10 सितंबर 1915 सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी जतिन्द्र नाथ मुखर्जी का बलिदान

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दिल्ली । भारतीय स्वाधीनता संग्राम में कुछ ऐसी प्रतिभाओं ने अपने जीवन का बलिदान दिया जो यदि अंग्रेजों की आधीनता स्वीकार कर लेते तो उन्हें उचचतम प्रसिद्धि मिल जाती । ऐसे ही बलिदानी थे बाघा जतिन ।

उनका नाम जतिनन्द्र नाथ मुखर्जी था लेकिन वे बाघा जतिन के नाम से भी जाने जाते हैं । उनका जन्म 7 दिसम्बर 1879 को जैसोर क्षेत्र में हुआ था । यह क्षेत्र अब बंगलादेश में है । जब पाँच वर्ष के हुये, तभी पिता का देहावसान हो गया था। माँ ने बड़ी कठिनाई से लालन-पालन किया। वे शरीर से बहुत हृष्ट-पुष्ट थे । किशोर वय में वे जंगल घूमने गये तो बाघ सामने आ गया। वे बाघ से भिड़ गये । बाघ भाग गया । तब से उनका नाम बाघा जतिन पड़ गया । वे जितने शरीर से सुदृढ़ थे उतने ही पढ़ने में भी बहुत कुशाग्र थे । उन्होंने 18 वर्ष की आयु में मैट्रिक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी । फिर स्टेनोग्राफी सीखी और कलकत्ता विश्वविद्यालय में स्टेनोग्राफर की नौकरी कर ली । अपनी सेवा काल में भी पढ़ाई जारी रखी । लेकिन वे अधिक नौकरी न कर सके । अपनी सेवा काल में जब भी अंग्रेजों द्वारा भारतीयों के साथ अपमानजनक व्यवहार देखते तो खून खौल उठता उसका प्रतिकार भी करते । लेकिन परिवार की जरूरत को ध्यान में रखकर समझौता करके नौकरी करते रहे । तभी 1905 आया । अंग्रेज सरकार ने बंगाल विभाजन की घोषणा कर दी । इसका विरोध आरंभ हुआ । यतींद्र नाथ मुखर्जी ने बंगाल विभाजन का विरोध किया । उन्होंने नौकरी छोड़कर कर आन्दोलन की राह पकड़ी। उन्होने युवकों की टोली बनाई और अंग्रेज अधिकारियों की घेराबंदी शुरू की । इस आँदोलन में उनकी आगे की पढ़ाई छूट गई। आँदोलन इतना तीव्र हुआ कि अंग्रेज सरकार को बंगाल विभाजन का निर्णय वापस लेना पड़ा। लेकिन बाघा जतिन ने राह न बदली । उन्हे दोवारा नौकरी पर आने का प्रस्ताव भी आया पर सरकारी नौकरी में न गये और क्राँतिकारी आंदोलन से सीधे जुड़ गये । वे 1910 में ‘हावड़ा षडयंत्र केस’ में गिरफ्तार हुये । एक साल का कारावास मिला ।

जेल से मुक्त होने पर’अनुशीलन समिति’ और ‘युगान्तर’ से जुड़ गये । वे दोनों प्रकार से कार्य करते थे एक तो क्रांति की गतिविधियों में सीधे भागीदारी और दूसरे आलेख लिखकर जन जागरण करना । क्रांतिकारियों के पास आन्दोलन के लिए धन जुटाने के लिये दुलरिया नामक स्थान पर अपने ही सहयोगी अमृत सरकार घायल हो गए थे । समस्या यह थी कि धन लेकर भागा जाये या साथी के प्राणों की रक्षा । स्वयं अमृत सरकार ने जतींद्र नाथ से कहा कि धन लेकर चले जाओ । पर जतींद्र तैयार न हुए तो अमृत सरकार ने आदेश दिया- ‘मेरा सिर काट कर ले जाओ ताकि अंग्रेज पहचान न सकें।’ पर जतिन ने अपने साथी को वहाँ न छोड़ा और साथ लेकर ही चले । क्रान्तिकारियो के ऐसे जज्वे से मिली है स्वतंत्रता।

कलकत्ता में उन दिनों एक राडा कम्पनी बंदूक-कारतूस का व्यापार करती थी। क्रान्तिकारियो ने इस कम्पनी की एक गाडी पर धावा बोला, जिसमें ५२ माउजर पिस्तौलें और ५० हजार गोलियाँ प्राप्त हुई । कुछ विश्वास घातियों ने सरकार को य। अवगत करा दिया था कि ‘बलिया घाट’ तथा ‘गार्डन रीच’ घटनाओ में यतींद्र नाथ का हाथ था। पुलिस पीछे लगी । कयी मुखबिर छोड़ दिये गये । अंततः सितंबर 1915 को पुलिस ने जतींद्र नाथ के अड्डा ‘काली पोक्ष’ स्थित गुप्त निवास पर पहुंच गयी । यतींद्र अपने साथियों के साथ वह जगह छोड़ने ही वाले थे कि पुलिस ने घेर लिया । यतींद्र नाथ ने गोली चला दी । मुखबिर राज महन्ती वहीं ढेर हो गया। यतीश नामक एक क्रांतिकारी बीमार था। जतींद्र उसे अकेला छोड़कर जाने को तैयार नहीं थे। चित्तप्रिय नामक क्रांतिकारी उनके साथ था। दोनों तरफ़ से गोलियाँ चली। चित्तप्रिय भी बलिदान हो गये। वीरेन्द्र तथा मनोरंजन नामक अन्य क्रांतिकारी मोर्चा संभाले हुए थे। इसी बीच यतींद्र नाथ का शरीर गोलियों से छलनी हो गया था । वे जमीन पर गिर पड़े। मनोरंजन ने उन्हें उठा कर भागने का प्रयत्न किया । किंतु अंग्रेज अफसर किल्वी ने घेर लिया । सामान्यतः ऐसी स्थिति में क्राँतिकारी में स्वयं को गोली मार लिया करते हैं पर मनोरंजन के कंधे पर जतिन थे इसलिये पकड़े गये । उनका बलिदान अगले दिन 10 सितंबर को हुआ । यद्धपि अंग्रेज रिकार्ड में घायल होने के कारण उनकी मौत हुई पर कुछ लोगों का मानना है कि पुलिस प्रताड़ना से उनका बलिदान हुआ । जो भी सत्य हो 10 सितंबर 1915 को इस महान क्राँतिकारी का बलिदान हो गया ।
शत शत नमन्’

नेपाल में यह भी चल रहा है …

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आन्दोलन र पितृ पक्षको पहिलो दिन : एक अनौठो संयोग

सुन्दा अचम्म लाग्न सक्छ—पितृ पक्ष (सोर्ह श्राद्ध) को पहिलो दिनमै जेन Z आन्दोलन सुरु हुनु केवल संयोग मात्र हो । पितृ पक्ष र जेन Z आन्दोलन बीच कुनै प्रत्यक्ष सम्बन्ध छैन जस्तो लाग्न सक्छ । अझ आयोजक समूहले पनि पितृ पक्षकै दिन आन्दोलन सुरु गर्ने भन्ने उल्लेख गरेको पाइँदैन । त्यसैले यो कुरालाई सामान्य संयोग मात्र मान्दा फरक पर्दैन । तर यो संयोगलाई किन अनौठो संयोग भनिएको हो भने, दुवै कुराको मूल जरो एउटै प्रश्नमा जोडिन्छः

“बाबुआमाले गरेको गल्तीको सजाय छोराछोरीले पाउनु ठीक कि गलत ?”

झट्ट सुन्दा यो प्रश्न नै गलत लाग्छ । आधुनिक न्याय प्रणालीले त यसलाई स्वीकार्नै सक्दैन ।

तर न्याय प्रणालीलाई यदि केवल राज्यको एउटा अङ्ग मात्रै भनेर बुझियो भने त्यो बुझाइ साँघुरो हुन सक्छ । ब्रह्माण्ड आफैंमा एउटा न्याय प्रणाली हो । त्यसले आफ्नै हिसाबले काम गर्छ—कतिपय अवस्थामा तत्क्षण सजाय दिन्छ, कतिपय अवस्थामा जन्मजन्मान्तर पर्खाउँछ ।

हाम्रो सनातन हिन्दू, बौद्ध, बोन, किरात लगायत मृत्युपछि पुनर्जन्म र आत्माको यात्रामा विश्वास गर्ने सभ्यताले यो कुरा राम्ररी बुझेको छ । त्यसैले किरात/बोन परम्परामा मृत्यु पश्चात् धामीले आत्मालाई बोलाएर हालखबर सोध्ने चलन छ (बिजुवा खेलाउने भनिन्छ) । त्यस्तै हिन्दू परम्परामा तिथिअनुसार श्राद्ध गर्ने गरिन्छ । पितृ पक्षमा पनि तिथिअनुसार श्राद्ध–तर्पण गर्ने चलन छ ।

यसलाई वैज्ञानिक ढङ्गले बुझ्न खोज्दा कुरा जटिल बन्छ, किनकि मृत्युपश्चातको यात्रा प्रत्येकको कर्म अनुसार ब्रह्माण्डले आफैं निर्धारण गर्छ । हाम्रो हातमा कसैको सबै कर्मको लेखाजोखा छैन, न त ब्रह्माण्डरूपी अदालतमा मुद्दा हाल्ने व्यवस्था नै छ ।

त्यसो भए, फेरि प्रश्न उठ्छ—श्राद्ध किन गर्ने ?

यदि ब्रह्माण्ड आफैं न्याय दिन्छ भने हामी किन हस्तक्षेप गर्ने ?

उत्तर होः ब्रह्माण्डले हाम्रो पिता–पुर्खाको पापको सजाय हामीलाई अदृश्य रूपमा दिइरहेको हुन्छ । तर त्यसैसँगै सुधार्ने अवसर पनि दिएको हुन्छ ।

उदाहरणका लागि, कुनै गाउँलाई डाकुले लुट्यो भने पुस्तौँसम्म त्यहाँ गरिबी रहिरहन्छ । डाकुको सन्तान कानुनी हिसाबले निर्दोष भए पनि लुटेको सम्पत्तिमा मोज गर्दै, अरूलाई थिचोमिचो गर्दै बसिरहेका हुन्छन् । ब्रह्माण्डको दृष्टिमा उनीहरू निर्दोष होइनन्, कारण उनीहरूको समृद्धि पुर्खाको पापमा टेकेको हुन्छ । डाकुको आत्माले मुक्ति नपाएर सन्तानलाई निरन्तर दुख दिने कथा प्रचलित छ ।

यसै दृष्टान्तले ब्रह्माण्डीय न्याय प्रणाली कस्तो जटिल हुन्छ भन्ने बुझाउँछ ।

श्राद्ध गर्ने भन्ने अर्थ, आफ्ना पुर्खाले अन्जानमा वा जानाजान गरेका पापका कारण मृत्यु पश्चात् कठिन यात्रामा रहेकालाई सहज बनाउन तर्पण, दानपुण्य गरेर सघाउने हो । सन्तान भएको नाताले उनीहरूको जिम्मेवारी पनि हामीमा पर्छ । यसरी पुर्खाको उद्धार भए उनीहरूको आशिर्वादले हाम्रो जीवन पनि सहज बन्छ भन्ने विश्वास छ । त्यसैले यसलाई “कर्म–काण्ड” भनिन्छ—पुस्तौँदेखिको कर्मको हिसाबकिताब पुनः नवीकरण गर्ने प्रक्रिया ।

अब जेन Z आन्दोलनको मर्मतर्फ जाऔँ ।

हालसालै नयाँ पुस्ताले सामाजिक सञ्जालमा भ्रष्ट्र नेताका छोराछोरीको विलासी जीवन भण्डाफोर गर्ने अभियान चलाएको छ । “जेन Z आन्दोलन” भन्ने चलन त्यही अभियानको निरन्तरता हो ।

यस अभियानका कारण केही भ्रष्ट्र बाउआमाका छोराछोरी सामाजिक सञ्जालमा आएर रोइलो गर्न थालेका छन्—

“हामी निर्दोष हौँ, हाम्रो के गल्ती ? बाउआमाको पापको सजाय हामी किन पाउनु ? राज्यलाई मात्रै सजाय दिने अधिकार छ ।”

तर यहाँ एउटा प्रश्न छ—राज्यमा विश्वास हुने भए जेन Z पुस्ता सामाजिक सञ्जालमा भण्डाफोर नगरी कानुनी बाटोमा जान्थे ।

तर उनीहरूले कानुन होइन, सामाजिक दबाब रोजे । यसको अर्थ, उनीहरूलाई प्रणालीमै भरोसा छैन ।

अब फेरि प्रश्न—बाउआमाको पापको सजाय छोराछोरीले पाउनु उचित हो ?

सजाय भन्नाले के भण्डाफोर मात्र हो ? के सजाय भ्रष्ट्र नेताका छोराछोरीले मात्र पाएका छन् ?

हामी सबैले त सजाय पाइरहेका छौँ—

पुरानो पुस्ताले भोट बेचेर गरेको गल्तीको सजाय अहिलेको युवाले भोगिरहेका छन् ।

कलिलो उमेरमा ऋण लिएर खाडीमा पसिना बगाइरहेका छन् ।

अस्पताल नभएर सुत्केरी महिलाले ज्यान गुमाइरहेछन् ।

प्रत्येक दिन एयरपोर्टमा बाउआमा सन्तानको लास बुझ्न बाध्य छन् ।

यो सब पुरानो पुस्ताको गलत निर्णयको सजाय होइन त ?

त्यसैले जेन Z ले भनेको यति मात्र हो—“हामीले सजाय पाइरहेका छौँ, त्यसैले तिमीले पनि पाउनु पर्छ ।”

हाम्रो बाउआमाले गल्ती गरेर सजाय हामीलाई दिए भने, भ्रष्ट्रको सन्तान भएर लुटेको सम्पत्तिमा मोज गर्ने तिमीहरू कसरी निर्दोष हुन सक्छौ ?

समग्रमा भन्नुपर्दा—पितृ पक्षको सुरु हुने दिन र जेन Z आन्दोलन सुरु हुने दिन एकै हुनु संयोग मात्र होइन, ब्रह्माण्डकै संकेत पनि हो ।

भ्रष्ट्राचारले भरिएको पापको घैटो जेन Z को चेतनाको हथौडाले फुटोस् ।

ब्रह्माण्डीय न्याय सबैले अनुभूत गर्न पाओस् ।

जेन Z ले ल्याएको चेतनाको क्रान्ति सफल होस् ।

शुभकामना 🙏

नेपाल की फर्जी जेन-जी क्रांति

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डॉ राजीव मिश्रा

क्रान्ति शब्द सुनने में बड़ा आकर्षक लगता है. और दुनिया में बड़े बड़े परिवर्तन इन क्रांतियों से आए हैं.

लेकिन किसी भी क्रान्ति का सत्य क्या होता है?
किसी भी देश की कितनी प्रतिशत जनता क्रांति की फिक्र करती है?
बड़ी से बड़ी क्रांतियों में भाग लेने के लिए कितने की भीड़ जुटती है?

दुनिया की सबसे महत्व की तीन आधुनिक क्रांतियां गिनी जाती हैं जिसने पूरी दुनिया का इतिहास बदल दिया.

*पहली, फ्रांस की राज्य क्रांति..(1789).*
यह क्रांति जनसामान्य की क्रांति नहीं थी, वह रॉयल्टी और नोबेलिटी यानि सामंती शक्तियों के विरुद्ध बुर्जुआ यानि मध्यम वर्ग की क्रांति थी… यानि नए नए प्रभावशाली और सम्पन्न हुए लोगों की सत्ता में भागीदारी के लिए किया हुआ विद्रोह था. *अगर उन्हें समझदारी से सत्ता में भागीदारी दे दी जाती तो कोई विद्रोह उद्रोह नहीं होना था.* और पूरी क्रांति का विंदुपथ मूलतः क्रांति के बाद उत्पन्न वैक्यूम में सत्ता पर कब्जा करने के लिए आपसी प्रतिस्पर्धा थी जिसमें क्रांति के नेता दूसरे नेताओं को क्रांति विरोधी बता कर गिलोटिन पर चढ़ा रहे थे.
*इस काम के लिए उन्हें कुछ हजार लोगों की भीड़ चाहिए थी…सामान्य जन का काम यह भीड़ बनना था, बदले में उन्हें हर रोज चौराहे पर गिलोटिन पर कटते सरों को देखने का मुफ्त मनोरंजन मिलता था.*

*दूसरी सबसे महत्वपूर्ण रूसी क्रांति* की मूल “क्रांतिकारी” घटना में मुश्किल से कुछ सौ लोग शामिल हुए थे.

जिस रात सत्ता के केंद्रों पर कब्जा कर लिया गया था, उसकी अगली सुबह ज्यादातर लोगों को रात की घटना का महत्व भी ठीक से समझ नहीं आया था.

*कुल मिला कर परिणाम यह हुआ कि सामंती पृष्ठभूमि एक महत्वाकांक्षी व्यक्ति ने अव्यवस्था और पॉवर वैक्यूम का लाभ उठा कर सत्ता पर कब्जा कर लिया. पब्लिक दर्शक थी, और जबतक उसे सत्य समझ में आता, उसके हाथ में कुछ नहीं बचा था, सिवाय सात दशकों की यातना के.*

*तीसरी सबसे महत्व की क्रांति,*
जो सामान्य अर्थों में क्रांति गिनी भी नहीं जाती, वह था अमेरिका का स्वतंत्रता संग्राम. विचार की दृष्टि से यह एक अधिक समग्र क्रांति थी, और परिणाम की दृष्टि से भी. इसका शीर्ष नेतृत्व भी अमेरिका का नव धनाढ्य व्यापारी और भूमिपति वर्ग था. पर *इसकी क्रांतिकारी बात यह थी कि उन लोगों ने जिस व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह किया, उसे वैसी ही एक अन्य व्यवस्था से नहीं बदला.*
*उन्होंने व्यक्तियों के बजाय संस्थाओं में विश्वास व्यक्त किया और सत्ता और नियंत्रण के बजाय स्वतंत्रता और उद्यम को केंद्रीय विचार बनाया.*

लेकिन *किसी भी क्रांति के मूल में कभी जन सामान्य नहीं हुआ करता. वह सिर्फ भीड़ जुटाता है, तथ्य़ यह है कि क्रांति के केंद्र में हमेशा एलीट वर्ग हुआ करता है. क्रांतियां उसके लिए सत्ता पर कब्जा करने का एक माध्यम मात्र हुआ करती हैं. सत्ता मिलने के बाद वह वही करता है जो अपनी सत्ता को सुदृढ़ और स्थायी बनाने के लिए आवश्यक होता है.*

इस शताब्दी में जो भी *चिल्लर टाइप क्रांतियां हुई हैं,* उनमें भी मूल रूप से यही हुआ है…चाहे अरब स्प्रिंग हो, या श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल टाइप छीछालेदर. अंतर सिर्फ इतना आया है कि सत्ता पर कब्जा करने, भीड़ जुटाने और भीड़ को नियंत्रित और निर्देशित करने का काम देश के भीतर बैठे महत्वाकांक्षी व्यक्तियों के बजाय बाहरी तंत्र कर रहा है.

*आवश्यक है कि हम “क्रांति” शब्द के रोमांस में ना फंसें. अगर आप सत्ता के प्रत्याशी एलीट में से नहीं हैं तो क्रांति में आपके काम का कुछ नहीं है, सिवाय कटते सरों और जलते घरों के मुफ्त मनोरंजन के. और उनमें से एक सर या एक घर हममें से किसी का भी हो सकता है.*

(डॉ राजीव मिश्र जी से साभार)

भ्रामक खबरों से राजशाही की ओर

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राकेश उपाध्याय

एक अच्छा सा शीर्षक दीजिए

दिल्ली: नेपाल के बारे में कई भ्रामक खबरें भारत के कुछ समाचार चैनलों ने प्रसारित की हैं, हालांकि बाद में उन्होंने उसे हटा लिया। उदाहरण के लिए, पशुपतिनाथ मंदिर में तोड़फोड़ की न कोई घटना हुई और न ही वायरल वीडियो का संबंध मौजूदा घटनाक्रम से है।

नेपाल में मेरे अनेक विद्यार्थियों ने मुझे सूचित किया है कि वीडियो तीन साल पुराना है, एक उत्सव का है, जिसमें मंदिर का गेट बंद हो जाने पर उसे खोलने के प्रयास में कुछ उत्साही भक्त उस पर चढ़ गए हैं। लेकिन इसी वीडियो को वायरल कर बताया जा रहा है कि मंदिर में तोड़-फोड़ की कोशिश हुई है। नितांत गलत और झूठी खबर है।

दूसरा मुद्दा जाति को लेकर आया है। नेपाल के मेरे एक छात्र जिन्होंने मेरे मार्गदर्शन में पीएचडी उपाधि प्राप्त की है, उनका कहना है कि कम्युनिस्ट नेता यदि जाति मानते होते तो इतनी दुर्गति के शिकार नेपाल में नहीं होते। जाति को न मानने के कारण ही उन्हें बचाने कोई भी नेपाल में सामने नहीं आया। असलियत यही है कि नेपाल का कोई भी भला आदमी किसी कम्युनिस्ट को ब्राह्मण मानता ही नहीं है, और कम्युनिस्ट तो हैं ही इस बात के लिए बदनाम कि धर्म और जाति सब उनके लिए अफीम के सिवाय कुछ नहीं। यही तो वामपंथ की ट्रेनिंग है। आजतक सीपीआई और सीपीएम के पोलित ब्यूरो में उनके नेताओं की जाति गणना से संबंधित कोई रिपोर्ट भारत के किसी चैनल में क्यों नहीं चलाई गई, आखिर इसका जवाब कौन वामी पत्रकार दे सकता है?

तो ऐसे लोगों की जाति गिनने वाले बिना बुद्धि के मूर्खपेटजीवी के अतिरिक्त और कौन हो सकते हैं भला। राजनीतिक आकाओं के संकेत और उनसे कुछ बजट पाकर नेवारो टाइप बकवास करने वाले पत्रकारों को आखिर कौन और कब तक सुने? भारत में कुछ वामपंथी समाजवादी मिजाज के लोगों ने कम्युनिस्ट नेताओं को वैसे ही ब्राह्मण बताना शुरु किया है, जैसे ट्रंप के सलाहकार पीटर नवारों को लगता है कि रशिया का सारा पेट्रोल ब्राह्मण गटक जा रहे हैं। खैर, सबको बोलने की आजादी है।
तीसरा मुद्दा कि नेपाल का भविष्य क्या है? इस पर महाराजा कर्ण सिंह ने नेपाल की राजशाही और तत्कालीन पीएम गिरजा प्रसाद कोइराला से बातचीत कर साल 2007 में एक रास्ता निकाला था कि राजा ज्ञानेंद्र पद छोड़ दें और उनके उस समय 5 साल के शिशु पौत्र ह्रदयेंद्र बीर बिक्रम शाह देव को सेरेमोनियल राष्ट्रप्रमुख के पद पर आसीन किया जाए। शेष, ब्रिटेन की तरह लोकतंत्र फले-फुले, चुनाव से प्रधानमंत्री और संसद का गठन हो।

लेकिन उस समय होनी को यह मंजूर नहीं था। प्रचंड समेत तमाम कम्युनिस्ट नेताओं ने इस प्रस्ताव को मानने से इन्कार कर दिया। बात वहीं पर खत्म हो गई। बाद में नेपाल के संविधान में बदलाव कर सदा के लिए राजशाही का रास्ता भी बंद किया गया।

लेकिन अब वह सूत्र पुनः बड़ी खामोशी से नेपाल के जन-मन में आगे बढ़ता दिख रहा है। राजा ज्ञानेंद्र के पौत्र ह्रदयेंद्र बीर बिक्रम शाह देव नेपाल में चुपचाप अनेक सामाजिक सेवा कार्यों से जुड़कर अपनी उपस्थित जनता के बीच दर्ज कराते रहे हैं।

ह्रदयेंद्र की लोकप्रियता नेपाल के कम्युनिस्ट नेताओं को चुभती रही है। केपी ओली ने तो एक बार यहां तक धमकी दी थी कि ह्रदयेंद्र राजा बनने का सपना देखना छोड़ दें। उन्हें जनता के बीच जाने की कोई जरूरत नहीं है। ह्रदयेंद्र के नाम से कम्युनिस्ट नेताओं की छाती में दर्द बार बार उठते रहने का एक और कारण है। कारण है ह्रदयेंद्र की मां का राजस्थान के शेखावत वंश से संबंधित होना। कम्युनिस्ट नेताओं ने चीन के अपने वैचारिक आकाओं के संकेत पर ह्रदयेंद्र को तब नेपाल का नायक बनने से रोक दिया था।

यह तानाशाही भी नेपाल के लोगों को अखरने लगी थी। सूत्र ने बताया है कि ह्रदयेंद्र सुशील और विनम्र हैं। ह्रदयेंद्र का जन्म महाराजा बीर बीरेंद्र की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या के ठीक एक वर्ष बाद जुलाई 2002 में हुआ था। तब अनेक पंडितों ने उनकी जन्मकुंडली देखकर भविष्यवाणी भी की थी कि नेपाल के महाराजा वापस आ गए हैं। जाहिर तौर पर, आज की परिस्थिति में यदि वह आगे बढ़कर नेपाल की बागडोर संभालते हैं तो महाराजा कर्ण सिंह का 2007 में दिया गया सुझाव और स्वप्न साकार हो सकता है। और जिस जेन-जी के सर पर नेपाल में बदलाव का मुकुट पहनाया जा रहा है, उस जेन-जी की जरूरतों को समझने वाले उनके बीच के नायक की कमी भी पूरी हो सकेगी।

दूसरी तरफ, राष्ट्रपति अथवा राजपद पर ह्रदयेंद्र की शपथ होते ही नेपाल के हिंदू राष्ट्र घोषित होने का रास्ता भी साफ हो जाएगा, क्योंकि सदियों तक नेपाल में राजा को ही ईश्वर के प्रतीक स्वरूप में देखकर विकेंद्रित प्रणाली से स्वराज और स्वशासन चलाने की व्यवस्था चलती रही है।
देखना लाजिमी है कि नेपाल का भविष्य आखिर किस करवट बैठता है।

(सोशल मीडिया से साभार)

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