चंद्रचूड़ का बोलना महत्वपूर्ण है और उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है उनके बोलने की टाइमिंग

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अभिनव आलोक

सरकार नहीं चाहती कि कोई भी कुछ बोले, कम से कम सेंसिबल बात तो नहीं ही बोले। कोई भी सत्ता अभिव्यक्ति के खिलाफ ही होती है। यह सत्ता के इंटरनल मेकअप के सर्वथा अनुकूल है। संभव है जस्टिस चंद्रचूड़ के बोलने के कंटेंट से भले ही सत्ता पक्ष को कोई एतराज न हो, मगर टाइमिंग से एतराज झलक रहा है। सीधे तौर पर तो ये लोग भले ही चंद्रचूड़ की आलोचना न करें, अंदरखाने बहुत दुखी हैं, वैसे ये भी हो सकता है कि जानबूझ कर दुखी होने का दिखावा कर रहे हों, संभावनाओं का कोई अंत नहीं। मनोज नरवणे की किताब को अभी तक स्क्रूटनी के नाम पर इसी लिए फंसाए हुए हैं। सत्ता लोगों के बोलने से डरती है, झूठ बोलने से खुश होती है, वास्तविकता के किसी भी पक्ष को सही-सही बयान करने वालों से सत्ताधारियों को तकलीफ होती है, देह में आग लग जाती है। मीडिया, यूट्यूब, नेताओं, उनके प्रवक्ताओं के माध्यम से चौबीसों घंटे अनाप-शनाप, बेमतलब की फालतू बातें की जा रही हैं — यह सब सत्ता के मनोनुकूल है।

एक रिटायर्ड जज को अपने फैसले के बारे में बाद में टिप्पणी करनी चाहिए या नहीं, इस पर कोई कानून नहीं है। सच तो यह है कि न्यायाधीशों से अपेक्षा की जाती है कि वे अकादमिक तौर पर अपने फैसलों के बारे में गंभीरता से सेमिनारों, लॉ कॉलेजों में बोलें, आर्टिकल लिखें। किसी भी न्यायधीश को अपने फैसलों के बारे में सेवा-समाप्ति उपरांत गंभीर बात करने से नहीं रोका जा सकता।

चंद्रचूड़ के बोलने और उससे ज्यादा उनके बोलने के टाइम और जिस प्लेटफॉर्म को उन्होंने चुना, उससे सत्ताधारी नाखुश हो सकते हैं। उन्हें और ज्यादा नाखुश करने की ज़रूरत है। देश की सेवा में उच्चतर स्तर पर काम किए लोगों को अपनी बात खुलकर रखनी चाहिए। इसमें मेरा भी फायदा है, देश का भी फायदा है। जब भी ऊंचे पदों से रिटायर्ड लोग बात करते हैं, तो हम जैसे जानने-समझने वालों का फायदा होता है। हमें चीज़ों को देखने का वो पर्सपेक्टिव मिलता है, जिसे हम किताबों और अखबारों से नहीं जान सकते।
बड़े पदों पर पहुंचे लोगों को ज्यादा से ज्यादा बोलना और लिखना चाहिए। इन पदों पर पहुंचे कुछ लोग मार्कण्डेय काटजू की तरह सत्ता के कृपापात्र और अपने पद की गरिमा के सर्वथा प्रतिकूल व्यवहार करने वाले भी हो सकते हैं। ऐसे लोगों को भी बोलना-लिखना चाहिए ताकि हम जैसे लोग समझ सकें कि ऊंचे पदों पर पहुंचे लोगों के चुनाव में सत्ताधारी किस प्रकार का भ्रष्टाचार करते हैं। अगर काटजू मुंह नहीं खोलते, चुप रहते तो उनकी मूर्खता का पता भी नहीं चलता।
किसी भी परिस्थिति में बड़े पदों पर पहुंचे लोगों का बोलना जनहित में है। पूर्व आर एंड ए डब्ल्यू चीफ अमरजीत सिंह दुलत कांग्रेस के करीबी है, हर व्यक्ति की अपनी राजनीतिक समझ और झुकाव होता है, दुलत साहब की किताबें चाहे कश्मीर के बारे में हो या राजनेताओं के साथ उनके संबंधों पर आधारित संस्मरण हो, पाठकों को संवर्धित ही किया है। उनकी पॉलिसी गलत थी, ओल्ड फैशन्ड थी, ज्यादा नरम थी, जो भी थी वो अपने समय की पैदाइश थी। दुलत साहब ने सरकारी सेवा में रहते जो भी किया हो, अपनी किताबों के लिए वो हमेशा जाने जाते रहेंगे।
चंद्रचूड़ ने कोई गलती नहीं की है। हम चाहेंगे कि उनके जैसे लोग ज्यादा से ज्यादा सामने आएं और साफ तरीके से अपनी बात करें। यह जनहित में है, देशहित में है, मेरे व्यक्तिगत हित में है। अभिव्यक्ति की आज़ादी का यही उद्देश्य है। टीवी एंकरों, उनके द्वारा इकट्ठा किए गए फर्जी विश्लेषकों, राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं और सुबह से शाम तक बकलोली करने वाले राजनेताओं की बकचोदी को एम्प्लीफाई करने के लिए अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं है। मेरा बस चले तो इनकी बकचोदी करने की आज़ादी को चुटकियों में मसल दूं। मगर अभिव्यक्ति के नाम पर बकचोदी करने का भी अधिकार है। वे करें, उनको धीरे-धीरे इग्नोर करना हम सीख लेंगे। ये सबसे खराब और कंटेंट-विहीन वक्ता लोग हैं। सत्ताधारी ऐसे ही कंटेंट-विहीन, उथली बातों को बढ़ावा देकर असली अभिव्यक्ति को कुंद करते हैं।

बोलो चंद्रचूड़ साहब, बोलो। सत्ताधारियों के चमचों की परवाह किए बिना बोलो। बोलो कि लब आज़ाद हैं तेरे। तुम्हें मालूम है कि कब, कितना और कैसे बोलना है।

और हां, जो भी सुन रहा हो कान खोलकर सुन लो — मसले कोर्ट के माध्यम से ही तय होंगे। तीन या तेरह नहीं, जितने भी मसले हैं उनके लिए कोर्ट के दरवाजे खुलने ही होंगे। संसद और सरकार जनता और न्यायालय के बीच दीवार नहीं खड़ी कर सकती। यह पूरा सिस्टम आवाम के साथ न्याय करने के वादे के ऊपर ही बनाया गया है। कोर्ट नेहरूजी को भी पसंद न था, नवी अनुसूची ले के आ गए, मोदी जी को भी पसंद नहीं होगा। मगर संविधान ने शक्तियों का बंटवारा किया हुआ है, जब तक संसद है, कोर्ट भी रहेंगे, इनके बीच खींच तान भी रहेगा, इनके शक्तियों का बैलेंस ठीक माध्य और माध्यिका के आसपास बना रहना चाहिए। यही शुभ और बेहतर स्थिति है वर्तमान लोकतांत्रिक मॉडल के लिए। चीन को देखकर हाह मारने से कुछ नहीं होगा, चीन का मॉडल अलग है, उसके तरीके और नतीजे अलग होंगे।

सिविल सोसाइटी को अपना वॉल्यूम और पीच दोनों बढ़ा देना चाहिए, यह सही समय है। और हां, बात सेंसिबल कीजिए, प्रोपेगेंडा को न्यूनतम रखिए, सच बोलिए। यही रास्ता है। झूठ और प्रोपेगेंडा फैलाने वालों को बीच बीच में रेलना भी जरूरी है क्योंकि ये अंततः सबका नुकसान करते हैं। कविता, कहानी, सिनेमा प्रोपेगेंडा का माध्यम है, उसको सिर्फ मजा लेने के लिए देखे पढ़े।

(अभिनव आलोक के सोशल मीडिया दीवार से)

आगरा: ताजमहल से परे

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आगरा: सुबह के धुँधलके में जब यमुना पर हल्की धुंध तैर रही थी और शहर की गलियों में सिर्फ़ परिंदों की चहचहाहट गूँज रही थी, तब लगा मानो आगरा अपनी साँसें रोककर हमें पुकार रहा हो—“क्या तुम मुझे सिर्फ़ ताजमहल समझते हो? या मेरी धड़कनों को भी सुनोगे, जो इन गलियों, हवेलियों, मंदिरों-मस्जिदों और कारख़ानों में सदियों से गूँज रही हैं?”
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विश्व पर्यटन दिवस (27 सितम्बर) की आहट है, और आगरा एक बार फिर अपने पुराने जादू को सँभालकर सैलानियों का इंतज़ार कर रहा है। लेकिन सवाल वही—क्या ताजमहल ही सब कुछ है? या इस शहर की रूह संगमरमर की दीवारों से कहीं आगे जाती है? इसी सवाल को साथ लेकर हम निकल पड़े बैटरी रिक्शे की धीमी चाल पर, जब सुबह की ठंडी हवा अभी लोगों को बिस्तर से बाहर नहीं निकाल पाई थी।

एतमाउद्दौला से दारा शिकोह तक:
यात्रा की शुरुआत यमुना किनारे एतमाउद्दौला पार्क से हुई। यहाँ रोज़ यमुना की आरती होती है। पाँच मुग़ली यादगारें एक साथ नज़र आती हैं—इतिहास और नदी की ख़ामोशी का दुर्लभ संगम।
फिर रुके हम पुरानी चुंगी पर—दारा शिकोह की किताबों की लाइब्रेरी। रोशनी और हवा से भरे उसके कमरे आज भी पढ़ने वालों को आवाज़ देते हैं। वही दारा, जो संस्कृत और फ़ारसी का सेतु बना, जिसकी सोच में हिन्दू-मुस्लिम तहज़ीब की गूँज थी। आज़ादी की लड़ाई में भी यह लाल पत्थर की इमारत क्रांतिकारियों की प्रेरणा रही।

बेलनगंज की खुशबू और ग़ालिब की हवेली:
बेलनगंज की सँकरी गलियों ने हमें खींच लिया। मिठाइयों की भाप, भगत हलवाई की दास्तान और श्री मथुराधीश मंदिर की प्राचीन छटा—सब एक साथ। फिर कचहरी घाट से होते हुए पहुँचे हज़ूरी भवन, जहाँ राधास्वामी संप्रदाय की आध्यात्मिक हवा अब भी बह रही है।

काला महल के पास दिल थम गया। यहीं पहली साँस ली थी मिर्ज़ा ग़ालिब ने। अगर दीवारें बोल पातीं तो कितनी ग़ज़लें सुनातीं। अब यहाँ लड़कियों का कॉलेज है। आसपास माल का बाज़ार, सेव का बाज़ार, कश्मीरी बाज़ार—ऊँची बालकनियाँ, खिड़कियों से झाँकती आँखें, मोहल्लों का शोरगुल। यही है असली आगरा।

एक साथी ने आह भरी—“कितना खालीपन है अब मोहल्लों का! मिठाइयों की खुशबू, नुक्कड़ की रंगत, काम में डूबे चेहरों का शोर—सब गुम हो गया।” सचमुच, पुराने वक्त का इश्क़ अब धुंधला पड़ता जा रहा है।

मंदिर, मस्जिद और बाज़ार की रौनक:
मंकामेश्वर मंदिर, जामा मस्जिद और जोहरी बाज़ार—तीनों के बीच घुलती-सुनहरी सुबह। मसालों की ख़ुशबू नाक गुदगुदाती है। किनारी बाज़ार की गलियाँ किसी फ़ारसी क़सीदे जैसी। दुकानदार हँसकर कहते हैं—“नई कॉलोनियों में बाज़ार खुले होंगे, मगर असली खरीदार आज भी हमारी दुकानों तक आते हैं। शादी-ब्याह हो या यादगार तोहफ़ा—बिना किनारी के कहाँ पूरी होती है रस्म?”

रेलवे, चिमन और पेठे की चाशनी:
आगरा फोर्ट स्टेशन—दुनिया का अकेला स्टेशन जो दो विश्व धरोहरों के बीच बसा है। अब मेट्रो रेल से भी जुड़ चुका है, जबकि bijlighar चौराहे का ‘बिजलीघर’ 1978 में बंद हो चुका है। सिर्फ रौनक है श्री राम पूरी भंडार जो रात दिन खुला रहता है। उधर स्टेशन के बाहर पान की मंडी, और चिमन पूरी वाले की खुशबू, सेठ गली के हलवाई और श्राद्ध पक्ष में इमरती-मालपुए की छनछनाहट। नूरी दरवाज़ा और गुड़ की मंडी से होते हुए पहुँचे पेठे के अड्डे तक। यहीं से पैदा हुआ वो चासनी में तर ताजा मीठा, “आगरा का पेठा” कहलाकर दुनिया भर में मशहूर हुआ।

ईसाई विरासत और बदलता शहर:
सेंट पैट्रिक जूनियर कॉलेज—एशिया का सबसे पुराना कॉन्वेंट 1842 में, बगल में प्रतिष्ठित 1846 में स्थापित सेंट पीटर्स कॉलेज। पास ही खड़े चर्च, आर्चबिशप हाउस और कैथेड्रल—अपनी नफ़ासत से दिल जीतते हैं। घाटिया आज़म से वज़ीरपुरा तक कैथोलिक तालीमी स्कूलों का जाल फैला है, जहाँ 20 हज़ार से अधिक बच्चे इल्म हासिल कर रहे हैं।

पुरानी जेल की जगह अब संजय प्लेस खड़ा है, एक चमचमाता कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स। मगर रास्ते में मिली हवेलियों की नक्काशीदार मेहराबें हमें रोक लेती हैं। ये दीवारें शहर के अतीत की गवाही देती हैं।

पत्थरों से आगे की विरासत:
आगरा तीन वक़्तों में एक साथ ज़िंदा है—मुग़ल, अंग्रेज़ी और आज़ाद भारत का दौर। मगर अफ़सोस यह है कि विरासत को सिर्फ पत्थरों और इमारतों तक सीमित कर दिया गया है।

असल धरोहर तो वो भी है—उर्दू अदब की दुनिया जहाँ ग़ालिब, नजीर अकबराबादी और मीर ने लफ़्ज़ों को अमर किया। वो भी है राधास्वामी का आध्यात्मिक धाम। वो भी है इनले वर्क, पच्चीकारी और जरदोज़ी के कारख़ाने, जहाँ कारीगर अपनी उँगलियों से पत्थरों को कविता बना देते हैं।

आगरा महज़ एक पत्थरों का शहर नहीं है। आगरा एक विचार है, एक तहज़ीब की विरासत है, एक मेल-जोल की कंपोज़िट संस्कृति का नाम है।

जब कोई सैलानी ताजमहल के सामने खड़ा होकर “वाह” कहता है, तो उसे यह भी जानना चाहिए कि उसी शहर की तंग गलियों में आज भी ग़ालिब की साँसें बसी हैं, मिठाइयों की भाप उड़ती है, मसालों की खुशबू लहराती है और मंदिर-मस्जिद-चर्च की घंटियाँ-अज़ानें एक साथ गूँजती हैं। यही है आगरा का असली जादू—एक जीती-जागती तहज़ीब, जिसे सिर्फ़ आँखों से नहीं, दिल से देखना पड़ता है।

संपादक से सेल्समैन तक: गिरती पत्रकारिता और बिकता सच

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दिल्ली । कभी अख़बार का संपादक एक संस्था हुआ करता था। उसकी एक पंक्ति से सत्ता की नींव हिल जाया करती थी। लेकिन आज हालात इतने बदल गए हैं कि अगर पाठकों से पूछा जाए, तो उन्हें अपने पसंदीदा अख़बार के संपादक का नाम तक नहीं मालूम। पत्रकारिता के मूल्यों का सूरज ढल रहा है और उसकी जगह पर बाजारू दबावों का अंधेरा छा गया है। खबर अब महज़ एक उत्पाद है, जिसकी बिक्री और टीआरपी ही सब कुछ तय करती है।

आज एडिटोरियल पन्ने सिकुड़ चुके हैं। कार्टूनिस्ट की धारदार कलम की जगह ग्राफ़िक डिज़ाइनर का माउस ले चुका है। और अब तो आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस इस भूचाल को और गहरा कर रहा है। वह दिन दूर नहीं जब अख़बारों के दफ़्तरों से ‘लाइब्रेरी’ का वो कोना भी गायब हो जाएगा, जहाँ कभी तथ्यों की खड़खड़ाहट गूंजा करती थी। यह केवल तकनीक का बदलाव नहीं, बल्कि पत्रकारिता की आत्मा का क्षरण है।

ज़्यादा पुरानी बात नहीं है—1970 का दशक। जब हम IIMC से पत्रकारिता की पढ़ाई कर बाहर निकले थे, तब अख़बारों के संपादक देश की बड़ी हस्तियाँ होते थे। बी.जी. वर्गीज, शामलाल, मुलगांवकर, कुलदीप नायर, ईरानी, खुशवंत सिंह, राजेंद्र माथुर, सर्वेश्वर, श्री कांत, राठी जी, श्री अज्ञेय, रतनलाल जोशी, धर्मवीर भारती, बगैरा… यह सभी नाम पत्रकारिता की बुलंदियों का प्रतीक थे। उस दौर के कार्टूनिस्ट्स फ्लैग बीयर्स थे, लक्ष्मण, रंगा, चो, सुधीर दर, काक। उस दौर में अख़बारों को एक पवित्र पेशा माना जाता था। न्यूज़ रूम किसी इबादतगाह से कम न थे, जहाँ सच की खोज और सत्ता को आईना दिखाना ही सबसे बड़ा उद्देश्य था।

विज्ञापन और पब्लिक रिलेशन वालों को शक की नज़र से देखा जाता था। कई अख़बारों में तो मार्केटिंग मैनेजर का न्यूज़ रूम में दाख़िल होना भी नामुमकिन था। एक साफ़ लक्ष्मण रेखा खिंची हुई थी, जिसका सब सम्मान करते थे।

लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। आज अधिकांश पत्रकार नेता और सत्ता की कृपा दृष्टि के लिए लालायित रहते हैं। जो चीज़ पहले परदे के पीछे, बहुत बारीकी से होती थी, आज खुलेआम और बेपरवाह अंदाज़ में सामने आ रही है। अब पत्रकार खुद इंफ़्लुएंसर, दलाल, बिचौलिये और लॉबिस्ट बन चुके हैं।

जो लोग कभी हक़ीक़त बयान करते थे, वही अब प्रोडक्ट बेचने, नेताओं का प्रचार करने और अफ़वाह फैलाने में जुटे हैं। मीडिया हाउसों में कंसल्टेंट और फिक्सर बाक़ायदा कुर्सियाँ पकड़ चुके हैं। खेल अब छिपा नहीं है, मगर खतरनाक ज़रूर है।

आजाद और बेबाक पत्रकारिता की क़ीमत गिर चुकी है। खबरें अब महज़ तथ्यों का बयान नहीं रहीं, बल्कि राय और मसालेदार तड़के में डुबोकर परोसी जाती हैं ताकि टीआरपी और क्लिक मिल सकें। मोटे पैकेज, आरामदेह लाइफ़स्टाइल और चमक-दमक की चाह में समझौते और सौदेबाजी आम हो चुकी है। ब्लैकमेलिंग के आरोप भी बार-बार उठते हैं।

प्रेस कॉन्फ़्रेंसों में गिफ़्ट्स देकर कवरेज पाना आज “नॉर्मल” है। नकद लिफ़ाफ़े और गिफ़्ट वाउचर खुलेआम दिए जाते हैं। खबरें अब खबर कम और प्रायोजित पैकेज ज़्यादा लगती हैं।

डिजिटल मीडिया ने इस गिरावट की रफ़्तार और तेज़ कर दी है। टीवी चैनल, अख़बार और न्यूज़ पोर्टल अब इश्तिहार और खबर के बीच की लकीर मिटा चुके हैं। प्रायोजित कंटेंट को खबर बनाकर परोसा जाता है। ब्रांड्स तय करते हैं कि कौन-सी स्टोरी छपेगी और कौन-सी दबा दी जाएगी।

नीरा राडिया टेप्स पहले ही उजागर कर चुके थे कि कैसे बड़े-बड़े पत्रकार कॉर्पोरेट और सियासत के बीच बिचौलिये की भूमिका निभा रहे थे। आज “गोदी मीडिया” का तमगा इस मिलीभगत का ही सबूत है।

यह बीमारी केवल हिंदुस्तान तक सीमित नहीं है। अमरीका में 2020 के चुनावों के दौरान इंस्टाग्राम और टिकटॉक के इंफ़्लुएंसर बाक़ायदा पैसे लेकर प्रचार कर रहे थे। हॉलीवुड के नेटिव ऐड्स हों या बॉलीवुड की प्रेस जंकेट्स, हर जगह पत्रकारिता और प्रचार गड्ड-मड्ड हो चुके हैं।

असल वजह है कमर्शियल दबाव। न्यूज़ रूम छोटे हो रहे हैं, बजट घट रहा है, और पत्रकार ग़िग-इकॉनॉमी में जूझ रहे हैं। ऐसे में कॉर्पोरेट मालिक और राजनीतिक रिश्तेदार अपनी मनचाही खबरें छपवा लेते हैं। जो पेशा कभी वॉचडॉग कहलाता था, वह अब सत्ता और पूँजी का भोंपू बन चुका है।

कुछ लोग कहते हैं कि अब लॉबिंग ही पत्रकारिता है, इसी से रोज़ी-रोटी चलती है। लेकिन यह मान लेना दरअसल पत्रकारिता की मौत को स्वीकार करना है। जब सच बिकाऊ माल बन जाए और पत्रकार महज़ दलाल, तो लोकतंत्र का पूरा ढांचा हिल जाता है।

लेकिन अभी भी देर नहीं हुई है। हालात सुधारे जा सकते हैं, अगर पाठक और दर्शक यह मांग करें कि खबर और विज्ञापन को साफ़-साफ़ अलग रखा जाए। प्रायोजित कंटेंट को स्पष्ट लेबल किया जाए और मीडिया संस्थान सब्सक्राइबर आधारित मॉडल अपनाएँ।

सबसे अहम है मीडिया साक्षरता—ताकि आम पाठक यह पहचान सके कि कौन-सी बात सच है, कौन-सी राय है और कौन-सा महज़ प्रचार है।

गिरती हुई पत्रकारिता की क़ीमत सिर्फ़ पेशे का संकट नहीं है, बल्कि लोकतंत्र का सवाल है। अगर मीडिया सत्ता का चेहरा दिखाने लगे और समाज की असली सूरत छिपा दे, तो लोकतंत्र का आईना धुंधला पड़ जाता है।

इसलिए पत्रकारिता की इज़्ज़त और शुचिता को वापस लाना ज़रूरी है। यह महज़ पुरानी यादों की कसक नहीं है, बल्कि मुल्क के भविष्य की गारंटी है। सच बोलने वाली कलम को बचाना ही लोकतंत्र को बचाना है।

नवरात्रि का नया रंग: तेजस्वी का हेलीकॉप्टर मटन मसाला

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पटना। नवरात्रि का पावन पर्व, माँ दुर्गा की भक्ति, उपवास, और शुद्धता का समय। लेकिन बिहार की सियासी गलियों में नवरात्रि का रंग कुछ और ही है। इस बार तेजस्वी यादव ने हेलीकॉप्टर से उतरते ही नया कारनामा कर दिखाया। न मछली खा रहे, न मटन का नाम ले रहे, बल्कि पटना की गलियों में राहुल गांधी और लालू प्रसाद के साथ मिलकर चंपारण मटन की कढ़ाई चढ़ा दी। यह नजारा देखकर माँ दुर्गा भी शायद सोच में पड़ जाएँ कि यह भक्ति है या भोज का नया अंदाज?

कहानी कुछ यूं है। नवरात्रि शुरू होते ही तेजस्वी ने सोचा, क्यों न इस बार कुछ अलग किया जाए? हेलीकॉप्टर तो पुराना हो गया, अब तो कढ़ाई में तड़का लगाने का समय है। लालू जी, जो हमेशा चारा कटने की बात करते थे, इस बार मसाले छौंकने में जुट गए। राहुल गांधी, जो कभी पप्पू तो कभी शहजादे कहलाते हैं, मटन काटने की कला में माहिर निकले। पटना के किसी गुप्त ठिकाने पर ये तिकड़ी जमा, और चंपारण मटन की खुशबू ने पूरे बिहार को लपेट लिया।

स्थानीय भक्तों का कहना है, “नवरात्रि में माँ को प्रसाद चढ़ता है, लेकिन यहाँ तो मटन का मेला सजा है!” कोई कहता, “तेजस्वी भइया का हेलीकॉप्टर अब मसाला एक्सप्रेस बन गया।” लालू जी ने हँसते हुए कहा, “देखो बेटा, मटन में मसाला और सियासत में रंग, दोनों सही डालने से ही बनते हैं।” राहुल जी ने भी अपनी ‘भारत जोड़ो’ स्टाइल में जोड़ा, “यह मटन नहीं, एकता का स्वाद है!”

लेकिन सवाल यह है कि नवरात्रि में यह मटन-महोत्सव क्या संदेश दे रहा है? शायद यह कि सियासत में नवरात्रि हो या न हो, स्वाद और वोट का मेल हमेशा चलता है। जनता देख रही है, माँ दुर्गा भी देख रही हैं। अब देखना यह है कि यह चंपारण मटन वोटरों के दिल में उतरता है या सिर्फ़ कढ़ाई तक सीमित रहता है।

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