मुस्लिम लीग, केरलम और बहुत कुछ…

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– प्रशांत पोळ

दिल्ली । 1947 मे भारत के विभाजन के जो अनेक कारक (factors) रहे, उनमे मुस्लिम लीग प्रमुख हैं। मुस्लिम लीग ने ही अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग रखी। उसे ‘पाकिस्तान’ नाम दिया। पाकिस्तान के लिए हिंसक आंदोलन किए। ‘डाइरेक्ट एक्शन डे’ जैसा खुंखार कदम उठाया। उस दिन (16 अगस्त 1946 को) कलकत्ता मे 5,000 हिंदुओं की हत्या करके खून की नदियां बहाई। इस पर भी विभाजन की मांग नही मानी गई, तो दो महिने बाद नोआखाली मे दस हजार हिंदुओं का नरसंहार किया। कांग्रेस नेताओं को झुकाया और पाकिस्तान की बात मनवा ली।

लेकिन 15 अगस्त 1947 के बाद, इस मुस्लिम लीग का क्या हुआ..?

पाकिस्तान मे तो वो सत्तारुढ पार्टी बनी। जैसे अपने यहां कांग्रेस थी, वैसे पाकिस्तान मे मुस्लिम लीग। किंतू जिन्ना और लियाकत अली खान की मृत्यु के पश्चात, मुस्लिम लीग मे मतभेद बढने लगे। जनरल अयूब खान शासक बनने के पश्चात, मुस्लिम लीग 3 धडों मे बट गई। तब तक पूर्व पाकिस्तान अलग देश नही बना था। वहां मुस्लिम लीग से टूटकर अलग पार्टी बनी – अवामी लीग, जिसके नेता थे शेख मुजीब रहमान। अवामी लीग के नेतृत्व मे ही 1971 के संघर्ष के बाद, बांग्लादेश की निर्मिती हुई।

संक्षेप मे, भारत से टूटकर बने दोनो मुस्लिम देशों को, मुस्लिम लीग के नेताओं ने ही बनाया और प्रारंभ के कुछ वर्षों मे उन्ही ने इन दोनों देशों पर राज किया।

स्वतंत्रता के बाद भारत मे मुस्लिम लीग का क्या हुआ?

शुरुआत के दिनों मे तो, भारत मे रह गए मुस्लिम लीग के नेता बडे अवसादग्रस्त थे। उन्हे उनका राजनैतिक भविष्य अंधकारमय दिख रहा था। इनमे से अनेक, कांग्रेस मे चले गए। कांग्रेस ने उनका लाल कालीन बिछाकर स्वागत किया। प्रारंभ मे मुस्लिम नेताओं को लगा कि अब चुंकी पाकिस्तान अलग हो गया हैं, तो भारत मे, भारत की परंपरा, पध्दति और व्यवस्था के अनुरुप ही रहना पडेगा। वैसी उनकी मानसिकता भी बन रही थी। किंतू उन्होने देखा कि कांग्रेस, मुसलमानों को ज्यादा महत्व दे रही हैं। साथ ही महात्मा गांधीजी की हत्या के बाद, हिंदू हित की बात करनेवाले संगठनों पर प्रतिबंध लगाया गया। अगले दस – बारह वर्ष, हिंदू संगठनों को कुचला गया। स्वाभाविक था कि मुस्लिम संगठनों को खुली छूट मिली।

भारत मे लस्त-पस्त पडी मुस्लिम लीग मे जान आने लगी। गांधीजी की हत्या के तुरंत बाद, भारत का विभाजन करने वाली मुस्लिम लीग के भारतीय धडे ने अपना चेहरा थोडासा बदल लिया। अब उनका नाम हुआ – ‘इंडियन युनियन मुस्लिम लीग’। विशेषतः केरल मे इनका प्रभाव बढता गया। मलप्पुरम, कोझिकोड, कन्नूर, कासरगोड यह जिले मुस्लिम बहुल बनते गए, तो मुस्लिम लीग यहां की प्रमुख पार्टी बनती गई। मोहम्मद इस्माईल, आईयुएमएल (Indian Union Muslim League) के संस्थापक रहे, तो मोहम्मद कोया, 1979 मे 3 महिनों के लिए केरल के मुख्यमंत्री भी रहे।

कांग्रेस ने केरल मे हमेशा से मुस्लिम लीग को साथ लिया हैं। यूपीए की सरकार मे, मुस्लिम लीग के ई. अहमद केंद्रीय मंत्री थे। वे जब रेल राज्यमंत्री थे, तब नई प्रारंभ होनेवाली ट्रेनों मे इंजिन की पूजा वगैरह करने की सख्त मनाई थी।

अभी इस महिने केरलम विधानसभा के जो परिणाम निकले, उनमे कांग्रेस – मुस्लिम लीग गठबंधन को 100 से उपर सीटें और पूर्ण बहुमत मिला। इसमे मुस्लिम लीग को 22 सीटें मिली हैं। गठबंधन मे कांग्रेस के बाद दुसरे नंबर पर। मुस्लिम लीग के दबाव के चलते, कांग्रेस को मुख्यमंत्री का नाम घोषित करने मे इतना विलंब हुआ।

आज जिस मंत्रिमंडल ने शपथ ली हैं, उनमे मुस्लिम लीग के 5 मंत्री हैं। 1. P. K. Kunhalikutty, 2. P. K. Basheer 3. K. M. Shaji 4. N. Shamsudheen 5. V. E. Abdul Gafoor.

*दुर्भाग्य देखिये.. जिस मुस्लिम लीग के नेता खुर्रम ने 1946 मे नेहरु जी को जिंदा गाड देने की धमकी दी थी, जिस मुस्लिम लीग ने गांधीजी की तौहीन की थी, जिस मुस्लीम लीग ने डाइरेक्ट एक्शन डे के नाम पर हिंदुओं के खून से बंगाल की सडकों को पाट दिया था, जो मुस्लिम लीग आज भी केरलम की सडकों पर सरे आम हिंसक प्रदर्शन करती हैं, ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाती हैं…*

*ऐसे धर्मांध मुस्लिम लीग के साथ कांग्रेस गठबंधन करती हैं, उनके साथ मंत्रीपद साझा करती हैं, उनको सम्मान देती हैं..*

*और देश के तमाम कांग्रेसी, तमाम सेक्युलर, तमाम ‘धर्मनिरपेक्ष’ पत्रकार, चुप बैठते हैं, खामोशी ओढ लेते हैं…*

ये देश का दुर्भाग्य हैं..!

सवर्णों के ख़िलाफ़ जहरीला हथियार है अब आरक्षण

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दयानंद पांडेय

लखनऊ । संविधान निर्माताओं ने दलित और वंचित समाज के लिए दस वर्ष के लिए आरक्षण का प्रावधान किया था कि यह लोग भी आर्थिक और सामाजिक तौर पर बराबरी में आ जाएं l देश के विकास में योगदान दें l बाद में मंडल की सिफारिशों के तहत पिछड़ी जातियों को भी आरक्षण मिल गया l आज़ादी के इन आठ दशक में आरक्षण ने आरक्षणधारियों को इतना सबल बना दिया है कि अब वह इसे सवर्णों के ख़िलाफ़ जहरीला हथियार बना चुके हैं l मरने-मारने पर आमादा हैं l

वोट बैंक के चक्कर में सभी राजनीतिक पार्टियों और नेताओं ने आरक्षणधारियों को भस्मासुर बना दिया है l हिंसक और अराजक बना दिया है l होता रहे देश प्रतिभाहीन, होता रहे प्रतिभा पलायन, वह तो माइनस चालीस वाले डाक्टर भी बना कर रहेंगे l देश में सामाजिक समता के नाम पर गहरी सामाजिक खाई बन गई है तो उन की बला से l यह आरक्षण जेहाद का ज़हर है l

आरक्षणधारी अब सवर्ण समाज के ख़िलाफ़ आक्रमणकारी बन कर उपस्थित हैं l इस्लाम के शरिया क़ानून से भी ज़्यादा ख़तरनाक और जहरीला हो चला है यह आरक्षण l यू जी सी आदि ने इस आग में घी का काम किया है l आप एक बार कैंसर और एड्स का इलाज कर सकते हैं l आरक्षण प्राप्त जहरीले लोगों का नहीं l राजनीतिज्ञों और सरकारों ने तो इसे इस हद तक पहुंचाया ही है l पता नहीं किसी सामाजिक विज्ञानी को इस का भान है कि नहीं l

सुप्रीम कोर्ट को इस ज़हर और जहरीले समाज का स्वत: संज्ञान लेना चाहिए l आरक्षण पूरी तरह ख़त्म कर देना चाहिए l बहुत दया आए तो आरक्षण को दलितों और पिछड़ों के ई डब्लू एस तक सीमित कर देना एक उपाय हो सकता है l नहीं जातीय और राजनीतिक दुकानदारों को जो विष बोना था बो चुके हैं l फ़सल कटने को तैयार है l

ग़नीमत है कि सवर्ण समाज संयम से काम ले रहा है l नहीं आरक्षणधारी तो जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन के लिए पूरी तरह तैयार हैं l देश एक ख़तरनाक मोड़ पर खड़ा है l हिंदू , मुसलमान से भी बड़ी आपदा सामने उपस्थित है l

मुद्दों के मेले , हम हैं अकेले !!

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दिल्ली ।मेला देखकर लौट रहे हम लोग, एक अजीब चौराहे पर अटके हुए हैं। जनता पूछ रही है, “रोजगार कहाँ है?”
सत्ता पूछ रही है, “वंदे मातरम् बोला कि नहीं?”
विपक्ष पूछ रहा है, “EVM का प्लग निकाला कि नहीं!”
और मीडिया पूछ रहा है, “आम चूसकर खाना चाहिए या काटकर?”
वाह रे तांत्रिक लोकतंत्र। जिस घर में चूल्हा ठंडा हो, वहां टीवी पर बहस गरम है।
एक तरफ बेरोजगार डिग्रियां लेकर धूप में लाइन लगा रहे हैं। दूसरी तरफ नेता माइक्रोफोन लेकर इतिहास की कब्रें खोद रहे हैं।
किसी को अस्पताल की बदहाली नहीं दिखती। पर कौन किस धर्म का है, यह सबको एक्स-रे मशीन की तरह साफ दिख जाता है।
गरीब आदमी महंगाई से पिस रहा है।
आम जरूरत की चीजों के भाव सुनकर BP की गोलियों की सेल बढ़ती है। गैस सिलेंडर देखकर सांस फूलती है, अस्थमा अटैक हो रहे हैं।
लेकिन टीवी पर अर्बन ज्ञाणी द्वारा राष्ट्रवाद का ऑक्सीजन मुफ्त बांटा जा रहा है।
इसी बीच त्याग और सादगी की नदियों बहने लगी हैं। मितव्ययिता मंत्र दिया गया है। कम खर्च करो।फिजूलखर्ची छोड़ो। सादगी अपनाओ।
पूरा देश ये सुनकर भावुक हो गया है। कइयों ने विदेश यात्रा स्थगित कर दी हैं। सरकारी बाबुओं ने AC की हवा में बैठकर त्याग पर सेमिनार किया। कुछ नेताओं ने पांच सितारा होटल में “सादगी सम्मेलन” रखा। किसी ने कहा, “विदेश यात्रा जरूरी है, आखिर मितव्ययिता का वैश्विक संदेश देना है।”
नई राजनीति का नया योग सूत्र है।जनता कटौती करे। सरकार प्रेरणा दे।
कहा गया, शादी समारोह सादगी से हों। वाह! यह बात उन लोगों ने कही जिनके काफिले निकलते समय ट्रैफिक खुद लोकतंत्र को सलाम करता है।
कहा गया, सरकारी खर्च कम हो।
और उसी शाम नई LED स्क्रीन पर “ऐतिहासिक उपलब्धियों” का विज्ञापन चमक उठा।
कहा गया, अनावश्यक यात्राएं बंद हों।
देश मुस्कुराया। एयरपोर्ट थोड़ा घबराया। त्याग का ऐसा अलौकिक वातावरण बना कि मध्यम वर्ग ने चाय में चीनी आधी कर दी। गरीब ने दाल में पानी बढ़ा दिया। और अमीर ने ट्वीट कर दिया, “Nation First.”
व्यवस्था तंत्र के पास मुद्दों की पूरी जादुई पोटली है। जनता फिर पांच किलो मुफ्त राशन और पंद्रह सेकंड के गुस्से में सब भूल जाती है।
उधर विपक्ष भी कम कलाकार नहीं।
देश जल रहा हो, पर उनकी प्राथमिकता EVM का पोस्टमार्टम है।
हार गए तो मशीन चोर। कुछ नहीं तो इनको हटाओ, उनको हटाओ। जीत गए तो लोकतंत्र जिंदाबाद। हार गए तो लोगों को डेमोक्रेसी खतरे में दिखती है।
इस बीच पूरा देश एक दूसरे की गिनती करने में लगा है। जाति जनगणना से अगले कुंभ तक गरीबी भाग जाएगी।
विपक्ष कहता है इतने खतरे तो पुराने जमाने में डाकुओं से भरे जंगल में भी नहीं थे।
और मीडिया! अरे मीडिया तो इस महान लोकतांत्रिक सर्कस का रिंग मास्टर है। देश में किसान आत्महत्या करे, नदी सूख जाए, बच्चे कुपोषण से मर जाएं, कोई फर्क नहीं। ज्योतिषियों की चांदी कट रही है, सब कुछ सितारों के हवाले। हम क्या साथ लाए थे, क्या ले जाएंगे!
वर्ल्ड बेस्ट टीवी एंकर्स भारत में हैं, उनके रहते सरकारी प्रवक्ताओं की कोई जरूरत ही नहीं। अगर किसी ने कहा कि आम काटकर खाना चाहिए या चूसकर, तो तीन घंटे की “राष्ट्रव्यापी बहस” तय है।
“सीमा हैदर का छठा बच्चा।”
“ जेल में बेटी हुई।”
“फिल्म स्टार ने किस रंग की चप्पल या चड्डी पहनी?”
ब्रेकिंग न्यूज ऐसे दौड़ती है जैसे रॉकेट चांद पर नहीं, पाताल में उतर चुका हो।
पत्रकारिता अब सवाल नहीं पूछती।
TRP की भिक्षा मांगती है।
एंकर ऐसे चिल्लाते हैं जैसे देश की सारी समस्याएं डेसिबल से हल होंगी।
स्क्रीन पर आठ खिड़कियां खुलती हैं।
आठ लोग एक साथ चीखते हैं।
और दर्शक सोचता है, शायद यही लोकतंत्र का नया राष्ट्रीय गीत है।
शिक्षा?
उसकी हालत उस रिश्तेदार जैसी हो गई है जिसे शादी में कोई पूछता नहीं।
स्वास्थ्य व्यवस्था ICU में पड़ी है।
रोजगार फाइलों में लटका है।
गरीबी आंकड़ों में छिपी बैठी है।
लेकिन चुनाव आते ही सबको मंदिर, मस्जिद, भाषा, लोकल अस्मिता, पाकिस्तान और जाति याद आ जाती है।
मानो देश नहीं, कोई अनंतकालीन टीवी सीरियल चल रहा हो।
सब अपना अपना धंधा चमका रहे हैं।
जनता सिर्फ ताली बजाने वाली ऑडियंस है।
देश के असली मुद्दे फुटपाथ पर बैठे हैं।
और नकली मुद्दे लाल बत्ती वाली गाड़ियों में घूम रहे हैं।
कभी कभी लगता है भारत समस्याओं से नहीं, “प्रायोजित बहसों” से चल रहा है।
फिर भी उम्मीद जिंदा है।
क्योंकि इस देश का आम आदमी बहुत सहनशील है।
वह हर पांच साल बाद फिर लाइन में खड़ा हो जाता है।
उसे लगता है, शायद इस बार कोई रोटी, रोजगार और राहत की बात करेगा।
लेकिन सिस्टम को पक्ष, विपक्ष के बाजीगर ही चलते हैं। टोपी से कभी धर्म निकालता है। कभी डर। कभी दुश्मन। कभी मितव्ययिता का नया मंत्र। और जनता? वह फिर ताली बजाती है। क्योंकि असली मुद्दों की आवाज अब शोर में दब चुकी है

अधिक मास : आध्यात्म और विज्ञान के निष्कर्ष पर निर्धारण : समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संदेश भी

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भोपाल । इस वर्ष ज्येष्ठ शुक्लपक्ष एकम् 17 मई से अधिकमास आरंभ हो गया है जो सोमवती अमावस 15 जून तक रहेगा। अधिकमास को “पुरुषोत्तम मास” माना गया। पंचांग के अनुसार अधिक मास का यह विधान विज्ञान, आध्यात्म और सामाजिक मनोविज्ञान के निष्कर्ष पर आधारित है। विज्ञान की दृष्टि से अधिकमास का निर्धारण सूर्य और चंद्रमा की गति के बीच समन्वय बनाने केलिये किया गया है तो आध्यात्म की दृष्टि से यह आत्मशक्ति जाग्रत करने का समय है। जबकि इसमें व्रत पूजा उपासना के विधान समाज में सकारात्मक चिंतन को प्रभावी बनाने के अद्भुत सूत्र हैं।
जीवन के लिये विज्ञान और आध्यात्म एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों के संयुक्त निष्कर्ष से जीवन समृद्ध और सकारात्मक होता है। भारतीय परंपरा के विकास क्रम में धार्मिक उतसव के आयोजन हों अथवा तीज त्यौहारों का निर्धारण, यह परंपरा अथवा केवल उत्सव मनाने के प्रावधान भर नहीं हैं। इनमें विज्ञान के निष्कर्ष और आध्यात्म के बीच समन्वय बना कर जीवन को उन्नत बनाने के सूत्र हैं। ताकि समाज जीवन उन्नतिशील बने और परस्पर व्यवहारिक समन्वय भी सशक्त हो। यही सिद्धांत अधिकमास के निर्धारण में है। अधिकमास का निर्धारण केवल धार्मिक या केवल ज्योतिष का आधार नहीं है अपितु इसका आधार सूर्य और चंद्र की गति में संतुलन बिठाने के लिये किया गया है। चंद्रमा की तुलना में सूर्य गति तेज है। गति के इस अंतर के कारण वर्ष के अंत में समय का अंतर आ जाता है। अधिकमास के निर्धारण से इस अंतर को समायोजित किया जाता है। यह आश्चर्यजनक है कि हजारों वर्ष पहले भारतीय मनीषियों को इस अंतर की सटीक जानकारी थी। इसी आधार पर पंचांग का निर्माण हुआ। भारतीय पंचांग में वर्ष की अवधि का निर्धारण तो सूर्य की गति से होता है। जबकि प्रतिदिन पड़ने वाली तिथियों का निर्धारण चंद्रमा की गति से किया जाता है। यदि दोनों की गति की गणना की जाय तो चंद्रमा की गति के अनुसार वर्ष की अवधि 354 दिन, 8 घंटे और 34.28 सेकंड का होती है। जबकि सूर्य की गति के अनुसार वर्ष की अवधि 365 दिन, छह घंटे, 9.54 सेकंड होती है। इस प्रकार चंद्रमा और सूर्य की गति का यह अंतर वर्ष में 10 दिन, 21 घंटे और 35.16 सेकंड का हो जाता है। अंतर की इस अवधि की गणना करके यह सुनिश्चित किया गया कि जब यह अंतर 29 दिन 12 घंटे, 44 मिनट और 2.865 सेकंड से अधिक हो जाय तो अधिकमास का प्रावधान करके इस समयावधि का संतुलन बनाया गया है। सामान्यतः 19 वर्ष में सात अतिरिक्त मास के प्रावधान किये जाते हैं। अधिकमास का निर्धारण कब किया जाय इसका भी विधान सुनिश्चित किया गया है। सूर्य प्रत्येक राशि पर लगभग एक माह रहते हैं। सूर्य की राशि परिवर्तन की तिथि से अधिकमास प्रारंभ होता है। इस वर्ष 15 मई से सूर्य ने मेष राशि से बृष राशि में प्रवेश कर लिया है। लेकिन इस माह अमावस शनिवार 16 मई को थी इसलिये ज्येष्ठ शुक्लपक्ष एकम 17 मई से अधिकमास आरंभ हुआ जो 15 जून अमावस तक रहेगा।

अधिकमास का नामकरण “पुरुषोत्तम मास”

जब पृथ्वी के मौसम परिवर्तन का अध्ययन करने पर सूर्य और चंद्र की गति के अंतर का पता चला तब वर्ष की अवधि में सामंजस्य केलिये अधिकमास का निर्धारण हुआ। तब प्रश्न आया कि इसका नाम क्या हो और माह का स्वामी कौन होगा। इसके नामकरण की कथा श्रीमद्भागवत में भी है। चूँकि राशियाँ बारह होतीं हैं और सूर्य की यात्रा का निर्धारण इन राशियों के अनुसार होता है तब इस अतिरिक्त मास के लिये कोई राशि नहीं मिलक इस कारण इस अतिरिक्त मास को “मलमास” कहा जाने लगा। यह धारणा भी बन गई कि यह अवधि अशुभ होती है। इससे दुःखी होकर यह अधिकमास समुद्र के पास पहुँचा। समुद्र कोअपनी वेदना बताई तब समुद्र उसे लेकर भगवान विष्णु के पास गये। तब भगवान विष्णु ने स्वयं को इस मास को अपना नाम देकर “पुरुषोत्तम मास” निर्धारित किया और कहा कि इस मास में किये गये सभी आध्यात्मिक कार्यों का फल अधिक मिलेगा। यह प्रसंग श्रीमद्भागवत में है। पुरुषोत्तम मास का का उल्लेख श्रीमद्भगवद्गीता में भी है। तब से अधिकमास का नाम “पुरुषोत्तम मास” हुआ और इसके स्वामी श्रीमन्ननारायण माने गये । इसलिये इस माह में किये जाने वाले पूजन भजन से नारायण प्रसन्न होते हैं और पुण्य लाभ अधिक मिलता है। इसे यदि मनोविज्ञान की दृष्टि से देखे तो सकारात्मक कार्य करने से मन की अशांति दूर होती है, सकारात्मक कार्यों की गति तीव्र होती है तो स्वाभाविक है कि कार्य परिणाम अच्छे ही होंगे। इसके अतिरिक्त सामूहिक अनुष्ठान से परिवार और समाज के बीच समन्वय भी बनता है।

आरोग्य, आध्यात्मिक जागरण और सामाजिक स्वरूप

अधिकमास का निर्धारण विज्ञान के अनुसंधान के अनुसार सूर्य और चंद्र की गति के अंतर को समायोजित करने के लिये होता है तो वहीं उसकी पूजा उपासना विधि में आध्यात्म जागरण और सामाजिक सहभागिता से जोड़ा गया है। व्यक्ति के अस्तित्व में कुल पाँच आयाम होते हैं एक अन्नमय कोष अर्थात शरीर, दूसरा प्राणमय कोष यनि प्राण शक्ति, तीसरा मनोमय कोष यनि मन, चौथा ज्ञानमय कोष यनि बुद्धि, और पाँचवा आत्ममय कोष यनि आत्मा। हमारे आत्म जागरण और आरोग्य में इन पाँचों कोषों में ऊर्जा का समन्वय होना चाहिए। यदि किसी एक कोष में ऊर्जा अधिक हुई तो दूसरे कोष की ऊर्जा कमजोर होगी। आरोग्य की दृष्टि से यह असंतुलन रोगों का कारण होता है। जबकि आत्म चेतना न केवल शरीर, मन और बुद्धि को सशक्त बनाती है अपितु इन पाँचों कोषों में संतुलन भी बनाती है। अधिकमास में पूजन विधि और भोजन का निर्धारण इन पाँचों आयामों में ऊर्जा का संतुलन हो और समाज के सभी वर्गों में समन्वय बनाने केलिये किया गया है। इसकी झलक हमें अधिकमास के दौरान भोजन सामग्री और पूजन सामग्री में मिलती है ।
पुरुषोत्तम मास में गेहूं, चावल, सफेद धान, मूंग, जौ, तिल, मटर, बथुआ, ककड़ी, केला, घी, कटहल, आम, पीपल, जीरा, सोंठ, इमली, सुपारी, आंवला, सेंधा नमक आदि का सेवन करने और पूरे माह एक समय भोजन करने को कहा गया है । अधिकमास में शहद, चौलाई, उड़द की दाल, राई, प्याज, लहसुन, गोभी, गाजर, मूली और तिल का तेल का सेवन करने को मना किया गया है। इस भोजन निषेध और उपयुक्त भोजन सामग्री को पाप पुण्य से जोड़ा गया है। भोजन, पूजन और दिनचर्या का विधान कुछ इस प्रकार किया गया है जिससे मनुष्य में सकारात्मक भाव उत्पन्न हों। आदर्श नागरिक और समाज के आदर्श स्वरूप केलिये सकारात्मक चिंतन ही सबसे महत्वपूर्ण होता है।
इस प्रकार अधिकमास के निर्धारण एक त्रिवेणी है। विज्ञान का अनुसंधान है, आरोग्य एवं आध्यात्म जागरण है और सामाजिक सहभागिता भी है ।

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