Gautam Adani ’s Letter to Shareholders

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Dear Fellow Shareholders,

24 January 2023 will be remembered as a morning when India’s markets awoke to headlines that reverberated far beyond Dalal Street.

Hindenburg’s report was not merely a critique of your Adani Group. It was a direct challenge to the audacity of Indian enterprises to dream on a global scale.

For your Group, it marked the beginning of a test that pushed every dimension of our resilience. It questioned our governance, our purpose and even the very idea that Indian companies could dare lead the world in scale and ambition.

Fast forward, and last week, the Securities and Exchange Board of India (SEBI) delivered a resounding and unequivocal verdict dismissing the allegations against us.

With SEBI’s clear and final word, truth has prevailed or like we had always said logo(truth alone will prevail).

What was meant to weaken us has instead strengthened the very core of our foundations.

This moment is more than a regulatory clearance, it is a powerful validation of the transparency, governance and purpose with which your company has always operated. And the truest evidence of our resilience lies not in words, but in performance over this period.

EBITDA Growth: Portfolio EBITDA rose from Rs. 57,205 Cr in FY23 to Rs. 89,806 Cr in FY25. This is an increase of Rs. 32,601 Cr, representing ~57% absolute growth and a two-year CAGR of 25%.

Asset Expansion: Our Gross Block expanded from Rs. 4,12,318 Cr in FY23 to Rs. 6,09,133 Cr in FY25. This is an addition of nearly Rs. 2 lakh Cr, a 48% rise in just two years.

At the same time, we delivered transformative projects that have reshaped India’s infrastructure landscape and strengthened its global standing:

# Commissioned India’s first container transshipment port at Vizhinjam, alongside the Colombo West International Terminal.

# Added 6 GW of renewable capacity, including Khavda, the world’s largest single-location renewable project.

# Commissioned the world’s largest copper smelter and metallurgical complex.

# Expanded our energy network with 7,000 circuit kms of transmission lines and 4 GW of new thermal capacity across India and overseas.

What was intended to hurt us has instead become a defining inflection point by fortifying our foundations, sharpening our ambition and reaffirming our responsibility to build with scale, speed and resilience for India’s future.

However, even as the storm raged, I remained acutely aware of the anxiety it created for our investors, lenders, suppliers and partners. It was your trust that steadied us, your patience that sustained us and your belief that emboldened us. For this extraordinary support, I am profoundly grateful.

Looking ahead, my promise to you is that we will:

# Further strengthen governance standards that inspire confidence across markets and regulators.

# Accelerate innovation and sustainability, setting benchmarks not just in India but globally.

# Double down on nation building, investing in infrastructure that powers India’s long term growth story.

Let this moment not merely restore confidence. Let it reaffirm what your company stands for – resilience in adversity, integrity in action and an unyielding commitment to building a brighter future for India and the world.

I close with the timeless words of Shri Sohan Lal Dwivedi, which capture the spirit that defines our journey:

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“The boat that fears the waves can never reach the shore,
But those who keep on trying will win forevermore….”

With renewed confidence and gratitude, I look forward to, together, writing the next and best chapters of our growth story and building a future worthy of India’s aspirations.

With determination and respect,

Gautam Adani
Chairman, Adani Group

मखाना की खेती और बिहार के किसानों की चुनौतियां

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दरभंगा (बिहार) मखाना, जिसे फॉक्स नट या गोर्गोन नट भी कहा जाता है, एक जलजनित फसल है जो बिहार की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। यह सुपरफूड के रूप में वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय हो रहा है, लेकिन इसके उत्पादन का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बिहार से आता है। मिथिला, कोसी और सीमांचल क्षेत्रों में इसकी खेती सदियों से चली आ रही है। प्राचीन ग्रंथों में इसे ‘महान फल’ कहा गया है, जो विटामिन, मिनरल्स और फाइबर से भरपूर होता है। बिहार सरकार की ‘मखाना विकास योजना’ और केंद्र सरकार के ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ स्कीम के तहत इसे बढ़ावा मिला है। फिर भी, बिहार के किसान इसकी खेती में भारी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

मखाना की खेती: प्रक्रिया और संभावनाएं
मखाना की खेती मुख्य रूप से जल-आधारित होती है, जो तालाबों, पोखरों या जलभराव वाले खेतों में की जाती है। यह ईउरियाल फेरॉक्स नामक जलकुंभी पौधे से प्राप्त होता है। बिहार के मधुबनी, दरभंगा, सहरसा, कटिहार, पूर्णिया, सुपौल और अररिया जैसे जिलों में 40-45 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में इसकी खेती होती है। पिछले नौ वर्षों में खेती का क्षेत्र 171 प्रतिशत और उत्पादन 152 प्रतिशत बढ़ा है। एक हेक्टेयर में औसतन 21 क्विंटल बीज (गुड़िया) प्राप्त होता है, जो प्रसंस्करण के बाद 8-10 क्विंटल लावा (पॉप्ड मखाना) बनता है।

खेती की प्रक्रिया जटिल और श्रमसाध्य है। फरवरी-मार्च में बीज रोपाई की जाती है। तालाब या खेत में 6-9 इंच पानी जमा रखा जाता है। खरपतवार हटाने के बाद बीज बोए जाते हैं। जुलाई-अगस्त में फूल आते हैं, जो सितंबर-अक्टूबर में बीजों में बदल जाते हैं। कटाई के दौरान किसान 4-5 घंटे पानी में खड़े होकर हाथ से गुड़िया तोड़ते हैं। इसके बाद सुखाना, छंटाई, भूनना और फोड़ना होता है। एक किलो गुड़िया से लगभग 400 ग्राम लावा मिलता है। प्रसंस्करण में लकड़ी के हथौड़े से बीज फोड़े जाते हैं, जो हाथों को जलाने का कारण बनता है।

बिहार सरकार 75 प्रतिशत सब्सिडी देती है, जैसे ‘स्वर्ण वैदेही’ प्रजाति के बीज पर 97,000 रुपये प्रति हेक्टेयर। राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र, दरभंगा (ICAR) ने आधुनिक तकनीकों जैसे उथले पानी वाली खेती और बाढ़ प्रतिरोधी किस्में विकसित की हैं। इससे उत्पादकता 1.7-1.9 टन/हेक्टेयर से बढ़ाकर 3-3.5 टन/हेक्टेयर की जा सकती है। एक एकड़ में 1-1.5 लाख रुपये का मुनाफा संभव है। वैश्विक मांग बढ़ने से निर्यात 25-30 करोड़ रुपये का हो गया है, जो पाकिस्तान, अरब देशों और यूरोप तक पहुंचता है। ‘मिथिला मखाना’ को GI टैग मिला है, जो ब्रांडिंग में मदद करता है।

कुछ किसान सफलता की मिसाल पेश कर रहे हैं। दरभंगा के रामखिलावन सहनी जैसे किसान 20 बीघा में खेती कर परिवार सहित काम करते हैं। कटिहार के शोभित ने सरकारी अनुदान से शुरू की खेती अब लाखों की आय दे रही है। मिथिला के 25 जिलों में जागरूकता अभियान चल रहे हैं, जहां मशीनीकरण और ड्रोन का उपयोग बढ़ावा दिया जा रहा है।

बिहार के किसानों की चुनौतियां: मेहनत के बावजूद खाली जेबें

मखाना की चमक किसानों तक नहीं पहुंच रही। 50-60 हजार किसान और मजदूर इससे जुड़े हैं, लेकिन अधिकांश गरीब मल्लाह समुदाय से हैं, जो भूमिहीन हैं। वे किराए की जमीन पर 10-20 हजार रुपये प्रति बीघा देते हैं। प्रमुख चुनौतियां निम्न हैं:

श्रमसाध्य और स्वास्थ्य जोखिम: कटाई में किसान घुटनों तक पानी में 8-10 घंटे डूबे रहते हैं। सांस लेना मुश्किल, त्वचा रोग और दुर्घटनाएं आम हैं। सहरसा में एक किसान की मौत की घटना इसका उदाहरण है। प्रसंस्करण में हाथ जलना और धूल से सांस की बीमारियां होती हैं। कोई स्वास्थ्य सुविधा या बीमा नहीं।

बाजार और मूल्य संबंधी समस्याएं: किसानों को गुड़िया के लिए 300-500 रुपये/क्विंटल मिलता है, जबकि बाजार में लावा 5-6 हजार रुपये/क्विंटल बिकता है। बिचौलिए 80-90 प्रतिशत मुनाफा कमा लेते हैं। MSP की कमी से किसान मजबूर हैं। निर्यात लाभ किसानों को नहीं, व्यापारियों को मिलता है।
जलवायु और प्राकृतिक चुनौतियां: बाढ़ और सूखा फसल नष्ट कर देते हैं। बढ़ते तापमान से विकास प्रभावित होता है। पारंपरिक तालाबों में जल प्रबंधन कठिन; खेतों में 6-9 इंच पानी बनाए रखना चुनौतीपूर्ण। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में 1.04 लाख हेक्टेयर बर्बाद भूमि का उपयोग संभव, लेकिन सिंचाई की कमी।

आर्थिक और तकनीकी बाधाएं: उच्च लागत (बीज, पटवन, मजदूरी) के बावजूद लाभ कम। भूमिहीन किसान ऋण पर निर्भर। आधुनिक तकनीक (मशीनरी, उच्च उपज वाली किस्में) का अभाव। प्रसंस्करण इकाइयों की कमी से कच्चा माल बाहर बिकता है। केवल 2 प्रतिशत मखाना अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरता है।

नीतिगत और सामाजिक मुद्दे: मखाना बोर्ड की घोषणा (2025 बजट में 100 करोड़ रुपये) हुई, लेकिन कार्यान्वयन धीमा। योजनाएं कागजी; FPO गठन सीमित। महिलाओं और युवाओं को रोजगार मिलता है, लेकिन आर्थिक तंगी बनी रहती है। GI टैग के बावजूद केवल 67 अधिकृत उपयोगकर्ता हैं।
कटिहार के देवसुंदर कुमार जैसे किसान कहते हैं, “महीनों की मेहनत पर 25 हजार बचत।” पूर्णिया के शाहजहां बताते हैं, “योजनाएं कागज पर, जमीन पर कुछ नहीं।”

समाधान की दिशा में कदम
मखाना बिहार के लिए ‘ब्लैक गोल्ड’ है, जो 70,000 हेक्टेयर क्षेत्र और दोगुना उत्पादन का लक्ष्य रखता है। मखाना बोर्ड से उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन मजबूत होगा। FPO, MSP, मशीनीकरण और प्रशिक्षण से किसानों को सशक्त बनाना होगा। जल प्रबंधन और जैविक खेती पर जोर दें। यदि चुनौतियां दूर हुईं, तो लाखों किसान समृद्ध होंगे। सरकार, वैज्ञानिक और किसान मिलकर ‘मखाना क्रांति’ ला सकते हैं। यह न केवल आर्थिक उन्नति, बल्कि सांस्कृतिक गौरव भी बहाल करेगा। बिहार का मखाना दुनिया की थाली सजाता है, लेकिन किसानों की थाली भरना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।

मखाना की छाया: बिहार के तालाबों में छिपी कहानी

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पूर्णिया (बिहार) : बिहार के पूर्णिया जिले के श्रीनगर गांव में, कोसी नदी की बाढ़ भरी धारा सालाना अपना कहर बरपाती है। चिन्मयानंद सिंह, एक युवा किसान, जो कभी पत्रकारिता की पढ़ाई कर शहर की चकाचौंध में खो जाना चाहते थे, आज तालाब के किनारे खड़े हैं। उनके हाथों में कीचड़ से सने हुए मखाने की गुड़िया हैं—वह कांटेदार बीज जो दुनिया भर में ‘सुपरफूड’ के नाम से जाना जाता है। लेकिन चिन्मयानंद के चेहरे पर मुस्कान कम, चिंता ज्यादा है। “मौसम की मार ने धान-मक्का की फसलें तबाह कर दीं,” वे कहते हैं, “लेकिन मखाना ने उम्मीद की किरण दिखाई। फिर भी, यह खेती इतनी आसान नहीं।”

यह कहानी 2021 की एक शोध रिपोर्ट से प्रेरित है, जहां ‘मॉन्गाबे इंडिया’ के पत्रकारों ने कोसी-सीमांचल क्षेत्र के 25-30 हजार हेक्टेयर मखाना खेतों का दौरा किया। चिन्मयानंद की तरह, यहां के हजारों किसान मौसम की अनिश्चितताओं से जूझ रहे हैं। बाढ़ आती है तो फसल डूब जाती है, सूखा पड़ता है तो पानी का प्रबंधन असंभव। बिहार सरकार ने 1.04 लाख हेक्टेयर बर्बाद भूमि को मखाना के लिए उपयुक्त बनाने की योजना बनाई, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। चिन्मयानंद बताते हैं, “हम खेतों में मेढ़ बनाते हैं ताकि 6-9 इंच पानी जमा रहे, लेकिन तूफान आते ही पत्तियां उलट जाती हैं। इन्हें सीधा करने में घंटों लग जाते हैं।” शोध के अनुसार, मखाना जलवायु-प्रतिरोधी है—इसकी पत्तियां तूफान में मुड़ जाती हैं लेकिन टूटती नहीं—फिर भी, बाढ़ से 20-25% फसल नष्ट हो जाती है।

चिन्मयानंद की कहानी शुरू होती है 2018 से, जब उन्होंने 5 एकड़ जमीन पर मखाना की खेती आजमाई। पारंपरिक रूप से, मखाना तालाबों में उगाया जाता है, जहां किसान कमर तक पानी में उतरकर कटाई करते हैं। “फरवरी-मार्च में बीज बोते हैं, जुलाई तक फूल खिलते हैं, और सितंबर-अक्टूबर में गुड़िया तोड़ते हैं,” वे वर्णन करते हैं। लेकिन कटाई की प्रक्रिया श्रमसाध्य है। सुबह 4 बजे से शाम तक, कीचड़ भरे पानी में खड़े होकर हाथों से बीज चुनना पड़ता है। कांटे हाथ चुभोते हैं, संक्रमण फैलता है, और सांस लेना मुश्किल। एक शोध अध्ययन, ‘इंटीग्रेटेड एक्वाकल्चर विद फॉक्स नट’ (2017, रिसर्चगेट), बताता है कि उत्तर बिहार के किसान मल्लाह समुदाय से हैं, जो भूमिहीन हैं और किराए की जमीन पर 10-20 हजार रुपये प्रति बीघा देते हैं। चिन्मयानंद कहते हैं, “हम 8-10 घंटे पानी में डूबे रहते हैं। कई बार दुर्घटनाएं होती हैं—एक साथी की मौत हो गई थी। कोई स्वास्थ्य बीमा नहीं।”

प्रसंस्करण की चुनौतियां और भी कठिन हैं। गुड़िया सुखाने, छंटाई, भूनने और फोड़ने का काम हाथों से होता है। लकड़ी के हथौड़े से बीज फोड़ते समय हाथ जल जाते हैं, धूल से सांस की बीमारियां होती हैं। चिन्मयानंद ने बताया, “एक किलो गुड़िया से 400 ग्राम लावा बनता है। हमें 300-500 रुपये प्रति क्विंटल मिलता है, जबकि बाजार में 5-6 हजार रुपये प्रति क्विंटल बिकता है।” यह असमानता एक 2025 की रिपोर्ट ‘ए बिलियन-डॉलर ग्लोबल मार्केट फॉर न्यूट्रिएंट-रिच फॉक्स नट्स’ में उजागर हुई, जहां कहा गया कि बिहार 90% वैश्विक उत्पादन करता है, लेकिन बिचौलिए 80-90% मुनाफा ले जाते हैं। कोई स्थानीय प्रसंस्करण इकाई नहीं, कोई कोल्ड स्टोरेज नहीं—कच्चा माल बाहर बिकता है। कीमतों में उतार-चढ़ाव से किसान कर्ज के जाल में फंसते हैं। चिन्मयानंद ने 2-3 लाख उधार लेकर शुरू किया, लेकिन पिछले साल फसल बर्बाद होने से 1.5 लाख का घाटा हुआ।

फिर भी, आशा की किरण है। राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र (ICAR), दरभंगा के डॉ. मनोज कुमार की शोध ने बदलाव लाया। उनकी ‘शैलो वॉटर फार्मिंग’ तकनीक से तालाबों के बजाय खेतों में 1-2 फुट पानी में खेती संभव हुई। एक केस स्टडी में, पूर्णिया के धीरेंद्र ने 48 क्विंटल फसल ली, जिससे 2.58 लाख का शुद्ध लाभ हुआ—धान की तुलना में 4 गुना ज्यादा। डॉ. कुमार ने बाढ़-प्रतिरोधी किस्में जैसे ‘स्वर्ण वैदेही’ विकसित कीं, जो उत्पादकता 1.7 टन से बढ़ाकर 3.5 टन प्रति हेक्टेयर कर सकती हैं। लेकिन चुनौतियां बरकरार हैं: बढ़ते तापमान से पौधे प्रभावित, और केवल 2% मखाना अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरता है।

2025 के बजट में मखाना बोर्ड की घोषणा हुई—100 करोड़ की योजना से MSP, FPO और मशीनीकरण का वादा। चिन्मयानंद जैसे किसान उम्मीद बांधे हैं। “अगर बोर्ड बना, तो बिचौलियों का राज खत्म होगा। हमारा ‘मिथिला मखाना’ GI टैग के साथ वैश्विक बाजार में चमकेगा।” लेकिन फिलहाल, वे तालाब में उतरते हैं, कांटों से जूझते हैं, और सपने बुनते हैं—एक ऐसी फसल की, जो न केवल पोषण दे, बल्कि सम्मान भी।

यह कहानी बिहार के 50-60 हजार किसानों की वास्तविकता को दर्शाती है। मखाना ‘ब्लैक गोल्ड’ है, लेकिन किसानों की थाली अभी भी खाली। क्या बोर्ड यह बदलाव लाएगा? समय बताएगा।

पैसा वसूल परिवार के साथ देखने लायक फिल्म जॉली एलएलबी थ्री

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विष्णु शर्मा

मुम्बई : जॉली एलएलबी ने राहुल गांधी की मुहिम पर हैट्रिक बनाई, लेकिन क्या विलेन राहुल गांधी हैं?
जॉली एलएलबी की तीसरी मूवी आ गई है, मूवी लोगों को पसंद भी आ रही है क्योंकि दोनों जॉली यानी सीनियर जॉली मेरठ वाले अरशद वारसी व जूनियर जॉली कानपुर वाले अक्षय कुमार एक साथ इसमें दिखेंगे. उन दोनों की जुगलबंदी ने फिल्म तो वाकई में देखने लायक बना दी है लेकिन जो लोग इस मूवी की असली कहानी जानते हैं, उनमें चर्चा शुरू हो गई है कि राहुल गांधी को क्या उस विधायक के रोल में दिखाया गया है जो पुलिस की कार्यवाही के दौरान चुपके से अपने गुंडे के जरिए डीएम को गोली मरवा देता है?  

जिन लोगों को नहीं पता, वो ये जान लें कि इस मूवी की कहानी यूपी के ग्रेटर नोएडा के जुड़वां गांवों भट्टा पारसौल में हुए किसानों और पुलिस के बीच हुए संघर्ष से जुड़ी है. हालांकि मूवी में ये गांव बीकानेर में दिखा दिया गया है. जहां असली कहानी प्रशासन की उन दो गावों की जमीन ग्रेटर नोएडा के लिए दो नए सैक्टर्स के लिए अधिग्रहण से जुड़ी थी, जिसके लिए किसान कम मुआवजे के चलते नाराज थे. वहीं मूवी में इसे एक उद्योगपति हरिभाई खेतान के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘बीकानेर टू बोस्टन’ के लिए सूदखोंरो के जरिए किसानों की जमीन खरीदने में दिखाया गया है, जिसमें घूस लेकर डीएम व सारे अधिकारी उनकी मदद करते हैं.

असल कहानी में जहां 2011 में गांव वालों ने जब सर्वे करने कुछ अधिकारियों को बंधक बना लिया तो उन्हें छुड़ाने पुलिस गई थी, तब बवाल हुआ, और दो पुलिस वाले और दो गांव वाले मांरे गए. मूवी में ये बवाल डीएम के गांव खाली करने के ऐलान और विधायक के गुर्गे द्वारा छुपकर डीएम को गोली मारने से शुरू होता है. ऐसे में फिल्म किसानों को खुश कर देने वाली है, जबकि हकीकत में इस जनवरी में भी बवाल करने वाले 27 किसानों के घरों पर कुर्की के नोटिस चिपकाए गए हैं. हालांकि बाकी किसान खुश हैं, फिल्म के विपरीत उनको बढा हुआ मुआवजा मिल गया है, विकसित प्लॉट भी मिल गए हैं.

2011 में 4 हत्याओं की खबर से राहुल गांधी एक्शन में आ गए थे, छुपकर वहां किसी की बाइक पर बैठकर पहुंचे और खूब माहौल बनाया, बयान दिए कि मैंने राख के ढेर में कई लाशें देखी थीं, बाद में सूचना मीडिया से ली हुई बताई. लेकिन जब चुनाव हुए तो भट्टा पारसौल के लोगों ने ही उनके विधायक प्रत्याशी को वोट नहीं दिया. हारा हुआ प्रत्याशी और उनको बाइक पर लिफ्ट देने वाला दोनों आज बीजेपी में हैं. 2012 के यूपी चुनावों में कांग्रेस को 28 सीटें आईं और लोकसभा में यूपी में जीरो.
लेकिन इस मूवी में जिस तरह से विधायक का छुपा किरदार दिखाया गया है कि उसी ने कंपनी के मालिक खेतान से पैसा लेकर डीएम पर गोली चलवाकर किसानों और पुलिस के  बीच बवाल करवाया था, लोग अनुमान लगा रहे हैं कि वो राहुल गांधी का किरदार हो सकता है. लेकिन राहुल की तरह वो फ्रंट पर आने से बचता रहा था. राहुल का किरदार हो ना हो लेकिन विपक्ष के वकील विक्रम (राम कपूर) का किरदार जरूर कई मौकों पर कपिल सिब्बल जैसा लगा है.

कुछ भी कहिए मूवी मजेदार है, सुभाष कपूर ने अरशद-अक्षय और सौरभ शुक्ला की तिकड़ी से पैसा वसूल परिवार के साथ देखने लायक फिल्म बनाई है. गजराज राव तो हमेशा की तरह बेमिसाल हैं. कई डायलॉग्स मारक हैं जैसे ‘मुक्का जब लड़ाई के बाद याद आए तो उसे अपने मुंह पर मार लेना चाहिए’ या फिर ‘किसान है तो जहान है’ और कॉमेडी मूवी में इमोशनल तड़का भी जबरदस्त है, वकील व किसान परिवारों के लिए तो मस्ट वाच है ही.  हालांकि दिल्ली की सैशन कोर्ट में बीकानेर का केस क्यों लड़ा जा रहा था, या फौरन वकील दिल्ली से बीकानेर के गांव में और बीकानेर की पुलिस दिल्ली की कोर्ट में वर्दी पहने कैसे नजर आती है, इन सब बहस में पड़ना बेकार है, बाकी गाना तो हिट हो ही गया है, फिकर ना कर तेरा भाई वकील है।

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