वामपंथ हिंसक क्यों होता है?

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डॉ राजीव मिश्रा
लंदन: वामपंथ के जो मूल assumptions हैं, वे गलत हैं. वामपंथ के अनुसार संसाधन सीमित हैं और उनका वितरण ही संसार की मूल समस्या है. संसाधन असीमित हैं, मनुष्य हमेशा नए संसाधन खोज कर नई असीमित संपदा का सृजन कर सकता है.. यह बात सदियों से आँखों के सामने है लेकिन वामपंथ इसे स्वीकार नहीं कर सकता. क्योंकि उसके लिए सम्पदा, और उससे मिलने वाला जीवन स्तर महत्व की बात नहीं है, उस सम्पदा पर और प्रत्येक व्यक्ति के जीवन पर नियंत्रण महत्वपूर्ण है.

इसी का एक दूसरा पक्ष है… वामपंथ की दृष्टि में नॉलेज सीमित है. और जो नॉलेज एक ऑथोरिटी से आता है वही वैध है… जो उनकी किताब में लिखा है, जो उनके लीडर ने कह दिया, जो कार्ल मार्क्स लिख कर चला गया वही और उतना ही नॉलेज है. और जब उनके पास पूर्ण और परफेक्ट नॉलेज है तो उन्हें एक परफेक्ट वर्ल्ड बनाने में क्या बाधा हो सकती है? जो बाधा है वह यह कि उनके पास पॉवर नहीं है… बस, उन्हें पॉवर मिल जाए तो एक परफेक्ट वर्ल्ड, एक यूटोपिया खड़ा कर देंगे.

समस्या यह है कि उनका यह assumption गलत है. यह रियलिटी नहीं है. और रियलिटी से कोई नहीं लड़ सकता. अगर आपके पास सत्य है तो रियलिटी आपके साथ है.. दुनिया में सबसे बड़ा मित्र, सबसे शक्तिशाली सहयोगी कोई है तो वह है रियलिटी.

वामपंथ की लड़ाई रियलिटी से है. समस्या यह है कि वे रियलिटी से कैसे लड़ें? इसके लिए उन्हें सत्य को नियंत्रित करना होगा, सत्य का दमन करना होगा. फ्री मार्केट प्लेस ऑफ आइडियाज़ में उनके विचार खड़े नहीं हो सकते. उसके लिए उन्हें इस मार्केट प्लेस को कंट्रोल करना होगा… प्रचार से, झूठ से, और अंत में हिंसा से…

वामपंथ बिना हिंसा के एक दिन भी सर्वाइव नहीं कर सकता. उनकी लड़ाई सत्य से है और सत्य का एक ही प्रभावी शत्रु है… हिंसा. आप हिंसा से सत्य को नियंत्रित कर सकते हैं, तब तक जब तक आपका अस्तित्व न खत्म हो जाए.

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के शताब्दी विजयदशमी उत्सव में दिए गए भाषण पर इजरायल के मुंबई स्थित महावाणिज्य दूत यानिव रेवाच

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नागपुर। “मैं यहाँ आकर बहुत उत्साहित हूँ… मैं कल डॉ. मोहन जी से मिला था और हमने बातचीत की। हम समझते हैं कि भारत और इजरायल दोनों देश न केवल समान मूल्यों को साझा करते हैं, बल्कि दुर्भाग्य से समान चुनौतियों का भी सामना करते हैं। जब मैंने आज उनका भाषण सुना, तो डॉ. मोहन जी ने कहा कि हमें युवा पीढ़ी के साथ काम जारी रखना चाहिए… हमें भविष्य की ओर भी देखना चाहिए — प्रौद्योगिकी, शिक्षा — और साथ ही उन्हें विरासत से जोड़ना चाहिए — भविष्य और अतीत दोनों को एक साथ। यही काम हम इजरायल में भी करते हैं। हमें मिलकर काम करना चाहिए कि हम इजरायल और भारत के बीच संबंधों को मजबूत कैसे करें, न केवल सरकारी स्तर पर बल्कि लोगों-से-लोगों के स्तर पर भी।”

वह आगे कहते हैं, “डॉ. मोहन जी ने आज अपने भाषण में एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही: अगर हम अपनी पहचान और अपने मूल्यों को नहीं बनाए रखेंगे, तो हम देखेंगे कि यूरोप में क्या हो रहा है जब बाहरी ताकतें अस्थिर करने की कोशिश कर रही हैं। न केवल यूरोप में, बल्कि हम इसे भारत और इजरायल में भी देख रहे हैं। हमें अपनी पहचान को मजबूत करने के लिए काम जारी रखना होगा ताकि वे चरमपंथी वामपंथी मार्क्सवादी ताकतें हमारे मूल्यों को अस्थिर करने की कोशिश न कर सकें… हम देखते हैं कि यूरोप में क्या हो रहा है जब आप बहुत ज्यादा प्रगतिशील हो जाते हैं। आखिरकार, अगर हम अपनी जड़ों, विरासत और संस्कृति को नहीं बनाए रखेंगे, तो हम अपनी पहचान खो देंगे, और हम देख रहे हैं कि इसका क्या परिणाम होता है।”

कैप्टन स्मित मच्छर के संबंध में मोहन भागवत के बयान पर वे कहते हैं, “…हम देखते हैं कि कैप्टन स्मित यहीं भारत में पले-बढ़े और यहाँ के मूल्यों और नैतिकता के अनुसार बड़े हुए, और यही एक कारण है कि उन्होंने इस उड़ान के दौरान इतने सारे लोगों की जान बचाई।”

अल्बानिया का उदाहरण और संवैधानिक मर्यादा

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दिल्ली। विपक्ष कुछ समय से हाथ में संविधान लेकर राजनीति कर रहा है। लेकिन व्यवहार में संवैधानिक संस्थाओं पर एक के बाद एक हमला जारी है। चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट और चुनावी प्रक्रिया पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। अप्रैल 2024 में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम चुनाव आयोग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम और वीवीपैट संबंधी याचिकाओं को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि ईवीएम सुरक्षित, सरल और उपयोगकर्ता-अनुकूल हैं। 100 प्रतिशत वीवीपैट सत्यापन या बैलट पेपर की वापसी की मांग को अस्थिर बताया गया। किसी बड़े स्तर की छेड़छाड़ का कोई ठोस सबूत नहीं मिला। कोर्ट ने चेताया कि बिना सबूत के बार-बार संदेह पैदा करना लोकतंत्र में अविश्वास बढ़ाता है और मतदाता भागीदारी घटा सकता है।
इसके बावजूद विपक्ष चुनाव आयोग पर हमला जारी रखे हुए है। मुख्य कारण राजनीतिक रणनीति है। जब वे जीतते हैं-कर्नाटक, तेलंगाना जैसे उदाहरणों में-तो ईवीएम ठीक लगती है। हारने पर-महाराष्ट्र, हरियाणा आदि में-धांधली का आरोप लग जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस दोहरे मापदंड पर टिप्पणी की थी। ‘वोट चोरी’ या मतदाता सूची संशोधन (SIR) जैसे मुद्दों को ईवीएम से जोड़कर चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया जा रहा है। उद्देश्य चुनावी जनादेश को कमजोर दिखाना, अपने समर्थनकर्ताओं को एकजुट करना और संस्थागत विश्वास कम करना है। अब तक कोई ठोस सबूत नहीं दिया गया। कोर्ट ने अतिरिक्त सुरक्षा-सिंबल लोडिंग यूनिट सील करना और पांच प्रतिशत माइक्रोकंट्रोलर जांच-के आदेश दिए, फिर भी आरोप जारी हैं।
ऐसे हमले बिना सबूत के लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर अविश्वास फैलाते हैं। ईवीएम ने बूथ कैप्चरिंग और अमान्य वोट जैसी पुरानी समस्याएं कम की हैं। विपक्ष हाथ में संविधान रखकर संवैधानिक संस्थाओं का अपमान कर रहा है। पवन खेरा और संजय राउत जैसे नेता अल्बानिया के सुप्रीम कोर्ट जलने का वीडियो और संदेश शेयर कर रहे हैं। राउत ने लिखा कि अल्बानिया की जनता ने सुप्रीम कोर्ट को इसलिए जलाया क्योंकि वह भ्रष्ट प्रधानमंत्री की मदद कर रहा था, संसद और सरकारी दफ्तरों पर हमले हुए, और सभी देशों को-खासकर भारत को-इससे सबक लेना चाहिए। यह क्रांति नहीं, अपराध है। अल्बानिया में सैकड़ों लोग गिरफ्तार हुए, सैकड़ों घायल हुए हैं। संजय देश को किस आग में झोंकने की भूमिका तैयार कर रहे हैं विपक्ष में बैठकर!
एक भारतीय सांसद के रूप में ऐसा संदेश देना कि भारत को भी ऐसा सबक लेना चाहिए, क्या सुप्रीम कोर्ट, संसद जलाने का आह्वान है? यह लोकतंत्र है या अराजकता? जिनकी राजनीति संविधान हाथ में लेकर चल रही है, उन्हें संस्थाओं का सम्मान करना चाहिए। अगर उनके व्यवहार से यह संदेश जाता है कि वे हाथ में संविधान रखकर उसकी मूल भावना की बार-बार हत्या कर रहे हैं, तो समाज में गलत संदेश जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने हाल में राउत को अवमानना संबंधी नोटिस दिया है, फिर भी ऐसे पोस्ट जारी हैं।
‘वोट चोरी’ के आरोप की परतें खोलें तो साफ है-यह हार की राजनीति है। जीत पर चुप, हार पर संस्थाओं पर वार। मतदाता सूची में सुधार के नाम पर संदेह पैदा करना, ईवीएम को लक्ष्य बनाना, और विदेशी हिंसक घटनाओं को भारत के लिए सबक बताना-यह लोकतंत्र मजबूत करने की नहीं, कमजोर करने की कोशिश है।
बिना सबूत के बार-बार संदेह पैदा करना मतदाता का विश्वास घटाता है। विपक्ष को Regime Change के किसी संविधान विरोधी षड्यंत्र का हिस्सा बनने से बेहतर है कि जितनी जल्दी हो, अपने व्यवहार में सुधार लाए। हाथ में संविधान रखने वाले को उसकी रक्षा करनी चाहिए, न कि संस्थाओं को निशाना बनाकर उसकी आत्मा को चोट पहुंचानी चाहिए। लोकतंत्र सबूत, संवाद और सम्मान पर टिकता है, अराजकता के संदेशों पर नहीं।

अशीष रे-कपिल सिब्बल से अवि डांडिया तक, इको सिस्टम की कड़ियां और वोटर लिस्ट की सफाई का विरोध

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दिल्ली। कांग्रेस पार्टी एक तरफ ईवीएम हैक होने का दावा करती है, दूसरी तरफ विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) जैसी मतदाता सूची की सफाई का विरोध करती है। यदि मशीनें ही धांधली का साधन हैं, तो सटीक मतदाता सूची से परहेज क्यों? यह विरोधाभास 2019 के लंदन प्रकरण से और स्पष्ट होता है।

जनवरी 2019 में इंडियन जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (यूरोप) द्वारा आयोजित कार्यक्रम में स्वयंभू साइबर विशेषज्ञ सैयद शुजा स्काइप के जरिए अमेरिका से जुड़ा।। चेहरा ढका था। उसने दावा किया कि 2014 लोकसभा चुनाव ईवीएम हैकिंग से प्रभावित हुए, कांग्रेस करीब 200 सीटें हारीं, गोपिनाथ मुंडे की मौत इसलिए हुई क्योंकि वे जानते थे, और गौरी लंकेश को भी निशाना बनाया गया। कोई लाइव प्रदर्शन नहीं हुआ, कोई तकनीकी सबूत नहीं दिया गया। ईसीआईएल ने साफ कहा कि शुजा उनका नियमित कर्मचारी नहीं था और ईवीएम डिजाइन-विकास से जुड़ा नहीं था। चुनाव आयोग ने इसे ‘प्रेरित स्लगफेस्ट’ (Motivated Slugfest) कहा और आईपीसी 505(1)(बी) के तहत दिल्ली पुलिस से एफआईआर दर्ज कराने को कहा। फॉरेन प्रेस एसोसिएशन ने इस विवाद से खुद को अलग कर लिया।

कार्यक्रम के आयोजक  कांग्रेसी रुझान वाले पत्रकार अशीष रे (आईजेए, यूरोप अध्यक्ष) थे, जिन्होंने कपिल सिब्बल को व्यक्तिगत निमंत्रण भेजा। सिब्बल मौजूद रहे और जांच की मांग की। आयोजन पर कांग्रेस प्रायोजित होने का आरोप लगा था। रे के नेशनल हेराल्ड जैसे कांग्रेस से जुड़े मंचों से संबंध रिपोर्टों में आए। तकनीकी विशेषज्ञों और चुनाव आयोग के अनुसार, ईवीएम स्टैंडअलोन मशीनें हैं, वायरलेस या रेडियो फ्रीक्वेंसी से जुड़ी नहीं होतीं, केवल केबल के जरिए पब्लिक व्यू में जुड़ती हैं। शुजा के ‘मिलिटरी ग्रेड मॉड्यूलेटर’ या ‘फ्रीक्वेंसी आइसोलेशन’ वाले दावे असंगत हैं।

इसी इको सिस्टम की कड़ी अवि डांडिया से जुड़ती है। डांडिया इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के सोशल मीडिया चीफ / चीफ इन-चार्ज हैं। एनआरआई वीडियो ब्लॉगर और यूट्यूब इन्फ्लुएंसर के रूप में वे संगठन की डिजिटल उपस्थिति संभालते हैं। 2023 में नियुक्ति पर उन्होंने राहुल गांधी और सैम पित्रोदा का धन्यवाद किया। 2019 में उन्होंने शुजा के ईवीएम हैकिंग दावों को आगे बढ़ाया, लाइव प्रसारण और संबंधित वीडियो जारी किए। साथ ही पुलवामा हमले और ईवीएम हैकिंग पर फर्जी ऑडियो क्लिप फैलाईं, जिन पर दिल्ली पुलिस ने एफआईआर दर्ज की और फैक्ट-चेकर्स ने इन्हें मनगढ़ंत बताया। अशीष रे और कपिल सिब्बल के माध्यम से इस कांग्रेसी इको सिस्टम के छूछूंदर को तलाशना चाहिए। अवि से पूछताछ की जाए तो शुजा की जानकारी मिल सकती है, क्योंकि दोनों के बीच 2019 में ही सार्वजनिक संवाद और प्रचार दिखता है।

2024 में भी पैटर्न दोहराया गया। महाराष्ट्र चुनाव से पहले इंडिया टुडे स्टिंग में शुजा ने ‘फ्रीक्वेंसी आइसोलेशन’ का हवाला देकर करीब 53-54 करोड़ रुपये में ईवीएम हैक करने की पेशकश की। कोई सबूत नहीं। मुंबई साइबर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की। सूत्रों के अनुसार वह किसी तीसरे देश में छिपा है। 2019 का मामला भी लंबित है। यानी ‘कांग्रेस का दुलारा’ भारतीय कानूनी प्रक्रिया से बच रहा है।

यह एसआईआर विरोध से जुड़ता है। एसआईआर मृत, डुप्लिकेट या अयोग्य नाम हटाने की प्रक्रिया है। यदि ईवीएम ही समस्या है, तो साफ सूची से क्या आपत्ति? कांग्रेस अक्सर मतदाता बहिष्करण का डर दिखाती है, जबकि हैकिंग के आरोप में वोटरों के अधिकार का हवाला देती है। दोनों जगह चयनात्मकता: परिणाम प्रतिकूल हों तो मशीन पर शक, सूची साफ हो तो प्रक्रिया पर शक।


ऐतिहासिक रूप से कांग्रेस की स्थापना में एलन ऑक्टेवियन ह्यूम (ब्रिटिश सिविल सेवक, बाद में लंदन) की प्रमुख भूमिका थी। वे जनरल सेक्रेटरी रहे। दशकों की सत्ता के कारण शुरुआती उद्देश्य की समीक्षा कम हुई। आज बिना सबूत के ईवीएम पर आरोप और लंदन जैसे मंचों का इस्तेमाल अविश्वास फैलाने जैसा लगता है। ध्रुव राठी भारत के मामले में प्रदर्शन के लिए दिल्ली पुलिस से मुंह छुपाकर, भागकर लंदन गया। जबकि वह रहता जर्मनी में है। कांग्रेस के जन्म से लेकर कांग्रेस प्रायोजित षडयंत्रों तक के तार लंदन से क्यों जुड़ते हैं?

सैयद शुजा आज भी सामने नहीं आया है। उसके खिलाफ एफआईआर हैं, वह विदेश में बताया जाता हैं, और दावे बिना सत्यापन के प्रचार का हिस्सा बना रहता है। आज की बहस में उस कांग्रेस समर्थित झूठे, मक्कार भगोड़े को भूलना नहीं चाहिए।

कांग्रेस को आज या तो ठोस सबूत पेश करने चाहिए या ईवीएम की विश्वसनीयता और एसआईआर जैसी प्रक्रियाओं को स्वीकार करना चाहिए। वर्ना कांग्रेस पार्टी और उसके समर्थित सैयद शुजा में क्या फर्क रह जाएगा?

चुनाव आयोग और तकनीकी समिति बार-बार स्पष्ट कर चुके हैं कि ईवीएम छेड़छाड़-रोधी हैं। अब आरोप लगाने वाले पक्ष को भी उसी मानक पर खरा उतरना होगा।

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