दिल्ली को वापस मिला दिवाली मनाने का पारंपरिक अधिकार

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नई दिल्ली: दिल्ली की जनता के लिए इस वर्ष की दिवाली विशेष महत्व लेकर आई है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिल्ली-एनसीआर में हरित पटाखों की सीमित बिक्री और उपयोग की अनुमति देने का निर्णय राजधानी के लाखों परिवारों के लिए खुशियों की नई किरण लेकर आया है। इस निर्णय का भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया पैनलिस्ट खेमचंद शर्मा ने हर्षपूर्वक स्वागत किया है।

उन्होंने कहा कि यह फैसला न केवल न्यायालय के संतुलित दृष्टिकोण का परिणाम है, बल्कि मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता जी के संवेदनशील और दूरदर्शी नेतृत्व का भी प्रतिफल है। उनके प्रयासों से दिल्लीवासियों को अपने सबसे बड़े सांस्कृतिक पर्व दिवाली को पारंपरिक उत्साह के साथ मनाने का अवसर पुनः प्राप्त हुआ है।

खेमचंद शर्मा ने कहा कि
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने दिल्ली की जनता की आस्था, परंपराओं और भावनाओं का सम्मान करते हुए इस विषय को माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। यह निर्णय पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक परंपराओं के बीच संतुलन का अद्भुत उदाहरण है।

उन्होंने आगे कहा कि यह निर्णय केवल एक कानूनी उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह करोड़ों दिल्लीवासियों की भावनाओं की जीत है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता जी ने यह सुनिश्चित किया है कि पर्यावरण की रक्षा के साथ-साथ हमारी पारंपरिक और धार्मिक विरासत भी सुरक्षित रहे।

खेमचंद शर्मा ने कहा कि यह फैसला दिल्ली को एक नई दिशा देता है जहां परंपरा, पर्यावरण और जिम्मेदारी तीनों का संतुलित संगम दिखाई देता है। यह मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता जी के नेतृत्व में दिल्ली की जनता के विश्वास और सकारात्मक परिवर्तन का प्रतीक है।

दिवाली के शुभ अवसर पर खेमचंद शर्मा ने सभी दिल्लीवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह पर्व सभी के जीवन में खुशहाली, समृद्धि और नई ऊर्जा लेकर आए। उन्होंने कहा कि दीपों का यह पर्व अंधकार पर प्रकाश, असत्य पर सत्य और निराशा पर आशा की विजय का प्रतीक है।

अपराध और राजनीति का गठजोड़

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दिल्ली : सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी ने बहस छेड़ दी है कि शाहबुद्दीन जैसे अपराधी के बेटे से उसके पिता के कुकृत्यों के लिए सवाल करना उचित नहीं है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने शाहबुद्दीन के बेटे ओसामा को रघुनाथपुर विधानसभा से टिकट दिया है। यहाँ मुद्दा केवल अपराधीकरण का नहीं, बल्कि अपराधियों को राजनीति में लाने और इसे सामान्य बनाने का है। सभी राजनीतिक दल अपराधियों को टिकट दे रहे हैं, लेकिन राजद ने उस परिवार के युवराज को चुना, जिसके पिता पर तेजाब से एक जीवित व्यक्ति को नहलाने जैसे जघन्य अपराध का आरोप है। उस पीड़ित की असहनीय वेदना को कोई कैसे भूल सकता है?

सवाल यह है कि ऐसी क्या मजबूरी थी? यदि मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट देना ही था, तो क्या बिहार में साफ-सुथरे चरित्र वाले मुस्लिम नेताओं की कमी पड़ गई कि शाहबुद्दीन के बेटे को मैदान में उतारा गया?

मान लिया जाए कि ओसामा ने कोई अपराध नहीं किया, जैसा कि उनके समर्थक और सोशल मीडिया पर उनके पक्ष में तर्क देने वाले दावा करते हैं। लेकिन क्या यह मान लिया जाए कि ओसामा ने अपने पिता की आपराधिक विरासत से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया है? क्या वह अपने पिता के कृत्यों पर शर्मिंदगी महसूस करते हैं?

शाहबुद्दीन भले ही दुनिया से चले गए हों, लेकिन सिवान, गोपालगंज से लेकर किशनगंज तक उनके खौफ का साया अब भी कायम है। शायद यही कारण है कि राजद ने उनके बेटे को टिकट दिया। बिहार ने लालू प्रसाद के गुंडाराज से मुक्ति पाई थी, लेकिन अब तेजस्वी प्रसाद उस दौर को फिर से लौटाने की कोशिश करते दिख रहे हैं।

इसके बावजूद, कुछ लोग बेशर्मी से तेजस्वी का समर्थन कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, सीपीएम के दीपांकर, जो शाहबुद्दीन के बेटे को टिकट दिए जाने के बाद भी तेजस्वी के पीछे-पीछे घूम रहे हैं। ऐसे में सीपीएम अब किस मुंह से बिहार में ब्राह्मणवाद और गुंडाराज के खिलाफ बोलेगी? क्या उन्हें जरा भी शर्म नहीं आएगी?

अखिल भारतीय कार्यकारी मण्डल की बैठक जबलपुर में

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दिल्ली । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रतिवर्ष होने वाली ‘अखिल भारतीय कार्यकारी मण्डल’ बैठक इस संघ शताब्दी वर्ष में मध्य प्रदेश के महाकौशल प्रांत में, जबलपुर शहर में आगामी युगाब्द 5127, विक्रमी संवत 2082, कार्तिक शुक्ल अष्टमी, नवमी एवं दशमी अर्थात दिनांक 30-31 अक्टूबर एवं 1 नवम्बर 2025 को होने जा रही है। यह बैठक दीपावली के पश्चात संपन्न होगी। अखिल भारतीय कार्यकारी मण्डल में संघ रचना के सभी 46 प्रांतों के प्रांत संघचालक, कार्यवाह तथा प्रचारक एवं सह प्रांत संघचालक, कार्यवाह तथा प्रचारक अपेक्षित रहते हैं।

इस बैठक में संघ के पूजनीय सरसंघचालक डॉ मोहन जी भागवत, माननीय सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले तथा सभी छह सह सरकार्यवाह एवं अन्य अखिल भारतीय कार्य विभाग प्रमुखों सहित कार्यकारिणी के सदस्य भी उपस्थित रहेंगे।

संघ के शताब्दी वर्ष का शुभारंभ हाल ही में संपन्न विजयादशमी के पावन पर्व पर नागपुर सहित देश भर में आयोजित विशेष उत्सवों से हुआ है। इस अवसर पर पूजनीय सरसंघचालक जी के उद्बोधन में प्रस्तुत महत्वपूर्ण मुद्दों के अनुवर्तन पर इस बैठक में चर्चा होगी। बैठक में शताब्दी वर्ष के सभी कार्यक्रमों की अभी तक तैयारियों की समीक्षा भी होगी। बैठक में सभी प्रांत अपनी शताब्दी योजनाओं के संदर्भ में विस्तृत वृत्त एवं विवरण प्रस्तुत करेंगे।

वर्तमान समय के समसामयिक विषयों पर उपस्थित कार्यकर्ताओं द्वारा व्यापक विचार-विमर्श भी बैठक का महत्वपूर्ण हिस्सा रहेगा।
हमेशा की भांति वर्ष 2025-26 की निर्धारित वार्षिक योजना की समीक्षा तथा संघ कार्य के विस्तार का वृत्तांत भी लिया जायेगा। बैठक में विशेष कर संघ शताब्दी निमित्त सुनिश्चित संगठनात्मक लक्ष्यों को विजयादशमी 2026 तक पूर्ण करने के संबंध में विचार-विमर्श होगा।

माफीवीर राजदीप: पत्रकारिता का कलंक

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दिल्ली। भारतीय पत्रकारिता में सनसनीबाज पत्रकार के तौर पर ख्यात राजदीप सरदेसाई ने ‘माफीवीर’ के रूप में अपनी पहचान बना ली है। उन्होंने अपने पत्रकारिता कॅरियर में कई ऐसी कहानियां बुनी हैं, जो जांच के आगे ढह जाती हैं, और पत्रकारिता की नींव को कमजोर करती हैं।

13 अक्टूबर 2025 को सरदेसाई ने एक और माफी मांगी—2011 में IBN7 के स्टिंग ऑपरेशन ‘दिल्ली के डबल एजेंट्स’ के लिए, जो कोबरापोस्ट के साथ मिलकर किया गया था। इसने बीजेपी पार्षद अजीत सिंह तोकस पर रिश्वत मांगने का झूठा आरोप लगाया, जिसने बीजेपी-विरोधी उन्माद को हवा दी। 14 साल तक अदालत में घसीटे जाने के बाद, सरदेसाई ने अपने फैलाए हुए झूठ से खुद को अलग करते हुए दावा किया कि उन्होंने केवल एक ‘बाहरी एजेंसी’ की जांच को दोहराया, जिसे बाद में तीसरे पक्ष ने खारिज कर दिया।

द्रोणाचार्य सरदेसाई के एकलव्य रवीश कुमार अब तक पूछ लेते कि तोकस के 14 साल कौन लौटाएगा? उनके सबसे पसंदीदा सवाल है। वे खास मौकों पर यह सवाल कई बार पूछ चुके हैं लेकिन इस बार गुरू (घंटाल) का मामला था, इसलिए उनके मुंह से बकार नहीं निकला। वैसे उन्होंने कैश फॉर वोट में भी अहम भूमिका निभाई थी और उसके बाद उनकी वफादारी की मुरीद पूरी कांग्रेस है लेकिन मजाल है कि आईटी सेल वाले यू ट्यूबर्स को कभी राजदीप और उनकी पत्नी में गोदी मीडिया दिखाई दिया हो। जबकि पत्नी अवसर पाते ही तृणमूल की गोद में जा बैठी लेकिन आईटी सेल वाले यू ट्यूबर्स ने उन्हें गोदी मीडिया नहीं कहा।

वैसे दर्जनों मामलों में बिना माफी मांगे चुप्पी साध लेने वाले राजदीप के लिए माफी मांगना कोई नई बात नहीं है। वे भारतीय मीडिया के माफीवीर हैं। 2020 में, उन्होंने आईपीएस अधिकारी राजीव त्रिवेदी से 2007 की CNN-IBN रिपोर्ट के लिए माफी मांगी, जिसमें उन्हें सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में गलत तरीके से फंसाया गया था। हैदराबाद कोर्ट ने उनकी माफी स्वीकार की। राजदीप सरदेसाई ने यह झूठ फैलाया था कि राजीव त्रिवेदी ने नकली नंबर प्लेट वाली कारें उपलब्ध कराई थीं, जिनका इस्तेमाल सोहराबुद्दीन को अहमदाबाद ले जाने के लिए किया गया था।

2021 में, दिल्ली की ट्रैक्टर रैली के दौरान राजदीप ने दावा किया कि पुलिस ने एक किसान को गोली मार दी—जो एक दुर्घटना थी। इसके लिए इंडिया टुडे ने उन्हें दो हफ्ते के लिए हटाया और एक महीने की तनख्वाह काटी।

2017 में, उन्होंने BHU के कुलपति को मोदी रैली में गलत पहचाना और प्रणब मुखर्जी की मृत्यु की झूठी घोषणा की-दोनों के लिए माफी मांगी। उनकी गलतियां हमेशा बीजेपी नेताओं को निशाना बनाती हैं, जो उनके पक्षपात को उजागर करती हैं। उनके इस काले रिकॉर्ड के बावजूद, देश की एक प्रतिष्ठित मीडिया हाउस उन्हें क्यों पाल पोस रही है।

खान मार्केट गैंग वाले इस बात को जानते हैं कि इतने बदनाम पत्रकार को किसी मीडिया हाउस से ये सम्मान बिना किसी बड़ी पैरवी के नहीं मिल सकता। अब राजदीप ने जब पत्रकारिता में कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ता की तरह ही काम किया है फिर चैनल की मजबूरी को समझना बहुत मुश्किल नहीं है।

सोनिया गांधी के दो या दो से अधिकद इंटरव्यू लेने वाले देश में गिनती के पत्रकार हैं। उनमें एक राजदीप हैं और दूसरे राजीव शुक्ला हैं। वैसे पत्रकारिता में राजदीप और राजीव शुक्ला में सिर्फ इतना अंतर रहा है कि राजीव कांग्रेस पार्टी में रहकर पार्टी के लिए पत्रकारिता कर रहे थे, वहीं राजदीप पार्टी से बाहर रहकर कांग्रेस पार्टी के लिए काम कर रहे थे।

राजदीप के लिए कहा जा सकता है कि वे टीआरपी की होड़ में तथ्यों को ताक पर रखकर, केवल एक कमजोर पत्रकार नहीं बल्कि पत्रकारिता के दुश्मन भी हैं, जो न्यूज़रूम को पोलिटिकल पार्टी के ‘प्रोपगेंडा’ का अड्डा बना देता है।

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