क्या स्मार्टफोन बन चुका है भारत की नई ‘ध्यान सत्ता’ का सम्राट?

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बेंगलूरु: एक जमाना था सुबह का अखबार पढ़े बिना लोग निच्चू नहीं हो पाते थे, शाम को, हम लोग, या महाभारत सीरियल देखे बगैर सो नहीं पाते थे। घंटों तक बच्चे टीवी जिसे इलेक्ट्रॉनिक निप्पल कहा जाता था, चिपके रहते थे। क्रिकेट मैच मोहल्लों को जोड़ देते थे। धारावाहिक घर-घर की बातचीत बन जाते थे। समाचार चैनल देश की राजनीतिक धड़कन तय करते थे। मीडिया सिर्फ सूचना का माध्यम नहीं था, वह सामाजिक संस्कृति का हिस्सा था।

और अब?

क्या आपने गौर किया है कि घरों में अख़बार की सरसराहट कम सुनाई देती है और टीवी के सामने परिवारों की भीड़ भी पहले जैसी नहीं रही?
एक खामोश क्रांति हमारे सामने घट रही है। बिना शोर। बिना मातम। बिना किसी औपचारिक घोषणा के। भारत में पारंपरिक मीडिया, खासकर प्रिंट और टेलीविजन, धीरे-धीरे अपनी पकड़ खोते जा रहे हैं। उनकी जगह अब स्मार्टफोन ने ले ली है। वही छोटा-सा चमकता पर्दा, जिसने दुनिया को हथेली में समेट लिया है और इंसानी ध्यान को अपनी गिरफ्त में कर लिया है।

कम्युनिकेशन क्रांति के गुरु मार्शल मैकलुहान ने ठीक ही कहा था: “मीडियम ही संदेश है।”

आज वह संदेश बदल चुका है।

तेज़। छोटा। उत्तेजक। और बेहद नशे की तरह असर करने वाला।

स्मार्टफोन ने केवल टीवी या अख़बार को चुनौती नहीं दी, उसने इंसानी व्यवहार ही बदल दिया।

आंकड़े कहानी साफ़ बताते हैं। भारत में टीवी दर्शकों की संख्या धीरे-धीरे घट रही है। करोड़ों लोग डीटीएच कनेक्शन छोड़ चुके हैं। विज्ञापन आय ठहर गई है। कभी मनोरंजन का बादशाह रहा टीवी उद्योग अब असुरक्षा के दौर से गुजर रहा है।

लेकिन असली चिंता टीवी नहीं, अख़बारों की गिरती हालत है।

प्रिंट पत्रकारिता, जो लोकतंत्र की रीढ़ मानी जाती थी, डिजिटल तूफान में हांफती नजर आ रही है। नई पीढ़ी अब खबरें अख़बार में नहीं, इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स, व्हाट्सऐप फॉरवर्ड और एल्गोरिदम से चलने वाली सोशल मीडिया फीड्स में ढूंढती है। लंबी रिपोर्ट पढ़ने का धैर्य घटता जा रहा है। लोग अब खबर को “समझना” नहीं, “स्क्रॉल” करना चाहते हैं।

सुबह का अख़बार अब किसी दूसरे अख़बार से नहीं, बल्कि मोबाइल की लगातार बजती नोटिफिकेशनों से लड़ रहा है।

यह बदलाव केवल तकनीकी नहीं, सामाजिक भी है।

अख़बार पाठक को ठहरना सिखाते थे। सोचने का समय देते थे। अलग-अलग विचारों से परिचय कराते थे। संपादकीय, विश्लेषण और खोजी रिपोर्टें समाज को गहराई देती थीं। दूसरी ओर स्मार्टफोन की दुनिया तेज़ प्रतिक्रिया, सनसनी और तात्कालिक उत्तेजना पर चलती है। सूचना अब टूटी हुई कांच के टुकड़ों की तरह बिखरकर आती है। लोग सब कुछ जानते हुए भी बहुत कम समझ पा रहे हैं।

माध्यम बदला है, इसलिए संदेश भी बदल गया है।

आज भारत में 80 करोड़ से अधिक स्मार्टफोन उपयोगकर्ता हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। सस्ते इंटरनेट ने डिजिटल दुनिया को हर हाथ तक पहुंचा दिया। सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने मनोरंजन को पूरी तरह व्यक्तिगत बना दिया है। अब हर व्यक्ति अपनी अलग डिजिटल दुनिया में जी रहा है।

टीवी सामूहिक अनुभव था। स्मार्टफोन व्यक्तिगत कैदखाना बन गया।

पहले पूरा परिवार एक कार्यक्रम साथ देखता था। अब एक ही कमरे में बैठे चार लोग चार अलग-अलग स्क्रीन पर अलग-अलग दुनिया देख रहे होते हैं। साझा सामाजिक संवाद बिखर रहा है। राष्ट्रीय बहसें अब स्वतः नहीं बनतीं, उन्हें एल्गोरिदम गढ़ते हैं।

आज की सबसे बड़ी पूंजी है : इंसानी ध्यान।

विज्ञापन कंपनियों ने यह बदलाव सबसे पहले समझ लिया। बड़े ब्रांड अब टीवी से ज्यादा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर पैसा लगा रहे हैं, जहां हर क्लिक, हर स्क्रॉल और हर सेकंड का हिसाब मिलता है। डिजिटल विज्ञापन तेजी से बढ़ रहा है जबकि टीवी और प्रिंट की विज्ञापन आय सिकुड़ती जा रही है।
और अख़बार?

वे चुपचाप लहूलुहान हो रहे हैं।

कई शहरों में प्रसार घट रहा है। विज्ञापन ऑनलाइन चले गए हैं। न्यूजप्रिंट की लागत बढ़ती जा रही है। छोटे और क्षेत्रीय अख़बार अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। अनुभवी पत्रकारों को डर है कि समाज केवल एक उद्योग नहीं खो रहा, बल्कि पढ़ने और गहराई से सोचने की आदत भी खो रहा है।

विडंबना देखिए : सूचना बढ़ी है, लेकिन ध्यान घट गया है।

तीस सेकंड की रील अब हजार शब्दों के विश्लेषण पर भारी पड़ रही है। वायरल कंटेंट बनाने वाले कई बार स्थापित न्यूज़रूम से ज्यादा प्रभावशाली हो गए हैं। इस डिजिटल जंगल में विश्वसनीयता से ज्यादा दृश्यता मायने रखती है।

असल लड़ाई अब टीवी बनाम डिजिटल की नहीं रही।

यह लड़ाई है इंसानी ध्यान पर कब्जे की।

और फिलहाल यह जंग सबसे छोटी स्क्रीन जीत रही है।

मैकलुहान की बात आज पहले से ज्यादा सच लगती है। माध्यम केवल संदेश नहीं देता, वह समाज की सोच, व्यवहार और रिश्तों को भी आकार देता है। स्मार्टफोन ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया, लेकिन साथ ही ध्यान भंग, ध्रुवीकरण और मानसिक बेचैनी भी बढ़ाई।

उत्तर प्रदेश के किसी गांव का युवा अब रातोंरात वायरल स्टार बन सकता है। किसान लाखों लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकता है। यह बदलाव क्रांतिकारी भी है और खतरनाक भी।

सवाल यह है कि क्या समाज बिना गहराई से पढ़े स्वस्थ लोकतंत्र बचा पाएगा?

क्या लोग केवल स्क्रॉल करते-करते सोचने की क्षमता खो देंगे?

पारंपरिक मीडिया अब चौराहे पर खड़ा है।

अख़बारों और टीवी चैनलों को पुराने ढांचे से बाहर निकलना होगा। डिजिटल पत्रकारिता, क्षेत्रीय भाषाओं की ताकत, मल्टीमीडिया स्टोरीटेलिंग और विश्वसनीय कंटेंट ही उनका भविष्य तय करेंगे।

लेकिन एक सच्चाई साफ़ दिख रही है।

मीडिया के अधिकार का युग समाप्त हो रहा है।

एल्गोरिदम के प्रभाव का युग शुरू हो चुका है।

परिवार अब भी एक ही छत के नीचे रहते हैं, लेकिन मानसिक रूप से अलग-अलग डिजिटल दुनियाओं में बंट चुके हैं। टीवी अब भी जलता है। अख़बार अब भी कुछ दरवाजों तक पहुंचते हैं। मगर समाज का केंद्र अब हथेली में चमकती उस छोटी स्क्रीन पर खिसक चुका है।
ध्यान का नया सम्राट अब स्मार्टफोन है।

और हर अंतहीन स्क्रॉल के साथ, पुरानी मीडिया दुनिया थोड़ा और धुंधली पड़ती जा रही है।

‘भारत क्यों निशाने पर’ पुस्तक का भव्य विमोचन, शिक्षा और साहित्य के दिग्गजों को मिला पुरस्कार

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​कोलकाता/हावड़ा: 31 मई 2026 को हावड़ा के रत्नाकर नॉर्थ पॉइंट स्कूल के सभागार में वैचारिक विमर्श और साहित्य जगत की एक बेहद महत्वपूर्ण घटना साक्षी बनी। वसुधानंद पब्लिकेशन से प्रकाशित लेखक विप्लव विकास की बहुप्रतीक्षित पुस्तक ‘भारत क्यों निशाने पर’ का भव्य विमोचन किया गया।

​इस गरिमामयी समारोह में अध्यक्षा के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. स्मिता मिश्रा, मुख्य अतिथि तिरुपति विश्वविद्यालय के प्रो. रामप्रकाश, सार्क जर्नलिस्ट फोरम नेपाल चैप्टर के अध्यक्ष रुद्र सुदेब, डॉ. आनंद पांडेय और सार्क जर्नलिस्ट फोरम, इंडिया चैप्टर के अध्यक्ष डॉ. सुधांशु अनिरुद्ध उपस्थित रहे। मंच संचालन का कुशल दायित्व डॉ. सुधांशु अनिरुद्ध ने निभाया।

​कार्यक्रम की शुरुआत में पुस्तक की भूमिका रखते हुए वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक डॉ. आनंद पांडेय ने कहा कि, “यह पुस्तक वर्तमान भारतीय विमर्श में एक सशक्त हस्तक्षेप और प्रामाणिक दस्तावेज है। समकालीन चुनौतियों को समझने के लिए यह हर वर्ग के लिए पठनीय है।”

​पुस्तक के विभिन्न पहलुओं पर बात करते हुए तिरुपति विश्वविद्यालय के प्रो. रामप्रकाश ने कालक्रम से भारत पर हुए ऐतिहासिक आक्रमणों को रेखांकित किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा:

​”भारत पर हुए आक्रमण केवल भूभाग को जीतने के प्रयास नहीं थे, बल्कि वे इस राष्ट्र की वैचारिक और आध्यात्मिक रीढ़ को तोड़ने की सुनियोजित कोशिशें थीं। इतिहास गवाह है कि तमाम झंझावातों के बाद भी भारत की सांस्कृतिक चेतना जीवित रही, और विप्लव जी की यह पुस्तक उन्हीं ऐतिहासिक सत्यों को आज के संदर्भ में हमारे सामने मजबूती से रखती है ताकि हम भविष्य की चुनौतियों के प्रति सचेत रह सकें।”

​वहीं, नेपाल से आए सार्क जर्नलिस्ट फोरम नेपाल के प्रेसिडेंट रुद्र सुदेब ने सांस्कृतिक सुरक्षा पर जोर देते हुए कहा कि, “यदि किसी भी राष्ट्र को समाप्त करना है, तो सबसे पहले उसकी संस्कृति को मिटा दो, राष्ट्र अपने आप समाप्त हो जाएगा। इस पुस्तक में भारत के खिलाफ चल रहे इसी सांस्कृतिक टकराव को सप्रमाण और ठोस तथ्यों के साथ रेखांकित किया गया है।”

​​समारोह की अध्यक्षता कर रही दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. स्मिता मिश्र ने अपने अध्यक्षीय भाषण में बेहद सारगर्भित विचार रखे। उन्होंने पुस्तक की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा:

​”‘भारत क्यों निशाने पर’ केवल एक शीर्षक नहीं, बल्कि हर सजग नागरिक के भीतर उठने वाला एक अनिवार्य प्रश्न है। लेखक ने वैश्विक नैरेटिव (narrative) और आंतरिक चुनौतियों का जो बारीक विश्लेषण किया है, वह सराहनीय है। यह पुस्तक हमें आत्मविस्मृति के दौर से बाहर निकालकर अपनी जड़ों पर गर्व करना और उन ताकतों को पहचानना सिखाती है जो भारत की प्रगति में बाधक हैं।”

इस अवसर पर शिक्षा, शोध और साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट एवं अद्वितीय योगदान हेतु एक विशेष सम्मान समारोह का भी आयोजन किया गया। मंच पर उपस्थित विद्वानों— प्रो. स्मिता मिश्रा, प्रो. रामप्रकाश, डॉ. आनंद पांडेय, रुद्र सुदेब और पुस्तक के लेखक विप्लव विकास को प्रतिष्ठित ‘पद्म भूषण पंडित राहुल सांकृत्यायन शिक्षा विरासत सम्मान-2026’ से सम्मानित किया गया।

​कार्यक्रम के समापन पर सार्क जर्नलिस्ट फोरम के विभिन्न देशों से आए प्रतिनिधि पत्रकारों, स्थानीय लेखकों और प्राध्यापकों का आभार व्यक्त करते हुए पुस्तक के लेखक विप्लव विकास ने धन्यवाद ज्ञापन किया। भावुक और ऊर्जावान शब्दों में अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा:

​”हमारे पूर्वज अत्यंत पराक्रमी थे। उन्होंने हमें बौद्धिक संपदा की बहुत ही समृद्ध पूंजी सौंपी है। उस विरासत को और अधिक समृद्ध करना तथा विशुद्ध भारतीय दृष्टिकोण से भारत का विमर्श खड़ा करना आज की पीढ़ी का सबसे बड़ा दायित्व है। यह शोध पुस्तक उसी दायित्व निर्वहन की दिशा में मेरा एक छोटा सा, लेकिन पूरी तरह ईमानदार और संकल्पित प्रयास है।”

​समारोह के अंत में राष्ट्रगान के साथ इस बौद्धिक कार्यक्रम का समापन हुआ, जिसने उपस्थित जनसमूह के दिलों में एक गहरी वैचारिक छाप छोड़ी।

जब अभद्रता को “कूल” कहा जाने लगे

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अक्षय शर्मा

नोएडा । महिला अधिकारों और समानता की बात आज पूरी दुनिया में हो रही है, और होनी भी चाहिए। क्योंकि जिस महिला के योगदान से परिवार, समाज और सृष्टि का जीवन चक्र आगे बढ़ता है, उसके सम्मान और अधिकारों पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता। लेकिन आज बात अधिकारों की नहीं, बल्कि उस सामाजिक बदलाव की है जिस पर चर्चा शायद असहज लगे, पर आवश्यक है।

देश के बड़े महानगर हों या छोटे शहर, महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रही हैं। यह परिवर्तन स्वागत योग्य है और एक विकसित समाज की पहचान भी। लेकिन इसी बदलाव के बीच एक ऐसी प्रवृत्ति तेजी से सामान्य होती जा रही है, जिस पर शायद हम खुलकर बात करने से बचते हैं।

आज सार्वजनिक जीवन में गाली-गलौज और अभद्र भाषा को कई बार “बोल्डनेस”, “बिंदासपन” और “कूल” होने का प्रतीक बना दिया गया है। चाय की दुकानों से लेकर मॉल, कैफे, दफ्तरों और सोशल मीडिया तक सामान्य बातचीत में अपशब्दों का इस्तेमाल अब असामान्य नहीं रहा।

यह लेख किसी एक वर्ग को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास नहीं है। गालियां कभी केवल पुरुषों तक सीमित नहीं थीं और न आज किसी एक वर्ग की समस्या हैं। लेकिन चिंता इस बात की है कि जिस व्यवहार को कभी गलत माना जाता था, उसे अब सामान्य और स्वीकार्य समझा जाने लगा है।

हमारे समाज में एक समय ऐसा भी था जब परिवार, माता-बहन या बुजुर्गों की मौजूदगी में लोग शब्दों की मर्यादा का विशेष ध्यान रखते थे। अभद्र भाषा को शालीनता के विपरीत माना जाता था। आज स्थिति बदलती दिख रही है,पुरुष और महिलाएं दोनों ही कई बार सामान्य बातचीत में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करते दिखाई देते हैं, जिन्हें कभी सार्वजनिक संवाद का हिस्सा नहीं माना जाता था।

यहां सवाल महिलाओं या पुरुषों को नियंत्रित करने का नहीं है। असली प्रश्न यह है कि क्या समानता का अर्थ हर अच्छी और बुरी आदत को समान रूप से अपनाना है? क्या आधुनिकता का मतलब संवाद की गरिमा को पीछे छोड़ देना है? और क्या स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि शब्दों की मर्यादा अप्रासंगिक हो जाए?

भारत केवल भौगोलिक सीमाओं से बना देश नहीं, बल्कि विविध संस्कृतियों, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों का संगम है। आधुनिक होना आवश्यक है, लेकिन यदि आधुनिकता शालीनता और संवाद की गरिमा को कमजोर करने लगे, तो उस पर विचार होना चाहिए।

समाज की पहचान केवल उसकी तकनीक, आर्थिक विकास या जीवनशैली से नहीं होती, बल्कि उसकी भाषा और व्यवहार से भी होती है। इसलिए बदलाव की शुरुआत किसी कानून या अभियान से पहले स्वयं से होनी चाहिए। पुरुष हो या महिला,यदि हम सार्वजनिक जीवन और पारिवारिक वातावरण में भाषा की गरिमा बनाए रखने का संकल्प लें, तो शायद आने वाली पीढ़ियों को संवाद का एक बेहतर संस्कार दे सकें।

अमेरिका में भारत व हिंदू विरोधी ताकतें फिर सक्रिय

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कोलकाता । पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक विजय के बाद अमेरिका में बैठा भारत व हिन्दू विरोधी गैंग फिर से जाग उठा है क्योंकि बंगाल लहराता भगवा उसे पसंद नहीं आ रहा है। बंगाल में हिंदुत्व की विजय से छद्म धर्मनिरपेक्ष लॉबी को नींद नहीं आ रही है। अमेरिका से जैसे समाचार आ रहे हैं उससे यह स्पष्ट हो रहा है कि बंगाल चुनावों के दौरान बीजेपी को रोकने के लिए जो प्रयास किए जा रहे थे उनको अमेरिकी डीप स्टेट का संरक्षण प्राप्त था। विगत दिनों सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान कॉकरोच शब्द का प्रयोग कर दिया देखते देखते अमेरिका मे बैठे कुछ लोगों ने इसे पकड़ लिया और कॉकरोच जनता पार्टी बना दी। इस पार्टी का संस्थापक आम आदमी पार्टी का ही संस्थापक सदस्य अभिजीत दीपके है।

कॉकरोच जनता पार्टी के नाम पर कहा जाने लगा कि अगर युवाओ की बात नही सनी गई तो यह कॉकरोच जनता पार्टी जिसके दो करोड़ से अधिक सोशल मीडिया फॉलोअर बन चुके हैं, देश में क्रांति कर देगी। भारत की विरोधी पार्टियों ने कॉकरोजनता पार्टी को हाथों हाथ लिया और टीवी चैनलों पर बहस के दौरान इस पार्टी का भय दिखाने लगे। ये भूल गए कि धरातल पर भारतीय जनता पार्टी दुनिया के 14 करोड़ से अधिक कार्यकर्ता काम कर रहे हैं।

अमेरिका की एक संस्था “यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम” कथित रूप से दुनिया भर में धार्मिक स्वतंत्रता के लिए काम करती है। ये संस्था स्वयं को धार्मिक आजादी की स्वयंभू पहरेदार और रक्षक मानती है। वास्तविकता यह है कि यह संस्था सनातन हिंदू धर्म के प्रति अपनी कुंठित मानसिकता के कारण जानी जाती है और अवसर मिलते ही हिंदुओं के प्रति विकृत घृणा का प्रदर्शन करती दिखाई देती है। यह संस्था हिंदुओं के प्रति नफरत से भरी हुई है । इस संस्था ने भारत में ”धार्मिक आजादी खतरे में है” का दुष्प्रचार किया है। इस बार इसके निशाने पर तीन मुख्यमंत्री हैं उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ, असम के हिमंता बिस्वा सरमा और उत्तराखंड के पुष्कर सिंह धामी। पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत के बाद इस सूचि में स्वाभाविक रूप से शुभेंदु अधिकारी का नाम भी जुड़ गया है ।

इसी अमेरिकी संस्था की एक सुनवाई में अपने आप को तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता व पत्रकार बताने वाला रकीब हमीद नाइक भी पंहुचा और उसने इन लोकप्रिय मुख्यमंत्रियों पर जहर उगलते हुए इन पर रोक लगाने की मांग की।रकीब अहमद नाइक मूल रूप से कश्मीर का रहने वाला है और उसका एकमात्र कार्य भारत विरोध है। यह हिंदुत्व वाच के नाम से एक संगठन भी चलाता है जिसका काम हिंदुत्व को घृणा व नफरत के तौर पर ट्रैक करना। रकीब का ये संगठन भारत में भी हिंदू राष्ट्रवाद की निगरानी करता है। यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम” का अपना एक राजनीतिक एजेंडा है जिसके तहत उसने हिंदू घृणा व नफरत से भरपूर रकीब को मंच दिया गया।

हिंदू विरोधी एजेंडे के अंतर्गत ही रकीब ने तीनों मुख्यमंत्रियो के खिलाफ जहर उगला गया क्योंकि ये तीनों ही मुख्यमंत्री हिदुओं को एकजुट और जागरुक करने के लिए कार्य कर रहे हैं। उत्तर प्र्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में अयोध्या में दिव्य व भव्य राम मंदिर बना, प्रदेश के सभी धार्मिक स्थलों का विकास हो रहा है, प्रदेश में गोवध व लव जिहाद की रेाकथाम के लिए कानून बना है, माफियाओं के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जा रही है । तीनों ही राज्यों में मतांतरण की रोकथाम के लिए कड़े कदम उठाए जा रहे हैं। तीनों ही राज्यों में बांग्लादेशी घुसपैठ के खिलाफ कार्यवाही हो रही है। असम व उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू हो चुकी है। घुसपैठिए भारत छोड़ने के लिए मजबूर हो रहे हैं। अमेरिका में बैठे हिन्दू विरोधियों को ये रास नहीं आ रहा है ।

फिलहाल तो सोशल मीडिया पर जन्मी कॉकरोच जनता पार्टी, सोशल मीडिया पर धूल चाट चुकी है अब देखते हैं कि इनका अगला पैंतरा क्या होगा ?

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