विजयादशमी पर संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त 62,555 कार्यक्रमों का आयोजन

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कार्यक्रमों में गणवेश में 32.45 लाख स्वयंसेवक उपस्थित रहे, 25 हजार स्थानों पर आयोजित पथ संचलनों में 25.45 लाख स्वयंसेवकों की सहभागिता

जबलपुर: कचनार सिटी में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल बैठक के अंतिम दिन पत्रकार वार्ता में सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने कार्यकारी मंडल बैठक तथा संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त श्री विजयादशमी के उपलक्ष्य में देशभर में आयोजित कार्यक्रमों के बारे में जानकारी प्रदान की। संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त संस्कारधानी जबलपुर कार्यकारी मंडल की बैठक के आयोजन से संघ यात्रा के दस्तावेज में दर्ज हो गया है।

उन्होंने कहा कि विजयादशमी के मंगल अवसर पर नागपुर सहित देशभर में कार्यक्रम संपन्न हुए। शताब्दी वर्ष के निमित्त धार्मिक, साहित्य, कला, उद्योग, व अन्य क्षेत्रों के गणमान्य लोगों ने अपनी शुभकामनाएं प्रेषित की हैं। संघ की 100 वर्षों की यात्रा में लाखों स्वयंसेवकों के साथ ही समाज के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों ने सहयोग दिया, उन सभी के प्रति आभार व्यक्त करते हैं।

विजयादशमी के अवसर पर देशभर में आयोजित कार्यक्रमों के आंकड़े संघ कार्य के विस्तार को दर्शाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में 59,343 मंडलों में से 37,250 मंडलों में कार्यक्रम हुए, जिसमें आस-पास के मंडलों के स्वयंसेवक भी शामिल हुए, इस प्रकार 50,096 मंडलों का प्रतिनिधित्व रहा। नगरीय क्षेत्रों में 44,686 बस्तियों में से 40,220 बस्तियों का प्रतिनिधित्व कार्यक्रमों में रहा। इसके अतिरिक्त 6700 विजयादशमी कार्यक्रम हुए। इस प्रकार कुल मिलाकर 62,555 विजयादशमी उत्सव हुए। विशेष यह कि 80 प्रतिशत कार्यक्रम विजयादशमी के दिन ही हुए, कुछ स्थानों पर स्थानीय कारणों के चलते बाद में या पहले कार्यक्रम हुए।

देशभर में आयोजित इन कार्यक्रमों में 32,45,141 स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित रहे। पथ संचलन के कार्यक्रम सभी जगह नहीं हुए, कुछ स्थानों पर हुए। देश में 25,000 स्थानों पर पथ संचलन हुए, इनमें 25,45,800 स्वयंसेवक गणवेश में सहभागी हुए। देश का कोई भी भौगोलिक क्षेत्र अछूता नहीं रहा, इन कार्यक्रमों से यह फैलाव दिखता है। अंडमान में भी कार्यक्रम हुआ, लद्दाख, अरुणाचल, मेघालय व नागालैंड में भी हुआ है।

विजयादशमी के कार्यक्रमों में समाज के विभिन्न समुदाय, समूह की सहभागिता रही। नागपुर के कार्यक्रम में विदेश से भी अतिथियों की उपस्थिति रही। उन्होंने सरसंघचालक जी व अन्य अधिकारियों से नागपुर और दिल्ली में भेंट की। उन्होंने संघ को समझा भी और शुभकामनाएं भी दीं।

पिछले वर्ष अक्तूबर में हुई बैठक के बाद से संघ कार्य की दृष्टि से एक साल में 10 हजार नए स्थानों पर संघ कार्य प्रारंभ हुआ है। वर्तमान में 55052 स्थानों पर 87398 शाखाएं लग रही हैं जो पिछले वर्ष से 15000 अधिक हैं। इसके अतिरिक्त साप्ताहिक मिलन 32362 हैं। यह दोनों मिलाकर कुल स्थान 87414 होती है। पिछले कुछ वर्षों में विशेष प्रयासों के कारण जनजाति क्षेत्र के साथ-साथ श्रमजीवी, कृषक, विद्यार्थी, व्यवसायी, अन्य क्षेत्रों में भी कार्य का विस्तार हुआ है।

शताब्दी वर्ष के आगामी कार्यक्रम

बैठक में शताब्दी वर्ष के आगामी कार्यक्रमों को लेकर भी चर्चा हुई। अभी तक समाज का अच्छा प्रतिसाद मिला है। संघ का कार्य समाज, राष्ट्र का कार्य है। आगे बस्ती/मंडल स्तर पर हिन्दू सम्मेलन करने वाले हैं। हिन्दू सम्मेलनों के माध्यम से मंडल, बस्ती स्तर तक पंच परिवर्तन से विषयों को लेकर पहुंचेगे, प्रयास रहेगा कि समाज के आचरण का विषय बने। इनमें साधु संत, सज्जन शक्ति, मातृ शक्ति, प्रमुख लोग विचार रखेंगे। अनुमान है कि 45000 ग्रामीण और 35000 नगरीय स्थानों पर सम्मेलन आयोजित होंगे। खंड, नगर स्तर पर सामाजिक सद्भाव बैठकों का आयोजन होगा, जिला स्तर पर प्रमुख जन नागरिक गोष्ठियों का आयोजन होगा।
अधिकाधिक लोगों को राष्ट्र कार्य में जोड़ना है। सभी लोग शाखा में आ जाएं, ऐसी अपेक्षा नहीं है। पर, अपने-अपने क्षेत्र में समाज की एकता, समाज की समरसता, राष्ट्र की उन्नति के भाव से कार्य करें। शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों का उद्देश्य संगठन की शक्ति बढ़ाना नहीं, समाज की आत्मशक्ति को बढ़ाना है।

सरकार्यवाह जी ने बताया कि कार्यकारी मंडल में तीन वक्तव्य जारी किए गए हैं।

24 नवंबर को सिक्ख पंथ के नवम् गुरू श्री गुरु तेगबहादुर जी की शहादत को 350 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। यहां बैठक में गौरव समर्पण किया है। आगामी समय में देशभर में होने वाले कार्यकर्मों में कार्यकर्ता भाग भी लेंगे, और कई जगह आयोजन में भी सहभागी होंगे। गुरू तेगबहादुर जी ने धर्म, संस्कृति और समाज की एकता की रक्षा के लिए प्राण अर्पण किया। वह अपने समाज, धर्म, संस्कृति के रक्षा के लिए कटिबद्ध रहे, यह आज पीढ़ी को बताना है।

भगवान बिरसा मुंडा जनजाति क्षेत्र के जननायक, जिन्होंने भारत भूमि के लिए कार्य किया वह सभी के लिए आदर योग्य हैं। बिरसा मुंडा केवल अंग्रेजों के खिलाफ लड़े, ऐसा नहीं है। उन्होंने धर्मांतरण के खिलाफ, जनजातीय क्षेत्र के विकास के लिए भी विचार रखा। उनके प्रति हम श्रद्धा अर्पित करते हैं। और उनकी 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में सारे समाज को सहभागी होना चाहिए। संघ ने बिरसा मुंडा को प्रातः स्मरणीय माना है।

वंदेमातरम राष्ट्रगीत के 150 वर्ष हो रहे हैं। 1975 में राष्ट्रगीत के 100 वर्ष पूर्ण होने पर देशभर में समितियां बनाई थीं। लेकिन दुर्भाग्य से आपातकाल लगने के कारण इस कार्य को स्थगित करना पड़ा। स्वतंत्रता संग्राम में जिसे गीत के रूप में गाया था, 1975 में फिर से स्वतंत्रता संग्राम करने के दिए आ गए थे। वर्तमान पीढ़ी को इसकी रोचक कहानी बतानी चाहिए, वंदेमातरम् केवल गीत नहीं है, भारत की आत्मा का मंत्र है। भारत की पहचान व संस्कृति को समझना आवश्यक है।

झारखंड और छत्तीसगढ़ में नक्सली गतिविधियों में परिवर्तन दिख रहा है। नक्सली शस्त्रों को त्याग कर समाज के मुख्य धारा में आ रहे हैं।

मणिपुर के विषय पर कहा कि यद्यपि वहां की सरकार अभी कार्य में नहीं है, किंतु जल्दी ही वहां अच्छे दिन आएंगे। संघ कार्यकर्ताओं ने पिछले दो वर्षों में संकट की परिस्थिति में धरातल पर कार्य किया। वहां पर परस्पर विश्वास का निर्माण करने की दृष्टि से कई बातें हुई हैं।

बैठक में भारत के युवाओं के प्रति चिंता व्यक्त की गई। आज का युवा एक ओर भारत के विकास में तकनीक और अपने कौशल के साथ आगे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर नशे के कारण वह पिछड़ रहा है। हमारे शैक्षिक संस्थानों स्कूलों महाविद्यालयों जैसे क्षेत्रों में ड्रग्स का विक्रय हो रहा है, जिसे रोकने के लिए सरकार के साथ-साथ समाज, धार्मिक संस्थाओं, समाज के कार्यकर्ताओं आदि को सक्रिय होना पड़ेगा। इसमें कुटुंब प्रबोधन की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है।

रोबो डॉक्टर के बाद रोबोट जज ??

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बृज खंडेलवाल

आगरा । एक अंधेरी कोठरी में उत्तर प्रदेश का राम सिंह नाम का बूढ़ा आसमान का रंग ही भूल चुका है। 1998 में गिरफ्तार हुआ, वो अपराध का दोषी भी नहीं साबित हुआ, मगर सत्ताईस साल से इंतज़ार कर रहा है—उस मुकदमे का जो कभी शुरू ही नहीं हुआ। उसी शहर में एक बलात्कार पीड़िता, जो हमले के वक्त चौदह साल की थी, अब बयालीस की हो चुकी है। उसकी फाइल पीले कागज़ों के ढेर में दफन है। ये कहानियाँ अपवाद नहीं, नियम हैं। पचास मिलियन मुकदमे अदालतों की साँसें रोक रहे हैं। न्याय का वादा इतना देर से आता है कि बेमानी हो जाता है। गवेल (जज का हथौड़ा) की आवाज़ अब धीमी नहीं, खामोश हो चुकी है। मगर इस कब्रिस्तान-ए-उम्मीद में एक चिंगारी जल रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस—जो कभी दूर का ख्वाब था—अब भारत की न्याय व्यवस्था को कगार से खींचने को तैयार है। ये मशीनों का इंसानों पर कब्ज़ा नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी का जजों को वो चीज़ लौटाना है जो खो गई: वक्त।

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आंकड़े चीख रहे हैं। पूरे देश में पचास मिलियन मुकदमे लटके हैं, ज़िला अदालतों में अकेले चवालीस मिलियन। दस साल से ज़्यादा पुराने एक लाख से ऊपर बलात्कार के केस। विचाराधीन कैदी—जिन्हें दोषी भी नहीं ठहराया गया—अक्सर सजा से ज़्यादा वक्त जेल में काटते हैं। अर्थव्यवस्था हर साल एक-दो लाख करोड़ रुपये खून की तरह बहा रही है। पच्चीस फीसदी जजों की कुर्सियाँ खाली पड़ी हैं, क्लर्क कागज़ों में डूबे हैं, वकील तारीख पर तारीख लेते हैं। संविधान का “शीघ्र न्याय” का हक आम आदमी के लिए क्रूर मज़ाक बन गया है।

कुछ लोग डरते हैं कि AI न्याय को कोड में बदल देगा, इंसानी रहम छीन लेगा। डर समझ में आता है, मगर पुराना हो चुका है। क्रांति शुरू हो चुकी है और नतीजे ज़बान बंद कर देते हैं। भारत में सुप्रीम कोर्ट का SUPACE हजारों जटिल फाइलें सेकंडों में निगल जाता है, पुराने फैसले निकालता है, केस की समरी तैयार करता है—वो काम जो क्लर्क को दिन भर लगता था। SUVAS दस भारतीय भाषाओं में फैसले अनुवाद करता है, कानूनी भाषा (jargon) की दीवार गिराता है। अदालत AI नाम का पायलट तीन हज़ार अदालतों में चला—बैकलॉग तीस फीसदी कम, केस हैंडलिंग पाँच गुना तेज़। ये प्रयोग नहीं, सबूत हैं कि टेक्नोलॉजी बड़े पैमाने पर काम करती है। और नतीजे चौंकाने वाले!

दुनिया देखो तो यकीन और पक्का होता है। एस्टोनिया सात हज़ार यूरो से कम के छोटे दावों को AI से निपटाता है, सटीकता लगभग सौ फीसदी, बैकलॉग लगभग खत्म। ब्राज़ील की AI-सहायता वाली अदालतों ने लटके केस आधे कर दिए—जज एक ही वक्त में दोगुने फैसले सुना रहे हैं। कोलंबिया में एल्गोरिदम रोज़ सैकड़ों साधारण दस्तावेज़ तैयार करते हैं, जज मुश्किल सवालों पर दिमाग लगाते हैं। ये देश परफेक्शन का इंतज़ार नहीं कर रहे; व्यावहारिक औज़ार चला रहे हैं जो न्याय की व्यवस्थाओं को तेज़ और निष्पक्ष बनाते हैं।

जादू बदलने में नहीं, सशक्त बनाने में है। AI अस्सी फीसदी बोरिंग काम सुलटा सकता है: नए केस तुरंत छाँटना, बच्चों से बलात्कार या ज़मानत जैसे ज़रूरी मामले फ्लैग करना, कानून और पुराने फैसले पलक झपकते निकालना, समन, ज़मानत आदेश, साधारण फैसले का पहला ड्राफ्ट तैयार करना। पायलट में वो ड्राफ्ट इंसानी तर्क से सत्तानवे फीसदी मेल खाते हैं, मगर जज हमेशा जाँचता और हस्ताक्षर करता है। रियल-टाइम ट्रांसक्रिप्शन और अनुवाद भाषा की दीवार तोड़ते हैं—तमिल बोलने वाला किसान अपनी ज़बान में सुनवाई समझता है। नतीजा? घरेलू हिंसा की पीड़िता पंद्रह साल की जगह नब्बे दिन में राहत पा सकती है, विचाराधीन कैदी सजा से ज़्यादा सड़ता नहीं।

ये संभावना बिखरे परीक्षणों से नहीं, राष्ट्रीय जंग से पूरी होगी। कल्पना करो AI-न्याय मिशन—तीन साल में पच्चीस मिलियन केस साफ करने का हौसला। सौ ज़िलों में एकीकृत AI-जस्टिस पोर्टल शुरू करो, हर साल दस लाख साधारण केस निपटाए। पचास मिलियन भारतीय फैसलों का डेटा फीड करो ताकि AI हमारे कानून, हमारी मिसालें, हमारी हकीकत समझे। दस हज़ार करोड़ लगाओ—वापसी दस गुना, अर्थव्यवस्था और भरोसे में। हर कदम पर इंसानी निगरानी अटल: जज आखिरी फैसला करेंगे, खासकर जटिल मामलों में। स्वतंत्र बोर्ड बायस जाँचेगा, पारदर्शिता रखेगा, डेटा कानून का पालन सुनिश्चित करेगा।

दाँव पर कुछ भी नहीं, सब कुछ है। तीस साल बाद आया न्याय देर से नहीं, बेमानी है। राम सिंह अपने खोए दशक वापस नहीं पा सकता। बलात्कार पीड़िता उस अदालत को नहीं भूल सकती जिसने उसे भुला दिया। मगर उनकी त्रासदी लाखों को बचा सकती है। तेज़, निष्पक्ष न्याय व्यवस्था विलासिता नहीं, विकसित भारत की बुनियाद है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस—इंसानी हिकमत और अटूट नैतिकता के साथ ताकत बन सकती है।

SHAMELESS PRESTITUTION BY HINDUSTAN TIMES — ONCE AGAIN

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Vijay Kranti

Delhi : Today 31st October India’s otherwise respected newspapr HINDUSTAN TIMES once again committed the shameless crime of selling its space for Chinese propaganda. In a two full-page reproduction of CHINA-DAILY’s propaganda it has included an article on Indian scholar Kumarajiva (4th & 5th century) titled “BUDDHIST SCHOLAR BROUGHT TO LIFE IN MUSIC AND DANCE” it makes a regrettable attempt of justifying colonial occupation of EAST TURKISTAN as today’s China’s ‘XINJIANG UYIGHUR AUTONOMOUS REGION’.

It is really shameful that a newspaper like the Hindustan Times should stoop down to sell its column to a colonialist regime in exchange for money at the cost of sentiments of occupied UYGHUR people.

किसे नहीं भा रही है छत्तीसगढ़ की समरसता?

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~ कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

बीते कुछ दिनों से छत्तीसगढ़ में सामाजिक वैमनस्य, घ्रणा और अलगाववाद के लगातार मामले सामने आ रहे हैं। राजधानी रायपुर के VIP चौक में स्थापित छत्तीसगढ़ महतारी की मूर्ति को एक मानसिक विक्षिप्त, शराबी ने तोड़ दिया। इसके बाद जमकर बवाल हुआ। सरकार और प्रशासन ने तुरंत सतर्कता दिखाते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन एक राजनीतिक दल के नेता ने इस घटना का विरोध जताते हुए — पंडित दीनदयाल उपाध्याय , श्यामा प्रसाद मुखर्जी, अग्रसेन महाराज, भगवान झूलेलाल आदि को लेकर विवादित और आपत्तिजनक बातें कही। इसके बाद छत्तीसगढ़ में सामाजिक तनाव बढ़ने लगा। क्रिया की प्रतिक्रिया हुई और संबंधित नेता के खिलाफ भी FIR दर्ज हो गई। लेकिन मामला यहीं नहीं रुका — रायगढ़ में सिंधी समाज के एक व्यक्ति ने शराब के नशे में इसी बीच गुरु घासीदास को लेकर अक्षम्य-अभद्र टिप्पणी की। सिंधी समाज ने बैठक कर उस व्यक्ति को तुरंत समाज से बहिष्कृत किया और प्रशासन से कठोर कार्रवाई की मांग की। एक्शन हुआ आरोपी गिरफ्तार हो गया। इसी बीच रायगढ़ में ही 30 अक्टूबर 2025 की देर रात असामाजिक तत्वों ने राममंदिर में तोड़फोड़ की। भगवान राम की मूर्ति को नाली में फेंक दी।…

ये जितने भी घटनाक्रम हुए इन्हें नहीं होना चाहिए था। ये सब अक्षम्य हैं। ऐसे कुकृत्यों को छत्तीसगढ़ की माटी स्वीकार नहीं कर सकती है। क्योंकि सर्वसमावेशी छत्तीसगढ़ की ये मूल भावना नहीं है। किंतु आप अगर इन घटनाक्रमों के मूल में देखेंगे और गहराई से सोचेंगे तो आपको जो ‘कॉमन’ बात देखने को मिलेगी। वो है विभाजन , वैमनस्य, अलगाववाद , क्षेत्रवाद जैसी संकीर्ण मानसिकता और आग में घी डालकर अपनी राजनीतिक ज़मीन मजबूत करने की धारणा। क्या ये सारी चीज़ें छत्तीसगढ़ की अस्मिता पर आघात नहीं कर रही हैं?

सोचिए ! वो छत्तीसगढ़ जो भगवान राम का ननिहाल है। राम जहां भांचा राम के तौर पर पूजे जाते हैं। दंडकारण्य का क्षेत्र है। बस्तर का दशहरा है‌। राजिम का कुंभ है। मांडूक्य ऋषि और शृंङ्गी ऋषि की तपोभूमि है। गुरु घासीदास के संदेशों का पुण्य प्रवाह है। रामनामी समाज की ‘राममय’ भावना है। कबीर पंथियों का उपदेश है। आस्था का शदाणी दरबार है। भगवान पार्श्वनाथ का शांति संदेश है। सिख गुरुद्वारों से एकत्व की गुरुबानी गूंजती है। छत्तीसगढ़ जहां के कोने-कोने में जनजातीय समाज के स्व की अनुगूंज है। छत्तीसगढ़ जहां ऋषि-मुनियों से लेकर समृद्ध सांस्कृतिक परिवेश का वातावरण है। जहां के सहज-सरल और आत्मीयता से भरे समाज में कोई भी आसानी से घुल मिल जाता है। यहां की कला, परंपराएं, शैली, खान-पान और वेश-भूषा की विविधता देखने को मिलती है। जो उत्सवों और दैनिक जीवन में समरसता के प्रतिबिंब के तौर पर दिखाई देती है। वो छत्तीसगढ़ जहां अलग-अलग क्षेत्रों में विविध मान्यताएं और परंपराएं मनाई जाती हैं। लेकिन सबमें एकता की धुन सुनाई देती है। सब समरस होकर जीवन की उमंगें बिखेरते हैं।

इसी छत्तीसगढ़ में आखिर! ये कौन लोग और कौन संगठन हैं ? जो अपने ‘वाद’ के लिए छत्तीसगढ़ में वैमनस्य फैलाने में जुटे हुए हैं? ये अचानक से ‘तुम्हारे महापुरुष-मेरे महापुरुष’ करने वाले लोग कहां से आ रहे हैं? ये स्थानीय बनाम बाहरी के विभाजनकारी दृश्य कहां से उभरने लगे? विशाल हिंदू समाज को जातियों में, क्षेत्रवाद में बांटने वाले लोग कहां से आ रहे हैं? क्या हमारे आराध्य, महापुरुष केवल जातियों, समूहों के महापुरुष हैं? याकि संपूर्ण समाज के आदर और श्रद्धा के केंद्र। क्या हम इतनी संकीर्णता का शिकार हो रहे हैं कि — अब हम महापुरुषों का भी बंटवारा कर रहे हैं। क्या हम जाति-समुदाय के आधार पर महापुरुषों को देखेंगे? क्या हमारे इन महापुरुषों ने यही सिखाया था? ज़रा ! ढूंढ़कर एक ऐसी पंक्ति या कथन लाकर दिखा दीजिए जब हमारे इन महापुरुषों ने किसी भी प्रकार के बंटवारे की बात कही हो। उनके विचार, कार्य और दर्शन हमेशा से समाज को जोड़ने वाला रहा है। फिर ऐसे में कौन लोग हैं जो इनकी आड़ में सामाजिक ताने-बाने को क्षत-विक्षत करने का मंसूबा पाले हुए हैं? आख़िर उनका उद्देश्य क्या है?

सवाल ये भी पूछिए कि -जो लोग समाज में विभाजन फैला रहे हैं क्या उनका उद्देश्य शुद्ध और सात्विक है? क्या वो वास्तव में छत्तीसगढ़ का भला चाहते हैं याकि समाज में विभाजन के बीज बो रहे हैं? जब हम ख़ुद को भारत माता की संतान कहते हैं तो फिर हमारे अंदर किसी भी तरह के अलगाव वाले ‘वाद’ का ज़हर कहां से आ रहा है? क्या इसके पीछे कोई संगठित तंत्र काम कर रहा है? जो विराट समाज में भेद और वैमनस्य पैदा करना चाहता है? क्या कोई रणनीति है जो ये चाहती है कि — हम सब आपस में लड़ते हुए अपनी हानि कर बैठें जिससे प्रगति से पीछे हो जाएं। क्या हम इन बिंदुओं पर कभी सोचते हैं?

क्या हमारी भाषा, संस्कृति, बोली, मूल्य, संस्कार और पूर्वजों ने कभी अलगाव का भाव दिया? सत्य तो ये है कि हम सब अपने तमाम मतभेदों के बाद भी हमेशा एक रहे हैं। हर जाति, समाज, समुदाय का सम्मान करना। एक-दूसरे के सुख-दुख का साझीदार बनना। यही छत्तीसगढ़ की संस्कृति और परंपरा है। यही भारतभूमि का बोध है।आदिकाल से भारत में विभिन्न राज्य सत्ताएं रही हैं। लेकिन राष्ट्रीयता, एकात्मता की भावना एक रही है। कभी दक्षिण के राज्यों में ‘भाषा’ और हिंदुत्व विरोध के नाम पर वैमनस्य, कभी महाराष्ट्र में ‘मराठी’ अस्मिता के नाम पर विभाजन…और अब छत्तीसगढ़ में ‘वाद’ की संक्रामक बीमारी कहां से आ रही है? क्या इन सबके पीछे कोई ख़ास पैटर्न है? क्या इन विभाजनकारी कृत्यों से कभी किसी का भला हुआ है? क्या छत्तीसगढ़ की माटी इन कृत्यों को स्वीकार करेगी? वैसे जब-जब हमने अपनी पहचान को ‘राष्ट्रीयता’ से अलग किया है। उस समय दुराग्रही राजनीति ने समूचे समाज को भारी नुक़सान पहुंचाया है। एक व्यक्ति, परिवार और समाज के नाते हमें यह ध्यान रखना होगा कि — जाति, प्रांत, बोली-भाषा, समुदाय आदि के नाम पर जितने भी बंटवारे किए जाते हैं। वो हमारी एक राष्ट्रीय पहचान-हिंदुत्व की पहचान पर कुठाराघात करना होता है। ताकि हम आपस में संघर्षों में उलझे रहें। जोकि अस्वीकार्य है।

आप सोचिए कि जब हमने अपने आदर्श और महापुरुष चुने तो किन्हें चुना? उन्हें न! — जो त्यागी, तपस्वी थे। जो समाज के लिए जिए और समाज के लिए मर गए। हमने आदर्श उन्हें चुना जिन्होंने अभावों के बीच भी समरसता के भाव प्रकट किए। जात-पात, ऊंच-नीच की भावना को त्यागने और एकजुटता का संदेश दिया। ऐसे में क्या हम उपद्रवियों के झांसे में आ जाएंगे? क्या हम अपनी मूल विरासत को भूल जाएंगे? ये सोचिए..

हिंदू समाज के समक्ष वैसे भी संकट कम नहीं हैं। जिहादियों और मिशनरियों के क्रूर षड्यंत्रों में हिंदू समाज पिस रहा है। सुदूर वनांचलों, गांवों-कस्बों और शहरों में लव जिहाद, कन्वर्जन का आतंक बढ़ता जा रहा है।उस बीच ये नए -नए वितंडा हमें और बांट रहे हैं। ताकि हम एकजुट न हो पाएं। एक-दूसरे के साथ खड़े न हों। हर व्यक्ति एक-दूसरे को शंका की दृष्टि से देखे। अगर ऐसा हुआ तो इसके ज़िम्मेदार हम सब होंगे। आप ही बताइए क्या हम ये सब चाहते हैं? क्या हम ऐसे आगे बढ़ेंगे? क्या हम ऐसे प्रगति करेंगे?अब आप ही तय कीजिए कि हम अपनी छत्तीसगढ़ महतारी की वंदना में एकता के पुष्प अर्पित करना चाहते हैं। याकि ऐसे विभाजनकारी विवादों में फंसकर छत्तीसगढ़ महतारी की पीड़ा बढ़ाना चाहते हैं। तय आप कीजिए…

जय जोहार..

( लेखक साहित्यकार, स्तंभकार एवं पत्रकार हैं)

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