मोदी जी को मेकअप में नहीं, गेटअप में विश्वास” : नलिनी-कमलिनी

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रंजीत राय ।

वाराणसी। विश्वप्रसिद्ध कथक युगल नृत्यांगना पद्मश्री नलिनी-कमलिनी ने गुरुवार को बीएलडब्ल्यू ऑफिसर्स क्लब गेस्ट हाउस में आयोजित एक संवाद कार्यक्रम में ‘नारी शक्ति वंदन विधेयक’ को लेकर पत्रकारों से विस्तारपूर्वक बातचीत की। इस दौरान उन्होंने न केवल इस विधेयक के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया, बल्कि भारतीय संस्कृति, महिला सशक्तिकरण और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर भी अपने विचार रखे।

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश की महिलाओं में आज जागरूकता, आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता का अभूतपूर्व विकास हुआ है। ऐसे समय में नारी शक्ति वंदन विधेयक महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया में अधिक भागीदारी देने का एक ऐतिहासिक कदम साबित होगा। उन्होंने कहा कि “हमें पूर्ण विश्वास है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में यह विधेयक अवश्य पारित होगा और देश की आधी आबादी को सशक्त बनाने का मार्ग प्रशस्त करेगा।”

नलिनी-कमलिनी ने कहा कि महिलाएं केवल घर-परिवार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे प्रशासन, शिक्षा, कला, राजनीति और उद्यमिता जैसे हर क्षेत्र में अपनी दक्षता साबित कर चुकी हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि महिलाएं किसी भी कार्य को अधिक संवेदनशीलता, अनुशासन और दीर्घकालिक दृष्टिकोण के साथ करती हैं, जिससे समाज में स्थायित्व और संतुलन आता है।

भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का उल्लेख करते हुए उन्होंने ‘अर्धनारीश्वर’ की अवधारणा को विशेष रूप से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि यह प्रतीक बताता है कि स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं, प्रतिस्पर्धी नहीं। ऐसे में नारी शक्ति को सशक्त बनाने वाले किसी भी प्रयास का विरोध करना हमारी सांस्कृतिक विरासत के भी विरुद्ध है।

सरकारी योजनाओं पर बात करते हुए उन्होंने नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री कार्यकाल का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर जैसी पहल ने महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज भी जनधन खाते, उज्ज्वला योजना और अन्य योजनाओं के माध्यम से महिलाओं को सीधे लाभ पहुंच रहा है, जिससे उनकी आत्मनिर्भरता बढ़ी है।

पूर्व और वर्तमान सरकारों की तुलना करते हुए उन्होंने एक प्रभावशाली रूपक का प्रयोग किया। उन्होंने कहा कि “पहले की सरकारें फूल तोड़कर गुलदस्ता बनाने जैसी थीं, जो कुछ समय बाद मुरझा जाता था। लेकिन वर्तमान सरकार बीज बोने का कार्य कर रही है, जो धीरे-धीरे वृक्ष बनकर कई पीढ़ियों को लाभ पहुंचाता है।” इस रूपक के माध्यम से उन्होंने दीर्घकालिक नीतियों और स्थायी विकास की आवश्यकता पर जोर दिया।

अपने वक्तव्य के दौरान उन्होंने एक रोचक टिप्पणी करते हुए कहा कि “मोदी जी को मेकअप में नहीं, गेटअप में विश्वास है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका आशय यह है कि वर्तमान नेतृत्व दिखावे की राजनीति से दूर रहकर वास्तविक और जमीनी कार्यों पर अधिक ध्यान देता है।

पद्मश्री नलिनी-कमलिनी ने देश की महिलाओं से आह्वान किया कि वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें और समाज व राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाएं। जब नारी शक्ति आगे बढ़ेगी, तभी देश सशक्त और समृद्ध बनेगा।

समसामयिक वैश्विक गतिविधियों पर सार्थक संवाद को बढ़ावा देने की पहल 

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दिल्ली । इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय में भारतीय वर्ल्ड अफेयर्स परिषद के सहयोग से ‘अंतरराष्ट्रीय युवा कॉन्क्लेव-2026’ का आयोजन किया गया।

इस कॉन्क्लेव का मुख्य विषय “परिवर्तित विश्व व्यवस्था में भारतीय विदेश नीति: सुरक्षा, विकास और वैश्विक नेतृत्व के बीच संतुलन” रखा गया है। इस आयोजन में देशभर के विद्वानों, नीति विशेषज्ञों और स्नातक छात्रों ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अहम मुद्दों पर चर्चा की।

यह पहल समसामयिक वैश्विक गतिविधियों पर सार्थक संवाद को बढ़ावा देने और छात्रों में वैश्विक व्यवस्था की समझ को गहरा करने हेतु इन्द्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय की प्रतिबद्धता का हिस्सा है।

यह कॉन्क्लेव आईसीडब्ल्यूए के साथ हुए एक एमओयू के तहत आयोजित की गयी, जिसका उद्देश्य युवाओं में विदेश नीति के प्रति जागरूकता और भागीदारी बढ़ाना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण के अनुरूप, उद्घाटन सत्र में “वसुधैव कुटुंबकम” (विश्व एक परिवार है) के सिद्धांत को भारतीय विदेश नीति का आधार स्तंभ बताया गया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. विनय सहस्रबुद्धे (पूर्व उपाध्यक्ष, भारतीय जनता पार्टी) रहे। उनके साथ आईसीडब्ल्यूए की रिसर्च फेलो सुश्री हिमानी पंत भी उपस्थित रहीं। कार्यक्रम का नेतृत्व महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. पूनम कुमारिया ने किया।
प्रो. पूनम कुमारिया ने शिक्षा और नीति संस्थानों के बीच सहयोग के महत्व पर जोर देते हुए कहा, “इस कॉन्क्लेव का प्राथमिक उद्देश्य युवा महिलाओं को सशक्त बनाना और उनमें तार्किक सोच विकसित करना है ताकि वे वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका निभा सकें।”
डॉ. विनय सहस्रबुद्धे ने अपने संबोधन में कहा कि भारत की वैश्विक साख उसके सैद्धांतिक नेतृत्व की देन है। उन्होंने पूर्व विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज द्वारा भारत की अंतरराष्ट्रीय पहुंच को मजबूत करने में दिए गए योगदान को भी याद किया। चर्चा के दौरान यह भी उभर कर आया कि वैश्वीकरण के दौर में युवाओं के लिए भारत की रणनीतिक प्राथमिकताओं और मानवीय संकल्पों को समझना अनिवार्य है।

कॉन्क्लेव के दौरान विशिष्ट अतिथियों ने महाविद्यालय के संग्रहालय और अभिलेखागार का भी अवलोकन किया, जहाँ उन्होंने संस्थान की ऐतिहासिक विरासत और संग्रह की सराहना की।
यह आयोजन आईसीडब्ल्यूए के ‘विदेश नीति जागरूकता अनुदान’ के सहयोग से सफल हुआ है। यह कार्यक्रम उन जागरूक और प्रखर युवतियों को तैयार करने की दिशा में एक बड़ा कदम है, जो भविष्य में अंतरराष्ट्रीय विमर्श में योगदान दे सकें।

परम्परागत ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय के लिए आईजीएनसीए ने किया समझौता

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नई दिल्ली: भारत के परम्परागत ज्ञान का आधुनिक विज्ञान के साथ समन्वय कर ज्ञान के नए आयामों का संधान करने के लिए इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) और गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा (जीबीयू) ने एक समझौता पत्र पर हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, डीन एवं कलानिधि प्रभाग के प्रमुख प्रो. (डॉ.) रमेश चंद्र गौड़, कलाकोश एवं सीआईएल प्रभाग के प्रमुख प्रो. सुधीर लाल, मीडिया प्रभाग के प्रमुख श्री अनुराग पुनेठा और बृहत्तर भारत एवं क्षेत्र अध्ययन प्रभाग के प्रमुख प्रो. धर्मचंद चौबे सहित केन्द्र के कई अधिकारी उपस्थित थे। इस अवसर पर जीबीयू की ओर से कुलपति प्रो. राणा प्रताप सिंह, रजिस्ट्रार प्रो. चंद्र कुमार सिंह, प्रो. उत्तम कुमार सहित कई अध्यापक और अधिकारी उपस्थित थे। समझौता पत्र पर आईजीएनसीए की ओर से प्रो. (डॉ.) रमेश चंद्र गौड़ और जीबीयू की ओर से रजिस्ट्रार प्रो. चंद्र कुमार सिंह ने हस्ताक्षर किए।

इस अवसर पर, डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा, राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू होने के बाद से हो ये रहा है कि हर कोई भारतीय शिक्षा प्रणाली या ज्ञान प्रणाली के नए क्षितिजों को खोजने में लगा हुआ है। लेकिन सभी लोग उसी पुराने दायरे में, उसी सीमित सोच में ही घूम रहे हैं। नए आयामों की खोज की जानी चाहिए, और वे तभी खोजे जा सकते हैं, जब आप लीक से हटकर सोचें। इसलिए यह समझौता ज्ञापन (एमओयू) एक अनोखी और नई पहल है, जिसमें जीवन विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान और आयुर्वेद विज्ञान से जुड़े लोग एक साथ आकर हमारी शास्त्रीय परम्परा में उपलब्ध उन तत्वों पर चर्चा करेंगे, जो इस प्रकार के ज्ञान से सम्बंधित हैं। ऐसा प्रयास ही कुछ ऐसा सामने ला सकता है, जो अब तक अनछुआ है और जिसके बारे में पहले कभी सोचा नहीं गया। इसलिए मुझे लगता है कि यह एमओयू ज्ञान के क्षेत्र में एक नए आयाम का मार्ग प्रशस्त करेगा।

जीबीयू के कुलपति प्रो. राणा प्रताप सिंह ने कहा, जब हम इस बात पर चर्चा कर रहे थे कि हम कहां और कैसे मिलकर काम कर सकते हैं, तब ये सुझाव आया कि हमारे पास कई पाण्डुलिपियों का डिजिटल भंडार भी उपलब्ध है। हम उनमें निहित ज्ञान को खोजने और समझने पर विचार कर सकते हैं। उनमें जो भी उपयोगी विचार, जानकारी और अनुवाद उपलब्ध हैं, उन पर शोध किया जा सकता है। साथ ही, उनकी वर्तमान प्रासंगिकता को समझकर यह देखा जा सकता है कि वे समाज और आम जनता के लिए किस प्रकार उपयोगी हो सकते हैं। इस प्रकार की ज्ञान-आधारित परियोजनाओं पर हम मिलकर काम कर सकते हैं, क्योंकि हमारे पास उससे सम्बंधित सामग्री उपलब्ध है।

इस पर अपने विचार व्यक्त करते हुए प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने कहा, मुझे लगता है कि यही वास्तविक सहयोग है, क्योंकि हमारे पास ऐसे लोग हैं, जो लिपि तथा पाठ को समझते हैं और आपके पास ऐसे विशेषज्ञ हैं, जो विषय-वस्तु को गहराई से समझते हैं। यही वह स्थान है, जहां हम मिलकर सार्थक कार्य कर सकते हैं। आपने आयुर्वेदिक जीवविज्ञान का जो उदाहरण प्रस्तुत किया है, वह वास्तव में भारतीय ज्ञान परम्परा और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान या जैविक विज्ञान के सच्चे समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है। हमारे पास भारत की 52 पुस्तकालयों से एकत्र की गई लगभग तीन लाख पाण्डुलिपियां हैं। इन सभी का डिजिटलीकरण किया जा चुका है और ये माइक्रोफिल्म के रूप में उपलब्ध हैं। पिछले लगभग सात वर्षों में हमने इन सभी पाण्डुलिपियों की विवरणात्मक सूची (डिस्क्रिप्टिव कैटलॉग) भी तैयार की है। इसमें यह जानकारी है कि वेदांत, बौद्ध धर्म, आयुर्वेद आदि विषयों पर कौन-कौन सी पाण्डुलिपियां उपलब्ध हैं। हमने कुल 53 विषय-क्षेत्रों की पहचान की है। इसलिए यदि हमें बौद्ध धर्म और आयुर्वेद पर कार्य प्रारम्भ करना हो, तो हमारे पास पहले से तैयार सूची उपलब्ध है कि आयुर्वेद पर कितनी पाण्डुलिपियां हैं और बौद्ध धर्म पर कितनी हैं। यहीं से हम सहयोग की शुरुआत कर सकते हैं।

प्रो. धर्मचंद चौबे ने जानकारी दी कि इस समझौते के पहले चरण के क्रियान्वयन के क्रम में सबसे पहले आईजीएनसीए मैप मॉडल ‘बुद्ध शासनं चिरं तिष्ठतु’ (बुद्ध की शिक्षाएं चिरस्थायी हैं) को जीबीयू में स्थापित कर रहा है। इस मैप मॉडल में भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़े प्रमुख स्थानों और बौद्ध धर्म के भारत तथा एशिया के विभिन्न क्षेत्रों में प्रसार को मानचित्र के माध्यम से दिखाया गया है। भगवान बुद्ध, बौद्ध धर्म और उसके विस्तार के बारे में हम जो भी जानते हैं, या सुने हुए हैं, उसे इस मानचित्र के माध्यम से सरल व संक्षिप्त रूप से समझाने का प्रयास किया गया है।

बिहार का विकास और चाणक्य सूत्र

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आशुतोष कुमार सिंह

यदि सच में बिहार को उसके गौरवशाली अतीत के स्वर्णिम दिनों की ओर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी लौटाना चाहते हैं तो उन्हें कौटिल्य के राज-शासन के सिद्धांतों को आत्मसात करते हुए अभ्यास में लाना होगा।

पटना । वर्तमान का बिहार जो कभी मगध साम्राज्य का वाहक था में आज एक सम्राट ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली है। आजादी के बाद एक ऐसी सरकार का गठन हुआ है, जो एक राष्ट्र-श्रेष्ठ राष्ट्र के मूल मंत्र को आगे बढ़ाने का काम करती रही है। इस मौके पर मुझे बिहार के अतीत को याद करने का मन कर रहा है। जब मैं राजनीतिक शास्त्र पढ़ रहा था तब मुझे आचार्य कौटिल्य यानी चाणक्य के बारे में पढ़ने एवं समझने का मौका मिला था। उनका संबंध भी आज के बिहार एवं तब के मगध से था। उन्होंने भी एक राष्ट्र, सशक्त राष्ट्र का सपना देखा था। उन्होंने भी भारत एवं भारतीयता का संकल्प लिया था।

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) का संकल्प और मगध साम्राज्य का उत्थान भारतीय इतिहास की सबसे रोमांचक और युगान्तरकारी घटनाओं में से एक है। यह केवल एक राज्य की विजय नहीं, बल्कि एक शिक्षक के अपमान का प्रतिशोध और एक ‘अखंड भारत’ के निर्माण की विजय गाथा है। मगध के तत्कालीन शासक घनानंद ने अपने दरबार में आचार्य चाणक्य का घोर अपमान किया था। घनानंद अपनी विलासिता और क्रूरता के लिए कुख्यात था। अपमानित होकर चाणक्य ने अपनी शिखा खोल दी और प्रण लिया कि जब तक वह इस अहंकारी नंद वंश का समूल नाश नहीं कर देंगे, तब तक अपनी शिखा नहीं बांधेंगे। उनका संकल्प केवल व्यक्तिगत प्रतिशोध तक सीमित नहीं था। उस समय भारत छोटे-छोटे जनपदों में बंटा था और उत्तर-पश्चिम से सिकंदर (Alexandra) के आक्रमण का खतरा मंडरा रहा था। कौटिल्य का वास्तविक संकल्प एक केंद्रीकृत और शक्तिशाली ‘अखंड भारत’ का निर्माण करना था।

कौटिल्य ने अपने संकल्प को सिद्ध करने के लिए चंद्रगुप्त मौर्य को तैयार किया। उन्होंने एक साधारण बालक को राजनीति, कूटनीति और युद्धकला में प्रशिक्षित कर उसे एक चक्रवर्ती सम्राट बनाया। पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) इस विशाल साम्राज्य की राजधानी बनी। कौटिल्य ने मगध को एक ऐसा प्रशासनिक ढांचा दिया जहां कर प्रणाली, गुप्तचर व्यवस्था और न्याय प्रणाली अत्यंत सुदृढ़ थी।

वर्तमान बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट के साथ भी इसी तरह का एक संकल्प जुड़ता है। जो राजनीति से प्रेरित था। बिहार की राजनीति में सम्राट चौधरी का संकल्प काफी चर्चा का विषय रहा है, जिसकी तुलना अक्सर ऐतिहासिक रूप से आचार्य चाणक्य की प्रतिज्ञा से की जाती है।

सम्राट चौधरी, जो बिहार के मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रमुख नेता हैं, ने नीतीश कुमार के खिलाफ एक गंभीर व्यक्तिगत और राजनीतिक प्रण लिया था। यह घटना तब की है जब नीतीश कुमार ने एनडीए (NDA) का साथ छोड़कर आरजेडी (RJD) के साथ मिलकर महागठबंधन की सरकार बनाई थी। उस समय सम्राट चौधरी ने विरोध स्वरूप अपने सिर पर मुरैठा (पगड़ी) बांधी थी। सम्राट चौधरी ने कसम खाई थी कि वह अपने सिर से यह मुरैठा तब तक नहीं उतारेंगे, जब तक वह नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी से नहीं हटा देते। उनका यह संकल्प व्यक्तिगत विरोध से ज्यादा वैचारिक विरोध का प्रतीक था। समय के साथ बिहार की राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और जनवरी 2024 में नीतीश कुमार वापस एनडीए गठबंधन में शामिल हो गए। इस नई सरकार में सम्राट चौधरी खुद उप मुख्यमंत्री बने। चूंकि नीतीश कुमार अब उनके गठबंधन के साथी और मुख्यमंत्री थे। सम्राट चौधरी ने अपने संकल्प को पूरा करने के लिए अयोध्या जाने का निर्णय लिया। जुलाई 2024 में उन्होंने अयोध्या में रामलला के चरणों में अपना मुरैठा समर्पित किया और सरयू नदी में स्नान कर अपना मुंडन करवाया। और आज यानी 15 अप्रैल 2026 को सम्राट चौधरी जब बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले रहे थे तो मुझे उनकी इस कसम की याद आ रही थी।

अपने संकल्पों के कारण बेशक सम्राट चौधरी को कौटिल्य यानी आचार्य चाणक्य के संकल्प से राजनीतिक पंडित जोड़ते आ रहे हैं लेकिन चाणक्य से तुलना न्यायोचित नहीं है। चाणक्य के सप्तांग सिद्धांत को यदि सम्राट चौधरी बिहार के विकास का मूल मंत्र बना लें तब शायद कालांतर में उनकी तुलना एक स्तर पर आचार्य चाणक्य से की शायद किया जा सके।

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ में राज्य की संरचना को समझाने के लिए ‘सप्तांग सिद्धांत’ का प्रतिपादन किया है। उन्होंने राज्य को एक शरीर के रूप में देखा है, जिसके सात मुख्य अंग होते हैं। सप्तांग सिद्धांत के अनुसार, राज्य के ये सात अंग हैं: स्वामी (राजा), अमात्य (मंत्री), जनपद (क्षेत्र और जनता), दुर्ग वह (किला), कोष (खजाना), दंड (सेना) और मित्र देश। राजा को राज्य का शीर्ष (सिर) माना गया है। कौटिल्य के अनुसार, राजा को दूरदर्शी, आत्म-संयमी, कुलीन और बुद्धिमान होना चाहिए। इसी तरह अमात्य यानी वर्तमान के मंत्री राज्य की आंखें होते हैं। इसमें उच्च कोटि के मंत्री, सचिव और प्रशासनिक अधिकारी शामिल हैं। राजा को चाहिए कि वह ईमानदार और योग्य अमात्य की ही नियुक्ति करे, क्योंकि शासन की सफलता उन्हीं पर निर्भर करती है। जनपद को राज्य की जंघाएं (पैर) के रूप में परिभाषित हैं। इसका अर्थ है राज्य का निश्चित भू-भाग और उसमें निवास करने वाली जनता। कौटिल्य के अनुसार, भूमि उपजाऊ होनी चाहिए और जनता मेहनती व राजा के प्रति वफादार होनी चाहिए। दुर्ग को राज्य की भुजाएं (हाथ) माना गया है। राज्य की रक्षा के लिए मजबूत किलेबंदी अनिवार्य है। कौटिल्य ने चार प्रकार के दुर्ग बताए हैं: औदिक दुर्ग: जिसके चारों ओर पानी हो। पार्वत दुर्ग: जो ऊँचे पहाड़ों पर हो। धान्वन दुर्ग: जो मरुस्थल में हो और वन दुर्ग: जो घने जंगलों के बीच हो। कोष को राज्य का मुख कहा गया है। किसी भी राज्य के संचालन, सेना के रख-रखाव और कल्याणकारी कार्यों के लिए धन की आवश्यकता होती है। कौटिल्य का मानना था कि कोष धर्म-पूर्वक एकत्रित किए गए करों से भरा होना चाहिए। दंड (सेना) राज्य का मस्तिष्क या बल है। राजा के पास एक शक्तिशाली और अनुशासित सेना होनी चाहिए ताकि वह आंतरिक विद्रोहों और बाहरी आक्रमणों से राज्य की रक्षा कर सके और सातवां सिद्धांत है-मित्र (मित्र देश) मित्र राज्य के कान होते हैं। एक आदर्श राज्य के मित्र ऐसे होने चाहिए जो आवश्यकता पड़ने पर सहायता करें और जिनकी निष्ठा पर संदेह न किया जा सके। कौटिल्य का मानना था कि जिस प्रकार शरीर का कोई भी अंग खराब होने पर पूरा शरीर प्रभावित होता है, उसी प्रकार राज्य के इन सात अंगों में से किसी एक की भी कमजोरी पूरे राज्य के पतन का कारण बन सकती है।

जिस सुशासन बाबू का तमगा लेकर नीतीश बाबू ने अपनी पहचान बनाई और बिहार ही नहीं भारत की राजनीति में एक कुशल राजनेता के रूप में स्थापित हुए उसका मूल आधार आचार्य चाणक्य द्वारा बताए गए सप्तांग सिद्धांत ही है।

यदि सच में बिहार को उसके गौरवशाली अतीत के स्वर्णिम दिनों की ओर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी लौटाना चाहते हैं तो उन्हें कौटिल्य के राज-शासन के सिद्धांतों को आत्मसात करते हुए अभ्यास में लाना होगा। तब जाकर बिहार वास्तव में वैसा बिहार बन सकेगा, जैसा बिहार वह बन सकता है, बनाया जा सकता है और बनना भी चाहिए। बिहार-मगध और चाणक्य को एक सूत्र में बांधना होगा। यहीं से बिहार के उत्थान का राह प्रशस्त होता है। यही बिहार में वास्तविक बहार लाने का एकमात्र उपाय है।

(लेखक स्वस्थ भारत के चेयरमैन एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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