आदि पत्रकार -देवर्षि नारद

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लखनऊ । सृष्टिकर्ता प्रजापति ब्रहमा के मानस पुत्र नारद। महान तपस्वी, तेजस्वी, सम्पूर्ण वेदान्त, शास्त्र के ज्ञाता तथा समस्त विद्याओं में पारंगत नारद। ब्रहमतेज से संपन्न नारद। नारद जी के महान कृतित्व व व्यक्तित्व पर जितनी भी उपमाएं लिखी जाएं कम हैं। देवर्षि नारद ने अपने धर्मबल से परमात्मा का ज्ञान प्राप्त किया । वे प्राणिमात्र के कल्याण के लिए सदा उपस्थित रहे। वे देवता, दानव और मानव समाज के हित के लिये सर्वत्र विचरण, चिंतन व विचार मग्न रहते थे। देवर्षि नारद की वीणा से निरंतर नारायण की ध्वनि निकलती रहती थी।भगवदभक्ति की स्थापना तथा प्रचार के लिए ही नारद का अवतार हुआ। नारद चिरंजीवी हैं। नारद जी का संसार में अमिट प्रभाव है। देव, दानव, मानव सबके सत्कार्यों में देवर्षि नारद सहायक सिद्ध होते हैं। नारद जी का जीवन जनकल्याण व मंगलमय जीवन के लिये ही है। नारद जी पर नारायण की विशेष कृपा है। वे शत्रु तथा मित्र दोनों में ही लोकप्रिय थे।
देवर्षि नारद त्रिकालदर्शी व पृथ्वी सहित सभी ग्रह नक्षत्रों में घट रही घटनाओें के ज्ञाता तो थे ही उनके मन में कठिन से कठिन समस्याओं के समाधान भी चलायमान रहते थे। देवर्षि नारद व्यास, वाल्मीकि, शुकदेव जी के गुरु रहे। नारद ने ही प्रह्लाद, ध्रुव, राजा अम्बरीष आदि को भक्तिमार्ग पर प्रवृत्त किया। नारद ब्रहमा, शंकर, सनतकुमार, महर्षि कपिल, मनु आदि बारह आचार्यो में अन्यतम हैं। प्रचलित कथा के अनुसार देवर्षि नारद अज्ञातकुल शील होने पर भी देवर्षि पद तक पहुंच गये थे। बाल्यकाल में भी उनके मन में चंचलता नहीं थी, वे मुनिजनों की आज्ञा का पालन किया करते थे। उनकी अनुमति प्राप्त करके वे बरतनों में लगी हुई जूठन दिन में एक बार खा लिया करते थे। इससे उनके जन्म के सारे पाप धुल गये। नारद की सेवा से प्रभावित होकर मुनिगण उन पर अपनी कृपा रखने लगे।

संतों की सेवा करते – करते उनका हृदय शुद्ध रहने लगा। भजन – पूजन में उनकी रुचि बढ़ती गयी। उनके हृदय में भक्ति का प्रादुर्भाव हो गया। वे अपनी माता के साथ ब्राहमण नगरी में रहते थे। माता के कारण वे भी कहीं अन्यत्र नहीं जा सके। कुछ दिनों बाद एक दिन उनकी माता को सर्प ने काट लिया जिससे उनकी मृत्यु हो गयी नारद जी ने उसे विधि का विधान माना और गृह का त्याग करके उत्तर दिशा की ओर चल दिये। इसके बाद उन्होनें अपनी सतत साधना और तपस्या के बल पर देवर्षि का पद प्राप्त किया। किसी – किसी पुराण में देवर्षि नारद को उनके पूर्वजन्म में सारस्वत नामक एक ब्राहमण बताया गया है। जिन्होनें “ॐ नमो नारायणाय” मंत्र के जाप से भगवान नारायण का साक्षात्कार किया।

कालान्तर में पुनः ब्रहमा जी के दस मानसपुत्रों के रूप में जन्म लिया। नारद शुद्धात्मा, शांत, मृदु तथा सरल स्वभाव के हैं। मुक्ति की इच्छा रखने वाले सभी लोगों के लिए नारद जी स्वयं ही प्रयत्नशील रहते हैं।नारद जी को ईश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन होते थे। उन्हें ईश्वर का मन कहा गया है। वे परम हितैषी हैं उनका अपना कोई स्वार्थ नहीं हैं। वे प्रभु की प्रेरणा से निरंतर कार्य करते रहते हैं। नारद जी ने दक्ष प्रजापति के हयाश्व- शबलाक्ष नामक सहस्र पुत्रों को अध्यात्म तत्व का पाठ पढ़ाया। देवर्षि नारद ने सभी के लिये भगवदभक्ति का द्वार खोल रखा था। वे जीवमात्र के कल्याण के लिये भगवान नाम कीर्तन की प्रेरणा देते रहते हैं।

देवर्षि नारद का वर्ण गौर सिर पर सुंदर शिखा सुशोभित है। उनके शरीर में एक विशेष प्रकार की उज्वल ज्योति निकलती रहती थी। वे देवराज इंद्र द्वारा प्राप्त श्वेत दिव्य वस्त्रों को धारण किये रहते हैं। वे अनुषांगिक धर्मों के ज्ञाता थे। नारद लोप, आगम, धर्म तथा वृत्ति संक्रमण के द्वारा प्रयोग में आये हुये एक- एक शब्द की अनेक अर्थो में विवेचना करने में सक्षम थे। कृष्ण युग में गोपियों का वर्चस्व स्थापित किया। प्रथम पूज्य देव गणेश जी को नारद जी का ही मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ था।

देवर्षि नारद स्वभावतः धर्म निपुण तथा नाना धर्मो के विशेषज्ञ हैं।वे चारों वेदों के ज्ञाता हैं। उन्होंने विभिन्न वैदिक धर्मों की मर्यादाएं स्थापित की हैं। वे अर्थ की व्याख्या के समय सदा संशयों का उच्छेद करते हैं। नारद जी के द्वारा रचित अनेक ग्रंथों का उल्लेख मिलता है – जिसमें प्रमुख हैं नारद पंचरात्र,नारद महापुराण,वृहदरदीय उपपुराण, नारद स्मृति, नारद भक्ति सूत्र, नारद परिवाज्रकोपनिषद आदि। इसके अतिरिक्त नगरीय शिक्षा शास्त्र के साथ ही अनेक स्तोत्र भी नारद जी के द्वारा रचित बताये जाते है।

भगवद भक्ति की स्थापना तथा प्रचार के लिये नारद जी का आविर्भाव हुआ। देवर्षि नारद धर्म के प्रचार तथा लोक कल्याण हेतु सदैव प्रयत्नशील रहते थे। इस कारण सभी युगों में सभी लोकों में समस्त विद्याओं में समाज के सभी वर्गो में नारद जी का सदा से प्रवेश रहा है। मात्र देवताओं ने ही नहीं वरन दानवों ने भी उन्हें सदैव आदर किया है। समय -समय सभी ने उनसे परामर्श लिया है। नारद जी भागवत संवाददाता भी थे, संदेश वाहक भी थे और ब्रह्माण्ड के प्रथम पत्रकार भी माने गये।

नारद जी के विभिन्न उपनाम भी हैं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में उन्हें संचारक अर्थात सूचना देने वाला पत्रकार कहा गया है।इसके अतिरिक्त संस्कृत के शब्दकोष में उनका एक नाम ”पिशुन“ आया है जिसका अर्थ है सूचना देने वाला संचारक, सूचना पहुंचाने वाला ,सूचना को एक स्थान से दूसरे स्थान तक देनेवाला है। आचार्य पिशुन से स्पष्ट है कि देवर्षि नारद तीनों लोकों में सूचना अथवा समाचार के प्रेषक के रूप में परम लोकप्रिय थे।

वे रामायण युग में भी थे तो महाभारत काल में पांडवों के सबसे बड़े हित साधक भी थे। जनमानस के कल्याणार्थ नारद मुनि ने सत्यनारायण भगवान की कथा, व्रत महात्मय आदि की श्रेष्ठता समाज में स्थापित की। जिज्ञासा प्रकट करने के बाद ही भगवान श्रीहरि ने नारद जी को समस्त पूजा एवं हवन का विस्तार से वर्णन किया और अंत में आश्वस्त करते हुए उनसे कहा कि श्रद्धा पूर्वक किया गया भगवान सत्य नारायण का व्रत सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है। महाभारत युग में भी पाण्डवों का हित साधन नारद जी ने ही किया था। महारानी द्रौपदी को पांच पांडवों के साथ रहने का नियम भी नारद जी ने ही बनवाया था जिससे पतिव्रता द्रौपदी और पांचों पांडवों के बीच सामंजस्य का वातवरण बना रहे।

नारद जी के व्यक्तित्व व कृतित्व को लेकर भांति – भांति की कथायें प्रचलित हैं। सभी पुराणों में महर्षि नारद एक मुख्य व अनिवार्य भूमिका में उपस्थित हैं। परमात्मा के विषय में संपूर्ण ज्ञान प्राप्त करने वाले दार्शनिक को नारद कहा गया है।पुराणों में नारद को भागवत संवाददाता भी कहा गया है। यह भी सर्वमान्य है कि नारद की ही प्रेरणा से महर्षि वाल्मीकि ने रामायण जैसे महाकाव्य और व्यास ने महाभारत जैसे काव्य की रचना की थी।

नारद सदैव ही सामूहिक कल्याण की भावना को सर्वोपरि रखते थे। नारद में अपार संचार योग्यता व क्षमता थी।आदि पत्रकार नारद जी की पत्रकारिता सज्जन रक्षक व एवं दुष्ट विनाशक की थी। वे सकारात्मक पत्रकार की भूमिका में रहा करते थे। पत्रकार के रूप में काशी, प्रयाग,मथुरा ,गया ,बद्रिकाश्रम, केदारनाथ, रामेश्वरम सहित सभी तीर्थों की सीमा तथा महत्व का वर्णन नारद पुराण में मिलता हैं। देवर्षि नारद जी की पत्रकारिता समाज के लिए हितकारी व दुष्टों का संहार करने वाली थी। नारद जी की पत्रकारिता अध्यात्म पर आधारित थी। उन्होंने स्वार्थ , लोभ, एवं माया के स्थान पर परमार्थ को श्रेष्ठ माना। महान विपत्तियों से मानवता की रक्षा का काम किया।

वर्तमान समय में पत्रकारिता को नारदीय आदर्श अपनाने की आवश्यकता है।

कलमा नहीं पढ़ पाने पर हिंदुओं पर हमले धर्मांतरण के कुचक्र का नया जाल तो नहीं?

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दिल्ली । गत 27 अप्रैल, 2026 को देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के मीरा रोड इलाके में 31 साल के जुबैर अंसारी नाम के व्यक्ति ने दो सिक्योरिटी गार्डों राजकुमार मिश्रा और सुब्रतो सेन पर चाकू से हमले की घटना क्या षड्यंत्र के किसी नए ट्रेंड की ओर स्पष्ट संकेत कर रही है? आरोपित ने पहले गार्डों का धर्म पूछा। धर्म हिंदू बताने के बावजूद उनसे ‘कलमा’ पढ़ने को कहा गया। स्वाभाविक था कि दोनों कलमा नहीं पढ़ पाए, तो उसने उन पर तुरंत ही चाकू से ताबड़तोड़ वार कर दिए। उल्लेखनीय है कि हमला मीरा रोड के मुस्लिम बहुल नया नगर की रिहायशी इमारत के सुरक्षा गार्डों पर किया गया। मामले की जांच महाराष्ट्र एटीएस कर रही है और इसे आईएसआईएस के ऑनलाइन प्रोपेगेंडा से जोड़ कर ‘लोन वुल्फ’ हमला कहा जा रहा है।

जुबैर मूल रूप से मुंबई के कुर्ला इलाके का रहने वाला है। मीडिया रिपोर्टो में अभी तक मिली जानकारी के अनुसार वह साइंस ग्रेजुएट है और ऑनलाइन कोचिंग के माध्यम से गणित और रसायन विज्ञान विषयों की पढ़ाई कराता था। उसके माता-पिता, बहन और पत्नी अमेरिकी नागरिक हैं। वर्क परमिट समाप्त होने के बाद जुबैर 2019 में अमेरिका से भारत लौटा और मीरा रोड क्षेत्र में अकेले रह रहा था। जांच अधिकारियों को उसके मकान से आईएसआईएस विचारधारा और ‘लोन वुल्फ’ अटैक से जुड़े दस्तावेज मिले हैं।

क्या है लोन वुल्फ अटैक?
लोन वुल्फ हमले का चलन पश्चिमी देशों में भी देखने को मिल चुका है। इसमें आतंकी सोच वाला कोई कट्टरपंथी जिहादी अकेले ही लोगों पर हमला करता है। देखने में आया है कि इस तरह के हमले हथियारों के अलावा निर्दोष राहगीरों पर गाड़ी चढ़ा कर भी किए जाते रहे हैं। इस तरह के हमलों को लोन वुल्फ अटैक इसलिए कहा जाता है, क्योंकि भेड़िए आमतौर पर झुंड में ही शिकार पर हमले करते हैं। लेकिन कभी-कभी यह भी देखने में आया है कि किसी कारण से झुंड से अलग हुआ कोई भेड़िया भूख लगने पर अकेले भी शिकार पर झपट पड़ता है।

पहलगाम के एक साल बाद हमला
क्या यह मात्र संयोग ही है कि कश्मीर के पहलगाम में ठीक एक साल पूरा होने के पांच दिन बाद मुंबई में इस तरह का हमला किया गया है? हम जानते हैं कि 22 अप्रैल, 2025 को पहलगाम में आतंकियों ने कम से कम 26 हिंदुओं की हत्या की थी। उस जघन्य आतंकी बर्बरता के पीड़ितों ने बताया था कि हमले से पहले उनके संबंधियों से धर्म पूछा गया और हिंदू सुन सुन कर गोली मार दी गई। मीडिया रिपोर्टों में यह जानकारी भी सामने आई कि धर्म सुनिश्चित करने के लिए हिंदू पर्यटकों के पैंट तक उतरवाए गए।

कलमा सुना कर बचाई जान
पता यह भी चला कि आतंकियों ने हिंदुओं की पहचान करने के बाद कुछ सैलानियों से कलमा सुनाने को कहा। कुछ लोगों ने कलमा पढ़ कर अपनी जान बचाई भी। असम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर देबाशीष भट्टाचार्य ऐसे ही सैलानी थे। उन्होंने कलना सुनाया और आतंकियों ने उन्हें नहीं मारा, जबकि वे हिंदू थे। बड़ा प्रश्न यह है कि पहलगाम के हमलावर आतंकियों का उद्देश्य यह संदेश देना भी था कि जो हिंदू कलमा पढ़ सकते हैं, उन्हें आतंकी बर्बरता का शिकार नहीं बनाया जाएगा? दूसरे शब्दों में कहें, तो क्या संदेश यह भी था कि जो हिंदू कलमा याद कर लेंगे, वे इस तरह की आतंकी वारदात की चपेट में आने से बच सकते हैं?

कलमा रटवाने का षड्यंत्र?
पहलगाम नरसंहार के समय तो यह प्रश्न इस तरह के दृष्टिकोण से उभर कर सामने नहीं आया था। लेकिन अब मुंबई में हिंदुओं के कलमा नहीं सुना पाने पर हमले के बाद यह प्रश्न मुखर हो जाता है। हिंदुओं से कलमा सुनाए जाने की अपेक्षा किसी आतंकी सोच वाले व्यक्ति या किसी भी व्यक्ति को करनी ही क्यों चाहिए? यदि उसकी सोच हिंदुओं पर सिर्फ जानलेवा हमला करने भर की थी, तो हिंदू बताए जाने के बाद उसने गार्डों से कलमा सुनाने को कहा ही क्यों? अब एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि यदि दोनों गार्ड कलमा सुना देते, तो क्या उन पर हमला नहीं किया गया होता?

लोन वुल्फ अटैक की पड़ताल
अब कुछ और पहलुओं की पड़ताल कर लेते हैं। प्रथम दृष्टया मुंबई का हमला अचानक सनक में आ कर नहीं किया गया, यह कहा जा सकता है। आरोपित जुबैर के घर से आतंक से जुड़े दस्तावेज मिले हैं। उसने अप्रैल के महीने में ही हमले के षड्यंत्र को जमीन पर उतारा। वह महीना, जब एक साल पहले विश्व के जघन्यतम आतंकी हमलों में से एक को कश्मीर के पहलगाम में अंजाम दिया गया! अब अगर पहलगाम आतंकी हमले की पहली बरसी पर मुंबई में उस तर्ज पर ही हमला किया गया है, तो प्रश्न यह भी है कि भले ही आरोपित अभी एक ही है, लेकिन क्या अंतत: यह लोन वुल्फ अटैक है भी या नहीं?

मुंबई एटीएस मामले की जांच कर रही है। आश्चर्य नहीं होगा कि यह पता लगे कि इस हमले का षड्यंत्र आरोपित जुबैर ने अकेले नहीं रचा था, बल्कि पूरी संस्थागत आतंकी सोच के साथ इसे रचा गया। हमले का उद्देश्य भी एक ही दिखाई देता है कि हिंदुओं को दिमागी तौर पर कलमा याद करने के लिए विवश किया जाए। उन्हें यह संदेश दिया जाए कि यदि ऐसे किसी हमले में इतने भर से ही जान बचाई जा सकती है, तो कलमा याद करने में बुराई क्या है? क्या एक तरह से यह षड्यंत्र धर्म परिवर्तन की जिहाद के ही प्रमुख साधन के रूप में नहीं रचा जा रहा है?

कलमा क्या है?
अब बात कर लेते हैं इस्लाम में कलमा के महत्व की। इस्लाम में छह तरह के कलमों से आस्था की नींव रखी गई है। पहला कलमा है तैयब। सभी छह कलमों में प्रकारांतर से यही कहा गया है कि अल्लाह के अतिरिक्त किसी और की इबादत नहीं की जा सकती और हजरत मोहम्मद अल्लाह के रसूल हैं। इस्लाम स्वीकारने वालों के लिए कलमा तैयब पढ़ना पहली आवश्यक शर्त है। वैश्विक मंच पर बहुसंख्य मानव समाज आज विकास के जिस प्रस्थान बिंदु पर खड़ा है, उस वातावरण में सिर्फ कुछ शब्द बोल देने भर से किसी व्यक्ति की आस्था में आमूल-चूल परिवर्तन हो सकता है, यह विचार ही हास्यास्पद लग सकता है। किंतु मध्यकालीन भारत में सनातन समाज के लोगों के धर्म परिवर्तन के लिए तलवार की ताकत के अलावा तरह-तरह के दकियानूसी तरीके भी अपनाए जाते थे, यह सच है।

धर्म परिवर्तन के पुराने षड्यंत्र
भारत में मुगल काल के प्रामाणिक ग्रंथों में हिंदुओं के बलपूर्वक धर्म परिवर्तन की बहुत सी घटनाओं का उल्लेख मिलता है। आक्रांताओं के अधिकृत लेखकों ने ऐसी बहुत सी पुस्तकें लिखी हैं। इतिहास बताता है कि जिन हिंदुओं ने इस्लाम अपनाने से इनकार कर दिया, उन्हें पूरी निर्ममता से मौत के घाट उतार दिया गया। लेकिन सामाजिक मान्यताओं के जाल में फंसा कर बहुत से हिंदुओं को धर्मांतरित घोषित कर दिया गया, यह भी सच है। छलपूर्वक धर्म भ्रष्ट घोषित कर दिए गए हिंदुओं को अपने ही समाज से बहिष्कृत कर दिया गया और आखिरकार उन्हें इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने को विवश होना पड़ा। बहुत से ऐतिहासिक सुबूतों और लोक कथाओं में ऐसे उल्लेख मिलते हैं।

ऊंच-नीच की जातीय व्यवस्था और कथित अतार्किक धार्मिक कु-मान्यताओं के अनुसार नीची जाति या दूसरे धर्म का कोई व्यक्ति यदि कुएं में पैर डाल दे या किसी और तरह से जल का स्पर्श कर ले, तो वह जल अपवित्र मान लिया जाता था। ऐसा पानी यदि कोई हिंदू पी ले या पीने के लिए विवश कर दिया जाए, तो उसे धर्म भ्रष्ट और फिर अंतत: धर्मांतरित घोषित कर दिया जाता था। छल या बल पूर्वक मांस से जुड़ा कोई खाद्य पदार्थ या दूसरे धर्म से जुड़ी कोई वस्तु खिला कर भी लोगों को धर्म भ्रष्ट घोषित कर दिया जाता था। आर्थिक सुरक्षा और पद इत्यादि का लालच दे कर भी धर्म परिवर्तन करा दिया जाता था।

लाउडस्पीकर जिहाद!
कुचक्र आज भी जारी हैं, लेकिन अब विश्व हिंदू परिषद समेत बहुत से जन-समूह सतर्क हो कर काम कर रहे हैं। फिर भी धर्मांतरण के लिए नए-नए हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। आज यदि हिंदुओं को कलमा स्मरण कराने का षड्यंत्र रचा गया हो, तो इस पर बहुत आश्चर्य नहीं होना चाहिए। प्रसंगवश, विचारणीय यह भी है कि नमाज के समय पर लाउडस्पीकरों पर अजान के प्रसारण का उद्देश्य भी क्या परोक्ष धर्म परिवर्तन से ही जुड़ा हुआ मसला तो नहीं है?

लाउडस्पीकर के प्रयोग को ले कर कई हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट समय-समय पर निर्णय सुना चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार लाउडस्पीकर का उपयोग कर लोगों को जबरन श्रोता बनाना निजता के अधिकार का उल्लंघन है। इससे आगे जा कर, अजान के लिए लाउडस्पीकरों के प्रयोग पर प्रतिबंध के आग्रही लोगों ने अदालतों में यह तर्क भी दिया है कि उनकी आस्था अनेक देवी-देवताओं में है, इसलिए उन्हें अल्लाह की सर्वोच्चता की घोषणा क्यों सुननी चाहिए, वह भी दिन में कई-कई बार? अजान सुनने से उनकी धार्मिक भावनाओं को आघात लगता है। अगर इस तर्क को मान लिया जाए, तो क्या अजान को ऊंची आवाज में सुनाए जाने को ‘लाउडस्पीकर जिहाद’ कह सकते हैं?

हिंदू समाज में समाप्त हो भेद भाव: नरेंद्र ठाकुर

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लखनऊ। हिंदू समाज में जाति, भाषा, प्रांत आदि के आधार पर भेदभाव समाप्त होना चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण के कार्य में लगा है। इसके लिए 32 से अधिक संगठन समाज के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं। ये बातें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र ठाकुर ने गुरुवार को नारद जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित मीडिया संवाद कार्यक्रम में कहीं।

उन्होंने कहा कि आरएसएस की 100 वर्ष की यात्रा सामान्य यात्रा नहीं है। हमारे कार्यकर्ताओं ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। संघ विश्व में भारत माता की जय जयकार के लिए कार्य करता है। भारत को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र बनाना संघ का उद्देश्य है। प्रथम सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार को याद करते हुए उन्होंने कहा कि संघ व्यक्ति निष्ठ नहीं, तत्व निष्ठ बनने में विश्वास करता है। इसीलिए हमने किसी व्यक्ति को नहीं बल्कि परम पवित्र भगवा ध्वज को गुरु माना।

उन्होंने कहा कि संघ की 85000 से अधिक दैनिक शाखाएं और 32000 से अधिक साप्ताहिक मिलन चल रहे हैं। वनवासी क्षेत्रों से लेकर नगरों तक अनगिनत सामाजिक कार्य स्वयंसेवक चला रहे हैं।

नरेंद्र ठाकुर ने संघ के भविष्य की कार्य योजना पर चर्चा करते हुए कहा कि पंच परिवर्तन का कार्य समाज में चल रहा है। सामाजिक समरसता के माध्यम से हम हिंदू समाज के बीच हर प्रकार का भेदभाव मिटाना चाहते हैं। शताब्दी वर्ष में हिंदू सम्मेलनों में समाज के सभी वर्ग एक साथ आए और सहयोग किया। कुटुम्ब प्रबोधन के जरिए संघ चाहता है कि पारिवारिक व्यवस्था ठीक रहे तो समाज भी ठीक रहेगा। पर्यावरण संरक्षण भी समाज का प्रमुख कर्तव्य होना चाहिए। साथ ही स्व के आधार पर समाज का जीवन चलना चाहिए। भाषा, वेशभूषा में भी स्व का भाव होना चाहिए। इसी प्रकार सभी को नागरिक कर्तव्यों का बोध होना चाहिए। हर व्यक्ति देश, समाज के प्रति अपने कर्तव्य को समझे।

यूजीसी दिशा निर्देशों को लेकर किए गए एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि यह मामला सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन है। इसलिए संघ इस विषय पर अपना कोई मत व्यक्त नहीं करना चाहता, फिर भी हमारा मानना है कि समाज में सद्भाव बना रहना चाहिए।

कार्यक्रम में अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य कृपा शंकर जी, पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र प्रचार प्रमुख सुभाष जी, सह क्षेत्र प्रचार प्रमुख एवं राष्ट्रधर्म के निदेशक मनोजकांत जी, प्रांत प्रचारक कौशल जी, प्रांत संघचालक सरदार स्वर्ण सिंह जी , विश्व संवाद केंद्र के प्रमुख डॉ. उमेश जी, विश्व संवाद केंद्र न्यास के उपाध्यक्ष अशोक सिन्हा, प्रांत के विशेष संपर्क प्रमुख प्रशांत भाटिया ,मीडिया संवाद एवं सम्पर्क प्रमुख बृजनन्दन राजू सहित बड़ी संख्या में वरिष्ठ पत्रकार एवं गणमान्यजन उपस्थित रहे.

चंपारण के लाल भूपेन्द्र भगत हुए डॉक्टर भूपेन्द्र भगत

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मोतिहारी। संग्रामपुर प्रखंड के अंतर्गत उत्तरी भवानीपुर गांव के निवासी श्री रामशीष भगत के सुपुत्र भूपेन्द्र भगत को देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपने 102वें दीक्षांत समारोह में डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की है। इस दीक्षांत समारोह के मुख्य अतिथि देश के माननीय उपराष्ट्रपति श्री सी पी राधाकृष्णन थे। साथ ही दिल्ली विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रो. योगेश सिंह, डीन ऑफ कॉलेज प्रो. बलराम पाणी जी और विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर्स, कर्मचारी और डॉक्टरेट से सम्मानित अन्य विषयों के सैकड़ों शोधार्थी रहे। यह उपाधि उनके हिंदी साहित्य में डॉक्टरेट इन फिलोसॉफी (पीएचडी) करने पर प्रदान की गई है।

यह उपाधि प्राप्त करने वाले भूपेन्द्र अपने परिवार, समाज और गांव के पहले छात्र हैं जिन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से ही स्नातक, स्नातकोत्तर और अब वहीं से अपनी पीएचडी कर डॉक्टरेट हुए हैं।

बता दें कि भूपेन्द्र के पिता एक आम किसान हैं और गांव में रहकर ही खेती किसानी और मजदूरी करते हैं। भूपेन्द्र ने अपने पिता के आदर्शों और संस्कारों से प्रेरणा लेकर यह मुकाम हासिल किया है।

इस विषय में डॉ. भूपेन्द्र का कहना है “दिल्ली विश्वविद्यालय में आने वाले उत्तर प्रदेश और बिहार विशेषकर पूर्वांचल के हम जैसे छात्र अपनी मेहनत तो करते ही हैं साथ ही उनके कुछ बनने में यहां के माहौल, यहां के वरिष्ठ साथी, प्राध्यापक सबका योगदान होता है। बिना सामाजिक सहयोग के व्यक्ति अकेले कामयाबी की ऊंचाई पर नहीं पहुंच सकता चाहे वह कितनी ही मेहनत क्यों न कर ले।”

डॉ. भूपेन्द्र आगे कहते हैं कि वो आगे चलकर अपने गांव, अपने समाज और अपने जिले के छात्रों को लिए उच्च शिक्षा के लिए सहयोग करना चाहते हैं ताकि अधिक से अधिक बच्चे उच्च शिक्षा में आ सकें और वे भी अपने गांव और जिले का नाम रौशन कर सकें।

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