भोजशाला : जब इतिहास की राख से फिर उठी सभ्यता बोल उठी

dhar-bhojshala-verdict_202605323734.jpg

प्रणय विक्रम सिंह

भोपाल । सभ्यताएं केवल पत्थरों, प्राचीरों और पुरातात्विक अवशेषों से नहीं बनतीं। वे स्मृतियों, श्रद्धा, ज्ञान और आत्मा के उन अदृश्य सूत्रों से निर्मित होती हैं, जिन्हें तलवारें काट नहीं सकतीं, फरमान मिटा नहीं सकते और आक्रमण पराजित नहीं कर सकते।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने भोजशाला-कमाल मौला कॉम्प्लेक्स की धार्मिक प्रकृति को भगवती वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर माना है। यह राजा भोज (परमार वंश) द्वारा स्थापित संस्कृत शिक्षा केंद्र था।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला परिसर की धार्मिक प्रकृति को भगवती वाग्देवी (माँ सरस्वती) का मंदिर मानना केवल एक न्यायिक निर्णय नहीं, बल्कि उस सभ्यतागत सत्य की पुनर्पुष्टि है, जिसे सदियों तक धूल, ध्वंस और दमन के नीचे दबाने का प्रयास किया गया, किन्तु जिसे मिटाया नहीं जा सका।

यह वही भोजशाला है, जिसे परमार वंश के महान प्रतापी राजा भोज ने ज्ञान, संस्कृत और माँ वाग्देवी की आराधना के केंद्र के रूप में स्थापित किया था। यहां केवल पूजा नहीं होती थी, यहां भारत की वैदिक चेतना श्वास लेती थी। यहां शब्द साधना थी, शास्त्रार्थ था, संस्कृत की स्वर लहरियां थीं, और ज्ञान को ईश्वर मानने वाली भारतीय सभ्यता का आलोक था। यह केवल मंदिर नहीं था, यह भारतीय बौद्धिकता, भारतीय ज्ञान और भारतीय अध्यात्म का समन्वित विश्वविद्यालय था। किंतु भारत के इतिहास का एक लंबा कालखंड ऐसा भी रहा, जब बाहरी आक्रमणकारियों ने इस भूमि की आत्मा को तोड़ने का प्रयास किया। मंदिरों को केवल पत्थरों का ढांचा नहीं समझा गया, उन्हें भारतीय समाज की सांस्कृतिक रीढ़ मानकर लक्ष्य बनाया गया। क्योंकि आक्रमणकारी जानते थे कि यदि किसी सभ्यता की स्मृतियों, प्रतीकों और आस्था केंद्रों को ध्वस्त कर दिया जाए, तो उसके आत्मविश्वास को घायल किया जा सकता है।

सोमनाथ से काशी तक, मथुरा से मार्तंड तक और भोजशाला से नालंदा तक इतिहास के पन्नों पर ऐसे असंख्य रक्तरंजित अध्याय अंकित हैं, जहां केवल इमारतें नहीं टूटीं, बल्कि भारतीय अस्मिता को अपमानित करने का सुनियोजित प्रयास हुआ। आक्रमण केवल भूभाग पर नहीं, भारत की स्मृति पर था।

पुस्तकालय जलाए गए, विद्यापीठ ध्वस्त किए गए, मूर्तियों को खंडित किया गया, और सभ्यता की स्मृतियों पर पराये प्रतीकों का आवरण चढ़ाने का प्रयास किया गया। भोजशाला भी उसी पीड़ा की साक्षी बनी। जहां कभी सरस्वती वंदना गूंजती थी, वहां इतिहास को बदलने के प्रयास हुए। जहां ज्ञान का दीप प्रज्वलित था, वहां पहचान का अंधकार थोपा गया। किन्तु सनातन की विशेषता यही है कि वह पराजित नहीं होता। वह प्रतीक्षा करता है। वह सहता है। वह समय के गर्भ में सत्य को सुरक्षित रखता है।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने उपलब्ध ऐतिहासिक साहित्य, पुरातात्विक साक्ष्यों, सतत उपासना परंपरा और वैज्ञानिक जांच के आधार पर यह स्पष्ट किया कि भोजशाला माँ वाग्देवी का प्राचीन मंदिर एवं संस्कृत शिक्षा का केंद्र थी। यह निर्णय किसी भावनात्मक आवेग का परिणाम नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया, पुरातात्विक परीक्षण और न्यायिक विवेक की कसौटी पर आया हुआ निर्णय है।

यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि न्यायालय ने ASI जैसी विशेषज्ञ संस्था की जांच, दोनों पक्षों की दलीलों, ऐतिहासिक प्रमाणों और प्रत्यक्ष निरीक्षण के बाद यह निर्णय दिया। यह बताता है कि भारत का संविधान और न्यायपालिका सत्य तक पहुंचने की क्षमता रखते हैं, यदि धैर्य और विश्वास बनाए रखा जाए।

यह निर्णय सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। लंबे समय तक भारत में ऐतिहासिक सत्य पर चर्चा को ही विवाद बना दिया गया। सभ्यतागत पीड़ा की अभिव्यक्ति को सांप्रदायिकता कहकर दबाने का प्रयास हुआ। मंदिर विध्वंसों की स्मृतियों को ‘अतीत भूल जाओ’ कहकर ढंकने का प्रयास किया गया। लेकिन कोई भी समाज अपने घावों को स्वीकार किए बिना स्वस्थ नहीं हो सकता।

भोजशाला का निर्णय इस बात का संकेत है कि आधुनिक भारत अब अपनी सभ्यता के इतिहास से आंखें चुराने के बजाय उसका संतुलित और तथ्याधारित पुनर्पाठ करने को तैयार है।

राजनीतिक दृष्टि से भी यह निर्णय भारत की बदलती चेतना का प्रतीक है। यह उस ‘नए भारत’ का संकेत है, जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों को लेकर संकोचग्रस्त नहीं है। जो यह मानता है कि विकास और विरासत साथ-साथ चल सकते हैं। जो मंदिरों को केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्मृति और सभ्यतागत पहचान के केंद्र के रूप में देखता है।

यह निर्णय उन करोड़ों भारतीयों के मन में विश्वास भी जगाता है, जिन्होंने दशकों तक यह अनुभव किया कि उनकी आस्था, उनकी पीड़ा और उनकी सांस्कृतिक स्मृतियां सार्वजनिक विमर्श में उपेक्षित रहीं। भोजशाला का निर्णय उन्हें यह आश्वासन देता है कि संवैधानिक और न्यायिक प्रक्रिया के भीतर रहते हुए भी ऐतिहासिक न्याय संभव है।

इस निर्णय का सबसे बड़ा संदेश यह है कि सनातन केवल पूजा पद्धति नहीं, बल्कि एक जीवित सभ्यता है। उसे तलवारों से घायल किया जा सकता है, लेकिन समाप्त नहीं किया जा सकता।

आज भोजशाला का प्रश्न केवल एक मंदिर का प्रश्न नहीं है। यह भारत की उस ज्ञान परंपरा का प्रश्न है, जिसने विश्व को व्याकरण दिया, दर्शन दिया, गणित दिया, अध्यात्म दिया। यह उस सांस्कृतिक अस्मिता का प्रश्न है, जिसे बार-बार मिटाने का प्रयास हुआ, लेकिन जो हर बार और अधिक तेजस्विता के साथ पुनः खड़ी हो गई।

न्यायालय द्वारा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में स्थापित मां सरस्वती की प्रतिमा को भारत वापस लाने की दिशा में विचार करने संबंधी टिप्पणी भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह प्रतिमा केवल मूर्ति नहीं है, वह भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। उसका पुनः भोजशाला में स्थापित होना वस्तुतः इतिहास की टूटी हुई कड़ी का पुनर्संयोजन होगा। वह केवल प्रतिमा की वापसी नहीं होगी, वह भारतीय आत्मा की घर-वापसी होगी।

किन्तु इस निर्णय को प्रतिशोध या पराजय के भाव से नहीं देखा जाना चाहिए। यह किसी समुदाय की हार नहीं है। यह ऐतिहासिक सत्य की स्वीकृति है।

अब आवश्यकता भोजशाला को पुनः ज्ञान और संस्कृत साधना के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने की है। वहां पुनः वेदों की ऋचाएं गूंजें। वहां पुनः संस्कृत का अध्ययन हो। वहां पुनः भारत की ज्ञान परंपरा विश्व को दिशा दे। वहां पुनः यह सिद्ध हो कि यह भूमि केवल आस्था की नहीं, ज्ञान की भी जननी है। तभी यह निर्णय अपने पूर्ण अर्थ को प्राप्त करेगा।

भोजशाला हमें याद दिलाती है कि इतिहास का सत्य देर से लौट सकता है, लेकिन लौटता अवश्य है। और जब सत्य लौटता है, तब केवल एक भवन नहीं जीतता… सभ्यता मुस्कुराती है, इतिहास की राख से फिर सरस्वती उठ खड़ी होती हैं।

उर्मिला, राम के वनवास का हिस्सा भी नहीं…

images-7.jpeg

भोपाल । राम वन गए। अयोध्या रोई। दशरथ टूट गए। राजमहल की दीवारें करुणा से कांप उठीं। माताओं की आंखें सूख गईं। कैकेयी इतिहास के कटघरे में खड़ी कर दी गईं। सीता त्याग की प्रतिमा बनकर राम के साथ चल पड़ीं। लक्ष्मण भ्रातृभक्ति के अमर प्रतीक बन गए।

लेकिन उसी अयोध्या में एक स्त्री और थी… जो न वन गई, न इतिहास में ठीक से दर्ज हुई…*वह उर्मिला थीं।*

रामायण जब भी सुनाई जाती है, लोग राम के वनवास पर रोते हैं, सीता की अग्निपरीक्षा पर विचलित होते हैं, लक्ष्मण की सेवा और समर्पण पर अभिभूत हो जाते हैं। लेकिन बहुत कम लोग उस स्त्री को याद करते हैं, जिसने इन सबके बीच सबसे लंबा, सबसे मौन और सबसे एकाकी वनवास जिया।

*उर्मिला राम के वनवास का हिस्सा भी नहीं थीं… फिर भी सबसे अधिक वनवास उन्हीं ने सहा।* क्योंकि वन केवल जंगलों में नहीं होता। वन वहां भी होता है, जहां प्रतीक्षा हो। जहां विरह हो। जहां हर रात किसी की अनुपस्थिति सिरहाने बैठकर रोती हो। जहां हर सुबह किसी की आवाज़ के बिना खुलती हो। जहां जीवन चलता तो रहे, मगर भीतर सब थम चुका हो। अयोध्या के राजमहल में रहकर भी वह भीतर से वनवासी थीं। हर रात उन्होंने स्मृतियों का एक वन पार किया होगा। हर सुबह उन्होंने अपने टूटे हुए हृदय को फिर से समेटा होगा।

लक्ष्मण जब राम के साथ वन जाने के लिए खड़े हुए होंगे, तब इतिहास ने उनकी निष्ठा देखी। लेकिन उसी क्षण उर्मिला के भीतर क्या टूटा होगा, इसका कोई श्लोक नहीं लिखा गया। किसी कवि ने नहीं लिखा कि उस रात उर्मिला ने कितना रोया होगा।

किसी महाकाव्य ने यह नहीं बताया कि चौदह वर्षों की उस पहली रात उन्होंने अपने आंसुओं को कैसे चुप कराया होगा। किसी ने यह नहीं पूछा कि जिस स्त्री का पति अभी-अभी उससे दूर गया हो, वह अगली सुबह कैसे उठी होगी।

उर्मिला ने लक्ष्मण का हाथ पकड़कर यह नहीं कहा “मुझे भी साथ ले चलिए।” उन्होंने कोई प्रश्न नहीं किया। कोई प्रतिकार नहीं किया। कोई शिकायत नहीं की। और शायद यहीं से उनका तप शुरू होता है।

सीता वन गईं, इसलिए संसार ने उनके त्याग को देखा। उर्मिला महल में रहीं, इसलिए उनके दुःख को किसी ने देखा ही नहीं। लेकिन कभी-कभी पीछे छूट जाना, साथ चलने से कहीं अधिक कठिन होता है।

रामचरितमानस में तुलसीदास लिखते हैं…
“रघुकुल रीति सदा चलि आई,
प्राण जाए पर वचन न जाई।”
इस मर्यादा की रक्षा में राम वन गए। लक्ष्मण सेवा में गए।
*लेकिन उर्मिला…?*
उर्मिला ने भी उसी मर्यादा के लिए अपने समस्त स्त्रीत्व, अपने प्रेम, अपने यौवन और अपने अधिकारों का मौन समर्पण कर दिया। उन्होंने पति को रोका नहीं। क्योंकि वह जानती थीं कि लक्ष्मण केवल उनके पति नहीं, राम के अनुज भी हैं। धर्म के प्रहरी भी हैं। मर्यादा के सैनिक भी हैं। परंतु क्या कोई समझ सकता है कि उस स्त्री के भीतर कैसी आंधियां चली होंगी, जिसने अपने सुहाग को चौदह वर्षों के लिए स्वयं अपने हाथों से वन की ओर विदा किया हो?

उर्मिला ने लक्ष्मण को जाने दिया… लेकिन स्वयं वहीं ठहर गईं, जहां समय ठहर जाता है। लक्ष्मण वन में जागते रहे। लोककथा कहती है कि उर्मिला ने उनकी नींद अपने हिस्से में ले ली थी।
यह कथा चाहे प्रतीक हो, किंतु उसके भीतर छिपा सत्य बहुत गहरा है। क्योंकि हर महान पुरुष के पीछे अक्सर एक ऐसी स्त्री होती है, जो स्वयं अंधेरे में रहकर उसके भीतर का प्रकाश बचाए रखती है।

यदि लक्ष्मण चौदह वर्षों तक राम की सेवा में अडिग खड़े रह सके, तो उसके पीछे उर्मिला का मौन त्याग भी था। क्योंकि जिसे घर की चिंता न हो, जिसे पीछे छूटे रिश्तों की बेचैनी न सताए, वही पूरी निष्ठा से धर्मयुद्ध लड़ पाता है।

लक्ष्मण को *’कालजयी लक्ष्मण’* बनाने में उर्मिला का योगदान उतना ही बड़ा है, जितना दीपक में बाती का होता है। लौ दिखाई देती है, बाती नहीं। प्रकाश की प्रशंसा होती है, धीरे-धीरे जलती हुई सूत की डोरी का कोई स्मरण नहीं करता। *उर्मिला वही अदृश्य बाती हैं।*

उन्होंने युद्ध नहीं लड़ा… फिर भी हर दिन भीतर एक युद्ध जिया। उन्होंने कोई अग्निपरीक्षा नहीं दी, फिर भी चौदह वर्षों तक हर रात अपने हृदय को अग्नि में तपाया।

रामायण का प्रत्येक पात्र किसी न किसी रूप में गौरव प्राप्त करता है। राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। सीता त्याग और पवित्रता की प्रतिमा बनीं। भरत भ्रातृप्रेम के शिखर बने। हनुमान भक्ति के प्रतीक बने। लक्ष्मण सेवा और समर्पण के अमर आदर्श बने।
पर उस स्त्री का क्या, जिसने सबसे लंबा विरह जिया? उन्हें इतिहास ने बस ‘लक्ष्मण की पत्नी’ कहकर छोड़ दिया। किसी ने यह नहीं कहा कि वह विरह की सबसे बड़ी तपस्विनी थीं। किसी ने यह नहीं लिखा कि चौदह वर्षों तक उन्होंने अपने अकेलेपन को किस धैर्य से जिया।

लेकिन किसी रात, किसी एकांत क्षण में यदि कोई हृदय सचमुच विरह की तपस्या को समझना चाहेगा, तो उसे अयोध्या के किसी मौन कक्ष में बैठी उर्मिला अवश्य दिखाई देंगी…दीपक की उस अदृश्य बाती की तरह, जो स्वयं जलती रही… ताकि दूसरों का प्रकाश अमर बना रहे।

उन्होंने न धन मांगा। न यश। न स्मृति। न सम्मान। उन्होंने बस प्रेम निभाया। और प्रेम का सबसे ऊंचा रूप वही होता है, जहां अधिकार नहीं, समर्पण बचा रह जाए। उर्मिला की करुणा यह नहीं थी कि उनके पति दूर चले गए। उनकी करुणा यह थी कि उन्हें अपने दुःख को भी मौन रखना पड़ा। अयोध्या को संभालना था। माताओं को सहारा देना था। राजमहल की मर्यादा को टूटने नहीं देना था।
वह टूटी होंगी…
लेकिन चुपचाप।
वह रोई होंगी…
लेकिन अकेले।
वह जली होंगी…
लेकिन बिना धुएं के।
इतिहास तलवार उठाने वालों को याद रखता है।
लेकिन जो लोग भीतर-ही-भीतर जलकर दूसरों को प्रकाश देते हैं, वे अक्सर इतिहास के हाशिए पर छूट जाते हैं। *उर्मिला वही हाशिए पर छूटी हुई ज्योति हैं।* और शायद इसीलिए उनका त्याग सबसे बड़ा है। क्योंकि उन्होंने किसी विजय की आकांक्षा नहीं की। किसी प्रशंसा की इच्छा नहीं की। उन्होंने केवल इतना चाहा कि लक्ष्मण अपने धर्म से विचलित न हों।

रामायण/राम चरित मानस यदि त्याग का महाकाव्य है, तो उर्मिला उसका सबसे शांत, सबसे उपेक्षित और सबसे करुण अध्याय हैं।

उन्होंने कोई प्रश्न नहीं किया।
कोई प्रतिकार नहीं किया।
बस अपने हिस्से का प्रेम, अपने हिस्से का जीवन और अपने हिस्से का स्त्रीत्व चुपचाप धर्म के चरणों में समर्पित कर दिया। शायद इसलिए उर्मिला भारतीय नारी की वह अनकही पीड़ा हैं, जो साथ न चलकर भी सबसे अधिक साथ निभाती है।

रामायण के सबसे लंबे विरह की कोई चौपाई नहीं लिखी गई… क्योंकि वह उर्मिला की आंखों में मौन रह गई।

भाजपा समग्र हिंदुत्व पर ही लड़ेगी उत्तर प्रदेश की चुनावी लड़ाई

images-3-1.jpeg

लखनऊ । पश्चिम बंगाल की विजय से उत्साहित भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में 2027 की चुनावी तैयारियां प्रांरभ कर दी हैं। बंगाल से स्पष्ट जनादेश आ जाने के बाद भाजपा की स्थिति मजबूत हो गई है। समाजवादी पार्टी एसआईआर, चुनाव आयोग व ईवीएम के खिलाफ वातावरण बनाने में लग गई है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि बंगाल में टीएमसी की हार के बाद यूपी में विरोधी दल अभी से पराजय का बहाना खेाज रहे हैं जबकि भारतीय जनता पार्टी फ्रंटफुट पर आकर बल्लेबाजी कर रही है। भाजपा ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ही चुनाव मैदान में उतरने का निर्णय किया है और संगठन को उसी के अनुसार तैयार किया जा रहा है। बंगाल की की ही तरह भाजपा ने उत्तर प्रदेश में अपनी रणनीति को धार देना आरम्भ कर दिया है।
बंगाल के चुनाव प्रचार में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री येागी आदित्यनाथ की जनसभाओं में भारी भीड़ आ रही थी तथा उनका स्ट्राइक रेट 90 प्रतिशत रहा है। यही कारण है कि भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने उन्हें आगामी विधान सभा चुनावों के लिए भाजपा का चेहरा घोषित कर दिया है।

बंगाल में नयी सरकार के शपथ ग्रहण के बाद ही प्रदेश में बहुप्रतिक्षित मंत्रिपिरिषद का विस्तार हो गया है। भाजपा ने इस मंत्रिमंडल विस्तार के सहारे जातीय व क्षेत्रीय संतुलन साधने का प्रयास किया है। सपा की पीडीए की धार को कुंद करने के लिए मंत्रिमंडल विस्तार में पिछड़े और दलित समाज के प्रतिनिधियों को कहीं अधिक प्रतिनिधित्व दिया है। भाजपा ने ओबीसी समाज से तीन और मंत्री बनाने के साथ ही दो को प्रोन्नत भी किया गया है। दलित समाज से भी दो मंत्री बनाए गए हैं। पूरब से पश्चिम तक को साधा गया है। मंत्रिमंडल विस्तार के साथ ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित 60 मंत्री हो गए हैं। जिसमें 60 प्रतिशत ओबीसी व दलित समाज है। क्षत्रिय व वैश्य समाज की भगीदारी यथावत है । यूजीसी के कारण सवर्ण समाज की नाराजगी को दूर करने के लिए मनोज पांडेय को मंत्री बनाया है वह सपा से भाजपा में आए थे। मंत्रिपरिषद मे पहली बार वाल्मीकि और पासी समाज के सदस्यों को प्रतिनिधित्व दिया गया है, सपा और बसपा दोनो की ही नजर इस वोट बैंक पर रहती है।

भाजपा ने इस मंत्रिपरिषद विस्तार के माध्यम से समग्र हिंदुत्व के एजेंडे को धार देने का प्रयास किया है। बिना कोई बड़ा बदलाव किए जिस प्रकार मंत्रिमंडल विस्तार हुआ है और जिन चेहरों को शामिल किया गया है वह बताता है कि भाजपा ने विधानसभा चुनाव में भरोसे और एकजुटता के संदेश के साथ आगे बढ़ने का निर्णय कर लिया है। मंत्रिमंडल विस्वार में निष्ठा को पुरस्कार व हिंदू एकता का फार्मूला दिखाई पड़ रहा है। भाजपा ने यह संदेश देने का स्पष्ट प्रयास किया है कि भाजपा ही पूरे हिंदू समाज का प्रतिनिधित्व करती है। लोकसभा चुनाव मे विपक्ष ने भले ही संविधान बदलने और आरक्षण पर भ्रम फैलाकर बढ़त बना ली हो किंतु अब भजपा खुद को ऐसी पार्टी के रूप मे प्रस्तुत कर रही है जो विभिन्न जातियों की भागीदारी के साथ व्यापक हिंदू एकता के भाव से आगे बढ़ रही है।

मंत्री परिषद व संगठन विस्तार के साथ ही अब प्रदेश सरकार अनेक योजनाओं के शिलान्यास व लोकार्पण व्यापक सिलसिला आरम्भ करने जा रही है, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर अनेक केंद्रीय मंत्री तक शामिल होंगे। अगर बंगाल की ही तरह यूपी का हिंदू एकजूट हो गया तो सपा का पीडीए ध्वस्त हो जाएगा अतः आने वाले समय में सपा हिन्दू समाज को तोड़ने वाले मसले उभार सकती है।

कट्टरपंथी और अलगाववादी शक्तियाँ अब काँग्रेस सहित कुछ विपक्षी दलों के झंडे तले

images-2-1.jpeg

भोपाल । हाल ही संपन्न पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों में संपूर्ण भारत केलिये सतर्कता की एक गहरी दस्तक मिली है। यह दस्तक सभी कट्टरपंथियों, अलगाववादी और सनातन विरोधी शक्तियों की एकजुट होकर अपने समर्थक मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने की है। इसमें एक चिंता की बात यह भी है कि इन शक्तियों ने काँग्रेस सहित कुछ विपक्षी दलों में अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया है। इसकी झलक इन पाँचों राज्यों में काँग्रेस, तृणमूल-कांग्रेस सहित इन दलों के विजयी उम्मीदवारों और केरल में सत्तारूढ़ होने जा रहे गठबंधन से स्पष्ट समझा जा सकता है।

इन पाँचों राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम अनुमान के अनुरूप हैं। असम, प. बंगाल और पांडिचेरी में भाजपा और केरल में काँग्रेस गठबंधन सत्तारुढ़ होगा। जबकि तमिलनाडु के मतदाताओं ने एक नये राजनैतिक दल को अपना समर्थन दिया। यह इन परिणामों का एक पक्ष है। दूसरा पक्ष भारत की सभी राष्ट्रवादी शक्तियों के माथे पर चिंता की एक लकीर खींच रहा है। इन परिणामों ने भविष्य के भारत केलिये एक डरावनी दस्तक दी है। यह दस्तक कट्टरपंथी मुस्लिम शक्तियों और अलगाववादियों की एकजुट होकर अपने समर्थक मतदाताओं को एकजुट करने की है। इसे समझने केलिये इन पाँचों राज्यों का सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरूप देखें। भाव भाषा और जिवन शैली की दृष्टि से केरल, तमिलनाड और प बंगाल-असम में कोई एकरूपता नहीं है। लेकिन सभी राज्यों में मुस्लिम कट्टरपंथियों और अलगाववादी वोटों के धुर्वीकरण दिशा एक ही रही है। इसमें दूसरी चिंताजनक बात यह है कि इन्होंने काँग्रेस जैसे एक बड़े दल में अपनी गहरी पैठ बना ली है। अब यह सत्ता प्राप्त करने केलिये काँग्रेस की अपनी ललक रही हो अथवा कट्टरपंथियों की अपनी कूटनीति कि अब काँग्रेस के नीति निर्णयों में कट्टरपंथ का समर्थन स्पष्ट दीख रहा है। काँग्रेस ने केरल में जिन दलों के साथ अपना गठबंधन बनाया अथवा असम एवं प. बंगाल में जिस प्रकार अपने उम्मीदवारों का चयन किया उसमें काँग्रेस की नीति स्पष्ट झलक रही है।

काँग्रेस के नेतृत्व में केरल की सत्ता संभालने जा रहे “यूडीएफ” गठबंधन में इंडियन मुस्लिम लीग, केरल कांग्रेस(जोसेफ) , केरल कांग्रेस(जैकब) , क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी प्रमुख सदस्य हैं। इस गठबंधन की सहयोगी इंडियन मुस्लिम लीग तो अपने कट्टरपंथ और शरीयत कानून का खुला समर्थन करने जानी जाती है। जबकि क्राँतिकारी समाजवादी पार्टी कम्युनिस्ट विचारधारा पर काम करती है। वहीं केरल काँग्रेस (जौसेफ) और केरल काँग्रेस (जेकब) का भी अपना इतिहास है। इनमें से एक सीरियाई ईसाई और नायर समाज का संगठन माना जाता है और दूसरी की गणना लेफ्ट के समीप होती है। केरल विधानसभा में इस बार 34 मुस्लिम विधायक चुनाव जीते हैं। इनमें मुस्लिम लीग के 22 और काँग्रेस टिकिट पर आठ हैं। अब केरल में सत्ता संभालने जा रहे यूडीएफ की नीति क्या होगी यह इस गठबंधन में शामिल दलों की रीति नीति और विधायकों से ही स्पष्ट हो रहा है।

यदि केरल से असम की दूरी देखें तो यह लगभग साढ़े तीन हजार किलोमीटर है। इन दोनों राज्यों में भाव, भाषा, जीवन शैली और साँस्कृतिक मूल्यों में भी कोई तालमेल नहीं है लेकिन कट्टरपंथी मतदाता के ध्रुवीकरण की जो लहर केरल में रही बिल्कुल वही लहर असम में भी देखने को मिली। असम विधानसभा में इसबार विपक्ष के कुल चौबीस विधायक पहुँचे हैं। चौबीस में से बाईस विधायक मुस्लिम हैं। कांग्रेस के टिकिट पर कुल उन्नीस विधायक चुनाव जीते। इनमें मुस्लिम विधायकों की संख्या अठारह है। कट्टरपंथी मतदाता का यही धुर्वीकरण प. बंगाल और तमिलनाड में भी देखा गया। प. बंगाल में काँग्रेस टिकिट पर कुल दो विधायक जीते। इनमें एक मुस्लिम है। जबकि तृणमूल कांग्रेस ने कुल अस्सी सीटे जीती, इनमें मुस्लिम विधायकों की संख्या 31 है। इन राज्यों में मुस्लिम वोटों के इस ध्रुवीकरण के दो लक्ष्य थे, एक भाजपा को रोकना और दूसरा विधानसभा अपनी सदस्य संख्या की वृद्धि करना। यदि कट्टरपंथियों का उद्देश्य केवल भाजपा को रोकना होता तो वे असम और पश्चिम बंगाल में काँग्रेस के गैर मुस्लिम उम्मीदवारों का भी समर्थन कर सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उनकी प्राथमिकता में मुस्लिम उम्मीदवार ही रहे इसलिये मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की नींव रकने वाले हुँमायू कबीर ने दोनों विधान सभा क्षेत्रों से विजय प्राप्त की। यदि कट्टरपंथियों का उद्देश्य केवल भाजपा को रोकना होता तो वे इन दोनों सीटों पर भी काँग्रेस उम्मीदवार को ही वोट देते, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। यहाँ काँग्रेस की बजाय हुँमायू कबीर को पसंद किया।

इन पांच राज्यों में वोटों के इस ध्रुवीकरण में केवल मुस्लिम कट्टरपंथी अकेले नहीं हैं। इसमें अलगाववादी, मार्क्सवादियों और माओवादियों का भी गठजोड़ रहा है। यद्यपि वैचारिक दृष्टि से इन दोनों समूहों के लक्ष्य और धारा में कोई मेल नहीं हैं। दुनियाँ के अन्य देशों में इन दोनों धाराओं के बीच कोई तालमेल नहीं है लेकिन भारत में इन दोनों के बीच अद्भुत गठजोड़ है। यह गठजोड़ केवल राजनैतिक दृष्टि से ही नहीं है, ये सामाजिक और बौद्धिक मंचों पर दोनों एकसाथ दिखाई देते हैं। दिल्ली के जेएनयू में होने वाले कार्यक्रम इसका उदाहरण है। इन दोनों समूहों का पूरे देश में अपना नेटवर्क है। इन समूहों की एक विशेषता यह भी है कि वे सार्वजनिक चर्चा केलिये विशेष “नैरेटिव” सेट करने में भी सिद्धहस्त होते हैं। अपने अभियान और रणनीति से लोगों का ध्यान हटाने केलिये कुछ ऐसे “नैरेटिव” उछालते हैं जिससे जन सामान्य इन्हीं नैरेटिव में उलझ जाए और वे अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ते रहें। इन पाँच राज्यों में संपन्न विधानसभा चुनाव परिणाम में हिन्दू वोटों के धुर्वीकरण का नैरेटिव उछाला गया। यह ठीक है कि हिन्दु मतदाताओं का एक बड़ा भाग भारतीय जनता पार्टी को ओर झुका। लेकिन वह हिन्दु वोटों का धुर्वीकरण नहीं था। पश्चिम बंगाल में लगभग सत्तर प्रतिशत हिन्दु मतदाता हैं लेकिन भाजपा को लगभग पैंतालीस प्रतिशत वोट मिले। इसका अर्थ है कि लगभग पच्चीस प्रतिशत हिन्दु वोट काँग्रेस, तृणमूल-कांग्रेस तथा अन्य दलों को भी मिले। यह स्थिति केवल पश्चिम बंगाल या असम की नहीं है। केरल, तमिलनाड और पुड्डुचेरी भी यही स्थिति रही। इन सभी प्राँतों में काँग्रेस समर्थक हिन्दु मतदाताओं ने काँग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों को भी वोट दिया। यह काँग्रेस के विजयी मुस्लिम उम्मीदवारों को मिले कुल वोटों और उस विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम मतों की कुल संख्या से स्पष्ट हो जाता है। लेकिन मुस्लिम मतों का विभाजन कहीं नहीं हुआ। लेकिन कट्टरपंथी मुस्लिम मतों के धुर्वीकरण से लोगों का ध्यान हटाने केलिये हिन्दु मतों के धुर्वीकरण का नैरेटिव उछाल दिया गया। सोशल मीडिया और मीडिया के अधिकांश नेटवर्क पर यही नैरेटिव चला।

अब इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि असम से लेकर केरल तक मुस्लिम मतदाताओं का इस धुर्वीकरण की राजनीति का प्रभाव देश के अन्य राज्यों पर भी पड़ेगा। विशेषकर उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत में इन्हें काँग्रेस का सशक्त कंधा मिल गया है। हालाँकि काँग्रेस की राजनीति में मुस्लिम तुष्टिकरण सदैव प्राथमिकता पर रहा है लेकिन अब काँग्रेस और कुछ विपक्षी दलों की राजनीति केवल तुष्टिकरण तक सीमित नहीं रहेगी। वह कट्टरपंथ को संरक्षण देने की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ेगी। भारत के इतिहास की कुछ घटनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि कट्टरपंथी एक एक कदम आगे बढ़ते हैं और अंत में अपनी पसंद के निर्णय भी कराते हैं। 1857 की क्राँति के बाद भारत के कट्टरपंथियों ने अंग्रेजों को अपनी वफादारी दिखाई और काँग्रेस पर दबाव बनाया। यह कट्टरपंथियों के दबाव का ही तो परिणाम था कि काँग्रेस बात तो रामराज्य की करती थी लेकिन खिलाफत आँदोलन खलीफा राज केलिये किया था। स्वतंत्रता से पहले बंगाल के अधिकांश मुसलमान काँग्रेस के विरुद्ध और मुस्लिम लीग के साथ थे। लेकिन भारत विभाजन के बाद शेष बचे बंगाल में सभी मुसलमान काँग्रेस के झंडे तले आ गये। लेकिन यदि काँग्रेस का पतन हुआ तो वे लेफ्ट समर्थक हो गये। लेफ्ट के पतन के बाद तृणमूल-कांग्रेस के बैनर पर सक्रिय हुये और अब पुनः काँग्रेस के माध्यम से अपनी राजनीति करना चाहते हैं। आरंभिक काल में भले वे कुछ कहें लेकिन उनका अंतिम लक्ष्य भारत राष्ट्र का सांस्कृतिक और सामाजिक रूपान्तरण करना है। इन चुनाव परिणामों के बाद केरल और तमिलनाड के प्रशासन में कट्टरपंथियों का प्रभाव बढ़ेगा। और इसका प्रभाव देश के अन्य प्रांतों में भी पड़ने की स्पष्ट आशंका दिखाई दे रही है। लव जिहाद और लैंड जिहाद के रूप में कट्टरपंथ का अभियान देशभर में चल रहा है। अब ऐसी घटनाओं में और वृद्धि होने की आशंका बढ़ गई है। तथा ऐसे तत्वों के समर्थन में काँग्रेस सहित कुछ राजनैतिक दलों द्वारा खुलकर समर्थन करने की आशंका भी बढ़ गई है। इसके लिये समस्त देश वासियों को सावधान होकर आगे बढ़ने की आशंका है।

scroll to top