क्राँतिकारी नानक भील का बलिदान : किसानों के शोषण के विरुद्ध आँदोलन चलाया

images-4.jpeg

बूँदी (राजस्थान) : स्वतंत्रता के बाद भी अँग्रेजों के बाँटो और राज करो षड्यंत्र के अंतर्गत सोचने वाले वालों के लिये बलिदानी नानक भील एक बड़ा उदाहरण है । बलिदानी नानक भील वनवासी थे लेकिन उन्होंने एक सशक्त किसान आँदोलन चलाया ।

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान खाली हुआ अपना खजाना भरने केलिये अंग्रेजों ने भारत में बलपूर्वक बसूली शुरु करदी। इससे सर्वाधिक प्रभावित किसान हुये । अंग्रेजों द्वारा नियुक्त सैनिकों ने गांव गांव जाकर बसूली केलिये किसानों को प्रताड़ित करना आरंभ कर दिया । देश भर में इसका विरोध शुरु हुआ । राजस्थान के बूँदी जिले में आरंभ हुये किसान के विरोध आँदोलन में क्राँतिकारी नानक भील की भूमिका महत्वपूर्ण थी । क्राँतिकारी नानक भील का जन्म राजस्थान के बूँदी जिला अंतर्गत बराड़ क्षेत्र के गाँव धनेश्वर में हुआ था । उनके जन्म की तिथि और जीवन का विवरण कहीं नहीं मिलता । अंग्रेजों के पुलिस रिकार्ड में नाम, आयु, पिता का नाम और गाँव का नाम मिलता है । स्थानीय लेखकों ने लोक जीवन की चर्चाओं के आधार पर जीवनी तैयार की है । इनका जन्म की तिथि का विवरण भी नहीं है । अंग्रेजों के पुलिस रिकार्ड में दर्ज आयु के अनुसार जन्म वर्ष 1890 माना गया है । इनके पिता पिता का नाम भेरू भील था वे जंगल से वनोपज लाकर धनेश्वर गांव में बेचते थे । समय के साथ पिता ने गांव भी एक कच्चा घर बना लिया था । नानक भील का जन्म इसी गाँव में हुआ था । वे बचपन से बहुत निडर और साहसी थे । उनके मित्रों वनवासी युवाओं की एक अच्छी टोली थी ।

साथ ही गांव में रहने वाले युवाओं का भी अच्छा समूह बन गया था । समय के साथ उन्होंने भी वन से वनोपज लाकर अन्य गाँवों में बेचना आरंभ कर दिया इससे उनका संपर्क आसपास के गाँवों में भी बन गया । उन्ही दिनों क्षेत्र के समाजसेवी गोविंद गुरु और मोतीलाल तेजावत ने अंग्रेजों के बलपूर्वक बसूली अभियान के विरुद्ध आँदोलन आरंभ किया । इसके लिये उन्होंने नानक भील को जोड़ा। नानक भील इस आंदोलन से जुड़ गये और अपनी युवा टोली के साथ पूरे क्षेत्र में झंडा गीतों के माध्यम से अंग्रेजों का विरुद्ध जन जागरण अभियान चलाने लगे । वे गीत भी अच्छा गाते थे और हाट बाजार में लोगों को एकत्र करके अंग्रेजों के षड्यंत्र से अवगत कराते । वे हाट बाजार के साथ गाँवों में किसानों की सभाएँ भी करते थे । ऐसी ही एक सभा 13 जून 1923 को डाबी में आयोजित की गई थी वहीं पर अचानक से अंग्रेज पुलिस पहुँची और घेर लिया । तब नानक भील सभा को संबोधित कर रहे थे । पुलिस को देखकर सभा में भगदड़ मच गई लेकिन नानक भील बिल्कुल विचलित न हुये । और झंडा लहराते हुए झंडा गीत गाने लगे । इससे क्रोधित अंग्रेज कमांडर क्रोधित हुआ उसने नानक भील को गोली मारने का आदेश दे दिया । एक सिपाही ने नानक भील के सीने पर गोली मारदी । नानक भील भूमि पर गिरे और बलिदान हो गये । लेकिन उनका बलिदान व्यर्थ न गया । पूरे वनक्षेत्र में उनके बलिदान की प्रतिक्रिया हुई और आँदोलन ने जोर पकड़ लिया । अंत में अंग्रेजों की शासन ने बसूली की कुछ व्यवस्था में परिवर्तन किया तथा उन किसानों सख्ती कम करदी जिनकी फसल खराब हो गई थी । इससे किसानों और जन सामान्य को कुछ राहत मिली ।

नानक भील ने जितने क्षेत्र में सभाएँ करके जन जागरण किया उस क्षेत्र में अब बराड़ क्षेत्र के तेरह ग्राम पंचायत क्षेत्र आते हैं । क्राँतिकारी नानक भील ने इस पूरे क्षेत्र में वनवासियों और किसानों को जाग्रत किया था । स्वतंत्रता के बाद धनेश्वर और बराड़ में अमर शहीद नानक भील की स्मृति में प्रतिमा स्थापित की गई और बराड़ में बार्षिक मेले का आयोजन भी आरंभ हो गया है ।

लोक संस्कृति के सच्चे संरक्षक: अनूप रंजन पांडेय

1-7.jpeg

रायपुर। वरिष्ठ रंगकर्मी, लोककलाकार एवं बस्तर बैंड के संस्थापक अनूप रंजन पांडेय जी को वर्ष 2025 का प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्रदान किए जाने की घोषणा हुई है। यह सम्मान न केवल उनके व्यक्तिगत कलात्मक सफर की मील का पत्थर है, बल्कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक परंपराओं और जनजातीय संस्कृति के संरक्षण में उनके अथक प्रयासों की राष्ट्रीय स्वीकृति भी है। अनूप रंजन पांडेय जी छत्तीसगढ़ी लोक रंगमंच और लोक संगीत के ऐसे साधक हैं, जिन्होंने अपनी कला के माध्यम से ग्रामीण भारत की आवाज को विश्व पटल पर पहुंचाया है।

21 जुलाई 1965 को बिलासपुर जिले के एक साधारण किसान परिवार में जन्मे अनूप रंजन पांडेय को कला और संस्कृति का संस्कार माता-पिता से ही प्राप्त हुआ। बचपन से ही लोकगीतों, लोककथाओं और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के प्रति गहरा लगाव रखने वाले पांडेय जी ने इस प्रेरणा को अपने जीवन का मिशन बना लिया। उन्होंने इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय से लोक संगीत में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की, जो उनके शोधपरक दृष्टिकोण को दर्शाती है।

वर्ष 1988 में सुप्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर से हुई मुलाकात उनके जीवन की महत्वपूर्ण घटना साबित हुई। 1990 में ‘नया थियेटर’ से जुड़कर उन्होंने अपनी कलात्मक यात्रा को नई दिशा दी। देश-विदेश के अनेक मंचों पर प्रदर्शन करते हुए उन्होंने छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं, गीतों, नृत्यों और लोककथाओं को न केवल संरक्षित किया बल्कि उन्हें आधुनिक संदर्भ में भी प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुतियां दर्शकों के हृदय को छूती हैं क्योंकि इनमें मिट्टी की महक और जनजातीय जीवन की सच्चाई झलकती है।

अनूप रंजन पांडेय जी का योगदान मात्र मंच प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। उन्होंने 143 लोकगीतों और लोककथाओं की पांडुलिपियों का संकलन किया है, जो भविष्य की पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर साबित होगा। छत्तीसगढ़ के दुर्लभ पारंपरिक वाद्ययंत्रों के संरक्षण में उनका कार्य उल्लेखनीय है। उन्होंने अपने संग्रह से कई दुर्लभ वाद्ययंत्र रायपुर संग्रहालय को दान किए। जनजातीय कलाकारों के सहयोग से उन्होंने 60 दुर्लभ वाद्ययंत्रों से सुसज्जित ‘बस्तर बैंड’ की स्थापना की। यह बैंड ‘बंदूक की बजाय ढोल चुनें’ के संदेश के साथ बस्तर के शांति, सांस्कृतिक जागरण और लोककला संरक्षण के अभियान का प्रतीक बन गया है। बैंड के माध्यम से उन्होंने युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने और हिंसा के स्थान पर संस्कृति को अपनाने का संदेश दिया।

लोककला और संस्कृति के क्षेत्र में उनके योगदान को पहले भी कई सम्मानों से नवाजा जा चुका है। दाऊ मंदराजी लोक कला सम्मान सहित अनेक पुरस्कारों के बाद वर्ष 2019 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से अलंकृत किया जाना उनके कार्य की व्यापक स्वीकृति था। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार अब इस श्रृंखला में नया और गरिमामय अध्याय जोड़ता है।

अनूप रंजन पांडेय जी का जीवन समर्पण, संरक्षण और सृजन का अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने साबित किया कि लोककला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने, संस्कृति को जीवंत रखने और शांति स्थापित करने का माध्यम भी है। इस उपलब्धि पर उन्हें हार्दिक बधाई। छत्तीसगढ़ समेत समूचे देश को उम्मीद है कि उनके मार्गदर्शन में नई पीढ़ी लोक संस्कृति को और आगे बढ़ाएगी। उनका यह सम्मान पूरे लोककलाकार समुदाय के लिए प्रेरणास्रोत है।

कृत्रिम मेधा प्रयोग के समाज पर पड़ रहे दुष्प्रभाव

prepared-crises-generat-artificial-intelligence.jpg.webp

दिल्ली। वर्तमान समय को तकनीकी क्रांति का युग कहा जा सकता है। इंटरनेट, स्मार्टफोन, क्लाउड कंप्यूटिंग और डेटा विज्ञान के बाद अब कृत्रिम मेधा (Artificial Intelligence-AI) मानव जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में प्रवेश कर चुकी है। शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग, कृषि, उद्योग, परिवहन, मीडिया और प्रशासन जैसे क्षेत्रों में इसका उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। कृत्रिम मेधा ऐसी तकनीक है जो मशीनों को मनुष्यों की तरह सीखने, सोचने, विश्लेषण करने और निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करती है। निस्संदेह यह तकनीक अनेक सुविधाएँ उपलब्ध करा रही है, लेकिन इसके साथ-साथ कुछ गंभीर चुनौतियाँ और दुष्प्रभाव भी सामने आ रहे हैं। समाज के संतुलित विकास के लिए इन दुष्प्रभावों को समझना और उनका समाधान खोजना अत्यंत आवश्यक है।

सबसे बड़ा दुष्प्रभाव रोजगार के क्षेत्र में दिखाई दे रहा है। कृत्रिम मेधा आधारित प्रणालियाँ अनेक ऐसे कार्य करने लगी हैं जिन्हें पहले मनुष्य करते थे। बैंकिंग, ग्राहक सेवा, लेखा-जोखा, डेटा विश्लेषण, अनुवाद, सामग्री निर्माण और उत्पादन जैसे क्षेत्रों में मशीनें मानव श्रम का स्थान ले रही हैं। इससे अनेक लोगों के सामने रोजगार की असुरक्षा की स्थिति उत्पन्न हो रही है। विशेष रूप से वे लोग अधिक प्रभावित हो रहे हैं जिनके कार्य दोहराव वाले और नियमित प्रकृति के हैं। यद्यपि नई तकनीकें नए रोजगार भी पैदा करती हैं, लेकिन हर व्यक्ति के लिए नई तकनीकी दक्षताएँ प्राप्त करना आसान नहीं होता। परिणामस्वरूप समाज में आर्थिक असमानता बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है।

कृत्रिम मेधा का दूसरा महत्वपूर्ण दुष्प्रभाव मानवीय कौशलों और क्षमताओं पर पड़ रहा है। आज अनेक लोग लेखन, गणना, अनुवाद, शोध और समस्या-समाधान जैसे कार्यों के लिए AI उपकरणों पर निर्भर होते जा रहे हैं। यदि यह निर्भरता अत्यधिक बढ़ती है तो मनुष्य की मौलिक सोच, रचनात्मकता और विश्लेषण क्षमता प्रभावित हो सकती है। किसी भी समाज की प्रगति उसके नागरिकों की बौद्धिक सक्रियता पर निर्भर करती है। यदि लोग हर छोटे-बड़े निर्णय के लिए मशीनों पर निर्भर हो जाएँ, तो स्वतंत्र चिंतन और नवाचार की प्रवृत्ति कमजोर पड़ सकती है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी कृत्रिम मेधा नई चुनौतियाँ प्रस्तुत कर रही है। विद्यार्थियों के लिए AI आधारित उपकरणों से जानकारी प्राप्त करना पहले की अपेक्षा बहुत आसान हो गया है। लेकिन इसके कारण अध्ययन, मनन और स्वयं उत्तर खोजने की आदत प्रभावित हो सकती है। कई बार विद्यार्थी बिना समझे हुए तैयार सामग्री का उपयोग करने लगते हैं। इससे सीखने की प्रक्रिया कमजोर हो सकती है। शिक्षा का उद्देश्य केवल उत्तर प्राप्त करना नहीं, बल्कि सोचने और समझने की क्षमता विकसित करना है। यदि तकनीक इस प्रक्रिया का स्थान लेने लगे तो शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।

सूचना और संचार के क्षेत्र में कृत्रिम मेधा ने एक नई समस्या उत्पन्न की है, जिसे भ्रामक सूचना या दुष्प्रचार कहा जाता है। AI की सहायता से नकली चित्र, वीडियो और ऑडियो तैयार किए जा सकते हैं। इन्हें सामान्यतः “डीपफेक” कहा जाता है। ऐसी सामग्री देखकर आम व्यक्ति के लिए यह पहचानना कठिन हो सकता है कि क्या वास्तविक है और क्या कृत्रिम रूप से निर्मित। इससे समाज में भ्रम, अविश्वास और तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है। चुनावों, सामाजिक आंदोलनों और सार्वजनिक विमर्श पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। गलत सूचनाएँ तेजी से फैलकर सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुँचा सकती हैं।

गोपनीयता का संकट भी कृत्रिम मेधा से जुड़ी एक गंभीर चिंता है। AI प्रणालियाँ बड़ी मात्रा में डेटा पर आधारित होती हैं। लोगों की पसंद, व्यवहार, खरीदारी, स्थान और ऑनलाइन गतिविधियों से संबंधित जानकारी लगातार एकत्रित की जाती है। यदि इस डेटा का दुरुपयोग हो जाए या पर्याप्त सुरक्षा न हो, तो व्यक्तियों की निजता प्रभावित हो सकती है। नागरिकों को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि उनका डेटा कहाँ और किस उद्देश्य से उपयोग किया जा रहा है। गोपनीयता का संरक्षण किसी भी लोकतांत्रिक समाज का महत्वपूर्ण आधार है।

कृत्रिम मेधा सामाजिक असमानताओं को भी बढ़ा सकती है। जिन देशों, संस्थानों और व्यक्तियों के पास अधिक संसाधन और तकनीकी क्षमता है, वे AI के लाभ अधिक मात्रा में प्राप्त कर सकते हैं। दूसरी ओर, संसाधनों की कमी वाले समुदाय पीछे छूट सकते हैं। इसे डिजिटल विभाजन की समस्या कहा जाता है। यदि तकनीकी सुविधाएँ केवल कुछ वर्गों तक सीमित रह जाएँ, तो सामाजिक और आर्थिक अंतर और अधिक बढ़ सकते हैं। इसलिए तकनीक का लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से पहुँचाना आवश्यक है।

एक अन्य चिंता निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में पक्षपात की है। कृत्रिम मेधा जिन आँकड़ों पर प्रशिक्षित होती है, उनमें यदि किसी प्रकार का पूर्वाग्रह मौजूद हो, तो उसके निर्णय भी पक्षपातपूर्ण हो सकते हैं। उदाहरण के लिए भर्ती, ऋण स्वीकृति या अन्य चयन प्रक्रियाओं में ऐसे निर्णय कुछ व्यक्तियों या समूहों के साथ अन्याय कर सकते हैं। मशीनें स्वयं नैतिकता नहीं समझतीं; वे उपलब्ध डेटा के आधार पर कार्य करती हैं। इसलिए AI आधारित प्रणालियों की पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है।

मानवीय संबंधों पर भी कृत्रिम मेधा का प्रभाव दिखाई दे रहा है। डिजिटल सहायक, चैटबॉट और आभासी संवाद प्रणालियाँ लोगों के जीवन का हिस्सा बनती जा रही हैं। इससे सुविधा तो बढ़ती है, लेकिन आमने-सामने संवाद की संस्कृति कमजोर पड़ सकती है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसके मानसिक स्वास्थ्य के लिए वास्तविक मानवीय संबंध अत्यंत आवश्यक हैं। यदि तकनीक सामाजिक संपर्कों का स्थान लेने लगे, तो अकेलेपन और सामाजिक दूरी जैसी समस्याएँ बढ़ सकती हैं।

मीडिया और रचनात्मक क्षेत्रों में भी AI को लेकर बहस चल रही है। लेखन, चित्रकला, संगीत और वीडियो निर्माण में कृत्रिम मेधा का उपयोग बढ़ रहा है। इससे रचनात्मक कार्यों की प्रकृति बदल रही है। एक ओर यह नई संभावनाएँ प्रदान करती है, वहीं दूसरी ओर मौलिकता और बौद्धिक संपदा से जुड़े प्रश्न भी खड़े करती है। यदि मशीनों द्वारा निर्मित सामग्री की मात्रा बहुत अधिक बढ़ जाती है, तो मानव रचनाकारों के लिए प्रतिस्पर्धा कठिन हो सकती है। समाज को यह तय करना होगा कि तकनीकी नवाचार और मानवीय सृजनशीलता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

कृत्रिम मेधा का एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी देखा जा रहा है। लगातार बदलती तकनीक के कारण अनेक लोगों में भविष्य को लेकर चिंता और असुरक्षा की भावना उत्पन्न हो रही है। रोजगार, गोपनीयता और सामाजिक स्थिति से जुड़ी आशंकाएँ मानसिक तनाव को बढ़ा सकती हैं। विशेष रूप से युवाओं के सामने यह प्रश्न खड़ा हो रहा है कि भविष्य में कौन-से कौशल प्रासंगिक रहेंगे। इसलिए तकनीकी परिवर्तन के साथ-साथ मानसिक और सामाजिक तैयारी भी आवश्यक है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि कृत्रिम मेधा स्वयं कोई समस्या नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब इसका उपयोग बिना पर्याप्त नियमों, नैतिक मानकों और सामाजिक उत्तरदायित्व के किया जाता है। जिस प्रकार किसी भी शक्तिशाली तकनीक का उपयोग लाभ और हानि दोनों के लिए किया जा सकता है, उसी प्रकार AI का प्रभाव भी उसके उपयोग पर निर्भर करता है। इसलिए सरकारों, शैक्षणिक संस्थानों, उद्योगों और नागरिक समाज को मिलकर ऐसी नीतियाँ विकसित करनी चाहिए जो तकनीकी प्रगति के साथ मानव हितों की रक्षा भी कर सकें।

समाधान के रूप में सबसे पहले डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देना आवश्यक है। लोगों को यह सिखाया जाना चाहिए कि AI आधारित सामग्री की सत्यता कैसे जाँची जाए और तकनीक का जिम्मेदारीपूर्वक उपयोग कैसे किया जाए। शिक्षा प्रणाली में आलोचनात्मक चिंतन, रचनात्मकता और नैतिक मूल्यों पर विशेष बल दिया जाना चाहिए। साथ ही, रोजगार के बदलते स्वरूप को ध्यान में रखते हुए कौशल विकास कार्यक्रमों का विस्तार किया जाना चाहिए। डेटा सुरक्षा और गोपनीयता संबंधी कानूनों को भी प्रभावी ढंग से लागू करना आवश्यक है।

निष्कर्षतः, कृत्रिम मेधा आधुनिक युग की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन इसके दुष्प्रभावों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। रोजगार की चुनौती, गोपनीयता का संकट, भ्रामक सूचना का प्रसार, सामाजिक असमानता, मानवीय कौशलों का क्षरण और मानसिक तनाव जैसी समस्याएँ समाज के सामने गंभीर प्रश्न खड़े कर रही हैं। आवश्यकता इस बात की है कि तकनीक को मानव कल्याण का साधन बनाया जाए, न कि मानव मूल्यों का विकल्प। संतुलित नीतियों, नैतिक दृष्टिकोण और जागरूक नागरिकता के माध्यम से ही हम कृत्रिम मेधा के लाभों का उपयोग करते हुए उसके दुष्प्रभावों को सीमित कर सकते हैं। यही भविष्य के सुरक्षित, समावेशी और मानवीय समाज की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम होगा।

जी-7 समिट : मोदी-मैक्रों की ऐतिहासिक मुलाकात और भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताएँ

macron-modi-2-1jpg_1739354054732.webp

                                             

दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ जी-7 समिट में द्विपक्षीय मुलाकात तय होने के साथ भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताएँ एक बार फिर वैश्विक मंच पर केंद्र में हैं। वर्ष 2026 के इस समिट में भारत न केवल बहुपक्षीय चर्चाओं में सक्रिय भूमिका निभाने जा रहा है, बल्कि फ्रांस के साथ गहरी रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की उम्मीद कर रहा है।

मुख्य अपेक्षाएँ और फोकस एरिया

समुद्री सुरक्षा और हार्मुज जलडमरूमध्य में स्वतंत्र नौवहन

फ्रांस ने भारत के साथ व्यापक समुद्री सुरक्षा साझेदारी का प्रस्ताव रखा है। क्षेत्रीय तनावों के बीच सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ हार्मुज में स्वतंत्र नौवहन सुनिश्चित करने के लिए बहुराष्ट्रीय पहल में भारत की भागीदारी की चर्चा प्रमुख है। भारत, जो विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है, अपने ऊर्जा सुरक्षा हितों की रक्षा के लिए इस पहल को महत्वपूर्ण मानता है। इससे हिंद महासागर और पश्चिम एशिया में भारत की भूमिका और मजबूत होगी।

रक्षा सहयोग और सैन्य हार्डवेयर

दोनों नेताओं के बीच रक्षा सहयोग, सैन्य उपकरणों की खरीद, संयुक्त उत्पादन और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर विस्तृत चर्चा होने की संभावना है। फ्रांस पहले से ही भारत का प्रमुख रक्षा साझेदार रहा है (राफेल, पनडुब्बियाँ, आदि)। इस बैठक में नए समझौतों और संयुक्त अभ्यासों के विस्तार की उम्मीद है, जो आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य के अनुरूप होगा।

पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता

समिट के किनारे भारत, अमेरिका, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के नेताओं की बैठक प्रस्तावित है। भारत पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा और ऊर्जा मार्गों की सुरक्षा पर फ्रांस के साथ समन्वय बढ़ाना चाहता है। क्षेत्र में भारतीय समुदाय की सुरक्षा और आर्थिक हित भी प्रमुख मुद्दे हैं।

जलवायु परिवर्तन, स्वच्छ ऊर्जा और प्रौद्योगिकी

जी-7 समिट में भारत विकसित देशों से जलवायु वित्त, हरित हाइड्रोजन, सौर ऊर्जा और उन्नत प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की अपेक्षा रखता है। फ्रांस के साथ पहले से चल रहे साझा कार्यक्रमों को और गति देने की योजना है, ताकि भारत 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य हासिल कर सके।

बहुपक्षीय सुधार और वैश्विक दक्षिण की आवाज

भारत जी-7 से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) सुधार, बहुपक्षीय संस्थाओं के लोकतंत्रीकरण और विकासशील देशों की चिंताओं को प्राथमिकता देने की मांग कर रहा है। मैक्रों के साथ यह बैठक इंडो-पैसिफिक रणनीति, क्वाड और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला मजबूती जैसे मुद्दों पर भी चर्चा का अवसर प्रदान करेगी।

भारत की ‘विश्व मित्र’ रणनीति

यह मुलाकात सिर्फ द्विपक्षीय नहीं है, बल्कि भारत की ‘विश्व मित्र’ नीति और बहु-संरेखण (Multi-Alignment) का प्रतीक है। फ्रांस यूरोपीय संघ में भारत का प्रमुख समर्थक रहा है। दोनों देश आतंकवाद, साइबर सुरक्षा और समुद्री डोमेन जागरूकता पर पहले से सहयोग कर रहे हैं। नई साझेदारी से भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी उपस्थिति मजबूत कर सकेगा।

जी-7 समिट 2026 भारत के लिए अवसरों का मंच है-ऊर्जा सुरक्षा से लेकर प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और वैश्विक नेतृत्व तक। फ्रांस के साथ मजबूत साझेदारी भारत को न केवल क्षेत्रीय चुनौतियों का सामना करने में मदद करेगी, बल्कि वैश्विक दक्षिण की आवाज को और प्रभावशाली बनाएगी। सफल वार्ता से दोनों देशों के बीच विश्वास का नया अध्याय शुरू होगा, जो आने वाले वर्षों में रणनीतिक सहयोग को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा।

scroll to top