दिशोम गुरु: शिबू सोरेन की अमर गाथा

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दिल्ली। झारखंड के जननायक, ‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन का 4 अगस्त 2025 को 81 वर्ष की आयु में दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में निधन हो गया। लंबे समय से किडनी की बीमारी और स्ट्रोक से जूझ रहे शिबू सोरेन ने आदिवासियों के हक और झारखंड के गठन के लिए जीवन समर्पित किया। उनके निधन पर पूरे देश में शोक की लहर है।

शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को हजारीबाग (अब रामगढ़) के नेमरा गांव में हुआ था। उनके पिता सोबरन मांझी, एक शिक्षक थे, उनकी 1957 में महाजनों द्वारा हत्या ने शिबू के जीवन को बदल दिया। पढ़ाई छोड़कर उन्होंने महाजनी प्रथा के खिलाफ ‘धानकटनी आंदोलन’ शुरू किया, जिसने आदिवासियों को उनकी जमीन और सम्मान दिलाने में मदद की। 1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना कर उन्होंने अलग झारखंड राज्य के लिए लंबा संघर्ष किया। उनकी मेहनत 2000 में रंग लाई, जब झारखंड राज्य बना।

तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री और आठ बार दुमका से लोकसभा सांसद रहे शिबू सोरेन ने केंद्र में कोयला मंत्री के रूप में भी योगदान दिया। हालांकि, चिरूडीह कांड और शशिनाथ झा हत्याकांड जैसे विवादों ने उनके करियर को प्रभावित किया, लेकिन वे हमेशा आदिवासी समुदाय की आवाज बने रहे।उनके समर्थक उन्हें ‘गुरुजी’ कहकर पुकारते थे, जो उनकी सादगी और जनता से जुड़ाव को दर्शाता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें “जमीनी नेता” बताते हुए शोक जताया, जबकि कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने उनके जल, जंगल, जमीन के लिए संघर्ष को याद किया। उनके बेटे, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा, “आज मैं शून्य हो गया हूँ।” झारखंड सरकार ने सात दिन के राजकीय शोक की घोषणा की।

शिबू सोरेन की विरासत झारखंड के हर कोने में बसी है। उनका संघर्ष, साहस और समर्पण आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा। अंतिम जोहार, दिशोम गुरु।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की असंगत जुबान- नियंत्रण आवश्यक

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संजय स्वामी

भारत की इलेक्ट्रॉनिक् मीडिया का गंभीरता से आंकलन करें तो हमें कुछ न्यूज़ चैनलों के रिपोर्टर पत्रकारिता के मानदंडो से अपरिचित दिखाई देते हैं। ये कच्चे और अगंभीर पत्रकार समाज में खबरों को दुषित कर परोसने का काम कर रहे हैं । बड़े मीडिया हाउस यहां नाम लेना उचित नहीं ऐसा आभास होता है कि वे कम वेतन में स्तर हीन रिपोर्टर रखकर अपने दर्शकों की संख्या घटा रहे हैं। देखने में आ रहा है कि कतिपय समाचार वाचकों तथा पत्रकारों द्वारा जो प्रसारित किया जा रहा है उसमें असंगत तथ्य और अनुचित शब्दों का प्रयोग लगातार हो रहा है। उदाहरणार्थ कुछ चैनल्स के रिपोर्टर लगातार कहते हैं कि योगी फोर्स, योगी की पुलिस, योगी का पीला पंजा, योगी के बुलडोजर आदि आदि। संविधान के अनुसार सरकार पांच वर्ष में परिवर्तित होती रहती है ।

मुख्यमंत्री तो कभी भी परिवर्तित हो सकते हैं। हमारे देश में पुलिस सेवा में चयन निश्चित संवैधानिक प्रक्रिया से होता है। नियमों, योग्यता और परीक्षा के द्वारा होता है न कि किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के प्रभाव से। पुलिस विभाग अपने कर्तव्यों का निर्वहन देश प्रदेश की कानून व्यवस्था के लिए करता है, न कि किसी व्यक्ति विशेष के लिए। विभिन्न प्रकार के कार्य उनके विभागीय दायित्व हैं यदि कोई कोताही करें तो उन पर विभागीय कार्यवाही होती है।

भारतीय नागरिक पुलिस या अन्य किसी भी विभाग में सेवा के लिए भर्ती होता है। वह अपनी सेवा निवृत्ति तक संबंधित विभाग में सेवा करता है। इतने लंबे कालखंड में अनेक सरकारें सत्ता में आती जाती रहती हैं। अनेक मंत्री, मुख्यमंत्री आदि पदासीन-पदच्युत होते रहते हैं ।इसलिए पुलिस या प्रशासन का किसी से नाम जोड़ना उचित नहीं है। पत्रकार यदि सम्यक शब्दप्रयोग से न्यून हैं तो यह सही पत्रकारिता नही है। विडंबना यह है कि देखा देखी में अनेक चैनलों में एक सी जुबान प्रयोग होने लगती है। देश के राज्यों में अपनी अपनी प्रदेश पुलिस व्यवस्था है। रिपोर्टर्स को उत्तर प्रदेश पुलिस, मध्य प्रदेश पुलिस, केरल, महाराष्ट्र पुलिस आदि बोलना चाहिए। वहां के प्रशासन का नाम लेना चाहिए। इसी प्रकार देश में अनेक स्वायत संगठन हैं। उनके अपने संचालन के नियम हैं।लखनऊ विकास प्राधिकरण, मेरठ विकास प्राधिकरण, मुंबई महानगरपालिका आदि संस्थाओं का नाम उच्चारित करना चाहिए। परंतु अनेक बार स्थानीय मुख्यमंत्री का ही नाम लेते रहते हैं । यह अनुचित है, अनचाहे ही सही राजनीतिक प्रचार हैं। कर्तव्यनिष्ठ सेवा कर्मियों, अधिकारियों का अपमान है।

मीडिया को कोई रोक-टोक नहीं है। वह किसी भी मुख्यमंत्री, मंत्री को अपने यहां बुलाए, भरपूर सम्मान दे। परंतु आग्रह है कि राजकीय सेवा में रत अधिकारियों, कर्मचारियों के लिए उचित शब्दों का प्रयोग करें। प्रसारण चैनलों को चौकन्ने रहते हुए समाज में द्वेष फैलाने वाले अमर्यादित रिपोर्टर्स और समाचार वाचकों को सीधे रास्ते पर लाना चाहिए। स्मरण रहे मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। विद्यार्थी, युवा पीढ़ी समाचार पत्रों और आधुनिक समय में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से भाषा सिखती है।
_ संजय स्वामी

हिन्दू कभी आतंकवादी नहीं हो सकता

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दिल्ली । से 2014 के मध्य पूरा भारत आतंकवाद से त्रस्त था। आये दिन होने वाले आतंकी बम धमाकों ने देश की जनता को भयभीत कर रखा था। ऐसे ही बम धमाकों की श्रृंखला में महाराष्ट्र के मालेगांव में 29 सितंबर 2008 को हुए बम धमाकों में कम से कम छह लोग मारे गए थे और 100 से अधिक लोग घायल हुए थे। 17 वर्षों के बाद मालेगांव की घटना की आम और खास लोगों में चर्चा का एक विशिष्ट प्रयोजन है। तत्कालीन केन्द्र की कांग्रेस सरकार मुस्लिम तुष्टिकरण की सारी हदें पार करते हुये जहां एक ओर पाक प्रायोजित आतंकवाद पर ढुलमुल रवैया अपनाये रही वहीं दूसरी ओर मालेगांव बम विस्फोट पर ष्हिन्दू आतंकवादष् का एक काल्पनिक कथानक रचकर उसे खूब प्रचारित और प्रसारित करने का प्रयास किया। बिना किसी सबूत के और बिना किसी जांच के राष्टी्रय स्वयंसेवक संघ तथा अन्य हिन्दू संगठन से जुड़े कई लोगों को गिरफ्तार लिया गया जिनमें साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, लेफ्टीनेन्ट कर्नल पुरोहित, रिटायर्ड मेजर रमेष उपाध्याय, समीर कुलकर्णी अजय रहीरकर, सुधाकर द्विवेदी और सुधाकर चतुर्वेदी प्रमुख हैं। सत्रह वर्षों बाद नेषनल इन्वेस्टिगेषन एजेंसी के विषेष न्यायालय ने 31 जुलाई 2025 को सभी सातों आरोपियों को ठोस सबूतों के अभाव में दोषमुक्त घोषित करते हुए बरी कर दिया।

मुस्लिम तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति करने वाले हिन्दू तथा सनातन विरोधी कांग्रेस और उसके सहयोगी दलां की भगवा आतंकवाद की पूरी थ्योरी न्यायपालिक के प्रथम चरण में ध्वस्त हो गई है। अब न्यायालय के निर्णय पर राजनीति होना स्वाभाविक गतिविधि है।

विषेष अदालत के फैसले ने इस तथ्य को पुनःप्रमाणित कर दिया है कि एक हिन्दू अथवा सनातनी कभी भी आतंकी नहीं हो सकता। यह फैसला बहुसंख्यक हिन्दू समाज तथा संत समाज को आनंदित करने वाला है वहीं कांग्रेस के नेतृत्व वाला समूचा विपक्ष आज उसी तरह से रो रहा है जिस प्रकार वे अयोध्या में बाबरी विध्वंस के समय रोये थे। यह वही मुकदमा है जिसके आधार पर तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने भगवा आतंकवाद का एक पूर्णतः असत्य कथानक रचा और पूरे विश्व में सनातन धर्म को अपमानित करने की कोषिष की। साध्वी प्रज्ञा सहित सभी सात आरोपियां को एक नितान्त मनगढ़न्त आरोपों से अपनी असंबद्धता सिद्ध करने के लिये 17 वर्षों तक न केवल कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी अपितु सतत् मानसिक और षारीरिक प्रताड़ना भी झेलनी पड़ी थी। एक महिला होने के नाते सर्वाधिक अत्याचार व अपमान साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को 9 साल जेल में रहते हुए सहना पड़ा था।

प्रज्ञा ठाकुर का संत से संसद तक का सफर – मध्यप्र्रदेश की भगवाधारी महिला संत प्रज्ञा सिंह ठाकुर को महाराष्ट्र एटीएस ने गिरफ्तार कर उन्हें पर आतंकवचादी बताया था। लेकिन इन्हीं आरोपों को अवसर में बदलते हुए वह भोपाल से बीजेपी की सांसद चुनी गई। जेल में रहते हुए उन पर 10 दिनों तक अपना अपराध स्वीकार करने सहित साजिश कर्ताओं के नाम बताने के नाम पर अथाह अत्याचार किये गये जिस कारण उनका स्वास्थ्य भी बिगड गया था। किंतु प्रज्ञा ठाकुर जी ने अपना धैर्य ,साहस व मनोबल नहीं खोया सभी आरोपी बराबर कहते रहे थे कि यह एक साजिश है और उन सभी को फंसाया जा रहा है। उन सभी के साहस और धैर्य ने हिन्दू-भगवा को आतंकवाद के अनर्गल आरोप से मुक्त करा दिया है।

अब आज जाकर साध्वी प्रज्ञा ठाकुर व सभी सात अन्य आरोपी पूर्ण रूप स्वतंत्र हुए हैं हालांकि अभी पीडित परिवारों के वकील का कहना है कि वह सभी लोग मामले को सुपीम कोर्ट में चुनौती देंगे वही कुछ मुस्लिम परस्ती की राजनीति करने वाले लोग इस मामले में जनहित याचिका भी डालने जा रहे हैं किंतु महाराष्ट्र सरकार की ओर से स्पष्ट कर दिया गया है कि फिलहाल वह इस मामले को ऊपरी अदालत में नहीं ले जाएगी।वहीं कांग्रेस सहित मुस्लिम संगठन महाराष्ट्र सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए कह रहे हैं कि जिस प्रकार वह त्वरित गति से मुंबई ट्रेन धमाकों के मामले को ऊपरी आदालत में लेकर चली गई इसी प्रकार उसे इस फैसले में भी करना चाहिए।

किंतु यहां पर सबसे बड़ा प्रश्न यह भी है कि इन सभी अरोपियों के जो 17 बहुमूल्य वर्ष व समय खराब हुआ है उसकी भरपाई कौन और कैसे कर पायेगा? । यह जानना भी आवश्यक है कि भगवा आतंकवाद की थ्योरी का जनक आखिर है कौन और इससे किसको लाभ होने वाला था। किसने इन सभी लोगां को आरोपी बनाने की कहानियां गढ़ी क्या अब उन सभी को न्यायपालिका , जांच एजेंसियों के कठघरे में खड़ा किया जाएगा। आखिर कौन है जो हिन्दुओं व भगवा को बदनाम करने के लिए साजिषें रच रहा था और फिर सबसे विषेष मालेगांव व समझौता एक्सप्रेस जैसे बम धमाके करवाने व फिर उन सभी तमाम घटनओें में साधु -संतों को गिरफ्तार करने की साजिषें कौन रच रहा था।निष्चित रूप से उस समय कांग्रेस केंद्र की सत्ता में थी और महाराष्ट्र में कांग्रेस -एनसीपी की सरकार थी। जब यह घटना घटी थी उस समय महाराष्ट्र में एनसीपी के आर आर पाटिल गृहमंत्री थे और केंद्र में कांग्रेस के गृहमंत्री शिवराज पाटिल थे।

महाराष्ट्र के वर्तमान मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कोर्ट का फैसला आने के बाद कहा कि भगवा आतंकवाद का झूठा नैरेटिव गढ़ने के लिए अब कांग्रेस को देश से माफी मांगनी चाहिए। भगवा आतांकवाद की थ्योरी का जन्मदाता एनसीपी नेता षरद पवार को ही माना जा रहा है और उनकी इस नीति को गृहमंत्री शिवराज पाटिल के बाद सुशील कुमार शिंदे , मध्यप्रदेश कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह व कमलनाथ और फिर उसके बाद गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने ही पूरी ताकत के साथ आगे बढ़ाया।

कोर्ट के फैसले से साफ हो गया है कि कुछ लोगां ने अपने निजी और राजनीतिक स्वार्थ के कारण भगवा आतंकवद के झूठे मुददे को अपनी विकृत राजनीति का हथियार बनाया और पूरे हिंदू समुदाय और हिंदू धर्म को आतंकावाद से जोडने की नाकाम कोषिष की गईं और अब इन सभी साजिषों की परत दर परत उखड़ने लग गई है।

इससे पूर्व समझौता एक्सप्रेस बम धमाके की साजिश रचने के आरोप में स्वामी असीमानंद महाराज भी बरी हो चुके हैं इस प्रकार यह दूसरा बड़ा अवसर है जब कांग्रेस की भगवा आतंकवाद की थ्योरी कोर्ट में ध्वस्त हे गई है।कोर्ट का फैसला आते ही हिंदू संगठनों में आनंद व उत्साह का वातावरण देखा गया तथा सभी ने पटाखे दागकर व एक -दूसरे को मिठाई खिलाकर विजय का उत्सव मनाया।

कोर्ट की अहम टिप्पणियां – इस पूरे प्रकरण में अपने अंतिम फैसले में कई ऐतिहासिक व गंभीर टिप्प्णियां करते हुए कहाकि ,“आतंकवद का कोइ रंग या धर्म नहीं होता।कोर्ट ने माना है कि कई लोगों के बयान उन्हें प्रताड़ित करके लिए गये हैं।“

कोर्ट का फैसला आने के बाद अब हिंदू संगठनों की ओर से पी. चिदम्बरम, दिग्विजय सिंह सहित उन सभी लोगों पर कार्यवाही करने की मांग की जा रही है जो सनातन को बदनाम करने के लिए भगवा आतंकवाद की झूठी साजिश रच रहे थे। निष्चय ही हिंदू आतंकवाद का नैरेटिव एक राजनैतिक साजिश है इसका उददेष्य इस्लामा आतंकियों को खुष करना और वोट बैंक को महबूत करने रहना है। यही कारण है कि कांग्रेसराज में हिंदुओं को डराने -धमकाने के लिए बम धमाके होते रहते थे और मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार भगवा आतंकवाद का झूठा नैरेटिव गढ़ा करती थी। आज पूरे भारत से कांग्रेस का सफाया हो रहा है। भगवा आतंकवाद के जनक तिलमिलाए हुए हैं।यही कारण है कि जब आज सरकार आतंकी ठिकानों पर चुन-चुनकर कार्यवाही करती है तब सेना व सराकर से यह विरोधी दल सबूत मांगने लगते हैं।

अब होने लगे खतरनाक खुलासे – माले गांव पर कोर्ट का फैसला आने के बाद उस समय रची गई साजिश भी बेनकाब होने लगी है और पूर्व अधिकारी तक टीवी चैनलों पर आकर हिंदू धर्म को बदनाम करने के लिए रची गई खुलासा करने लगे हैं। उस समय इस मामले में संघ के कुछ बड़े नेताओं को भी फंसाने की मंशा थीं जिसमें इंद्रेश कुमार का नाम सबसे चर्चित था।

मालेगांव विस्फोट कांड की जांच करने वाली टीम के एक सदस्य मकहबूब मुजावर ने खुलासा किया है कि उस समय एनआईए के एक अधिकारी ने वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत को गिरफ्तार करने के लिए बहुत बड़ा दबाव बनाया था। अंततः उन्हें अपनी नौकरी से भी समय पूर्व ही हाथ धोना पड़ गया था। मुजावर कहते हैं कि रामजी कालसंगरा और संदीप डांगे की जगह साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित का नाम डालकर एक फर्जी जांच शुरू की गई। उन्होंने कहाकि एक “गलत व्यक्ति “ के द्वारा की गई गलत जांच का परिणम आज सामने आ गया है।

इस मामले में तो यूपी के यशस्वी मुख्समंत्री योगी आदित्यनाथ को भी फंसाने की साजिश रची गई थी। वह तो भला हो कि इस पूरे झडे प्रकरण में सभी गवाह धीरे- धीरे मुकरते चले गये।

महाराष्ट्र के मालेगांव में हुआ बम धमाका एक सुनियोजित राजनैतिक साजिश का एक बहुत ही बड़ा और घटिया हिस्सा था जो अब धीरे- धीरे ही सही लगातार बेनकाब होता जा रहा है और सेकुलर ताकतें भी उसी प्रकार से बेनकाब होती जा रही हैं।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आजकल हिंदू धर्म बनाम हिंदुत्व का नारा दिया है और उसकी आड़ में वह सनातन हिदू संस्कृति पर चोट पहुंचा रहे हैं। लेकिन अब यह साफ हो गया है कि राहुल गांधी एक बहुत ही सुनियोजित साजिश के तहत ही हिंदू धर्म बनाम हिंदुत्व का मुददा उठा रहे थे। राहुल गांधी कई बार हिंदू विरोधी बयानबाजी कर चुके हैं। एक खोजी पत्रकारिता करने वाली संस्था विकीलिक्स में दिए इंटरव्यू में उन्होंने मुस्लिम कट्टरपंथ की तुलना में हिंदू संगठनां को हिन्दुत्व के उभार को सबसे बड़ा खतरा बताया था।यह वही राहुल गांधी हैं जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना मुस्लिम ब्रदरहुड से कर चुके हैं।

स्पष्ट है कि राहुल गांधी के नेतृत्त वाला इंडी गठबंधन पूरी तरह से हिंदू विरोधी है और सनातन के उन्मूलन में लगातार लगा रहता है लेकिन यह लोग भूल जाते हैं कि जो सनातन है वो शाश्वत भी है और कभी समाप्त नहीं हो सकता।
प्रेषक – मृत्युंजय दीक्षित
फोन नं. – 9198571540

कब तक बेटियां मरती रहेंगी?

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दिल्ली । वर्षीय आईटी प्रोफेशनल, सशक्त, कामयाब, आज गुलाबी साड़ी में, जो हल्दी और फूलों की ख़ुशबू से अभी भी महक रही थी, पंखे से लटकी मिली। उसकी शादी को छह महीने ही हुए थे। मरने से पहले व्हाट्सएप स्टेटस डाला: “मैंने सब कुछ दिया, फिर भी कम पड़ा। माफ़ करना माँ…”।

एक और मामले में, एक माँ ने अपने बच्चे को सीने से लगाकर शारजाह में दसवीं मंज़िल से छलांग लगा दी। पीछे सिर्फ़ सिसकियाँ और कुछ मैसेज बचे — दहेज और ज़ुल्म की दास्तान।

ये कोई एक-दो वाक़ये नहीं हैं — ये भारत के घरों में रोज़ घट रही ख़ामोश अत्याचारी जंग की चीखें भरी तस्वीरें हैं, जहाँ शादी प्यार नहीं, सौदा बन जाती है। जहाँ बेटी एक इंसान नहीं, लेन-देन की चीज़ बन जाती है। करोड़ों खर्च करके भी मां बाप को इस बात की कोई गारंटी नहीं मिलती कि उनकी होनहार बेटी का दाम्पत्य जीवन भूखे भेड़ियों की ख्वाइशों की भेंट नहीं चढ़ेगा।

शॉकिंग फैक्ट ये है कि दहेज प्रथा, जिसे 1961 में क़ानूनन जुर्म ठहराया गया था, आज भी बेखौफ़ जारी है। दहेज निषेध अधिनियम, भारतीय दंड संहिता की धारा 304B (दहेज हत्या) और 498A (पति या ससुराल वालों द्वारा अत्याचार) के बावजूद, ज़मीनी हक़ीक़त ये है कि दहेज का दानव अब भी हज़ारों बेटियों की जान ले रहा है, कहती हैं सोशल एक्टिविस्ट भागीरथी गोपालकृष्णन।

प्रयागराज की अंशिका को 2024 में मौत मिली। पुलिस कहती है आत्महत्या, लेकिन पिता कहते हैं — “मेरी बेटी को मारा गया। हमने कार दी, गहने दिए, फिर भी लालच बना रहा।” शारजाह की अथुल्या की रहस्यमयी मौत को भी घरवाले साजिश बता रहे हैं — उसे बार-बार दहेज के लिए तंग किया गया।

जयपुर, दिल्ली, ओडिशा, बिहार, हरियाणा, पश्चिम बंगाल — हर जगह, हर राज्य में यही कहानी: नई दुल्हन, पुरानी माँगें, ज़ुल्म, और फिर मौत।
पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं कि राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) के मुताबिक, “2024 में 292 दहेज हत्या की शिकायतें दर्ज हुईं। लेकिन हक़ीक़त इससे भी भयानक है। हर साल क़रीब 7,000 दहेज मौतें होती हैं, जिनमें से सिर्फ़ 4,500 मामलों में चार्जशीट दाख़िल होती है, और 100 से भी कम मामलों में सज़ा होती है। बाकी 90% केस अदालतों में सालों से लटके पड़े हैं। इतना ही नहीं — 67% जांच आधे साल से ज़्यादा समय तक रुकी रहती हैं, सबूत मिट जाते हैं, गवाह डर जाते हैं, और आरोपी खुले घूमते हैं।”

असल मुद्दा सिर्फ़ क़ानून का नहीं, समाज का भी है। एक 2024 के सर्वे में बताया गया कि 90% शादियों में दहेज आज भी लिया जाता है — वो भी खुलेआम। इसे “गिफ्ट”, “रिवाज” या “सम्मान” के नाम पर जायज़ ठहराया जाता है। और जब बेटी ससुराल जाती है, तो उसका दर्जा मेहमान का नहीं, सौदे की चीज़ का होता है।

पितृसत्ता, शादी में ऊँचा घर देखने की सोच , लड़की का ससुराल में रहना — ये सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं जहाँ दहेज की माँग, चाहे जितनी पूरी हो, कम ही लगती है, बताती हैं सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर। आज सोशल मीडिया पर लड़कियाँ सुसाइड से पहले दिल तोड़ देने वाले मैसेज डालती हैं। इंस्टाग्राम, ट्विटर पर आख़िरी चीख़ें दिखती हैं — मगर समाज कहता है: “घरेलू मामला है, नाज़ुक बात है, बढ़ाओ मत…”।

अब वक़्त है सच्चाई से आँख मिलाने का: भारत में दहेज के ख़िलाफ़ क़ानून नाकाम हो चुके हैं। क्योंकि न सिर्फ़ इनका ठीक से पालन नहीं होता, बल्कि समाज की सोच में भी कोई बदलाव नहीं आया। ना डर है, ना शर्म, ना अफ़सोस। युवा लेखिका मुक्ता बहन कहती हैं, “जब तक दहेज को जुर्म नहीं बल्कि परंपरा समझा जाएगा, जब तक पुलिस और अदालतें लड़कियों के बजाय शादी को बचाने की कोशिश करेंगी, जब तक गुनहगारों को सज़ा नहीं मिलेगी और गवाहों को सुरक्षा नहीं मिलेगी, तब तक ये मौतें यूँ ही होती रहेंगी।”

हर साल 6,000 से ज़्यादा बेटियाँ सिर्फ़ इसलिए मर जाती हैं क्योंकि उनका “मूल्य” पूरा नहीं हुआ। अगली बार जब आप किसी शादी में दुल्हन को गहनों में लिपटा देखें — तो सोचिए: क्या ये उसकी खुशी का इंश्योरेंस है… या उसके बलिदान की क़ीमत?

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