कांग्रेसी एजेंट है स्वतंत्र टिप्पणीकार बन कर टीवी पैनलों में बैठने वाला पंकज शर्मा

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दिल्ली : सोशल मीडिया पर एक यूजर ने कथित निष्पक्ष पत्रकार पंकज शर्मा की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं। यूजर ने आरोप लगाया है कि शर्मा, जो अक्सर टीवी डिबेट में निष्पक्ष पत्रकार के रूप में दिखाई देते हैं, वास्तव में कांग्रेस पार्टी के प्रति पक्षपातपूर्ण हैं।
उन्होंने एक इंटरव्यू का हवाला दिया, जिसमें पता चला कि शर्मा ने करीब 20 साल पहले पत्रकारिता छोड़ दी थी। इसके बाद सोनिया गांधी ने उन्हें कांग्रेस के मुखपत्र कांग्रेस संदेश का संपादक, राष्ट्रीय सचिव, और फिर प्रवक्ता बनाया। अब शर्मा इंदौर लोकसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने की इच्छा रखते हैं।

यूजर ने शर्मा की चालाकी पर भी सवाल उठाए, जो सोशल मीडिया पर अपनी “पंजा छाप” पहचान छुपाकर खुद को पत्रकार बताते हैं। इसके बावजूद न्यूज़ चैनल उन्हें डिबेट में निष्पक्ष पत्रकार के रूप में बुलाते हैं, जो चिंताजनक है। यूजर ने सवाल उठाया कि क्या ये चैनल इसकी असलियत से अनजान हैं या जानबूझकर अनदेखा कर रहे हैं।

यह खुलासा मीडिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

Source:
https://x.com/ocjain4/status/1954566699069665369?s=46

योगेन्द्र यादव: कांग्रेस के अनौपचारिक प्रवक्ता या स्वतंत्र विश्लेषक? वोटर लिस्ट विवाद में उलझी उनकी भूमिका

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नई दिल्ली, 10 अगस्त 2025: भारतीय राजनीति में चुनाव विश्लेषक के रूप में ख्याति प्राप्त योगेन्द्र यादव एक बार फिर विवादों के केंद्र में हैं। पत्रकार आशीष कुमार अंशु द्वारा लगाए गए तीखे आरोपों ने यादव की निष्पक्षता और उनकी राजनीतिक संबद्धता पर सवाल उठाए हैं। आशीष ने यादव को “कांग्रेस का एजेंट” करार देते हुए दावा किया है कि वे गांधी परिवार की “चाटुकारिता” में डूबे हुए हैं और उनके बयान कांग्रेस प्रवक्ता जैसे प्रतीत होते हैं। यह विवाद विशेष रूप से बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और राहुल गांधी के वोटर लिस्ट घोटाले के दावों के इर्द-गिर्द घूम रहा है।आशीष कुमार अंशु का तीखा हमलापत्रकार आशीष कुमार अंशु ने योगेन्द्र यादव पर निशाना साधते हुए लिखा, “योगेन्द्रजी, आप वही वाले चुनाव विश्लेषक हैं जिन्होंने अपनी पार्टी बनाकर चुनाव लड़वाया और अपनी पार्टी के एक नेता की भी जमानत नहीं बचा पाए थे। आप कांग्रेस की आलोचना करने वालों को जब भक्त कहते हैं, तो गांधी परिवार के लिए आपकी वफादारी साबित होती है। आप कांग्रेस के प्रवक्ता की तरह व्यवहार प्रेम में कर रहे हैं या इसका पूरा वेतन गांधी परिवार से ले रहे हैं?” आशीष का यह बयान न केवल यादव की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है, बल्कि उनकी तरफ से विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस, के प्रति दिख रहे झुकाव को भी उजागर करता है। आशीष का दावा है कि यादव न केवल राहुल गांधी की सभाओं में दिखाई देते हैं, बल्कि कांग्रेस की रणनीति को मजबूत करने के लिए समय समय पर सलाह भी देते हैं।

आशीष ने यह भी उल्लेख किया कि यादव ने स्वराज इंडिया नामक एक राजनीतिक दल बनाया था, जो 2019 के लोकसभा चुनावों में जनता द्वारा पूरी तरह खारिज कर दिया गया। इसके बावजूद, यादव का झुकाव कथित तौर पर कांग्रेस की ओर बना हुआ है। सवाल उठता है: क्या यह सेवा भावना से प्रेरित है या इसके पीछे कोई आर्थिक लाभ है? आशीष का यह कटाक्ष यादव की निष्पक्ष छवि पर गंभीर सवाल उठाता है।वोटर लिस्ट विवाद और योगेन्द्र यादव की टिप्पणीबिहार में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विवाद छिड़ा हुआ है। चुनाव आयोग ने 24 जून 2025 को इस प्रक्रिया की शुरुआत की थी, जिसके तहत सभी मतदाताओं को गणना फॉर्म भरना और 2003 के बाद पंजीकृत मतदाताओं को नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज जमा करने हैं। इस कदम का विपक्षी दलों, विशेष रूप से कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (RJD), ने कड़ा विरोध किया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे “लोकतंत्र पर हमला” करार दिया, जबकि RJD नेता तेजस्वी यादव ने दावा किया कि इससे 8 करोड़ बिहारवासियों के वोटिंग अधिकार छीने जा सकते हैं।

इस बीच, योगेन्द्र यादव ने इस मुद्दे पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “जबसे राहुल गांधी ने वोटर लिस्ट का भंडाफोड़ किया है, तबसे भौचक्के भक्तों ने एक अजीब कुतर्क चला रखा है — आपने ही तो गला ख़राब होने की शिकायत की, तो गला कटने से परेशान क्यों हैं?” उन्होंने SIR को “चुनावी जनगणना” करार देते हुए कहा कि यह प्रक्रिया करोड़ों लोगों को मताधिकार से वंचित कर सकती है। यादव ने दावा किया कि बिहार के 4.76 करोड़ लोग इस प्रक्रिया की चपेट में आ सकते हैं, क्योंकि उनके पास आवश्यक दस्तावेज नहीं हैं।

यादव ने SIR की तुलना एक ऐसी दवा से की, जो बीमारी का इलाज करने के बजाय मरीज को और नुकसान पहुंचाती है। उन्होंने सुझाव दिया कि इसके बजाय, चुनाव आयोग को बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLO) के माध्यम से सामान्य जांच करानी चाहिए थी, जिसमें मृत, स्थानांतरित, या डुप्लिकेट नाम हटाए जाते और नए नाम जोड़े जाते।कांग्रेस का अनौपचारिक प्रवक्ता?आशीष कुमार अंशु का आरोप है कि योगेन्द्र यादव की यह टिप्पणी कांग्रेस के नैरेटिव को मजबूत करने की कोशिश है। यादव ने न केवल SIR का विरोध किया, बल्कि बीजेपी समर्थकों को ‘भक्त’ कहकर निशाना साधा, जो उनके आलोचकों के अनुसार, उनकी पक्षपातपूर्ण छवि को और मजबूत करता है। आशीष का कहना है कि यादव के बयान कांग्रेस प्रवक्ता जैसे हैं, जो पार्टी लाइन को बढ़ावा देते हैं।यादव की कांग्रेस के साथ कथित नजदीकी का एक आधार यह भी है कि वे अक्सर राहुल गांधी के साथ मंच साझा करते हैं और उनकी रणनीति को समर्थन देते हैं। उदाहरण के लिए, राहुल गांधी ने हाल ही में दावा किया था कि उनके पास कर्नाटक के एक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता सूची में गड़बड़ी के “100% सबूत” हैं। इस दावे का समर्थन करते हुए, यादव ने इसे और जोर-शोर से उठाया, जिससे उनके आलोचकों को यह कहने का मौका मिला कि वे कांग्रेस के लिए अनौपचारिक प्रवक्ता की भूमिका निभा रहे हैं।सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की प्रतिक्रियासुप्रीम कोर्ट ने 10 जुलाई 2025 को SIR को संवैधानिक दायित्व बताते हुए इसे जारी रखने की अनुमति दी, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, और राशन कार्ड को पहचान के दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। इस फैसले का स्वागत करते हुए यादव ने कहा कि कोर्ट ने यह माना है कि SIR से मतदाताओं के अधिकार छीने जाने का खतरा है।

हालांकि, चुनाव आयोग ने विपक्ष के दावों को खारिज करते हुए कहा कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना है, न कि वैध मतदाताओं को हटाना। आयोग ने तेजस्वी यादव के उस दावे को भी गलत बताया, जिसमें उन्होंने कहा था कि उनका नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची से हटा दिया गया है।क्या है यादव का जवाब?योगेन्द्र यादव ने अभी तक आशीष कुमार अंशु के आरोपों का सीधा जवाब नहीं दिया है। हालांकि, उनके समर्थकों का कहना है कि यादव एक स्वतंत्र विश्लेषक हैं, जिन्होंने हमेशा लोकतंत्र और मतदाता अधिकारों की रक्षा की बात की है। उनके आलोचक, हालांकि, यह मानते हैं कि उनकी टिप्पणियां और गतिविधियां कांग्रेस के पक्ष में झुकी हुई हैं, जिससे उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठता है।योगेन्द्र यादव की बिहार वोटर लिस्ट विवाद में सक्रिय भूमिका और उनके द्वारा बीजेपी समर्थकों को ‘भक्त’ कहने जैसे बयानों ने उनकी छवि को एक बार फिर सवालों के घेरे में ला दिया है। आशीष कुमार अंशु के आरोपों ने इस बहस को और हवा दी है कि क्या यादव वास्तव में एक निष्पक्ष विश्लेषक हैं या कांग्रेस के लिए अनौपचारिक प्रवक्ता की भूमिका निभा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के बीच चल रही इस जंग में यादव की टिप्पणियां निश्चित रूप से राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी रहेंगी।

भारत में भूजल प्रदूषण: एक चिंताजनक संकट

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दिल्ली: भारत में भूजल प्रदूषण एक गंभीर पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संकट बन चुका है, जो लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित कर रहा है। के अनुसार, देश में 85% ग्रामीण पेयजल और 65% सिंचाई जल भूजल पर निर्भर है, लेकिन यह संसाधन अब जहरीले रसायनों और भारी धातुओं जैसे आर्सेनिक, फ्लोराइड, नाइट्रेट, और यूरेनियम से दूषित हो रहा है। यह प्रदूषण औद्योगिक अपशिष्ट, कृषि रसायनों, और अपर्याप्त सीवेज प्रबंधन के कारण बढ़ रहा है।भूजल में नाइट्रेट की मात्रा 2017 से 2023 तक 359 से 440 जिलों में बढ़ी है, जो 56% जिलों को प्रभावित कर रही है। आर्सेनिक और फ्लोराइड का उच्च स्तर राजस्थान, हरियाणा, और बिहार जैसे राज्यों में स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर रहा है। इससे कैंसर, किडनी रोग, और बच्चों में ‘ब्लू बेबी सिंड्रोम’ जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं।

 

उदाहरण के लिए, कानपुर और वापी में बच्चों में रक्त में सीसे की उच्च मात्रा पाई गई है।नियामक व्यवस्था की कमजोरी, जैसे जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 की अपर्याप्तता, और केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) की सीमित शक्तियां, इस संकट को और गहरा रही हैं। समाधान के लिए सामुदायिक स्तर पर आर्सेनिक और फ्लोराइड हटाने की प्रणालियां, शून्य तरल निर्वहन (जेडएलडी) नीतियां, और जैविक खेती को बढ़ावा देना आवश्यक है। साथ ही, पंचायतों और जल उपयोगकर्ता समूहों की भागीदारी से नागरिक-केंद्रित जल प्रबंधन को मजबूत करना होगा। यह संकट केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल है, जिसके लिए तत्काल और समन्वित कार्रवाई की जरूरत है।

बैलेट की लूट और लोकतंत्र की मासूमियत: 1984 से जुड़ा मनोज मलयानिल का एक संस्मरण

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नोएडा। मनोज मलयानिल की सोशल मीडिया पोस्ट में 1984 के लोकसभा चुनाव की एक ऐसी कहानी सामने आती है, जो व्यंग्य और कटाक्ष के रंग में रंगी है। उनकी यह कहानी उस समय के कथित चुनावी भ्रष्टाचार, खासकर बूथ लूट, की ओर इशारा करती है, जिसके बल पर कांग्रेस ने 400 से अधिक सीटें जीतीं। मनोज का यह संस्मरण केवल एक व्यक्तिगत अनुभव नहीं, बल्कि उस दौर की राजनीतिक प्रथाओं का एक काला चिट्ठा है, जो हास्य के आवरण में लिपटा हुआ है।

मनोज बताते हैं कि स्कूल के दिन थे, और वह अपने मोहल्ले के “भैया लोगों” के साथ मतदान केंद्र पहुंचे थे। उनकी जिम्मेदारी थी बैलेट पेपर पर ‘हाथ’ के निशान पर मुहर लगाना। उनके दोस्तों को बैलेट मोड़ने और बक्से में डालने का काम सौंपा गया। मनोज का दावा है कि उन्होंने “खूब मजे” के साथ 100 बैलेट पेपर पर मुहर लगाई। यह एक बच्चे की मासूमियत और उत्साह की कहानी नहीं, बल्कि बूथ लूट जैसे गंभीर चुनावी भ्रष्टाचार का व्यंग्यात्मक चित्रण है। उस दौर में बूथ लूट, या बूथ कैप्चरिंग, एक आम प्रथा थी, जिसमें पार्टी कार्यकर्ता या किराए के लोग मतदान केंद्रों पर कब्जा कर लेते थे और अपने पक्ष में वोट डालते थे।

1984 का चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए इस चुनाव में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने 414 सीटें जीतीं, जो आज तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। लेकिन इस जीत के पीछे सहानुभूति लहर के साथ-साथ बूथ लूट जैसे कदाचारों की कहानियां भी जुड़ी हैं। मनोज की पोस्ट उस समय की उन प्रथाओं को उजागर करती है, जब मतदान केंद्रों पर धमकी, हिंसा और धांधली आम थी। उनकी कहानी में हास्य का पुट है, लेकिन यह गंभीर सवाल उठाता है कि क्या उस दौर की जीत पूरी तरह से जनादेश थी, या इसमें भ्रष्टाचार की भी भूमिका थी?

राहुल गांधी का अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में 80 के दशक की यादों का जिक्र, जहां वह और प्रियंका पोस्टर चिपकाते थे, एक विपरीत तस्वीर पेश करता है। जहां एक तरफ वह मासूमियत भरे कार्यों की बात करते हैं, वहीं मनोज का व्यंग्य उस दौर की कड़वी सच्चाई को सामने लाता है। यह विडंबना दर्शाती है कि कैसे एक ही समय में दो अलग-अलग अनुभव—एक मासूम और दूसरा भ्रष्ट—लोकतंत्र के इस महापर्व का हिस्सा थे।

मनोज का यह भी कहना कि मतदान के बाद “जमकर भोज” हुआ, उस समय की सामाजिकता के साथ-साथ भ्रष्टाचार की स्वीकार्यता को भी दर्शाता है। यह एक ऐसा दौर था, जब बूथ लूट को कुछ हद तक सामान्य माना जाता था। आज के डिजिटल युग में, जब इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों और सख्त निगरानी ने ऐसी प्रथाओं को कम किया है, मनोज की कहानी हमें उस समय की कमजोरियों की याद दिलाती है।

यह संस्मरण हमें सोचने पर मजबूर करता है कि लोकतंत्र की नींव कितनी नाजुक हो सकती है, जब उसे भ्रष्टाचार की दीमक खा रही हो। मनोज का व्यंग्य न केवल 1984 की एक कड़वी सच्चाई को सामने लाता है, बल्कि हमें आज के लोकतंत्र को और मजबूत करने की प्रेरणा भी देता है।

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