समाजवादी आस्था का दोहरा मापदंड

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श्रावण माह शिव भक्ति का पवित्र माह है जिसमें उत्तर भारत के अनेक राज्यों में पवित्र कांवड़ यात्रा निकलती है। कांवड़ यात्रा में कांवड़िये पहले गंगा नदी तक पैदल जाकर पवित्र जल लेते हैं फिर शिवालयों जाकर महादेव का जलाभिषेक करते हैं। कांवड़िये अपनी यात्रा में 200 से 600 किमी तक पैदल चलते हैं। पूरी यात्रा में कांवड़िये सात्विक जीवन का पालन करते हैं। इस कठिन यात्रा में उनके पावों में छाले तक पड़ जाते हैं। कांवड़ यात्रा में स्त्रियाँ और बच्चे भी सम्मिलित होते हैं। जो सनातनी हिन्दू इस कथों यात्रा का व्रत नहीं ले पाते वे स्थान -स्थान पर कांवड़िओं की भिन्न- भिन्न प्रकार से सेवा करके अपना जीवन धन्य करना चाहते हैं।

ये अत्यंत दुखद है कि छद्म धर्मनिरपेक्ष और वोट बैंक की राजनीति करने वाले राजनैतिक दलों ने इस वर्ष ऐसी पवित्र यात्रा पर क्षोभजनक अमार्यदित टिप्पणियां करीं। समाजवादी पार्टी के नेताओं द्वारा कांवड़ यात्रियों को बेरोजगार, दंगाई और आतंकवादी तक कहा गया। समाजवादी नेता एस. टी. हसन ने कावड़ियों को आतंकवादी कहकर अपमानित कर किया। समाजवादी सोशल मीडिया कार्यकर्ताओं ने कांवड़ यात्रा व यात्रियों को बदनाम करने में कोई कोर कसर शेष नहीं रखी। गंदे मीस्म बनाए गये। कावड़ियों के जत्थों में घुसकर उत्पात मचाया गया जिसके कारण श्रद्धा व भक्ति भाव के साथ घर से सैकड़ो मील दूर शिवालयो में अपार श्रद्धा भाव समर्पित करने के लिए निकले कांवड़िये आहत हैं।

कुछ चैनलों ने बिना ये पड़ताल किये कि वास्तविक अपराधी कौन है, एक- दो समूह के कावड़ियों द्वारा की गई रोडरेज ओर अराजकता के समाचार खूब बढ़ा चढ़ाकर दिखाए और कावड़ यात्रा की नकारात्मक छवि बनाने का पूरा प्रयास किया किंतु ये चैनल ये बताना और दिखाना भूल गये कि कई स्थानों पर कांवड़ यात्रियों जिनमें महिलाएं और बच्चे भी सम्मिलित थे उन पर सुनियोजित हमले किए गए। यहाँ यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कावड़ियों से भी अनुशासित रहने की अपील की थी और पुलिस ने कांवड़ियों की अनुशासनहीनता पर उनको भी उचित दंड देने में विलम्ब नहीं किया। जिसमें एक स्थान पर कांवड़ियों और सीआरपीएफ जवान के बीच मारपीट का विडियो आने पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने त्वरित कार्यवाही की ।
कांवड़ यात्रा और यात्रियों पर विपक्ष, उसके सोशल मीडिया और कुछ टी.वी. चैनल द्वारा लगातार आक्रमण होने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कड़े तेवर अपना लिये और स्पष्ट शब्दों मे चेतावनी देते हुए कहा कि, कुछ असमाजिक तत्व कांवड़ यात्रा की आड़ में वातावरण खराब करने का प्रयास कर रहे हैं। सरकार की प्राथमिकता है कि यात्रा निर्विध्न संपन्न हो। जो भी व्यक्ति किसी प्रकार का हुड़दंग करेगा यात्रा के पश्चात उसके विरुद्ध कठोर कर्रावाई की जाएगी। दोनों उपमुख्यमंत्रियों ने सपा पर हमला बोलते हुए कहा कि कांवड़ यात्रा को बदनाम करने के लिए समाजवादी पार्टी के कुछ अराजक तत्व यात्रा में घुस आए हैं और माहौल को खराब करने की लगातार कोशिश कर रहे हैं।

जब भी हिंदुओं का कोई ऐसा पर्व आता है जिसमें हिन्दू एकता और सामूहिकता परिलक्षित होती है वैसे ही जाती वादी और तुष्टीकरण के बल पर जीवित परिवारवादी समाजवादी दल के नेताओं की आस्था का दोहरा मापदंड सामने आ जाता है और यह स्पष्ट दिखने लगता है कि समाजवादी हिंदुओ के प्रति कितनी नफरत रखते हैं। समाजवादियों को अयोध्या का दिव्य, भव्य राम मंदिर रास नहीं आ रहा, महाकुम्भ -2025 को कलुषित करने व हिंदू सनातन आस्था की छवि को विकृत करने के लिए तो इन्होने महाअभियान ही छेड़ दिया था।

जब प्रदेश में सपा, बसपा की सरकारें हुआ करती थी तब कांवड़ यात्रा व यात्रियों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता था वह किसी से छुपा नहीं है। सपा के कार्यकर्ता और समर्थक कांवड़ियों पर हमले किया करते थे। महिला कांवड़ियों के साथ अभद्रता व दुर्व्यवहार किया जाता था। कांवड़ यात्रा का अपमान करने पर कांग्रेस भी पीछे नहीं है उसके नेता दिग्विजय सिंह ने सोशल मीडिया पर कांवड़ यात्रा को लक्षित करते हुए सड़क पर नमाज पढ़ने को उचित बताया था।

इस वर्ष कांवड़ यात्रा से जुड़े चार प्रान्तों क्रमशः उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और उत्तराखंड के मुख्यमंत्रियों योगी आदित्यनाथ, रेखा गुप्ता, नायब सिंह सैनी और पुष्कर सिंह धामी ने कांवडियों के लिए विशिष्ट व्यवस्था की है जिससे भी विपक्ष चिढ़ा हुआ है । उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने तो कांवडियों पर स्वयं पुष्पवर्षा भी की। उत्तर प्रदेश में शिवालयों को खूब अच्छे ढंग से सजाया -संवारा जा रहा है जो हिन्दू विरोधी विपक्ष के लिए आपत्तिजनक है।

कांग्रेस, सपा ,बसपा सहित सभी विरोधी दलों का हिंदू पर्वो व आस्था के प्रति सदा से ही दोहरा मापदंड रहा है। यही कारण है कि जो लोग मोहर्रम के जुलूसों में फिलीस्तीन और पाकिस्तानन , ईरान का झंडा फहराते हैं उन्हें ये दल आतंकवादी नहीं कहते वहीं जो लोग भारत माता की जय, वंदेमातरम का नारा लगाते हुए भक्तिभाव के साथ शिवालयों में जल चढ़ाने जाते हैं वे इनको आतंकवादी नजर आते हैं।सपा के एक मुस्लिम विधायक इकबाल महमूद ने तो यहां तक कह दिया कि यह “शिव भक्त कम गुंडे ज्यादा नरक में जाना होगा“। यह हिंदू आस्था के अपमान की पराकाष्ठा है।

कांवड़ यात्रा पर हल्ला बोलने वाले समाजवादी नेता संसद के मानसून सत्र के बीच संसद भवन के पास बनी एक मस्जिद में बैठक करने पहुँच गए। भारतीय जनता पार्टी अल्पसंख्यक मोर्चा ने तस्वीर जारी कर आरोप लगाया है कि अखिलेश यादव ने इस मस्जिद को सपा कार्यलाय बना दिया है। अब यह तथ्य स्थापित हो गया है कि समाजवादी पार्टी राम शिव और श्रीकृष्ण विरोधी और मस्जिदों में आधार खोजने वाली पार्टी है । समाजवादी आस्था के प्रति खतरनाक दोहरा मापदंड अपना रहे है। इनकी पीडीए की राजनीति केवल हिंदू समाज को बांटने के लिए है।

अपनी बात : मेरी पुस्तक, खजाने की शोधयात्रा लिखने के पिछे मेरी भूमिका

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प्रशांत पोळ

भारतीय ज्ञान का खजाना इस पुस्तक का मराठी संस्करण प्रकाशित हुआ, 14 मई 2017 को। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केबिनेट मंत्री चंद्रकांत दादा पाटिल की उपस्थिति में यह भव्य समारोह, पुणे में संपन्न हुआ। मेरी यह पहली ही पुस्तक थी। इस पुस्तक में, आशीर्वाद के रूप में परम पूज्य सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत जी की प्रस्तावना थी।

मेरे लिए यह सुखद अनुभव था। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद अनेकों ने कहां, कि इसका दूसरा भाग भी आना चाहिए। कइयों ने तो इसके लिए मेरा फॉलोअप लिया।

लगभग 2015 से में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ इस विषय पर थोड़ा बहुत लिखने लगा। उन दिनों इस विषय पर ज्यादा कुछ नहीं लिखा गया था। माननीय सुरेश सोनी जी की दो पुस्तकें थी, जो इस विषय पर पढ़ने / लिखने के लिए प्रेरणा दे रही थी। पर इसके इतर, ज्यादा कुछ पढ़ने के लिए नहीं था। अभी जो प्रचलन में है, वह ‘आईकेएस’ (इंडियन नॉलेज सिस्टम), यह शब्द तो बहुत दूर था। सोशल मीडिया पर भी उन दिनों ज्यादा कुछ नहीं मिलता था।

ऐसे में इस पुस्तक का जबरदस्त स्वागत हुआ। मराठी के अतिरिक्त यह हिंदी, गुजराती और अंग्रेजी में भी प्रकाशित हुई। अनेक विद्वानों ने इस पुस्तक की प्रशंसा की। सभी भाषाओं में, इसके अनेक संस्करण निकले और निकल रहे हैं। अनेक विश्वविद्यालयों ने इसे संदर्भ ग्रंथ के रूप में मान्यता दी हैं।

तो, ऐसे अत्यंत लोकप्रिय पुस्तक का अगला भाग (सीक्वल) लिखना, यह मेरे सामने एक बड़ी चुनौती थी। *खजाने की शोधयात्रा* लिखते समय इसकी पूरी गंभीरता मुझे थी।

अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा इतनी समृद्ध हैं, कि विषयों की कमी नहीं थी। बस, ज्यादा से ज्यादा शोध करना; प्रमाणिक, वास्तविक और अधिकृत संदर्भ ढूंढना, उन्हें सत्यापित करना, यह बहुत बड़ा काम था। अनेक बड़े-बड़े ग्रंथ पढ़ने पड़े। संस्कृत को समझना पड़ा। अनेक संदर्भ खोज कर निकालने पड़े… ऐसा बहुत कुछ।

पर यह सब करते हुए बड़ा मजा आया। आनंद आया। यह मेरा प्रिय विषय हैं। पसंदीदा हैं। इसलिए, इस विषय से संबंधित पुस्तकों में / ग्र॔थों में अवगाहन करना, यह एक आनंदमयी अनुभव था। पुस्तक लिखने के इस पूरे प्रवास में मैंने इस आनंद का भरपूर अनुभव लिया।

*यह सब अभ्यास करते समय मुझे बार-बार यह अनुभूति होती थी, कि हमारी ज्ञान परंपरा कितनी समृद्ध और संपन्न हैं। हम उन दिनों तत्कालीन दुनिया से बहुत आगे थे। ग्यारहवीं – बारहवीं सदी में, यदि इस्लामी आक्रांता भारत नहीं आते, तो शायद भारत ही नहीं, अपितु विश्व का इतिहास और भूगोल, दोनों बदले हुए रहते।*

यह पुस्तक लिखते समय, ‘पुराना हैं, तो ही सब सुहाना हैं’ या, ‘मात्र भारतीयों के पास ही सब कुछ ज्ञान था’ यह मेरी भूमिका नहीं थी। यह उचित भी नहीं हैं। किंतु यह भी सत्य हैं, कि कुछ हजार वर्ष, अपना भारत विश्व में सर्वाधिक समृद्ध, संपन्न और ज्ञानवान देश था।

*भारत में ‘भाष्य’ की परंपरा सनातन हैं। इसलिए, देश-काल-परिस्थिति के अनुसार, परिवर्तन होते रहेंगे, संकल्पनाएं बदलती रहेंगी, ज्यादा अच्छी चीजों का शोध सतत लगता रहेगा, नई तकनीकी आती रहेगी.. इन सारी बातों पर अपने पूर्वजों की दृढ़ श्रद्धा थी। आद्य शंकराचार्य समवेत अनेकों ने, लगभग प्रत्येक विषय पर भाष्य लिखे। इसके कारण अनेक नई बातें सामने आती गई। सारे विश्व में अपनी ज्ञान परंपरा श्रेष्ठ रही, कारण भाष्य के रूप में, प्रत्येक सिद्धांत का, प्रत्येक संकल्पना का, खंडन – मंडन करते हुए आगे जाना, यह हमारे समाज का स्थाई भाव रहा हैं।*

ऋग्वेद के एक सूक्त पर भाष्य लिखकर, विजयनगर साम्राज्य के सायणाचार्य ने प्रकाश के वेग की सटीक गणना की, तो आदि शंकराचार्य ने उपनिषदों पर भाष्य लिखकर जीवन के मूल्य, दैनिक व्यवहार के नियम, व्यवस्थापन के सिद्धांत आदि विषयों की नए सिरे से व्याख्या की। न्यायशास्त्र के कात्यायन स्मृति, पाराशर स्मृति जैसे ग्रंथों पर अनेक भाष्य लिखे गए और अपने देश में स्थल-काल-परिस्थिति अनुरूप, न्यायव्यवस्था विकसित होती गई।

*विश्व के इतिहास में, दूसरे किसी धर्म में, राष्ट्र में या व्यवस्था में, इस प्रकार की ‘कंटीन्यूअस करेक्शन मेकैनिज्म’ अस्तित्व में नहीं हैं..!*

खजाने की शोधयात्रा इस पुस्तक में इन सब बातों की समीक्षा की हैं। सूर्य मंदिरों की अद्भुत रचना से लेकर तो भारत की प्राचीन और परिपूर्ण न्यायव्यवस्था तक, अनेक विषय इस पुस्तक में लेने का प्रयास किया हैं। प्राकृतिक खेती पर हमारे पुरखों ने कितना गहन विचार किया था, यह इस विषय पर अभ्यास करते हुए समझ में आया। पिंगल ऋषि ने आज के कंप्यूटर / डिजिटल प्रणाली का आधार, ‘बाइनरी सिस्टम’, का भी विचार करके रखा था। आज की कृत्रिम प्रज्ञा (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) यह मानवी मन का शोध लेते समय, ‘भाषा’ इस माध्यम का उपयोग करती हैं। इस भाषा का मानवी मन (बुद्धि) के संदर्भ में पाणिनि ने किस प्रकार से विचार किया था, यह देखकर हम दंग रह जाते हैं..!

*खजाने की शोधयात्रा* के निमित्त, अक्षरश: हजारों संदर्भ देखें। पढे। उनका अध्ययन किया। किंतु यह सब करते हुए एक बात दिल को कचोट रही थी, कि अपनी इस समृद्ध ज्ञान परंपरा पर अपने भारतीयों ने ज्यादा शोध नहीं किए हैं। इन विषयों पर न तो ज्यादा प्रबंध हैं, और न हीं पीएचडी। इसलिए संदर्भों के लिए, कई बार विदेशी खोजकर्ताओं के संदर्भों की ही मदद लेनी पड़ती हैं। समरांगण सूत्रधार, बृहत्संहिता जैसे ग्रंथों के लिए, अधिकतर संदर्भ विदेशी शोधकर्ताओं के ही मिलते हैं। यह हमारा दुर्भाग्य हैं।

यह सब अभ्यास करते समय मन में बार-बार प्रश्न निर्माण हो रहा था, कि कृषि पाराशर, वृक्षायुर्वेद, बृहत्संहिता, समरांगण सूत्रधार, ब्राह्मस्फूट सिद्धांत, न्याय कंदली, सहदेव भाळकी, कात्यायन स्मृति, युक्ति कल्पतरु… जैसे ग्रंथों पर, अपने विश्वविद्यालयों में ज्यादा शोध न होने का कारण क्या हैं? इन विषयों पर पीएचडी करने की कोई सोचता क्यों नहीं हैं..? मुझे विश्वास हैं, इन शोध के प्रयासों से, अनेक नई और उपयोगी बातें सामने आएगी। कृषि पाराशर में दिया हुआ पर्जन्य (वर्षा) का अनुमान, यह सचमुच शोध का विषय हैं। यह अनुमान अगर सत्य हैं, तो अपना सारा कृषि का चित्र बदल सकता हैं। वर्षा के अनुसार फसल लेना यह अपने प्राकृतिक कृषि की प्राचीन संकल्पना हैं। वह ठीक से लागू हो सकेगी।

कुछ वर्ष पहले मैंने ‘वैश्विक गणेश’ यह श्रृंखला लिखी थी। वह सोशल मीडिया और प्रिंट मीडिया में अत्यंत लोकप्रिय हुई। इस निमित्त से, ‘विश्व में भगवान श्री गणेश का अस्तित्व, अनेक स्थानों पर हैं’, यह रेखांकित हुआ। वर्तमान में, पूरे विश्व में हिंदुत्व का पुनर्जागरण हो रहा हैं। इस प्रक्रिया में भगवान गणेश का स्थान कितना महत्व का हैं, यह समझ में आता हैं। पाठकों के आग्रह पर, ‘वैश्विक गणेश’ का समावेश, इस पुस्तक में किया हैं।

यह पुस्तक तैयार करने में अनेकों की मदद हुई। मेरी पत्नी सुमेधा के बिना इस पुस्तक की कल्पना संभव नही थी। उसने न केवल अनेक संदर्भ मुझे उपलब्ध कराएं, वरन् इस पुस्तक के हिंदी अनुवाद में बहुत मदद की। इंद्रनील और निहारिका ने समय निकालकर, मुझे अनेक संदर्भ और ग्रंथ उपलब्ध करवाएं।

लोकतंत्र की नब्ज थमती जा रही है: भारतीय विश्वविद्यालयों में छात्रसंघों की वापसी वक्त की पुकार

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कभी लखनऊ, इलाहाबाद, बनारस, आगरा, दिल्ली, हैदराबाद, गोरखपुर, पटना के विश्वविद्यालयों की गलियों से गूंजती थी नारेबाजी, बहस, वैचारिक टकराव और एक नए भारत की परिकल्पना। वो दौर था जब हर छात्र नेता अपने वक्तव्य में एक आंदोलन की चिंगारी छिपाए रखता था। पर आज, उन गलियों में सन्नाटा पसरा है, छात्रसंघ भवन वीरान हैं और लोकतंत्र की सबसे अहम प्रयोगशाला – विश्वविद्यालय – राजनीतिक निष्क्रियता के बर्फीले साए में जकड़ी हुई है।

जिन्हें सियासत का हुनर आता था, वो अब नौकरी की दौड़ में उलझे हैं; और जो सत्ता का स्वाद जानते हैं, उन्हें छात्रों की चुप्पी रास आ गई है, सत्तर के दशक के छात्र नेता कहते हैं। याद कीजिए कुछ नाम, देवव्रत मजूमदार, चंचल, मोहन प्रकाश, सत्य देव त्रिपाठी, मोहन सिंह, मोहन प्रकाश, अरुण जेटली, रामजी लाल सुमन, राज कुमार जैन, शरद यादव, सीता राम येचुरी, एक लंबी लिस्ट युवा नेताओं की। और अब सूखा!!!

साठ और सत्तर के दशक में लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं ने छात्र राजनीति को जनक्रांति का औजार बनाया था। इमरजेंसी के दौरान कैंपसों से उठी ललकार ने सत्ता की चूलें हिला दी थीं। मगर नब्बे के दशक के बाद जैसे-जैसे निजीकरण का बोलबाला बढ़ा, विश्वविद्यालयों में विचार की जगह करियर काउंसलिंग ने ले ली। छात्रसंघों पर बैन, प्रशासनिक शिथिलता और ‘शांति व्यवस्था’ के नाम पर असहमति की हर आवाज़ को दबा दिया गया।

“जहाँ बहस नहीं होती, वहाँ बदलाव नहीं होता। और जहाँ बदलाव नहीं होता, वहाँ लोकतंत्र दम तोड़ देता है,” कहते हैं समाजवादी चिंतक प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी।”
छात्रसंघ, सिर्फ एक मंच नहीं थे – वे एक संस्कृति थे, जहाँ युवा नेतृत्व निखरता, नीति पर सवाल उठते और वैकल्पिक भविष्य के रास्ते खुलते थे। ये सभी नेता छात्र राजनीति के गर्भ से निकले। मगर अब वो गर्भ ही बंजर हो चुका है।

बिहार से लेकर महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश से लेकर गुजरात तक — कई राज्यों ने छात्रसंघ चुनावों पर रोक लगाकर एक सजीव लोकतांत्रिक परंपरा को कालकोठरी में डाल दिया है। “हंगामा होता है, पढ़ाई बाधित होती है,” ये तर्क अब कफन बन चुके हैं उस छात्र चेतना के लिए जो कभी सत्ता से सीधे सवाल पूछती थी।

NSUI की 2023 की रिपोर्ट बताती है कि छात्रसंघ की अनुपस्थिति में विश्वविद्यालय प्रशासन बिना जवाबदेही के फैसले करता है — हॉस्टल की दुर्दशा, फीस बढ़ोत्तरी, भेदभाव — सब पर छात्रों की कोई बात सुनी ही नहीं जाती। “शासन चला रहे हैं, संवाद नहीं” — यही आज के कैंपस का हाल है।
और इस गुमनामी का सबसे बड़ा खामियाजा भुगत रहे हैं हाशिए के तबके — दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और ग्रामीण पृष्ठभूमि से आए छात्र। 2024 के एक अध्ययन में पाया गया कि ऐसे छात्र जब तक यूनियनों के माध्यम से संगठित नहीं होते, तब तक उन्हें ‘राजनीतिक रूप से शक्तिहीन’ महसूस होता है। उनके मुद्दे — जातीय भेदभाव, लैंगिक उत्पीड़न, संस्थागत पक्षपात — अनसुने रह जाते हैं।जिस पीढ़ी को बोलने की आदत नहीं रही, वह कल सत्ता में चुपचाप अन्याय करेगी, कहती हैं सोशल एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर।
इस निष्क्रियता का असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी साफ़ दिखता है। एक तरफ वंशवादी पार्टियों का बोलबाला है, दूसरी तरफ कॉरपोरेट हितों की तर्जनी लोकतंत्र की दिशा तय कर रही है। नई आवाजें, नए विचार, नए नेतृत्व – सबकी जगह अब चाटुकारिता, उत्तराधिकार और चमचागिरी ने ले ली है।
क्या यह वही भारत है जहाँ गांधी ने छात्रों को ‘राष्ट्रनिर्माण की रीढ़’ कहा था? क्या यही वो विश्वविद्यालय हैं जहाँ एक समय, हर छात्र अपने भीतर एक आंदोलन को पालता था?

अब वक्त आ गया है – इस चुप्पी को तोड़ने का। छात्रसंघ चुनावों की बहाली कोई ‘राजनीतिक मांग’ नहीं, यह लोकतंत्र की पुनर्स्थापना की शर्त है। विश्वविद्यालय डिग्री वितरण केंद्र नहीं, विचार निर्माण स्थल होने चाहिए। उन्हें एक बार फिर बहस, आलोचना और वैचारिक टकराव का मैदान बनाना होगा।
राज्य सरकारों को चाहिए कि वो छात्रसंघों पर लगे प्रतिबंध हटाएं। विश्वविद्यालय प्रशासन को यह समझना होगा कि नियंत्रण से शांति नहीं, बल्कि निष्क्रियता जन्म लेती है। और राजनीतिक दलों को यह ज़िम्मेदारी लेनी होगी कि वो युवाओं को विचार के आधार पर आगे बढ़ाएं, न कि खानदान या संपर्क के आधार पर।

नेल्सन मंडेला ने कहा था, “Education is the most powerful weapon which you can use to change the world.” पर अगर शिक्षा का मंदिर ही राजनीति से काट दिया जाए, तो बदलाव कहाँ से आएगा? इसलिए, छात्र संघों को वापस लाइए। लोकतंत्र को फिर से सांस लेने दीजिए।

बलोच नागरिकों का यूएन को खुला ख़त , पाकिस्तान के झांसे में आकर बलूचिस्तान की लड़ाई को कमजोर नहीं करे संयुक्त राष्ट्र !!

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अनीता चौधरी 

दिल्ली । पाकिस्तान अधिकृत बलूचिस्तान के लोग ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्य देशों को पत्र लिख कर कहा है कि हम सूचित करना चाहते हैं कि पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित प्रस्ताव संख्या 2788 (2025) को अपनाना संयुक्त राष्ट्र की एक कूटनीतिक चाल, पाखंड और पाकिस्तान द्वारा बलूचिस्तान के वास्तविक मुद्दों को कमज़ोर करने का एक प्रयास है।

बलूचों ने अपने पत्र में कहा है कि हम संयुक्त राष्ट्र से आग्रह करते हैं कि वह पाकिस्तान के दोगलेपन पर तत्काल ध्यान दे। एक ओर, पाकिस्तान शांति की बात करता है और क्षेत्रीय विवादों को बिना संघर्ष के सुलझाने का दिखावा करता है, वहीं दूसरी ओर, वह बलूचिस्तान में लगातार सैन्य अभियान चला रहा है। बंदूक की नोक पर किए गए इस गैरकानूनी कब्जे के परिणामस्वरूप इस पूरे क्षेत्र में गंभीर मानवीय पीड़ा और व्यापक अस्थिरता पैदा हुई है।इसलिए हम संयुक्त राष्ट्र, UNSC और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से आह्वान करते हैं कि वे बलूचिस्तान को औपचारिक रूप से एक अधिकृत क्षेत्र के रूप में मान्यता दें और पाकिस्तान को बलूचिस्तान के हवाई क्षेत्र, भूमि और समुद्री सीमाओं को खाली करने के लिए मजबूर करने हेतु निर्णायक कदम उठाएँ, जिससे बलूच लोगों की शांति, स्थिरता और संप्रभुता बहाल हो सके। पत्र में उन्होंने आगे लिखा गई कि हम दृढ़तापूर्वक अपनी मांग दोहराते हैं कि या तो पाकिस्तान शांतिपूर्ण तरीके से बलूचिस्तान से अपनी सेना वापस बुलाए या अंजाम भुगतने को तैयार रहे ।

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