RSS’s biggest meeting to be held at Madhav Srishti, Samalkha

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– 1,487 representatives from across the country will gather for the Akhil Bharatiya Pratinidhi Sabha from March 13–15

– Discussions to focus on centenary year programmes, social challenges, and organizational expansion

– Grih Sampark Abhiyan has already connected with over 10crore households in few of the states from across India during the centenary year

– Discussion will be held on programmes related to the 650thbirth anniversary of Sant Shiromani Ravidas

Samalkha (Panipat): Meeting of “Akhil Bharatiya Pratinidhi Sabha” The Highest decision taking body of Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) will be held from March 13 to March 15 at the Madhav Srishti campus in Samalkha. A total of 1,487 representatives from across the country, including members of the RSS and organizations inspired by it, will participate in this three-day meeting. This information was shared by Sh. Sunil Ambekar, the Akhil Bhartiya Prachar Pramukh of the RSS, during a press conference held at the Madhav Srishti campus. He was joined on the stage by Sh. Pawan Jindal, the Uttar Kshetra Sanghchalak of RSS. Ambekar stated that the meeting will begin at 9 am on 13March in the presence of Sarsanghchalak Dr. Mohan Bhagwat and Sarkaryavah Dattatreya Hosabale. The gathering will include senior RSS office-bearers, Kshetra and Prantsanghchalaks, karyavahs, pracharaks, and top representatives from 32 inspired organizations.

He further stated that centenary year programmes of the RSS are currently being conducted across the country. The meeting will review the progress of these activities and deliberate on future plans. As part of the centenary celebrations, a nationwide GrihaSampark Abhiyan has already reached over 10 crore households in few of states and the campaign will continue in the remaining regions in the coming days. The meeting will also discuss programmes related to the 650th birth anniversary of Sant Shiromani Ravidas, which will be observed across the country from February 1 this year until February 20 next year, with a focus on promoting the message of social harmony.

Ambekar added that on the final day of sabha- 15 March, Sarkaryavah Dattatreya Hosabale will address the media and share details about the decisions taken during the meeting, along with responding to journalists’ questions.

During this time, Akhil Bharatiya Sah Prachar Pramukh Narendra Thakur, Akhil Bharatiya Sah Prachar Pramukh Pradeep Joshi, and Uttar Kshetra Prachar Pramukh Anil Kumar were present.

Discussion on Contemporary Social Issues

Representatives from across the country will share their experiences related to social and cultural work in their respective regions. Based on these inputs, the meeting will also deliberate on current social challenges and evolving circumstances in society.

Leaders from 32 Affiliated Organizations to Attend

Ambekar said that national-level office bearers of organizations inspired by the RSS will participate as special invitees. These include Advocate Alok kumar and Milind Parande from Vishva Hindu Parishad, Dr Raghuraj kishor and Ashish chauhan from Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad, Shanta akka and A Sita from Rashtriya Sevika Samiti, Bharatiya Janata Party President Nitin Nabin and officials of Bhartiya majdoor sangh, Bhartiya kisan sangh etc.

Organizational Expansion- Over 5500 New Shakhas in a Year

Ambekar said that organizational expansion will also be a key topic of discussion. Over the past year, more than 5500 new RSS shakhas have been started across the country. Interest in joining the organization through digital platforms is also steadily increasing. Every year, around 1.25 lakh people express their willingness to join through the “Join RSS” digital initiative.

Large-Scale Training Programmes

Ambekar further informed that training activities will also be conducted on a large scale during the centenary year. A total of 97 training camps will be organized across the country. In addition, 25 special Jeevan-Vrat Prashikshan Varg will be held for individuals in the 40 to 65 age group.

बंगाल को क्यों बचाने की ज़रूरत है ?

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— गोपाल सामंतो

कोलकाता : आज जब सम्पूर्ण देश राष्ट्रगीत “वन्दे मातरम्” की पंक्तियों के बीच एक सम्पूर्ण जीवन शैली की खोज और प्रसंस्करण में व्यस्त है, ठीक उसी समय बंगाल — उस पुण्यभूमि में जहाँ यह गीत लिखा गया था — इस गीत के माध्यम से पुनः एक क्रांति की आवश्यकता महसूस की जा रही है। निश्चित ही इस बार की लड़ाई में कोई विदेशी ताकत या सेना सामने नहीं है, अपितु यह वैचारिक अंतर्द्वंद से उपजा एक वृहद् सांस्कृतिक विचलन है, जिससे एक आम बांग्लाभाषी जूझता हुआ नज़र आ रहा है।

बंगाल की बात हो और देश के प्रति उसके ऐतिहासिक योगदान की चर्चा न हो, तो कोई भी विमर्श अधूरा लगता है। अध्यात्म से विज्ञान तक और औद्योगिकीकरण से चलचित्र तक — बंगाल और बंगालियों के योगदान को समेटकर लिखने में ही दशकों बीत जाएँगे। सम्पूर्ण विश्व पटल पर जिस प्रकार आज स्वामी विवेकानन्द सनातन के प्रतीक हैं, ठीक उसी प्रकार नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और खुदीराम बोस भी बलिदान के अमर चिह्न के रूप में हर भारतीय के हृदय में बसते हैं।

बंगाल वह भूमि है जिसने असंख्य सपूत भारत माँ के चरणों में अर्पित किए हैं, ताकि देश सुरक्षित रहे और राष्ट्रप्रेम जागृत बना रहे। आज भी गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर और शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की रचनाओं से प्रेरित होकर सिनेमा बन रहे हैं। ज़रा सोचिए — उनके विचार सौ वर्षों से भी अधिक पुराने होने के बावजूद आज भी कितने प्रासंगिक हैं।

ऋषि अरविन्द ने एक बार कहा था कि रास्ते पर ठोकर लगने से ही मनुष्य चलना सीखता है। लेकिन यदि बंगाल की वर्तमान पृष्ठभूमि को देखा जाए, तो ऐसा प्रतीत होता है कि बांग्लाभाषी भद्रलोक ने ठोकरों में ही अपना जीवन खोज लिया है और इन सब बातों से ऊपर उठकर एक काल्पनिक विचारधारा गढ़ ली है।

एक समय था जब मूलभूत विषयों के लिए पूरा भारतवर्ष बंगाल की ओर देखता था — चाहे वह स्वास्थ्य हो या मशीनी उपकरण। इसलिए कहा जाता था कि “जो बंगाल आज सोचता है, शेष भारत उसे कल सोचता है।”

शायद इन्हीं बातों ने बंगाल के अस्तित्व को नज़र लगा दी और आज बंगाल उस स्थिति में पहुँच गया है जहाँ उसका रक्तरंजित वर्तमान उसके गौरवशाली इतिहास को मिटाने में लगा हुआ है। जिस भद्रलोक ने बंगाल का स्वर्णिम इतिहास रचा था, आज उसी के हाथों में जबरन स्याही पोतकर नया इतिहास लिखवाने की चेष्टा की जा रही है।

ऐसी भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर दी गई है कि बंगालियों का एक बड़ा वर्ग वैभव की आकांक्षा छोड़कर दरिद्रता की प्रतियोगिता में अपनी पूरी बौद्धिक क्षमता झोंक रहा है। 35 वर्षों के कम्युनिज़्म के मीठे ज़हर को चखते-चखते दो-तीन पीढ़ियाँ समाप्त हो गईं और जब उसके बाद नए फ्लेवर में ममता काल आया, तो आम बंगाली को इस मायाजाल में फँसने का एहसास ही नहीं हो पाया।

ज़रा समझिए कि इस बौद्धिक समाज ने स्वयं को कैसे विभाजित कर लिया है — कई टुकड़ों में। शायद इन्हीं कारणों से इस समाज और बांग्लाभूमि में दो बार राजनीतिक विभाजन और एक बार सामूहिक विस्थापन संभव हो सका। आज भी हम उसी राह पर चल रहे हैं।

बांग्लादेश से 1947 के पहले आए बंगालियों को “बांगाल” कहा जाता है। 1947 के बाद जो बंगाली भारत आए, उन्हें “रिफ्यूजी बंगाली” कहा जाता है। बंगाल के बाहर बसे हुए बंगालियों को “प्रवासी बंगाली” कहा जाता है और इन सबके ऊपर एक वर्ग है — “ऐदेशी बंगाली”, जिनके पूर्वज पश्चिम बंगाल में ही रहे और जिनका पूर्वी बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) से कोई संबंध नहीं रहा।

विडम्बना देखिए कि इस विभाजन को आज भावनाओं का जामा पहनाकर फुटबॉल टीमों के नामों तक में बाँट दिया गया है।

अपने मातृभूमि के इस पतन के विरुद्ध हर बांग्लाभाषी के भीतर रोष है और कुछ कर गुजरने की इच्छा भी। इन्हीं इच्छाओं को एकत्रित करके कुछ बंगालियों ने “Save Bengal Save India” नामक मुहिम की शुरुआत की है। इस मुहिम के पीछे मुख्यतः प्रवासी बंगाली ही हैं, जो बंगाल को उस दृष्टि से देख पा रहे हैं जहाँ से बंगाल के भीतर रहने वाला व्यक्ति नहीं देख पा रहा।

जिस प्रकार किसी स्थान का सटीक नक्शा बनाने के लिए उसका एरियल व्यू लिया जाता है, उसी प्रकार यदि बंगाल की वर्तमान राजनीतिक-सामाजिक स्थिति का विश्लेषण करना हो तो वे लोग अधिक सक्षम हैं जो बंगाल को पूरे देश के संदर्भ में देख और समझ सकते हैं।

सच कहा जाए तो आज यह एक स्वर में कहा जा सकता है कि जो बांग्लाभाषी बंगाल के बाहर रहते हैं, वे अधिक खुशहाल और संपन्न हैं। यह सम्पन्नता केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि बौद्धिक भी है।

इसी कारण बंगाल के बाहर रहने वाले बंगाली स्वयं को अलग से “हिन्दू बंगाली” कहकर परिभाषित नहीं करते। जबकि बंगाल में आज बांग्लाभाषियों की सबसे बड़ी समस्या स्थायी पहचान की हो गई है, इसलिए उन्हें कहना पड़ता है कि वे “हिन्दू बंगाली” हैं।

“बंगाली” शब्द स्वयं में एक सांस्कृतिक पहचान का परिचायक है। सामान्यतः इस्लाम में भाषाई समुदायों के आधार पर अलग पहचान नहीं बनती। ईरान हो, बांग्लादेश हो या फिर पश्चिम बंगाल—इस्लाम धर्म में कलमा भी एक है और आराध्य भी एक ही है। फिर भी बंगाल में बसे मुस्लिमों को कम्युनिस्ट काल से “मुस्लिम बंगाली” की परिभाषा देकर भद्रलोक समाज ने अनजाने में अपनी ही धार्मिक पहचान और अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।

बंगाल के बाहर बसे बंगालियों को मूल रूप से चार वर्गों में बाँटा जा सकता है। पहला वर्ग उन बंगाली परिवारों का है जो सौ वर्षों से भी अधिक समय पहले बंगाल से अलग हो चुके हैं। अंग्रेज़ों ने इन्हें उनकी शैक्षणिक योग्यताओं के कारण देश के विभिन्न प्रांतों में बसाया और समाजहित में स्वास्थ्य, शिक्षा और अभियांत्रिकी जैसे क्षेत्रों में लगाया।

दूसरा वर्ग उन बंगाली परिवारों का है जो बेहतर पेशेवर अवसरों की तलाश में बंगाल से बाहर दूसरे राज्यों में पहुँचे और वहीं बस गए। कहा जा सकता है कि यह बौद्धिक पलायन नक्सल आंदोलन के दौर में तेज़ हुआ। इनके पलायन के साथ ही बंगाल के औद्योगिक ढाँचे के कमजोर होने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई।

तीसरा वर्ग उन परिवारों का है जो बेरोज़गारी और बंगाल के आर्थिक पतन के कारण मजबूर होकर दूसरे राज्यों में पलायन कर गए। इस वर्ग में उच्च शिक्षित लोग भी हैं और श्रमिक वर्ग से जुड़े लोग भी।

आज ये तीनों वर्ग भले ही बंगाल के बाहर रहते हों, लेकिन बंगाल की संस्कृति से उनका जुड़ाव आज भी जीवंत है। बंगालियों के आहार-विहार में भौगोलिक परिस्थितियों का बहुत कम प्रभाव पड़ता है। बंगाली चाहे न्यूयॉर्क में रहे या कोलकाता में, वह पंचांग के अनुसार पुष्पांजलि देना नहीं भूलता। आज भी “महालया” की आवाज़ भर से हर बंगाली के मन में उत्सव का उत्साह भर जाता है।

“Save Bengal Save India” मुहिम पूरी तरह एक डिजिटल अभियान के रूप में शुरू हुई। शुरूआती कुछ ही हफ्तों में इसने छत्तीसगढ़ के लगभग सभी जिलों के बंगाली समाज के सदस्यों के बीच अपनी जगह बना ली। इसके बाद यह अभियान मध्य प्रदेश के कुछ जिलों तक भी डिजिटल रूप से पहुँच गया।

इस मुहिम का उद्देश्य देश के विभिन्न राज्यों में बसे बंगाली समाज को एक मंच पर लाना है। भावनात्मक विभाजनों से ऊपर उठकर उन्हें पुनः बंगाल से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। साथ ही बंगाल में रहने वाले लोगों के बीच यह विचार स्थापित करना भी इस अभियान का लक्ष्य है कि बंगाली चाहे कहीं भी हो, वह पहले एक है और राष्ट्रीयता की भावना से जुड़ा हुआ है।

यह भी आश्चर्य की बात है कि केंद्र सरकार ने बांग्ला भाषा को देश में “क्लासिकल भाषा” का दर्जा दिया, लेकिन बंगाल में रहने वाले अधिकांश लोग इस बात से या तो अनभिज्ञ रहे या इसके महत्व को समझ नहीं पाए। राजनीतिक मायाजाल के कारण वहाँ के लोग प्राप्त सम्मान को भी संदेह की दृष्टि से देखने लगे हैं।

लेकिन हमें यह समझना होगा कि इसका प्रतिकूल प्रभाव हम जैसे बंगालियों पर पड़ता है, क्योंकि हमें बंगाल के बाहर भी जीवनयापन करना है। नॉन-बंगालियों के साथ हमारा संबंध इतना गहरा हो चुका है कि अब हम बंगाली होने के साथ-साथ भारतीय होने की पहचान को भी समान रूप से जी रहे हैं।

यह भारतीयता और राष्ट्रीयता की भावना को बंगाल के लोगों के बीच स्थापित करने का कार्य प्रवासी बंगाली अपेक्षाकृत अधिक सहजता और तार्किकता से कर सकते हैं।

बंगाल आज भी वह राज्य है जहाँ से हर वर्ष लगभग 50,000 युवा भारतीय सेना में भर्ती होकर देश की रक्षा का संकल्प लेते हैं। यह आँकड़ा इस बात का प्रमाण है कि बंगाल के गाँव-गाँव में आज भी राष्ट्रीयता जीवित है।

“Save Bengal Save India” अभियान के माध्यम से छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों में स्थित लगभग 130 बंगाली कालीबाड़ियों में पहुँचकर वहाँ के सदस्यों के साथ बैठकें की गईं और उन्हें इस अभियान से जोड़ा गया। सदस्यता प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए बारकोड आधारित सदस्यता प्रणाली शुरू की गई। इस बारकोड को पोस्टरों पर छापकर हर कालीबाड़ी में लगाया गया, जिससे बड़ी संख्या में लोग इस अभियान से जुड़ सके।

मध्य प्रदेश के जबलपुर और भोपाल जैसे शहरों में भी यह अभियान पहुँच चुका है और वहाँ के बंगाली समाज के बीच यह काफी लोकप्रिय हो गया है। इस अभियान से जुड़ने वाला प्रत्येक बंगाली कहीं न कहीं बंगाल के खोए हुए वैभव को पुनः स्थापित होते देखना चाहता है।

आज बंगाल में धार्मिक और सामाजिक उदारीकरण के नाम पर हो रहे सांस्कृतिक पतन से देश और दुनिया में बसे अनेक बंगाली चिंतित हैं। वे परिवर्तन की प्रतीक्षा कर रहे हैं और उसमें अपनी भागीदारी निभाना चाहते हैं।

इसी क्रम में रायपुर में “छत्तीसगढ़ हिंदू बंग सम्मेलन” का आयोजन भी किया गया, जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में पद्मश्री कार्तिक महाराज उपस्थित रहे। उन्होंने बंगाली समाज को यह समझाने का प्रयास किया कि यदि इस अंतिम संघर्ष में आम बंगाली हार गया, तो बंगाल एक नए विभाजन की ओर बढ़ सकता है और लाखों लोग फिर एक त्रासदी का सामना करने को मजबूर हो सकते हैं।

इस कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के कई जिलों से बंगाली समुदाय के लोगों ने स्वस्फूर्त भागीदारी की। यह इस बात का संकेत है कि बंगाली समाज के हर व्यक्ति के मन में अन्याय के खिलाफ एक लौ जल रही है, लेकिन उस लौ को मशाल में बदलने के लिए अभी पर्याप्त मंच उपलब्ध नहीं है।

कुछ लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि बंगाल को बचाने की आवश्यकता आखिर क्यों है। इसके उत्तर में कुछ उदाहरण पर्याप्त होंगे।

जिस बंगाल को माँ दुर्गा की पुण्यभूमि कहा जाता है, वहीं दुर्गा विसर्जन यात्रा के लिए कई बार न्यायालय का आदेश लेना पड़ता है। विसर्जन यात्रा को “कार्निवल” का नाम देकर उसे एक अलग स्वरूप दे दिया गया है।

मुर्शिदाबाद में बंगालियों के घरों में आग लगा दी गई, जिसमें कई लोग ज़िंदा जल गए। संदेशखाली की घटनाओं ने भी पूरे समाज को झकझोर दिया, जहाँ महिलाओं के साथ अत्याचार के आरोप सामने आए।

कोलकाता जैसे भद्र शहर में खुलेआम बीफ की बिक्री होने लगी है। बंगाल में गौ-हत्या के आरोपों और सीमा पार से घुसपैठ को लेकर भी लगातार बहस होती रही है। कई क्षेत्रों में जनसांख्यिकीय बदलाव भी एक राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का विषय बना हुआ है।

बंगाल सरकार के बजट में मदरसा बोर्ड के लिए 5713 करोड़ रुपये का प्रावधान भी बहस का विषय बना है। आलोचक प्रश्न उठाते हैं कि इन संस्थानों से समाज को किस प्रकार का भविष्य मिलेगा।

यह सूची बहुत लंबी है। सांकेतिक रूप से इतने उदाहरण ही पर्याप्त हैं यह समझने के लिए कि कुछ लोगों के अनुसार बंगाल के भविष्य को लेकर चिंताएँ क्यों व्यक्त की जा रही हैं।

यदि आज भी बंगाली समाज नहीं जागा, तो संभव है कि बहुत देर हो जाए।

—( श्री सामंतो Save Bengal Save India मूवमेंट के फाउंडर हैं)

स्वराज्य ही उनके लिए सर्वस्‍व था : छत्रपति संभाजी महाराज

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-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । भारतीय इतिहास के पन्नों को जब भी पलटा जाएगा, तब वीरता, संघर्ष और स्वराज्य की रक्षा के प्रेरणापुंज छत्रपति संभाजी महाराज का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाएगा। उनका संपूर्ण जीवन अदम्य साहस, अटूट आत्मसम्मान और धर्म तथा स्वराज्य के लिए सर्वोच्च बलिदान की प्रेरक गाथा है। 11 मार्च 1689 का दिन भारतीय इतिहास में उस अमर क्षण के रूप में अंकित है, जब ‘स्वराज्य’ के इस महान रक्षक ने औरंगजेब की इस्‍लामिक जिहादी क्रूर यातनाओं के सामने झुकने की बजाय अपने प्राणों का बलिदान देना ही उचित माना। यही कारण है कि उन्हें भारत के राष्‍ट्रीय चेतना के हिन्‍दू-सनातन भाव भरे इतिहास में स्वराज्य रक्षक के रूप में स्मरण किया जाता है।

छत्रपति संभाजी महाराज का जन्म 14 मई 1657 को पुरंदर किले में हुआ था। उनकी माता साईबाई थीं, जो छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रथम पत्नी थीं। दुर्भाग्य से संभाजी महाराज की माता का निधन तब हो गया जब वे मात्र दो वर्ष के थे। इसके बाद उनका पालन-पोषण उनकी दादी वीरमाता जीजाबाई ने किया। जीजाबाई ने बचपन से ही उनमें धर्म, साहस, स्वाभिमान और स्वराज्य की रक्षा के संस्कार भर दिए। यही संस्कार आगे चलकर उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी शक्ति बने।

प्रसिद्ध इतिहासकार जदुनाथ सरकार अपनी पुस्तक ‘शिवाजी एंड हिज टाइम्स’ में लिखते हैं, “शिवाजी की पहली पत्नी साईबाई से 14 मई 1657 को उनके ज्येष्ठ पुत्र संभाजी का जन्म हुआ।” (पृष्ठ 64) यह दिन उस महान व्यक्तित्व की शुरुआत है जिसने आगे चलकर मराठा साम्राज्य की रक्षा में अद्वितीय भूमिका निभाई। संभाजी महाराज बचपन से ही अत्यंत तेजस्वी, साहसी और बुद्धिमान थे। मात्र नौ वर्ष की आयु में उन्हें 1665 की पुरंदर संधि के बाद मुगलों के पास राजनीतिक बंधक के रूप में भेजा गया। वहाँ उन्हें आमेर के राजा जयसिंह प्रथम के साथ रहना पड़ा। मुगल दरबार की राजनीति, कूटनीति और शक्ति के स्वरूप को उन्होंने बहुत निकट से देखा। यह अनुभव उनके जीवन का पहला राजनीतिक पाठ था, जिसने उनके व्यक्तित्व को और अधिक दृढ़ बना दिया।

इतिहासकार स्टुअर्ट गॉर्डन ‘द मराठाज 1600–1818’ पुस्तक में लिखते हैं कि “बचपन में ही संभाजी ने असाधारण बुद्धिमत्ता और साहस का परिचय दिया, जिसने आगे चलकर उनके नेतृत्व को आकार दिया।”(पृष्ठ 88)। वस्‍तुत: 1680 में छत्रपति शिवाजी महाराज के निधन के बाद मराठा साम्राज्य में उत्तराधिकार को लेकर संकट उत्पन्न हो गया। शिवाजी महाराज की दूसरी पत्नी सोयराबाई अपने पुत्र राजाराम को सिंहासन पर बैठाना चाहती थीं। इससे राज्य में राजनीतिक संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई। लगभग नौ महीनों तक चली इस स्थिति के बाद सेनापति हम्बीरराव मोहिते और अन्य प्रमुख मराठा सरदारों के समर्थन से 1681 में संभाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ और वे मराठा साम्राज्य के छत्रपति बने।

इसका विस्‍तारित उल्‍लेख इतिहासकार गोविंद सखाराम सरदेसाई ने पुस्तक ‘न्यू हिस्ट्री ऑफ द मराठाज खंड 1’ में बहुत विस्‍तार से किया है, उनका कहना हैकि “संक्षिप्त संघर्ष के बाद 1681 में संभाजी ने प्रमुख मराठा सरदारों के समर्थन से सिंहासन ग्रहण किया।”(पृष्ठ 322)। छत्रपति बनने के बाद संभाजी महाराज ने अपने पिता की स्थापित हिंदवी स्वराज्य की परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्होंने प्रशासन को सुदृढ़ किया, योग्य अधिकारियों की नियुक्ति की और आठ मंत्रियों की परिषद को सक्रिय बनाए रखा। उन्होंने न्याय व्यवस्था को मजबूत किया और प्रजा के कल्याण को सर्वोपरि माना। उनके शासन में अनुशासन, संगठन और प्रशासनिक क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण देखने को मिलता है।

संभाजी महाराज एक महान योद्धा होने के साथ ही विद्वान और साहित्यप्रेमी भी थे। उन्हें संस्कृत और मराठी भाषा का गहन ज्ञान था। उन्होंने बुधभूषण, नायिकाभेद और सतशतक जैसी साहित्यिक रचनाएँ भी कीं। इससे यह स्पष्ट होता है कि वे युद्ध के साथ-साथ संस्कृति और ज्ञान के भी संरक्षक थे। इतिहासकार कमल गोखले अपनी पुस्तक ‘संभाजी’ में उनके इस व्‍यक्‍तित्‍व के गुण पर गहराई से प्रकाश डाला है, वे लिखती हैं, “लगातार युद्धों के बावजूद संभाजी ने साहित्य और विद्वता को प्रोत्साहित किया और स्वयं संस्कृत ग्रंथों की रचना की।”(पृष्ठ 145)।

दूसरी ओर यह भी उनके जीवन का बड़ा सत्‍य है कि संभाजी महाराज का अधिकांश शासनकाल युद्धों में बीता। मुगल सम्राट औरंगजेब इस्‍लाम की जिहादी मानसिकता की पराकाष्‍ठा तक भरा हुआ था, उसे हिन्‍दू एक आंख नहीं सुहाते थे, ऐसे में वो हिन्‍दवी स्‍वराज्‍य को कैसे स्‍वीकार्य कर सकता था, वो मराठा साम्राज्य को समाप्त करना चाहता था। इसी उद्देश्य से वह स्वयं विशाल सेना लेकर दक्षिण भारत आ गया। 1682 से 1688 तक संभाजी महाराज ने मुगलों, पुर्तगालियों और अन्य शत्रुओं के विरुद्ध लगातार युद्ध किए। उन्होंने अपने पिता शिवाजी महाराज की गुरिल्ला युद्ध नीति को अपनाया। इस युद्ध नीति में अचानक आक्रमण करना, घात लगाकर हमला करना और तुरंत पीछे हट जाना शामिल था। इस रणनीति के कारण मुगलों की विशाल सेना भी मराठों के सामने कई बार असहाय हो जाती थी।

इतिहासकार जदुनाथ सरकार शिवाजी महाराज की गुरिल्ला युद्ध नीति पर विस्‍तार से लिखते हैं, और अपनी पुस्‍तक में संभाजी द्वारा इसके उपयोग पर गहराई से बात करते हैं, वे कहते हैं- “संभाजी ने शिवाजी की गुरिल्ला युद्ध नीति को आगे बढ़ाया और औरंगजेब का अत्यंत दृढ़ता से प्रतिरोध किया।”(जदुनाथ सरकार, हिस्ट्री ऑफ औरंगजेब, खंड 5, पृष्ठ 231)। हालाँकि 1687 में वाई के युद्ध में मराठा सेना के महान सेनापति हम्बीरराव मोहिते वीरगति को प्राप्त हो गए। इससे मराठा सेना का मनोबल प्रभावित हुआ और परिस्थितियाँ धीरे-धीरे कठिन होती गईं। अंततः 1 फरवरी 1689 को संगमेश्वर में शिरके कबीले के कुछ लोगों के विश्वासघात के कारण मुगल सेनापति मुकर्रब खान ने संभाजी महाराज को बंदी बना लिया। उनके साथ उनके प्रिय मित्र और विद्वान कवि कलश भी बंदी बनाए गए।

संभाजी महाराज को औरंगजेब के सामने प्रस्तुत किया गया। औरंगजेब ने कई दिनों तक उन्हें अमानवीय यातनाएँ दीं और इस्लाम स्वीकार करने के लिए दबाव डाला। लेकिन संभाजी महाराज अपने धर्म, स्वाभिमान और स्वराज्य के आदर्शों से तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने स्पष्ट रूप से यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। इतिहासकार सरदेसाई इस प्रसंग का वर्णन कुछ इस तरह से करते हैं, “अत्यंत कठोर यातनाओं के बावजूद संभाजी ने औरंगजेब के सामने झुकने से इंकार कर दिया।” उन्‍हें भयंकर प्रताड़नाएं दी गईं, कई दिन भूखा रखा गया, शरीर का रोम-रोम अलग कर दिया गया, किंतु स्‍वधर्म की रक्षा एवं हिन्‍दुत्‍व के लिए अपना सर्वस्‍व समर्पण कर चुके महान संभाजी महाराज को बहुत कष्‍ट देकर भी औरंगजेब उन्‍हें उनके विचारों एवं हिन्‍दुत्‍व के प्रति उनके संकल्‍प से डिगा न सका। (जी. एस. सरदेसाई, न्यू हिस्ट्री ऑफ द मराठाज, खंड 1, पृष्ठ 348)।

अंततः 11 मार्च 1689 को पुणे के निकट तुलापुर में भीमा नदी के तट पर उनका सिर कलम कर दिया गया। किंतु मृत्यु के उस अंतिम क्षण तक उनका साहस और आत्मबल अडिग रहा। अनेक ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, यातनाओं के बीच भी उनके मुख से हर हर महादेव और जय भवानी के उद्घोष निकलते रहे। वस्‍तुत: यह भारत में अपने समय में हुई एक राजा की मृत्यु नहीं थी, बल्कि धर्म, स्वाभिमान और स्वराज्य की रक्षा के लिए दिया गया अमर बलिदान था। संभाजी महाराज हुतात्‍मा हो चुके थे, पर उनके इस बलिदान ने मराठा साम्राज्य के संघर्ष को और अधिक प्रबल बना दिया। उनके बलिदान ने मराठा सैनिकों के भीतर नई ऊर्जा और संकल्प का संचार किया।

इतिहासकार स्टुअर्ट गॉर्डन ने लिखा, “संभाजी की शहादत मुगल प्रभुत्व के विरुद्ध प्रतिरोध का एक शक्तिशाली प्रतीक बन गई।” (द मराठाज 1600–1818, पृष्ठ 102)। आज भी संभाजी महाराज का जीवन हमें अपने हिन्‍दुत्‍व के लिए सर्वस्‍व बलिदान कर देने की प्रेरणा दे रहा । उनके जीवन का संदेश यही है कि जब राष्ट्र, धर्म और स्वतंत्रता पर संकट आए, तब एक सच्चा वीर अपने प्राणों की परवाह किए बिना संघर्ष करता है। आज 11 मार्च को उनकी पुण्यतिथि सिर्फ श्रद्धांजलि का अवसर नहीं है, यह हमें उनके आदर्शों को स्मरण करने और उनसे प्रेरणा लेने का अवसर प्रदान करती है।

जोधपुरी सैंडस्टोन की बनावट

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अशोक श्रीमाल

जयपुर : स्थानीय भाषा में जोधपुर क्षेत्र में उपयोग होने वाली पत्थर की पट्टियों को ‘छीन’ कहा जाता है। ये पत्थर केवल निर्माण सामग्री ही नहीं हैं, बल्कि मारवाड़ क्षेत्र की पारंपरिक वास्तुकला और सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी हैं। राजस्थान के शुष्क और गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में सदियों से इनका उपयोग घरों, हवेलियों, मंदिरों और किलों के निर्माण में किया जाता रहा है।

परंपरागत रूप से जोधपुर की पत्थर पट्टियाँ मारवाड़ की वास्तुकला की रीढ़ मानी जाती हैं। इन पत्थरों से बनी छतें, दीवारें और जालीदार खिड़कियाँ न केवल भवनों को मजबूत बनाती हैं, बल्कि उन्हें सौंदर्यात्मक रूप से भी आकर्षक बनाती हैं। विशेष रूप से इनका उपयोग स्लैब छतों के निर्माण में किया जाता है, जो गर्मी के मौसम में घरों के अंदर तापमान को संतुलित रखने में मदद करती हैं। इसके अलावा, इन पत्थरों पर की जाने वाली जालीदार नक्काशी मारवाड़ की पारंपरिक कला-कौशल का उत्कृष्ट उदाहरण है। ऐसी जालियाँ हवा के प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखते हुए घर के अंदर ठंडक बनाए रखने में सहायक होती हैं।

जोधपुरी सैंडस्टोन की बनावट अपेक्षाकृत मजबूत, टिकाऊ और मौसम के प्रभावों को सहन करने वाली होती है। इसकी सतह हल्की खुरदरी और परतदार संरचना वाली होती है, जिसके कारण इसे आसानी से काटकर विभिन्न आकारों में ढाला जा सकता है। यही विशेषता इसे वास्तुकला और शिल्पकला दोनों के लिए उपयुक्त बनाती है।

इन पत्थरों का सबसे महत्वपूर्ण गुण उनकी प्राकृतिक ताप-रोधक क्षमता है। रेगिस्तानी क्षेत्रों में जहां दिन में अत्यधिक गर्मी और रात में अपेक्षाकृत ठंडक होती है, वहां यह पत्थर घरों के भीतर तापमान को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दिन के समय यह बाहरी गर्मी को अंदर आने से काफी हद तक रोकते हैं और रात में अंदर की ठंडक को बनाए रखने में मदद करते हैं।

इसी कारण से पीढ़ियों से राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्रों में इन पत्थरों का उपयोग एक सतत, पर्यावरण-अनुकूल और प्राकृतिक ठंडक प्रदान करने वाले वास्तु समाधान के रूप में किया जाता रहा है। आधुनिक निर्माण तकनीकों के बावजूद आज भी पारंपरिक वास्तुकार और कारीगर इन पत्थरों को महत्व देते हैं, क्योंकि ये न केवल टिकाऊ होते हैं बल्कि स्थानीय जलवायु और सांस्कृतिक सौंदर्य के अनुरूप भी होते हैं।

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