Bangladesh: Journalist hacked to death, PEC demands justice

unnamed-1.jpg

Nava Thakuria

Geneva: Press Emblem Campaign (PEC), the global media safety and rights body, expressed shock over the murder of a journalist in the capital city of Bangladesh and urged the interim regime in Dhaka to nab the killers of Md Asaduzzaman Tuhin, who was hacked to death by some miscreants in Gazipur locality on 7 August evening. Tuhin (40), who was associated with Mymensingh-based Bengali newspaper Dainik Pratidiner Kagoj, was targeted by the assailants as he was sitting in a tea stall of Chandana Chowrasta market. Wounded severely, Tuhin died on the spot and Dhaka police recovered his body to send for autopsy. The journalist reportedly recorded visuals from the market, where some extortionists were asking money from the local vendors and they fought among themselves. Tuhin was asked to stop recording, but when he did not respond they attacked him.

“It’s so pathetic that a journalist had to lose his life as he exposed the extortionists in the crowded capital city. Earlier on 25 June, another journalist named Khandaker Shah Alam was killed in Nabinagar locality of Dhaka by a released prisoner, who was understandably jailed because of Alam’s reporting in Dainik Matrijagat. Bangladesh is going for national elections by mid-February next year and the authority must ensure the safety and security of media persons across the south Asian nation. The current regime head Dr Muhammad Yunus has promised a favourable atmosphere for the media fraternity compared to the reign of ousted Bangladesh Prime Minister Sheikh Hasina. The freedom of journalists should be reflected on the ground,” said Blaise Lempen, president of PEC (www.pressemblem.ch), adding that killers of both the scribes must be punished under the law.

PEC’s south & southeast Asia representative Nava Thakuria informs that besides Tuhin, another Dhaka-based journalist (Anwar Hossain Sourav) was physically assaulted by miscreants in Gazipur’s Sahapara area on the previous day. The young journalist of Dainik Bangladesher Alo is currently undergoing treatment in the hospital. Tuhin becomes second Bangladeshi journo-victims since 1 January this year and 95th media casualty across the world. Days back, radio journalist Erwin Labitad Segovia, was killed in the Philippines. India lost five media persons namely Mukesh Chandrakar, Raghavendra Vajpayee, Sahadev Dey, Dharmendra Singh Chauhan and Chintakayalu Naresh Kumar to assailants in the first half of 2025, followed by Pakistan with the murder of Allah Dino Shar, Abdul Latif Baloch and Syed Mohammed Shah, and Nepal with the killing of Suresh Rajak during the period.

बिक गए हैं अजीत अंजुम और उनके जैसे दर्जनों यूट्यूबर्स?

2-14.png

दिल्ली। हाल के दिनों में सोशल मीडिया और यूट्यूब पर यह चर्चा जोरों पर है कि क्या वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम और उनके जैसे कई यूट्यूबर्स कांग्रेस पार्टी के लिए प्रचार करने में लगे हैं? यह सवाल न केवल पत्रकारिता की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है, बल्कि डिजिटल युग में सोशल मीडिया के प्रभाव और इसके पीछे की संभावित साजिशों को भी उजागर करता है। कुछ सूत्रों और आरोपों के आधार पर यह दावा किया जा रहा है कि अजीत अंजुम और अन्य यूट्यूबर्स को कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने के लिए मोटी रकम दी जा रही है। आइए, इस मुद्दे को गहराई से समझने की कोशिश करते हैं।
अजीत अंजुम एक चर्चित नाम हैं, जिन्होंने मुख्यधारा की पत्रकारिता में लंबे समय तक काम किया है। आरोप है कि उनकी पहचान और करियर को कांग्रेस के बड़े नेता, विशेष रूप से राजीव शुक्ला जैसे लोगों का समर्थन प्राप्त रहा है। कहा जाता है कि राजीव शुक्ला ने उन्हें न केवल नौकरी दी, बल्कि पत्रकारिता जगत में उनकी पहचान बनाने में भी मदद की। इस दावे के आधार पर कुछ लोग मानते हैं कि अजीत अंजुम ने हमेशा कांग्रेस के इकोसिस्टम के लिए काम किया है। यह भी सवाल उठता है कि क्या वह और उनके जैसे अन्य यूट्यूबर्स अब खुले तौर पर कांग्रेस के पक्ष में प्रचार कर रहे हैं, और क्या इसके पीछे आर्थिक लेन-देन का खेल चल रहा है?

सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि अजीत अंजुम समेत कई यूट्यूबर्स को एक संस्था के माध्यम से मोटी रकम दी जा रही है। इस संस्था का उद्देश्य कथित तौर पर कांग्रेस के पक्ष में दिन-रात प्रचार करना और सोशल मीडिया पर पार्टी की छवि को मजबूत करना है। यह भी कहा जा रहा है कि इन यूट्यूबर्स को न केवल पैसा दिया जा रहा है, बल्कि उनके चैनलों पर व्यूज और सब्सक्राइबर्स बढ़ाने का आश्वासन भी मिला है। कुछ लोगों का मानना है कि इन यूट्यूबर्स के वीडियो के तेजी से वायरल होने और उनके चैनलों की असामान्य वृद्धि के पीछे एक सुनियोजित रणनीति काम कर रही है।
आरोपों के मुताबिक, एक वीडियो के लिए यूट्यूबर्स को 20 हजार से लेकर डेढ़ लाख रुपये तक की राशि दी जा रही है। यह रकम इतनी आकर्षक है कि कई बड़े चेहरे दिन-रात कांग्रेस की तारीफ में लगे रहते हैं। इसके अलावा, यह भी खबर है कि कुछ लोग अपने सोशल मीडिया हैंडल, खासकर एक्स (पूर्व में ट्विटर) हैंडल, किराए पर दे रहे हैं, ताकि उनके जरिए कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाया जा सके। इनमें से कुछ लोग हर टिप्पणी पर नजर रखते हैं और अपनी सहमति के बाद ही उसे शेयर करने की अनुमति देते हैं, जबकि कुछ ने अपने हैंडल पूरी तरह से संस्था के हवाले कर दिए हैं।

हालांकि, इन दावों को साबित करना आसान नहीं है। यह दो पक्षों के बीच आपसी सहमति का मामला हो सकता है, जिसके कारण इसे कानूनी रूप से चुनौती देना मुश्किल है। दूसरी ओर, जो लोग बिना किसी आर्थिक लेन-देन के यूट्यूब पर कंटेंट बना रहे हैं, उनके लिए यह स्थिति चिंताजनक हो सकती है। वे देख रहे हैं कि कुछ यूट्यूबर्स के वीडियो असामान्य रूप से तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिससे यह संदेह पैदा होता है कि कोई संगठित तंत्र इनके पीछे काम कर रहा है।

यह पूरा मामला न केवल पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है, बल्कि डिजिटल युग में प्रचार और प्रभाव के नए तरीकों को भी उजागर करता है। अगर ये आरोप सही हैं, तो यह सोशल मीडिया के दुरुपयोग का एक बड़ा उदाहरण हो सकता है। दूसरी ओर, यह भी संभव है कि ये आरोप किसी खास एजेंडे के तहत लगाए जा रहे हों। सच्चाई जो भी हो, यह जरूरी है कि ऐसी खबरों की गहन जांच हो और पारदर्शिता बनी रहे, ताकि आम जनता को सही जानकारी मिल सके।

सत्ता, विवाद और साहित्य: दिल्ली विश्वविद्यालय का एक अनकहा अध्याय

nam.jfif_.jpeg

दयानंद पांडेय

दिल्ली। एक बार डाक्टर नागेंद्र और रामविलास शर्मा के बीच किसी बात पर विवाद हो गया। नागेंद्र अपना आपा खो बैठे। राम विलास शर्मा से बोले , अपने जीते जी तुम्हें कभी भी दिल्ली यूनिवर्सिटी में घुसने नहीं दूंगा। डाक्टर नागेंद्र उन दिनों बहुत पावरफुल थे। हिंदी विभाग के अध्यक्ष थे। तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री सैय्यद नुरुल हसन बहुत चाहते थे कि जोधपुर विश्वविद्यालय से बर्खास्त नामवर सिंह को किसी तरह दिल्ली विश्वविद्यालय में एडजस्ट कर दिया जाए। नुरुल हसन भी बहुत पावरफुल थे। इंदिरा गांधी के करीबी थे। लखनऊ के रहने वाले थे। उन के नाना सर सैयद वज़ीर हसन , अवध के न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और फिर मुस्लिम लीग के जाने-माने अध्यक्ष रहे थे। उन के नाम पर लखनऊ में वज़ीर हसन रोड भी है अब। पॉश इलाक़ा है। आप खोजेंगे तो ऐसे बहुत से मुस्लिम लीग के लोग , पसमांदा मुसलमानों का शोषण करने वाले लोग वामपंथी बन गए मिलेंगे। सैय्यद लोग अभी भी अपने को अरब से आया हुआ मानते हैं। श्रेष्ठ मानते हैं। सैय्यद नुरुल हसन प्रसिद्ध वामपंथी लेखक सैयद सज्जाद ज़हीर के भांजे थे। सैय्यद सज्जाद ज़हीर तो बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए थे। पर पाकिस्तान में जब रगड़े गए , जेल हो गई तो भाग कर वापस भारत आ गए। मुस्लिम लीग छोड़ कर कम्युनिस्ट बन गए। बहरहाल नुरुल हसन सैय्यद होने के बावजूद मामा सज्जाद ज़हीर की तरह वामपंथी भी थे। रामपुर के नवाब की बेटी से विवाह हुआ था। स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज , लंदन में इतिहास के प्रोफ़ेसर रहे थे । अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग में प्रोफेसर व अध्यक्ष भी रहे थे। रोमिला थापर और इरफ़ान हबीब जैसों को पावरफुल बनाने में नुरुल हसन का बड़ा हाथ था। नुरुल हसन बाद में राजनयिक भी हुए। पर ऐसे पावरफुल सैय्यद नुरुल हसन जो तब केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री भी थे डाक्टर नागेंद्र के आगे उन की एक नहीं चली। और सैय्यद नुरुल हसन नामवर सिंह को दिल्ली विश्वविद्यालय में नियुक्त नहीं करवा सके थे। विवश हो कर नामवर सिंह को कम्युनिस्ट पार्टी के जनयुग अख़बार में संपादक बन कर दिल्ली में गुज़ारा करना पड़ा। राजकमल प्रकाशन के लिए भी काम किया। आलोचना के संपादक भी बने। बाद में जब जे एन यू खुला तो एक हिंदी विभाग क्या सभी भाषाओं के अध्यक्ष बने और उन्हें उत्कर्ष तक पहुंचाया। लेकिन तब के डाक्टर नागेंद्र ने नामवर सिंह को दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में नियुक्त नहीं होने दिया।

और वही डाक्टर नागेंद्र , डाक्टर रामविलास शर्मा से कह रहे थे , तुम्हें दिल्ली विश्वविद्यालय में घुसने नहीं दूंगा। वैसे भी रामविलास शर्मा हिंदी में लिखते ज़रूर थे पर अंगरेजी के आदमी थे। अंगरेजी ही पढ़ाते थे आगरा में। उन्नाव के रहने वाले रामविलास शर्मा भी लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़े थे। अमृतलाल नागर के पारिवारिक और प्रिय मित्र थे। एक दिन डाक्टर नागेंद्र के एक शिष्य ने उन्हें बताया कि रामविलास शर्मा तो एक व्याख्यान में दिल्ली विश्विद्यालय में आ रहे हैं। इतिहास विभाग ने उन्हें बुलाया था। रामविलास शर्मा ने इतिहास पर भी पर्याप्त लिखा है। वामपंथी हिप्पोक्रेटों ने बाद के दिनों में कामरेड रामविलास शर्मा को भी हिंदू कह कर धकेल दिया। जैसे कभी राहुल सांकृत्यायन को हिंदू कह कर धकेल दिया था। तब के दिनों हिंदू नाम की ही गाली इन हिप्पोक्रेटों को मिल पाई थी। संघी , जनसंघी और भाजपाई नाम की गाली का तब तक अनुसंधान नहीं हुआ था। बाद के दिनों में निर्मल वर्मा को भी हिंदू कह कर धकियाया गया। तब जब कि निर्मल वर्मा भी वामपंथी रहे थे। कार्ड होल्डर रहे थे। खैर , रामविलास शर्मा तय तिथि पर दिल्ली विश्विद्यालय आए और जब आए तो उन का स्वागत करने के लिए डाक्टर नागेंद्र गेट पर न सिर्फ़ पहले से उपस्थित थे बल्कि धधा कर उन से गले मिले। रामविलास शर्मा भी डाक्टर नागेंद्र से उसी गर्मजोशी से मिले। ऐसे जैसे उन दोनों के बीच पहले कभी कुछ घटा ही न हो। इतना ही नहीं , पूरे कार्यक्रम में डाक्टर नागेंद्र उपस्थित रहे और रामविलास शर्मा को विदा कर के ही घर लौटे। लेखकीय सदाशयता और सदभाव का यही तकाज़ा है। पर आप ने क्या मुझ पर अपनी फ़ेसबुक पोस्ट पर की गई टिप्पणियों पर ध्यान दिया ? कमेंट की भाषा पर ध्यान नहीं दिया ? दिया तो है। लाइक तो किया है। क्या आप ने किसी से अभद्र और अश्लील भाषा पर ऐतराज भी जताया क्या ? स्पष्ट है कि नहीं जताया। इतना ही नहीं , मैं ने पाया कि आप ने दबाव में आ कर ही अपनी पोस्ट को कम से कम दो-तीन बार एडिट किया है। आप ने शुरू में लिखा कि भाजपा विरोधी , फिर लिखा शायद भाजपा विरोधी। फिर यह पूरा ही हटा दिया। आप की पोस्ट है। आप हज़ार बार संपादित कीजिए। क्या हटाइए , क्या जोड़िए , यह आप का अपना विवेक है। कोई हर्ज नहीं है ! लेकिन यह सब देख कर नामवर सिंह की बरबस याद आ गई है।

एक समय दिल्ली पुस्तक मेले में राजेंद्र यादव के बीमार आदमी के स्वस्थ विचार किताब की सहयोगी लेखिका ज्योति कुमारी के कहानी संग्रह के विमोचन पर बतौर अध्यक्ष नामवर सिंह ने कहा कि दस्तखत पर मेरे दस्तखत नहीं हैं। यानि दस्तखत कहानी संग्रह में नामवर सिंह के नाम से छपी भूमिका , उन्हों ने नहीं लिखी है। फिर हफ्ते भर में नामवर सिंह का बयान आया कि दस्तखत में छपी भूमिका उन से बातचीत पर आधारित है। अगले हफ़्ते फिर नामवर सिंह की भूमिका पर सफाई आई। नामवर ने कहा , भूमिका मेरी ही है। तब के समय ठंड बहुत थी। हाथ कांप रहे थे। सो बोल कर लिखवाई है। सो हो जाता है विष्णु जी ऐसा भी कभी-कभार। कोई बात नहीं। पर चित्रकूट के रहने वाले वालीवुड के फ़िल्मकार कमल पांडेय के भतीजे राहुल पांडेय दिल्ली में रहते हैं। मेरे अनन्य पाठक और प्रशंसक हैं। कमल पांडेय भी , राहुल पांडेय भी। राहुल पांडेय ने कुछ कमेंट पर प्रतिवाद भी किया है। राहुल पांडेय ने बताया कि दस बरस पहले लिखे मेरे लेखों के लिंक भी आप की पोस्ट के कमेंट बॉक्स में बार-बार पोस्ट किए। आप ने बार-बार मिटाया। कोई बात नहीं। आप की वाल है , फ़ैसला आप का है। कोई आपत्ति नहीं। हर बिंदु पर हर कोई लोकतांत्रिक भी हो , ज़रूरी तो नहीं। बस ज़िक्र है बरक्स तुलसीदास , मैं बैरी सुग्रीव पियारा ,अवगुण कवन नाथ मोहि मारा ! ठीक है मैं बालि नहीं , और कोई सुग्रीव नहीं। फिर तुलसीदास से आप सहमत भी नहीं होंगे भरसक। आप का नहीं जानता , पर आप के कई मित्र तो तुलसी के घनघोर निंदक हैं। फिर भी अपनी अभद्र और अश्लील टिप्पणी में मुझे अपमानित करने के लिए आप को सलाह देते हुए तुलसीदास का ही सहारा लिया है : तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही। ऐसे नफ़रती और घृणा में डूबे व्यक्ति का ज़िक्र भी क्या करना।

पूछिएगा कभी मन करे तो उन से भी कि उन की अश्लील और अभद्र टिप्पणी में कहीं दस बरस पहले उन पर लिखे चार लेखों की श्रृंखला का फोड़ा क्या अब फूटा है ? इस फोड़े का मवाद तो नहीं बह गया है ? क्या यह किसी पढ़े-लिखे आदमी की भाषा है ? वह आदमी जो ख़ुद को आलोचक भी मानता हो। क्या आलोचना ऐसे ही होती है ? पूछिएगा उन से कि दस बरस पहले लिखे उन पर लेखों में कहीं मैं ने तू-तकार भी किया है क्या ? कहीं अभद्र , अश्लील या बिलो द बेल्ट भी हुआ हूं क्या ? वैचारिकी और आलोचना के अलावा कुछ और पर भी बात की है क्या ? कोई निजी हमला भी किया है क्या उन पर ? निजी हमला , बिलो द बेल्ट होने का अभ्यास कभी नहीं रहा मुझे। अब भी ख़ैर क्या होगा।

आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के शास्त्रार्थ का प्रसंग याद आता है। मंडन मिश्र के बहुत दबाव के बाद आदि शंकराचार्य शास्त्रार्थ के लिए तैयार हुए। शस्त्रार्थ के लिए निर्णायक तय हुई मंडन मिश्र की पत्नी भारती। शास्त्रार्थ जब लंबा खिंच गया तो भारती दोनों के गले में ताज़े फूलों की माला पहना कर किसी काम से निकल गईं। कहा कि आप लोग शास्त्रार्थ जारी रखिए। मैं आ कर निर्णय सुना दूंगी। शास्त्रार्थ समाप्त होने के पहले ही वह वापस भी आ गईं। शस्त्रार्थ समाप्त होने पर भारती ने मंडन मिश्र को पराजित और आदि शंकराचार्य को विजेता घोषित किया। लोगों ने इस पर ऐतराज किया। मंडन मिश्रा ने सब से ज़्यादा। कहा कि पूरे समय रहीं भी नहीं और निर्णय भी ग़लत सुना दिया। यह तो ठीक बात नहीं है। भारती ने कहा कि , मैं पूरे समय उपस्थित नहीं थी , यह सत्य है। पर आप दोनों के गले में मैं ने ताज़ा फूलों की माला जो पहनाई थी , निर्णय उसी के आधार पर दिया है। इन फूलों ने निर्णय दिया है। उन्हों ने उन दोनों माला को दिखाते हुए बताया कि आदि शंकराचार्य के गले में पड़ी माला के फूल अभी भी ताज़ा हैं। जब कि मंडन मिश्र के गले की माला के फूल सूख गए हैं। क्यों कि शस्त्रार्थ के समय यह बार-बार क्रोधित और उत्तेजित हुए हैं। सो माला के फूल उस क्रोध और उत्तेजना के ताप में सूख गए हैं। जब तथ्य और तर्क नहीं होता तब ही आदमी क्रोध में आता है। उत्तेजित होता है। अलग बात है कि बाद में यही आदि शंकराचार्य इसी भारती से शास्त्रार्थ में पराजित हो गए थे। हो सकता है यह प्रसंग आप को और तमाम मित्रों को न पसंद आए। न समझ आए। हिंदू , संघी , भाजपाई आदि-इत्यादि कह कर नाक-भौं सिकोड़ लें। खारिज कर दें। पर अभद्र और अश्लील भाषा के मद्देनज़र मुझे यही प्रसंग याद आया।

आदमी के पास जब तर्क और तथ्य नहीं होते तो उत्तेजित और क्रोधित ही होता है।
(हिप्पोक्रेट वामपंथी कबीले की कैफ़ियत लेख से)

सनातन हिन्दू संस्कृति का संवाहक – जनजातीय समाज

hollywood-celebrities-and-hinduism.jpg

~ कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

अपने शाश्वत स्वरुप और सत्य के अधिष्ठान पर खड़ी सनातनी संस्कृति की झंकार सर्वत्र गुंजित होती है। यह हिन्दू संस्कृति का वैशिष्ट्य है कि वह विश्व की सबसे अर्वाचीन संस्कृति के रूप में अधिष्ठित और प्रतिष्ठित है। भारतीय संस्कृति का सेमेटिक मजहबों की भांति न तो कोई एक ग्रंथ है‌ । न कोई प्रारम्भकर्ता व्यक्ति। यह अपने विराट और वैविध्यपूर्ण स्वरूप के साथ अपना साक्षात्कार कराती है। न तो भारतीय संस्कृति में एक देव पूजा की बाध्यता है और न ही किसी एक पंथ प्रणाली, किताब को पूजने की शर्त। सनातन हिन्दुत्व की कोख से जन्म लेने वाला व्यक्ति अपने ढंग से – जीवन के आचार, विचार का निर्धारण करने के लिए स्वतन्त्र है। अपनी पूजा पद्धति, परम्पराओं को मानने या न मानने के लिए भी स्वतन्त्र है। इन सबके बावजूद भी वह हिन्दू कहलाता है‌ क्योंकि स्वतन्त्र चिन्तन – सत्यान्वेषण हिन्दुत्व का मूल है। इसी हिन्दू संस्कृति ने विश्व को बौध्द, जैन और सिख धर्म/ पंथों का दर्शन दिया। प्रकृति के साथ तादात्म्य और एकात्म स्थापित करने वाला हिन्दू मानष विश्व शांति का मन्त्र देने वाला और प्राणि मात्र के कल्याण की भावना का उद्गाता है।अनेकानेक षड्यंत्रों ,आक्रमणों , कुठाराघातों के बावजूद भी भारतीय संस्कृति जीवंत है तो वह इसीलिए कि विविधता और बहुलता में ‘एकात्मता’ इसके मूल में है। अपनी इसी बहुलतावादी सांस्कृतिक जीवटता के इतिहास के साथ ही भारत के सांस्कृतिक सूर्य का रथ गतिमान है।

भारत के इसी स्वरुप को प्रतिबिंबित करता है यहां का जनजातीय समाज और उनकी प्रकृति से एकात्म परम्पराएं।जनजातीय समाज का अधिकांशतः निवास स्थान भले ही वनांचलों में रहा हो‌। किन्तु जनजातीयसमाज सर्वदा सनातन -हिन्दू धर्म के अभिन्न अंग के रूप में एकात्मता का संगीत सुनाता आया है। यह अलग बात है कि सभ्यताओं के विकास और लगातार आक्रमणों के कारण जनजातीय समाज के स्थान परिवर्तन हुआ।उनकी परम्पराओं ,संस्कृति ,विवाह, रीति-रिवाजों ,पूजा-पद्धति, बोली और कार्यशैली में आंशिक अन्तर दिखाई देता है। किन्तु संविधान में अनुसूचितसनातन हिन्दू समाज के जनजातीय समाज और गैर जनजातीय समाज का मूल और केन्द्र हिन्दुत्व की धुरी ही है।

वैदिक साहित्य की ओर यदि हम दृष्टिपात करें तो ऋग्वैदिक कालीन समाज जनजातीय समाज के स्वरूप के साथ ही आगे बढ़ रहा था। इस सन्दर्भ में यदि हम किसी भी जनजातीय समाज में देखें तो यह साफ-साफ परिलक्षित होता है कि उनकी पूजा पध्दतियां गैर जनजातीय समाज के समान ही हैं। केवल इनके स्वरुप अथवा नामों में अंतर देखने को मिलता है। जनजातीय समाज में
भगवान शिव का त्रिशूल ,डमरू ,स्वास्तिक, देव और देवी की उपासना , श्रीफल (नारियल) ,तुलसी ,तांत्रिक क्रियाओं में नींबू-मिर्च ,गोबर से लिपाई-पुताई इत्यादि के प्रयोग होते हैं। क्या ये प्रतीक किसी भी प्रकार से हिन्दू समाज से अलग अस्तित्व को दर्शाते हैं? इसी प्रकार जनजातीयसमाज जिन देवताओं को महायदेव, ठाकुरदेव, बूढ़ादेव, पिलचूहड़ाम के स्वरूप में स्मरण और पूजन करते हैं । उन्हीं देवताओं को गैर जनजातीयसमाज शिव, महेश, नीलकंठ आदि नामों से जानते और पूजते हैं।

उत्तर -पूर्व भारत में सीमांत जनजातियों की भाँति ‘मिशमिश’ जनजाति के लोग सूर्य व चन्द्रमा की पूजा ‘दान्यी-पोलो’ के स्वरूप में करते हैं। इस पर उनका मानना है कि — सूर्य और चन्द्र सत्य के पालनकर्ता भगवान हैं। ठीक इसी परम्परा को अरुणाचल प्रदेश की लगभग सभी पच्चीसों जनजातियां मानती हैं। सनातन हिन्दू धर्म में प्रकृति को माँ के स्वरूप में पूजने और पंच तत्वों की पूजन परंपरा सर्वत्र देखने को मिलती है।
प्रकृति के तत्वों यथा — भू, जल,अग्नि, आकाश ,सूर्य, चन्द्र ,नदी-तालाब, समुद्र ,वृक्षों यथा-पीपल ,नीम ,तुलसी ,आम , गुग्गुल ,बरगद इत्यादि की पूजा करने की परम्पराएँ समूचे भारतीय समाज में देखने को मिलती हैं। क्या यह सब हमारी जनजातीय संस्कृति के अभिन्न अंग एवं मूलस्वरूप को नहीं दर्शाती हैं? इसी प्रकार धार्मिक अनुष्ठानों में यज्ञ वेदी का निर्माण वैदिक कालीन समाज में रहा है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से चिन्हों यथा- यज्ञ वेदी ,पशुपति की मूर्ति प्राप्त होना। भारतीय संस्कृति के ही तो प्रमाण हैं जिनके ध्वंसावशेष समय – समय पर देश- विदेश के विभिन्न स्थानों से प्राप्त होते रहे हैं।

भारत के जनजातीय समाज में कुल देवी-देवताओं के पूजन की पद्धति और पूजन में हवन (होम) किया जाना‌। हिन्दुत्व की पूजन प्रक्रिया का ही हिस्सा हैं जो सनातन की अक्षुण्ण अखण्ड परम्पराओं की द्योतक हैं। चाहे जनजातीय समाज के द्वारा नागों की पूजा करना हो। याकि नागों के भित्तिचित्र, शैल चित्रों को उकेरना हो । ये सभी चीजें गैर जनजातीयसमाज में भी हैं। नागपंचमी का त्यौहार इसी का प्रतीक है। इस दिन हिन्दू समाज नाग देवता की पूजा कर अपने घरों के मुख्य द्वार में नाग देवता का प्रतीकात्मक चित्रण करते हैं। लोकमंगल की कामना करते हैं। यह वही विशुद्ध सांस्कृतिक विरासत ही तो है जिसे संपूर्ण हिन्दू समाज हर्षोल्लास के साथ मनाता है।

यदि हम आधुनिक इतिहास (हिस्ट्री) के बोध से अलग होकर देखें। अपने सनातन कालक्रम की ओर दृष्टिपात करें तो सनातन हिन्दू संस्कृति अपनी साहचर्यता ,बन्धुता और समन्वय के साथ विश्व की अनूठी संस्कृति की मिसाल के तौर पर स्थापित है। सनातन परंपरा में ईश्वरीय अवतारों ,संत-महात्माओं की जाति देखने की परंपरा कभी नहीं रही है। किन्तु जब इस पर अध्ययन किया जा रहा है तो उसका विभिन्न कोणों से विश्लेषण करना आवश्यक ही प्रतीत होता है।

त्रेतायुग में भगवान श्रीराम के वनवास काल में चित्रकूट से दण्डकवन और लंका युध्द से विजय तक उनके सहयोगी वनांचलों में निवास करने वाला जनजातीय समाज ही रहा है। इस कड़ी में श्रृंग्वेरपुर के राजा निषाद राज गुह ने भगवान के वनवास की जानकारी लगते ही अपना राज्य अपने आराध्य को सौंपने की बात कही। किन्तु भगवान राम ने उन्हें मित्र की पदवी देकर अपने समतुल्य बतलाया । मैत्रीबोध का श्रेष्ठतम् मानक स्थापित किया। फिर चाहे गंगा पार उतारने के समय का केवट और भगवान राम का मधुर ,स्नेहिल संवाद हो। याकि भगवान राम की भक्ति में लीन शबरी भीलनी माता के जूठे बेर फल का सेवन करना हो। उन्हें माँ के तौर में प्रतिष्ठित करना हो । यह सब सनातन हिन्दू संस्कृति की ही विशेषता है। माता शबरी को आज भी समूचा हिन्दू समाज माँ के रुप में पूजता है। भला, इससे अनूठा -अनुपम उदाहरण विश्व में और कहाँ मिलेगा? यही तो सनातन संस्कृति और उसकी सदा प्रवाहित होने वाली स्नेह ,सामंजस्य ,श्रेष्ठता की अविरल धारा है। जो अमृत का संचय कर राष्ट्र को पोषित कर रही है।

सनातन संस्कृति के महानायकों यथा- निषादराज गुह ,माता शबरी ,बिरसा मुंडा , टंट्या भील, जात्रा भगत ,कालीबाई , गोविन्दगुरु ,ठक्कर बापा,गुलाब महाराज, राणा पूंजा,भीमा नायक ,भाऊसिंह राजनेगी और राजा विश्वासु भील हों‌ । याकि तुंडा भील, रानी दुर्गावती ,सरदार विष्णु गोंडजैसे अनेकानेक वीर-वीरांगनाएं हों। इन्होंने सनातन हिन्दुत्व की रक्षा और राष्ट्र के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है। उस महान परम्परा के संवाहकों के वंशजों को हिन्दू समाज से अलग बतलाना षड्यंत्र नहीं तो और क्या हो सकता है ? इसी प्रकार जनजातीय समाज को विभिन्न तरीकों से उनकी सांस्कृतिक विरासत से काटने के षड्यंत्र निरंतर हो रहे हैं। जो जनजातीय समाज के गौरवशाली अतीत और महान पुरखों की परिपाटी को नष्ट कर रहे हैं। क्या स्वप्न में भी कल्पना की जा सकती है कि जनजातीय समाज ,सनातन हिन्दू धर्म से अलग है ? यदि जनजातीयसमाज हिन्दू संस्कृति से अलग होता तो न तो एकात्मकता के सन्दर्भ मिलते । न ही जनजातीय समाज के महान पूर्वज कन्वर्जन के विरोध और संस्कृति की रक्षा के लिए अपना प्राणोत्सर्ग करते।

उपनिवेशवाद की त्रासदी से से चले आ रहे षड्यंत्रों के बावजूद भी जनजातीय समाज हमेशा सनातन हिन्दू समाज का अविभाज्य मूल अंग रहा आया है । जनजातीय समाज के बिना सम्पूर्ण हिन्दू समाज की कल्पना नहीं की जा सकती है। आखिर वह कौन सा केन्द्र है? जब जनजातीय समाज के बंधु-बांधव कष्ट में होते हैं । उनके साथ षड्यंत्र होते हैं ,तब समूचा हिन्दू समाज स्वयं को पीड़ित और चोटिल समझता है। क्या यह अपनेपन की पीड़ा नहीं है ? यदि जनजातीय समाज को कोई हिन्दू समाज से अलग करने की कुचेष्टा करता है तो शेष हिन्दू समाज का रक्त क्यों खौल उठता है?यह इसीलिए न!क्योंकि वे जनजातीय समाज के हिन्दू बंधु- बान्धव हैं। जनजातीय समाज, सनातन हिन्दू समाज की परम्परा के वे संवाहक हैं, जो सदैव सनातन हिन्दुत्व के लिए प्राणोत्सर्ग करने का साहस रखते रहे आए हैं।

विश्व प्रसिद्ध उड़ीसा का जगन्नाथपुरी मंदिर का इतिहास उसी एकात्मता का साक्षी है। वहां भगवान जगन्नाथ की मूर्ति जनजातीय समाज के महान राजा विश्वासु भील को ही प्राप्त हुई थी। उन्होंने ही नीलगिरि की पहाड़ियों में भगवान जगन्नाथ की स्थापना की थी। इसी तरह भुवनेश्वर के भगवान लिंगराज को बाड जनजाति के पुजारियों द्वारा ही स्नान करवाया जाता है। कुल्के एवं रॉथरमुंड नामक विद्वानों ने अपने विभिन्न शोधों एवं अध्ययनों से पाया कि — “कुरुबा, लंबाडी,येरूकुल,येनाडी एवं चेंचू जनजातियों के तिरुपति के भगवान वेंकटेश्वर से गहरे सम्बन्ध हैं।”

इसी तरह दक्षिण मेघालय में मासिनराम के निकट मावजिम्बुइन गुफाएं हैं । यहां गुफा की छत से टपकते हुए जल मिश्रित चूने के जमाव से शिवलिंग बना हुआ है । ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार वहां लगभग 13 वीं शताब्दी से बहुमान्य एक मान्यता प्रचलित है। उसके अनुसार जयन्तिया पर्वत की गुफा में स्थापित ‘हाटकेश्वर नामक शिवलिंग’ वहाँ की रानी सिंगा के समय से विराजमान हैं। इसी हाटकेश्वर धाम में जयन्तिया जनजाति समाज के लोग प्रति वर्ष ‘शिवरात्रि महोत्सव’ बड़े ही हर्षोल्लास के साथ उत्साहपूर्वक मनाते हैं।

वहीं वैष्णो देवी और केरल के भगवान अय्यप्पम से जनजातीय समाज के आत्मिक एवं आध्यात्मिक सम्बन्ध की प्रतिष्ठा है। जनजातीय समाज भगवान नरसिंम्ह की स्तंभीय शांकवीय प्रतिमाओं को पूजते हैं। इसी प्रकार विन्ध्य का जनजातीय समाज, हिन्दू परम्पराओं, पूजा पध्दतियों का लगभग उसी तरह पालन और निर्वहन करता है ; जिस प्रकार शेष हिन्दू समाज करता है । छ.ग.का रामनामी समाज तो भगवान राम के लिए समर्पित होने के लिए ही जाना जाता है । रामनामी समाज का। विस्तार छ.ग.,म.प्र. और झारखंड के विविध क्षेत्रों में है। रामनामी समाज पूर्णरूप राममय है । रामनामी समाज के बन्धु अपने सम्पूर्ण शरीर में राम नाम का गोदना गुदवा लेते हैं। मोरपंख धारण करना,राम नाम संकीर्तन करना। यह इस बात का प्रमाण है कि – भगवान राम के प्रति अगाध श्रध्दा रखने वाला यह समाज सनातन हिन्दू धर्म का वटवृक्ष है।

इस प्रकार अनेकानेक उदाहरणों और जनजातीय समाज की पध्दति,सनातन हिन्दू धर्म के लिए योगदान देने की शौर्य की कहानियां सर्वत्र व्याप्त है। इन समस्त सन्दर्भों से यही सिद्ध होता कि जनजातीय समाज हिन्दू परम्पराओं का आदि प्रवर्तक है। राष्ट्र के पूर्व से लेकर पश्चिम, उत्तर से लेकर दक्षिण चारो दिशाओं में निवास करने वाला जनजातीय समाज – सनातन हिन्दू धर्म की धर्मध्वजा का पालन करने वाला है। बल्कि यह कहना भी अतिशयोक्ति भी नहीं होगी कि – जिस कठोरता और नियमबद्धता के साथ जनजातीय समाज सनातन हिन्दू धर्म का पालन करता है। अपनी परंपराओं के के प्रति दृढ़ रहता है। उस अनुरूप शेष गैर जनजातीय हिन्दू समाज थोड़ा कमतर ही सिध्दू होता दिखता है। जनजातीय समाज विशुद्ध तौर पर सनातन हिन्दू समाज का अभिन्न अंग है। जो सनातनी मूल्यों एवं धर्मनिष्ठा के लिए जाने जाता है। जो अपनी परंपरागत विविधता के साथ उत्सवधर्मिता और लोक का मानक है।

(लेखक साहित्यकार, स्तम्भकार एवं पत्रकार हैं)

scroll to top