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2 मई 2013 : पाकिस्तान की जेल में निर्दोष सरबजीत की हत्या
दिल्ली । सरबजीत सिंह वो निर्दोष भारतीय नागरिक था जो नशे की हालत में धोखे से पाकिस्तान की सीमा में चला गया । जेल में कठोर यातनायें देकर कैदियों ने हत्या कर दी । और शव भारत आया तो उसके शरीर के सभी आंतरिक अंग गायब थे ।
किसी भी सरकार की विदेश नीति और नेतृत्व कैसा होना चाहिए। कहाँ मानवीय पक्ष को प्राथमिकता हो कहाँ सख्त तेवर दिखाये जाये ये दोनों उदाहरण भारत की विभिन्न सरकारों की कार्यशैली में देखने को मिलते हैं। एक उदाहरण निर्दोष नागरिक सरबजीत सिंह का है जो धोखे से पाकिस्तान चला गया । उसे बंदी बनाकर जेल भेज दिया गया जहाँ तेइस वर्षों तक जेल में कठोर यातनाएँ देकर कैदियों ने मार डाला और भारत सरकार केवल विरोध पत्र लिखने के अतिरिक्त कुछ न कर सकी । भारत का ही दूसरा उदाहरण विंग कमांडर अभिनंदन का है जो एयर स्ट्राइक के लिये विमान लेकर पाकिस्तान सीमा में गये थे, बंदी बनाये गये लेकिन यह भारतीय नेतृत्व का दबाव था कि केवल 60 घंटों में ही पाकिस्तान ने अभिनंदन को सम्मान भारत वापस भेज दिया । जिन दिनों सरबजीत पाकिस्तान की जेल में था तब भारत में हर दल की सरकार रही । सबसे लंबी दो सरकारें काँग्रेस की रहीं। पहले प्रधानमंत्री नरसिंहराव की और फिर दस वर्ष मनमोहन सिंह की सरकार रही । पर सरबजीत की भाग्य न बदला । पाकिस्तानी जेल में उसे सतत यातनायें मिलीं । सरबजीत सिंह का जन्म पंजाब के तरनतारन जिला अंतर्गत गांव भीखीविंद में हुआ था । यह एक किसान परिवार था लेकिन पिता सुलक्षण सिंह ढिल्लो अपने गाँव से दूर उत्तर प्रदेश परिवहन विभाग में नौकरी करने लगे । मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण कर सरबजीत गांव लौट आये और खेती करने लगे । अपनी आय बढ़ाने केलिये एक ट्रेक्टर खरीदकर भाड़े पर दूसरे गांवों में भी खेती करने लगे। 1984 में विवाह हुआ और दो बेटियों के पिता बने । जीवन खुशी से बीतने लगा । समय के साथ उन्हें शराब पीने की आदत लग गई और यही आदत पूरे घर का सुख चैन और उनकी जान ले बैठी । वह 28 अगस्त 1990 का दिन था। वे पाकिस्तान सीमा से लगे गांव में भाड़े पर ट्रैक्टर चला रहे थे । शाम को काम समाप्त कर शराब पी, भोजन किया शाम को लौटने लगे । तब सीमा पर तार की बागड़ नहीं लगी थी । सरबजीत नशे में रास्ता भटक गये और पाकिस्तान सीमा में घुस गये । पाकिस्तानी सेना पकड़ लिया । उनपर जासूसी का आरोप लगाकर सात दिन प्रताड़नाएँ दी गईं । उनपर आरोप लगाया गया कि वे सरबजीत सिंह नहीं मंजीत सिंह हैं। पाकिस्तान में इस नाम से एक एफआईआर थी । सेना ने इसी नाम से अदालत में पेश किया और आरोप लगाया कि आरोपी सही नाम न बता रहा । सेना ने सरबजीत सिंह को अदालत में मंजीत सिंह के नाम से पेश किया । अदालत में उन्हें भारतीय गुप्तचर संस्था रॉ का एजेंट बताकर लाहौर, मुल्तान और फैसलाबाद बम धमाकों का आरोपी भी बनाया गया। इन आरोपों पर अदालत ने अक्टूबर 1991 में उन्हें फांसी की सजा सुना दी ।
सरबजीत सिंह के परिवार ने भारत सरकार से भी संपर्क किया और मानवाधिकार संगठनों से भी । प्रमाण के बताया गया कि वे मंजीत सिंह नहीं सरबजीत सिंह हैं। लिखापढ़ी आरंभ हुई । भारत सरकार और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने पत्र भी लिखे । इससे फांसी की सजा टलती रही पर सरबजीत रिहा न हो सके ।
1990 से 2013 तक यद्यपि भारत में विभिन्न राजनैतिक दलों की सरकारें रहीं। काँग्रेस के नेतृत्व में नरसिंहराव सरकार, मनमोहन सिंह सरकार और भाजपा नेतृत्व में अटलजी की सरकार । लेकिन ये सभी सरकारें राजनैतिक अस्थिरता के दौर में रहीं और पाकिस्तान सरकार पर कोई दबाव नहीं बना सकीं। इसका पूरा लाभ पाकिस्तान ने उठाया । 1990 से लेकर 2013 तक भारत में न केवल निर्दोष सरबजीत सिंह पर क्रूरता हुई अपितु पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादी घटनाएँ भी बढ़ी । पाकिस्तान ने अनेक झूठ रचे । फर्जी दस्तावेज तैयार किये ऐसे गवाह भी खड़े किये कि सरबजीत सिंह ही असली मंजीत सिंह है । और वह खुशी मोहम्मद के नाम से पाकिस्तान में आया था । 2005 में एक दावा तो यह भी किया कि सरबजीत सिंह उर्फ मंजीत सिंह ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है । इस खींचतान और लिखापढ़ी के बीच फांसी की सजा तो टली पर सरबजीत सिंह को रिहाई न मिली ।
रिहाई की उम्मीद और फांसी की आशंका के बीच सरबजीत सिंह लाहौर सेन्ट्रल जेल में यातनाएँ सहते रहे । लेकिन रिहाई उम्मीद कमजोर हो गई। 26 अप्रैल 2013 को लाहौर जेल के कुछ कैदियों ने सरबजीत सिंह पर हमला बोल दिया था। रीढ़ की हड्डी सहित उनके शरीर की कई हड्डियाँ टूट गईं थीं। बहुत गंभीर स्थिति में अस्पताल लाया गया । वे कोमा में थे और उनकी रीड की हड्डी भी टूट चुकी थी। फिर भी हॉस्पिटल में उन्हें वेंटीलेटर पर रखा । 29 अप्रैल 2013 को भारत सरकार ने एक बार फिर पकिस्तान से रिहा करने की अपील की । जिसे पकिस्तान सरकार ने खारिज कर दिया ।
1 मई 2013 को जिन्ना अस्पताल के डॉक्टरो ने सरबजीत सिंह को ब्रेनडेड और 2 मई 2013 को मृत घोषित कर दिया । उनका शव भारत आया । भारत में शव का पोस्टमार्टम हुआ । भारतीय डॉक्टर यह देखकर आश्चर्य चकित रह गये कि उनके शरीर के अधिकांश मुख्य अंग निकाल लिये गये थे । क्यों निकाले इसका उत्तर कभी न मिला और न पाकिस्तान ने स्वीकार किया ।
सरबजीत सिंह के परिवार को पंजाब और केंद्र सरकार ने आर्थिक सहायता दी और पंजाब में तीन दिन का शोक भी घोषित हुआ पर सरबजीत सिंह के प्राण के साथ भारत की प्रतिष्ठा भी न बच सकी ।
इस संदर्भ वर्ष 2019 की उस घटना उल्लेख संभवतः उचित होगा जब एयर स्ट्राइक के दौरान विंग कमांडर अभिनंदन पाकिस्तान में गिरफ्तार हो गये तब भारत सरकार का यह दबाव था पाकिस्तान ने केवल साठ घंटे के भीतर सम्मान वापस किया । बाद में अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट में कहा गया कि यदि पाकिस्तान विंग कमांडर अभिनंदन को रिहा न करता तो भारत ने पाकिस्तान पर आक्रमण की तैयारी कर ली थी । पाकिस्तान की जेल में जब सरबजीत सिंह की क्रूरता पूर्वक हत्या हुआ तब भारत में मनमोहन सिंह की सरकार थी और जब विंग कमांडर अभिनंदन भारत लौटे तब प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी की सरकार थी ।
लोजपा युवा नेता डॉ. विभय कुमार झा ने विभागीय सचिव कपिल अशोक शीर्षत से की मुलाकात
दरभंगा । डेयरी, मत्स्य पालन एवं पशुपालन विभाग के सचिव श्री कपिल अशोक शीर्षत से लोक जनशक्ति पार्टी के युवा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सह प्रवक्ता डॉ. विभय कुमार झा ने पटना स्थित विकास भवन में शिष्टाचार मुलाकात की। इस दौरान मिथिला क्षेत्र के समग्र विकास, विशेषकर मत्स्य पालन क्षेत्र में संभावनाओं और उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने को लेकर विस्तृत चर्चा हुई।
मुलाकात के दौरान डॉ. विभय कुमार झा ने मिथिला क्षेत्र में मत्स्य पालन के तेजी से बढ़ते अवसरों पर चर्चा करते हुए भरोसा जताया कि सचिव श्री कपिल अशोक शीर्षत के कार्यकाल में यह क्षेत्र मत्स्य उत्पादन के क्षेत्र में नया मानक स्थापित करेगा। उन्होंने कहा कि सरकार की योजनाओं और प्रशासनिक प्रतिबद्धता के बल पर मिथिला को मत्स्य पालन के एक सशक्त केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।
एक सवाल के जवाब में डॉ. विभय कुमार झा ने कहा कि बिहार राज्य रोड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के प्रबंध निदेशक एवं 2011 बैच के आईएएस अधिकारी श्री कपिल अशोक शीर्षत से उनका वर्षों पुराना आत्मीय संबंध रहा है। उन्होंने कहा कि श्री शीर्षत हमेशा समाज और क्षेत्र के विकास के लिए समर्पित रहे हैं। डॉ. झा ने बताया कि उनके गृह जिले में जिलाधिकारी के रूप में श्री कपिल अशोक शीर्षत ने उल्लेखनीय कार्य किए थे। विकास परियोजनाओं को गति देने के साथ-साथ उन्होंने मिथिला की समृद्ध कला-संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन को भी प्राथमिकता दी थी, जिसकी चर्चा आज भी क्षेत्र में होती है।
उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र के मूल निवासी बिहार कैडर के आईएएस अधिकारी श्री कपिल अशोक शीर्षत मधुबनी के अलावा मोतिहारी और पटना के जिलाधिकारी के रूप में भी अपनी प्रशासनिक दक्षता का परिचय दे चुके हैं। हर स्थान पर उनकी शालीनता, व्यवहार-कुशलता और संवेदनशील प्रशासनिक शैली की सराहना होती रही है। डॉ. झा ने विश्वास व्यक्त किया कि डेयरी, मत्स्य पालन एवं पशुपालन विभाग में उनके नेतृत्व में बिहार, खासकर मिथिला क्षेत्र, विकास के नए आयाम स्थापित करेगा।
असम चुनाव: बड़ी जीत की उम्मीदों के बीच BJP के सामने ज़मीनी चुनौतियाँ
पीपल्स पल्स रिसर्च संगठन ने अपने एग्जिट पोल में नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (NDA) के पक्ष में स्पष्ट जनादेश का संकेत देते हुए BJP को 69 से 73 सीटें मिलने का अनुमान लगाया। उसके अनुसार, सहयोगी दल असम गण परिषद (AGP) को 8-11 सीटें और बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (BPF) को 8-9 सीटें मिल सकती हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस को 22-26 सीटों तक सीमित रहने का अनुमान दिया गया। अन्य दलों — जैसे ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF), यूनाइटेड पीपल्स पार्टी लिबरल (UPPL), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) तथा निर्दलीय उम्मीदवारों — को बहुत कम सीटें मिलने की संभावना जताई गई।
इसे ऐतिहासिक चुनाव बताते हुए गोयल ने कहा कि असम के 2,50,54,463 मतदाताओं में से 85.91 प्रतिशत ने एक चरण में हुए मतदान में हिस्सा लिया। 722 उम्मीदवारों में से 126 विधायकों का चुनाव होना है। उन्होंने यह भी बताया कि पिछले पाँच विधानसभा चुनावों में मतदाता भागीदारी क्रमशः 2021 में 82.02 प्रतिशत, 2016 में 84.64 प्रतिशत, 2011 में 76.05 प्रतिशत, 2006 में 75.72 प्रतिशत और 2001 में 75.16 प्रतिशत रही थी।
बांग्लादेशी अधिकारियों ने सरमा की उस टिप्पणी पर भी आपत्ति जताई, जिसमें उन्होंने कहा था कि असम के लोग नई दिल्ली और ढाका के बीच तनावपूर्ण संबंध पसंद करते हैं, क्योंकि बेहतर संबंधों की स्थिति में अवैध घुसपैठियों को वापस भेजने के प्रति पर्याप्त रुचि नहीं दिखाई जाती। ढाका ने इन टिप्पणियों को अनुचित और द्विपक्षीय संबंधों के लिए हानिकारक बताते हुए उनकी कड़ी आलोचना की।
(लेखक पूर्वी भारत के वरिष्ठ पत्रकार)






