न्यूयॉर्क का मेयर एक जिहादी बन गया, यह आश्चर्य की बात क्यों नहीं है?

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डॉ राजीव मिश्रा

जिहादी मेयर इसलिए बन गया क्योंकि वह डेमोक्रेट कैंडिडेट था. अगर कोई मंगल ग्रह का नरभक्षी प्राणी डेमोक्रेटिक कैंडिडेट होता तो वही मेयर बन जाता. इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है. आश्चर्य करना है तो इसपर कीजिए कि वह जिहादी डेमोक्रेटिक पार्टी का मेयर कैंडिडेट कैसे बन गया?

लेकिन दुनिया को इसपर आश्चर्य होना कब का बंद हो चुका है. इसपर उतना ही आश्चर्य होता है जितना इस बात पर कि राहुल गाँधी अपनी सारी हरकतों के बाद भी विपक्ष का सर्वमान्य नेता कैसे है. डेमोक्रेट्स, यानि अमेरिकी वामपन्थ पूरी तरह से उस हर ताकत के साथ है जो अमेरिका को नष्ट करना चाहता है.

हमारे देश में यह भावना व्यापक है कि अमेरिका का नष्ट होना हमारे हित में है. इसे जरा सावधानी से देखने की जरूरत है. हर देश की तरह अमेरिका में भी राजनीति की विभिन्न धाराएँ हैं. वे धाराएँ अक्सर पार्टी लाइन को क्रॉस भी करती हैं. पर अपने फिलोसॉफिकल स्वरूप में वे दो स्पष्टतः विपरीत धाराएँ हैं. एक धारा है जो मुक्त व्यापार, उद्यम, प्रगति, नई खोज और स्वतंत्रता की धारा है जिसने अमेरिका को डेढ़ सदी की प्रगति, सम्पन्नता और सम्मान दिलाया है. और दूसरी धारा है नियंत्रण, शोषण और दासता की. जो पूरी दुनिया को अस्थिर और पराधीन रखना चाहती है. और अपने देश के निवासियों को भी पराश्रित और विभाजित रखना चाहती है.

अमेरिका का पराभव इस दूसरी शक्ति की जीत है. और इसी जीत को अमेरिका के ही नहीं, पूरी दुनिया के लिबरल सेलिब्रेट कर रहे हैं.

लेकिन न्यूयॉर्क सिटी, जो अमेरिकी कैपिटलज्म का, समृद्धि और स्वतंत्र विचार का गर्भस्थल रहा है वह कैसे आज वामपंथ की जकड़ में उलझा हुआ है? वहां क्या बदला है कि धरती के जिस छोटे से भूखंड पर मनुष्य ने एक सदी में कल्पना और स्वप्न को वास्तविकता में बदल दिया था वह शहर आज एक जिहादी को अपना मेयर चुन लेता है?

क्योंकि एक पीढ़ी पहले उसे समाजवाद की बीमारी लग गई है. उस शहर में जहाँ कोने कोने में समृद्धि और अवसर बिखरे पड़े हैं वहाँ आज एक सामान्य व्यक्ति अमेरिकी परम्परा के विपरीत समृद्धि से स्पर्धा के बजाय ईर्ष्या करना सीख गया है. वह अपने से सफल व्यक्ति की सफलता से सीखने के बदले उसे गिराने और नष्ट करने का सुख लेना चाहता है. इस ईर्ष्या ने उसका शत्रुबोध नष्ट कर दिया है. जिन लोगों ने न्यूयॉर्क को एक मायानगरी, विशाल अट्टालिकाओं का शहर, समृद्धि का प्रतीक बना दिया वह उनसे घृणा करता है और जिन लोगों ने सिर्फ दो दशक पहले उसके शहर को आग में झोंक दिया था और हजारों नागरिकों की हत्या कर दी थी उन्हें अपना नेता चुन लिया है. यह आत्मघाती मानसिकता शुद्ध रूप से समाजवाद की उपज है.

राजनीति के पतन का कारण जानिए

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सुरेंद्र किशोर

1.-कर्पूरी ठाकुर
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सत्तर के दशक की बात है।
मैं समाजवादी कार्यकर्ता था और सारण जिला संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का कार्यालय सचिव था।
सारण जिले के विधायक सभापति सिंह और रामबहादुर सिंह ने बारी- बारी से मुझसे कहा कि आप पटना जाइए।कर्पूरी जी आपको अपना निजी सचिव बनाना चाहते हैं।
मैं जब पटना नहीं गया तो एक दिन अचानक कर्पूरी जी छपरा हमारे आॅफिस में पहुंच गये।उन्होंने मुझसे कहा कि ‘‘मुझे तेज मिलते हैं तो ईमानदार नहीं और ईमानदार मिलते हैं तो तेज नहीं।चूंकि आप दोनों हैं,इसलिए मैं चाहता हूं कि आप मेरे निजी सचिव बनें।’’
एक समाजवादी कार्यकर्ता के लिए इससे बड़ी बात भला क्या हो सकती थी।मैं पटना आया और करीब डेढ़ साल तक उनका निजी सचिव रहा।
मुझे आमंत्रित करते समय कर्पूरी जी ने न तो जाति का ध्यान रखा और न ही किसी और बात का।सिर्फ समाजवादी आंदोलन का व्यापक हित देखा।उनकी चाह थी कि उनके आसपास के लोग ईमानदार हों।
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रामानंद तिवारी
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जब मैं कर्पूरी जी का साथ छोड़ कर पत्रकारिता करने लगा तो रामानंद तिवारी ने मुझे बुलवाया।वे ‘‘जनता’’ साप्ताहिक निकालना चाहते थे।तिवारी जी ने मुझे जनता का, जिसकी शुरूआत रामवृक्ष बेनीपुरी के संपादकत्व में जेपी ने की थी,सहायक संपादक बना दिया।
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अब आइए—
4 नवंबर 1974 की घटना पर
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उस दिन जेपी के नेतृत्व में पटना में जुलूस निकला था।
जेपी जीप पर सवार थे।जुलूस में अन्य अनेक महिलाओं के साथ मेरी पत्नी रीता भी शामिल थी।आयकर गोलंबर के पास रीता जेपी की जीप के पास खड़ी थी तो अश्रु गैस का एक गोला रीता के सिर पर गिरा।वह बुरी तरह झुलस गई।बेहोश हो गई।
भगदड़ मच गई।अर्ध सैनिक बल के जवान बेहोश रीता को पास के नाले में फेंकने ही वाले थे कि आंदोलनकारी गिरिजा देवी (बिहारी साव लेन की)ने उनसे विनती की कि मेरी बेटी है,इसे छोड़ दो।इस तरह उसकी जान बची।लंबे समय तक पी.एम.सी.एच.के राजेंद्र सर्जिकल वार्ड में थी।जेपी उसे देखने अस्पताल गये थे।जेपी ने डाक्टरों से कहा था कि इसके इलाज में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।
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सन 1977 में जब बिहार विधान सभा का टिकट बंटने लगा तो उम्मीदवारों के आवेदन जेपी के यहां भी दिये जाने लगे।उनकी एक सूची जेपी के कदम कुआं स्थित आवास ‘‘चरखा समिति’’ में भी बन रही थी।जेपी ने आवेदन पत्र लेने वालों से पूछा–क्या उस लड़की का आवदेन पत्र आया है या नहीं जिसके सिर 4 नवंबर को अश्रु गैस का गोला गिरा था ?
उन लोगों ने कहा कि ‘‘ नहीं आया है।’’
कई साल बाद तारा सिन्हा ने मेरी पत्नी को बताया था कि दादाजी (यानी जेपी) तुमको विधान सभा का टिकट देना चाहते थे।तारा सिन्हा डा.राजेंद्र प्रसाद की पोती हैं और इन दिनों चरखा समिति की देखभाल करती हैं।
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जेपी ने जात पात पर विचार किए बिना मेरी पत्नी के बारे में
तय किया था। क्योंकि उन्हें लगता था कि समाज के लिए जो अपनी जान न्योछावर करने को तैयार हो,उसे सम्मान मिलना चाहिए,उसका सशक्तीकरण होना चाहिए।(आज तो बाहुबलियों,धन पतियों और जातीय भावनाएं उभार वोट बंटोरने वालों का सशक्तीकरण हो रहा है–अपवादों की बात और है।
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आज की पीढ़ी के समाजवादी नेता
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व्यक्तिगत बात लिखना ठीक तो नहीं लगता, किंतु
यह लिखना जरूरी है ताकि अगली पीढ़ी के लिए रिकाॅर्ड रहे।
1.–एक शीर्ष समाजवादी सत्ताधारी नेता ने मुझे संदेश भिजवाया–मेरी जीवनी लिख देंगे तो एम.एल.सी.बनवा दूंगा।
मैंने जवाब दिया-‘‘मैं जीवित नेता की जीवनी लिखने का पक्षधर नहीं हूं।’’
ऐसा नहीं है कि मैं एम.एल.सी.नहीं बनना चाहता था।किंतु
तभी बनना चाहता था जब बनाने वाले यह समझें कि मेरा एम.एल.सी.बनने से समाज को मेरा कुछ सकारात्मक योगदान हो सकता है।
सिर्फ किसी नेता को फायदा पहुंचा कर कुछ मिले तो वैसे में तो मुझे स्वर्ग भी मंजूर नहीं।
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2.–एक दूसरे शीर्ष समाजवादी सत्ताधारी ने मेरे एक स्वजातीय बाहुबली से कहा कि सुरेंद्र किशोर को ले आओ,उसे एम.एल.सी.बना दूंगा।उस नेता की शर्त थी कि मेरे खिलाफ वह लिखना बंद कर दे।
वह बाहुबली मुझसे किसी अन्य प्रयोजन से पहले मिल चुका था।मैंने उससे साफ-साफ कह दिया था कि आपकी कार्य शैली से राजपूतों का भी भला नहीं हो रहा है।
इसलिए वह एम.एल.सी.का आॅफर लेकर मेरे पास क्यों आता ?
नहीं आया।
उधर शीर्ष नेता ने सोचा होगा कि एक ऊंट के जरिए एक हाथी को उपकृत करेंगे तो हाथी सदा मेरे वश में रहेगा।
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मैंने व्यक्तिगत उदाहरण इसलिए दिया ताकि लोगबाग यह समझ सकंे कि आज की राजनीति क्यों उद्योग -व्यापार का स्वरूप ग्रहण करती जा रही है चाहे जो इस बार चुनाव जीते या हारे।
क्योंकि अपवादों को छोड़कर शीर्ष नेता यह चाहते हैं कि तुम मेरा व्यक्तिगत रूप से भला करो मैं तुम्हारा सशक्तीकरण कर दूंगा।समाज का भला ठेंगे पर !!
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जेपी-कर्पूरी-तिवारी ऐसे नेता नहीं थे,इसलिए उनका मान-सम्मान आज भी है।
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और अंत में
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मैंने अपने लिए किसी से पद्म श्री सम्मान कभी मांगा नहीं था।मेरा आज भी मनना है कि ऐसे सम्मानों से न तो कोई बड़ा बनता है और सम्मान न मिलने से कोई छोटा रह जाता है।
जो जैसा होता है,वैसा ही रहता है।
यदि इस धरती पर कोई भी आपको मिले और कहे कि उससे मैंने पद्मश्री के लिए विनती की हो तो उसका नाम बता दीजिएगा।दरअसल कोई नहीं मिलेगा।
अब पूछिएगा कि मिला तो स्वीकारा क्यों ?
इसलिए कि मैंने अपने परिवार की लगातार उपेक्षा की।उस परिवार की खुशी के लिए स्वीकारा।मुझे तो फर्क नहीं पड़ता,किंतु मुझे पद्म सम्मान मिलने से मेरा परिवार बहुत खुश है।वह खुश है तो उसकी खुशी देखकर जीवन में मेरी खुशी बढ़ गई है।
एक बात और । पद्म श्री देने वाली सरकार के किसी नेता ने आजतक मुझसे यह नहीं कहा कि आपको हमने पद्मश्री दिया है आपको मेरी पार्टी के लिए कुछ करना चाहिए।
उनका ऐसा संयम सराहनीय है।
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कुछ लोग कहते हैं कि मेरा विचार इन दिनों बदला हुआ है।हां,बदला हुआ है।
देश,काल, पात्र की जरूरतों के अनुसार चीन और रूस की कम्युनिस्ट दलों ने भी विचार बदल लिया है।वे लोग समाजवाद से पूंजीवाद की ओर,अंतरराष्ट्रीयता से राष्ट्रीयता की ओर चले गये हैं।
दरअसल उसी तरह बदला हुआ है जिस तरह 1967 में डा.लोहिया और 1977 में जेपी का विचार बदला था–विचार बदलने के पीछे कोई व्यक्तिगत लाभ-लोभ न तो जेपी-लोहिया को चाहिए था न ही आज
मुझे लभ चाहिए।
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लोहिया ने समझा था कि जनसंघ और कम्युनिस्टों को एकजुट किए बिना कांग्रेस सत्ता पर एकाधिकार के जरिए देश को लूटती रहेती।
भुखमरी जारी रहेगी।
भीषण अकाल ग्रस्त बिहार को जरूरत के अनुसार अनाज देने से प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने इनकार कर दिया था।
5 नवंबर 1966 को इंदिरा गांधी ने पटना में कहा कि अनाज की बिहार सरकार की मांग हम पूरा नहीं कर सकते।क्योंकि देश में अन्न की उपलब्धता की स्थिति ठीक नहीं है।
(याद रहे कि उन्हीं दिनों बड़े बड़े घोटालों में सरकारी पैसे जा रहे थे और 100 पैसे घिसकर 15 पैसे बन रहे थे।)
1974–77 में जेपी ने समझा था कि जनसंघ-संघ की मदद लिए बिना इंदिरा गांधी की एकाधिकारवादी-तानाशाही प्रवृति से नहीं लड़ा जा सकता।
मैं समझता हूं कि आज ‘‘गजवा ए हिन्द’’ के भारी खतरे से भारत को बचाना है तो मोदी-योगी-संघ-सेना को ताकत पहुंचानी ही होगी।
जेहाद समर्थकों व मुस्लिम वोट लोलुपों का इस प्रचार में कोई दम नहीं है कि 80 प्रतिशत हिन्दू वाले देश में जेहादी कुछ नहीं कर सकते।नहीं कर सकते क्या ?
जेहादियों के प्रयास से 200 जिलों में हिन्दू अल्पमत में आ चुके हैं।
अब 80 प्रतिशत नहीं रहे हिन्दू।
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4 नवंबर 25

क्या फिर स्वीकार होगा अखण्ड वंदेमातरम्

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-सर्वेश कुमार सिंह-

वंदेमातरम् की रचना के 150 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। सात सितम्बर को वंदेमातरम् का रचना दिवस देशभर में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाएगा। वंदेमातरम् के 150 साल पूरे होने पर उत्साह है। सम्पूर्ण भारत में एक विशेष प्रकार का स्फूरण है। यह स्फूरण देशभक्ति का है। भारतीय जनमानस के रोम-रोम को देशभक्ति की भावना से पुलकित करने वाला है। वंदेमारतरम् दरअसल सिर्फ गीत नहीं है, यह देशभक्ति का प्रेरणापुंज है, यह मंत्र है। इसके शब्द बीज मंत्रों से आच्छादित हैं। यही वजह है कि जब यह अवतरित हुआ तब से आज तक भारत की एकता, विविधता और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक बना है। लेकिन, जिस गीत ने राजनीतिक दूरियां मिटा दी थीं, उत्तर से दक्षिण तक पूर्व से पश्चिम तक राष्ट्रीय एकता का संदेश और क्रांति की प्रेरणा दी। गुलामी की बेडियों में जकड़ी भारत मां को मुक्त कराने के लिए क्रांति कर दी थी। लाखों युवाओं को क्रांति की मशाल हाथ में थमा दी थी, और वे स्वतत्रतता का लक्ष्य लेकर निकल पड़े थे। उसी वंदेमातरम् को आज उसके मूल स्वरूप में स्वीकारोक्ति की आवश्यकता है। राजनीति में तुष्टिकरण के विद्रूप स्वरूप के वशीभूत कांग्रेस ने वंदेमातरम् को खण्डित कर दिया था। राजकीय स्तर पर केवल आरम्भिक दो छन्द ही स्वीकार्य हैं। सम्पूर्ण और अखण्डित वंदेमातरम् आज भी राजकीय मान्यता से बाहर है। इसे राष्ट्रगीत का दर्जो तो है लेकिन, उसके केवल एक संक्षिप्त अंश को ही। भारत का जनमानस इस गीत के 150 साल पूरे होने पर इसके मूल स्वरूप को स्वीकार करने की इच्छा और आकांक्षा संजोये है।

देशभक्ति की प्रबल भावना से जन्मा वंदेमातरम्

अंग्रेजों के क्रर शासन में भारत की सांस्कृतिक और सामाजिक एकता खण्डित की जा रही थी। समाज में भारतीयता के भाव को समाप्त करने या उसको छिन्न-भिन्न करने के लिए अंग्रेज तरह-तरह के हथकण्डे अपना रहे थे। उसी दौर में बंगाल के सरकारी अधिकारी वंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय के हृदय में अंग्रेज सरकार के एक फैसले से क्षोभ उत्पन्न हो गया। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 के बाद ईस्ट इण्डिया कंपनी के हाथों से जब भारत का शासन ब्रिटिश सरकार ने सीधे अपने हाथों में लिया तो भारत में एक गीत गाना अनिवार्य किया गया। यह गीत था, “गाड सेव द क्वीन”, इसमें ब्रिटेन की महारानी की रक्षा की ईश्वर से कामना की गई थी। इसे सरकारी स्तर पर कार्यालयों, शिक्षण संस्थाओं मं गाना अनिवार्य किया गया था। इस घटना से बकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय बहुत आहत हुए, उनका हृदय अंग्रेजों के प्रति क्षोभ से भर उठा। उसी समय उन्होंने भारत माता की स्तुति में एक गीत लिखने का निश्चय किया। देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत चट्टोपाध्याय ने 7 नवम्बर 1876 को वंदेमातरम् की रचना कर दी। वंदेमारम् को कांग्रेस के अधिवेशन में प्रथम बार कलकत्ता में 1876 में गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने गाया। इसके बाद यह कांग्रेस के अधिवेशनों में परंपरागत रूप से गाया जाने लगा। वर्ष 1901 में भी कलकत्ता अधिवेशन में गाया गया, यहां चरणदास ने गायन किया। वर्ष 1905 में वाराणसी में आयोजित अधिवेशन में सरला देवी ने गायन किया। वर्ष 1923 में गायन के समय इसका विरोध हुआ। वंदेमातरम् की प्रबल राष्ट्रीय भावना के प्रकटीकरण के लिए ही स्वतंत्रता सेंनानी लाला लाजपत राय ने अपने समाचार पत्र का नामकरण ही “वंदेमातरम” किया। अग्रेजों की गोली लगने से शहीद हुईं क्रातिकारी मांतगिनी हजारा ने “वंदेमातरम्” का उद्घोष करते हुए अपने प्राण त्याग दिये थे। जर्मनी में मैडम भीकाजी कामा ने “वंदेमातरम्” लिखा तिरंगा स्टट गार्ड में फहराया था। इसे जब बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यास “आनन्द मठ” में 1882 में शामिल किया तो यह क्रांति गीत बन गया।

तुष्टिकरण से खण्डित हुआ वंदेमातरम्

इस गीत की यात्रा 7 नवम्बर 1875 से आरंभ होकर कई पड़ावों से होकर गुजरी है। इस यात्रा में गीत से अनन्य राष्ट्रभक्ति के ज्वार का देशव्यापी प्रसार शामिल है। तो वहीं गीत को अंग्रेजो के प्रतिबंध का सामना करना पड़ा है, भारत विभाजन की विचारधारा के पोषक वर्ग की मानसिकता को संतुष्ट करने के लिए इसे खण्डित किया गया। कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में 28 अक्टूबर 1937 को प्रस्तुत एक रिपोर्ट के बाद इसे खण्डित कर दिया गया। कांग्रेस ने उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जिसमें इसके कई महत्वपूर्ण अंशों को काट दिया गया और केवल आरम्भ के दो छन्द ही स्वीकार किये गए। यह सब कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीति के कारण हुआ। दरअसल रामपुर के अली बन्धुओं का कांग्रेस में मुस्लिम नेता होने के कारण काफी दबदबा था। कांग्रेस उन्हें देश के प्रमुख मुस्लिम नेताओं के रूप में मान्यता देती थी। इन अली बन्धुओं के अनुरोध पर ही कांग्रेस ने खिलाफत आन्दोलन में भाग लेने का फैसला किया था। अली बन्धुओं में छोटे भाई मौलाना मोहम्मद अली जौहर कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। उनकी अध्यक्षता में आन्ध्र प्रदेश के काकानीडा में 28 दिसम्बर 1923 से एक जनवरी 1924 तक अधिवेशन हुआ था। अधिवेशन में परंपरागत रूप से “वंदेमातरम्” गायन होना निश्चित था। इसके लिए प्रख्यात संगीतज्ञ,गायक पंडित विष्णु दिगम्बर पुलस्कर उपस्थित हुए थे। उन्होंने जैसे ही गायन आरम्भ किया तो अधिवेशन की अध्यक्षता कर रहे मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने विरोध कर दिया। उन्होंने गायन रोकने को कहा किन्तु वे नहीं रूके और पूरा वंदेमातरम् गायन किया। लेकिन, क्षुब्ध होकर मौलाना जौहर मंच छोड़कर चले गए। इस विरोध का कांग्रेस के तत्कालीन अन्य नेताओं नेताओं पर गहरा प्रभाव हुआ। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में धार्मिक एकता बनाए रखने के लिए मौलाना जौहर की मांग पर एक समिति बना दी। इसी समिति की रिपोर्ट के आधार पर वंदेमातरम को खण्ड़ित किया गया। इसके साथ ही इसक अनिवार्य गायन से भी मुक्त कर दिया गया। यही खण्डित वंदेमातरम् 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया। वंदेमातरम् को राष्ट्रगीत के समकक्ष मान्यता देने का फैसला संविधान सभा के अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद ने सुनाया था।

वंदेमातरम् की अखण्डता के लिए स्वर

अब पहली बार भारत के किसी प्रधानमंत्री ने वंदेमातरम् के खण्डित होने के भारत के दर्द को उजागर किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 31 अक्टूबर को एकता नगर (केवडिया) में सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जन्मजयंती पर आयोजित कार्यक्रम में “वंदेमातरम्” के भी 150 वर्ष पूरे होने का उल्लेख किया। उन्होंने जब यह कहा कि कांग्रेस ने वंदेमातरम् के साथ वह किया जो अंग्रेज भी नहीं कर सके। यानि, कि वंदेमातरम् जैसे क्रांतिगीत और अनन्य राष्ट्रभक्ति की प्रेरक प्रार्थना को खण्डित कर दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा- “काँग्रेस ने अंग्रेजों से केवल पार्टी और सत्ता ही नहीं पाई, बल्कि कांग्रेस ने गुलामी की मानसिकता को भी आत्मसात कर लिया था। आप देखिए, अभी कुछ दिन बाद ही हमारे राष्ट्रगीत वन्दे-मातरम के 150 साल होने जा रहे हैं। 1905 में जब अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया, उसके प्रतिरोध में वंदेमातरम हर देशवासी का स्वर बन गया था। वन्देमातरम देश की एकता और एकजुटता की आवाज़ बन गया था। अंग्रेजों ने वन्देमातरम बोलने की बात तक बैन लगाने की कोशिश की थी। अंग्रेज़ इस कोशिश में कामयाब नहीं हो पाये! कई हिनदुस्तान के कोने-कोने से वंदे मातरम का नारा गूंजता ही रहा, गूंजता ही रहा। लेकिन, जो काम अंग्रेज़ नहीं कर पाए, वो काम काँग्रेस ने कर दिया। काँग्रेस ने मजहबी आधार पर वन्देमातरम के एक हिस्से को ही हटा दिया। यानी, काँग्रेस ने समाज को भी बांटा, और अंग्रेजों के एजेंडे को भी आगे बढ़ाया। और मैं आज एक बात बहुत जिम्मेदारी से कह रहा हूं- जिस दिन काँग्रेस ने वन्देमातरम को तोड़ने का, काटने का, विभाजित करने का फैसला लिया था, उसी दिन उसने भारत के विभाजन की नींव डाल दी थी। काँग्रेस ने वो पाप नहीं किया होता, तो आज भारत की तस्वीर कुछ और होती” ।

मोदी जी की इस साहसिक प्रतिक्रिया के बाद देश को यह उम्मीद बंधी है कि भारत राजकीय स्तर पर 150 साल बाद वंदेमातरम् के अखण्डित स्वरूप को फिर से स्वीकार करेगा। ऐसा करने का यह उचित और सही समय है, यह समय की भी मांग है। आखिर हम क्यों न उस गीत को समग्र रूप में स्वीकार करें, जिसने क्रांति कर दी। लाखों युवाओं के दिलों में क्रांति और देशभक्ति की लौ जला दी। क्या कुछ लोगों के विरोध के कारण हमें मौन बैठे रहना चाहिए ? क्या हम किसी विरोध के भय से हमेशा राष्ट्रीय प्रतीकों क साथ समझौते करते रहेंगे ? जैसा कि वंदेमातरम् के साथ कांग्रेस ने किया। आखिर समझौता करके भी क्या कांग्रेस ने भारत का विभाजन बचा लिया ? जिन लोगों ने वंदेमातरम् का विरोध किया वे बाद में कांग्रेस छोड़कर मुस्लिम लीग में चले गए। इस देश के विभाजन के लिये जिम्मेदार “द्विराष्ट्र” का सिद्धान्त क्या वंदेमातरम् की भावना से उपजा था ? वंदेमातरम् तो राष्ट्र की एकता और अखण्डता का प्रतीक है।

क्या वंदेमातरम् को खण्डित करने से भारत विभाजन से बच सका

प्रश्न यह है कि क्या वंदेमातरम् को खण्डित करने से कांग्रेस भारत का विभाजन रोक सकी? जिन लोगों के भय से वंदेमातरम् को खण्डित किया गया, क्या वे संतुष्ट हो गए थे। क्या उन्होंने खण्डित वंदेमातरम् के दो छंदों को भी कभी स्वीकारा। इस खण्डित वंदेमातरम् के खिलाफ भी देवबंद के दारूल उलूम ने फतवा दिया। इतना ही नहीं 3 नवम्बर 2009 को देवबंद में ही आयोजित जमीअत-उलेमा-ए-हिन्द के अधिवेशन में वंदेमातरम् को नहीं गाने के लिए प्रस्ताव पारित किया गया। इस अधिवेशन में तत्कालीन गृहमंत्री पी.चिदम्बरम् भी पहुंचे थे। इसी खण्डित वंदेमातरम् को गाने से मुरादाबाद और संभल से सांसद रहे डा शफीकुर्रहमान वर्क ने संसद में इनकार किया। उन्होंने दो बार 2013 और 2019 में संसद में इसका विरोध किया। अभी 29 अक्टूबर को जब महाराष्ट्र की देवेन्द्र फडणवीस सरकार ने एक नवम्बर से 7 नवम्बर तक सभी स्कूलों में वंदेमातरम् के सामूहिक गायन का आदेश दिया तो समाजवादी पार्टी के विधान अबू आजमी ने विरोध किया।

वंदेमातरम् का विभाजन इस आधार पर कर दिया गया कि इसमें दुर्गा, सरस्वती की स्तुति है। जब हम भारत माता को ही दुर्गा और सरस्वती के रूप में देख रहे हैं तो विरोध औचित्यहीन है। अगर कुछ दिन बाद कोई यह कहने लगे कि भारत माता की जय भी नहीं बोलेंगे, इसमें तो देश को माता कहा गया है तो क्या हम इस विरोध के आगे भी झुक जाएंगे। किसी का अपना तर्क और मत हो सकता है लेकिन, राष्ट्रीय जनमानस की प्रबल इच्छा और भावना को समझते हुए ही फैसला लिया जाना चाहिए। यह सात नवंबर “अखण्ड वंदेमातरम् संकल्प दिवस” बन जाए तो एक बार फिर आनन्द मठ का वंदेमातरम् ही देश में गूंजेगा।

A Century-Old Vision for Modern India: How Sister Nivedita’s Educational Dream Echoes in NEP 2020

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By Prof. Ruby Mishra, Principal, Bhagini Nivedita College, University of Delhi

Delhi: As we approach October 28, the birth anniversary of the remarkable Sister Nivedita, it is time to revisit her century-old educational vision—a vision that continues to illuminate India’s modern journey of learning and nation-building. A spirited Scots-Irish teacher and devoted disciple of Swami Vivekananda, Nivedita dedicated her life to India’s awakening through the transformative power of education. What’s truly astonishing is how her revolutionary ideas—conceived more than a hundred years ago—find striking resonance in the National Education Policy (NEP) 2020.

The Revolt Against Rote Learning

Nivedita clearly saw the colonial education system for what it was: a cultural anesthetic designed to disconnect Indians from their roots. She didn’t seek to reform it superficially—she demanded a complete reimagining of education, one that nourished both intellect and spirit. Her educational philosophy rested on three enduring pillars:

•​National Character Building: For Nivedita, education was not merely about literacy or examinations. It was a sacred tool for cultural revival, moral awakening, and the forging of a strong national identity.

•​Holistic Development: She advocated an education system that dissolved barriers between academics, arts, and life skills—insisting that crafts, creativity, and vocational learning were as vital as textbooks.

•​Mother Tongue as Medium: Learning, she believed, must flow through the language of the heart. She insisted on vernacular instruction to ensure accessibility, inclusivity, and cultural rootedness.
Her journey began humbly—with a single student, Mrs. Krishna Bose, the daughter of the great scientist Sir Jagadish Chandra Bose, near Lalbazar in Kolkata. From that modest beginning, Nivedita began shaping young minds, particularly empowering women through education, and sowing the seeds of a national awakening.

More Than a Teacher: Nivedita, the Visionary Ally
Sister Nivedita’s contribution extended far beyond the classroom. She became an indispensable collaborator in Sir Jagadish Chandra Bose’s scientific journey—not just as a confidante, but as his editor, fundraiser, and public advocate.
She refined his manuscripts for seminal works such as The Living and Non-Living and Plant Response, helped secure funding for his laboratory, and used her eloquent writing to popularize his research in newspapers and journals. Through her tireless efforts, she ensured that Bose’s pioneering discoveries received the recognition they deserved. Nivedita was, in every sense, the pillar of strength behind his genius.

A Timeless Vision Realized: Nivedita and NEP 2020
More than a century later, NEP 2020 stands as a living testament to Nivedita’s dream—affirming that the true goals of Indian education are timeless.

•​Holistic Education: NEP’s emphasis on multidisciplinary learning—breaking the rigid divides between arts, sciences, and commerce—echoes Nivedita’s call for integrated education that nurtures every dimension of human potential.

•​Mother Tongue Instruction: The policy’s advocacy for teaching in the mother tongue or local language until Grade 5 (and beyond) beautifully mirrors Nivedita’s belief that education must grow from the soil of one’s own culture.

•​Skills and Vocational Integration: NEP 2020’s focus on vocational education from Grade 6, promoting practical skills and the “dignity of labour,” directly reflects Nivedita’s vision of blending academics with real-life learning.

A Vision That Transcends Time
Sister Nivedita’s work was far more than social service—it was nation-building through education. Her dream was to shape enlightened, confident, and self-reliant citizens who would build a free and vibrant India. The deep harmony between her ideals and NEP 2020 is not a coincidence—it is a continuum of India’s educational renaissance, rooted in its cultural wisdom and driven by the power of knowledge that empowers.

As we celebrate her birth anniversary, we honour a true pioneer whose century-old vision still guides India’s modern educational journey.

Happy Birth Anniversary, Sister Nivedita—The Nation Salutes You.

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