ITBP Launches First CAPF Medical Teaching Institute

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New Delhi : In a landmark initiative, the Indo-Tibetan Border Police (ITBP) today inaugurated the Himveer Postgraduate Institute at CAPFs Referral Hospital, Greater Noida.

DG ITBP Shri Shatrujeet Kapur, IPS inaugurated the institute, marking the first medical teaching facility within CAPFs.

The upgraded 200-bedded hospital is now a tertiary care and academic centre, accredited by NBEMS and aligned with NMC norms.

The institute starts with PG seats across 05 disciplines, with DNB courses in General Medicine and Pathology, and Diploma courses in Paediatrics, Anaesthesia and Family Medicine. Six PG residents (ITBP & CRPF) have been inducted.

The initiative will boost in-house medical training, reduce dependence on external institutions, and strengthen healthcare capacity within CAPFs.
ITBP plans to develop it into a medical college with 50 MBBS seats in future.

वीर कुंवर सिंह : अस्सी वर्ष का अमर शौर्य और बिहार की रणगाथा

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 प्रणय विक्रम सिंह

दिल्ली । इतिहास के विस्तीर्ण आकाश में कुछ क्षण ऐसे होते हैं, जब समय स्वयं ठहरकर उन्हें नमन करता है। आज वही क्षण है, जब वयोवृद्ध देह में धधकती अजेय आत्मा ने मृत्यु को भी परास्त कर अमरत्व का आलोक धारण किया।

आज महानायक बाबू कुंवर सिंह जी का बलिदान दिवस है। वह दिवस, जब मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए समर्पित एक विराट जीवन, अमर गाथा बन गया। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि राष्ट्र-स्वाभिमान, अदम्य साहस और अटूट संकल्प का स्मरण है।

1857 का स्वाधीनता संग्राम भारतीय चेतना का प्रथम ज्वालामुखी था। यह संग्राम भारत की आत्मा का अमर आलोक, राष्ट्रीय जागरण का प्रथम शंखनाद और संस्कृति के स्वाभिमान की महान मशाल थी।

इस महायज्ञ की अग्नि में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हजरत महल, महावीर सिंह राठौड़, नाना साहेब, राजा राव राम बक्स सिंह और तात्या टोपे जैसे अनेक हुतात्माओं ने आहुति दी किंतु इनमें भी बाबू वीर कुंवर सिंह का नाम विशेष रूप से चमकता है। अस्सी वर्ष की आयु में भी वे आंधी की तरह उठे, अग्नि की तरह भड़के और सिंह की तरह गर्जे।

इतिहासकार डॉ. आर.सी. मजूमदार ने लिखा है कि “इतनी आयु में जब मनुष्य विरक्ति और विश्राम की ओर अग्रसर होता है, उस समय कुंवर सिंह ने तलवार थामी और ब्रिटिश साम्राज्य को ललकारा। यह उनके आत्मबल और संकल्प का अनुपम उदाहरण है।”

1777 में जगदीशपुर (वर्तमान भोजपुर, बिहार) की धरती पर जन्मे वीर कुंवर सिंह परमार राजपूतों के उज्जैनिया वंश परंपरा से थे। उनका कुल वीरता, धर्म और स्वाभिमान का जीवंत प्रतीक था।

जन्म से ही उनमें पराक्रम का प्रकाश और धर्मनिष्ठा की दृढ़ता थी। वे तलवार के साथ-साथ न्याय के भी साधक थे। प्रजा उन्हें केवल जमींदार नहीं, बल्कि जन-नायक और जन-रक्षक मानती थी।

*अस्सी वर्ष का सेनापति और संग्राम का शंखनाद*

1857 का जब शंखनाद हुआ, तब कुंवर सिंह अस्सी वसंत पार कर चुके थे। वह समय था, जब सामान्यतः मनुष्य संन्यास की शरण लेता है। किंतु इस महायोद्धा ने वृद्ध शरीर में युवा साहस का संचार कर लिया।
उनके साथ उनके भाई बाबू अमर सिंह और सेनापति हरे कृष्ण सिंह ने कंधे से कंधा मिलाया। यही वह सैन्य-संघटन था, जिसने बिहार की धरती को क्रांति का केंद्र बना दिया।

*आरा का रण और आंधी-सी आक्रामकता*

आरा की लड़ाई में अंग्रेज़ों को जबरदस्त पराजय मिली। अंग्रेज अफसर हेरेसन ने आरा हाउस में शरण ली, किंतु कुंवर सिंह की सेना ने उसे चारों ओर से घेर लिया।

अंग्रेज इतिहासकार जॉन के ने लिखा है कि “The old lion of Jagdishpur shook the very foundation of British prestige in Bihar.”
(जगदीशपुर का वृद्ध शेर बिहार में ब्रिटिश प्रतिष्ठा की नींव हिला गया।)

कुंवर सिंह की सबसे बड़ी शक्ति थी गुरिल्ला युद्धकला। वे धरती को ढाल, नदी को रक्षा और जंगल को शस्त्र बना देते। अंग्रेज़ी सेना बार-बार उनके छल-छंद में उलझती रही। आजमगढ़ और गाजीपुर में उनके छापामार युद्ध ने अंग्रेजों को असहाय कर दिया। ब्रिटिश कमांडर मार्क्स ने स्वीकार किया कि “This old rebel was more dangerous than many young leaders put together.”
(यह वृद्ध विद्रोही अनेक युवा नेताओं से अधिक खतरनाक सिद्ध हुआ।)

*कटे हाथ का करुण किंतु कांतिमान प्रसंग*

1858 में गंगा पार करते समय अंग्रेजों की गोली वीर कुंवर सिंह के बाएं हाथ में आ लगी। रक्त की धारा अनवरत बह रही थी, किंतु यह वृद्ध योद्धा विचलित नहीं हुआ। उन्होंने अपनी तलवार उठाई और स्वयं अपना घायल हाथ काटकर गंगा माता की गोद में अर्पित कर दिया। मानो उन्होंने जीवन का एक अंग राष्ट्ररक्षा के यज्ञ में समिधा बनाकर समर्पित कर दिया हो।

यह दृश्य भारतीय इतिहास का करुण किंतु कांतिमान क्षण था, जहां घाव भी गौरव बन गया, पीड़ा भी पूजा में परिवर्तित हो गई और अंग-त्याग अमर-बलिदान का शाश्वत प्रतीक बन गया।

यह प्रसंग केवल रक्तपात नहीं था, यह था गंगा-गर्भ में किया गया एक दिव्य आहुति-यज्ञ, जिसमें योद्धा ने स्वयं को मातृभूमि की रक्षा हेतु समर्पित कर दिया।

आज भी बिहार की धरती इस गाथा को गीतों में संजोए है कि

*”कटल हथवा, ना कटल हिम्मत,”*
*”कुंवर सिंह बनलन जन-जन की इज्जत।”*

*जगदीशपुर की विजय और विजेता की विदाई*

23 अप्रैल 1858 को, अस्सी वर्षीय किंतु अदम्य सेनानी ने अपने गढ़ जगदीशपुर पर पुनः विजय ध्वज फहराया। यह केवल सैन्य सफलता नहीं थी, बल्कि यह था संघर्षरत आत्मा का स्वर्णिम स्वर्गारोहण। तीन दिन बाद, 26 अप्रैल 1858 को उन्होंने इस नश्वर शरीर को त्याग दिया। किंतु वे मरे नहीं, वे तो अमरत्व को प्राप्त हुए। वे गए तो पराजित होकर नहीं, बल्कि विजयी बनकर, विजेता की विदाई लेकर।

अंग्रेज अधिकारी विलियम टेलर भी स्वीकार करने पर विवश हुआ कि “He died, but he died as a victor.”
(वह मरे, परंतु विजेता बनकर मरे।)

*स्मृति और सम्मान : अमर योद्धा की अमिट छाप*

वीर कुंवर सिंह का बलिदान केवल इतिहास के पन्नों में अंकित नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा और जनता की वाणी में आज भी गूंजता है। उनके शौर्य को नमन करने हेतु समय-समय पर सरकार और समाज ने अनेक स्मृति-चिह्न स्थापित किए। 23 अप्रैल 1966 को भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया। यह टिकट डाक-विभाग का औपचारिक प्रतीक नहीं, बल्कि राष्ट्र की कृतज्ञता का मोहर था।

इसके पश्चात 1992 में आरा में वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। शिक्षा का यह मंदिर उनके नाम से अभिषिक्त होकर इस सत्य का उद्घोष करता है कि वीरता केवल रणभूमि तक सीमित नहीं, बल्कि यह नई पीढ़ियों के चरित्र-निर्माण की प्रेरणा भी है।

2017 में गंगा पर बने आरा-छपरा पुल का नामकरण वीर कुंवर सिंह सेतु के रूप में किया गया। यह सेतु केवल उत्तर और दक्षिण बिहार को जोड़ने वाला मार्ग नहीं, बल्कि अतीत और भविष्य के बीच संवाद का पुल भी है। एक ऐसा शौर्य-स्मारक, जिस पर हर दिन हजारों लोग चलते हैं और अनजाने ही वीरता के पदचिह्नों पर पांव धरते हैं।

उनकी शहादत की 160वीं पुण्यतिथि पर 2018 में पटना का हार्डिंग पार्क परिवर्तित होकर ‘वीर कुंवर सिंह आजादी पार्क’ बना और वहां उनकी प्रतिमा स्थापित की गई। यह प्रतिमा राजधानी के मध्य खड़ी होकर हर आने-जाने वाले से मानो कहती है कि “यह धरती वीरों की जननी है।”

किंतु वीर कुंवर सिंह की स्मृति केवल इन औपचारिक स्मारकों तक सीमित नहीं है। भोजपुर, शाहाबाद और मगध के गांव-गांव में आज भी आल्हा गायन और बिरहा परंपरा उनकी गाथा का उद्घोष करती है। मेले और अखाड़ों में गायक जब स्वर छेड़ते हैं, तो लोकमानस झूम उठता है

*”सोनवा के किनार बजनवा गूंजे,”*
*”कुंवर सिंह के नाम से धरती पूजे।”*

इन गीतों की गूंज बताती है कि वीरता का असली स्मारक पत्थर या लोहे से नहीं बनता, बल्कि जनता के हृदय में जीवित रहता है। यही कारण है कि बिहार की मिट्टी, लोकगीतों की लय और गांव की चौपालें आज भी उन्हें जीवित रखती हैं।

*अमर संदेश और अलौकिक आदर्श*

वीर कुंवर सिंह की गाथा हमें सिखाती है कि देशभक्ति आयु की सीमाओं से परे है। वृद्धावस्था भी यदि संकल्पवान हो, तो साम्राज्य की जड़ें हिला सकती है। उनका जीवन एक संदेश है, उनका बलिदान एक मंत्र है और उनकी गाथा एक प्रेरणा है।

आइए, हम संकल्प लें कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारेंगे। अन्याय के सामने अडिग रहेंगे, न्याय के लिए निर्भीक बनेंगे और राष्ट्र के लिए सर्वस्व अर्पित करने को सदैव तत्पर रहेंगे।

वे मरे नहीं,
वे आज भी जीवित हैं
धरती की धड़कनों में, गंगा की लहरों में,
और भारत माता की संतानों के साहस में।

Meghalaya possesses ancient knowledge system: RSS Prachar Pramukh

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Guwahati: In pursuit of understand the essence of ancient Bharat, one must look towards the Northeast, where traditions continue to thrive in their most organic and spiritual forms, said Dr Sunil Mohanty, Assam Kshetra Prachar Pramukh of Rashtriya Swayamsevak Sangh, while delivering a comprehensive and deeply reflective address during a religious gathering in Meghalaya placing indigenous traditions of the region within the larger civilizational framework of Bharat.

The 36th Seng Khihlang (Tien Phira / Lumphung), one of the most significant indigenous spiritual congregations of the Khasi–Pnar (Jaintia) community, held at Sein Raij Muthlong in West Jaintia Hills on 17 to 19 April 2026, attracted a huge volume of audience. Established in 1981, Seng Khihlang has grown from a small gathering of 30–40 participants into a massive spiritual congregation attended by lakhs of indigenous faith believers, symbolizing a living tradition of cultural continuity, identity, and spiritual resilience.

Recalling Meghalaya’s historical legacy, Dr Mohanty referred to early rulers such as Urmi Rani (c. 600–630 CE), Krishak Pator, Hatak, and Guhak, and stressed the importance of remembering these figures. He also highlighted the historical importance of Jaintiapur, which served as the capital of the Jaintia Kingdom until its annexation by the British in 1835. Further, he mentioned key rulers including Prabhat Ray Syiem (1500–1516), Laxmi Sinha (1670–1701), credited with constructing the Jayant Rajbadi in 1680, and the last ruler Rajendra Singh Syiem (1832–1835).

Paying tribute to struggles against colonial rule, he remembered U Tirot Sing (c. 1802–1835), U Kiang Nangbah (1836–1862), and Pa Togan Sangma (d. 1872), acknowledging their sacrifices in defending sovereignty and identity. Mohanty highlighted the richness of indigenous heritage, referring to the megalithic traditions of menhirs and dolmens as enduring symbols of an ancient civilization. He also spoke about the spiritual significance of the Nartiang Durga Temple and the Jaintia Shaktipeeth in present-day Bangladesh. He further pointed out the existence of a nearly 3,000-year-old iron-smelting tradition in Meghalaya as evidence of advanced indigenous knowledge systems.

Emphasizing the philosophical unity underlying diverse traditions, he noted that indigenous faiths across the north-eastern Bharat including those of Nyishi, Apatani, Galo, Mishings, and Kacharis share common foundations such as reverence for the Pancha Bhutas (earth, water, fire, air, and sky). Drawing from the wisdom of the Rig Veda, he cited the Vedic expression ‘Eko’ham Bahusyamah’ (I am One, may I become many), explaining that diversity is an expression of the One manifesting in multiple forms. He emphasized that in the Bharatiya worldview, diversity is not seen as division or difference as often interpreted in Western thought, but as an intrinsic expression of unity itself, where plurality strengthens, rather than fragments, the whole.

Describing indigenous faith-traditions as the mother or the foundational source of world’s modern civilisations and organised religions, he stated that just as the river Ganges depends on its origin at Gangotri, modern religions and civilizations are rooted in indigenous traditions, and their decline would impact the entire world’s cultural and spiritual balance. He also referred to the International Council for Cultural Studies (ICCS), which brings together representatives of more than 40 indigenous traditions globally, including Māori, Aboriginal, Aztec, and Zulu communities, to explore shared spiritual values and common heritage with the ethos that ‘All are One’.

In the context of the centenary year of the RSS, Mohanty emphasized the need for ‘Panch Parivartan’ like preservation of family values, environmental protection, social harmony, promotion of selfhood, and adherence to civic duties. He also highlighted the core principles of Niam Khasi such as ‘Tip briew tip blei’ (to know humanity is to know God), ‘Tip kur tip kha’, and ‘Kamai ia ka hok’ (earn righteousness), underlining that true spirituality is reflected in conduct, compassion, and selfless service.

The three-day program saw structured participation with the arrival of delegates and ceremonial Mawbynna (monolith) procession on the first day, followed by installation, awareness sessions, and prayers on the second day, and a grand concluding ceremony on the third day. More than 30 Sein Raij and Seng Khasi units participated through traditional songs and dances, reflecting the vibrant cultural heritage of the community.

The event was attended by several prominent dignitaries including Sniawbhalang Dhar, deputy chief minister of Meghalaya, Wailadmiki Shylla, State minister, Sanbor Shullai, State minister, Matthew Beyondstar Kurbah, member of State legislative assembly, Laski Rymbai, deputy chief executive member of JHADC, Sooki Lapasam and Rikut Parien, JHADC executive members along with traditional authorities like the Dollois of Shangpung, Raliang, Jowai, and Nangbah Elakas and a number of government officials. The spiritual congregation concluded with a strong message of unity, cultural pride, and the reaffirmation that preserving indigenous traditions is essential for building a harmonious, spiritually rooted, and inclusive society.

बलबीर पुंज : एक युगद्रष्टा चिंतक का अवसान

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दिल्ली । प्रख्यात चिंतक, लेखक, स्तंभकार और पूर्व राज्यसभा सांसद बलबीर पुंज नहीं रहे। मस्तिष्क इसे मान भी ले तो हृदय मानने को तैयार नहीं होता। क्या लिखा जाए, कैसे लिखा जाए, कहाँ से शुरुआत की जाए और कहाँ समाप्त, यह तय कर पाना अत्यंत कठिन हो रहा है। कभी-कभी किसी विराट व्यक्तित्व के जाने से ऐसी रिक्तता उत्पन्न होती है, जिसे भर पाना कदाचित संभव नहीं होता; बलबीर पुंज जी का जाना ऐसी ही रिक्तता का बोध कराता है।

वे एक ऐसे व्यक्तित्व थे, जो सदैव लिखने-पढ़ने वाले लोगों को प्रेरित और प्रोत्साहित करते रहते थे। राष्ट्रीय धारा के लेखकों, स्तंभकारों और पत्रकारों के किसी अच्छे लेख पर वे अपनी टिप्पणी देते, उसे पढ़ने के लिए अपने परिचितों के साथ साझा करते और प्रायः स्वयं फोन कर लेखक को बताते कि उसके लेख में क्या खूबियाँ हैं, कहाँ सुधार की आवश्यकता है, तथा विषय को और गहराई से समझने के लिए किन-किन लेखकों को पढ़ना चाहिए। यह वास्तव में एक दुर्लभ गुण था, विशेषतः ऐसे व्यक्ति में – जो स्वयं एक स्थापित चिंतक, दो बार राज्यसभा सदस्य, भाजपा के बौद्धिक रणनीतिकारों में प्रमुख और संगठन के उच्च पदों पर रहा हो। उनकी सादगी, सहजता, सर्वसुलभता और निरहंकारिता केवल प्रभावित ही नहीं करती थी, बल्कि कई बार अविश्वसनीय भी लगती थी। यदि कोई लेखक, पत्रकार या स्तंभकार स्वास्थ्य संबंधी या अन्य किसी समस्या से गुजर रहा हो, तो वे उसका कुशल-क्षेम लेना कभी नहीं भूलते थे। संपर्क-सूत्र उपलब्ध न होने पर भी वे किसी परिचित से उसका नंबर लेकर उससे संवाद स्थापित करते और उसके दुःख-दर्द में सहभागी बनते। आज के समय में, जब संबंधों में औपचारिकता बढ़ती जा रही है, ऐसी आत्मीयता अत्यंत दुर्लभ है।

आयु के आठवें दशक में भी उनकी सक्रियता आश्चर्यचकित करती थी। वे निरंतर लेखन, चिंतन और विमर्श में सक्रिय रहे। अनेक व्हाट्सएप समूहों पर वे न केवल अपने लेख साझा करते थे, बल्कि दूसरों के लेखों और टिप्पणियों को भी ध्यानपूर्वक पढ़कर उन पर सारगर्भित प्रतिक्रिया देते थे। कभी-कभी वे अन्य महत्त्वपूर्ण लेख साझा कर सभी को उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे। अपने देहावसान से तीन-चार दिन पूर्व तक उनका लेखन जारी रहा, यह उनकी साधना और प्रतिबद्धता का प्रमाण है। उनके लिए लेखन केवल विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि एक साधना थी। वे कहा करते थे कि यदि “राम जी” ने लेखनी का सामर्थ्य दिया है, तो उसका उपयोग देश, धर्म और संस्कृति के लिए होना चाहिए। इसी में जीवन की धन्यता और सार्थकता है। वे लेखकों, पत्रकारों और संपादकों को यह प्रेरणा देते थे कि वे लेखन को ही अपना सबसे सशक्त उपकरण बनाएं। कार्यक्रमों और आयोजनों की अपेक्षा लेखन अधिक स्थायी प्रभाव छोड़ता है। सधी हुई लेखनी ही समय के शिलालेख पर अपनी अमिट छाप छोड़ती है। इस संदर्भ में वे सीताराम गोयल, राम स्वरूप और धर्मपाल जैसे चिंतकों से प्रेरणा लेने की बात करते थे। उनका कहना था कि उनके जाने के बाद दुनिया ने उनकी लेखनी के तत्त्व व महत्त्व को समझा।

किसी भी विषय पर उनकी समझ अत्यंत गहरी और व्यापक थी। वे केवल घटनाओं की सतह पर नहीं रुकते थे, बल्कि उनके मूल तक जाकर विश्लेषण करते थे। भारतीय विमर्श (नैरेटिव्स) की उनकी समझ विलक्षण थी। प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित उनकी पुस्तक “नैरेटिव्स का मायाजाल” इस संदर्भ में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उनके लेखों में लिजलिजी-पिलपिली भावुकता के लिए कोई स्थान नहीं होता था; वे तर्कों को स्पष्टता और तथ्यों को प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करते थे। यही कारण था कि उनके विचारों का खंडन करना उनके विरोधियों के लिए भी सहज नहीं होता था।

उन्होंने भारतीय सभ्यता, सनातन संस्कृति और उसके इतिहास का गहन अध्ययन किया था। साथ ही उन्होंने अब्राहमिक सभ्यताओं का भी सूक्ष्म विश्लेषण किया था। इस कारण वे वैश्विक स्तर पर चल रहे सभ्यतागत संघर्ष का यथार्थ चित्र प्रस्तुत कर पाते थे। वे हिंदुत्व की उदारता, बहुलता और सह-अस्तित्व की भावना को पहचानते थे, परंतु इसके समक्ष उपस्थित वर्तमान और संभावित संकटों के प्रति भी उतने ही सजग थे। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से समाज को बार-बार इन चुनौतियों व संभावित संकटों के प्रति सचेत किया। वे मानते थे कि खंडित समाज किसी भी वैचारिक या सामाजिक चुनौती का सामना नहीं कर सकता। इसलिए उन्होंने संगठित समाज के महत्त्व को जीवनभर रेखांकित किया। वे जानते थे कि वामी-जिहादी-यूरोपंथी गठजोड़ के समक्ष असंगठित हिंदू-समाज टिक नहीं सकता। अतः उन्होंने अपना लेखकीय-जीवन समाज को संगठित करने की आवश्यकता समझाने में समर्पित किया।

व्यक्तिगत बातचीत में वे संगठनात्मक सुधार के बिंदुओं का उल्लेख अवश्य करते थे, परंतु सार्वजनिक रूप से उन्होंने सदैव संगठन की मर्यादा को सर्वोपरि रखा। वे इस बात के प्रति सजग थे कि किसी भी बड़े ध्येय की प्राप्ति के लिए ध्येयनिष्ठा, अनुशासन और व्यक्तिगत आकांक्षाओं का त्याग आवश्यक होता है। वे संघ विचारों के निकट थे और स्वयंसेवकों को साधक के रूप में देखते थे। उनका विश्वास था कि स्वयंसेवकों की साधना से ही समाज में अनुकूल परिवर्तन संभव हुआ है और राष्ट्र, धर्म व संस्कृति के प्रति गौरव-बोध जागृत हुआ है। फिर भी वे इस बात से चिंतित थे कि बौद्धिक और शैक्षिक क्षेत्रों में वामपंथ का प्रभाव अब भी बना हुआ है। उनका मानना था कि 2014 के बाद राजनीतिक और हिंदी मीडिया जगत में परिवर्तन अवश्य आया है, परंतु अंग्रेजी मीडिया, शैक्षिक संस्थानों व सत्ता-प्रतिष्ठानों में वैचारिक असंतुलन अभी भी विद्यमान है। वहाँ अभी भी वामपंथ व औपनिवेशिक मानसिकता हावी है। वे बार-बार कहते थे कि इक्कीसवीं सदी की मुख्य लड़ाई ‘नैरेटिव्स’ के स्तर पर ही लड़ी जाएगी, जो इस लड़ाई को जीतेगा, वही अंततः समाज की दिशा तय करेगा। इसलिए वे युवाओं और कार्यकर्ताओं को पढ़ने-लिखने की आदत विकसित करने के लिए प्रेरित करते थे।

जनसंख्या के बदलते स्वरूप और उसके सामाजिक प्रभावों को लेकर भी वे अत्यंत गंभीर थे। इस विषय पर वे एक विस्तृत पुस्तक लिख रहे थे और इसके लिए उन्होंने सैकड़ों ग्रंथों का अध्ययन किया था। उनका चिंतन वायवीय नहीं, बल्कि यथार्थपरक और तथ्याधारित होता था। भारत के विभाजन की पीड़ा उनके लेखन और चिंतन में बार-बार प्रकट होती थी। वे इस बात से व्यथित थे कि समाज उस ऐतिहासिक एवं पीड़ादायक अनुभव एवं त्रासदी से अपेक्षित शिक्षाएँ नहीं ले पाया है। वे कहते थे कि यदि समाज अपने अतीत से सबक नहीं लेगा, तो भविष्य में भी वही गलतियाँ दोहराएगा। बदलती जनसंख्या संरचना, मतांतरण, घुसपैठ और जनसंख्या के आनुपातिक असंतुलन को वे गंभीर समस्या मानते थे और समाज को इसके प्रति जागरूक रहने का आग्रह करते थे। उनके अनुसार, आत्ममुग्धता या वास्तविकता से विमुख होना समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। इसलिए वे चाहते थे कि हिंदू-समाज सद्गुण-विकृति का शिकार न हो, बल्कि उससे यथाशीघ्र मुक्त हो।

आज जब बलबीर पुंज जी हमारे बीच नहीं हैं, तब यह अनुभूति और भी तीव्र हो उठती है कि राष्ट्र ने एक सजग, निर्भीक, सत्यदर्शी एवं राष्ट्रनिष्ठ वैचारिक प्रहरी खो दिया है। उनका जीवन हमें यह स्मरण कराता रहेगा कि ध्येय के प्रति अटूट निष्ठा और धर्म, संस्कृति एवं राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण ही जीवन को सच्ची सार्थकता प्रदान करते हैं। जिस दौर में हिंदुत्व, राष्ट्रीय विचारों और सनातन संस्कृति के अनुकूल लेखन करना सहज स्वीकार्य नहीं था, उस दौर में भी उन्होंने ध्येयनिष्ठा का मार्ग चुना, राष्ट्र का पक्ष चुना और जीवन-पर्यंत उसी पर अडिग रहे। निःसंदेह, उनकी स्मृतियाँ और उनका लेखन आने वाली पीढ़ियों को ध्येयनिष्ठा, साहस और राष्ट्रनिष्ठ चिंतन की प्रेरणा देता रहेगा।

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