उदयपुर फाइल्स: साहस, सच्चाई और सिनेमा का एक अनमोल प्रयास

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दिल्ली। भारतीय सिनेमा में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि समाज को झकझोरने, सवाल उठाने और सच्चाई को सामने लाने का साहस रखती हैं। ऐसी ही एक फिल्म है उदयपुर फाइल्स, जिसे अमित जानी जैसे साहसी फिल्म निर्माता ने बनाया है। यह फिल्म न केवल एक सिनेमाई प्रयास है, बल्कि एक ऐसी कहानी है जो समाज के उन कोनों को उजागर करती है, जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। इस लेख में हम उदयपुर फाइल्स के महत्व, इसके साहसिक निर्माण और इसे देखने की आवश्यकता पर चर्चा करेंगे, ताकि आप भी इस फिल्म को देखने के लिए प्रेरित हों और इसे समर्थन देकर भविष्य में ऐसे साहसी प्रयासों को बढ़ावा दे सकें।

अमित जानी का साहस: सच्चाई को पर्दे पर उतारने की हिम्मत

सबसे पहले, हमें अमित जानी के साहस की सराहना करनी होगी। एक ऐसी दुनिया में जहां सिनेमा अक्सर व्यावसायिकता और लोकप्रियता के दायरे में सिमट जाता है, अमित ने एक संवेदनशील और विवादास्पद विषय को चुनकर समाज के सामने सच को प्रस्तुत करने का जोखिम उठाया। उदयपुर फाइल्स केवल एक फिल्म नहीं है; यह एक सामाजिक दस्तावेज है जो उदयपुर की एक दुखद घटना को आधार बनाकर बनाया गया है। इस तरह के विषय पर फिल्म बनाना आसान नहीं है। इसके लिए न केवल गहन शोध और संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है, बल्कि सामाजिक और व्यावसायिक दबावों का सामना करने की हिम्मत भी चाहिए। अमित जानी ने न केवल इस चुनौती को स्वीकार किया, बल्कि इसे एक सिनेमाई रूप देकर साबित किया कि सच्चाई को सामने लाने के लिए जुनून और दृढ़ संकल्प ही काफी है।

उनका यह प्रयास उन सभी फिल्म निर्माताओं के लिए एक प्रेरणा है जो कम संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं। अमित जानी ने यह दिखाया कि यदि आपके पास कहानी कहने का जुनून है, तो सीमित संसाधन भी आपके रास्ते में बाधा नहीं बन सकते। उनकी इस हिम्मत को सलाम करते हुए हमें यह समझना होगा कि यदि हम इस तरह के साहसी प्रयासों को समर्थन नहीं देंगे, तो भविष्य में कोई भी निर्माता ऐसे विषयों पर फिल्म बनाने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगा।

उदयपुर फाइल्स: एक कहानी जो समाज को आईना दिखाती है

उदयपुर फाइल्स उदयपुर की उस भयावह घटना पर आधारित है, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था। यह फिल्म केवल उस घटना को दोहराने का प्रयास नहीं करती, बल्कि इसके सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय पहलुओं को गहराई से उजागर करती है। यह हमें उन सवालों से रूबरू कराती है जो हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं-न्याय, सामाजिक एकता, और सच्चाई को सामने लाने की कीमत। फिल्म का कथानक न केवल भावनात्मक रूप से प्रभावशाली है, बल्कि यह दर्शकों को सोचने पर मजबूर करता है कि हमारा समाज कहां जा रहा है और हमारी जिम्मेदारी क्या है।

फिल्म की कहानी को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया गया है, जो इसे और भी प्रभावी बनाता है। यह न तो सनसनीखेज बनने की कोशिश करती है और न ही किसी समुदाय को निशाना बनाती है। इसके बजाय, यह एक निष्पक्ष दृष्टिकोण के साथ सच्चाई को सामने लाने का प्रयास करती है। यह एक ऐसी फिल्म है जो दर्शकों को केवल मनोरंजन ही नहीं देती, बल्कि उन्हें अपने आसपास की दुनिया को नए सिरे से देखने के लिए प्रेरित करती है।
राष्ट्रवादी फिल्मों का परिदृश्य और उदयपुर फाइल्स की विशिष्टता

राष्ट्रवादी कहे जाने वाली फिल्मों के बारे में अक्सर यह शिकायत होती है कि उनमें सिनेमाई शिल्प (क्राफ्ट) पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। कम बजट के कारण इन फिल्मों में तकनीकी गुणवत्ता, जैसे कि सिनेमाटोग्राफी, संपादन, या संगीत, कभी-कभी अपेक्षाकृत कमजोर रहती है। यह बात समझ में आती है, क्योंकि सीमित संसाधनों में एक भव्य प्रोडक्शन बनाना चुनौतीपूर्ण होता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि इन फिल्मों के कथ्य, उद्देश्य, या प्रभाव को नजरअंदाज कर दिया जाए। उदयपुर फाइल्स इस मिथक को तोड़ती है। भले ही यह फिल्म बड़े बजट की न हो, लेकिन इसका प्रभाव और इसकी कहानी की ताकत इसे एक यादगार अनुभव बनाती है।

अमित जानी ने इस फिल्म में सीमित संसाधनों के बावजूद कहानी को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। यह फिल्म हमें यह भी सिखाती है कि सिनेमा केवल भव्य सेट्स और महंगे दृश्यों का नाम नहीं है; यह एक माध्यम है जो भावनाओं, विचारों और सच्चाई को व्यक्त करता है। उदयपुर फाइल्स का हर फ्रेम इस साहस और ईमानदारी को दर्शाता है, जो इसे अन्य समकालीन फिल्मों से अलग करता है।

कम बजट, बड़ा प्रभाव: वैकल्पिक माध्यमों की संभावना

यह सच है कि कम बजट की फिल्मों में कई बार वह भव्यता नहीं होती जो बड़े प्रोडक्शन हाउस की फिल्मों में दिखती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कहानी कहने का जुनून कम हो। यदि बजट की कमी एक चुनौती है, तो फिल्म निर्माता वैकल्पिक माध्यमों जैसे टेली फिल्म, शॉर्ट फिल्म, या वेब सीरीज के जरिए अपनी कहानी को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर सकते हैं। उदयपुर फाइल्स इस दिशा में एक कदम है। यह फिल्म दिखाती है कि सीमित संसाधनों में भी एक ऐसी कहानी कही जा सकती है जो दर्शकों के दिलों को छू जाए।

अमित जानी जैसे फिल्म निर्माताओं के लिए यह एक प्रेरणा हो सकती है कि वे भविष्य में वेब सीरीज या शॉर्ट फिल्म जैसे फॉर्मेट्स में भी अपने विचारों को प्रस्तुत करें। आज के डिजिटल युग में, जहां ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और यूट्यूब जैसे माध्यम दर्शकों तक आसानी से पहुंच रहे हैं, कहानी कहने की संभावनाएं अनंत हैं। उदयपुर फाइल्स इस बात का उदाहरण है कि यदि आपके पास साहस और जुनून है, तो आप किसी भी माध्यम में अपनी बात प्रभावी ढंग से कह सकते हैं।

क्यों देखें उदयपुर फाइल्स?

सच्चाई का साहस: यह फिल्म एक ऐसी घटना पर आधारित है जो समाज के लिए महत्वपूर्ण है। इसे देखकर आप न केवल उस घटना के बारे में गहराई से समझ पाएंगे, बल्कि यह भी जान पाएंगे कि सच्चाई को सामने लाने के लिए कितना साहस चाहिए।

अमित जानी का जुनून: इस फिल्म को देखकर आप एक ऐसे फिल्म निर्माता का समर्थन करेंगे, जिसने साहस और ईमानदारी के साथ एक मुश्किल विषय को चुना। यह समर्थन भविष्य में और साहसी कहानियों को जन्म देगा।

सामाजिक जागरूकता: यह फिल्म आपको अपने समाज, अपने आसपास की घटनाओं और अपनी जिम्मेदारियों के बारे में सोचने पर मजबूर करेगी।
सिनेमाई अनुभव: भले ही यह फिल्म कम बजट की हो, लेकिन इसकी कहानी और प्रस्तुति इसे एक यादगार अनुभव बनाती है। यह उन फिल्मों में से है जो आपके दिल और दिमाग पर लंबे समय तक असर छोड़ती हैं।

सिनेमा हॉल में समर्थन

अगर हम चाहते हैं कि भारतीय सिनेमा में साहसी और सार्थक कहानियां सामने आती रहें, तो हमें उदयपुर फाइल्स जैसी फिल्मों को सिनेमा हॉल में जाकर देखना होगा। यह न केवल अमित जानी जैसे फिल्म निर्माताओं का हौसला बढ़ाएगा, बल्कि यह संदेश भी देगा कि दर्शक ऐसी कहानियों को महत्व देते हैं। यदि हम इस तरह की फिल्मों को अनदेखा करेंगे, तो भविष्य में कोई भी निर्माता ऐसे जोखिम भरे विषयों पर फिल्म बनाने की हिम्मत नहीं करेगा। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम साहसी सिनेमा को समर्थन दें, ताकि यह परंपरा जीवित रहे।

उदयपुर फाइल्स एक ऐसी फिल्म है जो साहस, सच्चाई और सिनेमाई जुनून का प्रतीक है। अमित जानी ने न केवल एक फिल्म बनाई है, बल्कि समाज को एक आईना दिखाया है। यह फिल्म हमें यह सिखाती है कि सीमित संसाधनों में भी बड़े सपने देखे जा सकते हैं और सच्चाई को सामने लाया जा सकता है। इसे सिनेमा हॉल में देखकर आप न केवल एक प्रभावशाली कहानी का हिस्सा बनेंगे, बल्कि एक साहसी फिल्म निर्माता के सपने को भी समर्थन देंगे। आइए, हम सब मिलकर उदयपुर फाइल्स को देखें और इस साहसिक प्रयास को वह सम्मान दें जिसका यह हकदार है।

कुत्ता कथा

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सुशांत झा

कथा 01

जज साब ने कुत्तों पर जो अपना फैसला दिया है, मुझे घणा संदेह है कि यह एक राजनीतिक फैसला है। मुद्दा कुत्ता भले ही हो, निशाना कहीं और होगा। वैसे भी मुई सरकार अवैध घुसपैठियों पर लगी हुई है, तो ऐसे में जजों का शासन से प्रभावित हो जाना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं लगती। ध्यान रहे, जजों ने डॉगियों के बारे में ऐसा कोई फैसला नहीं सुनाया है– जिनके मालिक उन्हें लेकर सार्वजनिक जगहों पर, पार्कों में और लिफ्ट तक में मल-मूत्र त्याग करवाते रहते हैं। आप कह सकते हैं ये डॉगी कुलीन घरों के वे आवारा बच्चे हैं जो कई बार अपनी महंगी गाड़ी किसी ठेले या पटरी वाले पर चढ़ा देते हैं और बाद में कानूनी झोल का फायदा उठाकर बच जाते हैं। गली के कुत्तों का कोई रखवाला नहीं है।

वैसे गली के कुत्ते भी कम नहीं हैं—एक तो मुए बिना किसी लाभ की उम्मीद के आबादी बढ़ाते रहते हैं। ऊपर से म्यूनिसपैलिटी वाले आंख मूंद लेते हैं। कुत्तों के परिवार नियोजन का बजट अधिकारी खा जाते हैं। कर्मचारी पहले से ही कम है। मेरे एक मित्र का कहना है कि जब सरकार स्कूल-कॉलेज में शिक्षक बहाल नहीं कर रही तो कुत्ता पकड़ने/नियोजन विभाग में कर्मचारी क्यों भर्ती करेगी? सुधी पत्रकारों को इस पर शोध करना चाहिए कि पिछले दस सालों में कुत्ता नियंत्रण/नियोजन विभाग में कितना बजट बढ़ा है या कितने कर्मचारी बहाल हुए हैं।
पुलिस विभाग में कई बार ये जुमला चलता है कि फलाने साब ने कुत्ते का खाना खाकर फ्लैट खरीद लिया। दरअसल, साब डॉग स्क्व़ॉड में अधिकारी थे। कुत्ते दुबले होते जाते थे, लेकिन साब का धन बढ़ रहा था।
बहुत पहले सरिता या गृहशोभा पत्रिका में मैंने एक चुटकुला पढ़ा था जिसमें पति अपनी पत्नी से कह रहा है:
‘अजी सुनती हो। म्यूनिसपैलिटी वाले शहर के तमाम आवारा कुत्तों को पकड़ रहे हैं’
पत्नी: ‘तभी तो कहती हूँ कि कुछ दिन घर से बाहर न निकला करो।’
आजकल तो ऐसे चुटकुले भी नहीं लिखे जाते।

वैसे कुत्तों को अगर शहर से निकाल दिया गया तो सोचिए क्या स्थिति होगी? हमने शहरों में, अपार्टमेंटों में पहले ही मैना, गोरैया और गिलहरी देखना बंद कर दिया है। बिल्लियों का भी वही हाल है। मैं कैट की बात नहीं कर रहा। हिंदी में म्याऊँ करने वाली बिल्ली की बात कर रहा हूँ। अनिल यादव अपने प्रसिद्ध यात्रा वृत्तांत ‘वह भी कोई देस है महाराज’ में लिखते हैं कि जब वे और उनका दोस्त नगालैंड की सीमा में गया तो चिड़ियाँ दिखनी बंद हो गई। सौ किलोमीटर के बाद भी जब कुत्ते नहीं दिखे तो दोनों भयांक्रांत हो गए और दोस्त ने इशारे से कहा कि वहाँ से लौटना ही बेहतर है।

कुत्ते सर्वहारा वर्ग के भी प्रतीक हैं और हमारी सामासिक संस्कृति के भी। कुत्तों को भैरव का वाहन माना गया है। कुत्तों की कृपा से कई तांत्रिकों की दुकानें चलती हैं। डिप्रेसन के शिकार, ऑफिस में अपने बॉस से परेशान, असफल किस्म के व्यापारी और अमेरिकी वीजा नहीं पाने वाले कई लोग भी कुत्तों को खाना खिलाकर ग्रह दशा बदलने की उम्मीद करते हैं।

ऐसे में मुझे पक्का यकीन है कि जो लोग कुत्तों के समर्थन में आन्दोलन कर रहे हैं–उनमें दो तरह के लोग होंगे। एक राजनीतिक चेतना से सम्पन्न लोग और दूसरे धार्मिक रूप से आस्थावान। राजनीतिक लोग वाम प्रवृत्ति के हो सकते हैं–क्योंकि डॉगी पालने की उनकी क्षमता नहीं होती। यहाँ डॉगी पूँजीवाद या कहें तो एक हद तक दक्षिणपंथ का प्रतीक है। कोर्ट, डॉगियों के खिलाफ बोलने का साहस नहीं जुटा सकता। ऐसे में अदालत ने कुत्तों के खिलाफ फैसला देकर दो वर्गों को नाराज कर दिया है। रही बात सरकार की, तो उसे वामपंथियों से इस मामले में ज्यादा समस्या नहीं होगी। लेकिन ‘भैरव वाहन’ वाले उसका खेल खराब कर सकते हैं।
वैसे देखा जाए तो शहरी समाज में, घनी आबादी वाले इलाकों में गली के कुत्ते हैं भी बहुत। भोजन का भरपेट जुगाड़ हो जाता है। उधर गांव के कुत्ते भूखे मर रहे हैं। गांव वीरान हो रहे हैं और घरों में लोहे के फाटक लग गए हैं। दूसरी तरफ शहर के कुत्ते मुटा रहे हैं। डॉगीज़ को लाइफ स्टाइल वाली बीमारियाँ हो रही हैं। वे डिप्रेशन में जा रहे हैं और उन्हें रिहैब में रखा जा रहा है।

ऐसे में शहर के इन मोटे ताजे, बेरोजगार और अराजक कुत्तों पर कार्रवाई कर अदालत ने कोई बुरा काम नहीं किया है–लेकिन उनकी पूरी आबादी को शिफ्ट कर शेल्टर होम में भेजने का फरमान वैसा ही जैसा अमेरिका का राष्ट्रपति एक पूरे देश की आबादी को कहीं और बसाने के संदर्भ में कह रहा है।
जहाँ तक काटने की बात है तो अदालत कुलीन कुत्तों पर मौन है, गरीब कुत्तों पर कहर बरपा रही है। ये वैसा ही मामला है कि पंचायत सचिव का भ्रष्टाचार आपको दिख रहा है, लेकिन राजधानियों में बैठे बड़े सचिवों का भ्रष्टाचार नहीं दिख रहा है।

कुत्तों के समर्थन में इन पंक्तियों के लेखक ने पहले भी कीबोर्ड चलाई है और हमारा कीबोर्ड आगे भी इस पर चलेगा। हम कुत्तों के प्रति हुए इस अन्याय के प्रति अपना विरोध दर्ज करते हैं।
हमारी मांग है कि कुत्तों के सर्वांगीण हित के लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी बनाई जाए, तभी कोई फैसला हो।

कथा 02

सुबह-सुबह इनको(इनका एक और भाई है) किसी ने मुँह-अंधेरे घर के पास छोड़ दिया। ये काँय-काँय कर रहे थे, तो नींद खुली। इनका छोटा भाई थोड़ा शर्मीला निकला और मुझे देखते ही भाग गया। इसे मैंने खाने को कुछ दिया तो एक घंटा घर के बाहर धूप सेंकता रहा। फिर भैया पड़ोस में किसी से मिलने गए तो उनके पीछे-पीछे पड़ोसी के घर के बाहर बैठ गया।

गांव के कुत्ते आमतौर पर सबके होते हैं, हवा, पानी और चिड़ियों की तरह। मैंने सोचा जब तक गाँव में हूँ, इसके भोजन का इंतजाम तो हो ही जाएगा, क्या पता था कि नामुराद एक ही घंटे में पड़ोस में जाकर बैठ जाएगा!
शायद इसकी मम्मी पड़ोस के गांव की है। पाँच-छह बच्चे होंगे तो किसी ने मेरे टोले में छोड़ दिया। दिक्कत क्या है कि हमारे यहाँ आबादी कम है और रात-बिरात कभी-कभी सियार टहल लेते हैं। ऐसे में इन पिल्लों का भगवान मालिक है।

वैसे, एक बार मेरे टोले से किसी ने ऐसे ही छह पिल्ले-पिल्लियों में से दो को नहर पार दूसरे टोले में भेज दिया था। लेकिन कुतिया ने दो किलोमीटर दूर तक सूँघ लिया था और मैंने देखा कि वह दोनों बच्चों को बारी-बारी मुँह में दबाए हुए नहर में तैरकर इस पार ले आई थी। उस ज़माने में नहर बननी शुरू ही हुई थी। घटना तीस साल पुरानी होगी। नहर अभी भी बन ही रही है।

बचपन में कुत्तों का संग अपना प्रिय शगल था। साथ ही चिड़ियों के घोंसले में जाकर उनके बच्चे देखना। मेरा दो साल का बेटा कुत्तों को देखते ही मचलने लगता है और ‘कुत्ता बाबू-कुत्ता बाबू, आओ-आओ’ कहकर पुकारता है। कुतिया बच्चे को जन्म देती थी तो दादी रोटी देती थी, खिलाने के लिए। आमतौर पर किसी न किसी ‘गोठुल्ले'(गाय-भैंस रखने की जगह, जहाँ पुआल या लकड़ी भी हो) में वो बच्चे को जन्म देती थी। जो लोग जान-पहचान के होते, सिर्फ वही बच्चे तक जा सकते थे, बाकी लोगों को देखकर कुतिया गुर्राती थी।

मेरे बाबा बोलते थे कि सबसे बढ़िया ‘कतिका कुकुर’ होता है, यानी वो कुत्ता जो कार्तिक में जन्म लेता है। उनका कहना था कि कतिका कुकुर चोरों के अभियान पर निकलते ही समझ जाता है कि चोर आने वाला है। एक बार हमारे परिवार(परिवार माने छह सात गोतिया/दियाद का घर) का एक पालतू कुत्ता हमारे गाम-कक्का के साथ रेलवे स्टेशन चला गया। वो फिर नहीं लौटा। मैं बहुत रोया था। ये सन् 1985 की बात होगी। गाम कक्का रेलवे में नौकरी करते थे और कुत्ते, बिल्लियों, तोतों इत्यादि से उन्हें बहुत प्रेम था। वे साल-दो साल में गांव आते और चार-पांच महीना रहते। वे गुजरात में गांधीधाम में रहते थे और ट्रेन चलाते थे। वे जब गांव आते तो इलाके भर से उनके चेले जुट जाते और सरकार-सरकार कहते, क्योंकि वे खूब ‘पार्टी’ करते थे। वे तालाब के किनारे बंसी में काँटा फँसाकर मछली मारते थे और हमलोगों को गुलेल चलाना और पतंग उड़ाना सिखाते थे। वे कहते थे कि वो दिन दूर नहीं जब घर-घर में पर्दे पर हेममालिनी नाचेगी और लोगों को सिनेमा हॉल नहीं जाना पड़ेगा। सन् अस्सी-पचासी में गांव में ये बातें अजूबी लगती थी।
खैर, बात कुत्ते की हो रही थी। एक बार किसी दूसरे टोले के कुत्ते ने मेरे एक चाचा को काट लिया तो दूसरे चाचा ने कुत्ते को जाकर पीट दिया। उस कुत्ते के ‘मालिक’ ने पंचायत बिठाने की कोशिश की, लेकिन इधर के लोग भी कम नहीं थे। बात आई-गई हो गई।

मेरे पापा ने सन् 2000 के आसपास एक कुतिया को पाल लिया था। पाल क्या लिया था, वो पला गई थी। वो परित्यक्ता थी और कुपोषण की शिकार थी। पापा उसे खिलाने लगे। वो छोटी दादी के आंगन से चोरी करके कुछ खा पी आती थी। छोटी दादी ने उसका नाम ‘लूही’ रख दिया, शायद पुरानी मैथिली में इसका अर्थ चोरनी होता होगा! लेकिन वो नाम हमें पसंद आया और लूही उसका परमानेंट नाम हो गया। लगता था जैसे यूरोपियन टाइप का नाम हो। खैर, वो पापा की परम भक्त थी। एक बार उसने एक जहरीले सांप को घर में घुसने से पहले ही मार दिया था। उसके बाद से तो उसके भोजन की गुणवत्ता बढ़ा दी गई थी। लूही को ज्यादा मान-सम्मान मिलने लगा था। लेकिन उसकी संगति कुछ आवारा कुत्तों के साथ हो गई थी। ऐसी उड़ती हुई खबरें आईं कि वे गैंग बनाकर खेतों में अकेले-दुकले बकरियों का शिकार करने लगे थे। एकाध के तो सबूत भी मिले थे। लेकिन पापा को भरोसा नहीं था कि लूही ऐसा करेगी।

एक दिन लूही के गैंग ने चुपके से फिर एक बकरी का शिकार कर लिया। बकरी एक गरीब यादव की थी जिसकी बेटी और नाती उसे चराते थे। उसकी बेटी और नाती को उसके पति ने छोड़ दिया था और दूसरी शादी कर ली थी। वो नेपाल का रहने वाला था। ऐसे में बकरी उनके लिए बड़ा धन थी। लेकिन लूही ने बकरी का शिकार कर लिया। ऐसे में उस सत्रह साल के लड़के ने इलाके में उस गैंग के खात्मे का प्रण ले लिया। उसने कुदाल से कई कुत्तों की हत्या कर दी जिसमें लूही भी एक थी।

पापा को ये बात जब पता चली तो वो दो दिन तक खाना नहीं खाए। पापा नाराज भी बहुत हुए। वो बकरी वाला गांव का ही था, उसने अपने नाती को अपने किसी रिश्तेदार के पास कमाने दिल्ली भेज दिया। उसे लगा कि मेरे पापा कहीं उसकी पिटाई न कर दें। खैर, बात आई-गई हो गई।

मेरे मामा के पास भी एक कुत्ता था जिसका नाम उन्होंने रीगन रखा था। ये सन् अस्सी के दशक की बात है। मामा कम्यूनिस्ट थे और उन्होंने कुत्ते का नाम अमेरिका के राष्ट्रपति के नाम पर रखा था। उस समय मुझे ये बातें समझ में नहीं आती थीं। मधुबनी कम्यूनिस्टों का गढ़ होता था जहाँ से भोगेंद्र झा सांसद होते थे।
अब गाँव के कुत्तों में वो बात नहीं रही। घरों में लोहे के फाटक लग गए हैं और चारो तरफ चारदीवारी खड़ी है। कुत्तों को खाना देने वाला कोई नहीं है। कुत्ते तो कुत्ते बिल्लियाँ भी घर नहीं आ पाती हैं। कुत्ते-बिल्ली चूहे, कीट-पतंगे और सांप से रक्षा करते थे। वो सब अब पेस्ट क्रंटोल वाला ही करेगा आने वाले समय में। सबसे बड़ी बात ये कि कुत्ते घर की, टोले की और गांव की रखवाली करते थे। वे अजनबियों पर निगाह रखते थे। अब वैसा नहीं है।
गांवों में सन्नाटा पसर रहा है। लगता है सारे लोग शहरों में समा जाएँगे। कुछ मकान तो ऐसे हैं जहाँ उसका मालिक दस-दस साल से नहीं आया है। हालाँकि जब से बिजली-सड़क अच्छी हुई है, कुछ लोग रिटायर करके आए हैं।
लेकिन कुत्ते, बिल्लियों, गौरैयों और चिड़ियों के लिए जगह गांव में भी कम होती जा रही है।

कथा 03

सुबह-सुबह इनको(इनका एक और भाई है) किसी ने मुँह-अंधेरे घर के पास छोड़ दिया। ये काँय-काँय कर रहे थे, तो नींद खुली। इनका छोटा भाई थोड़ा शर्मीला निकला और मुझे देखते ही भाग गया। इसे मैंने खाने को कुछ दिया तो एक घंटा घर के बाहर धूप सेंकता रहा। फिर भैया पड़ोस में किसी से मिलने गए तो उनके पीछे-पीछे पड़ोसी के घर के बाहर बैठ गया।

गांव के कुत्ते आमतौर पर सबके होते हैं, हवा, पानी और चिड़ियों की तरह। मैंने सोचा जब तक गाँव में हूँ, इसके भोजन का इंतजाम तो हो ही जाएगा, क्या पता था कि नामुराद एक ही घंटे में पड़ोस में जाकर बैठ जाएगा!
शायद इसकी मम्मी पड़ोस के गांव की है। पाँच-छह बच्चे होंगे तो किसी ने मेरे टोले में छोड़ दिया। दिक्कत क्या है कि हमारे यहाँ आबादी कम है और रात-बिरात कभी-कभी सियार टहल लेते हैं। ऐसे में इन पिल्लों का भगवान मालिक है।
वैसे, एक बार मेरे टोले से किसी ने ऐसे ही छह पिल्ले-पिल्लियों में से दो को नहर पार दूसरे टोले में भेज दिया था। लेकिन कुतिया ने दो किलोमीटर दूर तक सूँघ लिया था और मैंने देखा कि वह दोनों बच्चों को बारी-बारी मुँह में दबाए हुए नहर में तैरकर इस पार ले आई थी। उस ज़माने में नहर बननी शुरू ही हुई थी। घटना तीस साल पुरानी होगी। नहर अभी भी बन ही रही है।

बचपन में कुत्तों का संग अपना प्रिय शगल था। साथ ही चिड़ियों के घोंसले में जाकर उनके बच्चे देखना। मेरा दो साल का बेटा कुत्तों को देखते ही मचलने लगता है और ‘कुत्ता बाबू-कुत्ता बाबू, आओ-आओ’ कहकर पुकारता है। कुतिया बच्चे को जन्म देती थी तो दादी रोटी देती थी, खिलाने के लिए। आमतौर पर किसी न किसी ‘गोठुल्ले'(गाय-भैंस रखने की जगह, जहाँ पुआल या लकड़ी भी हो) में वो बच्चे को जन्म देती थी। जो लोग जान-पहचान के होते, सिर्फ वही बच्चे तक जा सकते थे, बाकी लोगों को देखकर कुतिया गुर्राती थी।

मेरे बाबा बोलते थे कि सबसे बढ़िया ‘कतिका कुकुर’ होता है, यानी वो कुत्ता जो कार्तिक में जन्म लेता है। उनका कहना था कि कतिका कुकुर चोरों के अभियान पर निकलते ही समझ जाता है कि चोर आने वाला है। एक बार हमारे परिवार(परिवार माने छह सात गोतिया/दियाद का घर) का एक पालतू कुत्ता हमारे गाम-कक्का के साथ रेलवे स्टेशन चला गया। वो फिर नहीं लौटा। मैं बहुत रोया था। ये सन् 1985 की बात होगी। गाम कक्का रेलवे में नौकरी करते थे और कुत्ते, बिल्लियों, तोतों इत्यादि से उन्हें बहुत प्रेम था। वे साल-दो साल में गांव आते और चार-पांच महीना रहते। वे गुजरात में गांधीधाम में रहते थे और ट्रेन चलाते थे। वे जब गांव आते तो इलाके भर से उनके चेले जुट जाते और सरकार-सरकार कहते, क्योंकि वे खूब ‘पार्टी’ करते थे। वे तालाब के किनारे बंसी में काँटा फँसाकर मछली मारते थे और हमलोगों को गुलेल चलाना और पतंग उड़ाना सिखाते थे। वे कहते थे कि वो दिन दूर नहीं जब घर-घर में पर्दे पर हेममालिनी नाचेगी और लोगों को सिनेमा हॉल नहीं जाना पड़ेगा। सन् अस्सी-पचासी में गांव में ये बातें अजूबी लगती थी।

खैर, बात कुत्ते की हो रही थी। एक बार किसी दूसरे टोले के कुत्ते ने मेरे एक चाचा को काट लिया तो दूसरे चाचा ने कुत्ते को जाकर पीट दिया। उस कुत्ते के ‘मालिक’ ने पंचायत बिठाने की कोशिश की, लेकिन इधर के लोग भी कम नहीं थे। बात आई-गई हो गई।

मेरे पापा ने सन् 2000 के आसपास एक कुतिया को पाल लिया था। पाल क्या लिया था, वो पला गई थी। वो परित्यक्ता थी और कुपोषण की शिकार थी। पापा उसे खिलाने लगे। वो छोटी दादी के आंगन से चोरी करके कुछ खा पी आती थी। छोटी दादी ने उसका नाम ‘लूही’ रख दिया, शायद पुरानी मैथिली में इसका अर्थ चोरनी होता होगा! लेकिन वो नाम हमें पसंद आया और लूही उसका परमानेंट नाम हो गया। लगता था जैसे यूरोपियन टाइप का नाम हो। खैर, वो पापा की परम भक्त थी। एक बार उसने एक जहरीले सांप को घर में घुसने से पहले ही मार दिया था। उसके बाद से तो उसके भोजन की गुणवत्ता बढ़ा दी गई थी। लूही को ज्यादा मान-सम्मान मिलने लगा था। लेकिन उसकी संगति कुछ आवारा कुत्तों के साथ हो गई थी। ऐसी उड़ती हुई खबरें आईं कि वे गैंग बनाकर खेतों में अकेले-दुकले बकरियों का शिकार करने लगे थे। एकाध के तो सबूत भी मिले थे। लेकिन पापा को भरोसा नहीं था कि लूही ऐसा करेगी।

एक दिन लूही के गैंग ने चुपके से फिर एक बकरी का शिकार कर लिया। बकरी एक गरीब यादव की थी जिसकी बेटी और नाती उसे चराते थे। उसकी बेटी और नाती को उसके पति ने छोड़ दिया था और दूसरी शादी कर ली थी। वो नेपाल का रहने वाला था। ऐसे में बकरी उनके लिए बड़ा धन थी। लेकिन लूही ने बकरी का शिकार कर लिया। ऐसे में उस सत्रह साल के लड़के ने इलाके में उस गैंग के खात्मे का प्रण ले लिया। उसने कुदाल से कई कुत्तों की हत्या कर दी जिसमें लूही भी एक थी।

पापा को ये बात जब पता चली तो वो दो दिन तक खाना नहीं खाए। पापा नाराज भी बहुत हुए। वो बकरी वाला गांव का ही था, उसने अपने नाती को अपने किसी रिश्तेदार के पास कमाने दिल्ली भेज दिया। उसे लगा कि मेरे पापा कहीं उसकी पिटाई न कर दें। खैर, बात आई-गई हो गई।

मेरे मामा के पास भी एक कुत्ता था जिसका नाम उन्होंने रीगन रखा था। ये सन् अस्सी के दशक की बात है। मामा कम्यूनिस्ट थे और उन्होंने कुत्ते का नाम अमेरिका के राष्ट्रपति के नाम पर रखा था। उस समय मुझे ये बातें समझ में नहीं आती थीं। मधुबनी कम्यूनिस्टों का गढ़ होता था जहाँ से भोगेंद्र झा सांसद होते थे।

अब गाँव के कुत्तों में वो बात नहीं रही। घरों में लोहे के फाटक लग गए हैं और चारो तरफ चारदीवारी खड़ी है। कुत्तों को खाना देने वाला कोई नहीं है। कुत्ते तो कुत्ते बिल्लियाँ भी घर नहीं आ पाती हैं। कुत्ते-बिल्ली चूहे, कीट-पतंगे और सांप से रक्षा करते थे। वो सब अब पेस्ट क्रंटोल वाला ही करेगा आने वाले समय में। सबसे बड़ी बात ये कि कुत्ते घर की, टोले की और गांव की रखवाली करते थे। वे अजनबियों पर निगाह रखते थे। अब वैसा नहीं है।
गांवों में सन्नाटा पसर रहा है। लगता है सारे लोग शहरों में समा जाएँगे। कुछ मकान तो ऐसे हैं जहाँ उसका मालिक दस-दस साल से नहीं आया है। हालाँकि जब से बिजली-सड़क अच्छी हुई है, कुछ लोग रिटायर करके आए हैं।
लेकिन कुत्ते, बिल्लियों, गौरैयों और चिड़ियों के लिए जगह गांव में भी कम होती जा रही है।

(श्री झा के सोशल मीडिया खाते से साभार)

कहानी: एक जुनून की कीमत

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पटना की गलियों में बसी थी कविता की छोटी-सी दुनिया। आठ साल पहले उसकी शादी राकेश से हुई थी, जो एक सम्मानित सरकारी अधिकारी थे। दो प्यारे बच्चे, सात साल का आरव और चार साल की अनन्या, उनके घर की रौनक थे। सुबह की चाय से लेकर रात की कहानियों तक, उनका परिवार हंसी-खेल और प्यार से भरा था। लेकिन कहते हैं न, खुशहाल जिंदगी में भी कभी-कभी ऐसी आंधी आती है, जो सब कुछ उड़ा ले जाती है।

दो साल पहले कविता को सोशल मीडिया पर वीडियो बनाने का शौक चढ़ा। पहले तो यह सिर्फ समय काटने का जरिया था। वह खाना बनाने, बच्चों के साथ खेलने या घर सजाने के छोटे-मोटे वीडियो बनाती। लोग तारीफ करते, लाइक और कमेंट की बरसात होती। कविता को यह सब अच्छा लगने लगा। धीरे-धीरे यह शौक जुनून में बदल गया। वह दिन-रात बस वीडियो बनाने, एडिट करने और अपलोड करने में डूबी रहती। राकेश ने कई बार टोका, “कविता, बच्चों को भी समय दो, मुझे भी थोड़ा वक्त चाहिए।” लेकिन कविता हंसकर टाल देती, “बस थोड़ा और, फिर सब ठीक हो जाएगा।”
इसी दौरान सोशल मीडिया के जरिए कविता की जिंदगी में आया विवेक। वह एक फ्रीलांस वीडियो एडिटर था, जो कविता के वीडियो को और आकर्षक बनाता। उसकी आवाज में एक अजीब-सी कशिश थी, जो कविता को भाने लगी। विवेक न सिर्फ वीडियो एडिट करता, बल्कि कविता को नए-नए आइडिया भी देता। कविता उसे इसके लिए पैसे देती, और धीरे-धीरे दोनों की बातचीत वीडियो से आगे बढ़कर निजी जिंदगी तक पहुंच गई। रात-रात भर चैट, फोन कॉल्स, और हंसी-मजाक ने कविता को एक ऐसी दुनिया में ले जाना शुरू कर दिया, जहां न राकेश था, न बच्चे, न परिवार की जिम्मेदारियां।
कविता की रुचि अपने पति और बच्चों में कम होने लगी। राकेश को उसका बदला व्यवहार खटकने लगा। वह समझ नहीं पा रहा था कि आखिर बात क्या है। एक दिन बच्चों के स्कूल की मीटिंग थी, लेकिन कविता ने बहाना बनाकर मना कर दिया। राकेश ने गुस्से में उसका फोन चेक किया और विवेक के साथ उसकी बातचीत देखकर सन्न रह गया। बात सिर्फ वीडियो एडिटिंग तक सीमित नहीं थी। दोनों के बीच ऐसी बातें थीं, जो एक शादीशुदा औरत और एक अजनबी के बीच नहीं होनी चाहिए।
राकेश ने कविता से बात करने की कोशिश की, लेकिन कविता उल्टा उस पर बरस पड़ी। “तुम्हें मेरी खुशी से क्या मतलब? मैं अपनी जिंदगी जीना चाहती हूं!” राकेश स्तब्ध था। उसने सोचा कि शायद समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। लेकिन एक रात कविता घर छोड़कर चली गई। बच्चों की नींद और राकेश की बेचैनी के बीच यह खबर जंगल की आग की तरह फैली कि कविता विवेक के साथ सिलीगुड़ी भाग गई है।

मामला थाने तक पहुंचा। राकेश एक रसूखदार अधिकारी था, इसलिए पुलिस और कुछ प्रभावशाली लोग इसे दबाने में जुट गए। मीडिया को भनक तक नहीं लगी। सिलीगुड़ी के एक होटल में कविता और विवेक को पकड़ा गया। कविता ने साफ कह दिया, “मैं राकेश के साथ नहीं रहना चाहती।” उसकी आंखों में न पछतावा था, न बच्चों की चिंता। वह बस अपनी “आजादी” की बात कर रही थी।
राकेश टूट चुका था। वह बच्चों को कैसे समझाए कि उनकी मां अब उनके पास नहीं आएगी? समाज में सवाल उठ रहे थे। कुछ लोग कविता को दोष दे रहे थे, तो कुछ राकेश पर ताने कस रहे थे कि उसने पत्नी को “कंट्रोल” नहीं किया। लेकिन सवाल यह था कि आखिर गलती किसकी थी?

यह कहानी सिर्फ कविता और राकेश की नहीं, बल्कि उस समाज की है, जहां सोशल मीडिया का जुनून परिवारों को तोड़ रहा है। आज के दौर में लोग वास्तविक रिश्तों से ज्यादा आभासी दुनिया में जीने लगे हैं। लाइक, कमेंट और तारीफों की चमक में लोग अपने बच्चों, जीवनसाथी और जिम्मेदारियों को भूल रहे हैं। यह एक मानसिक विकृति है, जो कैंसर से भी खतरनाक है, क्योंकि इसका कोई इलाज नहीं। यह बीमारी धीरे-धीरे परिवारों को, रिश्तों को और समाज को खोखला कर रही है।
कविता की गलती थी कि उसने अपने शौक को जुनून बनने दिया और परिवार को पीछे छोड़ दिया। लेकिन समाज भी कम जिम्मेदार नहीं, जो ऐसी आभासी दुनिया को बढ़ावा देता है, जहां लोग अपनी पहचान, अपने मूल्यों को भूल जाते हैं। हमें यह समझना होगा कि सोशल मीडिया एक उपकरण है, जीवन का आधार नहीं। अगर हम समय रहते नहीं संभले, तो ऐसे और परिवार टूटेंगे, बच्चे मां-बाप के प्यार से वंचित होंगे, और समाज में सिर्फ खालीपन बचेगा।

गलती किसकी?

गलती कविता की थी, जो अपने परिवार को छोड़कर एक आभासी रिश्ते की चमक में खो गई। गलती उस समाज की भी है, जो ऐसी मानसिकता को सामान्य मानने लगा है। और शायद गलती हम सबकी है, जो इस बीमारी को फैलने से रोकने के लिए कुछ नहीं कर रहे। आइए, अपने रिश्तों को, अपने परिवार को, और अपनी जिम्मेदारियों को प्राथमिकता दें, क्योंकि कोई लाइक या कमेंट उस प्यार की जगह नहीं ले सकता, जो एक परिवार देता है।

देश के पहले वोट चोर पंडित नेहरू

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दिल्ली। देश की राजनीतिक इतिहास में 1946 का कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव एक ऐसी घटना है, जिसे अक्सर “पहली वोट चोरी” के रूप में याद किया जाता है। इस चुनाव में सरदार वल्लभभाई पटेल को 15 में से 12 प्रादेशिक कांग्रेस समितियों (पीसीसी) का समर्थन मिला, जो उन्हें स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित करने के लिए पर्याप्त था। हालांकि, महात्मा गांधी के हस्तक्षेप के बाद जवाहरलाल नेहरू को इस पद पर बिठाया गया, जिसे कई इतिहासकार और राजनीतिक विश्लेषक एक तरह की “वोट चोरी” के रूप में देखते हैं।

ऐतिहासिक साक्ष्य

1946 का कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव: कांग्रेस पार्टी के दस्तावेजों से पता चलता है कि despite गांधीजी के नेहरू के पक्ष में खुले तौर पर समर्थन के बावजूद, 12 पीसीसी ने पटेल को नामांकित किया। बाकी तीन ने नामांकन प्रक्रिया से परहेज किया। नेहरू को किसी भी पीसीसी द्वारा नामांकित नहीं किया गया था।

गांधी का हस्तक्षेप: 20 अप्रैल 1946 को, गांधीजी ने नेहरू के पक्ष में अपना विकल्प स्पष्ट किया, और इसके बाद पटेल से अपनी उम्मीदवारी वापस लेने को कहा गया, जिसे उन्होंने तुरंत मान लिया।

जनमत का नजरिया: प्रख्यात इतिहासकार राजमोहन गांधी, जो पटेल की सबसे प्रामाणिक जीवनी के लेखक हैं, ने कहा कि पार्टी के भीतर पटेल का समर्थन स्पष्ट था।

समकालीन समानता
आज, नेहरू-गांधी परिवार की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर फिर से सवाल उठ रहे हैं। 1946 की घटना को दोहराते हुए, यह आरोप लगाया जा रहा है कि परिवार बिना किसी योग्यता के एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी हासिल करना चाहता है, जिसे नेहरू की तरह “वोट चोरी” के रूप में देखा जा रहा है।

राहुल गांधी की महत्वाकांक्षा: हाल के समय में, कांग्रेस पार्टी के भीतर और बाहर से यह धारणा बन रही है कि राहुल गांधी, नेहरू के वंशज होने के नाते, प्रधानमंत्री बनने की इच्छा रखते हैं, भले ही जनता का समर्थन उनके पक्ष में न हो।

पार्टी का प्रभाव: नेहरू-गांधी परिवार का कांग्रेस पार्टी पर लंबे समय से प्रभाव रहा है, और यह प्रभाव आज भी जारी है, जिसे कई लोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करने के रूप में देखते हैं।

1946 की घटना में, पटेल को पार्टी के भीतर व्यापक समर्थन मिला, लेकिन गांधी के हस्तक्षेप ने नेहरू को प्रधानमंत्री बनाया, जिसे “वोट चोरी” के रूप में देखा जाता है। आज, नेहरू-गांधी परिवार की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं फिर से सवालों के घेरे में हैं, और 1946 की घटना को दोहराने का डर व्यक्त किया जा रहा है। यह देश के लोकतांत्रिक मूल्यों और नेतृत्व चयन की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

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