सीएसडीएस ने हिन्दू समाज को बांटा और मुस्लिम-ईसाई एकता को बढ़ावा दिया: एक विश्लेषण

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दिल्ली। भारतीय राजनीति और समाज पर गहरे प्रभाव डालने वाली संस्था सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) पर इन दिनों सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि इस सर्वे एजेंसी ने अपनी जाति-आधारित चुनाव विश्लेषण रिपोर्ट्स के जरिए हिन्दू समाज को तोड़ने का काम किया, जबकि मुस्लिम और ईसाई समुदायों को एकजुट रखने में अपनी भूमिका निभाई। वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक विश्लेषक दिलीप मंडल ने सीएसडीएस को ‘भारतीय समाज के लिए खतरा’ करार देते हुए इसके आंकड़ों पर सवाल उठाए हैं, जिसने देश की सामाजिक संरचना को प्रभावित किया है।

हिन्दू समाज में जातीय दरार
सीएसडीएस की शुरुआत से ही जाति-आधारित वोटिंग पैटर्न पर फोकस रहा है, जो मुख्य रूप से हिन्दू समुदाय तक सीमित रहा। 2009 के उत्तर प्रदेश लोकसभा चुनावों के आंकड़ों में सीएसडीएस ने जाटव और गैर-जाटव समुदायों के वोटिंग व्यवहार को अलग-अलग दर्शाया। इन आंकड़ों के अनुसार, जाटवों ने बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) का समर्थन किया, जबकि गैर-जाटव वोट अन्य दलों में बंट गए। यह विश्लेषण 2007 में मायावती की सरकार बनने के बाद शुरू हुआ, जब कांग्रेस ने यूपी में अपनी सियासी जमीन मजबूत करने के लिए सक्रियता दिखाई। राहुल गांधी के नेतृत्व में बीएसपी के खिलाफ आंदोलन और फायरिंग की घटनाओं ने इस विभाजन को और गहरा किया।

सीएसडीएस के आंकड़ों ने मीडिया और टीवी डिबेट्स में हलचल मचा दी। हजारों लेख और सैकड़ों शो में इन आंकड़ों का हवाला दिया गया, जिससे हिन्दू समाज में जातीय संदेह और टकराव बढ़ा। इन आंकड़ों ने नेताओं की सोच को भी प्रभावित किया, जहां वे वोटरों को नहीं, बल्कि जातियों के रूप में देखने लगे। हालांकि, यह भी सच है कि वोटिंग में जाति एक कारक हो सकती है, लेकिन यह एकमात्र निर्धारक नहीं है। फिर भी, सीएसडीएस के विश्लेषण ने इस धारणा को मजबूत किया कि हिन्दू वोटर अपनी जाति के आधार पर ही फैसला लेते हैं, जो सामाजिक एकता को नुकसान पहुंचाने वाला साबित हुआ।

मुस्लिम और ईसाई समुदाय: एकजुटता का दावा

सीएसडीएस के आलोचकों का कहना है कि इस संस्था ने मुस्लिम और ईसाई समुदायों के वोटिंग पैटर्न को धार्मिक पहचान के तहत एकजुट दर्शाया, न कि जाति के आधार पर। सीएसडीएस मुसलमानों से जाति-आधारित सवाल नहीं पूछता, जिससे इन समुदायों की आंतरिक विविधता को नजरअंदाज किया जाता है। इससे मुस्लिम और ईसाई वोटरों को एकजुट धार्मिक ब्लॉक के रूप में पेश किया गया, जो राजनीतिक दलों के लिए रणनीति बनाने में सहायक रहा। यह दृष्टिकोण हिन्दू समाज में जातीय विभाजन को बढ़ाने के साथ-साथ अल्पसंख्यक समुदायों में एकता का भ्रम पैदा करता है।

राजनीतिक एजेंडा और विदेशी फंडिंग
सीएसडीएस पर राजनीतिक एजेंडा चलाने का भी आरोप है। 2007-09 के दौरान कांग्रेस की यूपी में वापसी और बीएसपी-एसपी की कमजोरी को सीधे तौर पर सीएसडीएस के आंकड़ों से जोड़ा जाता है। यह संस्था विदेशी वित्त पोषण से संचालित है और बेलगाम होकर भारतीय राजनीति को प्रभावित कर रही है।
एससी लिस्ट में मुस्लिमों को शामिल करने की साजिश?

नया विवाद सीएसडीएस के उस सर्वे को लेकर है, जिसमें दावा किया गया कि 59% लोग मुसलमानों को अनुसूचित जाति (एससी) सूची में शामिल करना चाहते हैं। यह बाबा साहब भीमराव आंबेडकर के संविधान आदेश, 1950 के खिलाफ है। यह कदम देश में और सामाजिक तनाव पैदा करेगा, जो फंडिंग एजेंसियों के हित में हो सकता है। चूंकि सीएसडीएस अपना रॉ डाटा सार्वजनिक नहीं करता, इन दावों की स्वतंत्र जांच संभव नहीं है, जो आलोचकों के लिए चिंता का विषय है।

सामाजिक सौहार्द पर असर
सीएसडीएस के आंकड़ों ने भारतीय समाज पर गहरा असर डाला है। हिन्दू समाज में जातीय विभाजन को बढ़ावा देने और मुस्लिम-ईसाई समुदायों को एकजुट धार्मिक पहचान के रूप में पेश करने से राजनीतिक ध्रुवीकरण तेज हुआ है। यह संस्था जानबूझकर सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचा रही है। दूसरी ओर, सीएसडीएस के समर्थक इसे वैज्ञानिक विश्लेषण का हिस्सा मानते हैं, जो लोकतंत्र को समझने में मददगार है। फिर भी, इसके तरीकों और निष्पक्षता पर सवाल बने रहेंगे, जब तक कि यह अपने डाटा को पारदर्शी न करे।

असम में पत्रकार अभिसार शर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज, आर्थिक अनियमितता के पुराने आरोप भी चर्चा में

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गुवाहाटी: वरिष्ठ पत्रकार और यूट्यूबर अभिसार शर्मा के खिलाफ असम की गुवाहाटी क्राइम ब्रांच ने एफआईआर दर्ज की है। यह कार्रवाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के सदस्य आलोक बरूआ की शिकायत पर हुई, जिसमें शर्मा पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पर सांप्रदायिक राजनीति का आरोप लगाने का दावा किया गया है। शर्मा ने अपने यूट्यूब चैनल पर असम सरकार की नीतियों, विशेषकर महाबल सीमेंट को 3000 बीघा जमीन आवंटन और मुसलमानों व मदरसों के खिलाफ कथित प्रचार की आलोचना की थी। शर्मा ने एक्स पर कहा, “यह एफआईआर बेमानी है, इसका जवाब वैधानिक रूप से दिया जाएगा।”

अभिसार शर्मा पहले भी विवादों में रहे हैं। 2023 में दिल्ली पुलिस ने न्यूजक्लिक मामले में उनसे पूछताछ की थी, जिसमें उन पर और न्यूजक्लिक पर चीन से अवैध फंडिंग के आरोप लगे थे। यूएपीए और आईपीसी की धाराओं के तहत जांच के दौरान उनके घर पर छापेमारी हुई, जिसमें लैपटॉप और मोबाइल जब्त किए गए। इसके अलावा, 2018 में उन पर और उनकी पत्नी सुमना सेन पर एनडीटीवी से जुड़े वित्तीय अनियमितता के आरोप लगे, जिन्हें बाद में सीबीआई जांच में खारिज कर दिया गया।

शर्मा, जो अपनी कांग्रेस समर्थक छवि के लिए जाने जाते हैं, ने इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया है। मामले की आगे की जांच जारी है।

एक ग्रह था, जो टल गया

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हरेश कुमार

अकाल मृत्यु वो मरे, जो काम करे चांडाल का।
काल उसका क्या बिगाड़े, जो भक्त हो महाकाल का।।

गुरु तेगबहादुर मेट्रो स्टेशन से ठीक पहले, ढाका गाँव में हरिमंदिर के सामने एक ठोकर (स्पीड ब्रेकर) बना है, जो बरसात में क्षतिग्रस्त हो चुका है। बारिश के मौसम में सड़कों की ऐसी स्थिति लोगों के लिए जानलेवा बन जाती है। सरकार को इस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। इसी क्षतिग्रस्त ठोकर के कारण मेरी गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गई।

हादसे से कुछ सेकंड पहले मैं अपनी बेटी से बात कर रहा था। अचानक क्या हुआ, कुछ याद नहीं। दो सेकंड में सब कुछ बदल गया। मैंने गाड़ी पर नियंत्रण खो दिया, और हम दोनों सड़क पर घसीटे गए। मेरी बेटी को पहले होश आया। उसने मुझे ढूंढा, पुकारा, “पापा, कहाँ हो?” मैं कुछ दूरी पर औंधे मुंह पड़ा था। मेरी बेटी, जो ग्रेटर नोएडा यूनिवर्सिटी में फिजियोथेरेपी की सातवें सेमेस्टर की छात्रा है, ने हिम्मत दिखाई। वह देखने में भले ही दुबली-पतली हो, लेकिन साहस और हौसले में उसका कोई मुकाबला नहीं। उसने मुझे थपकी दी, फिर हिम्मत जुटाकर सीपीआर दिया।
उसने लोगों को पुकारा। मुकुंदपुर के दीपक कुमार ने आगे बढ़कर मदद की। उन्होंने गाड़ी को साइड किया और मुझे नजदीकी क्लिनिक पहुंचाया, जहां टिटनेस का इंजेक्शन दिया गया। वहां से सलाह दी गई कि मुझे ट्रॉमा सेंटर ले जाया जाए। मेरी बेटी मुझे दिल्ली सरकार के ट्रॉमा सेंटर ले गई, लेकिन वहां का अनुभव निराशाजनक था।

ट्रॉमा सेंटर में मौजूद डॉक्टरों और कर्मचारियों का व्यवहार बेहद असंवेदनशील था। एक डॉक्टर ने तो यह तक कह दिया, “मर तो नहीं गया, इंतजार करो।” न तो वे इलाज कर रहे थे, न ही रेफर कर रहे थे। मेरा माथा, नाक, कान और मुंह से खून बह रहा था, लेकिन उनकी उदासीनता देखकर दुख हुआ। कुछ लोग वहां मौजूद थे, अगर उन्होंने हाथ उठाया होता, तो शायद स्थिति और बिगड़ जाती। चिकित्सा जैसे पवित्र पेशे को कुछ लोग बदनाम कर रहे हैं।

मैं, हरेश कुमार, दिल्ली और केंद्र सरकार से मांग करता हूं कि ऐसे ट्रॉमा सेंटर्स को तत्काल बंद किया जाए और चिकित्सा के पेशे में घुस आए असंवेदनशील लोगों पर कठोर कार्रवाई हो। यह मेरी व्यक्तिगत शिकायत नहीं, बल्कि समाज की समस्या है। मेरे साथ कई लोग थे, शायद इसीलिए मुझे रेफर किया गया, वरना स्थिति और गंभीर हो सकती थी।

मैं सभी जिम्मेदार लोगों से अपील करता हूं कि जन्माष्टमी के अगले दिन दोपहर एक बजे के बाद का ट्रॉमा सेंटर का सीसीटीवी फुटेज जांचा जाए। चिकित्सा जगत को कलंकित करने वाले ऐसे लोगों पर कार्रवाई हो, ताकि किसी और की जिंदगी खतरे में न पड़े।

महाकाल की कृपा और समुदाय का समर्थन

दुर्घटना के बाद महाशक्ति कॉलोनी मंदिर, कौशिक एन्क्लेव, ब्लॉक-ए, बुराड़ी में नियमित भजन-कीर्तन बंद है। सभी लोग उदास हैं। जैसे ही हादसे की खबर फैली, लोग ट्रॉमा सेंटर से लेकर फोर्टिस हॉस्पिटल, शालीमार बाग तक दौड़े आए। महाकाल की कृपा और सभी की दुआओं से मैं तेजी से स्वस्थ हो रहा हूं।

जन्माष्टमी की पूजा के बाद भगवान का भंडारा होना था, लेकिन हादसे के कारण केवल भोग लगाया गया। सभी लोग उदास हैं। कल, 23 अगस्त को मुझे अस्पताल से छुट्टी मिलेगी। इसके बाद धूमधाम से भंडारा आयोजित किया जाएगा। कॉलोनीवासियों का कहना है, “हमारे चाचा कुर्सी पर बैठे रहेंगे, और भंडारा भव्य होगा।” जिसके साथ महाकाल हों, उसका काल क्या बिगाड़ सकता है?

मैं 24 घंटे सभी के लिए उपलब्ध रहता हूं। मुझे अपनी चिंता नहीं, दूसरों की सेवा ही मेरी कमाई है। लोग मुझे “विधायक चाचा” कहते हैं, भले ही निर्वाचित विधायक कोई और हो। यह प्यार और सम्मान समाज की सेवा से ही मिला है। मैंने खुद को समाज और देश के लिए समर्पित कर दिया है। मेरा कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं, बस समाज के भले के लिए मैं हर पल तैयार रहता हूं।

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का भावुक लेख, जनसुनवाई अब हर विधानसभा में

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नई दिल्ली: दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने एक भावुक लेख के माध्यम से अपनी जिंदगी के अनुभव और दिल्लीवासियों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को साझा किया। अपने कॉलेज के दिनों की एक कार दुर्घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि कैसे उनके पिता ने उन्हें डर पर काबू पाने और आगे बढ़ने की सीख दी। इस सीख को याद करते हुए रेखा ने हाल ही में हुई एक और दुर्घटना का उल्लेख किया, लेकिन दृढ़ता के साथ कहा कि वह दिल्ली के हितों के लिए लड़ना कभी नहीं छोड़ेंगी।मुख्यमंत्री ने अपने लेख में लिखा, “मेरे जीवन का हर क्षण और शरीर का हर कण दिल्ली के नाम है। मैं इन सभी अप्रत्याशित प्रहारों के बावजूद दिल्ली का साथ कभी नहीं छोड़ूँगी।”

उन्होंने महिलाओं की सहनशक्ति और संघर्ष की भावना को रेखांकित करते हुए कहा कि महिलाओं में तकलीफों से लड़ने की दोहरी ताकत होती है। “मैं भी हर परीक्षा के लिए तैयार हूँ,” उन्होंने जोड़ा।रेखा गुप्ता ने एक महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए कहा कि अब जनसुनवाई केवल उनके आवास तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि दिल्ली की हर विधानसभा में होगी। “आपकी मुख्यमंत्री, आपके द्वार,” उन्होंने लिखा।

अपने लेख को उन्होंने कवि रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियों के साथ समाप्त किया, जो उनकी दृढ़ता और साहस को दर्शाती हैं: “कदम मिलाकर चलना होगा।” उनके लिखे पर सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।

दिल्लीवासियों ने उनकी संवेदनशीलता और जनता के प्रति समर्पण की सराहना की। यह कदम दिल्ली की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है।

“बाधाएं आती हैं आएं,
घिरें प्रलय की घोर घटाएं,
पांवों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं,
निज हाथों से हंसते-हंसते,
आग लगाकर जलना होगा,
कदम मिलाकर चलना होगा”

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