जगतगुरु आद्य शंकराचार्य का जीवन एवं शिक्षा दर्शन

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गिरीश जोशी

श्रीनगर । शारदा पीठ कश्मीर स्थित भारतीय संस्कृति का अत्यंत महत्वपूर्ण एवं मुख्य केंद्र था, यहां पर मां सरस्वती का अत्यंत प्राचीन मंदिर हुआ करता था। इस मंदिर में एक सर्वज्ञ नामक पीठ था। इस पीठ पर आसीन होने के लिए व्यक्ति का सर्व शास्त्रों में पारंगत होना, पराविद्या का विशेषज्ञ होना तथा ब्रह्म ज्ञान में प्रतिष्ठित होना अनिवार्य था। इस पीठ पर आरूढ़ होने की अभिलाषा से आने वाले विद्वान को मंदिर के चारों मुख्य द्वारों पर बैठे हुए विभिन्न मत संप्रदायों के प्रकांड पंडितों से शास्त्रार्थ करना होता था। उन्हें अपने मत से सहमत करने के बाद ही मंदिर में प्रवेश की अनुमति मिला करती थी। इस शर्त के अलावा एक और महत्वपूर्ण शर्त थी। मंदिर में प्रवेश करने के बाद पीठ पर आरूढ़ होने के लिए मां शारदा स्वयं देववाणी से उस व्यक्ति के सर्वज्ञ होने की घोषणा किया करती थी। उसके बाद ही वह व्यक्ति शारदा पीठ पर विराजमान हो सकता था।

अनेक बार अनेक विद्वान दूर-दूर से इस पीठ पर आरूढ़ होने की अभिलाषा से आया करते। कोई शास्त्रार्थ में पराजित हो जाता तो किसी को मां शारदा का आशीर्वाद नहीं मिलता।

अपने शिष्यों के आग्रह पर आचार्य शंकर इस पीठ पर विराजित होने की अभिलाषा से कश्मीर पहुंचे। मंदिर के चारों द्वारों पर वैशेषिक, न्यायिक, सांख्य, मीमांसक, सौतांत्रिक, वैभाषिक, योगाचारी, माध्यमिक, जैन आदि मतों को मानने वाले विद्वान जमा थे,आचार्य का उन से शास्त्रार्थ आरंभ हुआ।
शास्त्रार्थ की कुछ बानगी यहाँ देखते हैं। गौतम मतावलंबी न्यायिक पंडितों ने पूछा कि कणाद और गौतम के मतों में मुक्ति के संदर्भ में क्या भेद हैं? आचार्य ने उत्तर दिया कणाद के मतानुसार आत्मा मुक्ति की अवस्था में विशेष गुण रहित होकर पुनरुत्पत्ति की संभावना से मुक्त होकर आकाश की तरह निसंग एवं निष्क्रिय भाव से विराजित होती है। वही गौतम के मतानुसार आत्मा मुक्त अवस्था में आनंद व सत्य से युक्त होकर स्थित रहती है।

अब सांख्यवादी आगे आए उन्होंने पूछा कि सांख्य मत के अनुसार मूल प्रकृति में विश्व प्रपंच का जो कारण तत्व है वह स्वतंत्र है या चिदात्मा पुरुष के अधीन है? आचार्य ने उत्तर दिया –त्रिगुणात्मक नामरूप की विशेषताओं वाली मूल प्रकृति कपिल के मतानुसार स्वतंत्र है।इसके द्वारा ही विश्व के प्रपंच का आविर्भाव होता है। यही स्वतंत्र मूल प्रकृति संसार के अस्तित्व का कारण है,लेकिन वेदांत के अनुसार मूल प्रकृति माया चैतन्य ब्रह्म के अधीन हैं।
दोनों पक्षों के मध्य अनेक क्लिष्ट विषयों पर शास्त्रार्थ चलता रहा। आचार्य के तर्क सुनकर सांख्यवादी भी संतुष्ट हुए।

अगली बारी बौद्धों की थी।उस समय बौद्ध धर्म के चार संप्रदाय थे माध्यमिक,योगाचार्य,सौतांत्रिक और वैभाषीक। बौद्ध विद्वानों ने पूछा हमारे चारों संप्रदाय में क्या भेद हैं? हमारे चारों मतों के साथ वेदांत किस प्रकार से अलग है? आचार्य ने उन्हें भी संतुष्ट किया। जैन भी संतुष्ट हुए। अंत में जैमिनी मतावलंबियों ने पूछा – जैमिनी के मतानुसार शब्द का क्या स्वरूप है शब्द धर्म है या गुण? आचार्य ने उत्तर दिया,“आप जानते हैं कि शब्द वर्णनात्मक है, वर्ण नित्य और व्यापक है,श्रवण इंद्रिय द्वारा जब शब्द की अनुभूति होती है तभी उसकी उत्पत्ति मानी जाती है इसलिए शब्द द्रव है गुण नहीं।”

आचार्य के तर्कों से संतुष्ट होकर विद्वानों ने मंदिर के द्वार खोल दिए।

मंदिर में प्रवेश कर आचार्य ने मां शारदा की स्तुति की – “सुवोक्षोजकुंभां सुधापूर्णकुंभां प्रसादवलंबामं प्रपुण्यांवलम्बाम।…. भजे शारदाम्बाम मजस्त्रमदाम्बाम।।”
यह अर्चना पूर्ण होते ही आकाशवाणी गूंजी – “वत्स शंकर मैं तुमसे प्रसन्न हूं। आज मैं, तुम्हें सर्वज्ञ की उपाधि से विभूषित करती हूं। तुम इस पीठ के योग्य अधिकारी हो। वत्स तुम मेरी इस सर्वज्ञ पीठ पर आरोहण करो।” आचार्य धीरे धीरे पीठ की ओर बढ़ने लगे, चारों ओर से आचार्य की जय जयकार गूंजने लगी। आज आचार्य वास्तविक रुप से इस दिन जगतगुरु हुए। हमारे देश में जगद्गुरु बनाने की यही पात्रता थी।

जगतगुरु आचार्य शंकर का दर्शन क्या था?

आचार्य शंकर वेदांत दर्शन के पुनःप्रवर्तक माने जाते हैं। वेदांत शब्द का अर्थ जानने के लिए इस शब्द की संधि विच्छेद करने पर वेद + अंत प्राप्त होता है। इसका अर्थ है – वेदों का अंतिम भाग। वेदांत दर्शन के दो मुख्य पक्ष हैं – पहला पक्ष सैद्धांतिक है जो बुद्धि प्रधान है जिसके द्वारा तर्कों के माध्यम से भ्रांतियों को दूर कर परम सत्य का बोध करवाया जाता है। वहीं दूसरे पक्ष में उस लक्ष्य की ओर संकेत किया जाता है जहां पहुंचकर परम शक्ति की अनुभूति होती है। इस हेतु अपनी बुद्धि एवं मन की सीमाओं का अतिक्रमण कर पार जाना होता है।

वेदांत के सिद्धांत अनुसार विश्व का सारा दृश्यमान प्रपंच जिसमें सभी पशु-पक्षी,मानव,देवी-देवता शामिल है, यह नाम एवं रूप वाला विश्व ब्रह्म के अलावा कुछ नहीं है। “सर्वं खल्विदं ब्रह्म”। जो कुछ भी इस संसार में दिखाई देता है, जो कुछ भी नाम रूप से संबोधित होता है वह सब ब्रह्म की सत्ता से ही संचालित होता है।

मनुष्य जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य परम सत्य की,ब्रह्मज्ञान की,ब्रह्म स्वरूप अथवा मुक्ति की प्राप्ति ही होता है सारे वेदों का अंतिम अभिप्राय यही है।
आचार्य ने जब अपने गुरु गोविंदपाद से शिक्षा पूर्ण की, तब गुरु ने आशीर्वाद दिया था कि तुम व्यास कृत ब्रह्म सूत्र पर भाष्य की रचना कर अद्वैत वेदांत को सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित करने, सर्वधर्म के ज्ञान को सार्वभौमिक अद्वैत ब्रह्म की परिधि में लाने में सफल रहोगे।गुरु आज्ञा से आचार्य काशी पहुंचे,यहां उन्हें आद्यशक्ति एवं भगवान शंकर से आगे के कार्य का मार्गदर्शन मिला। भगवान ने आशीर्वाद देते हुए कहा कि तुम्हारे द्वारा वैदिक धर्म की प्राण प्रतिष्ठा हो। तुम वेदांत की पूर्ण व्याख्या करो, भ्रमित मत वादों का खंडन करो, व्यास कृत ब्रह्मसूत्र भाष्य लिखकर वेदांत के मुख्य लक्ष्य ब्रह्म ज्ञान की पुनः प्रतिष्ठा करो।

भगवान वेदव्यास द्वारा रचित ब्रह्म सूत्र परम ज्ञान की प्राप्ति हेतु मानव के मन मस्तिष्क में जितने भी प्रश्न-जिज्ञासा हो सकती है उन सब का उत्तर देता है। यह ग्रंथ आध्यात्मिक क्षेत्र के साहित्य का सर्वोच्च ग्रंथ है।

गुरु एवं भगवान की आज्ञा का पालन करने आचार्य उत्तर में व्यास क्षेत्र पहुंचे। यहां अनेक दिनों तक गंभीरतापूर्वक ध्यान कर ब्रह्म सूत्र पर भाष्य लिखना आरंभ किया। आचार्य प्रत्येक सूत्र का वाचन करते फिर अपने शिष्यों के साथ उस सूत्र का ध्यान करते। ध्यान में प्राप्त संकेतों के आधार पर प्रत्येक सूत्र का भावार्थ जानकर भाष्य की रचना करते। ब्रह्म सूत्र के लेखन के साथ-साथ आचार्य ने ब्रह्म सूत्र की शिक्षा अपने शिष्यों को देना प्रारंभ किया। इसी अवधि में आचार्य ने ब्रह्मसूत्र के भाष्य के साथ द्वादश उपनिषद, भगवत गीता जिन्हें प्रस्थानत्रयी कहा जाता है के साथ लगभग 16 ग्रंथों के भाष्य की रचना की। आचार्य ने मात्र 4 वर्ष की अवधि में यह कार्य पूर्ण किया। ऐसा कहा जाता है कि ब्रह्मसूत्र का भाष्य पूरा होने पर भगवान वेदव्यास स्वयं आचार्य से भेंट करने आए और प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया कि तुम विभिन्न वादों प्रतिवादों के सिद्धांतों को वेदांत मत से सहमत कर सारे मत वालों को पूर्ण करने का कार्य प्रारंभ करो। वेदांत की महिमा के साथ ब्रह्म तत्व के विज्ञान की पुनः प्रतिष्ठा करें।

वेद, उपनिषद आदि शास्त्रों में ज्ञान के सिद्धांत एवं उसे जानने की प्रक्रिया समझाई गई है। शास्त्रों में वर्णित ज्ञान के भावार्थ को समझाने के लिए उनके भीतर प्रयुक्त किए गए हैं, शब्दों एवं परिभाषाओं की व्याख्या करने के लिए जो ग्रंथ रचे जाते हैं उन्हें प्रकरण ग्रंथ कहा जाता है। आचार्य ने ‘आत्मबोध’ के अलावा ‘तत्वबोध’, ‘पंचदशी’, ’विवेक चूड़ामणि’ जैसे ग्रंथों की रचना की ताकि शास्त्रों की समय सापेक्ष सटीक व्याख्या की जा सके।

आत्मबोध के 68 श्लोकों में आचार्य ने कलिष्ट सिद्धांतों को समझाने के लिए दृष्टांतों का उपयोग किया है। प्रत्येक श्लोक एक प्रभावशाली चित्र के समान हमारे समक्ष प्रकट होता है। वेदांत के कठिन प्रतीत होने वाले सिद्धांतों को सरलता से समझाने के लिए आचार्य ने उपमाओ का प्रयोग किया है।

आचार्य अन्य मतावलमबियों को अपने मत से सहमत करवाने के लिए शास्त्रार्थ की पद्धति का उपयोग किया करते थे। जो विद्वान उनके समक्ष अपने मत की महत्ता एवं केवल उनके मत की अधिमान्यता को स्वीकार करने के आग्रह से प्रस्तुत होते थे, आचार्य उनके मत को पूरा सम्मान पूर्वक सुना करते, उसके बाद उस मत की पूर्णता के लिए वेदांत की आवश्यकता प्रतिपादित कर उन्हें पूर्ण रूप से सहमत कर लिया करते थे।

आचार्य ने कोई नया पंथ, संप्रदाय अथवा मत स्थापित नहीं किया। उन्होंने तो प्राचीन वैदिक सनातन ज्ञान को ही तत्कालीन एवं भविष्य की आवश्यकता के अनुसार उनकी समझ स्पष्ट करने तथा समाज को बाकी सभी प्रकार के मतवादों से उपजे संघर्षों से उबार कर मूल जान पर, वास्तविक लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास किया है।

जगतगुरु आद्य शंकराचार्य का शिक्षा दर्शन

भगवान वेदव्यास द्वारा रचित ब्रह्मसूत्र परम ज्ञान की प्राप्ति हेतु मानव के मन मस्तिष्क में जितने भी प्रश्न-जिज्ञासा हो सकती है उन सबका उत्तर देता है। यह ग्रंथ आध्यात्मिक क्षेत्र के साहित्य का सर्वोच्च ग्रंथ है। ऐसा कहा जाता है कि ब्रह्मसूत्र का भाष्य पूरा होने पर भगवान वेदव्यास स्वयं आचार्य शंकराचार्य से भेंट करने आए और प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया कि तुम विभिन्न वादों-प्रतिवादों के सिद्धांतों को वेदांत मत से सहमत कर सारे मत वालों को पूर्ण करने का कार्य प्रारंभ करो। वेदांत की महिमा के साथ ब्रह्म तत्व के विज्ञान की पुनः प्रतिष्ठा करें।

महर्षि वेदव्यास के आशीर्वाद में ही आचार्य शंकर की शिक्षाओं का सार निहित है।
आचार्य की शिक्षा पद्धति को जानने के लिए उनके द्वारा रचित ग्रंथों से संदर्भ लेकर आगे बढ़ते है। आचार्य रचित ‘आत्मबोध’ के अनुसार जिस प्रकार किसी विषय विशेष का अध्ययन करने के पूर्व उस विषय के विशिष्ट शब्दों की परिभाषा जानना आवश्यक होता है। ऐसे पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या समझ लेने से विषय प्रवेश सहज हो जाता है। वेदांत जीवन के विज्ञान का विषय है जो मनुष्य जीवन के वास्तविक लक्ष्य की ओर ध्यान आकृष्ट करता है, ऐसे उपाय एवं योजना बताता है जिससे साधक अपनी जीवन यात्रा सहज रूप से आगे बढ़ाते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकें। आचार्य रचित ‘आत्मबोध’ वह कुंजी है जिनसे शास्त्रों को खोलकर उनमें निहित दिव्य ज्ञान को बाहर निकाला जा सकता है। ‘आत्मबोध’ वेदांत के परिभाषिक शब्दों की विशद व्याख्या करता है।
आत्मबोध के 68 श्लोकों में आचार्य ने कलिष्ट सिद्धांतों को समझाने के लिए दृष्टांतों का उपयोग किया है। प्रत्येक श्लोक एक प्रभावशाली चित्र के समान हमारे समक्ष प्रकट होता है। वेदांत के कठिन प्रतीत होने वाले सिद्धांतों को सरलता से समझाने के लिए आचार्य ने उपमाओ का प्रयोग किया है।
आत्मबोध के श्लोक-2 में आचार्य कहते हैं –

“बोधोS न्य साधनेभ्यो हि साक्शांमोक्षेक साधनं।
पाकस्य वन्हिवज्ज्ञानं विना मोक्षो न सिध्यति ।।”
अर्थात जैसे बिना अग्नि भोजन नहीं कर सकता वैसे ही बिना ज्ञान के मोक्ष नहीं मिलता। साधनों की तुलना में आत्मज्ञान मोक्ष का सर्वोच्च साधन हैं।
श्लोक-3 में आचार्य कहते हैं –

“अविरोधितया कर्म नाSविद्यां विनिवर्तयेत।
विद्याविद्याम निहंत्येव तेजस्तिमिरसंघवत।।”

अर्थात कोई कर्म अज्ञान का नाश नहीं कर सकता क्योंकि कर्म अज्ञान का विरोधी नहीं है।

प्रकाश का एक छोटा सा दीपक घनघोर अंधेरे को दूर करता है। वैसे ही अज्ञान का नाश ज्ञान से ही होता है।
वेदांत के विषय का प्रतिपादन करने हेतु आचार्य द्वारा रची गई अनेक रचनाओं में से एक उत्कृष्ट कृति है “विवेक चूड़ामणि”। चूड़ामणि वह अलंकार होता है जिसे मस्तक पर शीर्ष पर धारण किया जाता है। आचार्य द्वारा रचित यह ग्रंथ विवेक का मुकुट मणि है। इस ग्रंथ में 581 श्लोक हैं। इस ग्रंथ के माध्यम से आचार्य ने अनेक विषयों को स्पष्ट किया है। शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत शिक्षकों-विद्यार्थियों के लिए कुछ विषय जैसे ज्ञान उपलब्धि के उपाय, गुरु सपसत्ति और प्रश्न विधि, शिष्य-प्रश्न निरूपण, प्रश्न विचार आदि महत्वपूर्ण है।
सामान्यतः शिक्षकों को इन विषयों के संबंध में एक आरंभिक ज्ञान प्रशिक्षण के दौरान एवं अपने अनुभव से मिलता है किंतु आचार्य ने विवेक चूड़ामणि में परम ज्ञान को प्राप्त करने के लिए जिस प्रकार से इन विषयों का विशद वर्णन किया है उनका अध्ययन एवं अनुपालन कर कोई भी शिक्षक किसी भी विषय के शिक्षण में आने वाली चुनौतियों का सामना अत्यंत सफलतापूर्वक कर सकता है।
आचार्य शिष्यों को संबोधित करते हुए कहते हैं –

“अतोविचारः कर्तव्यों जिज्ञासोरात्मवस्तुतः।
समासाद्य दयासिंधुम गुरम ब्रम्हविदुत्तमम।।”
श्लोक15 – विवेक चूड़ामणि
भावार्थ है सच्चे ज्ञान पिपासु जिज्ञासु को योग्य गुरु की शरण में जाकर उनसे आत्मा विचार एवं चिंतन करना सीखना चाहिए। वास्तव में देखा जाए तो शिष्यों को संबोधित यह श्लोक शिक्षकों का भी प्रबोधन करता है। यदि शिष्य ‘आत्मविचार एवं चिंतन कैसे करें’ यह सीखने के लिए गुरु के पास आता है तो गुरु को भी इन दोनों विधाओं में पारंगत होकर यह कुशलता विद्यार्थियों में विकसित करने की क्षमता स्वयं के भीतर विकसित करनी होगी। सही अर्थ में देखा जाए तो यही शिक्षा का उद्देश्य भी है।

आगे आचार्य कहते हैं –
“मन्दमध्यमरूपापि वैराग्येण शमादिना।
प्रसादेन गुरो: सेयं प्रवृद्धा सुयते फलं।।”

यदि विद्यार्थी मंद अथवा औसत हो तो यदि गुरु प्रयास करके शिष्यों को शम आदि षटसंपत्ति से युक्त करें तो मंद अथवा आवश्यक विद्यार्थी भी तीव्र हो जाता है।
आचार्य के अनुसार परम ज्ञान को प्राप्त करने के लिए अपने विवेक को विकसित करना होता है। विवेक को विकसित करने के लिए मुमुक्षु अर्थात ज्ञान प्राप्ति हेतु इच्छुक विद्यार्थी को साधन चतुष्ट्य से संपन्न होना चाहिए। आचार्य कहते है –

“साधन चतुष्ट्यमं किंम? नित्या नित्य वस्तु विवेक: यहां मूत्रार्थफलभोग विराग: शमादि षटसम्पत्ति मुमुक्षत्वम चेति:।”

आचार्य के अनुसार चार ऐसे गुण है जिनको आत्मसात करने पर हमारा विवेक विकसित होता है।

नित्य-अनित्य वस्तु का विवेक – इस बात को यहाँ हम लौकिक या व्यवहारिक ज्ञान के परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास करते है। विद्यार्थी जिस भी विषय का ज्ञान अर्जित करना चाहता है उसे अध्ययन अवधि में इस बात का विचार मन में सदैव रखना चाहिए कि कौन सी बात कार्य या विचार मेरे ज्ञान प्राप्ति में सहायक है और कौन सी बातें अवरोधक है। सहायक बातों का अनुराग रखते हुए निरर्थक बातों का त्याग कर देना चाहिए।

कर्मों के फलभोग से विरक्ति – विद्यार्थियों को ज्ञान अर्जन का यथाशक्ति सम्पूर्ण प्रयास करना चाहिए। लक्ष्य सामने रखना ही चाहिये किंतु उस लक्ष्य को पाने का दुराग्रह मन में नहीं रखना चाहिए। आग्रह प्रेरक होता है, दुराग्रह से मन का बोझ बढ़ता है। दुराग्रह अधिक होने से यदि अनुकूल परिणाम नहीं मिलते तो विद्यार्थी निराशा के दुष्प्रभाव में पड़ कर किसी भी सीमा तक चले जाने को प्रवृत्त हो जाता है।

शम आदि षटसंपत्ति – शम, दम, उपरिति, तितिक्षा, श्रद्धा, और समाधान इस प्रकार की छः संपत्तियां हैं।

शम – इसका का अर्थ होता है अपने मन का निग्रह अर्थात मन पर नियंत्रण। हमारे मन को यहां वहां भटकने का अभ्यास होता है, उसे भटकने के लिए नहीं छोड़ना चाहिए। हमने अपना जो लक्ष्य तय करके रखा है, जिस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए हम प्रयासरत हैं उस ज्ञान को पाने के लिए अपने मन को केंद्रित करना चाहिये ताकि हमें ज्ञान प्राप्ति हेतु सभी आयामों से सहायता मिल सके।

दम – इस का अर्थ है अपनी इंद्रियों पर आधिपत्य प्राप्त करना। इंद्रियों का निग्रह इस प्रकार से करना कि वह हमारे लक्ष्य के अनुकूल विषयों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित हो एवं उसके लिए किए जाने वाले प्रयासों को यथासंभव सहयोग करे।

उपरिती – इसका का अर्थ है अपने धर्म का पालन करना। यहां धर्म से तात्पर्य शिक्षकों के लिए शिक्षक के धर्म एवं विद्यार्थियों के लिए विद्यार्थी धर्म से है। यानि अपने शिक्षक के कर्तव्य अथवा विद्यार्थी के कर्तव्य का प्राणपन से निष्पादन करना, नवीन विचारों नवीन प्रणालियों, नवीन साधनों का अनुसंधान करना जिससे विद्यार्थी अध्ययन में रुचि ले एवं ज्ञान प्राप्ति का मार्ग उनके लिए सरल हो सके।

तितिक्षा – इसका अर्थ है प्रत्येक प्रकार की आंतरिक एवं बाहरी प्रतिकूलताओं को सहन करने की शक्ति। जिस समाज जीवन में हम जीवन यापन करते हैं यहां पर अनेक प्रकार की प्रतिकूलताओं का सामना हमें दैनंदिन जीवन में करना पड़ता है। यदि हमारे भीतर इन प्रतिकुलताओं को सहन करने की शक्ति नहीं होगी तो हम अपने मार्ग से भटक सकते हैं। हमारा ज्ञान अर्जन का प्रयास प्रभावित हो सकता है। आचार्य ने प्रतिकूलता के संबंध में अपनी सहनशीलता को बढ़ाने का आग्रह किया है। आचार्य के जीवन में भी अगर हम देखें तो उन्हें अनेक प्रकार की प्रतिकुलताओं का सामना करना पड़ा लेकिन उसके बाद वे अपने लक्ष्य से कभी नहीं डिगे।

श्रद्धा – परमसत्ता में अखंड विश्वास का नाम श्रद्धा हैं । पहले शास्त्र, गुरु फिर साधना में श्रद्धा होती हैं, उससे आत्म- श्रद्धा बढती हैं। आत्म-स्वरूप में पूर्ण श्रद्धा होने पर उस निर्गुण,निराकार, परमसत्य ब्रह्म में बुध्दी स्थिर होती है ।

समाधान – यहां समाधान से तात्पर्य चित्त की एकाग्रता से है। शिक्षकों एवं विद्यार्थियों को अपने चित्र की एकाग्रता पर ध्यान केंद्रित करना अत्यंत आवश्यक होता है। शिक्षा देने एवं शिक्षा ग्रहण करने दोनों प्रक्रियाओं के लिए चित्त का एकाग्र होना अति आवश्यक है।

आचार्य के अनुसार चौथा गुण भी अत्यंत महत्वपूर्ण है ।

मुमुक्षत्व – ज्ञानार्जन के लक्ष्य को प्राप्त करने की अभिलाषा एवं अचल निष्ठा। यदि शिक्षक विद्यार्थी के ज्ञानार्जन की अभिलाषा जागृत कर देते हैं तथा ज्ञान के प्रति विद्यार्थियों के मन में अचल निष्ठा की स्थापना कर देते हैं तो शिक्षण कार्य सहज हो जाता है।

आचार्य शंकर ने चार गुणों एवं छह संपत्तियों से विद्यार्थियों को युक्त करने के लिए गुरुओं से आग्रह किया है। आचार्य द्वारा प्रतिपादित वेदांत दर्शन की शिक्षा तथा लौकिक जगत की शिक्षा प्रदान करने का शास्त्रों में वर्णित उपाय आचार्य ने पुनर्स्थापित किया है।

आचार्य अन्य मतावलमबियों को अपने मत से सहमत करवाने के लिए शास्त्रार्थ की पद्धति का उपयोग किया करते थे। जो विद्वान उनके समक्ष अपने मत की महत्ता एवं केवल उनके मत की अधिमान्यता को स्वीकार करने के आग्रह से प्रस्तुत होते थे, आचार्य उनके मत को पूरा सम्मान पूर्वक सुना करते, उसके बाद उस मत की पूर्णता के लिए वेदांत की आवश्यकता प्रतिपादित कर उन्हें पूर्ण रूप से सहमत कर लिया करते थे।

आचार्य शंकर परम ज्ञान की प्राप्ति के लिए जिन सिद्धांतों एवं प्रक्रियाओं को अपनाने का आग्रह करते हैं उनका पालन कर हम अपने लक्ष्य को सहजता से प्राप्त कर सकते हैं।

(लेखक संस्कृति अध्येता एवं स्तंभकार हैं)

भारतीय ज्ञान परम्परा, शिक्षा, समाज व्यवस्था और सांस्कृतिक चिंतन पर हुआ गंभीर विमर्श

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नई दिल्ली। इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए), नई दिल्ली के भारत विद्या प्रयोजना विभाग द्वारा समवेत सभागार में श्री आशीष गुप्ता द्वारा संपादित ‘श्री रविन्द्र शर्मा गुरुजी समग्र’ के लोकार्पण एवं विमर्श का आयोजन किया गया। इस एकदिवसीय कार्यक्रम में विद्वानों, शिक्षाविदों, शोधार्थियों तथा संस्कृति-जगत से जुड़े अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने सहभागिता की।

कार्यक्रम के समापन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए प्रख्यात विचारक श्री सुरेश सोनी ने कहा, “हमारे यहां पर कहा गया कि तीन स्तर पर जीवन चलता है हमारा। एक अनुभूति का धरातल रहता है, दूसरा विचार का धरातल रहता है और तीसरा व्यवहार का धरातल रहता है। और फिर हमारे यहां तीनों में कोई भेद नहीं है। जो अनुभूति में है, वही विचार में व्यक्त है और जो विचार में है, वो व्यवहार में व्यक्त है। और गुरुजी उसे व्यवहार के अंदर बता रहे हैं। वो जो व्यवहार में बता रहे हैं, वो हमारे विचारों में भी व्यक्त है और वो हमारे पूर्वजों की अनुभूतियों में भी व्यक्त है। यह निरंतरता में है।”

जीवन में विज्ञान और दूसरे पक्षों पर बात करते हुए उन्होंने कहा, “जीवन समग्रता में है और विज्ञान एक पहलू है उसका। कला-संगीत अगर उसके साथ नहीं है, तो उसमें अधूरापन है।” रवींद्र शर्मा ‘गुरुजी’ को उद्धृत करते श्री सुरेश सोनी ने कहा, “गुरुजी दो वाक्य कहा करते थे कि छोटी टेकनोलॉजी मालिक बढ़ाती है समाज में और बड़ी टेकनोलॉजी नौकर बढ़ाती है- यह पहला वाक्य था उनका। दूसरा था, छोटी टेकनोलॉजी को समाज व्यवस्थित करता है। बड़ी टेकनोलॉजी समाज को व्यवस्थित करती है। मेरे ब्रांड में आओ, मेरे डिजाइन के अंदर आओ, मेरे मॉडल के अंदर तुम सामंजस्य बढ़ाओ। वो मालिक हो जाता है।”

उन्होंने कहा, गुरुजी ने जो बातें कही हैं, वो केवल शब्द नहीं है, केवल बौद्धिक व्यायाम नहीं हैं, वो एक जीता जागता एक अनुभूत जीवन है। यह जो उनका समग्र वाङ्मय बना है, इसका प्रचार-प्रसार हो और हम सब मिलकर इसको अधिक से अधिक आगे बढ़ा सकें, इसके लिए परमात्मा हमको सामर्थ्य दे।

अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा, “विचार की दृष्टि से, चिंतन की दृष्टि से जब हम भारतीय ज्ञान परम्परा की बात कहते हैं तो इसक संदर्भ सिर्फ पाठ्यक्रमों तक सीमित न रहकर जीवन में कैसे उतर सकता है, यह गुरुजी का पूरा वाङमय और गुरुजी का जीवन दर्शन बताता है। आने वाले समय में निश्चित तौर पर इसकी बहुत अधिक आवश्यकता भी है, क्योंकि जैसे-जैसे पूरे विश्व में चुनौतियां बढ़ती चली जा रही हैं, वैसे-वैसे हमें सबको यह आभास होने लगा है कि जो हमारी भारत की पारम्परिक जीवनशैली है, जिसमें आपका प्रकृति से तादात्म्य होता है और इसीलिए जो प्रकृति प्रदत्त अनुशासन है, जो हमें हमारे जीवन का मार्ग दिखाता है, वही आने वाले समय में न सिर्फ भारत को बल्कि संपूर्ण विश्व को राह दिखाने वाला है। अगर इस संदर्भ में गुरुजी का वाङमय, गुरुजी का विचार दर्शन कहीं सहायता करता है तो हमें उसकी सहायता निश्चित तौर पर लेनी चाहिए।” आईजीएनसीए के कलाकोश के विभागाध्यक्ष और भारत विद्या प्रयोजना के निदेशक प्रो. (डॉ.) सुधीर लाल ने पूरे दिन के विमर्श का सार प्रस्तुत किया।

इससे पूर्व, उद्घाटन सत्र में प्रो. (डॉ.) सुधीर लाल ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की। उद्घाटन सत्र में जहां श्री रविन्द्र शर्मा ‘गुरुजी’ के जीवन, कार्यों और विरासत पर आधारित डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘क्रांतदर्शी गुरुजी’ के टीजर लॉन्च किया गया, वहीं इस एकदिवसीय आयोजन का समापन इसी राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता डॉक्यूमेंट्री फिल्म के प्रदर्शन के साथ हुआ।

जीविका आश्रम के श्री आशीष गुप्ता ने संपादकीय वक्तव्य देते हुए गुरुजी के चिंतन की समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। मुख्य अतिथि गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति प्रो. राणा प्रताप सिंह तथा विशिष्ट अतिथि केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने अपने उद्बोधनों में भारतीय चिंतन पर आधारित शिक्षा मॉडल, स्वदेशी ज्ञान-विज्ञान और सांस्कृतिक स्वाभिमान के महत्व को रेखांकित किया।

इस अवसर पर ‘भारत गाथा’ एवं ‘भारत कथा’ शृंखला के 15 खंडों का औपचारिक लोकार्पण मंचासीन अतिथियों ने किया। उद्घाटन सत्र के उपरांत आयोजित कार्यशाला के प्रथम सत्र ‘भारत गाथा’ में श्री रविन्द्र शर्मा गुरुजी के विचारों पर आधारित वीडियो प्रस्तुति दिखाई गई। इसके बाद ‘शिक्षाविधि, प्रौद्योगिकी, घर-व्यवस्था’ विषय पर गांधी आश्रम, नई दिल्ली के श्री लक्ष्मी दास ने अपने विचार रखे। आईआईटी दिल्ली के प्रो. विजय चेरीयार ने भारतीय ज्ञान प्रणाली, डिजाइन, कला और समाज व्यवस्था के अंतर्संबंधों पर विस्तार से चर्चा की। वहीं एलबीएसएनएसयू, दिल्ली के कुलसचिव प्रो. पवन कुमार शर्मा ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था और भारतीय समाज व्यवस्था के आधारभूत तत्त्वों पर अपना व्याख्यान दिया।

द्वितीय सत्र ‘भारत कथा’ में पुनः गुरुजी के विचारों की वीडियो प्रस्तुति के साथ चर्चा प्रारम्भ हुई। जीविका आश्रम के श्री आशीष गुप्ता ने ‘मसूरी संवाद’ और ‘विजयनगर संवाद’ पर अपने विचार रखे। सेवा इंटरनेशनल के डॉ. आर.के. अनिल ने ‘आदिलाबाद संवाद’ विषय पर प्रस्तुति दी। इस सत्र की अध्यक्षीय टिप्पणी जामिया मिलिया इस्लामिया के कुलसचिव प्रो. मोहम्मद महताब आलम रिज़वी ने दी।

दिनभर चले इस आयोजन में भारतीय ज्ञान परम्परा, शिक्षा-दर्शन, समाज व्यवस्था, ग्राम्य जीवन, तकनीक, स्वदेशी दृष्टि और सांस्कृतिक पुनर्जागरण जैसे विषयों पर सारगर्भित चर्चा हुई।

चंडीपुर में अमित शाह की हुंकार बनाम उत्तम बारीक का ‘100 दिन’ का संकल्प, आखिर कौन मारेगा बाजी!

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नैवेद्य पुरोहित

कोलकाता। पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले में 21 अप्रैल की दोपहर चंडीपुर विधानसभा के ‘बिनयकृष्ण स्मृति फुटबॉल मैदान’ में राजनीति का एक नया अध्याय लिखा गया। देश के गृहमंत्री अमित शाह की विशाल जनसभा में उमड़े अपार जनसमर्थन ने चंडीपुर विधानसभा के चुनावी मुकाबले को ‘हाई-वोल्टेज’ बना दिया है। जहां एक ओर भ्रष्टाचार पर तीखे प्रहार हुए, वहीं दूसरी ओर स्थानीय समस्याओं की ज़मीनी हकीकत ने इस चुनाव को और भी पेचीदा कर दिया है।

भ्रष्टाचार पर शाह का वार, ‘पाई-पाई वसूलेंगे’

गृहमंत्री ने मंच से सीधे तौर पर ममता सरकार की घेराबंदी की। उन्होंने दहाड़ते हुए कहा, “जिस सरकार ने मां, माटी, मानुष के नाम पर सत्ता पाई थी उसने आज केवल बालू माफिया, जमीन माफिया और रिज़ॉर्ट माफिया को संरक्षण देने का काम किया है। मैं चंडीपुर की जनता को भरोसा दिलाता हूँ कि बंगाल में भाजपा सरकार बनते ही एक-एक भ्रष्टाचारी को पाताल से ढूंढ निकालेंगे और जनता की लूटी हुई पाई-पाई वसूली जाएगी।”
उत्तम बारीक का पलटवार, “100 दिन में समाधान का वादा”

इस लहर के बीच चंडीपुर से टीएमसी प्रत्याशी और पटाशपुर के विधायक उत्तम बारीक अपनी जीत को लेकर आश्वस्त दिखे। हमारी विशेष बातचीत में उन्होंने क्षेत्र की समस्याओं को स्वीकारते हुए एक बड़ा विज़न सामने रखा। उन्होंने कहा, “मैं जीतने के 100 दिनों के भीतर चंडीपुर में वॉटर ड्रेनेज की समस्या का स्थाई समाधान कर दूँगा।”

पलायन का दर्द और गंदगी का अंबार

जब मैंने मेचेदा रेलवे स्टेशन से चंडीपुर जाने वाली बस में यात्रियों से स्थानीय लोगों से बात की तो हकीकत अमित शाह के दावों और उत्तम बारीक के वादों के बीच कहीं फंसी नजर आई। नौजवानों की मजबूरी दिखी जहां एक स्थानीय युवक ने आँखों में मायूसी लिए बताया, “भले ही यहाँ स्कूल-कॉलेज खुल गए हों, लेकिन हाथ में काम नहीं है। डिग्री लेकर भी हमें दूसरी जगह पलायन करना पड़ता है।” क्षेत्र में घूमने पर हर तरफ फैली गंदगी की समस्या स्पष्ट दिखी। लोगों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि सालों से बुनियादी सुविधाओं की अनदेखी की गई है।
क्या काम आएगा ‘कांथी’ का फैक्टर?

कांथी लोकसभा के अंतर्गत आने वाले चंडीपुर में सौमेंदु अधिकारी की हालिया जीत ने भाजपा के पक्ष में माहौल बनाया है। भाजपा प्रत्याशी डॉ. पीयूष कांति दास को उम्मीद है कि अमित शाह की इस रैली के बाद ‘परिवर्तन की लहर’ वोट में तब्दील होगी। वहीं उत्तम बारीक अपने विधायक अनुभव और 100 दिनों के ‘एक्शन प्लान’ के सहारे इस लहर को रोकने की कोशिश कर रहे हैं।

चंडीपुर का मुकाबला अब भ्रष्टाचार बनाम स्थानीय विकास की जंग में बदल गया है। क्या जनता माफिया राज के खिलाफ शाह के गुस्से के साथ जाएगी, या फिर उत्तम बारीक के 100 दिनों के वादे पर भरोसा करेगी? इसका फैसला चंडीपुर का वह मतदाता करेगा जो फिलहाल पलायन और जलजमाव सहित हर तरफ से मार झेल रहा है।

कानून को धता बताने की कोशिश नाकाम, सीकर में निषेधाज्ञा से रोका गया दो बहनों का बाल विवाह

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जयपुर । राजस्थान के सीकर जिले के श्रीमाधोपुर में कानून को धता बताकर गुपचुप तरीके से दो बहनों के बाल विवाह को अदालती आदेशों के जरिए रोक दिया गया। जिले में यह पहला मामला है जब बाल विवाह रोकने के लिए अदालत ने निषेधाज्ञा (Injunction Order) जारी की। बाल विवाह की रोकथाम के लिए काम कर रहे नागरिक समाज संगठन गायत्री सेवा संस्थान को अपने एक सदस्य के जरिए सूचना मिली थी कि दो बहनों के बाल विवाह की तैयारी की जा रही है। इस पर त्वरित कार्रवाई करते हुए गायत्री सेवा संस्थान, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण एवं श्रीमाधोपुर थाना पुलिस की संयुक्त टीम मौके पर पहुंची। बच्चियों के परिजनों को बाल विवाह के कानूनी पहलुओं की जानकारी देते हुए उन्हें समझाया गया और इस विवाह को रोकने के लिए नोटिस दिया गया।

पुलिस व प्रशासनिक टीम के मौके से लौटने के बाद बच्चियों के परिजन कानून को धता बता कर गुपचुप तरीके से विवाह के प्रयास में जुटे रहे। अक्षय तृतीया के दिन यानी 19 अप्रैल को सूचना मिली कि दोनों बच्चियों का बाल विवाह होने जा रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अगले दिन जिला विधिक सेवा प्राधिकरण एवं बाल अधिकारिता विभाग के सहयोग से अदालत में अर्जी दी गई, जिस पर श्रीमाधोपुर न्यायालय के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने परिजनों को अदालत में तलब किया और निषेधाज्ञा जारी कर इस बाल विवाह को रोकने का आदेश दिया।

दोनों बच्चियों की उम्र 15 व 17 साल है और वे स्थानीय विद्यालय में पढ़ रही हैं। इस पूरी कार्रवाई में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की सचिव डॉ. शालिनी गोयल, सीताराम जाखड़, बाल अधिकारिता विभाग से सहायक उपनिदेशक डॉ. गार्गी शर्मा, गायत्री सेवा संस्थान से नरेश कुमार सैनी, अभिषेक बगड़िया, चाइल्ड हेल्पलाइन से राकेश कुमार, राहुल दानोदिया और श्रीमाधोपुर थाना पुलिस टीम सक्रिय रूप से शामिल रही।

बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए 250 से भी अधिक नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के सहयोगी संगठन गायत्री सेवा संस्थान के निदेशक व राजस्थान बाल आयोग के पूर्व सदस्य डॉ. शैलेंद्र पंड्या ने कहा कि यह आदेश जिले में बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (पीसीएमए) 2006 के तहत पहली न्यायिक निषेधाज्ञा है जो भविष्य में ऐसे मामलों में एक नजीर पेश करेगी। यह न केवल दो बालिकाओं के जीवन को सुरक्षित करने की दिशा में एक ठोस कदम है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि अब बाल विवाह जैसे अपराधों के विरुद्ध कानूनी हस्तक्षेप और प्रभावी एवं सख्त हो रहा है।

जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के राष्ट्रीय संयोजक रवि कांत ने अदालती आदेश की प्रशंसा करते हुए कहा कि बाल विवाह की रोकथाम के लिए हमारे देश में कानून हमेशा से सख्त और प्रगतिशील रहे हैं। जरूरत इन कानूनों पर गंभीरता से अमल की है। इस तरह की निषेधाज्ञाएं एक स्पष्ट संदेश देती हैं कि कानून के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता और बाल विवाह किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि राजस्थान में जिस तरह से सरकार, समाज व न्यायपालिका बाल विवाह के खिलाफ एकजुटता व दृढ़ संकल्प दिखा रहे हैं, उससे उम्मीद जगी है कि हम जल्द ही बाल विवाह मुक्त राजस्थान के सपने को पूरा होते देखेंगे।

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