों और सुरक्षा सम्बंधी परिस्थितियों के कारण कार्य रोक दिया गया है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्य का दायित्व कानून-व्यवस्था बनाए रखना और सभी नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना है। ऐसे में यदि विरोध और धमकियों के दबाव के बीच प्रशासन विरोध करने वाले तत्वों के विरुद्ध कार्रवाई करने के बजाय पीड़ित पक्ष की वैध गतिविधियों पर ही रोक लगा दे, तो यह स्वाभाविक रूप से राज्य की निष्पक्षता और उसकी क्षमता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

*संवैधानिक आदर्श और व्यवहारिक वास्तविकता*

बांग्लादेश का संविधान धर्मनिरपेक्षता और सभी नागरिकों के लिए धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने, उसका प्रचार करने तथा धार्मिक संस्थानों की स्थापना करने का अधिकार प्राप्त है।

ऐसी स्थिति में यदि हिन्दू समाज को अपनी निजी भूमि पर धार्मिक प्रतीकों और पूजा स्थलों के निर्माण के लिए भी बहुसंख्यक स्वीकृति या सामाजिक दबाव से जूझना पड़े, तो यह केवल एक स्थानीय विवाद नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों की परीक्षा का विषय बन जाता है। प्रश्न यह भी है कि क्या कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी राज्य की है या फिर धार्मिक स्वतंत्रता का निर्धारण भीड़ और धमकियों के आधार पर होगा?

*सिकुड़ती अल्पसंख्यक आबादी*

बांग्लादेश में हिन्दू समाज की जनसंख्या में पिछले सात दशकों में निरन्तर गिरावट दर्ज की गई है। 1951 में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में हिन्दुओं की आबादी लगभग 22 प्रतिशत थी। 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता के समय यह घटकर लगभग 13.5 प्रतिशत रह गई और वर्तमान जनगणना के अनुसार देश में हिन्दुओं की आबादी लगभग 7.95 प्रतिशत रह गई है।

जनसंख्या में यह गिरावट लम्बे समय से शोधकर्ताओं और मानवाधिकार संगठनों के लिए चिन्ता का विषय रही है। भूमि सम्बंधी विवाद, साम्प्रदायिक हिंसा, असुरक्षा की भावना और पलायन को इसके प्रमुख कारणों में गिना जाता है।

 *बढ़ती सांप्रदायिक घटनाएँ*

यह विवाद कोई अकेली घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में बांग्लादेश में मन्दिरों, मूर्तियों और हिन्दू समाज पर हमलों की अनेक घटनाएँ सामने आई हैं। विभिन्न रिपोर्टों में मन्दिरों में तोड़फोड़, देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के विखण्डन और धार्मिक स्थलों को निशाना बनाए जाने का उल्लेख मिलता है।

अल्पसंख्यक अधिकार संगठनों के अनुसार, हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद देश में साम्प्रदायिक तनाव और अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा की घटनाओं में वृद्धि हुई है। ठाकुरगांव में कई मन्दिरों पर हमले, फरीदपुर में मूर्तियों का विखण्डन और अब गाइबांधा में वैधानिक रूप से निर्मित हो रहे मंदिर परिसर के कार्य पर रोक जैसी घटनाओं ने चिन्ता को और बढ़ाया है।

*तस्लीमा नसरीन की प्रतिक्रिया*

निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने इस घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने प्रश्न उठाया कि जब देश में हजारों मस्जिदें हैं और नए धार्मिक स्थलों के निर्माण पर कोई आपत्ति नहीं होती, तो एक हिन्दू मन्दिर और भगवान राम की प्रतिमा के निर्माण का विरोध क्यों किया जा रहा है?

उन्होंने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता यदि वास्तव में सभी के लिए है, तो उसका लाभ अल्पसंख्यकों को भी समान रूप से मिलना चाहिए। किसी समुदाय की धार्मिक मान्यताओं के कारण दूसरे समुदाय की आस्था और पूजा स्थलों को बाधित करना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।

 *वैश्विक विमर्श और दोहरे मानदंड*

मानवाधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के प्रश्न पर अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएँ सामान्यतः सक्रिय दिखाई देती हैं। किन्तु यथार्थ यह है कि विभिन्न देशों और समुदायों के सन्दर्भ में प्रतिक्रियाओं का स्तर समान नहीं होता। यही कारण है कि बांग्लादेश में हिन्दू अल्पसंख्यकों से जुड़ी घटनाओं पर अपेक्षाकृत सीमित अन्तरराष्ट्रीय चर्चा को लेकर प्रश्न उठाए जा रहे हैं।

यद्यपि यह कहना उचित नहीं होगा कि अन्तरराष्ट्रीय मंच पूरी तरह मौन हैं, लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि जिस प्रकार की व्यापक प्रतिक्रिया अन्य मामलों में देखने को मिलती है, वैसी तीव्रता यहाँ दिखाई नहीं देती। यही स्थिति चयनात्मक मानवाधिकार विमर्श की बहस को जन्म देती है।

*भारत के बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रिया पर प्रश्न*

भारत में भी इस विषय पर अपेक्षित स्तर की व्यापक सार्वजनिक बहस देखने को नहीं मिली। यह भी ध्यान देने योग्य है कि पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों के प्रश्नों पर अपेक्षित स्तर की सार्वजनिक बहस अपेक्षाकृत सीमित दिखाई देती है।

हालाँकि किसी भी विचारधारा या वर्ग के सभी लोगों को एक समान मान लेना उचित नहीं होगा, फिर भी यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यदि मानवाधिकार सार्वभौमिक हैं, तो उनकी रक्षा और समर्थन के मानदण्ड भी सार्वभौमिक होने चाहिए। धार्मिक या वैचारिक पहचान के आधार पर अलग-अलग मापदण्ड अपनाना अन्ततः मानवाधिकारों की विश्वसनीयता को ही कमजोर करता है।

*क्षेत्रीय प्रभाव*

बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरता और अल्पसंख्यकों के विरुद्ध बढ़ती असुरक्षा केवल एक देश का आन्तरिक विषय नहीं है। इसका प्रभाव भारत-बांग्लादेश सम्बंधों, सीमा क्षेत्रों की स्थिरता और दक्षिण एशिया की सामाजिक-सामरिक परिस्थितियों पर भी पड़ सकता है।

यदि अल्पसंख्यकों में असुरक्षा और पलायन की प्रवृत्ति बढ़ती है, तो उसके दूरगामी परिणाम पूरे क्षेत्र को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए यह विषय केवल मानवाधिकारों का नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और सामाजिक समरसता का भी प्रश्न है।

*आगे का रास्ता*

आवश्यक है कि बांग्लादेश सरकार धार्मिक स्थलों और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। साम्प्रदायिक हिंसा और धमकियों के मामलों में कठोर कार्रवाई हो तथा संवैधानिक अधिकारों की प्रभावी रक्षा की जाए।

साथ ही, अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को भी सभी मामलों में समान मानदण्ड अपनाने चाहिए। मानवाधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के प्रश्न पर चयनात्मक दृष्टिकोण अन्ततः इन मूल्यों की सार्वभौमिकता को कमजोर करता है।

पलाशबाड़ी में मन्दिर निर्माण पर लगी रोक केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता, संवैधानिक मूल्यों और राज्य की निष्पक्षता की वास्तविक परीक्षा है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता इस बात से तय होती है कि वह बहुसंख्यक दबाव के बीच अपने अल्पसंख्यकों के अधिकारों की कितनी दृढ़ता से रक्षा करती है।

धार्मिक स्वतंत्रता किसी एक समुदाय का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि एक सार्वभौमिक मानवाधिकार है। यदि किसी भी देश में किसी समाज को भय, दबाव या हिंसा की आशंका के कारण अपनी आस्था और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को सीमित करने के लिए विवश होना पड़े, तो यह केवल पीड़ित समाज का नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिन्ता का विषय है। मानवाधिकारों की विश्वसनीयता भी तभी बनी रह सकती है, जब उनके मानदण्ड व्यक्ति, देश या धर्म देखकर नहीं, बल्कि समान रूप से लागू किए जाएँ।

राम मंदिर चंदा चोरी: आस्था के साथ खिलवाड़ पर अब तक एफआई क्यों नहीं

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अयोध्या (उत्तर प्रदेश): श्री राम मंदिर करोड़ों हिंदू भक्तों की आस्था का केंद्र है। लाखों-करोड़ों लोगों ने अपनी श्रद्धा से दान दिया—किसी ने अपनी कमाई का हिस्सा, किसी ने आभूषण, किसी ने वर्षों की बचत। यह धन रामलला के निर्माण और मंदिर की गरिमा के लिए था, न कि किसी की जेब भरने के लिए। यदि इस चंदे में गबन या अनियमितताओं के आरोप सही साबित होते हैं, तो इसे मात्र प्रशासनिक लापरवाही नहीं माना जा सकता। यह आस्था के साथ सीधा विश्वासघात है। ऐसे में गोपनीय जांच या आंतरिक पूछताछ पर्याप्त नहीं। पूर्ण पारदर्शिता, एफआईआर और सख्त कानूनी कार्रवाई अनिवार्य है।

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने मामले को गोपनीय तरीके से संभालते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से निष्पक्ष जांच की मांग की है लेकिन बिना परदर्शिता के निष्पक्षता अक्सर संदेहास्पद होती है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ट्रस्ट के पत्र पर तुरंत संज्ञान लिया और तीन सदस्यीय विशेष जांच दल (SIT) गठित कर दिया। इस टीम में लखनऊ मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत, आईजी किरण एस और विशेष सचिव वित्त नील रतन शामिल हैं। एसआईटी को प्रारंभिक रिपोर्ट सात दिनों में और अंतिम रिपोर्ट 15 दिनों में सौंपनी है। कुछ कर्मचारियों से पूछताछ हुई है, अचानक बढ़ी संपत्ति और दान पेटियों में गड़बड़ी के संकेत मिले हैं। एक कर्मचारी के घर से गाय के गोबर में छिपाकर रखी लाखों रुपये की नकदी बरामद हुई। ये तथ्य गंभीर हैं, लेकिन ये छोटे कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहने चाहिए।

समस्या यह है कि गोपनीय या उच्च-स्तरीय जांच में अक्सर बड़े नाम सामने नहीं आते। छोटे-मोटे चोर पकड़े जाते हैं, उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाता है और मामला शांत हो जाता है। लेकिन जब बात करोड़ों भक्तों की आस्था की हो, तो यह पर्याप्त नहीं। एफआईआर दर्ज होनी चाहिए ताकि जांच सीआरपीसी के तहत चले, सबूत संरक्षित हों, गवाह सुरक्षित हों और दोषी—चाहे कोई भी हो—पर कानूनी शिकंजा कसे जा सके। एसआईटी अच्छा कदम है, लेकिन इसे पूर्ण स्वायत्तता और समयबद्धता के साथ पारदर्शी बनाना होगा। रिपोर्ट सार्वजनिक होनी चाहिए, ऑडिट रिपोर्ट्स खुली हों और मंदिर के वित्तीय लेन-देन की पूरी जानकारी भक्तों को उपलब्ध हो। सीसीटीवी को लगाते समय वे कौन से लोग थे, जिन्होंने बाधा उत्पन्न की थी। उनके नाम सार्वजनिक होने चाहिए।

उत्तर प्रदेश में यह साल चुनाव का साल है। श्रीराम मंदिर करोड़ों हिन्दुओं की आस्था से सीधा जुड़ने वाला विषय है। गोपनीय जांच के नाम यदि चंदा चोरी मामले को ठंडे बस्ते में डालने का प्रयास किया जाएगा तो इस बार विपक्ष को बैठे बिठाए एक मुद्दा मिलेगा। बिना किसी सहानुभूति के इस पूरे मामले की पारदर्शी और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। एफआईआर हो और बड़े छोटे कैसे भी चोर हों, उनके साथ रियायत नहीं की जाए।

यदि इस चंदा चोरी मामले में चोरों को बड़े—छोटे का भेद किए बिना लटकाने की मिसाल उत्तर प्रदेश की सरकार पेश कर पाती है तो पूरे देश में महाराज जी की जय—जयकार होगी।

राम मंदिर केवल ईंट-गारे का ढांचा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है। यदि यहां चंदा चोरी साबित होने के बाद चोरो पर यूपी स्टाइल में कार्रवाई नहीं हुई तो न केवल विश्वास टूटेगा, बल्कि विरोधी ताकतें इसे हिंदू समाज पर हमला करने का हथियार बनाएंगी। इसलिए न्याय सिर्फ छोटे कर्मचारियों की बर्खास्तगी से नहीं, बल्कि पूरी सच्चाई उजागर करने, दोषियों पर सख्त कार्रवाई और भविष्य में ऐसे गबन को रोकने वाले मजबूत तंत्र से मिलेगा। ट्रस्ट, सरकार और समाज को मिलकर सुनिश्चित करना चाहिए कि रामलला के चरणों में चढ़े एक एक पैसे का हिसाब सार्वजनिक हो और वह पैसा सुरक्षित हाथों में रहे।

आस्था पर कोई समझौता नहीं हो सकता। पारदर्शिता ही सबसे बड़ा बलिदान और सच्ची श्रद्धा है।

एफटीआईआई है या left orientation का प्रचार केंद्र: एक छात्रा का अनुभव

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प्रिया

पुणे : जून 2024 में मैंने पुणे के प्रतिष्ठित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) से फिल्म एप्रिसिएशन कोर्स पूरा किया। कोर्स कोऑर्डिनेटर पंकज सक्सेना थे। कोर्स की अवधि में कई दिग्गज वक्ताओं ने व्याख्यान दिए, जिनमें अरुणा राजे पाटिल जैसी नामचीन हस्तियां भी शामिल थीं। हालांकि, इन सत्रों में वर्तमान सरकार और उसके नैरेटिव की आलोचना बार-बार दबे स्वर में सुनाई दी।

मेरे अनुभव के अनुसार, कोर्स में राष्ट्रवादी दृष्टिकोण वाली किसी भी फिल्म या वक्ता को जगह नहीं दी गई। अधिकांश चयनित फिल्में और वक्ता वामपंथी विचारधारा से गहराई से प्रभावित दिखे। भारतीय संस्कृति, सभ्यता, ऐतिहासिक गौरव और राष्ट्रवादी मूल्यों को दर्शाती फिल्मों पर ना के बराबर चर्चा हुई। उलटे, कुछ फिल्मों को सीधे ‘प्रोपेगेंडा’ का ठप्पा लगाकर खारिज कर दिया गया। ऐसा लगता था जैसे संस्थान का पूरा सिलेबस और चयन प्रक्रिया एक खास विचारधारा को ही बढ़ावा देने के लिए तैयार किया गया हो।

फिल्म अध्ययन जैसा विषय, जो दृश्य माध्यम के माध्यम से समाज, संस्कृति और इतिहास को समझने का माध्यम है, वहां वैचारिक विविधता की अपेक्षा स्वाभाविक रूप से की जाती है। दुर्भाग्यवश, यहां केवल एक तरफा विमर्श ही प्रमुखता से रखा गया। छात्रों को भारतीय सिनेमा की समृद्ध विरासत—चाहे वह स्वतंत्रता संग्राम की फिल्में हों, सांस्कृतिक पुनर्जागरण की कहानियां हों या समकालीन राष्ट्रवादी कथाएं—उनसे परिचित कराने का कोई प्रयास नहीं दिखा।

मेरा दृढ़ मानना है कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान, खासकर सरकारी समर्थन वाले संस्थान में, वैचारिक विविधता अनिवार्य होनी चाहिए। वामपंथी, दक्षिणपंथी, राष्ट्रवादी या उदारवादी—सभी दृष्टिकोणों को समान अवसर मिलना चाहिए। छात्रों को केवल एक विचारधारा का पाठ नहीं, बल्कि बहुआयामी चिंतन सिखाया जाना चाहिए ताकि वे स्वतंत्र रूप से सोच सकें और अपनी समझ विकसित कर सकें।

एफटीआईआई जैसे संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे सच्चे अर्थों में रचनात्मक और बौद्धिक स्वतंत्रता का वातावरण बनाएं, न कि left orientation का प्रचार केंद्र। जब तक वैचारिक संतुलन नहीं होगा, छात्रों का समग्र विकास अधूरा रहेगा। मुझे आशा है कि संस्थान प्रबंधन इस ओर ध्यान देगा और भविष्य के कोर्स में वास्तविक विविधता सुनिश्चित करेगा।

(लेखिका के आग्रह पर नाम परिवर्तित किया गया है)

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