विजयादशमी पर सनातन विजय व राष्ट्र को नशामुक्त करने का संकल्प 

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लखनऊ। असत्य पर सत्य की विजय का महापर्व विजयादशमी रावण के पुतलों के दहन के साथ धूमधाम से संपन्न हो चुका है। इस अवसर पर देशभर में भव्य कार्यक्रमों का आयोजन हुआ । इसी दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपना स्थापना दिवस मनाया। यह अवसर संकल्पों का अवसर भी रहा इनमें सबसे महत्वपूर्ण संकल्प गृहमंत्री अमित शाह ने पंजाब में लिया। गृहमंत्री ने  दिसंबर 2029 तक पंजाब को नशे से मुक्ति दिलाने का संकल्प लिया। यह एक देशव्यापी संकल्प है क्योंकि आज केवल पंजाब में ही नहीं अपितु अन्य प्रान्तों के युवाओं को भी नशे की लत में झोंका जा रहा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विजयादशमी कार्यक्रम को सर संघचालक डा. मोहन भागवत ने संबोधित किया। उन्होंने यूरोप के देशों मे हो रहे विरोध प्रदर्शनों,  जेन -जी और एआई पर अपने विचार व्यक्त करते हुए नई पीढ़ी  को एकजुटता का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि भारत की प्रगति के लिए एकजुटता बहुत जरूरी है। भारत विकास की राह पर अग्रसर है ,अभी विकास पूरा नही हुआ है तो समस्याएं तो रहेंगी ही, समस्या के चलते आंदोलन होते ही हैं और लोकतंत्र मे आंदोलन होंगे ही किंतु आंदोलन समाधान के लिए होना चाहिए समस्या के लिए नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि हमें पश्चिम में चली आंधी से बचना ही होगा हमारी किसी भी कृति से समाज में अनबन, द्वेष या विभाजन पैदा नहीं  होना चाहिए।

डॉ. भागवत ने चेताया कि आंदोलन किसी दूसरे लक्ष्य से चले तो वह राजनीतिक साधन बन जाता है। इसका लाभ भारत को दबाने वाली शक्तियां लेती हैं। वे भारत को बांटकर दूसरा वर्ग बनाती हैं असंतोष और अराजकता भड़काती हैं। उन्होंने कहा कि पश्चिम से आंधी चली है जो हर तरह की व्यवस्था , भद्रता, मांगल्य और सांस्कृतिक मानवीय संस्कार से विरोध रखती है। फ्रांस, अल्बानिया, बांग्लादेश और नेपाल में क्या हुआ ये सब किया कराया उनका ही है उन लोगों का कहना है कि रिजीम चेंज करने से परिस्थिति बनती है लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं है पहले नहीं हुआ है और आज भी नहीं हुआ है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दशहरा उत्सव में भाग लेते हुए देश के दुश्मनों को स्पष्ट चेतावनी दी कि हम 2047 तक भारत को विकसित भारत बनाकर ही रहेंगे। प्रधानमंत्री ने वस्तुतः अपने नये नारे “हम करके रहेंगे“ को ही दोहराया और बता दिया है कि अंत में विजय हमारी ही होगी। प्रधानमंत्री ने देश के सामने आ रही वर्तमान चुनौतियों से मिलकर लड़ने का संदेश दिया और देश के सभी राजनैतिक दलों व समस्त संवैधानिक संस्थाओं से राष्ट्रहित में एकजुट हो जाने का आह्वान किया। प्रधानमंत्री ने देश के तीन दुश्मनों का उल्लेख करते हुए कहा कि देश के मान सम्मान को नुकसान पहुंचाने वाली ताकतें, समाज में फूट डालने वाले लोग और भारतीय समाज से नफरत करने वाली सोच ऐसी चुनौतिया हैं जिनका सामना देश को मिलकर करना होगा। उन्होंने देश की एकता व संस्कृति को मजबूत बनाए रखने पर बल दिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भगवान राम के आदर्शों को याद करते हुए कहा कि रामराज्य में शासन का उद्देश्य जनकल्याण होता है। वहां भेदभाव की जगह न्याय और सभी को समान अवसर देना होता है। साथ ही गरीबों, वंचितों की सेवा करना भी है, सरकार और समाज दोनों का ध्यान इन लोगों की सहायता पर होना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन से आगामी समय में सरकार द्वारा लिए जाने वाले  संभावित साहसिक निर्णयों व संकल्पों का संदेश भी निकल रहा है। संभव है सरकार संसद के माध्यम से अपने कुछ ऐतिहासिक संकल्पों को पूर्ण करने के लिए आगे बढ़े और इसी कारण से प्रधानमंत्री ने देशहित में सभी राजनीतिक दलों से एकजुटता का आह्वान किया है। सरकार परिसीमन बिल, महिला आरक्षण बिल तथा  एक देश एक चुनाव व्यवस्था पर आगे बढ़ना चाहती है।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वर्तमान समस्याओं का अंत रामराज्य के माध्यम से ही संभव है। प्रधानमंत्री मोदी ने अयोध्या में दिए गए अपने संबोधन को स्मरण किया और प्रभु श्रीराम के गुणों व विशेषताओं  का वर्णन करते हुए राम राज्य की स्थापना व उस समय लिए गए सभी संकल्पों को पूर्ण  करने का भी स्मरण किया और कहा कि “अंत में विजय हमारी ही होगी।“ उन्होंने कहा कि आज देश का जन -मन अधर्म पर धर्म की जीत का उद्घोष कर रहा है भगवान राम ने रावण का अंत किया और मानवता को ऐसे आदर्श दिए जो इतिहास में अतुलनीय हैं। भगवान राम ने कठिनाईयों के बाद भी सत्य और नीति का मार्ग नहीं छोड़ने की सीख दी।

उधर उत्तर प्रदेश में सभी की दृष्टि गोरखपुर में आयोजित विजयादशमी उत्सव के अवसर पर उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संबोधन पर भी टिकी हुई थी । योगी जी ने अपनी चिर-परिचित शैली में सनातन की बात की। उन्होंने अयोध्या की रामलीला, दीपोत्सव और राम मंदिर निर्माण का उल्लेख करते हुए कहा कि जिन लोगों  ने अयोध्या की रामलीला तक नहीं देखी वे भी वहां को लेकर दुष्प्रचार कर रहे हैं। योगी ने कहा कि राम मंदिर का निर्माण तय समय से पहले हो गया है। जो लोग कभी अयोध्या गए ही नहीं उन लोगों  को भगवान श्रीराम के मंदिर का निर्माण कैसे बर्दाश्त होगा। उन्होंने समाज को जाति, क्षेत्र और भाषा के नाम पर बांटने वालों की तुलना रावण से की और कहा कि देश को कमजोर करने का प्रयास करने वाले लोगों में रावण की आत्मा आ गई है। उन्होंने कहा कि कालनेमि भी राम -राम कहता था उन्होंने लोगों से बजरंग बली की तरह सही और गलत की पहचान करने की अपील की। महाराष्ट्र से देवेन्द्र फड़नवीस, उत्तराखंड से पुष्कर सिंह धामी, असम से हिमंता बिस्वा सरमा और पश्चिम बंगाल से शुभेंदु अधिकारी के सन्देश और संकल्प भी चर्चा में रहे ।

सात अक्टूबर के विक्टिम 

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मान जी

जयपुर । शनि, नोआ और लेवी,इन तीनों महिलाओं के नाम अपने हृदय में कहीं गहरे लिख लीजिए। ये केवल तीन नाम नहीं हैं; ये उन असहनीय यातनाओं, टूटे हुए सपनों और मातम में डूबी उन ज़िंदगियों की कहानियाँ हैं, जिन्हें पढ़ते हुए इंसान का कलेजा मुँह को आने लगता है।

इन कहानियों में कुछ ऐसे दृश्य हैं, जिन्हें पढ़ना कठिन है और कल्पना करना उससे भी कठिन। इतिहास के पन्नों में दर्ज मध्यकालीन भारतीय स्त्रियों की पीड़ा की याद दिलाने वाली ये घटनाएँ हमें बताती हैं कि जब मनुष्य के भीतर से इंसानियत मर जाती है, तब उसकी जगह कैसी भयावह क्रूरता जन्म लेती है।इस लघु शृंखला में सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में प्रकाशित विवरणों के आधार पर इन तीन महिलाओं के साथ घटी घटनाओं का संक्षिप्त वर्णन किया जाएगा। उद्देश्य किसी के घाव कुरेदना नहीं, बल्कि उन घावों को याद रखना है, जिन्हें समय की धूल के नीचे दबा देना सबसे बड़ा अन्याय होगा।

शनि लूक महज़ बाईस साल की एक युवती थी। जर्मनी और इसराइल की दोहरी नागरिकता रखने वाली शनि टैटू बनाने की कला में निपुण थी। उम्र का वह पड़ाव, जहाँ इंसान सपनों को आकार देता है, दुनिया को अपनी आँखों से देखता है और आने वाले कल के लिए न जाने कितनी योजनाएँ बनाता है,शनि भी उसी जीवन का हिस्सा थी।

उसकी दुनिया में भी हँसी थी, दोस्त थे, संगीत था और भविष्य के रंग थे।

लेकिन उसे क्या मालूम था कि सात अक्टूबर की वह सुबह और शाम उसके जीवन की आख़िरी कहानी लिखने वाली है!

उस दिन शनि इसराइल में आयोजित एक संगीत समारोह में मौजूद थी। चारों ओर संगीत, उत्सव और जीवन की चहल-पहल थी। फिर अचानक हमास के आतंकियों ने वहाँ धावा बोल दिया। कुछ ही क्षणों में उत्सव का वातावरण चीख़ों, भगदड़ और मौत के भय में बदल गया।

शनि ने घबराकर अपनी माँ को फ़ोन किया। एक बेटी ने उस क्षण अपनी माँ को पुकारा, जब उसे दुनिया में सबसे अधिक सुरक्षा की ज़रूरत थी। उसने बताया कि वह छिपने के लिए कोई जगह तलाश रही है।

कुछ घंटों बाद सोशल मीडिया पर एक वीडियो फैलने लगा। उसमें शनि का अचेत, लगभग निर्वस्त्र शरीर एक पिकअप ट्रक में दिखाई दे रहा था। उसके आसपास हथियारबंद हमलावर थे और कुछ लोग उस दृश्य पर जश्न मनाते दिखाई दिए।

यह दृश्य केवल एक युवती के साथ हुई बर्बरता का प्रमाण नहीं था; यह उस क्षण मनुष्यता के मुँह पर पड़ा एक ऐसा तमाचा था, जिसकी गूँज बहुत दूर तक सुनाई दी।

एसोसिएटेड प्रेस के एक फ़ोटोग्राफ़र द्वारा खींची गई तस्वीर भी दुनिया भर में चर्चा का विषय बनी।

तस्वीर को देखकर शनि के परिवार ने क्या महसूस किया होगा, यह शब्दों में लिखना आसान नहीं है।

लेकिन इस कहानी का सबसे क्रूर हिस्सा अभी बाक़ी था।

तस्वीरों और वीडियो ने दुनिया को एक भयावह दृश्य दिखाया था, मगर शनि की माँ के मन में एक छोटी-सी उम्मीद अब भी जीवित थी।

उसे कुछ सूत्रों से जानकारी मिली कि शनि शायद जीवित है और ग़ाज़ा के किसी अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है।

बस, एक माँ के लिए इतना ही काफ़ी था।

जब दुनिया आशंकाएँ व्यक्त कर रही थी, तब भी वह अपनी बेटी की साँसों की उम्मीद से चिपकी रही होगी। शायद वह सोचती होगी कि उसकी बच्ची घायल है, तकलीफ़ में है, मगर ज़िंदा है। शायद वह किसी दिन दरवाज़े पर दस्तक देगी। शायद फ़ोन बजेगा। शायद कोई कहेगा आपकी बेटी मिल गई है।

माता-पिता ने जर्मनी और इसराइल के अधिकारियों से गुहार लगाई कि उनकी बेटी को खोजा जाए और उसे वापस लाया जाए। लेकिन विशेषज्ञों की आशंकाएँ लगातार गहरी होती जा रही थीं।

एक ओर दुनिया की कूटनीति, युद्ध और खोजबीन थी; दूसरी ओर एक माँ थी, जिसके लिए पूरा संसार सिमटकर अपनी बाईस साल की बेटी तक रह गया था।

उम्मीद का बुझना भी एक यातना है, दिन बीतते गए।

फिर एक ख़बर आई कि शनि का क्रेडिट कार्ड ग़ाज़ा में इस्तेमाल हुआ था। इस सूचना ने मामले को एक नया मोड़ दिया। परिवार के लिए यह एक और बेचैन कर देने वाला संकेत था, लेकिन इससे शनि के जीवित होने की पुष्टि नहीं होती थी।

कुछ समय बाद इसराइली सेना को इसराइल ग़ाज़ा की सीमा के निकट मानव खोपड़ी का एक छोटा-सा अंश मिला।

डीएनए जाँच से उसकी पहचान शनि से जुड़ी पाई गई। जाँच के बाद यह स्पष्ट हो गया कि शनि अब जीवित नहीं थी।

मृत्यु की पुष्टि हो जाने पर भी प्रतीक्षा समाप्त नहीं होती। मन पूछता रहता है,वह कहाँ है? उसके साथ आख़िर क्या हुआ? क्या हम उसे आख़िरी बार देख भी पाएँगे? क्या उसे अपनी परंपरा के अनुसार विदा कर सकेंगे?

शनि के परिवार के सामने भी यही प्रश्न था।

महीने गुज़रते गए।

एक दिन, दो दिन नहीं पूरा एक महीना, फिर दूसरा, फिर तीसरा। इस तरह आठ महीने बीत गए। आठ महीने, जिनमें शनि की माँ और पिता को अपनी बेटी के शरीर की तलाश की ख़बरों के साथ जीना पड़ा।

आख़िरकार, लगभग आठ महीने बाद, इसराइली सेना को ग़ाज़ा की एक सुरंग में शनि के अवशेष मिले।

लेकिन उसका सिर वहाँ नहीं था।

जाँच और उपलब्ध विवरणों से यह बात सामने आई कि जिस समय शनि का शरीर ट्रक में दिखाई दिया था, उस समय तक उसकी मृत्यु हो चुकी थी। बाद में उसके सिर को शरीर से अलग किया गया था।

यह विवरण पढ़ते हुए मन में एक ही प्रश्न उठता है,आख़िर किसी की मृत्यु के बाद भी उसके शरीर के साथ ऐसी बर्बरता करने वाला मनुष्य किस चीज़ से बना होता है? ठीक यही बर्बरता और करतूतें भारतीय स्त्रियों ने पाँच सौ साल पहले देखी थी, इनसे बचने हेतु अग्नि स्नान करना स्वीकारा था।

मृत्यु अपने आप में अंतिम पीड़ा है। लेकिन किसी मृत देह का अपमान करना, उसे उसके परिजनों से दूर कर देना और उन्हें महीनों तक उसके अवशेषों की तलाश में भटकने देना,यह उस पीड़ा को और गहरा कर देता है।

आठ महीने बाद शनि के अवशेष उसके परिवार तक पहुँचे और उसे पारंपरिक रीति से दफ़नाया जा सका।

माँ-बाप अपने बच्चों को जीवन देना जानते हैं। उनके लिए कब्र खोदने की घड़ी का इंतज़ार करना किसी भी माता-पिता के हिस्से आने वाली सबसे असहनीय विडंबनाओं में से एक है।

शनि चली गई, लेकिन उसकी कला रह गई

शनि की मृत्यु के बाद उसके टैटू-आर्ट से जुड़े काम को ‘फ़ॉरएवर यंग’ नाम से सहेजने की पहल हुई। उसकी कला को जीवित रखने का यह प्रयास उस युवती की याद को सँभालने का एक माध्यम बना, जिसके जीवन को हिंसा ने असमय समाप्त कर दिया।

आज सामने आई ख़बरों के अनुसार, इसराइली सेना ने उस हमलावर को मार गिराया, जिसके बारे में बताया गया था कि वह उस दिन शनि के शरीर के साथ ट्रक में मौजूद था।

शनि लूक के साथ हुई बर्बरता को पढ़ते हुए भारतीय इतिहास के वे अध्याय भी स्मरण हो आते हैं, जिनमें युद्धों, आक्रमणों और सत्ता के संघर्षों के बीच असंख्य भारतीय स्त्रियों ने अपमान, हिंसा और असहनीय यातनाएँ झेलीं। मध्यकालीन भारत की अनेक स्त्रियों की पीड़ा हमारी ऐतिहासिक स्मृति का हिस्सा है।

शनि इसराइल की बेटी थी, लेकिन उसे खोने का दुःख समझने के लिए इसराइली होना आवश्यक नहीं। उसके जीवन और मृत्यु की कहानी सुनने के लिए केवल एक संवेदनशील हृदय होना पर्याप्त है।

ईश्वर शनि की आत्मा को शांति दें। उसके माता-पिता को वह शक्ति दें, जिसकी कल्पना करना भी हमारे लिए कठिन है।

मोदी अंश: अमित शाह में प्रधानमंत्री का प्रतिबिंब…

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दिल्ली। एक देश के नागरिकों का स्वतंत्र अभियान जो बारह साल पहले नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की मांग लेकर सड़कों पर उतरा था, अब उसी भाव से अमित शाह को “मोदी अंश” कह रहा है। यह कोई पार्टी का निर्देशित कार्यक्रम नहीं, बल्कि मतदाता पहचान पत्र और आधार कार्ड रखने वाले आम लोगों की स्वैच्छिक पहल है।
2012 की आवाज: जब नागरिकों ने कहा ‘नरेंद्र मोदी फॉर पीएम’
2012 में जब भाजपा के भीतर नेतृत्व को लेकर चर्चाएं चल रही थीं, तब एक नागरिक समूह ने सबसे पहले “नरेंद्र मोदी फॉर पीएम” का नारा बुलंद किया। ये लोग पार्टी के पदाधिकारी नहीं थे। किसी ने उन्हें प्रचार के लिए नहीं भेजा था। जब भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने उनसे कहा कि “नेता कौन होगा, यह पार्टी तय करेगी, आप कौन होते हैं नाम आगे बढ़ाने वाले”, तो उन्होंने जवाब दिया: “हम इस देश के नागरिक हैं। हमारे पास मतदाता पहचान पत्र है, आधार कार्ड है। हमें नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के रूप में चाहिए।”
उस दौरान उनके पोस्टर सड़कों, मैदानों और सभाओं में दिखे। पोस्टर पर लिखा होता था-“नरेंद्र मोदी फॉर पीएम। बीजेपी के हित में जारी।” क्रिकेट मैदानों से लेकर मोदी की रैलियों तक ये लोग हाथों में पोस्टर लेकर ‘मोदी-मोदी’ के नारे लगाते थे। अभियान पूरी तरह स्वायत्त था। किसी से आर्थिक मदद नहीं लिया गया। कोई प्रायोजक नहीं था। शुभचिंतकों के सुझावों को ठुकराते हुए समूह ने तय किया कि अपनी ताकत से जितना चल सके, उतना चलाया जाएगा।
मिस्ड कॉल अभियान के जरिए दस लाख से अधिक लोगों ने समर्थन दिया। मांग साफ थी-प्रधानमंत्री बनने से पहले ही मोदी के नाम की घोषणा हो। 2014 में जब मोदी प्रधानमंत्री बने, तो इस समूह ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से बधाई दी और अपने काम में लग गया। प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण के बाद वे उनसे मिलने नहीं गए। अपेक्षा सिर्फ इतनी थी कि देश का सिर कभी झुकने न दे और मोदी प्रधानमंत्री बनकर काम करें।

बारह साल बाद: अमित शाह के जन्मदिन की पूर्व संध्या पर नया अभियान
2026 में, अमित शाह के जन्मदिन से एक दिन पहले, वही समूह फिर सामने आया। उन्होंने कहा: “हम प्रधानमंत्री मोदी के प्रशंसक हैं। वे जब तक चाहें प्रधानमंत्री रहें। लेकिन उनका अंश हमें अमित शाह में दिखता है। इसलिए अमित जी हैं मोदी अंश।”
2014 का अभियान मोदी के जन्मदिन से एक दिन पहले शुरू हुआ था; यह अभियान शाह के जन्मदिन की पूर्व संध्या पर। समूह का कहना है कि बारह सालों में उन्होंने मोदी की कार्यशैली, निर्णय क्षमता और राष्ट्रहित को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति को करीब से देखा। उसी प्रवृत्ति का स्पष्ट प्रतिबिंब उन्हें गृह मंत्री अमित शाह में दिखाई देता है।
मोदी अंश क्यों? हनुमान और नीब करौली बाबा की तरह
हनुमान भक्तों की परंपरा में नीब करौली बाबा को हनुमान का अंश माना जाता है। यह धारणा किसी औपचारिक घोषणा से नहीं, बल्कि गुणों, भक्ति और कार्यशैली की समानता से बनती है। ठीक उसी तरह ये नागरिक “मोदी अंश” की बात कर रहे हैं-किसी पार्टी प्रस्ताव से नहीं, बल्कि देखे-समझे गुणों के आधार पर।
समूह के अनुसार, मोदी में जो दृढ़ता, संगठनात्मक कौशल, राष्ट्रहित में कठोर निर्णय लेने की क्षमता और जमीनी स्तर तक पहुंच बनाने की कला है, वही गुण अमित शाह में भी स्पष्ट हैं। गृह मंत्रालय के कामकाज में आंतरिक सुरक्षा, कानून व्यवस्था और प्रशासनिक दक्षता को लेकर जो निरंतरता दिखी है, उसे वे मोदी की कार्यशैली का विस्तार मानते हैं। शाह की भूमिका को वे मोदी के राजनीतिक और प्रशासनिक दर्शन का स्वाभाविक विस्तार बताते हैं-जैसे कोई गुरु के गुण शिष्य में, या किसी महान व्यक्तित्व का अंश उसके निकटतम सहयोगी में दिख जाए।
अभियान फिर से स्वायत्त है। किसी बड़े नेता से मुलाकात या प्रायोजन की मांग नहीं की गई है। समूह का जोर इस बात पर है कि नागरिकों को अपने पसंदीदा नेतृत्व की पहचान करने और उसे सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने का अधिकार है। वे कहते हैं कि 2012 में भी यही तर्क था, और आज भी वही है।
नागरिकों की स्वायत्त आवाज
यह समूह बार-बार दोहराता है कि वे भाजपा के कार्यकर्ता नहीं हैं। उनकी पहचान मतदाता और नागरिक की है। 2012 में उन्होंने जो जोखिम उठाया था-कि पार्टी के अंदरूनी निर्णय के बावजूद बाहर से नाम आगे बढ़ाया-उसे आज भी वे याद करते हैं। उनका तर्क है कि लोकतंत्र में नागरिकों को यह अधिकार है कि वे देखें और कहें कि किस नेता में वे अपने पसंदीदा प्रधानमंत्री की कार्यशैली का अंश देखते हैं।
अमित शाह को ‘मोदी अंश’ कहने का मतलब उत्तराधिकार की घोषणा नहीं है। इसका मतलब है कि मोदी की दृष्टि, अनुशासन और राष्ट्र-प्रथम की भावना का एक स्पष्ट रूप गृह मंत्री में दिखता है। जैसे नीम करोली बाबा की परंपरा में हनुमान के गुणों को पहचानने की बात होती है, वैसे ही यहां नागरिक मोदी के गुणों को शाह में पहचान रहे हैं।
अभियान अभी प्रारंभिक चरण में है। पोस्टर और सोशल मीडिया के जरिए संदेश जा रहा है। समूह का दावा है कि 2012 की तरह ही यह भी बिना किसी बाहरी दबाव या प्रायोजन के चल रहा है। उनका अंतिम संदेश सरल है: प्रधानमंत्री मोदी जब तक चाहें प्रधानमंत्री रहें; लेकिन जो अंश उनमें है, वह अमित शाह में भी दिखता है।

आन्दोलन और समाधान पर आदरणीय डाक्टर मोहन भागवत जी विजयादशमी उद्बोधन में 

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अवधेश कुमार

दिल्ली । भारत सहित सारे विश्व में जो-जो भद्रता, मांगल्य, सांस्कृतिक व मानवीय संस्कार है, वह सारा नष्ट-भ्रष्ट उद्धवस्त करने की आसुरी प्रतिज्ञा लेकर पश्चिम से एक आंधी चली है। विश्व भर के तथाकथित प्रगत देश भी उस से त्रस्त, असहाय हैं। परन्तु, पिछले दशकों में भारत ने स्वयं की शक्ति तथा सुनीति के कारण विश्व में धीरे-धीरे अपना स्थान बनाया है। भारत के समाज का पुरुषार्थ, सुदृढ़ नीतियाँ, नेतृत्व, देशाभिमान तथा विश्व के प्रति अपने दायित्व के बोध की जागृति के कारण सभी क्षेत्रों में यशस्वी हो रहा है। भारत की इस प्रकार की प्रगति के कारण विश्व के राष्ट्रों में अराजगता खड़ी कर अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए सहायक हो सकने वाले अपने पिट्ठुओं को वहां स्थापित करने का षडयंत्र करने वाली ताकतों के खेल बंद होंगे।

इस वस्तुस्थिति को ये आसुरी ताकतें जानती हैं। इसलिए भारत ही उस का निर्णायक व सब से बलवान प्रतिस्पर्धी और अंतिम एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्ष्य है। भारत, हिन्दू व संघ को किस प्रकार तोड़ सकते हैं (dismantling), इसका विचार कर, योजना बना कर वे कार्य करती हैं। उन्हीं की प्रकृति के कुछ लोग इसमें उन्हें सहायता के लिये मिल जाते हैं। क्षुद्र सत्ता स्वार्थ तथा विवेकहीनता के कारण कुछ महत्वाकांक्षी नेता लोग भी शामिल होते हैं। अपने इतने बड़े समाज में समस्याएँ तो हैं। व्यवस्था की कमियाँ भी ढेर सारी होंगी। उनके चलते आंदोलनों का होना भी स्वाभाविक ही है। परन्तु आंदोलन समाधान देने के लिए होने चाहिए। आन्दोलन करने वाला समाज का कोई समूह हो, शांति व सुव्यवस्था कायम रखने के लिए कार्यवाही करने वाला शासन-प्रशासन या राजनीतिक नेतागण हो, अपने एक अखंड समाज में हमारी करनी के कारण किसी प्रकार की अनबन, द्वेष, त्वेष, मलाल या विभाजन पैदा नहीं होना चाहिए, भावनाएं तीव्र होने पर भी हमारे संविधान कानून की मर्यादा में, बोल चाल के भद्र व्यवहार के संकेतों की मर्यादा में हमारी कृतियाँ हों, यह ध्यान रखना चाहिए। वोट, सस्ती लोकप्रियता अथवा राजनीतिक लाभ का लोभ हमारे विवेक व सद्भावना पर हावी न हो, यह चिंता करनी ही पड़ेगी।
समाज के उद्यम से समाधान
समाज की सब समस्याएं शासन ही सुलझा सकता है अथवा आन्दोलनों से ही समस्याएं सुलझती हैं, ऐसा भी अनुभव नहीं है। समाज की सक्रियता व आपसी संवाद के आधार पर भी समस्याओं का समाधान निकल सकता है।
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