जब राजनैतिक व्यवस्था सुस्त और लचर बनी रहेगी तो ज्यूडिशियरी को हस्तक्षेप करना पड़ेगा

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दिल्ली । भारत की सुप्रीम कोर्ट को लोकतंत्र का सबसे बड़ा पहरेदार माना जाता है। महिलाओं के अधिकार, LGBTQ बराबरी और पर्यावरण सुरक्षा जैसे ऐतिहासिक फ़ैसलों ने अदालत की साख मज़बूत की है। लेकिन हाल के बरसों में कई फ़ैसलों ने यह बहस छेड़ दी है कि अदालतें अपने दायरे से बाहर निकलकर नीति और प्रशासन का काम करने लगी हैं। न्यायिक सक्रियता पर एक बहस 1993 में भी हुई थी जब जस्टिस कुलदीप सिंह बेंच ने MC मेहता के PIL पर ताज ट्रिपेजियम जोन में प्रदूषणकारी उद्योगों पर तमाम बंदिशें लगा दी थीं। उस वक्त Presumptive justice का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया था।

आजकल आवारा कुत्तों की समस्या को लेकर न्यायिक दखल पर फिर से आधे अधूरे सवाल उठ रहे हैं। पिछले कुछ सालों में न्यायिक सक्रियता को लेकर राजनैतिक सर्कल्स में असहजता देखी गई है। कुछ लोग ज्यूडिशियरी को parallel government के रूप में देखने लगे हैं! लेकिन ज्यूडिशियरी अपनी रिस्पांसिबिलिटी के प्रति जागरूक है और अपनी हदों से वाकिफ है। वो राष्ट्र का conscience है, जनता की आखिरी उम्मीद है।

हाल के वर्षों में कुछ केसेस में न्यायिक सक्रियता को लेकर, राज नेताओं ने कन्फ्यूजन फैलाया और ये भी कहा कि नेताओं की आजादी पर बेवजह अंकुश लगाया गया। जैसे, फ़रवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड्स योजना को रद्द कर दिया। चुनाव से कुछ ही हफ़्ते पहले आए इस फ़ैसले ने राजनीतिक उथल पुथल पैदा कर दी थी। आलोचकों का कहना था कि अदालत ने पार्लियामेंट की पॉलिसी को बिना ज़रूरी बहस पलट दिया।

इसी साल अदालत ने गवर्नरों और राष्ट्रपति को लंबित बिलों पर तय वक़्त में कार्रवाई का आदेश दिया। इतना ही नहीं, आर्टिकल 142 के तहत कुछ बिलों को “अपने आप क़ानून” मान लिया गया। क़ानूनविदों का कहना है कि यह आर्टिकल 200 की रूह से टकराता है और केंद्र व सूबों के ताल्लुक़ात पर असर डाल सकता है।
तक़नीकी और सामाजिक मामलों में भी अदालत ने दख़ल दिया। 2017 में हाईवे किनारे शराब दुकानों पर पाबंदी से लाखों लोगों की रोज़ी पर असर पड़ा, बाद में यह पाबंदी ढीली करनी पड़ी। पटाखों पर “ग्रीन क्रैकर्स” का फ़ैसला भी आया, जिसकी नीयत नेक थी मगर सवाल यह उठा कि क्या अदालतें वैज्ञानिक और सांस्कृतिक मसलों पर नीति तय करेंगी।

2018 में अदालत ने भारत को 2020 तक BS-6 उत्सर्जन मानकों पर ला दिया। उद्योग और ग्राहकों पर बड़ा बोझ पड़ा, और यह बहस उठी कि क्या ऐसे मसले अदालत के बजाय पॉलिसी-निर्माताओं के लिए नहीं छोड़े जाने चाहिए।
2025 में अदालत ने आवारा कुत्तों पर सुओ मोटू नोटिस लेकर आठ हफ़्तों में उन्हें शेल्टर भेजने का हुक्म दिया। मगर दिल्ली की हक़ीक़त यह है कि वहाँ मुश्किल से ढाई हज़ार कुत्तों की जगह है, जबकि आबादी आठ-दस लाख है। यह डायरेक्टिव Animal Birth Control Rules, 2023 से भी टकराता दिखा, हालांकि अभी फाइनल ऑर्डर आना बाकी है।

इन मिसालों ने न्यायिक सक्रियता को पॉलिसी बनाने की हद तक पहुँचा दिया है। अदालत की भूमिका हक़ की हिफ़ाज़त करना है, लेकिन जब वही हुकूमत या पार्लियामेंट का काम करने लगे, तो नाज़ुक संतुलन बिगड़ भी सकता है।

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता केसी जैन कहते हैं, “अदालतें आमतौर पर शक्तियों के पृथक्करण का सम्मान करती हैं और लक्ष्मण रेखा पार करने से बचती हैं। लेकिन जब नीतिगत गतिरोध या कानूनी शून्यता होती है, जो मौलिक अधिकारों को सीधे प्रभावित करती है और समाज को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुँचाती है, तो न्यायपालिका मूक दर्शक बनी नहीं रह सकती। ऐसे मामलों में, विधायिका या कार्यपालिका द्वारा कदम बढ़ाने तक नागरिकों की सुरक्षा के लिए अंतरिम निर्देश आवश्यक हो जाते हैं। अगर कोई राज्यपाल किसी विधेयक पर अनिश्चित काल तक बैठा रहे, तो यह कब तक चल सकता है? संविधान का अनुच्छेद 200 स्पष्ट करता है — राज्यपाल का उद्देश्य विधायी प्रक्रिया को अनिश्चित समय तक रोकना नहीं है। अंततः, निर्वाचित सरकार की इच्छा ही प्रभावी होनी चाहिए।”

सार्वजनिक टिप्पणीकार प्रो. पारस नाथ चौधरी न्यायिक सक्रियता का समर्थन करते हैं। वे कहते हैं, “एक गतिशील समाज में न्याय को बनाए रखने और अधिकारों की रक्षा करने में न्यायिक सक्रियता एक महत्वपूर्ण शक्ति है। यह अदालतों को कानूनों को लचीले ढंग से व्याख्यायित करने का अधिकार देती है, ताकि कठोर विधान या अन्य अंगों की निष्क्रियता से पैदा हुए अंतराल को भरा जा सके। जब विधायिका नागरिक अधिकारों, पर्यावरणीय संकटों या प्रणालीगत असमानताओं जैसे जरूरी मुद्दों से निपटने में विफल होती है, तो सक्रिय न्यायाधीश हस्तक्षेप करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि संविधान एक जीवित दस्तावेज बना रहे, जो आधुनिक चुनौतियों के अनुकूल हो। अन्यायपूर्ण कानूनों या नीतियों को साहसपूर्वक रद्द करके, अदालतें हाशिए के समुदायों की सुरक्षा करती हैं और लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाए रखती हैं। न्यायिक सक्रियता अतिक्रमण नहीं है; यह सत्ता पर एक आवश्यक अंकुश है, जो अन्य संस्थाओं के विफल होने पर निष्पक्षता और प्रगति को बढ़ावा देती है।”
भारत का लोकतंत्र अदालत की निगहबानी से ही मज़बूत होता है। लेकिन अदालत अगर पॉलिसी बनाने लगे तो बैलेंस बिगड़ने का ख़तरा भी बना रहेगा। बेहतर होगा संसद और हमारी पॉलिटिकल पार्टीज, समय रहते सचेत हो जाएं, और फटाफट नीतिगत फैसले लेने की पहल करें। जागो, सोने वालो।

यह भारत विरोधी शक्तियों के “स्लीपर सेल” का षड्यंत्र तो नहीं

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दिल्ली । काँग्रेस नेता राहुल गाँधी और इंडी गठबंधन के सदस्य दल विहार में मतदाता सूची के सत्यापन का तो विरोध कर रहे हैं लेकिन चुनाव आयोग पर फर्जी मतदाता बनाने का आरोप लगाकर सड़क से लेकर संसद तक देश में नया तनाव पैदा रहे हैं। यह ठीक वही शैली है जो पाकिस्तान में इमरान खान और बंगलादेश में खालिदा जिया के विरुद्ध अपनाई गई थी। यह आँदोलन ऐसे समय तीव्र हुआ जब अमेरिका ने भारत पर टैरिफ हमला बोला।
विदेशी षड्यंत्र का उत्तर तो भारत दे देगा। यह वही अमेरिका है जिसने अटलजी के समय भारत द्वारा किये गये परमाणु परीक्षण के बाद प्रतिबंध लगाये थे। लेकिन भारत अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। इस बार भी अमेरिका के टैरिफ हमले से भारत अपेक्षाकृत अधिक सक्षम होकर निकलेगा। लेकिन भारत को सदैव समस्या आन्तरिक तत्वों से रही। इन्हें आधुनिक शब्दावली में “स्लीपर सेल” कहते हैं। यह स्वयं सामने नहीं आते लेकिन भारत में भारत के ही चेहरों को अपना “मोहरा” बनाते हैं, इसी से विदेशी षड्यंत्र कारी सफल हुये हैं। वर्तमान समय में मतदाता सूची के बहाने उत्पन्न किये जा रहे राजनैतिक तनाव से भी कुछ प्रश्न उठ रहे हैं जो किसी षड्यंत्र की ओर संकेत कर रहे हैं। इस आँदोलन में तीन प्रकार के प्रश्न उठ रहे हैं जिनपर देश के प्रबुद्ध जनों को विचार करना आवश्यक है। पहली तो काँग्रेस और इंडी गठबंधन बिहार में मतदाता सूची का सत्यापन रोकने केलिये पूरी शक्ति लगा रहा है। आशंका है इन प्राँतों में कुछ बांग्लादेशी घुसपैठिये मतदाता बन गये हैं। जिनकी जांच चल रही है। इसे रोकने केलिये उच्चतम न्यायालय का दरबाजा भी खटखटाया गया है। लेकिन दूसरी ओर केवल मीडिया के सामने मतदाता सूची को मुद्दा बनाकर एक धुंध फैलाई जा रही है। फर्जी मतदाता के बहाने कुछ नाम उछाले गये हैं, दो महिलाओं के नाम लिये गये, बनारस में एक सूची भी दिखाई गई। ये नाम सब हिन्दुओं के हैं। काँग्रेस द्वारा प्रचारित सूची में किसी ऐसी बस्ती का नाम नहीं है जो मुस्लिम बाहुल्य हो। तीसरा प्रश्न इस आँदोलन का समय है। काँग्रेस ने आठ अगस्त से बहुत तेजी दिखाई। पहले “प्रेजेंटेशन” दिया, फिर सांसद सड़क पर निकले। नौ अगस्त रक्षाबंधन का दिन था। रक्षाबंधन से जन्माष्टमी तक सनातन त्यौहारों का एक क्रम रहता है। लेकिन काँग्रेस ने पूरे देश का ध्यान त्यौहारों से हटाकर मोदी सरकार और चुनाव आयोग की ओर खींचा। जिस दिन काँग्रेस और उनके साथी भारत की सड़क पर आँदोलन कर रहे थे उन्हीं दिनों पाकिस्तान की ओर से रक्षामंत्री मुनीर भारत को परमाणु हमले की धमकी दे रहे थे। इस बार मुनीर की धमकी ऐसे समय आई जब एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप टैरिफ के बहाने भारत को धमका रहे थे और दूसरी ओर भारत की सड़कों पर यह आँदोलन इतना तीव्र था कि जन सामान्य का ध्यान अमेरिका और पाकिस्तान की धमकी से हटकर केवल आँदोलन से उत्पन्न तनाव में ही लग गया।
इन दिनों पूरी दुनियाँ के कुछ भागों में सत्ता हथियाने की एक नई शैली विकसित हुई है। इसमें सकारात्मक मुद्दों के आधार पर जन सामान्य में अपना समर्थन नहीं बढ़ाया जाता, अपितु भ्रामक और झूठे मुद्दे उछालकर सरकारों को अस्थिर करने का कुचक्र किया जाता है, संवैधानिक संस्थाओं पर हल्ला बोला जाता है। इस शैली में सत्य पर, तथ्य पर अथवा तर्क पर कोई बात नहीं होती केवल धुंध फैलाई जाती है। ऐसी धुंध कि जिसमें कुछ भी साफ न दिखे, जन सामान्य भ्रमित होकर सड़कों पर आ जाये और सत्ता भयभीत होकर सिमट जाय। रूस में जारशाही के विरुद्ध पूरा वामपंथी आंदोलन इसी शैली पर चला था और इसी शैली से चीन में माओवाद प्रभावी हुआ था। इसी शैली से पाकिस्तान में इमरान खान और बंगलादेश में खालिदा जिया की सत्ता पलट हुआ। काँग्रेस और इंडी गठबंधन के कुछ दल इन दिनों भारत में इसी रास्ते पर चल पड़े हैं। 2014 में केन्द्रीय सत्ता से बाहर होने के बाद काँग्रेस ने जितने भी मुद्दे उठाये गये हैं वे सभी नकारात्मक रहे हैं। उनके निशाने पर पहले प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी थे। उनको लक्ष्य करके “चौकीदार चोर” जैसे नारे उछाले गये। सीएए को मुद्दा बनाकर देश में साम्प्रदायिक तनाव उत्पन्न करने का प्रयास हुआ। किसान आँदोलन के बहाने गाँवों में असंतोष भड़काने का प्रयास हुआ। ओबीसी आरक्षण का मुद्दा उछालकर देश में सामाजिक अलगाव की रेखा गहरी की गई। लेकिन मोदीजी बिना विचलित हुये भारत राष्ट्र को सशक्त बनाने के अभियान में जुटे रहे। वे विकसित देशों की पंक्ति में भारत को अग्रणी बनाने के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहे हैं। यह मोदीजी की संकल्पशीलता और सकारात्मक चिंतन का ही परिणाम था कि विपक्ष द्वारा उछाले गये नकारात्मक मुद्दों का कोई अधिक प्रभाव नहीं पड़ा और मोदीजी के नेतृत्व में तीसरी बार सरकार बनी। 2024 के चुनाव परिणाम के बाद काँग्रेस और उनके सहयोगी दलों ने अपनी नकारात्मक रणनीति को ही विस्तार देकर अधिक आक्रामक बनाया और संवैधानिक संस्थाओं पर हमले तेज किये गये। ये हमले ईडी, सीबीआई, एनआईए पर हुये। सेना और न्यायालय तक को नहीं छोड़ा गया। अब चुनाव आयोग, चुनाव प्रक्रिया और ईवीएम पर अधिक फोकस किया जा रहा है। पहले ईवीएम मशीन को “हैक” करने का शोर मचाया गया था। और अब मतदाता सूची हाथ में लेकर चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा करने का शोर है। काँग्रेस और राहुल गांधी अपनी शिकायत लेकर सिधे चुनाव आयोग नहीं पहुँचे, आयोग ने बुलाया प्रमाण माँगे फिर भी नहीं पहुँचे। लेकिन सड़क से संसद तक अपनी आवाज तेज और तीखी करते रहे।

मतदाता सूची बनाने की प्रक्रिया में काँग्रेस के बीएलए भी शामिल होते हैं

मतदाता सूची तैयार करने की एक प्रक्रिया होती है। मतदाता सूची बनाने अथवा चुनाव प्रक्रिया पूरी करने का काम चुनाव आयोग के निर्देशन में तो होता है लेकिन इसके लिये चुनाव आयोग के पास कोई अपना “स्टाॅफ” नहीं होता। यह काम राज्यों में काम करने वाला प्रशासन तंत्र करता है। देश में कुल 28 राज्य और 8 केन्द्र शासित प्रदेश हैं। प्रशासनिक दृष्टि से इन्हें कुल 780 जिला केन्द्रों में विभाजित किया गया है। जिला प्रशासन का मुखिया कलेक्टर होता है। चुनाव आयोग का मुख्यालय दिल्ली में है और सभी राज्यों की राजधानी में “राज्य निर्वाचन आयोग कार्यालय” तो होते हैं। पर उनमें इतना स्टाॅफ नहीं होता कि यह वे स्वयं यह काम कर सकें। चुनाव आयोग केवल “नीति निर्देशिका” अर्थात “गाइड लाइन” तैयार करता है। जो देश के सभी कलेक्टरों को भेजी जाती है। उसके अनुसार चुनाव प्रक्रिया आरंभ होती है। संबंधित सभी जिला कलेक्टर अपने प्रशासनिक दायित्वों के साथ “जिला निर्वाचन अधिकारी” भी माने जाते हैं। वे ही मतदाता सूची बनाने केलिये घर घर जाकर सर्वे करने अथवा मतदान प्रक्रिया पूरी करने के काम का समन्वय करते हैं। इसमें शिक्षक और पटवारी से लेकर डिप्टी कलेक्टर तक पूरा प्रशासनिक अमला लगता है। ये सब स्थानीय होते हैं। भारत में अलग अलग राज्यों में अलग अलग राजनैतिक दलों की सरकारें हैं। अनेक प्राँतों में भारतीय जनता पार्टी सरकार में भी नहीं हैं। मतदाता सूची तैयार करने का काम केवल प्रशासनिक अमले तक ही सीमित नहीं रहता। इसमें मान्यता प्राप्त दल भी सहभागी होते हैं। जिस प्रकार मतदान प्रक्रिया में प्रत्येक मतदान केन्द्र पर राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि सहभागी रहते हैं, उसी प्रकार मतदाता सूची बनाने में भी होते हैं। निर्वाचन अधिकारी के रूप में कलेक्टर की ओर से उस क्षेत्र के सभी मान्यता प्राप्त राजनैतिक दल को पत्र लिखे जाते हैं जिसमें उनसे अपना कोई कार्यकर्ता जोड़ने केलिये कहा जाता है। इस पत्र के आधार पर राजनैतिक दल अपना कार्यकर्ता नियुक्त करते हैं जिन्हें “बीएलए” अर्थात ब्लाक लेवल एजेंट कहा जाता है। सभी दलों के बीएलए के समन्वय से ही मतदाता सूचियाँ तैयार होती हैं।
इस प्रक्रिया से स्पष्ट है कि जहाँ भी मतदाता सूचियाँ तैयार हुईं हैं उनमें काँग्रेस कार्यकर्ता भी बीएलए के रूप में सहभागी रहे हैं। यदि कहीं कोई गड़बड़ी थी तो उसकी शिकायत स्थानीय स्तर पर ही क्यों नहीं की गई। इसके अतिरिक्त एक बात और है। मतदाता सूचियों का अंतिम प्रकाशन पहली बार में कभी नहीं होता। इन्हें तैयार करके पहले सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया जाता है, सुझाव और आपत्तियाँ माँगी जातीं हैं। सुझाव और आपत्ति भेजने की भी अंतिम तिथि निर्धारित होती है। इस अवधि में आईं शिकायतों के निराकरण के बाद ही मतदाता सूचियों का अंतिम प्रकाशन होता है। काँग्रेस नेता श्री राहुल गाँधी के हंगामेदार आरोपों से पहले किसी प्रदेश में काँग्रेस के किसी नेता ने कोई शिकायत प्रस्तुत नहीं की।

धुँध फैलाने का सुनियोजित कुचक्र : आरोपों का झूठ भी सामने आया

काँग्रेस की राजनीति अपने वोट और जीत केलिये होती है। वह अपनी सुविधा केलिये मुद्दे भी बदल लेती है। काँग्रेस द्वारा मुद्दे बदलने की घटनाओं से इतिहास भरा है। फिर भी दो ऐसे मुद्दे हैं जो आज के राजनैतिक आकाश में धुँध की भाँति फैले हैं। इनमें जातीय आधारित जन गणना और दूसरा ईवीएम द्वारा मतदान है। काँग्रेस का कभी नारा था- “जात और न पांत पर, मोहर लगेगी हाथ पर”। लेकिन अब जातिवाद की राजनीति उसकी प्राथमिकता पर है। दूसरा ईवीएम द्वारा मतदान। 1989 के चुनाव परिणाम के बाद स्वर्गीय राजीव गाँधी “वैलेट पेपर” के बजाय ईवीएम पर मतदान कराने की माँग उठाई थी। लेकिन अब श्री राहुल गाँधी और पूरी काँग्रेस ईवीएम मशीन को निशाना बना रही है। काँग्रेस अपनी लगातार चुनावी हार से कोई सीख नहीं ले रही। मतदाता में प्रभाव बढ़ाने केलिये कोई सकारात्मक मुद्दा नहीं उठा रही। वह भ्रामक मुद्दे उछालकर सरकार को अस्थिर करने का प्रयास कर रही है। श्री राहुल गाँधी ने मीडिया के सामने एक मनोवैज्ञानिक योजना से काम किया था। वे लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। स्वाभाविक रूप से मीडिया के कैमरे उनकी ओर होते हैं। उन्होंने पहले भूमिका बनाई और प्रचारित किया वे “बम फोड़ने वाले हैं। बम फोड़ने की बात से पूरे देश की जिज्ञासा जागी। फिर कम्प्यूटर के माध्यम से एक “प्रजेंटेशन” रखा। इस प्रजेंटेशन को मीडिया के माध्यम से पूरे देश ने देखा । उन्होंने अपने प्रजेंटेशन में पांच प्रमुख आरोप लगाये। श्री राहुल गांधी ने कर्नाटक के एक विधानसभा महादेवापुरा का उल्लेख किया और आरोप लगाया कि यहां पर 1,00,250 वोटों की चोरी की गई है। उन्होंने फर्जी वोटर जोड़ने के पांच तरीके बताये। 1-11,965 डुप्लीकेट वोटर बनाए गए। 2- 40,009 मतदाताओं के पते फर्जी हैं। 3- 10,452 वोटर बड़ी संख्या में एक ही पते पर रजिस्टर हैं। 4- 4,132 वोटर बिना फोटो या अवैध फोटो के साथ जोड़े गए। 5- 33,692 नए वोटर फॉर्म-6 का गलत तरीके से जोड़े गए।

अपनी बात के समर्थन में उन्होंने दो महिलाओं के नाम लिये। एक सकुन रानी का राहुल गाँधी का आरोप था कि इस महिला दो बार मतदान किया। दूसरी महिला मन्टी देवी। इनकी आयु 125 साल लिखी है। राहुल ने एक मकान नम्बर बताया जिस पर साठ मतदाताओं के नाम अंकित हैं। उन्होने कुछ पते ऐसे दिखाये जिनपर मकान नम्बर शून्य लिखा था। श्री राहुल गाँधी के आरोपों के आधार पर मीडिया के कैमरे वहाँ पहुँच गये। सकुन रानी ने मीडिया को राहुल जी के आरोप झूठे बताये और कहा कि उन्होने कोई दो बार मतदान नहीं किया। एक बार ही मतदान किया था। उसी प्रकार मन्टी देवी की जन्मतिथि वर्ष 1990 है लेकिन उनकी लिखावट कुछ ऐसी थी जिससे कम्प्यूटर ने 1900 अंकित कर लिया। जिस पते पर साठ मतदाता अंकित किये गये थे। वह मकान मालिक काँग्रेस समर्थक निकला। तीसरा मकान नम्बर का शून्य होना। भारत गाँवों का देश हैं। यहाँ गांव में लाखों ऐसे घर हैं जिनका कोई नम्बर नहीं होता। कम्प्यूटर उन्हें शून्य ही लिख देता है। वोट चोरी के श्री राहुल गाँधी ने जो पाँच विन्दु उछाले थे वे उसी दिन शाम ढलते ढलते ही भ्रामक प्रमाणित हो गये थे। फिर भी काँग्रेस अपनी बात पर अड़ी रही।

चुनाव आयोग ने सभी भ्रामक आरोपों को भ्रामक बताया

भारत के चुनाव आयोग ने राहुल गांधी द्वारा जारी मतदाता सूची को भ्रामक बताया। चुनाव आयोग ने ‘निराधार’ और ‘गैर-जिम्मेदाराना’ बताया। आयोग ने यह भी कहा कि श्री राहुल गांधी ने व्यक्तिगत रूप से कभी कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई। चुनाव आयोग ने अपने आधिकारिक एक्स सोशल मीडिया पर कांग्रेस की पोस्ट को साझा करते हुए लिखा, यह बयान पूरी तरह भ्रामक है। अगर राहुल गांधी को लगता है कि उनकी तरफ से साझा की जा रही सूची सही है तो उन्हें कानूनी प्रक्रिया का पालन करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। उन्हें बिना देरी कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को जवाब भेजना चाहिए। आयोग ने कहा कि श्री राहुल गाँधी अपने द्वारा उठाए गए मुद्दों पर हस्ताक्षरित शपथ पत्र दें अथवा देश से माफी मांगे।

काँग्रेस समर्थक भी सहमत नहीं हुये राहुल गाँधी के आरोप से

श्री राहुल गाँधी द्वारा वोट चोरी के आरोपों की सच्चाई तो शाम तक सामने आ ही गई थी। उनके आरोपों से अनेक काँग्रेस जन और भाजपा एवं प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के आलोचक भी सहमत नहीं हुये। इनमें सबसे पहला नाम काँग्रेस की कर्नाटक सरकार में सहकारिता मंत्री के एन राजन्ना का है। उन्होंने महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र में “वोट चोरी” के लिए अपनी ही पार्टी को दोषी माना और कहा कि ये “अनियमितताएं हमारी आंखों के सामने हुईं”। उन्होंने यह भी कहा कि “यह हमारे लिए शर्म की बात कि हम निगरानी नहीं कर सके”। दूसरा बड़ा नाम चर्चित पत्रकार श्री राजदीप सरदेसाई का है। उन्होंने कहा कि “यदि वोट चोरी होती तो भाजपा 240 पर नहीं रूकती 340 भी हो सकती थी” तीसरा नाम एआईएमआईएम के नेता औबेसुद्दीन उबैसी का है। उनका कहना है कि इससे काँग्रेस को नुकसान होगा।

काँग्रेस अभी रुकेगी नहीं इस मुद्दे को आगे भी बढ़ा सकती है

श्री राहुल गाँधी के आरोपों का चुनाव आयोग की ओर से भी खंडन आ गया और मीडिया ने सच्चाई को भी सामने ला दिया है। इन दोनों बातों से संतोष तो किया जा सकता है लेकिन यह मुद्दा अभी समाप्त नहीं हुआ है। इस बात की संभावना प्रबल है कि काँग्रेस इसे आगे बढ़ायेगी। धुंध की उस राजनीति का एक और सिद्धांत है “एक झूठ को सौ बार बोलो तो लोग सच समझने लगते हैं”। काँग्रेस इस नीति पर चलकर इस मुद्दे और आगे बढ़ा सकती है। इसे दो बातों से समझा जा सकता है। सबसे पहला तो यही है कि कर्नाटक सरकार के मंत्री राजन्ना सच्चाई सामने लाये तो उन्हें मंत्री पद से बर्खास्त किया गया। मुख्यमंत्री त्यागपत्र लेना चाहते थे लेकिन काँग्रेस महासचिव वेणुगोपाल ने मुख्यमंत्री सीतारमैया से बात की और बर्खास्त करने का निर्देश दिया। इस निर्णय से काँग्रेस में अब असहमति का स्वर नहीं उठेगा अपितु इस आरोप को और तेजी से आगे बढ़ाने केलिये काँग्रेस जन आगे आयेंगे। कर्नाटक के मंत्री को बर्खास्त करने के बाद एक समाचार बनारस से आया। बनारस में काँग्रेसजनों ने अपने पराजित प्रत्याशी अजय राज के सम्मान में जुलूस निकाला। मालाएँ पहनाई और मोदीजी की जीत का आधार वोट चोरी बताया। अजय राज केवल अपने स्वागत तक ही नहीं रूके। उन्होने बनारस के राम जानकी मठ के पते पर अंकित मतदाताओं की सूची जारी की। इस सूची में साठ से अधिक मतदाताओं के नाम अंकित हैं और पिता के नाम के स्थान पर एक ही नाम “रामकमल दास” लिखा है। अजयराज ने इसे वोट चोरी का प्रमाण बताया। वस्तुतः राम जानकी मठ के महंत रामकमल दास जी हैं और मतदाता सूची में जितने नाम हैं वे सब महंत जी के शिष्य हैं और इसी मठ में रहते हैं। संन्यास के बाद पिता के स्थान पर पिता के रूप में गुरू का नाम लिखने की परंपरा हैं। इसे कानूनी मान्यता भी है। इस बात को सब जानते भी हैं फिर भी मीडिया में स्थान बनाने केलिये इसे उछाला गया। बनारस के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने भी कुछ क्षेत्रों अपने पराजित प्रत्याशियों का स्वागत किया।
सच्चाई कहने पर कर्नाटक में अपने मंत्री को बर्खास्त करना। बनारस में अपने पराजित प्रत्याशी का स्वागत और मठ के मतदाताओं को फर्जी बताना इस बात के संकेत हैं कि काँग्रेस अभी रुकेगी नहीं। वह इसे आगे बढ़ायेगी।

चुनाव आयोग के दुरुपयोग से पुराना नाता है काँग्रेस का

काँग्रेस नेता राहुल गाँधी चुनाव आयोग पर “वोट चोरी” का आरोप लगा रहे हैं। उनके द्वारा अब तक उछाले गये आरोपों में कोई भी प्रमाणित नहीं हो सका लेकिन इतिहास की कुछ घटनाएँ ऐसी हैं जो काँग्रेस को ही चुनाव आयोग का दुरुपयोग करने के कटघरे में खड़ा करती हैं। श्री राहुल गाँधी द्वारा चुनाव आयोग पर की गई पत्रकार वार्ता का उत्तर केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने भी पत्रकार वार्ता में ही दिया। उन्होंने पहला उदाहरण बाबा साहब अंबेडकर के चुनाव हारने का दिया और बताया कि अंबेडकर जी केवल 14561 वोटों से चुनाव हारे जबकि इस चुनाव में 74,333 वोट निरस्त किए गए थे। इसके विरुद्ध आंबेडकर जी ने 18 पन्नों की याचिका भी लगाई। इतने वोटों का निरस्त होना सामान्य घटना नहीं है यह चुनाव आयुक्त की भूमिका पर एक बड़ा प्रश्न उपस्थित करती है। एक अन्य घटना 1971 में श्रीमती इंदिरा गाँधी के रायबरेली से शासकीय साधनों का दुरूपयोग करके लोकसभा चुनाव जीतने की है। न्यायालय ने आरोप प्रमाणित माने और चुनाव को निरस्त कर दिया था। एक घटना श्रीमती सोनिया गाँधी के मतदाता बनने की है। 1980 की मतदाता सूची में श्रीमती सोनिया गांधी का नाम दर्ज था। लेकिन वे तब तक भारत की नागरिक नहीं बनी थीं। सोनिया जी का राजीव जी से विवाह तो 1968 में हो गया था लेकिन विवाह के पन्द्रह वर्ष तक सोनिया जी इटली की नागरिक ही रहीं थीं। भारत की विधिवत नागरिक वे 1983 में बनीं।

मतदान की प्रक्रिया गोपनीय होती है। वोट अकेले में डाला जाता है लेकिन अब सोशल मीडिया पर कुछ तस्वीरे और वीडियों वायरल हो रहे हैं जिसमें 1991 मतदान बूथ पर श्री राजीव गाँधी, श्रीमती सोनिया गाँधी और सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता राजेश खन्ना दिखाई दे रहें हैं। एक और किसी मतदान का फोटो वायरल हो रहा है जिसमें श्रीमती सोनिया गाँधी और श्री राहुल गाँधी साथ दिखाई दे रहे हैं। यह मतदान के गोपनीयता कानून का उल्लंघन है लेकिन चुनाव आयुक्त ने इसका संज्ञान नहीं लिया। जो चुनाव आयुक्त की अनुकूलता के बिना संभव नहीं है।
काँग्रेस शासन काल में कुछ आयुक्तों को जिस प्रकार पद प्रतिष्ठा दी गई उससे इस आरोप को बल मिलता है कि काँग्रेस शासन काल में चुनाव आयोग कि दुरुपयोग हुआ। जिन प्रमुख चुनाव आयुक्तों अतिरिक्त पद प्रतिष्ठा मिली उनमें भारत के आठवें चुनाव आयुक्त रहे राम कृष्ण त्रिवेदी भी हैं। उन्हें 1986 में गुजरात का राज्यपाल बनाया गया था। भारत की नौवीं चुनाव आयुक्त रमादेवी रहीं। बाद में इनको कर्नाटक राज्यपाल बनाया गया। रमा देवी के बाद टीएन शेषन चुनाव आयुक्त बने। शेषन अपने समय के सबसे चर्चित चुनाव आयुक्त रहे हैं। उन्हें चुनाव सुधारों के लिये जाना जाता है। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस टिकिट पर गांधीनगर निर्वाचन क्षेत्र से 1999 का लोकसभा चुनाव लड़ा था। भारत के ग्यारहवें मुख्य चुनाव आयुक्त रहे एम एस गिल भी सेवानिवृत्ति के बाद कांग्रेस में शामिल हो गए। वे राज्यसभा सदस्य बने। उन्हें 2008 में पहले युवा एवं खेल मंत्री और 2011 में सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्री बनाया गया।

उत्तर प्रदेश में तकनीकी शिक्षा को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगा टाटा टेक्नोलॉजीज

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लखनऊ । उत्तर प्रदेश में तकनीकी शिक्षा की तस्वीर लंबे समय से चिंताजनक रही है। राज्य के पॉलिटेक्निक और इंजीनियरिंग कॉलेजों में आधुनिक प्रयोगशालाओं व उपकरणों की कमी और कमजोर प्रशिक्षण स्तर के कारण डिग्री-डिप्लोमा धारक युवा उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप कौशल हासिल नहीं कर पाते। शिक्षा और उद्योग के बीच गहराती खाई के चलते लाखों युवा रोजगार की दौड़ में पिछड़ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि व्यावहारिक प्रशिक्षण, आधुनिक बुनियादी ढांचा और उद्योगों से मजबूत तालमेल के बिना यह चुनौती हल नहीं हो सकती।

इस दिशा में योगी आदित्यनाथ सरकार ने एक क्रांतिकारी कदम उठाया है। टाटा टेक्नोलॉजीज लिमिटेड (टीटीएल) के साथ हाल ही में हुए ऐतिहासिक समझौते के तहत राज्य के 150 राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआई) और 121 सरकारी पॉलिटेक्निक्स को अत्याधुनिक तकनीक से लैस किया जाएगा। यह पहल न केवल युवाओं के लिए रोजगार के नए द्वार खोलेगी, बल्कि उत्तर प्रदेश को आर्थिक आत्मनिर्भरता की राह पर ले जाएगी। करीब 6,935.8 करोड़ रुपये की लागत वाली इस महापरियोजना में टाटा टेक्नोलॉजीज 87 प्रतिशत योगदान देगी, जबकि शेष राशि और सिविल ढांचे का खर्च राज्य सरकार वहन करेगी।

परियोजना का पहला चरण 2025-26 तक 50 आईटीआई और 45 पॉलिटेक्निक्स को हाईटेक बनाएगा, जबकि दूसरा चरण 2026 से 2028 तक शेष 100 आईटीआई और 76 पॉलिटेक्निक्स का उन्नयन करेगा। इसका लक्ष्य हर साल 35,000 युवाओं को विश्वस्तरीय प्रशिक्षण देना है। टाटा टेक्नोलॉजीज 11 दीर्घकालिक और 23 अल्पकालिक कोर्स शुरू करेगी, जिनमें रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमेशन, स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग और ग्रीन एनर्जी जैसे क्षेत्र शामिल होंगे। ये कोर्स टाटा के विशेषज्ञों और प्राविधिक शिक्षा विभाग के प्रशिक्षकों द्वारा संचालित होंगे, साथ ही छात्रों को टाटा समूह सहित राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कंपनियों में ऑन-जॉब ट्रेनिंग और अप्रेंटिसशिप के अवसर मिलेंगे।

इंडस्ट्री कैप्टेंस ने इस करार को ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के लक्ष्य की दिशा में मील का पत्थर बताया है। यह साझेदारी उत्तर प्रदेश की तकनीकी शिक्षा को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगी। टाटा टेक्नोलॉजीज के अधिकारियों ने भी युवाओं को विश्वस्तरीय कौशल प्रदान करने की प्रतिबद्धता जताई, साथ ही इसे राष्ट्र निर्माण की दिशा में एक कदम बताया। सरकार ने स्पष्ट किया कि यह आईटीआई का निजीकरण नहीं, बल्कि एक सहयोगी मॉडल है, जिसमें टाटा तकनीकी उन्नयन और प्रशिक्षण प्रदान करेगी, जबकि प्रशासनिक और वित्तीय जिम्मेदारी राज्य सरकार की रहेगी।

हालांकि, इस महत्वाकांक्षी योजना के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। तीन साल में 271 संस्थानों का उन्नयन एक जटिल लक्ष्य है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशिक्षकों की कमी और परियोजना लागत में 5,472 करोड़ से 6,935.8 करोड़ रुपये तक की वृद्धि को लेकर पारदर्शिता के सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि लागत वृद्धि का औचित्य स्पष्ट हो और सरकारी हिस्सेदारी को 20 प्रतिशत तक बढ़ाने पर विचार किया जाए। साथ ही, कोर्स स्थानीय उद्योगों, जैसे ऑटोमोबाइल, हस्तशिल्प, कृषि प्रौद्योगिकी और ग्रीन एनर्जी, की जरूरतों के अनुरूप हों। त्रैमासिक स्किल ऑडिट, उद्योगों से फीडबैक और डिजिटल स्किलिंग डैशबोर्ड की स्थापना भी जरूरी है।
भारत के अन्य राज्यों में ऐसी साझेदारियों ने उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। मैसूर के उद्योगपति जगन बेंजामिन के मुताबिक कर्नाटक में सिस्को नेटवर्किंग अकादमी ने 150 से अधिक आईटीआई में साइबर सुरक्षा और नेटवर्किंग प्रशिक्षण देकर 50,000 से ज्यादा छात्रों को 85 प्रतिशत प्लेसमेंट दर के साथ रोजगार दिलाया है। तमिलनाडु में श्वाब फाउंडेशन के साथ उद्योग 4.0 केंद्रित प्रशिक्षण और महाराष्ट्र में सीमेंस द्वारा 80 आईटीआई में स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग लैब्स की स्थापना इसके उदाहरण हैं।

एजुकेशनल कंसल्टेंट एन गणेशन के मुताबिक यदि उत्तर प्रदेश में यह परियोजना स्थानीय जरूरतों पर केंद्रित रही और पारदर्शिता बरती गई, तो यह न केवल युवाओं को रोजगार देगी, बल्कि राज्य को तकनीकी और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम साबित होगी।

श्रीकृष्ण: प्रकृति के शाश्वत रक्षक और यमुना

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मथुरा । आज नदियाँ गंदी हो रही हैं, जंगल कट रहे हैं और जानवरों की कई नस्लें खत्म हो रही हैं। ऐसे में कृष्ण की शिक्षा हमें बताती है— प्रकृति की देखभाल करना हमारी ज़िम्मेदारी है। जो पेड़, नदी और जानवरों की रक्षा करता है, वही असली भक्त है।

श्री कृष्ण सिर्फ़ भगवान नहीं, बल्कि प्रकृति के सच्चे साथी थे। अगर हम उन्हें मानते हैं, तो हमें भी पेड़-पौधों, नदियों और जीव-जंतुओं की रक्षा करनी चाहिए। कृष्ण की पूजा तभी सच्ची है, जब हम प्रकृति की सेवा करें।

वृंदावन कृष्ण के लिए सिर्फ़ खेलने की जगह नहीं थी—वह उनकी ज़िंदगी का हिस्सा था। नदियाँ, पेड़, पहाड़, जानवर और पक्षी… सबके साथ उनका एक ख़ास नाता था। पेड़ों के दोस्त: कदंब के पेड़ों की छाँव में बैठकर वह बाँसुरी बजाते थे। उनकी मधुर धुन सुनकर पत्ते भी झूम उठते थे! गायों के पालक: गोपाल कृष्ण गायों को सिर्फ़ पालते ही नहीं थे, बल्कि उनसे बेपनाह मुहब्बत करते थे। जब कालिया नाग ने यमुना को ज़हरीला बना दिया, तो कृष्ण ने उसकी रक्षा की। वह यमुना को सिर्फ़ नदी नहीं, बल्कि अपनी सखी मानते थे।

आज जब संसार पर्यावरणीय संकटों से जूझ रहा है, श्री कृष्ण का जीवन हमें स्मरण कराता है कि मानव का भाग्य प्रकृति के स्वास्थ्य से ही जुड़ा है। अक्सर जब हम श्रीकृष्ण का स्मरण करते हैं, तो हमारी दृष्टि उनके रासलीला, गोपियों के साथ उनके दिव्य प्रेम, महाभारत में उनके पराक्रम, या भगवद्गीता के शाश्वत उपदेशों पर ठहरती है। किंतु श्रीकृष्ण के जीवन का एक अत्यंत गहरा और कम चर्चित आयाम है—प्रकृति के साथ उनका अतूट और भावनात्मक बंधन। कृष्ण के लिए वृंदावन केवल खेल का स्थल नहीं था, बल्कि एक जीवंत तपोभूमि थी—नदियों, वनों, पर्वतों, पशुओं और पक्षियों से गुंथी हुई एक पवित्र चादर, जिसे उन्होंने प्रेम और संरक्षण से संवार दिया।

यमुना के तटों से लेकर कदंब के उपवनों तक, कृष्ण की उपस्थिति उस भूमि से अभिन्न है जिसे उन्होंने पवित्र किया। बाल्यकाल में वे वृक्षों, नदियों और पशुओं के साथी बने। उनकी बांसुरी की तान केवल मनुष्यों को ही नहीं, बल्कि पशुओं, पक्षियों और वृक्षों को भी मोहित कर देती थी। हिरण, मोर, गायें, यहाँ तक कि पत्तों की सरसराहट भी उनके स्वर में बंध जाती थी, मानो सब पहचानते हों कि वही जीवन का मूल स्पंदन हैं। स्वयं कृष्ण गीता में कहते हैं—“मैं जल का स्वाद हूँ, सूर्य और चंद्रमा का प्रकाश हूँ, आकाश में ध्वनि हूँ और समस्त प्राणियों में जीवन हूँ।” (10.20)

श्रीकृष्ण की पर्यावरण रक्षक की छवि का सबसे अद्भुत प्रतीक है गोवर्धन पर्वत का धारण। जब इन्द्र ने प्रलयंकारी वर्षा कर वृंदावन को डुबोने का प्रयास किया, तब बालक कृष्ण ने अपनी छोटी अंगुली पर विशाल गोवर्धन पर्वत उठा लिया और समस्त ग्रामवासियों, गायों तथा वन्यजीवों को आश्रय दिया। यह केवल दिव्य पराक्रम नहीं था, बल्कि एक पर्यावरणीय संदेश भी था। कृष्ण ने अपने लोगों को समझाया कि पर्वत, जो चरागाह, जल और संसाधन देता है, उसी की पूजा होनी चाहिए। वे कहते हैं—“पर्वतों में मैं मेरु हूँ, नदियों में गंगा हूँ, वृक्षों में पीपल हूँ।” (गीता 10.24)

यमुना नदी के प्रति कृष्ण का प्रेम भी उतना ही शाश्वत है। यमुना उनके लिए केवल एक नदी नहीं, बल्कि एक प्रिय सखी थी। जब कालिया नाग ने उसके जल को विषाक्त कर दिया, तब कृष्ण ने यमुना की रक्षा हेतु जल में कूदकर उसे नाग से मुक्त कराया। उनकी वाणी में: “मैं पृथ्वी की सुगंध हूँ और सभी जीवों का जीवन हूँ।” (गीता 7.8)

कदंब वृक्षों की छाया में कृष्ण की बांसुरी को उसकी मधुरतम ध्वनि मिली। कदंब उनके प्रिय वृक्ष थे, जिनकी छाया और सुगंध ने उनकी लीलाओं को पवित्र किया। भागवत कहती है—“नदियाँ, पर्वत, वृक्ष और पशु सब दूसरों के हित के लिए जीते हैं। वैसे ही मनुष्य को भी जगत के कल्याण हेतु जीना चाहिए।” (10.22.35)

कृष्ण का प्रेम सबसे कोमल रूप से गौओं में झलकता है। गोपाल के रूप में वे उन्हें केवल पालते ही नहीं, बल्कि परिवार की तरह मानते थे। गायें उनके जीवन का केंद्र थीं, जो वृंदावन की पारिस्थितिकी संतुलन की धुरी थीं। कृष्ण ने दिखाया कि सादगी और कृतज्ञता से भरा जीवन ही सच्चा स्थायी जीवन है। वे कहते हैं—“यदि कोई मुझे प्रेम और भक्ति से एक पत्ता, एक पुष्प, एक फल या जल भी अर्पित करे, तो मैं उसे स्वीकार करता हूँ।” (गीता 9.26)

कृष्ण ने गीता में संतुलित आहार, कर्तव्य और त्याग को जीवन का आधार बताया। “सभी प्राणी अन्न पर जीवित रहते हैं, अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है, वर्षा यज्ञ से आती है और यज्ञ कर्तव्य से उत्पन्न होता है।” (गीता 3.14) इस प्रकार अध्यात्म और पर्यावरण उनके लिए अलग-अलग नहीं, बल्कि अभिन्न थे।

आज जब नदियाँ प्रदूषण से दम तोड़ रही हैं, वन कट रहे हैं, और असंख्य प्रजातियाँ लुप्त हो रही हैं, कृष्ण का वृंदावन हमें पुकारता है। वे हमें स्मरण कराते हैं कि प्रकृति की रक्षा करना ही अपने अस्तित्व की रक्षा है।

श्रीकृष्ण केवल राधा के प्रियतम या अर्जुन के सारथि ही नहीं थे—वे यमुना के संरक्षक, गोवर्धन के रक्षक, वृक्षों के मित्र और वनों के स्वर हैं। आज कृष्ण की आराधना का सच्चा अर्थ है—प्रकृति की आराधना।

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