जीवन के आठ वर्ष जेल में बिताये : हर जेल यात्रा में एक ग्रंथ तैयार

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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम विविधता से भरा है । क्राँतिकारी और अहिसंक आँदोलन के साथ अन्य धाराओं में एक ऐसी धारा भी रही जिसने प्रत्यक्ष आँदोलनों में सहभागिता के साथ ऐसी साहित्य रचना भी की जिसने जन सामान्य को झकझौरा और एक पूरी पीढ़ी को आँदोलन के लिये आगे आई । रामवृक्ष बेनीपुरी ऐसी ही प्रतिभा थे जिन्होंने सतत साहित्य रचना की और असहयोग आंदोलन से लेकर भारत छोड़ो आँदोलन तक हर संघर्ष में हिस्सा लिया और जेल गये ।

ऐसे ओजस्वी साहित्यकार और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म 23 दिसम्बर 1899 को बिहार प्राँत के मुज़फ़्फ़रपुर जिला अंतर्गत ग्राम बेनीपुरी में हुआ था । पिता फूलवंत सिंह जी एक साधारण किसान और माता तुलसी देवी साधारण गृहिणी थीं । इनके माता-पिता का देहांत बचपन में ही हो गया था। पालन पोषण मौसी ने किया था। मौसी का परिवार शिक्षा से जुड़ा था उन्होंने शिक्षा पर ध्यान दिया और आरंभिक शिक्षा केलिये बेनीपुर के स्थानीय विद्यालय में ही भर्ती कर दिया । आरंभिक शिक्षा के मैट्रिक करने ननिहाल पहुँचे । यह वह समय था जब देश में स्वाधीनता आँदोलन के मानो बादल घुमढ़ रहे थे । युवा रामवृक्ष भी दूर न रह सके और 1920 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में प्रारंभ हुए असहयोग आंदोलन से जुड़ गये । गिरफ्तार हुये जेल भेजे गये और जेल से लौटकर मुजफ्फर महाविद्यालय से आगे पढ़ाई की और हिंदी साहित्य से ‘विशारद ‘ की परीक्षा उत्तीर्ण की।

साहित्य और पत्रकारिता से उनकी रुचि बचपन से थी । वे किशोर वय से ही लेखन करते थे पर उनका लेखन ओजस्वी और समाज की कुरीतियों के निवारण संबंधी होता था इसलिए स्थानीय समाचार पत्रों में स्थान नहीं मिल पाता था । उन्होंने 1929 से पत्रकारिता आरंभ की ‘युवक’ नामक समाचारपत्र से जुड़ गये । वे इसके न केवल संपादक थे अपितु प्रकाशन में भी सहभागी थे । उन्होंने अपने नाम रामवृक्ष के आगे अपने गाँव का नाम बेनीपुरी जोड़ा और वे इसी नाम से प्रसिद्ध हुये । बेनीपुरी जी ने इस समाचार पत्र “युवक” के माध्यम से युवाओं में ब्रिटिश सरकार के अत्याचारों की ओर ध्यान खींचा तथ राष्ट्रवाद जगाने का अभियान छेड़ा। इसी बीच उनका संपर्क सुप्रसिद्ध समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण से बना 1931 में ‘समाजवादी दल’ की स्‍थापना हुई । इसके संस्थापकों में जयप्रकाश नारायण, फूलन प्रसाद वर्मा के साथ रामवृक्ष बेनीपुरी भी थे । उन्होंने समाज में कुरीतियों के विरुद्ध भी अनेक आँदोलन छेड़े। अपने लेखन और आदोलनों के चलते अनेक बार बंदी बनाये गये । विभिन्न आँदोलनों में उन्होंने अपने जीवन के कुल आठ वर्ष जेल में बिताये । लेकिन उन्होने अपनी जेल अवधि का उपयोग लिखने में किया । वे जब भी जेल से बाहर आते उनके हाथ में कोई नया ग्रंथ होता जो आगे चलकर साहित्य की अमर कृतियाँ बनीं।

उनकी गिरफ्तारी और रिहाई की एक घटना बहुत चर्चित रही । यह घटना 1942 के अंग्रेजो भारत छोड़ो आँदोलन की है । वे इस आँदोलन में जयप्रकाश नारायण जी के साथ गिरफ्तार हुये और हजारीबाग जेल में रखे गये । पर एक पूरे जत्थे ने भागने की योजना बनाई । रामवृक्ष जी इस योजना के सहभागी बने उनकी साहित्य प्रतिभा से जेल कर्मचारी प्रभावित थे ही । इसी का लाभ उठाकर जयप्रकाश नारायण जी, रामवृक्ष जी सहित पूरा जत्था जेल से भाग निकला । इस घटना की गूँज पूरे बिहार में हुई ।

रामवृक्ष जी महान् विचारक, चिन्तक, क्राँतिकारी, साहित्यकार और पत्रकार थे । उनकी हर रचना में देश प्रेम और समाज को विसंगतियों से मुक्ति का संदेश होता था । उनके दो प्रमुख उपन्यास “पतितों के देश में”और “आम्रपाली” बहुत मशहूर हुये तो “माटी की मूरतें” कहानी संग्रह तथा चिता के फूल, लाल तारा, कैदी की पत्नी, गेहूँ और गुलाब, जंजीरें और दीवारें

नाटक – सीता का मन, संघमित्रा, अमर ज्योति, तथागत, शकुंतला, रामराज्य, नेत्रदान, गाँवों के देवता, नया समाज, विजेता, बैजू मामा आदि आलेख आज साहित्य की अमर कृतियाँ हैं। इसमें “कैदी की पत्नि” रचना में उन्होने अपनी पत्नि रानी देवी की उस व्यथा का ही वर्णन किया । जब रामवृक्ष जी जेल जाते थे तब पत्नि की आँसू झरते थे । वही पीड़ा उस रचना में थी । उन्होंने उपन्यास, जीवनियाँ, कहानी संग्रह, संस्मरण आदि लगभग 80 साहित्यिक पुस्तकों की रचना की।

स्वतंत्रता संग्राम और साहित्य रचना के साथ वे सक्रिय राजनीति में भी आये । उन्होने जयप्रकाश नारायण जी कहने पर 1957 में हजारीबाग विधान सभा से चुनाव भी लड़ा और विजयी हुये । निरंतर संघर्ष और साहित्य रचना के साथ 9 सितम्बर 1968 को वे इस संसार से विदा हुये । उनके सम्मान में भारत सरकार ने वर्ष 1999 में ‘डाक टिकट जारी किया और बिहार सरकार ने ‘वार्षिक अखिल भारतीय रामवृक्ष बेनीपुरी पुरस्कार’ आरंभ किया ।

डांगे मर चुका है

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अमर गर्ग कलमदान

आज घर में किसी ने खाना नहीं बनाया क्योंकि जनता के लोकप्रिय नेता डांगे का निधन हो गया था। लोग उन्हें अपना जीवित भगवान मानते थे। पार्टी कार्यालय में उनके पार्थिव शरीर को देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी।

परिवार ने शव के दाह संस्कार के लिए सात मन लकड़ी मंगवाई थी, जिसमें कुछ चंदन की लकड़ी भी थी, लेकिन सोलह सदस्यीय समिति ने आदेश पारित किया कि कॉमरेड डांगे की मृत्यु अस्थायी है, वे कभी भी जीवित हो सकते हैं।

शव को समाधि की मुद्रा में एक बड़े रेफ्रिजरेटर में रख दिया गया। लोगों से कहा गया, “विज्ञान बहुत तरक्की कर रहा है, कॉमरेड डांगे कभी भी हमारे बीच वापिस आ सकते हैं, बस खुशखबरी का इंतज़ार करें।”

ए.जी. कार एक प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी माने जाते थे और विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रह चुके थे। उन्हें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों की पूरी समझ थी। बचपन अमृतसर में बीता होने के कारण, उनकी बंगाली, पंजाबी और अंग्रेजी पर अच्छी पकड़ थी।

डांगे ने उन्हें 16 सदस्यीय समिति में अतिरिक्त पर्यवेक्षक के रूप में नियुक्त किया था और टीवी पर राजनीतिक मुद्दों पर पार्टी की स्थिति का बचाव करने के लिए अक्सर पेश होते थे।

पार्टी के एक वफ़ादार सिपाही ए.जी.कार पार्टी के प्रति जनसमर्थन में भारी गिरावट से चिंतित थे, “एक ज़माने में पार्टी कार्यालय में जनता का मेला लगता था। आज पार्टी कार्यालय में गिने-चुने कार्यकर्ता ही आते हैं। पार्टी कार्यालय के बड़े आँगन में चबूतरे पर लगी लेनिन की मूर्ति हिल रही थी,”

क्योंकि चूहों ने जड़ों में छेद कर दिए थे। पार्टी के सारे दांव उल्टे पड़ने लगे। ए जी कार झूठ के बोझ तले अपनी आत्मा को और कष्ट नहीं देना चाहते थे। 16 सदस्यीय समिति के समक्ष पेश होते हुए उन्होंने कहा, “”अतीत में, हमने भारत को एक राष्ट्र नहीं माना, कभी ‘भारत मां की जय’ या ‘वंदे मातरम’ नहीं कहा, जबकि ये दोनों नारे कम्युनिस्टों के प्राथमिक नारे होने चाहिए थे, हमने हो ची मिन्ह, फिदेल कास्त्रो या माओ के राष्ट्रवाद से कुछ नहीं सीखा।

19 सितंबर 1942 के एक प्रस्ताव ने भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन की जड़ें एक झटके में उखाड़ दीं। यह वही प्रस्ताव था जो भारत के विभाजन और पाकिस्तान के निर्माण का समर्थन करता था। हम इतने मूर्ख हो गए थे कि अपनी ही माँ के विभाजन में भागीदार बन गए।

हम जिन्ना को एक क्रांतिकारी मानने लगे, जिनके हाथों हमारे अपने ही निर्दोष लोग मारे गए। जब हम इतिहास पर नज़र डालते हैं और देखते हैं कि 16 अगस्त 1946 को जिन्ना के प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस के आह्वान पर दो शीर्ष कम्युनिस्ट नेताओं जिन्ना के साथ बंगाल में मंच सांझा किया, देख कर मेरी आत्मा रो रही है ।

जिन्ना द्वारा (डायरेक्ट एक्शन डे) प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस के आह्वान के कारण बंगाल में दंगे भड़क उठे, जिनमें लगभग 6,000 हिंदू और मुसलमान मारे गए और लगभग 2 लाख महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। उसी दिन पाकिस्तान के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो गया था।

अब जबकि चीन के साथ युद्ध का प्रश्न उठ खड़ा हुआ है, हम अब पूरी पार्टी से देश के राष्ट्रीय पूंजीवाद के नेतृत्व में राष्ट्रवाद के साथ खड़े होने का आग्रह कर रहे हैं, जबकि हमने न केवल अपने कार्यकर्ताओं को राष्ट्रवाद पर लामबंद नही किया है, बल्कि राष्ट्रवाद को राष्ट्रीय पूंजीवाद का हथकंडा समझते रहे।

16 सदस्यीय समिति के सचिव प्रकाश चंद जोशी ने कहा, “कॉमरेड कार, आपने बंद कमरे में अपनी बात कह दी है, लेकिन कृपया इन विचारों को किसी अखबार में प्रकाशित न करना, इसी में आपकी भलाई है, अपना साथ बना रहेगा।”

हुआ भी वही, पार्टी टूट गई, टुकड़े के आगे टुकड़े हो गए। दफ्तर लूट लिए गए। जिसके हाथ जो लगा, वो ले गया। ए.जी कार फिर बोले, “जब हमने अपने कैडर को धरतीपुत्र नहीं बनाया, तो उम्मीद मत रखिए कि वो पार्टी के लिए सुपुत्र साबित होंगे ”

प्रकाश चंद जोशी ने कहा, “कॉमरेड कार जी, बताइए, ‘पार्टी को अब खड़ा करने के लिए कौन सी नीति अपनाई जाए?’ ए.जी. कार ने कहा, ‘सबसे पहले देश की जनता से अतीत में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगिए। पार्टी के कार्यक्रम को राष्ट्रवाद से जोड़िए।’ भारतीय राष्ट्रवाद विशुद्ध रूप से सांस्कृतिक और वैज्ञानिक है। यह पर्यावरण और संपूर्ण मानवता के लिए कल्याणकारी है। आप योग को देख सकते हैं, यह पूरी दुनिया को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ रहा है। आप कुंभ को देख सकते हैं, जहाँ देश की आधी आबादी पहुँचती है जो केवल सूर्य और नदी को प्रणाम करती है, जहाँ निराकार ईश्वर की कोई मान्यता नहीं है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए, कम्युनिस्ट पार्टी को अपने कार्यकर्ताओं के बीच दो मुख्य नारे बुलंद करने चाहिए, पहला: “भारत माता की जय” और दूसरा “वंदे मातरम”। यह सुनकर प्रकाश चंद जोशी बोले,”कॉमरेड कार, कम्युनिस्ट पार्टी इन नारों को स्वीकार नहीं कर सकती। अगर पार्टी इन नारों को स्वीकार कर लेती है, तो उसके कार्यक्रम का धर्मनिरपेक्ष ढाँचा नष्ट हो जाएगा। ये नारे सैद्धांतिक रूप से भी सही नहीं हैं।”

ए.जी.कार ने कहा, “आप धर्मनिरपेक्ष मंच से नहीं, बल्कि एक संप्रदाय के मंच से बोल रहे हैं। इन नारों का क्या मतलब है, यही ना, हे मातृभूमि तेरी जय हो, हम आपको प्रणाम करते हैं, ये शुद्ध मार्क्सवादी नारे हैं,”इनमें ईश्वर की कोई महिमा नहीं है। इसके विपरीत, इन नारों को नकारने वाले संप्रदायों का तर्क है कि वे किसी पत्थर या मिट्टी की जय नहीं कर सकते, वे तो केवल निराकार ईश्वर की जय करेंगे।

इसका मतलब है कि हम मार्क्सवाद के साथ नहीं, बल्कि पंथिक शक्तियों के आगे सिर झुकाते हैं। याद रखिए, जैसे किसान अपने बेटे को अपनी धरती का पुत्र बनाता है, वैसे ही यह धरती भी अपने पुत्र को वारिस बनाएगी। याद रखिए ‘वंदे मातरम’ का नारा बंगाल की धरती से उठा था, इस नीति पर चलते बंगाल भी ज्यादा दिन हमारे पास नहीं रहेगा, यह उनके पास चला जाएगा जो दिल से ‘वंदे मातरम’ कहेंगे।

कई साल बीत गए, कॉमरेड ए.जी. कार बूढ़े हो गए थे। प्रख्यात लेखक सरचांदपुरी उनसे मिलने आए। कहने लगे “कॉमरेड, हमें कश्मीरियों के आत्मनिर्णय के पक्ष में एक आंदोलन शुरू करना चाहिए।” भारत में पूंजीवादी सरकार ने कश्मीरियों का दमन किया है, हम इसे स्थाई शांति नहीं कह सकते।’ यह सुनकर ए.जी.कार क्रोधित हो गए, लेकिन यह मानते हुए कि बुद्धि के माध्यम से क्रोध को विचारों में बदलना सबसे अच्छा तरीका है, कहने लगे , पहले ये बताओ, भारत तो पहले ही तीन टुकड़ों में बँट चुका है, पार्टी आज भी इस विभाजन में अपनी निभाई भूमिका का कलंक झेल रही है। अपनी ही पार्टी, जिसे हमने अपने हाथों से बनाया है, अब और कितना डुबोएंगे? त्रिपुरा हार गए, बंगाल हार गए, अब सिर्फ़ केरल बचा है, अब ये भी आपकी कलम को चुभता है। बताइए, आप उस दिन मेरे पास क्यों नहीं आए जब कश्मीरी आतंकवादियों ने एक कश्मीरी पंडित महिला गिरजा टिक्कू को आरे से चीर डाला था। सरचचांदपुरी जी, आप स्वयं पंडित जाति से हैं, जिसने अतीत में ऐसे ग्रंथों की रचना की है, जिसके कारण आज तक इस भूमि पर एक सांझी संस्कृति बची हुई है।

अब आप भी आतंकवादियों के साथ खड़ रहे हो, बड़ी गिनती में कश्मीरियों का पलायन करने के बाद, बचे हुए, खौफ ज़दा को भी आरे से कटने के लिए माहौल बनाना चाहते हो। आत्मनिर्णय का नारा एक ढोंग है, पंडितों के विरुद्ध हिंसा का वातावरण बनाने के लिए। जबकि पंडित तो काश्मीर के मूल निवासी है। तुम्हारा खून सफ़ेद क्यों हो गया है? मेरी आत्मा चीख रही है, किन दुश्मनों के गल पड़ूं, तो नतीजा निकलता है, हम खुद अपनी ही पार्टी के दुश्मन हैं।आप मेरी हालत देख ही रहे हैं, पहले दफ्तर कितना बड़ा हुआ करता था, आज मैं जिस कमरे में बैठा हूं, उसमें बाथरूम तक नहीं है, अब आप ही बताइए, पार्टी को गुमराह करने में लेखकों या कलमकारों की क्या भूमिका है? यह सुनकर सरचांदपुरी कुछ नहीं बोले, और उठ कर चल दिए।

गुस्से को शांत करने के लिए ए.जी कार ने प्रकाश चंद जोशी को फोन मिलाया और कहने लगे, “कॉमरेड, पार्टी की स्थिति समझिए। डांगे मर चुका है। उसे अग्नि भेंट कर दीजिए। शायद नई पीढ़ी पार्टी में जान डाल दे।

संपर्क : अमर गर्ग कलमदान
7 ए/71, 50 फुटी रोड,( धूरी)
मोबाइल: 9814341746
amargargp@gmail.com

रामायण से प्रेरित है मारीसन

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ऋषभ कुमार

इसे साउथ सिनेमा का समय कहा जा सकता है। क्योंकि वहां नये-नये विषयों या फिर पुराने विषयों को लेकर नए और इनोवेटिव तरीकों से गड़ते हुए सिनेमा का निर्माण किया जा रहा है। इसी दौर में जब बॉलीवुड के बारे में यूट्यूबर शतीश राय अपने फेक पॉडकास्ट में सटायर करते हुए कहते हैं कि “बॉलीवुड एकदम ऑरिजनल रीमेक बनाता है” अब ऑरिजनल का तो पता नहीं पर रीमेक बनाने में तो बॉलीवुड का कोई मुकाबला ही नहीं है विश्व में कहीं से भी एक फिल्म उठाई और उसे बना दिया रिमेक यानी कॉपी पेस्ट की परंपरा को बॉलीवुड बहुत ही उम्दा तरीके से निभा रहा है। अब कोई ऑरिजिनल, अच्छी कहानी बॉलीवुड से क्यों नहीं निकल पा रही? उसके कारणों पर बात फिर कभी आज फिलहाल बात करते हैं तमिल में आयी फिल्म मारीसन( Maareesan) की।

इसका शीर्षक “मारीसन” रामायण से प्रेरित है जिसका अर्थ है मारीक्ष, मायावी या स्वर्ण मृग जो इस कहानी को बहुत ही सुन्दर तरीके से प्रस्तुत करता है पर ट्वीस्ट यह है कि यहां मारीक्ष सत्य के पक्ष से बैटिंग करता हुआ नज़र आता है।

कहानी की शुरुआत में एक चूहे को एक सिपाही पिंजड़े में बंद किए हुए पानी में डुबोकर मारने की कोशिश करता है पर पानी से निकलते ही वह चूहा भाग जाता है। इसके बाद एक चोर की कहानी में इंट्री होती है जो चोरी से अपना पेट पालता है इसका किरदार निभाया है ‘फहाद फासिल’ ने, जिन्हें आप पुष्पा फिल्म के एसपी भंवर सिंह के नाम से जानते हैं। जिसकी चोरी करते हुए एक बूढ़े व्यक्ति से मुलाकात होती है, उस बूढ़े व्यक्ति का किरदार निभाया है तमिल के जाने-माने कॉमिडियन एक्टर ‘वडिवेल्लु’ ने, अगर आप साउथकी फिल्में देखते हैं तो ये आपको बहुत सी पहले की फिल्मों में अपने ऊल-जलूल तरीकों से हंसाते दिख जाएंगे। वो जंजीर से बंधा हुआ है तो वह चोर को पैसों का लालच देता है कि उसे जंजीरों से आज़ाद कर दे। चोर मान भी जाता है पर एटीएम से पैसे निकालते हुए चोर उसके खाते में लाखों की रकम देखता है। यानी कि स्वर्ण मृग सामने है पर उसे पकड़ा कैसे जाए? पर समस्या यह है कि वह बूढ़ा व्यक्ति अल्जाइमर का रोगी है, वह अक्सर चीज़ें भूल‌ जाता है। अब फिल्म में पैसे हासिल करने के लिए बहुत ही मजेदार तिकड़म करते हुए फहाद फासिल दिखाई देते हैं।

अब इस कहानी में आप सोचेंगे कि हीरो फहाद फासिल होगा क्योंकि हमें बचपन से हीरो की यही परिभाषा सिखाई गई है पर अगर कहानी अच्छी हो तो हीरो कैसा भी और कोई भी हो सकता है। इस कहानी के हीरो की पत्नी अल्जाइमर से मर चुकी है पर उसने अपने पति से बच्चियों पर हुए अन्याय को न्याय में बदलने का वचन लिया था।

हमारे देश में “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः” की परंपरा रही है जो बताता है कि “जहाँ स्त्रियों का सम्मान और पूजा की जाती है, वहाँ देवता निवास करते हैं अर्थात जहाँ उनका सम्मान नहीं होता, वहाँ अच्छे कर्म भी व्यर्थ हो जाते हैं।” परंतु हमारे राष्ट्र की समस्या है कि आज भी रावण जैसे लोग बने हुए हैं जो किशोरियों के साथ अनाचार और अपहरण जैसे मामलों को अंजाम देते नजर आते हैं। NCRB का डेटा बताता है कि हर वर्ष करीब 80000 से 90000 हजार गुमशुदगी के मामले सामने आते हैं जिनमें से 75% अवयस्क लड़कियां होती हैं और इतना ही नहीं हर वर्ष NCRB की रिपोर्ट के अनुसार 2022 में 62095 POCSO के केश सामने आए थे जो 2017 के मुकाबले 90% ज्यादा हैं। (उसके बाद के आंकड़े उपलब्ध नहीं हुए हैं) तो बच्चियों के खिलाफ हो रहे इन भयावह अपराध के मुद्दे को फिल्म ने बड़ी खूबसूरती के साथ उठाया है। क्लाइमेक्स तक आप हीरो और अपराधी को नहीं पकड़ पाएंगे।

फिल्म को डायरेक्ट किया है सुधीष संकर ने अगर फिल्म के किरदारों के अभिनय की बात करें तो फहाद फासिल और वडिवेल्लु ने शानदार अभिनय किया है। बल्कि वडिवेल्लु का अभिनय कई जगह आपको चौंकाता है। फिल्म की डबिंग निराश करती है, जिसे औसत से नीचे का ही कहा जा सकता है इसकी वजह से फिल्म में डायलॉग का जादू जो चल सकता था डबिंग की वज़ह से ग़ायब दिखता है। साउथ सिनेमा को डबिंग पर काम करना चाहिए बल्कि अगर साऊथ की फिल्मों ने अच्छी डबिंग कर ली तो वह हिन्दी सिनेमा को खा जाएगा या फिर हिंदी सिनेमा सार्थक सुधार पर विवश हो जाएगा।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में शोधार्थी हैं)

पीटर नवारो का ‘टैरिफ तमाशा’ और X का सच का तीर

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दिल्ली। अरे वाह, पीटर नवारो, ट्रंप के ‘वफादार योद्धा’, फिर से भारत पर बरस पड़े! इस बार उनका ‘ज्ञान’ था कि भारत की ऊंची टैरिफ नीति अमेरिकी नौकरियों को खा रही है और रूस से तेल खरीदकर भारत ‘युद्ध मशीन’ को फंड कर रहा है। लेकिन जनाब, फैक्ट-चेकिंग ने उनके इस ‘महान दावे’ को ऐसा नंगा किया कि बेचारे नवारो का तमाशा बन गया!

नवारो का कहना है कि भारत रूस से तेल खरीदकर ‘मुनाफाखोरी’ कर रहा है, जिससे यूक्रेन में खून-खराबा हो रहा है। लेकिन फैक्ट चेकिंग के नोट ने तो साफ बता दिया कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए तेल खरीदता है, वो भी बिना किसी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध को तोड़े। और हां, नवारो जी, आपके अपने अमेरिका ने भी रूस से सामान आयात किया है, तो ये ‘पाखंड’ का तमगा पहले अपने गिरेबान में झांककर देख लीजिए!

नवारो का ‘ब्राह्मण मुनाफा’ वाला तंज तो और भी हास्यास्पद है। लगता है, हार्वर्ड की PhD में इतिहास और भूगोल छूट गया! भारत का तेल आयात 1% से 35% तक बढ़ा, लेकिन ये ऊर्जा जरूरतों और बाजार की सच्चाई का नतीजा है, न कि कोई ‘क्रेमलिन का लॉन्ड्रोमैट’। और टैरिफ? भारत हर साल 41.8 बिलियन डॉलर का अमेरिकी सामान खरीदता है, जिससे लाखों अमेरिकी नौकरियां चलती हैं।

नवारो जी, फैक्ट चेकिंग ने आपके झूठ को बेनकाब कर दिया। अब थोड़ा ‘सच’ का सामना कर लीजिए, या फिर ‘टैरिफ का महाराजा’ बनकर ट्रंप के तंबू में ही तालियां बटोरते रहिए।

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