धरोहरों के पुनर्निर्माण की करनी होगी शुरुआत

high.jpeg

मधु शर्मा

दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट में खजुराहो के जवारी मंदिर में भगवान विष्णु की 7 फुट लंबी सिर कटी मूर्ति की पुनर्स्थापना की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) द्वारा की गई टिप्पणी कि, “यह एक पुरातात्विक स्थल है और एएसआई को इसकी अनुमति देनी होगी” ने सांस्कृतिक स्मारकों के पुनर्निर्माण को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। यह विचार उन ऐतिहासिक स्मारकों और स्थानों के पुनर्निर्माण पर केंद्रित है जिनमें मुगल काल के, अथवा समयावधि के दौरान कथित तौर पर क्षति हुई थी। इस दृष्टिकोण के साक्ष्य का मानना है कि ऐसे कदम न केवल ऐतिहासिक धारणा को सुधारेंगे, बल्कि राष्ट्रीय गौरव और भाईचारे की भावना को भी बढ़ावा देंगे।

इस दिशा में पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम एक कानूनी ढांचा तैयार करना है। सरकार को ऐसा कानून बनाना चाहिए जो उन ऐतिहासिक स्थलों की पहचान करे और उनके पुनर्निर्माण के लिए दिशा-निर्देश स्थापित करे। इस प्रक्रिया में इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और कला विशेषज्ञों की एक टीम को शामिल किया जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि पुनर्निर्माण प्रक्रिया पारंपरिक और सांस्कृतिक ढंग से पूर्ण हो सकें। इस प्रक्रिया में जन साधारण एवं सभी संबंधित समुदाय की भावनाओं को भी संज्ञान में रखना चाहिए।

इन पुरातत्व स्मारकों, और धरोहरों के पुनर्निर्माण से कई सकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं। जिन स्मारकों को उनके मूल स्वरूप से बदल दिया गया या पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया है, उन्हें फिर से उनके मूल स्वरूप में लाना हमारी समृद्ध विरासत के प्रति सम्मान का प्रतीक होगा। यह कदम लोगों में अपनी संस्कृति और इतिहास के प्रति गौरव की भावना पैदा करेगा।

यह पर्यटन को भी बढ़ावा देगा। भारत में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं, और पुनर्निर्मित स्मारकों की भव्यता और दिव्यता निश्चित रूप से पर्यटकों को आकर्षित करेगी। अयोध्या में राम मंदिर का उदाहरण हमारे सामने है, जिसने न केवल धार्मिक आस्था को पुनर्जीवित किया है, बल्कि एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में भी खोजा गया है। इसी प्रकार, अन्य ऐतिहासिक स्थलों का पुनर्निर्माण राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय मानचित्र पर किया जा सकता है, जिससे पर्यटन एवं आर्थिक विकास को गति मिल सके।

पुनर्निर्माण का उद्देश्य किसी भी समुदाय को अपमानित करना या इतिहास को बदलना नहीं, अपितु सभी को एक साथ लाना और हमारी साझा विरासत के गौरव की पुनःस्थापना ही होनी चाहिए। यदि इस दृष्टिकोण को सही तरीके से लागू किया जाता है, तो इस देश में भाईचारे और दर्शन को बढ़ावा दिया जा सकता है, और इतिहास को एक रथ के रूप में देखने के बजाय, एक प्रेरणा के रूप में देखा जा सकता है।

अतः इसे प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए, सरकार एक मजबूत वैधानिक ढाँचा बनाए और इन धरोहरों के पुनर्निर्माण की शुरुआत करे।

मैं आपका सेवक हूं,न कि शासक -प्रधानसेवक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

pm-modi-22.jpg

-डॉ० प्रवेश कुमार

आज भारत सीना तान के अपनी शर्तों पर विश्व पटल पर अपनी भूमिका का निर्वहन कर रहा है। ऐसे में वैश्विक मंच पर भारत की छवि को बढ़ाने वाले श्री नरेन्द्र मोदी जी का व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर एक दृष्टि डालने की आवश्यकता ज़रूर है। देश और वैश्विक रणनीतिक मंच पर भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी जी के निडर,सशक्त और सबल नेतृत्व के कारण से भारत के जनमानस के प्रति दुनिया की दृष्टि में परिवर्तन आया है। ऐसे में जब 17सितंबर, 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 75 वर्ष के हो जाएंगे। इस अवसर पर उनकी उपलब्धियों और नेतृत्व शैली पर चर्चा स्वाभाविक है। समाज में उनकी पहचान जहाँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वारा प्रशिक्षित स्वयंसेवक, प्रचारक, हिन्दू ह्रदय सम्राट के रूप है। तो वही वह एक कुशल प्रशासक, एक राजनेता के रूप है।

इसी प्रकार से श्री नरेन्द्र मोदी जी की छवि ‘प्रधानसेवक’के रूप में भी है। यह शब्द उन्होंने स्वयं अपनाया, जो उनकी कार्यशैली और जनता के प्रति समर्पण को दर्शाता है। वही भारत मूल्यों, दर्शन की प्रति उनके अगाध आस्था को भी बताता है। भारत में शासक प्रजा का पालक है, राजा पिता की भाँति अपनी प्रजा को अपनी संतान मानते हुए उनके कल्याण के लिए काम करना है। भारत में “योगक्षेम” का पूरा विचार समाज कल्याण पर आधारित है। इसी प्रकार भगवान राम ने कहा “ राजा के सुख के स्थान पर जनता का सुख, उनका कल्याण किसी भी शासन को उच्चता की श्रेणी में लाता है”।हम यदि वर्तमान श्री नरेन्द्र मोदी जी की सरकार का एक सूक्ष्म आकलन करे तो हमे स्वतः ज्ञात हो जाएगा कि यह सरकार जनसेवा, जनकल्याण, समाज में अंतिम व्यक्ति के सबसे ज़्यादा कल्याण को समर्पित है। यही कारण है कि श्री नरेन्द्र मोदी जी को ‘प्रधानसेवक’कहा जाता है। लेकिन हमारे प्रधानमन्त्री जितना सर्वकल्याण आधारित नीतियों का निर्माण कर लोकप्रिय है तो वही पारंपरिक राजनीति करने वाले विपक्ष के लिए हमेशा आलोचना के केंद्र में भी है। लेकिन हम आकलन करे की क्या?

श्री नरेन्द्र मोदी जी जी असल में प्रधानसेवक है। इस प्रश्न का उत्तर हमे उनके कार्यों, नीतियों और जनसंपर्क के तौर-तरीकों में छिपा दिखता है।आइए हम देखते है श्री नरेन्द्र मोदी जी के व्यक्तित्व और उनके कृतत्व के विभिन्न पक्षों को- श्री नरेन्द्र मोदी जीएकसेवक के रूप में –वर्ष 2014में पहली बार श्री नरेंद्र मोदी जी देश के प्रधानमंत्री बने।श्री नरेंद्र मोदी जी जी दो दशको से चली आ रही मिलीजुली सरकार के स्थान पर पूर्ण बहुमत की सरकार के मुखिया बने। लेकिन अपने दल के पूर्ण बहुमत में भी उन्होंने गठबंधन धर्म को निभाया। यह श्री नरेंद्र मोदी जी के प्रति जनता का भाव,उनका समर्थन था, जिसने मुख्यमंत्री मोदी को देश का प्रधानमंत्री, प्रधानसेवक बनाया। इसी का परिणाम था कि श्री नरेंद्र मोदी जी का जनता के लिए समर्पण है। उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने पहले भाषण में ही कहा की “मैं आपका सेवक हूं, न कि शासक”यह कथन केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनकी नीतियों और कार्यों में भी झलकता है। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल से लेकर केंद्र में प्रधानमंत्री के रूप में, उन्होंने जनता की सेवा को प्राथमिकता दी। उनकी यह सोच “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास,सबका प्रयास”के नारे में स्पष्ट दिखाई देती है,जो समावेशी विकास का प्रतीक बन गया। प्रधानमंत्री के तौर पर उन्होंने कई ऐसी योजनाएं शुरू कीं, जो सीधे आम जनता की जरूरतों को संबोधित करती हैं। चाहे वह ‘प्रधानमंत्री जन धन योजना’ हो, जिसने लाखों गरीब परिवारों को बैंकिंग सेवाओं के साथ जोड़ा, या ‘आयुष्मान भारत’ योजना, जिसने गरीबों को मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान कीं। ये योजनाएं उनकी उस सोच को दर्शाती हैं, जिसमें जनता की सेवा सर्वोपरि है।

श्री नरेन्द्र मोदी जीका जनता से सीधा संवाद- नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण उनकी जनता से सीधे संवाद करने की क्षमता है। ‘मन की बात’कार्यक्रम इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इस रेडियो कार्यक्रम के माध्यम से वे देशवासियों से सीधे जुड़ते हैं,उनकी समस्याओं को समझते हैं और छोटी-छोटी कहानियों के जरिए समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की प्रेरणा देते हैं।यह कार्यक्रम न केवल जनता की आवाज को मंच देता है, बल्कि सरकार की नीतियों को भी सरल भाषा में समझाता है। इसके अलावा, सोशल मीडिया के जरिए भी मोदी जनता के बीच अपनी उपस्थिति बनाए रखते हैं। ट्विटर (अब एक्स X) और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर वे नियमित रूप से अपनी योजनाओं, विचारों और देश की प्रगति को साझा करते हैं।यह उनकी पारदर्शी और जवाबदेह कार्यशैली को दर्शाता है, जो एक सेवक की तरह जनता के प्रति उनकी जिम्मेदारी को रेखांकित करता है। श्री नरेन्द्र मोदी जीकीनीतियों में सबका प्रयास, सबका सहभाग की नीति -प्रधानमंत्री मोदी जी ने अपनी नीतियों और योजनाओ में जान सेवा को प्राथमिकता दी वही जनसेवा के अभियान को जन-जन के सहभाग के साथ जोड़ना। हम देखे ‘स्वच्छ भारत अभियान’ इस अभियान ने सरकार के कार्ययोजना में जनता को सहभागी बनाया। इस अभियान के तहत देश भर में लाखों शौचालयों का निर्माण हुआ, जिसने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्वच्छता और सम्मान की भावना को बढ़ावा दिया। यह अभियान केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं था, बल्कि यह सामाजिक जागरूकता और जनभागीदारी का भी प्रतीक बना। इसी तरह, ‘मेक इन इंडिया’ और ‘डिजिटल इंडिया’ जैसी पहल ने न केवल भारत को वैश्विक मंच पर मजबूत किया, बल्कि युवाओं को रोजगार और तकनीकी सशक्तीकरण का अवसर भी प्रदान किया। इन योजनाओं का आधार यह था कि देश का हर नागरिक सशक्त हो और आत्मनिर्भर बने। यह दृष्टिकोण एक सेवक की तरह काम करने की उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।श्री नरेन्द्र मोदी जीका संकट में नेतृत्व-एक सच्चे सेवक की पहचान संकट के समय में होती है। कोविड-19महामारी के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह नेतृत्व किया, वह उनकी सेवक भावना का प्रतीक है। उन्होंने न केवल देशवासियों को एकजुट करने का प्रयास किया, बल्कि ‘आत्मनिर्भर भारत’का नारा देकर देश को आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए। ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना’के तहत लाखों गरीब परिवारों को राशन उपलब्ध कराया गया, जिससे संकट के समय में कोई भूखा न रहे। इसके अलावा, भारत ने वैक्सीन निर्माण और वितरण में जो वैश्विक नेतृत्व दिखाया, वह भी मोदी की दूरदर्शिता का परिणाम था। ‘वैक्सीन मैत्री’के तहत भारत ने कई देशों को मुफ्त वैक्सीन प्रदान की, जो उनकी वैश्विक स्तर पर सेवा की भावना को दर्शाता है।सामाजिक समावेश और सशक्तीकरण- प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों में सामाजिक समावेश और सशक्तीकरण का विशेष स्थान है। चाहे वह ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’अभियान हो या ‘उज्ज्वला योजना’, जिसके तहत गरीब महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शन प्रदान किए गए, इन सभी पहलों का उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को मुख्यधारा में लाना रहा है। महिलाओं, युवाओं और ग्रामीण भारत को सशक्त बनाने की उनकी प्रतिबद्धता उनकी सेवक भावना का एक और प्रमाण है।

चुनौतियां और आलोचनाएं-हालांकि, कोई भी नेतृत्व आलोचनाओं से अछूता नहीं रहता। कुछ लोग मानते हैं कि उनकी नीतियों में और सुधार की गुंजाइश है। उदाहरण के लिए, नोटबंदी और जीएसटी जैसे कदमों ने शुरुआत में कुछ आर्थिक चुनौतियां पैदा कीं। लेकिन यह भी सच है कि इन कदमों ने लंबे समय में अर्थव्यवस्था को पारदर्शी और मजबूत बनाने में मदद की। उनकी सेवक भावना पर सवाल उठाने वाले भी हैं, लेकिन यह उनकी कार्यशैली और जनता के प्रति समर्पण से नकारा नहीं जा सकता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘प्रधानसेवक’ कहना केवल एक शब्द का प्रयोग नहीं है, बल्कि यह उनकी कार्यशैली, नीतियों और जनता के प्रति उनकी जवाबदेही का प्रतीक है। चाहे वह स्वच्छता, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार या वैश्विक मंच पर भारत की पहचान हो, उन्होंने हर क्षेत्र में जनता की सेवा को प्राथमिकता दी है। उनकी सादगी, जनता से सीधा संवाद और संकट में नेतृत्व की क्षमता ने उन्हें न केवल भारत, बल्कि विश्व स्तर पर एक लोकप्रिय नेता बनाया है।75वें जन्मदिन के अवसर पर, यह कहना गलत नहीं होगा कि नरेंद्र मोदी ने ‘प्रधानसेवक’ की भूमिका को न केवल अपनाया, बल्कि उसे जीया भी है। उनकी यह यात्रा देशवासियों के लिए प्रेरणा है कि सच्ची सेवा ही सच्चा नेतृत्व है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी: क्यों कहलाते हैं ‘प्रधानसेवक

2024-06-04T155750Z_334922837_RC2F48ADT12K_RTRMADP_3_INDIA-ELECTION-MODI-1024x576-1.jpg

17 सितंबर, 2025 को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 75 वर्ष के हो जाएंगे। यह अवसर उनकी उपलब्धियों, नेतृत्व शैली और जनसेवा के प्रति समर्पण पर चर्चा करने का एक उपयुक्त मौका है। नरेंद्र मोदी की पहचान न केवल एक राजनेता के रूप में, बल्कि ‘प्रधानसेवक’ के रूप में भी रही है-एक ऐसा शब्द जो उन्होंने स्वयं अपनाया और जिसे उनकी नीतियों, कार्यशैली और जनता के प्रति जवाबदेही ने सार्थक किया। आखिर, नरेंद्र मोदी को ‘प्रधानसेवक’ क्यों कहा जाता है? यह सवाल उनके कार्यों, नीतियों, जनसंपर्क और संकटकाल में नेतृत्व की गहन पड़ताल से समझा जा सकता है।

सेवक की भावना: जनता के लिए समर्पण

2014 में पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने अपने पहले भाषण में कहा था, “मैं आपका सेवक हूं, न कि शासक।” यह कथन केवल सांकेतिक नहीं था, बल्कि उनकी कार्यशैली का आधार बना। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में अपने 13 वर्षों के कार्यकाल (2001-2014) से लेकर केंद्र में 11 वर्षों के नेतृत्व तक, उनकी नीतियां जनता की बुनियादी आवश्यकताओं को संबोधित करती रही हैं। उनकी सोच ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे में परिलक्षित होती है, जिसने समावेशी विकास को नया आयाम दिया। बाद में इसे ‘सबका विश्वास’ और ‘सबका प्रयास’ के साथ और विस्तार दिया गया, जो सामाजिक समरसता और जनभागीदारी पर जोर देता है।

प्रधानमंत्री जन धन योजना (2014) इसका एक ठोस उदाहरण है। इस योजना के तहत 53 करोड़ से अधिक बैंक खाते खोले गए, जिसने लाखों गरीब परिवारों को वित्तीय समावेशन का अवसर दिया। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में वित्तीय समावेशन का स्तर 2014 के 50% से बढ़कर 2021 तक 80% हो गया। इसी तरह, आयुष्मान भारत योजना (2018) ने 50 करोड़ से अधिक लोगों को 5 लाख रुपये तक का मुफ्त स्वास्थ्य बीमा प्रदान किया, जिससे गरीब परिवारों को स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ हुईं। ये योजनाएं उनकी उस सोच को दर्शाती हैं, जिसमें जनता की सेवा सर्वोपरि है।

जनता से सीधा संवाद

नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का एक प्रमुख कारण उनकी जनता से सीधे संवाद करने की असाधारण क्षमता है। ‘मन की बात’ रेडियो कार्यक्रम, जो 2014 से शुरू हुआ, इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सितंबर 2025 तक इसके 113 से अधिक एपिसोड प्रसारित हो चुके हैं। इस कार्यक्रम में मोदी न केवल सरकारी योजनाओं को सरल भाषा में समझाते हैं, बल्कि समाज के गुमनाम नायकों की कहानियों को उजागर करते हैं, जो सामाजिक जागरूकता और प्रेरणा का स्रोत बनता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, 70% से अधिक श्रोता इस कार्यक्रम को प्रेरणादायक और सूचनात्मक मानते हैं।

सोशल मीडिया, विशेष रूप से X प्लेटफॉर्म, पर उनकी सक्रिय उपस्थिति उनकी पारदर्शी और जवाबदेह कार्यशैली को दर्शाती है। 2025 तक उनके X हैंडल (@narendramodi) पर 100 मिलियन से अधिक फॉलोअर्स हैं, जो उन्हें विश्व के सबसे अधिक फॉलो किए जाने वाले नेताओं में से एक बनाता है। यह जनता के साथ उनकी निरंतर संलग्नता और उनकी नीतियों को साझा करने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

नीतियों में सेवा की भावना

मोदी की नीतियां उनकी सेवक भावना का आधार हैं। स्वच्छ भारत अभियान (2014) ने स्वच्छता को राष्ट्रीय आंदोलन का रूप दिया। इस अभियान के तहत 12 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण हुआ, जिसके परिणामस्वरूप 2019 तक भारत को खुले में शौच से मुक्त घोषित किया गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने अनुमान लगाया कि इससे 300,000 से अधिक बच्चों की जान बची। यह अभियान केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने सामाजिक जागरूकता और जनभागीदारी को बढ़ावा दिया।

इसी तरह, ‘मेक इन इंडिया’ (2014) और ‘डिजिटल इंडिया’ (2015) ने भारत को वैश्विक मंच पर मजबूत किया। मेक इन इंडिया के तहत भारत में विनिर्माण क्षेत्र का योगदान बढ़ा, और 2025 तक भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर है। डिजिटल इंडिया ने इंटरनेट कनेक्टिविटी को ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाया, जिससे डिजिटल भुगतान में 400% की वृद्धि हुई। ये पहलें युवाओं को रोजगार और तकनीकी सशक्तीकरण का अवसर प्रदान करती हैं।

संकट में नेतृत्व

संकटकाल में नेतृत्व ही एक सच्चे सेवक की असली पहचान होती है। कोविड-19 महामारी (2020-2022) के दौरान नरेंद्र मोदी ने जिस तरह देश को एकजुट किया, वह उनकी सेवक भावना का प्रतीक है। ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना’ के तहत 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन उपलब्ध कराया गया, जिसने संकट के समय भुखमरी को रोका। भारत ने 200 करोड़ से अधिक वैक्सीन डोज वितरित कीं, और ‘वैक्सीन मैत्री’ के तहत 100 से अधिक देशों को मुफ्त वैक्सीन प्रदान की, जिसने भारत को वैश्विक स्वास्थ्य नेतृत्व में अग्रणी बनाया।

सामाजिक समावेश और सशक्तीकरण

मोदी की नीतियों में सामाजिक समावेश और सशक्तीकरण का विशेष स्थान है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ (2015) ने लिंगानुपात में सुधार किया, और 2023 तक 1,020 लिंगानुपात (प्रति 1,000 पुरुषों पर महिलाएं) दर्ज किया गया। ‘उज्ज्वला योजना’ (2016) के तहत 10 करोड़ से अधिक गरीब महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शन प्रदान किए गए, जिसने उनकी स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति को बेहतर किया। ये योजनाएं समाज के कमजोर वर्गों को मुख्यधारा में लाने की उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं।

चुनौतियां और आलोचनाएं

कोई भी नेतृत्व आलोचनाओं से अछूता नहीं रहता। नोटबंदी (2016) और जीएसटी (2017) जैसे कदमों ने शुरुआत में आर्थिक चुनौतियां पैदा कीं। उदाहरण के लिए, नोटबंदी के कारण असंगठित क्षेत्र में अस्थायी रोजगार की हानि हुई। हालांकि, लंबे समय में इन कदमों ने डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया और कर प्रणाली को पारदर्शी बनाया। कुछ आलोचक उनकी नीतियों को प्रचार-प्रधान मानते हैं, लेकिन उनके कार्यों का प्रभाव, जैसे स्वच्छता, स्वास्थ्य और वित्तीय समावेशन में प्रगति, इन आलोचनाओं को कमजोर करता है।

नरेंद्र मोदी को ‘प्रधानसेवक’ कहना केवल एक शब्द का प्रयोग नहीं, बल्कि उनकी कार्यशैली, नीतियों और जनता के प्रति जवाबदेही का प्रतीक है। चाहे वह स्वच्छता, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार या वैश्विक मंच पर भारत की पहचान हो, उन्होंने हर क्षेत्र में जनता की सेवा को प्राथमिकता दी। उनकी सादगी, जनता से सीधा संवाद और संकट में नेतृत्व की क्षमता ने उन्हें न केवल भारत, बल्कि विश्व स्तर पर एक लोकप्रिय नेता बनाया। 75वें जन्मदिन पर यह कहना उचित होगा कि नरेंद्र मोदी ने ‘प्रधानसेवक’ की भूमिका को न केवल अपनाया, बल्कि उसे जीया भी है। उनकी यह यात्रा देशवासियों के लिए प्रेरणा है कि सच्ची सेवा ही सच्चा नेतृत्व है।

मोदी सरकार और नारी शक्ति का नवयुग

1449639__pm-modi-women-mps202309276054.jpg

डॉ शिवानी कटारा

दिल्ली । भारत की आधी आबादी, जिसे लंबे समय तक घर की चौखट और सामाजिक परंपराओं में सीमित माना जाता था, आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रही है। बीते दशक में तस्वीर पूरी तरह बदली है—ऐसे कानून बने जिन्होंने महिलाओं को बराबरी और गरिमा का अधिकार दिया, और ऐसी योजनाएँ आईं जिन्होंने मातृत्व को सुरक्षित कर बेटियों के सपनों को पंख दिए। यही वजह है कि आज नारी शक्ति केवल वोट नहीं, अब राष्ट्र की आवाज़ है । इसी यात्रा में 2023 का ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ स्त्री प्रतिनिधित्व को नई ऊँचाई देने वाली ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में अंकित हो गया है। इसके तहत लोकसभा और विधानसभाओं की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गईं। यह बदलाव केवल आंकड़ों का नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा में स्त्री शक्ति को प्रतिष्ठित करने का है।

मोदी सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित करने के लिए ‘मिशन शक्ति’ की शुरुआत की। इसके अंतर्गत वन स्टॉप सेंटर, 24×7 महिला हेल्पलाइन और डिजिटल शिकायत पोर्टल जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराई गईं। हिंसा झेलने वाली महिलाएँ अब कानूनी, चिकित्सीय और मानसिक सहयोग एक ही स्थान पर पा रही हैं, और यह भरोसा जगा है कि उनकी आवाज़ अब अनसुनी नहीं होगी। मुस्लिम महिलाओं को अन्यायपूर्ण परंपरा से मुक्त करने वाला ‘तीन तलाक’ विरोधी कानून इसी दिशा में एक बड़ा परिवर्तन साबित हुआ। वहीं कामकाजी महिलाओं के लिए ‘मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम, 2017’ के अंतर्गत अवकाश 12 से बढ़ाकर 26 सप्ताह किया गया तथा बड़े संस्थानों में शिशु गृह (क्रेच) की सुविधा अनिवार्य की गई। इन पहलों ने महिलाओं को सुरक्षा और गरिमा के साथ कार्यक्षेत्र में सक्रिय योगदान का अवसर प्रदान किया।

मोदी सरकार की नीतियों में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ नारी सशक्तिकरण का मर्मस्थ स्रोत रहा है, और हाल के आँकड़े इसकी गवाही देते हैं। 2014-15 में जहाँ 1000 लड़कों पर 918 लड़कियाँ थीं, 2023-24 में यह अनुपात बढ़कर 930 हुआ और माध्यमिक शिक्षा में लड़कियों की नामांकन दर 75.51% से बढ़कर 78% पहुँची। मार्च 2022 में ‘कन्या शिक्षा प्रवेश उत्सव’ से 1,00,786 बच्चियाँ स्कूल लौटीं। 2014-16 में मातृ मृत्यु दर 130 से घटकर 2018-20 में 97 रह गई और संस्थागत प्रसव 87% से बढ़कर 94% से अधिक हुआ—यह दर्शाता है कि सुरक्षित मातृत्व ही विकसित भारत की सच्ची पहचान है। राज्यों के अनुभव इस प्रगति को और भी सजीव बना देते हैं। उत्तर प्रदेश में गर्भवती महिलाओं में एनीमिया की दर 51% से घटकर 45.9% रह गई और गंभीर एनीमिया 2.1% से घटकर 1.7% पर आ गया—यह आँकड़े मातृ स्वास्थ्य सुधार की गवाही देते हैं। इसी कड़ी में उज्ज्वला योजना के अंतर्गत 10.33 करोड़ गैस कनेक्शन दिए गए, जिनमें से 8.34 करोड़ परिवार सक्रिय उपयोगकर्ता हैं, जिससे माताओं और बच्चों को धुएँ से मुक्ति मिली। वहीं स्वच्छ भारत मिशन के तहत बने करोड़ों शौचालयों ने ग्रामीण महिलाओं को खुले में शौच की विवशता से उबारकर उनकी गरिमा और स्वास्थ्य दोनों को संबल दिया। यह सब मिलकर नारी जीवन में सुरक्षा, सम्मान और स्वाभिमान की नई कहानी लिख रहे हैं।

आर्थिक स्वतंत्रता भी अब महिलाओं की शक्ति का दूसरा नाम बन चुकी है। मोदी सरकार के प्रयासों से ‘स्टैंड अप इंडिया’ और ‘मुद्रा योजना’ ने लाखों महिला उद्यमियों को कारोबार के लिए वित्तीय सहारा दिया, जबकि ‘लाखपति दीदी’ और ‘ड्रोन दीदी’ योजना ने ग्रामीण महिलाओं को तकनीक और स्वरोज़गार से जोड़कर उन्हें स्वावलंबी भारत की नई पहचान बना दिया है। मुद्रा योजना में महिलाओं की हिस्सेदारी 68% है और 2016 से 2025 के बीच प्रति महिला औसत ऋण ₹62,679 तक पहुँचा। स्टैंड-अप इंडिया में 80% से अधिक ऋण महिलाओं को मिले। उत्तर प्रदेश में मनरेगा में उनकी भागीदारी 35% से बढ़कर 45.05% और श्रम-बल में 14% से बढ़कर 36% हुई। वाराणसी की 1.38 लाख ग्रामीण महिलाएँ स्व-सहायता समूहों से आत्मनिर्भर बनीं, जिनमें कई ड्रोन पायलटिंग, कृषि और डेयरी जैसे क्षेत्रों में सक्रिय हैं। यह दर्शाता है कि महिलाएँ अब केवल योजनाओं की भागीदार नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था की सशक्त धुरी बन रही हैं।

डिजिटल इंडिया ने महिलाओं के जीवन में ऐतिहासिक बदलाव लाया है। शहरी भारत की महिलाएँ स्मार्टफोन और इंटरनेट के सहारे बैंकिंग, ई-कॉमर्स और डिजिटल भुगतान को सहज बना रही हैं, तो ग्रामीण भारत की 76% महिलाएँ मोबाइल का उपयोग कर रही हैं और आधी से अधिक अपने निजी फोन की स्वामिनी बन चुकी हैं। यही तकनीकी पहुँच उन्हें डिजिटल विपणन, पैकेजिंग और ई-कॉमर्स से जोड़कर आत्मनिर्भरता की राह पर अग्रसर कर रही है। साथ ही, महिला हेल्पलाइन 181, एनसीडब्ल्यू 24×7 और पावर लाइन-1090 सुरक्षा और न्याय की त्वरित पहुँच देकर उनके आत्मविश्वास को और गहरा कर रही हैं। मोदी सरकार का यह डिजिटल सशक्तिकरण महिलाओं को समय और दूरी की सीमाओं से आज़ाद कर अवसरों की नई दुनिया थमा रहा है और उन्हें नवोन्मेषी बना रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी के शासनकाल में महिलाओं ने राष्ट्रीय सुरक्षा की अग्रिम पंक्ति में नया इतिहास रचा। अग्निपथ योजना के तहत 153 महिला अग्निवीरों ने बेलगावी से प्रशिक्षण पूरा किया और नौसेना ने लगभग 20% पद महिलाओं के लिए खोले। जम्मू-कश्मीर के अखनूर सेक्टर में सात महिला बीएसएफ कर्मियों ने 72 घंटे तक मोर्चा सँभालकर साहस का अद्वितीय उदाहरण पेश किया। प्रधानमंत्री ने इस अभियान को हर माँ और बहन को समर्पित किया। साथ ही सेना का ‘ऑपरेशन सिंदूर’ एक सांस्कृतिक प्रतीक बना—जहाँ राष्ट्र रक्षा के साथ महिलाओं के सम्मान और गरिमा की रक्षा का संदेश भी प्रतिध्वनित हुआ। सचमुच, अग्निवीर बेटियाँ अब सीमाओं पर देश की ढाल हैं और ‘सिंदूर’ वीरता का प्रतीक है।

बेशक चुनौतियाँ अब भी हैं और सामाजिक पूर्वाग्रह भी कायम हैं, पर अब नींव इतनी मजबूत है कि बदलाव अटल है। मोदी युग में महिलाओं की आवाज़ अब निर्णय और दिशा गढ़ती है; नारी केवल लाभार्थी नहीं, परिवर्तन की शिल्पकार और राष्ट्र निर्माण की धुरी बन चुकी है। यदि यही रफ्तार कायम रही, तो 2047 का विकसित भारत सचमुच नारी-निर्मित भारत होगा—जहाँ हर क्षेत्र में स्त्री शक्ति समानता, समृद्धि और नई संभावनाओं की मिसाल बनेगी।

(लेखिका दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से पीएच.डी. हैं और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं)

scroll to top