ऑपरेशन सिंदूर पार्ट 2 शुरू कर देना चाहिए

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मिहिर कुमार 

इस बार साजिश इतनी प्रचंड थी कि यदि आतंकी सफल हो जाते तो समूचा विश्व एक ऐसा विनाश भारत में देखता जिसे आज तक कभी सोचा भी न गया हो मगर दुआएं दीजिए आदरणीय प्रधानमंत्री श्री Narendra Modi जी को जिनकी सजग चौकीदारी की वजह से आप और आपका परिवार एक बहुत बड़े विनाश से सुरक्षित बच पाया है…

इस बार कोई छोटी मोटी मछली नहीं बल्कि गुजरात ATS ने कल आतंकी डॉक्टर मोहिउद्दीन के रूप में बहुत बड़े मगरमच्छ को पकड़ा है जिसने कैस्टर ऑयल से रेज़िन नाम का ऐसा तरल पदार्थ बनाया जो साइनाइड से भी 600 गुना ज़्यादा खतरनाक है… इस रेजिन की न तो कोई गंध है और न ही कोई स्वाद… यदि इस रेजिन को फल सब्जियों के अंदर या मांस मछली के अंदर इंजेक्ट करके हिन्दू बाहुल्य क्षेत्रों में यदि बेच दिया जाता तो क्या हश्र होता… यह जनसंहार सीधे सीधे मोदी जी के स्वर्णिम कार्यकाल पर एक बदनुमा दाग लगा जाता…

गुजरात ATS के डिप्टी एसपी एस एल चौधरी को कुछ समय पहले एक खुफिया टिप मिली कि देश में खतरनाक आतंकी मॉड्यूल एक्टिव हो रहा है…अब पूरे भारत में कौन कहां कहां एक्टिव है यह मालूम करना भूसे में सुई ढूंढने जैसा था…मगर जब टिप के आधार पर जांच की गई तो पता चला कि कोई आंध्रप्रदेश का एक शख्स संदिग्ध है…

उस संदिग्ध को मॉनिटर कर 24X7 निगरानी की गई… शुरू में तो ये मेहनत बेकार लगी मगर एक दिन कुछ चीजे इनपुट से मेल खाती दिखी तो एक डॉक्टर का पता चला … निगरानी और बढ़ाने पर उसका नाम डॉ मोहिउद्दीन अहमद सैयद मालूम हुआ…उसकी लोकेशन सर्विलांस पर लगा दी गई… एक दिन उसकी लोकेशन गुजरात के मेहसाना से अहमदाबाद की तरफ मिली जिसके बाद गुजरात ATS एक्टिव हो गई…

गुजरात ATS ने अड़ालज टोल प्लाजा पर घेराबंदी कर दी और एक फोर्ड गाड़ी को रोका…पूछताछ में गाड़ी में मौजूद उस शख्स ने अपना वही नाम बताया जिसकी निगरानी काफी समय से ATS कर रही थी…ATS ने तुरंत उसका फोन अपने कब्जे में लेकर फोन की जांच करनी शुरू की तो उसमें काफी डेटा डिलीट मिला जिसे रिकवर कर लिया गया…मगर कुछ ऐप डिलीट नहीं हो सकी थी क्योंकि डॉक्टर सैयद को ये अंदेशा ही नहीं था कि वो इस तरह से पकड़ा भी जाएगा…फोन की जांच से पता चला कि डॉक्टर अफगानिस्तान से ऑपरेट हो रहे ISIS के ही एक ग्रुप ISKP के कुछ बड़े लोगों के साथ कनेक्टेड था और उसके आका यानि आमिर का नाम ‘अबू खदिजा’ है…

गाड़ी की चेकिंग के दौरान उसमें तीन हथियार मिले जिसमें दो Glock पिस्टल, एक बेरेट पिस्टल और 30 जिंदा कारतूस मिले… पर इसके साथ 10 लीटर केमिकल भी मिला…पूछताछ में डॉक्टर ने बताया कि इस केमिकल से वो रेजिन बना रहा था जो केस्टर बीन्स से बनता है…

हथियार के बारे में पूछताछ करने पर दो नाम सामने आए… आजाद सैफी और मोहम्मद सुहेल जोकि यूपी के रहने वाले है… दोनों को ट्रेस करने पर उनकी लोकेशन राजस्थान बोर्डर के पास बनासकांठा में मिली जिसके बाद तुरंत दोनों को वहां से गिरफ्तार किया गया…इन दोनों ने ये सभी हथियार राजस्थान के हनुमानगढ़ी से लिए थे जिसे पाकिस्तानी शख्स ने ड्रोन की सहायता से पाकिस्तान से हथियार पहुंचाए थे…

यह सभी किसी बड़ी आतंकी वारदात को अंजाम देने वाले थे… इन सभी ने दिल्ली, लखनऊ और अहमदाबाद की रेकी की थी… हमला कब कहाँ कितने बजे करना था ???
जहरीले केमिकल का इस्तेमाल कैसे और कहां कहां किस पर करने वाले थे ??? बाकी कौन कौन लोग इस हमले में शामिल है ??? किस किस शख्स ने क्या क्या मदद इन्हें इस हमले को करने के लिए दी , यह सभी सवाल अभी फिलहाल गुजरात ATS की डायरी में दर्ज है…

आप सिर्फ कल्पना कीजिए कि देश किन हालातों में सांस ले रहा है और यदि नरेंद्र मोदी जैसा चौकीदार भारत की रक्षा न कर रहा होता तो आज क्या अंजाम होता ??? इसलिए चौकस रहिए क्योंकि वो ठान चुके है 2027 के चुनाव से पूर्व कुछ भी बड़ा करने की… 2027 तक का ये समय बेहद संभल कर चलने का है…

कोई शक ???
घटनास्थल अपर NSG पहुंच चुकी है।

देश के Gen Z युवाओ/युवतियों,

जो दहशत, ख़ौफ़नाक माहौल आज आप दिल्ली में देख रहे हो, वो हमने 2004 से लेकर 2014 तक हर हफ़्ते, महीने किसी ना किसी शहर में देखा है।

आज इस हमले के बाद हमे पूर्ण विश्वास है की इसमें संलिप्त आतंकियों, उनके Handlers, गैंग की खाल विदेशों तक भी उधेड़ दी जाएगी।

पर उस समय ऐसा नहीं होता था, तब इनको कवर fire करने के लिए RSS की साज़िश बता दी जाती थी।

जागरूक रहिए, इस देश पर बहुत गिद्ध निगायें है।

पहचानिए…

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अजी हाँ

A Team और B Team एक ही खेल, दो चेहरे

जब भी इस देश पर हमला होता है तो एक A-Team होती है और एक B-Team..

A-Team हथियार उठाती है, और B-Team नैरेटिव..

A-Team बम लगाती है जैसे पुलवामा में लगाया था, जैसे उरी में लगाया था, जैसे पहलगाम में किया गया, और अब दिल्ली में..इनका काम है खून बहाना, डर फैलाना, और देश के भीतर नफ़रत का बीज बो देना..

फिर आती है B-Team कलम और कैमरा लेकर..
जो कहती है कहीं ये इनसाइड जॉब तो नहीं?
जो कहती है ये इलेक्शन जीतने की साज़िश ती नहीं..

A-Team पाकिस्तान की लैब में बनती है
B-Team भारत के अंदर से ट्रेंड करती है
A-Team बारूद से हमला करती है
B-Team ट्वीट से

पुलवामा में हमारे जवान शहीद हुए तो A-Team ने धमाका किया, B-Team ने कहा, चुनाव से पहले सरकार को फायदा मिलेगा।

जब भारत ने बालाकोट में जवाब दिया तो वही B-Team बोली कितने मरे, सबूत कहाँ हैं?

यानी जिनके लिए आतंकी सिर्फ “मिसगाइडेड यूथ” हैं,
उनके लिए भारत की सेना “ओवररिएक्टिंग गवर्नमेंट एजेंसी” है।

सेम स्क्रिप्ट, सेम सिंक, सेम टूलकिट हर बार..

पहलगाम में भी यही खेल हुआ, और अब दिल्ली धमाकों में वही पैटर्न दोहराया जा रहा है..

A-Team ने हमला किया, B-Team ने भारत की ही नीयत पर सवाल उठाया..और दोनों का निशाना एक ही है भारत का बहुसंख्यक समाज, भारत का मनोबल, और भारत का नेतृत्व।

A-Team की गोलियाँ शरीर पर लगती हैं,
B-Team के झूठ दिमाग पर।
एक देश को घायल करती है, दूसरी उसके विश्वास को
एक C टीम भी होती है जो इन्हें ऐम्प्लीफ़ाई करती है..

कांग्रेस और उनके जैसे सोच वाले लोगों को समझना चाहिए ये “Pakistan vs perception” का गेम है।
और इसमें B-Team हर बार पाकिस्तान को क्लीन चिट देकर उसके लिए ही बैटिंग करती नज़र आती है..

कौन बारूद से हमला करता है, और कौन बयान से।
कौन दुश्मन के साथ खड़ा है, और कौन देश के साथ..ये देश अच्छे से जानता है..

जिहाद वॉच: आतंक की नई चुनौतियाँ और सतर्क भारत का उदय

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गोविन्दा मिश्रा

दिल्ली । भारत ने आतंकवाद की विभीषिकाएँ झेली हैं — संसद पर हमला, मुंबई की 26/11 की रात, पुलवामा का दर्द और असंख्य छोटे-बड़े धमाके जिन्होंने देश की आत्मा को झकझोरा। लेकिन आज का भारत इन चुनौतियों के सामने सिर झुकाने वाला नहीं, बल्कि जवाब देने वाला राष्ट्र बन चुका है। हाल की घटनाएँ, जैसे फरीदाबाद में 2,900 किलोग्राम विस्फोटक की बरामदगी या गुजरात की “राइसिन साजिश”, इस सच्चाई की पुष्टि करती हैं कि आतंक के तरीके बदल गए हैं — और भारत का रुख भी।

आतंक की नई परतें: जब सफ़ेद कोट बना हथियार

फरीदाबाद से बरामद विस्फोटक किसी साधारण अपराध का हिस्सा नहीं थे। यह साजिश देश के प्रतीक — लाल क़िले — पर हमला करने की मंशा से जुड़ी थी। पहले के आतंकवादी चेहरे पहचानने योग्य होते थे — फटा बैग, पुरानी बाइक, या सीमापार से आई बंदूक। लेकिन इस बार आतंक ने नया रूप धारण किया: सफ़ेद कोट, प्रयोगशालाएँ और तकनीकी उपकरण।
आतंकवाद अब सिर्फ बंदूक या बम नहीं, बल्कि विचारधारा और विज्ञान का विकृत संगम बन चुका है। “व्हाइट कॉलर जिहाद” — यानी शिक्षित आतंकवाद — एक वास्तविकता है। यह वह चेहरा है जहाँ डॉक्टर, इंजीनियर या वैज्ञानिक कट्टरपंथ की विचारधारा से प्रभावित होकर विनाश के औजार बना रहे हैं।

मोदी युग में खुफिया चौकसी और जवाबदेही

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत की खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों की संरचना पहले से कहीं अधिक सशक्त और स्वतंत्र हुई है। राजनीतिक हस्तक्षेप कम हुआ है, और निर्णय प्रक्रिया तेज़। यही कारण है कि कई बड़ी साजिशें उनके परिपक्व होने से पहले ही ढह गईं।
फरीदाबाद, मुरशीदाबाद और गुजरात की घटनाएँ इस नई रणनीति का प्रमाण हैं। पहले जहाँ प्रतिक्रियाएँ औपचारिक होती थीं, अब रोकथाम प्राथमिकता बन गई है। यह परिवर्तन केवल नीतिगत नहीं, बल्कि वैचारिक भी है — “पहले प्रहार करो, फिर पछताओ नहीं।”

कांग्रेस काल और असुरक्षा का दशक

यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि 2004 से 2014 के बीच भारत में आतंकवाद की घटनाएँ चरम पर थीं। दिल्ली, मुंबई, वाराणसी, पुणे, जयपुर — कोई शहर सुरक्षित नहीं रहा। लेकिन अधिक चिंता का विषय था, तब की सरकार की प्रतिक्रिया।
बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद जो राजनीतिक बयान आए, उन्होंने सुरक्षा बलों के मनोबल को चोट पहुँचाई। जब किसी नेता की करुणा आतंकियों के प्रति अधिक दिखे और शहीद पुलिसकर्मी के प्रति कम, तो संदेश खतरनाक होता है।
इसी दौर में “हिंदू आतंकवाद” जैसी संज्ञा सामने आई — जिसने न केवल असली जिहादी नेटवर्क को छिपाया, बल्कि देशभक्तों की निष्ठा पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया।

तुष्टीकरण बनाम राष्ट्रहित: दो राजनीतिक दृष्टिकोण

कांग्रेस का दृष्टिकोण अक्सर तुष्टीकरण की नीति पर आधारित रहा — जिससे सीमापार और घरेलू आतंकी नेटवर्क को अप्रत्यक्ष सहूलियत मिली। वहीं भाजपा का दृष्टिकोण राष्ट्रहित के केंद्र में खड़ा रहा।
मुरशीदाबाद में बांग्लादेश सीमा के पास बरामद 150 बमों की घटना याद दिलाती है कि निष्क्रियता और वोट-बैंक की राजनीति आतंक को पनपने देती है। भाजपा की नीति स्पष्ट रही — सीमाओं की सुरक्षा और आंतरिक नेटवर्क पर कठोर नियंत्रण।

डिजिटल युग में आतंक का नया चेहरा

आज आतंकवादी संगठन बंद कमरों से नहीं, बल्कि एन्क्रिप्टेड चैट्स, डार्क वेब और डिजिटल वॉलेट्स के माध्यम से साजिश रच रहे हैं। यह “साइबर जिहाद” है — जो बिना बम के भी उतना ही घातक हो सकता है।
इस चुनौती से निपटने के लिए केवल संवेदनशीलता नहीं, बल्कि तकनीकी दक्षता चाहिए। यही वजह है कि वर्तमान सरकार ने डिजिटल इंटेलिजेंस नेटवर्क और साइबर सुरक्षा में बड़े निवेश किए हैं। ड्रोन निगरानी, डेटा एनालिटिक्स और एआई-सक्षम निगरानी प्रणाली अब भारत की आंतरिक सुरक्षा का हिस्सा हैं।

राष्ट्रवाद और सुरक्षा का पुनर्परिभाषित अर्थ

भारत में अब “राष्ट्रवाद” कोई राजनीतिक शब्द नहीं, बल्कि एक नागरिक जिम्मेदारी बन चुका है। मोदी युग का राष्ट्रवाद पुलिस, सेना या एजेंसियों तक सीमित नहीं — यह जनसहभागिता का रूप ले रहा है।
सुरक्षा अब केवल सीमाओं की रक्षा नहीं, बल्कि विचारों की रक्षा भी है। इस दृष्टिकोण ने आतंक के विरुद्ध राष्ट्रीय एकता को नई मजबूती दी है।

कठोर शासन बनाम कमजोर राजनीति

जहाँ पहले अफसर निर्णय लेने से डरते थे, अब वे राष्ट्रीय समर्थन के साथ काम कर रहे हैं। शासन की इस स्थिरता ने एजेंसियों को निडर बनाया है। यही अंतर है कमजोर राजनीति और मज़बूत शासन में।
कांग्रेस ने कायरता को धर्मनिरपेक्षता कहा, भाजपा ने साहस को देशभक्ति। परिणाम यह है कि आज भारत पहले से अधिक सुरक्षित महसूस करता है।

लाल क़िले से नई चेतावनी तक

लाल क़िले पर संभावित हमले की योजना केवल भौतिक नहीं, प्रतीकात्मक भी थी। यह भारत की आत्मा पर प्रहार का प्रयास था। लेकिन यह विफल हुआ — क्योंकि अब भारत में ऐसा नेतृत्व है जो किसी के आगे झुकता नहीं और किसी भी षड्यंत्र को पनपने नहीं देता।
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में आतंक की साजिशें “परिपक्व” नहीं हो पातीं, वे ढह जाती हैं। यही है नया भारत — सतर्क, सशक्त और निर्णायक।

सतर्क राष्ट्र, सुरक्षित भविष्य

आतंक का स्वरूप बदल रहा है — अब यह सीमाओं से नहीं, विचारों और तकनीक से आ रहा है। लेकिन भारत भी बदल चुका है। राजनीतिक इच्छाशक्ति, तकनीकी कौशल और जनसहयोग के समन्वय से राष्ट्र ने एक नई सुरक्षा संरचना गढ़ी है।
यह भारत अब केवल अपने घाव नहीं गिनता, बल्कि हमलावर की दिशा में भी देखता है।
“जो भारत को धमकाएगा, उसे खोजकर समाप्त किया जाएगा” — यह केवल एक नीति नहीं, बल्कि नई राष्ट्रीय चेतना का उद्घोष है।

(लेखक गोविंदा मिश्रा दिल्ली में पठन, पाठन, लेखन में सक्रिय हैं)

1983 में घटे असम के नेली नरसंहार की सच्चाई सार्वजनिक की जाए — PPFA की मांग

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नव ठाकुरिया

गुवाहाटी: देशभक्त नागरिकों के संगठन पैट्रियोटिक पीपल्स फ्रंट असम (PPFA) ने असम सरकार द्वारा विधानसभा में नेली नरसंहार से जुड़ी रिपोर्ट पेश किए जाने के निर्णय का स्वागत करते हुए कहा है कि 1983 में घटित इस भयावह घटना की वास्तविक सच्चाई अब देश के सामने आनी चाहिए।
संगठन ने यह भी कहा कि असमिया समाज को ‘मुस्लिम-विरोधी’ बताने की किसी भी साजिश को नाकाम किया जाए और तथ्यों के आधार पर वर्षों से गढ़ी जा रही नकारात्मक छवि को मिटाया जाए।

ज्ञात हो कि 18 फरवरी 1983 को राज्य की नेली क्षेत्र में हुआ यह नरसंहार दुनिया के सबसे भीषण जनसंहारों में गिना जाता है। रिपोर्टों के अनुसार, इसमें 2,000 से अधिक बांग्लादेश मूल के मुस्लिम बसने वालों की मौत हुई थी। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इस त्रासदी को मुख्य रूप से महिलाओं और बच्चों की हत्या के रूप में प्रस्तुत किया, लेकिन शायद ही किसी रिपोर्ट में यह उल्लेख हुआ कि इस हिंसा के दौरान हमलावर (स्थानीय जनजातीय और असमिया समुदाय के लोग सहित) भी जवाबी कार्रवाई में मारे गए थे।

PPFA ने अपने बयान में कई बुनियादी प्रश्न उठाए हैं —

“इन हत्याओं में कौन-से हथियार इस्तेमाल किए गए थे? क्या बिना किसी आधुनिक हथियार के स्थानीय लोग इतनी बड़ी संख्या में लोगों को कुछ घंटों में मार सकते थे? यदि मृतक मुस्लिम समुदाय से थे, तो उन्हें कहाँ दफनाया गया? क्या नेली क्षेत्र में सामूहिक कब्रों के कोई संकेत या प्रमाण मिले हैं?”
संगठन का मानना है कि तेवारी आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाना इस पूरे घटनाक्रम की वास्तविकता को समझने की दिशा में अहम कदम होगा। इससे न केवल ऐतिहासिक सच्चाई सामने आएगी, बल्कि उन भ्रांतियों और राजनीतिक कथाओं का भी अंत होगा, जिनके जरिए असमिया समाज को दोषी ठहराने की कोशिशें की जाती रही हैं।

PPFA का कहना है कि रिपोर्ट सार्वजनिक होने से न सिर्फ पीड़ितों और उनके परिजनों के सवालों के जवाब मिल सकेंगे, बल्कि असम और असमिया समाज के प्रति फैलाई गई गलत धारणाओं का भी तथ्यात्मक और निष्पक्ष रूप से खंडन हो सकेगा।

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