काम और हुनर से युवाओं को मिल रही नई पहचान

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बेतिया । बिहार के एक छोटे से गाँव की धूलभरी गलियों में 19 वर्षीय रामवती कभी “अछूत” कहलाती थी। कुएँ से पानी भरने जाओ तो औरतें पीछे हट जाती थीं। उसकी परछाईं तक मनहूस मानी जाती थी। मगर, ग्रेजुएशन के बाद, अंग्रेजी भाषा सीखकर आज, गुरुग्राम के एक कॉल सेंटर में बैठी वही रामवती अपनी आवाज़ से महाद्वीपों के पार ग्राहकों से बात करती है। यहाँ कोई उसकी जात नहीं पूछता। उसकी क़ीमत उसकी बोलने की रफ़्तार, विनम्रता और काम के प्रति लगन से तय होती है।

मुंबई के किसी और कोने में राजू, जो कभी एक मज़दूर का बेटा था, अब बीएमडब्ल्यू की ड्राइविंग सीट पर है। जिन अफ़सरों को वह रोज़ ऑफ़िस छोड़ने जाता है, वे मुस्कुराकर “गुड मॉर्निंग” कहते हैं — “कौन सी जात हो?” नहीं पूछते।

राजू का चचेरा भाई रमेश, एक बिजली मिस्त्री, सुबह से रात तक टेक पार्क, मॉल और ऊँची रिहायशी सोसाइटियों में काम करता है। वहीं राम, जो एक सोसाइटी का हेल्पिंग स्टाफ है, बुज़ुर्गों को उतरने में मदद करता है, उनके किराने या खाने का सामान उठाता है — अब उसके लिए लोगों के दिलों में सम्मान है, संकोच नहीं।

गाँव के कुएँ से लेकर वर्चुअल दुनिया तक, भारत का तेज़ शहरीकरण, तकनीकी उन्नति और खुलती हुई ग्लोबल अर्थव्यवस्था, सदियों से बनी जातीय दीवारों को चुपचाप गिरा रही है। शहर अपनी अव्यवस्था और अवसरों के साथ एक नए युग का महान समताकारी (Great Equaliser) बन चुका है — जहाँ जात नहीं, योग्यता और परिश्रम पहचान तय करते हैं।

सदियों तक जाति व्यवस्था ने तय किया कि कौन ऊँचा है और कौन नीचा, कौन क्या काम करेगा और कौन नहीं। मगर अब एक धीमी, पर गहरी सामाजिक क्रांति चल रही है — जिसे आगे बढ़ा रहे हैं शहरीकरण और डिजिटल कनेक्टिविटी के दो मज़बूत इंजन। शादी-ब्याह या गाँव के सामाजिक रीति-रिवाजों में जात की दीवारें अब भी कायम हैं, लेकिन शहरों में वे दीवारें दरक चुकी हैं।

अब तरक़्क़ी का रास्ता परिश्रम और हुनर से निकलता है, खानदान और कुलनाम से नहीं। सबसे नज़र आने वाला बदलाव अब सार्वजनिक जीवन में दिख रहा है। देश के मंदिर, जो कभी भेदभाव के गढ़ थे, अब सबके लिए खुले हैं। प्रवेश का टिकट डिजिटल होता है, जातीय नहीं। कार्यालयों, मॉलों और सर्विस सेक्टर ने एक नई समानता रची है — यहाँ अहमियत काम की है, नाम की नहीं।

पुराने सामाजिक बंधन, जो औरतों के कदम रोकते थे, अब टूट रहे हैं। सड़क से लेकर बोर्डरूम तक, महिलाएँ बराबरी से हिस्सेदारी निभा रही हैं। यह बदलाव परंपरागत समाज की नींव से लेकर उसकी मानसिकता तक को चुनौती दे रहा है। इस परिवर्तन को रफ़्तार दी है तकनीक ने।

इंटरनेट और सोशल मीडिया ने चाहतों और सपनों को लोकतांत्रिक बना दिया है। अब कोई भी जानता है कि सफलता विरासत से नहीं, मेहनत से मिलती है। इस नई डिजिटल दुनिया में जात का कोई दाम नहीं।

प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी, जो सामाजिक विश्लेषक हैं, कहते हैं — “शहरों में एक नई आपसी निर्भरता (Interdependency) जन्म ले रही है। अब बिजली मिस्त्री, प्लंबर, डिलीवरी बॉय — सब अहम हैं। वे हर घर में बेझिझक जाते हैं, उनके काम की क़ीमत है, जात की नहीं। आज कोई ऊँची जात का युवा डिलीवरी बॉय से पार्सल लेता है या किसी बाई पर घर की ज़िम्मेदारी छोड़ता है तो उसे उसकी जात की परवाह नहीं रहती। यह बदलाव मामूली दिखता है, पर सामाजिक दृष्टि से गहरा और ऐतिहासिक है।”

नोएडा के आवासीय कॉम्प्लेक्स हों या मुंबई की सोसायटियाँ — हाउस हेल्प, ड्राइवर, टेक्नीशियन, सब एक बड़े महानगरीय ताने-बाने में शामिल हो चुके हैं। अब जाति किसी दरवाज़े के बाहर नहीं खड़ी रहती। सर्विस इकॉनमी ने इस सामाजिक बदलाव को और गति दी है।

कॉल सेंटर्स, बीपीओ, और ऐप-आधारित कामों में व्यक्ति की पहचान उसकी आवाज़, उसकी प्रोफ़ाइल, और रेटिंग से होती है — उपनाम या जात से नहीं। तकनीकी गुमनामी ने जन्म आधारित भेदभाव को धीरे से किनारे कर दिया है, कहती हैं सोशल एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर।

अब वेटर, ड्राइवर, इवेंट मैनेजर, या कैटरर — सब अपनी पेशेवर पहचान से पहचाने जाते हैं। बैंगलोर की एक्टिविस्ट मुक्ता के मुताबिक, ” शहरों में पहनावे और संस्कृति में भी यह बराबरी झलकती है। जीन्स और टी-शर्ट जैसे कपड़े अब नई पीढ़ी की साझा यूनिफ़ॉर्म बन गए हैं। जातीय अंतर कपड़ों और बोलचाल से मिट गए हैं। उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम — महानगर एक पैन-इंडियन समाज की बुनियाद गढ़ रहे हैं। मॉल, मल्टीप्लेक्स, कैफ़े — यह सब नई समानता के प्रतीक हैं, जहाँ कोई जात पूछने की फुर्सत नहीं रखता। रोज़मर्रा की भागदौड़ में, लोग जात भूलकर केवल काम, लक्ष्य और सपनों पर भरोसा करना सीख रहे हैं।”

सच तो यह है कि आधुनिक शहर एक ग़ैर-सियासी क्रांति ला रहे हैं — बिना किसी घोषणा के, बिना किसी नारे के। ज़िंदगी की ज़रूरतें, रोज़ी-रोटी की मजबूरी, और तकनीक की सर्वव्यापकता मिलकर एक नया समाज रच रही हैं — जहाँ इंसान को पहली बार अपने जन्म की बेड़ियों से निकलकर खुद कुछ बनने का सच्चा मौक़ा मिला है।

यह नया भारत है — जहाँ पहचान अब जात से नहीं, काम और काबिलियत से बनती है।

संपूर्ण जीवन राष्ट्रगौरव और सांस्कृतिक मूल्यों के लिये समर्पित

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सरदार वल्लभभाई पटेल भारत की उन विरली विभूतियों में से एक हैं जिन्होंने स्वाधीनता के लिये जितना संघर्ष किया उतना ही संघर्ष भारत को आकार देने केलिये किया। स्वतंत्रता के साथ आरंभ हुये इस संघर्ष का प्रत्येक पल मानों भीषण षड्यंत्र और उत्पात से भरा था। उन परिस्थितियों में यदि किसी ने लोहा लिया तो वे सरदार वल्लभभाई पटेल ही थे। उनकी दूरदर्शिता, रणनीतिक कौशल और संकल्पशीलता से ही भारत का वर्तमान गणतांत्रिक स्वरूप उभर सका। इसीलिए वे “लौहपुरुष” कहलाये। जन सामान्य ने उन्हें “सरदार” कहकर पुकारा और “पुरोधा पुरुष” माना।
कद-काठी, बोली-वाणी या शरीर सौष्ठव से व्यक्ति की पहचान स्थाई नहीं होती। प्रतिदिन लाखों लोग जन्म लेते हैं, और लाखों लोग विदा होते हैं। सभी की स्मृति स्थाई नहीं होती। करोड़ों में से किसी एक छवि स्थाई स्मृति में होती है। स्मृति का यह स्थायित्व ही व्यक्तित्व, कृतित्व विषम परिस्थिति में अडिग रहने नेतृत्व की सफलता का आधार होता है। ऐसे प्रज्ञावान और पुरूषार्थी मनुष्य सैंकड़ो वर्ष बीत जाने के बाद भी जन श्रृद्धा का केन्द्र होते हैं। सरदार वल्लभभाई पटेल ऐसे ही महान व्यक्तित्व के धनी थे। उन्हें संसार से विदा हुये पचहत्तर वर्ष बीत गये लेकिन आज भी उन्हें आत्मीयता से स्मरण किया जाता है, प्रत्येक व्यक्ति श्रृद्धा शीश नवाता है। सरदार वल्लभभाई पटेल संसार के उन विरले महापुरुषों में एक हैं जिनका कोई आलोचक नहीं। वे सही मायने में अजातशत्रु हैं। कोई उन्हें “सरदार” कहता है तो कोई “पुरोधा पुरुष”। बुद्धिमान, दूरदृष्ट, राजनीति में पारंगत, विवेकशील, प्रज्ञावान, सिद्धांत और समाज के प्रति समर्पित, छल-कपट से मुक्त और स्वधर्म के पालन कर्ता को “पुरोधा” कहते हैं। सरदार वल्लभभाई पटेल इन सभी गुणों से युक्त थे। इसीलिए वे “लौह पुरुष” और सरदार कहलाये। उन्हें “सरदार” या “पुरोधा” का संबोधन किसी सरकार ने नहीं दिया था और न किसी अनुयायी ने उन्हें प्रसिद्ध बनाने की योजना से यह विशेषण दिया। ये तो जन सामान्य का स्वर था, जो आज भी उनके लिये गूँजता है। “लौहपुरुष” “सरदार” या “पुरोधा पुरुष” का उच्चारण आते ही सबके मन में वल्लभभाई पटेल की छवि ही उभर आती है। स्वत्व और स्वाभिमान का भाव तो मानों उनकी रग रग में झलकता था। उनका संपूर्ण जीवन मानों समाज, संस्कृति औय राष्ट्र केलिये समर्पित था।
यह उनके व्यक्तित्व की दृढ़ता थी कि अंग्रेजों के अंतिम वायसराय माउंटवेटेन जब भारत विभाजन और सत्ता हस्तांतरण का फार्मूला लेकर भारत आये तब उन्हें केवल सरदार वल्लभभाई पटेल से ही भयभीत रहते थे। ऐसा उन्होंने स्वयं कहा। सरदार वल्लभभाई पटेल के निधन पर अपनी श्रृद्धाँजलि देते हुये माउंटवेटेन ने कहा था- “भारत आने से पहले मुझे चेतावनी दी गई थी कि “मुझे एक बहुत ही ‘कठोर व्यक्ति’ सरदार वल्लभभाई पटेल से मुकाबला करना होगा। माउंटवेटेन ने आगे यह भी लिखा- “जब हम मिले तो मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि वह उतने कठोर नहीं हो सकते, जितना वे दिखाई देते हैं। वह दिखने में बहुत ही कठोर, दृढ़ और अडिग हैं, और मुझे लगता है कि वह ऐसे इसलिए हैं क्योंकि वह नहीं चाहते कि दुनियाँ को पता चले कि उनके कठोर बाहरी आवरण के पीछे कितना गर्मजोशी भरा दिल धड़कता है, और मैं उन्हें यहाँ मिले अपने सबसे अच्छे दोस्तों में से एक मानता हूँ और मुझे दुख है कि वह आज रात हमारे साथ नहीं हो सकते”।

विषम परिस्थिति में सुगम मार्ग निकाले

जिन परिस्थियों में भारत स्वतंत्र हुआ था वह साधारण नहीं थीं। विभाजन की त्रासदी, हिंसक और अराजक तत्वों की हिंसा से चीत्कार करती मानवता, लुटे पिटे शरणार्थियों की सीमा पर आ रही भीड़ और कुछ रियासतों द्वारा स्वतंत्र रहने, अथवा पाकिस्तान का खुला समर्थन करने से उत्पन्न समस्याएँ भी थीं। गृहमंत्री के रूप में इन सब पर नियंत्रण करके भारत के भविष्य की यात्रा आरंभ करने का दायित्व सरदार वल्लभभाई पटेल के कंधों पर था। लेकिन ये साधारण नहीं था। जैसी अकल्पनीय समस्याओं के साथ सत्ता हस्तांतरण हुआ था वैसा ही अकल्पनीय आंतरिक षड्यंत्र भी था। अंग्रेजों और मुस्लिम लीग ने इसके बीच 15 अगस्त 1947 से वर्षों पहले ही बो दिये थे। जिसके कदम कदम पर प्रत्येक भारतवासी के कदमों में चुभ रहे थे। अंग्रेजीकाल में मुस्लिम लीग ने प्रशासन में अपनी गहरी पैठ बना ली थी। यही कारण था कि 16 अगस्त 1946 से मुस्लिम लीग के डायरेक्ट एक्शन से आरंभ हुआ हिन्दुओं पर हमले होने का क्रम कभी रुका नहीं यह भारत विभाजन की घोषणा के साथ और तेज हुआ। सत्ता हस्तांतरण के बाद भी न केवल अंग्रेजीकाल का संपूर्ण प्रशासन तंत्र यथावत रहा अपितु अंग्रेजों का अंतिम वायसराय माउंटवेटेन भी सिर पर बैठा रहा। अंग्रेजों ने पूरा कुचक्र रच कर सत्ता हस्तांतरण किया था। भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान तो पहले दिन से स्वतंत्र था। मोहम्मद अली जिन्ना गवर्नर जनरल बने और उनकी पसंद से लियाकत अली प्रधानमंत्री। लेकिन भारत में ऐसा नहीं था। वायसराय माउंटवेटेन 15 अगस्त 1947 के बाद भी एक वर्ष तक रहा। अंतर इतना ही था पहले उसकी “नेम प्लेट” पर “वायसराय” लिखा था। अब “गवर्नर-जनरल” हो गया। उसके अधिकार में कोई अंतर नहीं आया। हर काम उससे पूछकर करना होता था। इसके अतिरिक्त एक और परिस्थिति थी। पंडित जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री का दायित्व काँग्रेस की प्रांतीय इकाइयों के बहुमत से नहीं, गाँधीजी की पसंद से मिला था। बहुमत तो सरदार वल्लभभाई पटेल के पक्ष में था। गाँधीजी ने इस भावना के विपरीत सरदार वल्लभभाई पटेल को क्यों पीछे किया यह सत्य उनके साथ ही चला गया। सरदार वल्लभभाई पटेल ने गांधीजी की भावना का सम्मान किया और गृहमंत्री का दायित्व स्वीकार करके भारत को एक आदर्श गणतांत्रिक स्वरूप प्रदान करने में जुट गये। उन्होंने बहुत साहस, युक्ति और कुशलता से इन जटिलताओं के निराकरण का मार्ग बनाया। उन्हें एक साथ अनेक मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ा। समस्याओं का समाधान खोजने के साथ प्रशासन के अंग्रेजीतंत्र के अवरोधों का भी सामना करना पड़ा। अनेक विषय तो ऐसे आये कि उन्हें अपने ही प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की असहमति से भी सामना करना पड़ा। असहमति के इन विषयों को भोपाल, जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर जैसी रियासतों के भारतीय गणतंत्र में विलय, सोमनाथ मंदिर जीर्णोद्धार, अयोध्या में रामलला का प्रकटीकरण, भाषा और भारत के साँस्कृतिक स्वरूप जैसे विषय थे। पाकिस्तान और चीन के प्रति सतर्कता पर भी सरदार वल्लभभाई पटेल के विचार अलग थे।

व्यक्तित्व में लौहतत्व सी दृढ़ता बालपन से थी

जो विशाल वटवृक्ष धरती से अंकुरित होकर आकाश की ऊँचाइयों को छूता है उसकी समस्त विशेषताएँ उसके बीज रूप में ही छिपी होतीं हैं। इसी प्रकार महापुरुष भी अपनी विशिष्ट प्रतिभा के साथ संसार में आते हैं और उनके व्यक्तित्व की विशिष्टता का प्रस्फुटन परिवार और कुटुम्ब के वातावरण से आरंभ होती है जो समय के साथ आकार लेता है। सरदार वल्लभभाई पटेल के कुटुम्ब की पृष्टभूमि भी ऐसी ही थी। उनके कुटुम्ब से चार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी निकले। इनमें सरदार वल्लभभाई पटेल और उनके बड़े भाई विट्ठलभाई पटेल भी थे। वे सत्य के पक्षधर थे और असहाय लोगों के समर्थन में सदैव खड़े होते थे। ऐसी एक घटना उनके शालेय जीवन की है। वे नडियाद के स्कूल में पढ़ते थे। उस शाला के एक शिक्षक पुस्तकों का व्यापार करते थे। वे विद्यार्थियों पर उनसे ही पुस्तकें क्रय करने का दबाव बनाते थे। कुछ पुस्तकों का मूल्य बाजार से अधिक भी होता था। वल्लभभाई ने इसके विरोध में छात्रों को एकत्र किया। शिक्षकों से पुस्तकें न खरीदने का अभियान चलाया। शिक्षक ने परिवार को शिकायत भेजी, डराया धमकाया भी। लेकिन न तो वल्लभभाई झुके और न संगठन टूटा। कुछ दिन विद्यालय बंद भी रहा। अंत में स्कूल प्रशासन झुका और शिक्षकों द्वारा पुस्तकें बेचने पर रोक लगी।शालेय जीवन में पुस्तकों की अनुचित बिक्री के विरुद्ध संघर्ष में उनका साहस,निडरता, संघर्ष की रणनीति, संगठन क्षमता, संवाद कौशल, और सत्य पर अडिग रहने के गुण उनके हर आँदोलन और अभियान में रहे। वंदेमातरम उद्घोष के साथ आरंभ शालेय जीवन का यह संघर्ष जीवन की अंतिम श्वाँस तक रहा। उन्होंने सदैव अन्याय के विरुद्ध संघर्ष किया। वे स्वभाषा और स्वपरंपरा के समर्थक रहे। स्थानीय स्तर पर सामाजिक जागरण केलिये उनके द्वारा किये गये कार्यों की एक लंबी सूची है। वकालत पास करके लंदन से लौटे तो उनकी ख्याति पूरे गुजरात में हो गई और खेड़ा सत्याग्रह की सफलता ने उनकी ख्याति देश व्यापी बनाई और बारदोली सत्याग्रह की सफलता के बाद उनकी छवि एक दृढ़ प्रतिज्ञ नेतृत्वकर्ता के रूप में बनी पूरे समाज ने उन्हें “सरदार” कहकर पुकारा।

आँदोलनों में दृढ़ता नेतृत्व की संपूर्णता और “सरदार” का संबोधन

छात्र जीवन में झलकती यही दृढ़ता उनके हर आँदोलन में रही। लंदन से लौटकर उनके नेतृत्व में पहला बड़ा आँदोलन 1918 में हुआ था। यह आँदोलन “खेड़ा संघर्ष” के नाम से जाना जाता है। उन दिनों पूरे क्षेत्र में भयानक सूखा पड़ा। गाँव के गाँव उजड़ गये। भुखमरी से मौते होने लगीं, महामारी भी फैल गई लेकिन सरकारी वसूली न रुकी। वसूली कर्ता घर मकान जेवर छीनने लगे। वल्लभभाई पटेल ने आवाज उठाई। वे वकालत छोड़कर पीड़ितों की सहायता के आगे आये। जब बातचीत से बात न बनी तो आँदोलन आरंभ हुआ। इसका नेतृत्व वल्लभभाई पटेल ने किया। यह आँदोलन तीन स्तर पर चला। एक ओर अहिसंक तरीके से वसूली कर्ताओं को रोकना, दूसरा जन सामान्य को ढाँढस बँधाकर उन्हें एकजुट रखना और तीसरा अंग्रेज अधिकारियों से बातचीत। वल्लभभाई पटेल ने अंग्रेज सरकार से वसूली रोकने और राहत कार्य आरंभ करने की माँग की और यह आश्वासन भी दिया कि स्थिति सुधरते ही किसान राजस्व चुकाने लगेंगे लेकिन सरकार नहीं मानी। उनकी मांग अस्वीकार कर दी गई। तब वल्लभभाई पटेल ने किसानों, व्यापारियों और स्थानीय लोक शिल्पकार तीनों को संगठित करके आँदोलन तेज किया। गाँव गाँव में प्रभात फेरियाँ निकलने लगीं, धरना, प्रदर्शन और कीर्तन आरंभ हुई। अंग्रेज सरकार ने हर पेंतरा अपनाया। कुछ लोगों को प्रलोभन देकर आँदोलन में फूट डालकर तोड़ने का प्रयास किया। लेकिन सफलता नहीं मिली। बल प्रयोग और गिरफ्तारियाँ भी हुईं पर आँदोलन कम न हुआ। अंत में सरकार को झुकना पड़ा और वसूली में राहत दी गयी। इस आँदोलन का नेतृत्व करने और सफलता के बाद स्थानीय जन मानस में वे “सरदार” के नाम से प्रसिद्ध हो गये। उन दिनों नायक को “सरदार” कहा जाता था । बाद में गाँधीजी ने भी उन्हें सरदार कहकर संबोधित किया और वे जन सामान्य में स्थाई रूप से “सरदार” की उपाधि से विभूषित हो गये। अहिसंक आँदोलन केलिये गाँधीजी के बाद उनकी ख्याति पूरे देश में हुई । और उनकी गणना काँग्रेस के अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं में होने लगी। असहयोग आँदोलन सहित काँग्रेस के विभिन्न आँदोलनों और सक्रियता के साथ उन्होंने दूसरा बड़ा आँदोलन 1928 में किया। इतिहास में यह आँदोलन बारडोली सत्याग्रह के नाम से प्रसिद्ध है। उनके नेतृत्व में यह भी एक बड़ा किसान आंदोलन था। अंग्रेज सरकार ने लगान में भारी वृद्धि करके सख्ती के साथ वसूली आरंभ कर दी थी। वल्लभभाई पटेल ने किसानों को संगठित किया और आँदोलन आरंभ कर दिया। सरकार ने पहले इस आंदोलन को भी दबाना चाहा। सरकार जितना दबाव बनाती, आँदोलन उतना तीव्र होता। इसकी प्रतिक्रिया गुजरात के बाहर भी होने लगी। इस बार भी सरकार झुकी और लगान वृद्धि वापस हुई। निरंतर संघर्ष और अपनी क्षमता से उनकी गणना काँग्रेस के सर्वाधिक लोकप्रिय नेताओं में होने लगी।

रियासतों के विलीनीकरण में अद्भुत रणनीतिक कौशल

सरदार वल्लभभाई पटेल की महत्वपूर्ण भूमिका 562 रियासतों के भारतीय संघ में विलीनीकरण में रही। यह उनकी रणनीति, दृढता और दूरदर्शिता ही थी जिससे सभी रियासतों का भारतीय संघ में विलीनीकरण हो सका। जिससे वर्तमान भारत का राजनीतिक और भौगोलिक स्वरूप सुनिश्चित हो सका। अंग्रेजी सत्ता से भारत की मुक्ति केलिये कुछ तिथियाँ महत्वपूर्ण हैं। पहली तिथि सितंबर 1945 है। इस तिथि पर ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने इंग्लैंड में भारत विभाजन और सत्ता हस्तांतरण का संकेत दिया था। दूसरी तिथि मार्च 1946 है। तब लंदन से एक केबिनेट मिशन भारत आया। इस मिशन ने भारत आकर मुस्लिम लीग, काँग्रेस और राजाओं से बातचीत करके भारत विभाजन एवं सत्ता हस्तांतरण का फार्मूला तय किया और तीसरी तिथि 3 जून 1947 है। इस तिथि को माउंटवेटेन भारत विभाजन और सत्ता हस्तांतरण फार्मूला लेकर भारत आया और इसके साथ ही विधिवत घोषणा हुई। मुस्लिम लीग को अंग्रेजों के फार्मूले का पहले से अनुमान था। मुस्लिम लीग दो विन्दुओं पर 1945 से ही काम कर रही थी। एक मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों से हिन्दुओं से संपत्ति छीनकर भगाना और दूसरे विभिन्न रियासतों से संपर्क करके पाकिस्तान से जोड़ने का। लीग का यह भी प्रयास था कि अधिकतम रियासतें पाकिस्तान का अंग बने। यदि वे किसी कारण से पाकिस्तान का अंग नहीं बन स्वतंत्र रहें। लीग की इस कूटनीति का सामना करने केलिये सरदार वल्लभभाई पटेल सबसे पहले सक्रिय हुये। केबिनेट मिशन की यात्रा के बाद विभाजन की सीमाएँ लगभग सुनिश्चित हो गई थीं। जिन्ना की ओर से जैसलमेर से लेकर त्रावणकोर तक सीमा प्राँत के शासकों को अपनी ओर मिलाने के प्रलोभन दिये जा रहे थे। इनमें भोपाल, हैदराबाद और जूनागढ़ जैसी मुस्लिम शासकों की रियासतें भी थीं। सरदार वल्लभभाई पटेल ने 15 अगस्त 1947 से पहले इन सभी रियासतों से संपर्क कर लिया था। 15 अगस्त 1947 के बाद तो हैदराबाद एवं जूनागढ़ रियासत में सेना का भी उपयोग किया। जबकि माउंटवेटेन और नेहरुजी सेना के उपयोग के पक्ष में नहीं थे। कश्मीर के भारत में विलय केलिये जो युक्ति उन्होंने निकाली वह अद्भुत थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक गोलवलकर जी को श्रीनगर भेजा महाराजा तैयार हुये और कश्मीर का भारत में विलय हुआ।
वे स्वतंत्र भारत के पहले उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री बने। शरणार्थियों के पुनर्वास, हिंसा को शांत करने में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी। उन्होंने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के खुले विरोध के बावजूद सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। जब 75 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ तब भारत भर में उनका कोई अपना निजी मकान न था । उनका परिवार अहमदाबाद में एक किराये के मकान में रहता था और बैंक खाते में भी केवल 260 रुपये थे । उन्होंने अपने जीवन में अपने परिवार के किसी सदस्य को राजनीति में आगे न बढ़ाया। उनके निधन के बाद गुजरात काँग्रेस के आग्रह पर उनकी बेटी को लोकसभा चुनाव लड़ाया गया ।

संक्षिप्त जीवन परिचय

सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में हुआ। उनके पिता झाबेरभाई खेड़ा जिले के कारमसद में रहने वाले थे और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय थे। माता लाडबा पटेल धार्मिक स्वभाव की घरेलू महिला थीं। वल्लभभाई कुल सात भाई बहन थे। उनसे बड़े विट्टल भाई पटेल भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। 1991 में उनका विवाह हुआ। कुछ कारणों से पढ़ाई में बाधा आई 1997 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की तब उनकी आयु बाइस वर्ष थी। 1907 में पत्नि झबेरवाॅ का निधन हुआ। 1910 में वकालत पढ़ने लंदन गये। जहाँ उन्होंने प्रथम श्रेणी में वकालत पास की। 1913 में भारत लौटे और अहमदाबाद में वकालत प्रारंभ की। 1915 में वे गुजरात सभा से जुड़े और यहीं से उनका सार्वजनिक एवं राजनैतिक जीवन प्रारंभ हुआ। 1917 अहमदाबाद नगर पालिका के लिये चुने गये। इसी वर्ष वे काँग्रेस की गतिविधियों में सक्रिय हुये। 1918 में उन्होंने खेड़ा सत्याग्रह में भाग लिया। 1920 में गुजरात प्रदेश काँग्रेस के अध्यक्ष बने। उनके नेतृत्व में ही काँग्रेस ने अहमदाबाद नगर पालिका का चुनाव लड़ा और भारी बहुमत से सफलता मिली। 1921 में असहयोग आँदोलन में भाग लिया। 1923 में नागपुर में झंडा सत्याग्रह और बोरसाद सत्याग्रह में भाग लिया। 1924 में अहमदाबाद नगर पालिका के अध्यक्ष बने। 1927 में गुजरात में बाढ़ आई तब उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर सहायता समूह बनाकर धन संग्रह किया और पीडितों की सहायता की। 1928 में नगर पालिका से त्यागपत्र देकर बारदौली सत्याग्रह का नेतृत्व किया। 1931 के कराँची अधिवेशन में वे काँग्रेस के अध्यक्ष चुने गये। 1942 के भारत छोड़ो आँदोलन में भाग लिया और गिरफ्तार हुया। वे कुल छै बार गिरफ्तार हुये और अलग-अलग अवधियों में लगभग सोलह माह जेल में रहे। 1946 में संविधान सभा के सदस्य बने। 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत के पहले गृहमंत्री बने और 15 दिसम्बर 1950 को हृदयाघात से उनका निधन हुआ।1991 में मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया। उनका जन्म दिन 31 अक्टूबर भारत में राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया जाता है।

भारतीय ज्ञान परंपरा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

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धीप्रज्ञ द्विवेदी

दिल्ली । भारतीय ज्ञान परंपरा भारत की प्राचीन ज्ञान और शिक्षा की एक विविध प्रणाली है, जिसमें विज्ञान, कला, दर्शन, गणित, खगोलशास्त्र, चिकित्सा और व्याकरण जैसे कई क्षेत्र शामिल हैं।यह वेदों, उपनिषदों और पुराणों से प्रारम्भ होकर संतों और विभिन्न शास्त्रों के माध्यम से विकसित हुई है। यह भारत की हजारों वर्षों में विकसित हुयी बहुआयामी बौद्धिक विरासत है। इस परंपरा का विकास वेद, उपनिषद, पुराण, धर्मशास्त्र तथा संत साहित्य के माध्यम से हुआ, और इसका उद्देश्य केवल बौद्धिक उन्नयन ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आत्मिक जागरण रहा है। हम कह सकते हैं कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल शिक्षा की प्रणाली नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन पर आधारित एक व्यापक ज्ञान-संहिता है। इसकी जड़ें वेद, उपनिषद, दर्शन, आयुर्वेद, खगोल विज्ञान, गणित, नाट्यशास्त्र, और कला-विज्ञान तक फैली हैं। यह परंपरा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसे सार्वभौमिक सिद्धांतों पर आधारित है। इसका लक्ष्य ज्ञान को केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि आत्मबोध, सामाजिक समरसता, और विश्वकल्याण का माध्यम बनाना है। इस प्राचीन सांस्कृतिक और बौद्धिक धरोहर का संरक्षण और पुनर्जीवन आवश्यक है। समकालीन समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं उसके साथ जुडेंशिक्षा संगठनों ने इस परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए संगठित प्रयास किए हैं, और इन प्रयासों के परिणाम भारत सरकार की नई शिक्षा नीति में भी परिलक्षित हो रही हैं। आज से कुछ वर्ष पहले तक अकादमिया में भारतीय ज्ञान परम्परा पर चर्चा होना एक प्रकार से असम्भव था और इसे पिछडेपन का प्रतीक माना जाता था। यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवम अन्य समान विचार वाले संगठनों के लगातार समंवित प्रयासों से सम्भव हो पाया है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण और योगदान

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ) भारतीय संस्कृति और मूल्यों के पुनरुद्धार का एक वैचारिक आंदोलन है। संघ का मूल उद्देश्य है— राष्ट्र जीवन का पुनर्निर्माण भारतीय मूल्यों की नींव पर। अतः भारतीय ज्ञान परंपरा इसके वैचारिक केंद्र में है।

वैचारिक दृष्टिकोण: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल रोज़गार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र निर्माण और सांस्कृतिक चेतना का जागरण है। इसके लिए “स्व” यानी आत्मनिर्भर भारत और पंचमुखी विकास—शारीरिक, बौद्धिक, सामाजिक, आत्मिक, चारित्रिक—की संकल्पना पर बल दिया जाता है।​

इसके लिये विविध शैक्षिक संस्थाएँ स्थापित की गयी और पाठ्यक्रम निर्धारित किये गये। ‘विद्या भारती’, ‘भारतीय शिक्षण मंडल’ आदि की स्थापना कर भारतीय परंपराओं को पाठ्यक्रमों में शामिल किया गया है। इन पाठ्यक्रमों में योग, आयुर्वेद, भारतीय गणित, भारतीय विज्ञान, सांस्कृतिक मूल्यों, और लोक साहित्य को स्थान दिया गया।​

नई शिक्षा नीति (NEP 2020): नीति निर्माताओं पर प्रभाव डालकर भारतीय ज्ञान प्रणाली (Indian Knowledge System, IKS) की साझेदारी को बढ़ाया गया है। अब शोध, प्रशिक्षण, और पाठ्यक्रम में भारतीय दृष्टिकोण प्रमुख हो रहा है।​

सांस्कृतिक पुनरुद्धार: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्थानीय भाषाओं, परंपराओं, धार्मिक अनुष्ठानों, और सामुदायिक संगठनों के माध्यम से सांस्कृतिक एकता व राष्ट्रीय गौरव का प्रचार कर रहा है। इसके अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सेवा भारती इंटरनेशनल तथा ‘अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद्’ जैसी संस्थाओं के माध्यम से यह कार्य किया जा रहा है।

पंचमुखी विकास की अवधारणा एवं “स्व” बोध: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शैक्षिक दृष्टिकोण का विस्तार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ) के शिक्षा-विंग, विशेषकर विद्या भारती, भारतीय ज्ञान परंपरा के संदर्भ में ‘पंचमुखी विकास’ की अवधारणा को प्रमुखता देता है। यह मॉडल संपूर्ण व्यक्ति-विकास का लक्ष्य रखता है, जो पश्चिमी/आधुनिक शिक्षा के केवल उपयोगितावादी दृष्टिकोण से अलग है।​

पंचमुखी विकास की संकल्पना

‘पंचमुखी विकास’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा स्वीकृत एक समग्र शैक्षिक दृष्टिकोण जो अपने मूल स्वरूप में भारतीय ज्ञान परम्परा से ही मिली है, जिसमें पाँच प्रमुख आयाम शामिल हैं:

शारीरिक विकास: स्वास्थ्य, शक्ति और अनुशासन का निर्माण। योग, प्राणायाम तथा पारंपरिक आर्य व्यायाम इसका आधार हैं। विद्यार्थी में ऊर्जा, संयम और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता लाने पर बल।​

बौद्धिक विकास: आलोचनात्मक सोच और रचनात्मकता का विकास—परंतु भारतीय सांस्कृतिक नींव पर आधारित। ‘ज्ञान का स्वदेशीकरण’ यानी विचारों में आत्मनिर्भरता और संस्कृति-सम्मिलन।​

सामाजिक विकास: समाज के प्रति जिम्मेदारी, सेवा-भाव और सामुदायिक एकता। ‘सेवा’ जैसे कार्यक्रम छात्रों में समाजोत्थान, सहयोग व सामाजिक समरसता के भाव उत्पन्न करते हैं।​

आत्मिक विकास: आंतरिक शांति, नैतिकता और अपने वास्तविक स्वरूप की अनुभूति। यह स्व-बोध और चरित्र निर्माण का आधार है—राष्ट्रीय, धार्मिक और मानवीय मूल्यों के साथ।​

चारित्रिक विकास: सत्यनिष्ठा, साहस, ईमानदारी, जिम्मेदारी और दृढ़ता जैसे गुणों का निर्माण—यही शिक्षा का परम लक्ष्य माना जाता है। विद्यार्थी में सतत नैतिकता और नेतृत्व क्षमता विकसित करना।​

केस स्टडी: विद्या विकास परियोजना

विद्या विकास परियोजना उत्तर कर्नाटक के पिछड़े क्षेत्रों में शिक्षा एवं संस्कृति से वंचित बच्चों के लिए सेवा भारती ट्रस्ट द्वारा संचालित किया गया है।​

इसमें बच्चों को विद्यालय योग्य बनाना, उनकी पढ़ाई के साथ स्वच्छता एवं स्वास्थ्य का प्रशिक्षण दिया जाता है, नैतिक और आध्यात्मिक शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों का चारित्रिक निर्माण।

यह परियोजना न केवल शैक्षिक विकास पर बल देती है बल्कि उनकी छिपी प्रतिभाओं और कौशलों की पहचान कर उन्हें निखारने का काम भी करती है साथ ही ड्रॉपआउट कम करना और समुदाय के साथ जुड़ाव कायम करने की भी गतिविधियां चलाती है। इसके अतिरिक्त शिक्षकों के प्रशिक्षण और महिला सशक्तिकरण पर भी बल दिया जाता है।

परिणाम:

सैकड़ों केंद्रों में बच्चों की शिक्षा, प्रतिभा-निखार और समाजसेवा के कार्य सफल रहे।

अनेक छात्र CBSE व राज्य बोर्ड परीक्षाओं में अव्वल आए, और UPSC जैसी प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में भी सफल हुए।

विद्या भारती के पूर्व छात्र समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सेवा कर रहे हैं।​

यह केस स्टडी पंचमुखी विकास के हर पक्ष जैसे शारीरिक (स्वास्थ्य/व्यायाम), बौद्धिक (ज्ञान-संकलन), सामाजिक (सेवा/समुदाय), आत्मिक (नैतिकता/ध्यान) और चारित्रिक (नेतृत्व/ईमानदारी) के समग्र विकास को रेखांकित करती है।

“स्व” बोध: आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक जड़ें

पंचमुखी विकास के केंद्र में ‘स्व’ (Self) या ‘आत्म’ का बोध है।

“स्व” का तात्पर्य: एक ऐसी शिक्षा प्रणाली का निर्माण, जो बौद्धिक रूप से स्वतंत्र, विचारों में आत्मनिर्भर, और सांस्कृतिक रूप से अपनी जड़ों से जुड़ी हो। परिणामत: विद्यार्थियों में आत्मबोध, आत्मविश्वास और देश के प्रति जिम्मेदारी का भाव विकसित होता है, जिससे वे “आत्मनिर्भर भारत” के रचनाकार बनें।​

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ‘पंच परिवर्तन’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से स्वदेशी सोच, समाज लाभ, पर्यावरण सरंक्षण, कुटुंब प्रबोधन और नागरिक कर्तव्य को आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की दिशा में प्राथमिकता दी है।​​

शैक्षिक दृष्टिकोण और वर्तमान महत्व

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पश्चिमी शिक्षा प्रणाली को एक ऐसी प्रणाली के रूप में देखता है जो मनुष्य को मानव नहीं बल्कि भावना शुन्य मशीन बना देती है, क्योंकि वह व्यक्ति को केवल उपार्जन और उपयोगिता तक सीमित करती है; जबकि पंचमुखी विकास का उद्देश्य संपूर्ण मानवाधिकार, चरित्र, और समाजोत्थान है।​

विद्या भारती एवं अन्य शिक्षा-संगठनों में इस मॉडल का पाठ्यक्रमों, दैनिक गतिविधियों और सामाजिक सेवा में स्पष्ट प्रयोग है। विद्यार्थियों में यह दृष्टिकोण सामर्थ्य, संस्कृति-संबद्धता, एवं समाज-सेवा के भाव पैदा करता है। चरित्र, सेवा, और आत्मनिर्भरता आधुनिक भारत की पहचान बनती है।​

पंचपदी शिक्षण पद्धति

विद्या भारती के विद्यालयों में पंचपदी शिक्षण पद्धति को अपनाया गया है, जो भारतीय मनोविज्ञान और मनुष्य के भीतर स्थित ज्ञान को जाग्रत करने वाली प्रक्रिया है.​​ यह प्रणाली पूर्ण रूप से भारतीय ज्ञान परमपरा पर आधारित है।

पंचपदी पद्धति के पाँच चरण:

अधीति (Adhiti): विषय का अधिग्रहण—सुनना, देखना, पढ़ना, अनुभव करना।

बोध (Bodh): विषय की गहराईयों को समझना, आत्मसात करना, विश्लेषण और संश्लेषण करना।

अभ्यास (Abhyas): सीखी गई बातें बार-बार दोहराकर अपने व्यवहार में लाना।

प्रयोग (Prayog): सीख को जीवन में या समस्या के समाधान में व्यावहारिक प्रयोग करना।

प्रसार (Prasar): अर्जित ज्ञान का विस्तार करना, समाज में साझा करना, दूसरों को प्रेरित करना।

यह विधि ज्ञानार्जन को केवल सूचना स्मृति तक सीमित नहीं रखती, बल्कि व्यवहार, तर्क, अनुभव और समाज तक ले जाती है—जिससे शिक्षा जीवन का अभिन्न अंग बनती है।​​

अत: हम कह सकते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारतीय ज्ञान परम्परा के पुनरूथान के लिये प्रतिबद्ध है।

(लेखक पर्यावरण विज्ञान में स्नात्कोत्तर हैं, प्रतियोगिता परीक्षाओं के लिये पर्यावरण विज्ञान पढाते हैं और विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में पर्यावरण और स्वास्थ्य सम्बंधी आलेख प्रकाशित होते रहे हैं। लेखक शोध पत्रिका “सभ्यता सम्वाद के कार्यकारी सम्पादक हैं, तथा स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था स्वस्थ भारत के संस्थापक न्यासी हैं।)

राष्ट्रीय एकता के प्रतीक – लौहपुरुष सरदार पटेल

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अहमदाबाद । स्वतंत्रता के पश्चात भारत की राष्ट्रीय एकता के प्रतीक एक प्रखर देशभक्त जो ब्रिटिश राज के अंत के बाद 562 रियासतों को जोड़ने के लिए प्रतिबद्ध थे तथा एक महान प्रशासक जिन्होंने विभाजन कि विभीषिका से बिलखते और जलते भारत को स्थिर करने में महतवपूर्ण भूमिका निभायी ऐसे महान लौहपुरुष सरदार पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को ग्राम करमसद में हुआ था। इनके पिता झबेरभाई पटेल थे जिन्होंने 1857 में रानी झांसी के समर्थन में युद्ध किया था। इनकी मां का नाम लाडोबाई था।

वल्लभ भाई की प्रारम्भिक शिक्षा गांव के ही एक ऐसे विद्यालय में हुई जो कक्षा चार तक ही था। आगे की शिक्षा के लिए पटेल जिस विद्यालय में गए वह उनके मूल गांव से छह से सात किलोमीटर की दूरी पर था। वल्लभ भाई की हाईविद्यालय की शिक्षा उनके ननिहाल में हुई। उनके जीवन का वास्तविक विकास ननिहाल से ही प्रारम्भ हुआ था। उनमें बचपन से ही कुशल नेतृत्वकर्ता के गुण दिखाई देते थे । वे पढ़ने में तो तेज थे ही, गीत- संगीत व खेलकूद में भी आगे थे। उनमें एक ऐसा सम्मोहन था कि वे अपने साथियों के बीच विद्यालय के दिनों में ही लोकप्रिय हो गये थे तथा उनका नेतृत्व करने लग गये थे। वल्लभभाई की उच्च शिक्षा बहुत ही कष्टों के साथ इंग्लैंड में जाकर पूरी हुई जहाँ से उन्होंने बैरिस्टरी की परीक्षा उत्तीर्ण की।

पटेल कुशाग्रबुद्धि के थे तथा उनमें सीखने की अद्भुत क्षमता थी। बचपन में एक बार वे विद्यालय से आते समय पीछे छूट गये। कुछ साथियों ने जाकर देखा तो ये धरती पर गड़े एक नुकीले पत्थर को उखाड़ रहे थे। पूछने पर बोले,” इसने मुझे चोट पहुंचायी है अब मैं इसे उखाड़कर ही मानूंगा” और वे उस पत्थर को उखाड़ करके ही घर आये। एक बार उनकी बगल में फोड़ा निकल आया। उन दिनों गांवो में इसके लिए लोहे की सलाख को लालकर उससे फोड़े को दाग दिया जाता था। नाई ने सलाख को भट्ठी में रखकर गरम तो कर लिया पर वल्लभ भाई जैसे छोटे बालक को दागने की हिम्मत नहीं पड़ी। इस पर वल्लभ भाई ने सलाख अपने हाथ में लेकर उसे फोड़े में घुसा दिया आसपास बैठे लोग चीख पड़े लेकिन उनके मुंह से उफ तक नहीं निकला।

1926 में उनकी भेंट गांधी जी से हुई और वे स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़े और स्वदेशी जीवन शैली में आ गये। बारडोली में किसान आंदोलन का सफल नेतृत्व करने के कारण उनका नाम सरदार पड़ा। सरदार पटेल स्पष्ट व निर्भीक वक्ता थे। यदि वे कभी गांधी जी से असहमत होते तो वे उसे भी साफ कह देते थे। वे कई बार जेल गये। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें तीन साल की कैद हुई।

स्वतंत्रता के बाद उन्हें नेहरू मंत्रि परिषद में गृहमंत्री बनाया गया। सरदार पटेल ने चार वर्ष तक गृहमंत्री के पद पर कार्य किया। यह चार वर्ष न केवल उनके वरन स्वाधीन भारत के भी ऐतिहसिक वर्ष हैं। उन्होने 542 रियासतों का विलय करवाया जिसमें सबसे कठिन विलय जूनागढ़ और हैदराबाद का रहा। सरदार की प्रेरणा से ही जूनागढ़ में विद्रोह हुआ और वह भारत में मिल गया।हैदराबाद में बड़ी पुलिस कार्यवाही करनी पड़ी। जम्मू कशमीर का मामला नेहरू जी ने अपने पास रख लिया जिसका आंशिक समाधान नरेन्द्र मोदी जी ने धारा 370 की समाप्ति के रूप में कर दिया है जबकि पाकिस्तानी कब्जे वाला कश्मीरवापस लेना अभी शेष है। सरदार पटेल ने गृहमंत्री रहते हुए रेडियो एवं सूचना विभाग का कायाकल्प किया।

सरदार पटेल स्वभाव से बहुत कठोर भी थे तो बहुत ही सहज और उदार भी। समय के अनुसार निर्णय लेने में वे समर्थ तथा सक्षम थे। वे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को उचित परामर्श देने में भी नहीं हिचकते थे। जब चीन तिब्बत पर अपना अधिकार जता रहा था और नेहरू ने चीन की विस्तारवादी नीति का विरोध नहीं किया था जिसके ही तिब्बत पर चीन नियंत्रण हो गया था तब सरदार पटेल ने चीन के प्रति सर्वाधिक संदेह प्रकट करते हुए कहा था कि यदि चीन तिब्बत पर अधिकार कर लेता है तो यह भविष्य में भारत की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा होगा। कालांतर में दूरदर्शी पटेल की चिंता सच सिद्ध हुई । मंत्री के रूप में भी वे हर व्यक्ति से मिलते थे और उसकी समस्या का समाधान खोजते थे।

इस वर्ष सरदार पटेल की जयंती के 150 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। इस अवसर पर कई भव्य ओयाजन किए जा रहे हैं। हम सभी को सरदार पटेल कि स्मृति में होने वाले कार्यक्रमों का हिस्सा बनकर उनका पुण्य स्मरण करते हुए, उनके बताए गए पथ पर चलने की प्रेरणा लेनी चाहिए।

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